29 नवंबर 2016

किसको कहूँ अब क्या करूँ ?

इश्क-हकीकी को बयान करती ये दो सूफ़ी रचनायें किसकी हैं, ये तो ज्ञात नही । पर ये आत्मा के उस ‘चरम बिन्दु’ को उपलब्ध होने को अवश्य सूचित करती हैं । जब ‘मैं और तू’ का पर्दा बहुत झीना होकर ‘खुद और खुदा’ ही रह जाता है ।





तमाशा ए जहान है, और भरे हैं सब तमाशाई ।
न सूरत अपने दिलवर सी, कहीं अब तक नजर आई ।
न उसका देखने वाला, न मेरा पूछने वाला ।
इधर ये बेकसी अपनी, उधर उसकी ये तनहाई । (बेकसी-मजबूरी)
मुझे ये धुन, कि उसके तालवों में नाम हो जाये । (तालवों-जिज्ञासुओं)
उसे ये कद कि, पहले देख लो है यह भी सौदाई । (कद-ख्याल, हठ)
मुझे मतलूब दीदार उसका, इक खिल्वत के आलम में । (मतलूब-जरूरत) (खिल्वत-एकान्त)
उसे मंजूर मेरी आजमायश, मेरी रुसवाई ।
मुझे घङका, कि आजुर्दा न हो मुझ से कुच्छ दिल में । (आजुर्दा-नाराज)
उसे शिकवा कि, क्यों तूने तबियत अपनी भटकाई ।
मैं कहता हूँ कि, तेरा हुसन आलम-सोज है जाना । (आलम-सोज-जगत)
वह कहता है कि, क्या हो गर करूँ मैं जुल्फ़ आराई । (जुल्फ़ आराई-सजाना)
मैं कहता हूँ कि, तुझ पर इक जमाना जान देता है ।
वह कहता है कि, हाँ बेइन्तहा है मेरे शैदाई । (शैदाई-आशिक)
मैं कहता हूँ कि, दिलवर ! मैं नहीं हूँ क्या तेरा आशिक ।
वह कहता है कि, मैं तो रखता हूँ ऐसी ही रानाई । (रानाई-सुन्दरता)
मैं कहता हूँ कि, तू नजरों से मेरी क्यों हुआ ओझल ।
वह कहता है, यही अपनी अदा मुझको पसन्द आई ।
मैं कहता हूँ, कि तेरा ये हुस्न और देखूँ न मैं उसको ।
वह कहता है कि, मैं खुद देखता हूँ अपनी जेवाई । (जेवाई-खूबसूरती)
मैं कहता हूँ कि, हद पर्दा की आखर तावकै परदा । (तावकै-आत्मवेत्ता)
वह कहता है कि, कोई जब तक न हो अपना शनासाई । (शनासाई-जुदाई सहना)
मैं कहता हूँ कि अब मुझ को नही है ताव फ़ुर्कत की ।
वह कहता है कि, आशिक हो के कैसी ना-शिकेवाई ।
मैं कहता हूँ कि, सूरत अपनी दिखला दीजिये मुझको ।
वह कहता है कि, सूरत मेरी किसको देगी दिखलाई ?
मैं कहता हूँ कि, जाना अब तो मेरी जान जाती है ।
वह कहता है कि, दिल में याद कर क्यों कर थी वह आई ?
मैं कहता हूँ कि, इक झलकी है काफ़ी मेरी तसकीं को । (तसकीं-तसल्ली)
वह कहता है कि, वामे-तूर पर थी क्या निदा आई । (वामेतूर-ज्ञान का शिखर । निदा-आवाज)
मैं कहता हूँ कि, मुझ बेसबर को किस तौर सबर आये ।
वह कहता है कि, मेरी याद की लज्जत नही पाई ।
मैं कहता हूँ कि, ये दाम-ए-इश्क बेढव तू ने फ़ैलाया । (दाम-ए-इश्क-इश्क का फ़ंदा)
वह कहता है कि, मेरी खुदपसन्दी मेरी खुदराई । (खुदराई-स्वयं बनाई हुयी)
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इक ही दिल था, सो भी दिलवर ले गया अब क्या करूँ ।
दूसरा पाता नहीं, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
ले चुका था जाने जाना, जां को पहिले हाथ से ।
फ़िर भी हमले कर रहा, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
हम तो दर पर मुन्तजर थे, तिशन-ए-दीदार के । 
पहुँचते बिसमिल किया, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
याद्दाश्त के लिये, रहता था फ़ोटो जिस्मो जां ।
वह भी जायल कर दिया, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
यार के मुँह पर झरोखे, से नजर इक जा पङी ।
देखते घायल हुआ, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
आप को भी कत्ल कर, फ़िर आप ही इक रह गये ।
वाह नजाकत आपकी, किसको कहूँ अब क्या करूँ ।
(तिशन-ए-दीदार-दर्शन के प्यासे) (जायल-नष्ट)

23 नवंबर 2016

स्वर वायु

- क्या शब्द के साथ अर्थ का कोई स्वाभाविक सम्बन्ध है ?
- शब्द के साथ अर्थ का क्या सम्बन्ध है ? केवल निरुक्तकार लोग ही इस विद्या को जानते थे ।
आत्मा बुध्या समेत्यार्थान मनो युङ्क्ते विवक्षया ।
मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम । पा.6
आत्मा बुद्धि को माध्यम बनाकर विषयों का संकलन करके अभिव्यक्त करने की इच्छा से मन को प्रेरित करती है । मन कायाग्नि को आहत करता है । तत्पश्चात कायाग्नि प्राणवायु को प्रेरित करता है । शरीर में रहने वाली प्राणवायु फ़ेफ़ङों के माध्यम से घूमती हुयी अर्थात कायाग्नि से आहत प्राणवायु जब ह्रदय के अन्तःभाग में भ्रमण करती है तो वह मन्द ध्वनि को उत्पन्न करती है । जो प्रातःसवन (यज्ञादिक्रियोचित) होता है ।
उसके बाद वह प्राणवायु मूर्धा में टकराकर वापस मुख में आकर सभी वर्णों को उच्चारण करने का सामर्थ्य प्रदान करती है । यही विवक्षा है । इसी को परा, पश्यन्ती, मध्यमा, बैखरी वाक नाम दिया गया है ।

परा शब्दब्रह्म की शान्त अवस्था है । इसे परापश्यन्ती या पराप्रकृति भी कहा गया है । परापश्यन्ती शब्दब्रह्म की जागरणोन्मुखी स्थिति है । एवं पराप्रकृति शब्दब्रह्म की सुषुप्ति अवस्था को कहा गया है ।
स एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः ।
मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्यरूपं मात्रास्वरो वर्ण इति स्थिविष्ट ।  
ॐकार रूपी अनाहत नाद स्वरूप सूक्ष्मा वाक नामक प्राण के साथ मूलाधार चक्र में प्रवेश करता है । वह प्राण स्वभाव अव्यक्त सप्तस्वर वाला घोष ध्वनि के साथ होता है । यही परा वाक है ।
इसके बाद वही प्राणवायु मणिपूर चक्र (नाभि) में आकर पश्यन्ती वाक का मनोमय सूक्ष्म रूप धारण करता है ।
इसके पश्चात कंठप्रदेश में स्थित विशुद्ध नामक चक्र में मध्यमा वाक के रूप में व्यक्त होता है ।
फ़िर क्रमशः मुख में आकर हस्व दीर्घ आदि मात्रा उद्दातादि स्वर अकारककारादि वर्ण रूप स्थूल बैखरी वाक का रूप बन जाता है ।
इस प्रकार आत्मा ही अव्यक्त से व्यक्त होकर परा, पश्यन्ती, मध्यमा एवं बैखरी रूप में प्रकट होता है । 

15 नवंबर 2016

ईश्वर - कुछ प्रसिद्ध तथ्य

ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः । 
- ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं ।
ओमित्येतदक्षरमपश्यत ।
- ॐ इस ‘अक्षर’ को देखता है ।
स हि सर्ववित सर्वकर्ता, ईद्दशेश्वर सिद्धिः सिद्धा ।
- वह शक्ति निसंदेह सर्वज्ञ और सर्वकर्ता है । इस प्रकार ईश्वर की सिद्धि सिद्ध करते हैं ।
शास्त्रयोनित्वात । (वेदान्त सूत्र)
- शास्त्र योनि होने से उस परमात्मा की सिद्धि है ।
स एव पूर्वेपामपि गुरु, कालेनानवच्छेदात । (पतंजलि योगसूत्र)
- वह पूर्वजों का भी गुरु है । जो काल के फ़ेर में नही आता अर्थात परमेश्वर है ।
- ईश्वर जैसा विषय जो ‘सपर्य्यगाच्छुकमकायमव्रणम’ कहलाता है । उसे भी मनुष्य जानते हैं और बङी खूबी से प्रमाणित करते हैं । यद्यपि वे उससे कभी मिले नही । 

- जब मैं बहुत दूर और गहराई तक सोचता हूँ तो ज्ञात होता है कि ईश्वर सम्बन्धी ज्ञान मनुष्य आप ही आप अपने ह्रदय में पैदा नही कर सकता । क्योंकि वह अनन्त है हमारा मन शान्त है । वह व्यापक है हम एकदेशीय हैं और भी इसी प्रकार समझिये । इससे यह बात स्पष्ट है कि मूल विचारों को हमने स्वयं नही बनाया । किन्तु परमात्मा ने आदिपुरुषों के ह्रदयों में अपने हाथ से छाप लगा दी है ।
दार्शनिक - डिस्कार्टीज (हिस्ट्री आफ़ नेचरलिस)
- अनेक बङे बङे विद्वानों ने कहा है कि उस समय भी कोई नवीन धर्म प्रवर्तक नही हुआ । जब आर्यों सेमेटिकों और तुरानियों ने नया धर्म व नयी सभ्यता का आविष्कार किया था । ये धर्म प्रवर्तक भी केवल धर्म के पुनरुद्धारक थे, मूल शिक्षक नही ।
ब्ले वेटसकी (सीक्रेट डाक्ट्रिन)
- आदिसृष्टि से लेकर आज तक कोई भी बिलकुल नया धर्म हुआ ही नही ।
मैक्समूलर (चिप्स फ़्राम ए जर्मन वर्कशाप)
- अनेक जन्म जन्मान्तरों में प्राणियों ने नाना प्रकार की योनियों में प्रवेश किया है । अवसर आने पर वही संस्कार जाग्रत हो जाते हैं । जैसे प्राणी जल में पङते ही तथा सोते समय संकट में पङते ही तैरने  और उङने लगता है । किन्तु मनुष्य अपनी देह के साथ बिना सिखाये कुछ भी नही कर सकता ।
- चौपङ के प्रसिद्ध खेल का संकेत है गोट भी मर जाने पर 84 घरों में घूमकर पकती अर्थात छुटकारा पाती है ।
- मैं अपने ज्ञान के नेत्रों से देख रहा हूँ कि आर्यावर्त अपनी राजनीति, अपनी सरकार, अपने आचार और धर्म मिश्र, ईरान, यूनान और रोम को दे रहा है । मैं जैमिनि और व्यास को सुकरात और अफ़लातून से पहले पाता हूँ । प्राचीन भारत के महत्व का अनुभव प्राप्त करने के लिये योरोप में प्राप्त किया हुआ विज्ञान और अनुभव किसी काम का नही, इसलिये हमें आर्यावर्त का प्राचीन महत्व जानने के लिये ऐसा यत्न करना चाहिये । जैसा कि एक बच्चा नये सिरे से पाठ पढ़ता है ।
जेकालियट (योरोपिय विद्वान)
- if there is any paradise in the world. i should point out to india.
यदि प्रथ्वी पर कही स्वर्ग है तो मैं कहूँगा - वह भारतवर्ष है ।
मैक्समूलर (what does india teach us)

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