24 दिसंबर 2016

जानना

यह पूरा लेख सिर्फ़ ‘जानें बिनु न होइ परतीती’ चौपाई का महत्व दर्शाने हेतु है । हमारी कोई भी आराधना/उपासना तब तक सार्थक नहीं । जब तक अंतःदर्शन आदि भक्ति प्रमाण प्रत्यक्ष न हों । अतः रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड का यह अंश किसी सार सिद्धांत या विज्ञान सार की भांति है । केवल इतने मात्र को पूर्णरूपेण समझ लेने पर ‘स्वयं को जानने’ की ठोस भूमि तैयार हो जाती है ।

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ।
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ।
बिना (अंतःदर्शन आदि) जाने प्रतीत (महसूस, अनुभव) नहीं होती एवं बिना प्रतीत के प्रीत (लगाव, निष्ठा) नहीं होती । बिना प्रीति के दृढ़ता से भगति (जुङाव) नहीं होती । जैसे जल और चिकनाई परस्पर मिले हुये भी प्रथक ही रहते हैं ।
बिनु गुर होइ कि ग्यान, ग्यान कि होइ बिराग बिनु ।
गावहिं बेद पुरान सुख, कि लहिअ हरि भगति बिनु ।  
बिना गुरु के ज्ञान और बिना ज्ञान के वैराग नहीं होगा और ज्ञान के बिना सुख संभव नहीं है ।
कोउ बिश्राम कि पाव, तात सहज संतोष बिनु ।
चलै कि जल बिनु नाव, कोटि जतन पचि पचि मरिअ ।  
सहजता और संतोष के बिना विश्राम नहीं होगा । जैसे पानी के बिना नाव चल नहीं सकती ।
बिनु संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ।
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ।

बिना संतोष के इच्छाओं की समाप्ति नहीं होगी और इच्छाओं के रहते सुख संभव नहीं ।
बिनु बिग्यान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ।
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई । बिनु महि गंध कि पावइ कोई ।
रहस्य को जाने बिना समता नहीं होगी । जैसे आकाश के बिना स्थान तथा बिना श्रद्धा के धर्म नहीं होगा जैसे की प्रथ्वी के गुण बिना गंध नही हो सकती ।
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ।
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई ।
बिना तप के प्रकाशित होना संभव नही जैसे कि जल के बगैर रस । सेवा भाव के बिना शील संभव नहीं और तेज के बिना रूप ।
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ।
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ।
स्वयं सुखी हुये बिना मन स्थिर नही होगा जैसे के वायु के बिना स्पर्श । विश्वास के बिना सिद्धि नहीं और बिना ‘हरि भजन’ के ‘भवभय’ का नाश नहीं होगा ।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ।  
अतः बिना विश्वास के भक्ति नहीं और भक्ति के बिना राम प्रसन्न नहीं होगें और राम के प्रसन्न हुये बिना सपने में भी विश्राम नहीं होगा ।
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तब ते मोहि न ब्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ।
जब से मैं राम को जान गया (एक हो गया) तब से माया का प्रभाव समाप्त हो गया ।
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा ।
अतः हे गरुण ! मेरा अनुभव है कि ‘हरि भजन’ बिना कलेश नहीं जाता ।

10 दिसंबर 2016

कैसे जीता रवि से कवि ?

प्रथमदृष्टया यह आत्मज्ञान के बेहद गूढ़ दृष्टांतों में से है और जिनको समाधि में प्रत्यक्ष होने वाले दृश्यों और खाली अन्तःकरण का अभी अनुभव नही है । उनके लिये समझना कठिन ही है । फ़िर भी ‘एकात्मा सर्वाय’ होने से यह ‘चेतना’ को गहरे में ‘कहीं’ झंकृत अवश्य करेगा । इसी आशा के साथ !
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एक राजा ने दो निपुण चित्रकारों (रवि और कवि) की प्रतिभा परीक्षा ली । 
उसने दोनों चित्रकारों से कहा - आमने सामने स्थित इन दो गज का फ़ासला रखने वाली दोनों दीवारों पर आप लोग अलग अलग चित्रकारी करिये ।
राजा की आज्ञा होते ही दोनों दीवारों के मध्य पर्दा तान दिया गया । जिससे वे चित्रकार एक दूसरे का कार्य न देख सकें ।
चित्रकार प्रतियोगिता सम्पन्न करने में लग गये । वे प्रतिदिन आते और अपनी अपनी दीवार पर काम करने के पश्चात चले जाते ।
नियत अवधि बीतने पर राजा साहब अपने सभासदों के साथ चित्रकारों की कला देखने उनके स्थान पर पधारे ।
पहले रवि की दीवार से पर्दा उठाया गया । सभी दर्शक दंग रह गये ।
- अ हा..अ हा । करते हुये बोले - चीन के चित्र भला इससे बढ़कर क्या होंगे ?
तुरा दीदा व मानी रा शुनीदा ।
शुनीदा कै बुबुद मानिंदे दीदा ।
(मैंने तुझको तो देखा है और मानी का केवल नाम सुना है । भला सुना हुआ देखे के बराबर कैसे होगा)
सभी कहने लगे - यह तो हद ही हो गयी । इससे अच्छा चित्रण हो ही नही सकता । रवि चित्रकार ही यह प्रतियोगिता जीतेगा । महाभारत की समस्त घटनाओं को नये सिरे से सजीव ही कर दिया । चित्र जैसे बोल पङने ही वाले थे । इससे बढ़कर तो ख्याल (कल्पना) भी नही हो सकता ।
रवि को पूरे अंक मिलने चाहिये । इनाम इसी को दिया जाना चाहिये । अब कोई आवश्यकता ही शेष नही कवि की कारीगरी देखने की । कमाल है भाई कमाल है ।
त्रप्त तो स्वयं राजा साहब भी ऐसे हो गये थे कि जी नही चाहता था कि कवि की चित्रकारी देखने का कष्ट उठायें ।
किन्तु कवि ने स्वयं ही पर्दा उठा दिया ।
पर्दा उठने की देर थी कि चारो ओर घोर आश्चर्य से निस्तब्धता छा गयी । राजा साहब और अन्य श्रीमन्त लोग दाँतों तले उंगली दबाकर रह गये । कुछ पल के लिये भीतर का स्वांस भीतर और बाहर का बाहर ही रह गया । जिधर देखो सबके सब जङवत और विस्मित से खङे थे ।
आखिर क्या हुआ ! कवि ने ऐसा क्या सितम कर दिया, क्या गजब ढाया उसने ?
ओहो ऐसी अदभुत सफ़ाई..दृष्टि फ़िसली सी जा रही थी । देखो तो सही, दीवार के दो गज भीतर घुसकर चित्र बना आया ।
- हाय जालिम ने मार डाला । क्या ही ठीक निकला यह वाक्य - जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि ।
रवि से कवि कैसे जीता ?
दोनों दीवारों का अन्तर लगभग दो गज का था । तय समयावधि के भीतर रवि तो अपनी दीवार पर रंग रोगन चढ़ाता रहा और इतने समय में कवि अपनी दीवार की सफ़ाई एकाग्रचित्त होकर करता रहा । यहाँ तक कि उसने दीवार एकदम स्वच्छ (दर्पण) बना दी । अतः इस झलकती ढलकती दीवार के मुकाबले रवि की दीवार खुरदरी और भद्दी लगती थी । इसलिये रवि की सब मेहनत एक सफ़ाई की बदौलत कवि ने मुफ़्त हासिल कर ली ।
और दृक शास्त्र (optics) के प्रसिद्ध सिद्धांत के अनुसार जितना अन्तर दीवारों के मध्य में था । उतने ही अन्तर पर कवि की दीवार के भीतर (रवि के) चित्र दिखाई देते थे ।
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ऐ अपरा विद्या के विद्यार्थियो ! ह्रदय पटल पर रवि की भांति चित्रकारी कहाँ तक पङे करोगे । सतह ही सतह (प्रथ्वी तल) पर विविध भांति के रूप कहाँ तक भरोगे । धंसे हुये (crammed) विविध वर्ण मस्तिष्क में कब तक रंग जमायेंगे और बिखरे हुये विचार ठूंस ठूंस कर भरे हुये कब तक काम आयेंगे ।
(आत्म) शिक्षा का अर्थ है - भीतर से बाहर निकालना (खाली करना, होना) न कि बाहर से भीतर ठूंसना । शिक्षा के मुख्य उद्देश्य को कब तक गङबङ करोगे ?
क्यों नहीं कवि की तरह उस पवित्रता (purity) और आत्मज्ञान दिलाने वाली विद्या की ओर चित्त देते ।
(मैं अपने घायल चित्त को हरदम नाखूनों से छीलता हूँ जिसमें यार (परमात्मा) के ख्याल के अतिरिक्त प्रत्येक ख्याल को चित्त से बाहर निकाल दूँ)

ओ मौत !

सन्त गोस्वामी तुलसीदास के कुल में जन्में स्वामी रामतीर्थ जी महाराज (22 अक्टूबर1873-27 अक्टूबर1906) आत्मज्ञानियों में एक विशाल तेज पुंज की भांति ही है । 
इनका जन्म कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा संवत 1930 (सन 1873) को दीपावली के दिन ग्राम मुरारीवाला जिला गुजरांवाला में एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण पण्डित हीरानन्द गोस्वामी (पिता) के परिवार में हुआ था । इनके बचपन का नाम तीर्थराम था । परिवार की आर्थिक स्थिति खराब ही थी ।
बाल्यावस्था में ही इनका विवाह कर दिया गया था । इनके दो पुत्र और एक पुत्री थी ।
आर्थिक तंगी के उन्हीं हालातों में उन्होंने अपने पुरुषार्थ के बल पर पंजाब यूनिवर्सिटी से M.A की पढ़ाई पूरी की और ‘फ़ोरमैन कालेज’ में दो वर्ष तक गणित के अध्यक्ष रहे । उनका पांडित्य अंग्रेजी में भी बेहद प्रसिद्ध था ।
‘उपनिषदों के महावाक्यों का साक्षात्कार कैसे हो सकता है और वेदांत शास्त्र केवल पुस्तकों और वाणी का विषय नही है । किन्तु हर घङी अनुभव का विषय है ।’
इसी भावना के बलवती होने पर नौकरी, घरबार, स्त्री, पुत्र, पिता आदि सबको छोङकर सन्यास ले लिया और पूर्णता प्राप्त करके ही रुके ।
दिसम्बर 1901 में स्वामी रामतीर्थ मथुरा आये और फ़िर आगरा, लखनऊ, फ़ैजाबाद आदि स्थानों में ‘मोहनिद्रा’ में सोते जीवों को जगाया ।
मोहनिशा सब सोबनहारा ।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा । 
कार्तिक 1962 में स्वामी रामतीर्थ हरिद्वार से वशिष्ठ आश्रम को गये ।
उन्होंने कहा - मनुष्य इसलिये नही बनाया गया कि इसी चिन्ता फ़िक्र में ‘मेरा जीवन कैसे चलेगा, मेरा क्या होगा’ मर जाये । उसको इतना सन्तोष तो चाहिये । जितना मछलियों, पक्षियों और वृक्षों को होता है । वे धूप अथवा वृष्टि की शिकायत नही करते । किन्तु प्रकृति के साथ एक होकर रहते हैं । कहो - मैं ही यह मेघ हूँ जो बरस रहा है । मैं ही बिजली होकर तङकता हूँ । मैं ही गर्जता हूँ, मैं कैसा सुन्दर बलवान भयंकर हूँ ।
इस प्रकार ‘शिवोऽहं’ स्वतः ह्रदय से निकले ।
न पश्योमृत्युपश्यति न रोगंनो,
तदुःखतां सर्वमाप्नो तिसर्वशः । 
ब्रह्मवेत्ता मृत्यु, रोग, दुःख को नही देखता । वह सर्व को सर्व प्रकार से व्याप्त करता है । 
प्यारे ब्रह्म ! दृश्य में विश्वास मृत्यु है । तेरा सत्य स्वरूप अमृत आनन्द है । तेरा आत्मा-रसास्वाद अनुभव से आ सकता है ।
जिसे अधिष्ठान रूपी रस्सी का साक्षात्कार है उसे भासने वाले सर्प से बाधा नही । जिसने अधिष्ठान रूपी शक्ति को जान लिया । उसे दृश्यमान रजत नही खींचता । जिसे ‘केवल सत’ का अनुभव हो गया । उसे मुँह देखी दुनियां का भय, स्तुति चलायमान नही कर सकती ।
इस दुनियां में जो कुछ दिखाई देता है वह तमाशा ही है ।
‘अरे तमाशा देखने वाले ! तमाशा हो नही जाना ।’

है मौत दुनियां में बस गनीमत,
खरीदो राहत को मौत के भाव ।
न करना चूं तक यही है मजहब,
खङे हैं रोम और गला रुके है ।
जिसे हो समझे कि जाग्रत है, 
यह ख्वाबे गफ़लत है सखत ए जां ।
क्लोरोफ़ार्म हैं सब मतालिब, (मतालिब-अर्थ, वासनायें)
खङे हैं रोम और गला रुके है ।
ठगों को कपङे उतार दे दो,
लुटा दो असबावो-मालो जर सब ।
खुशी से गरदन पर तेरा धर तब,
खङे हैं रोम और गला रुके है ।
न बाकी छोङेंगे इल्म कोई,
थे इस इरादे से जम के बैठे ।
है पिछला लिखा पढ़ा भी गायब,
खङे हैं रोम और गला रुके है ।

सन 1906 ई. में स्वामी रामतीर्थ वशिष्ठ आश्रम से टिहरी आये और वही गंगा तट पर रहने लगे ।
वहाँ उन्होंने कार्तिक बदी 13 संवत 1963 (सन 1906) को दीपावली के दिन ही मृत्यु के नाम एक सन्देश ‘खुद मस्ती’ पर लिखा और उसको समाप्त कर गंगास्नान को गये और फ़िर कभी न लौटे ।
(वे गंगा में बढ़ते गये और गहरे पानी में खुद को लहरों के हवाले कर जीवित ही ‘जल समाधि’ ले ली)
उनके अन्तिम कथन थे -
अच्छा जी कुछ भी कहो, राम तो हर रंग में रमता राम है । हर जिस्म में प्राण हर प्राण की जान है । सब में सब कुछ है परन्तु इस वक्त कलम बनकर लिख रहा है । सूरज बनकर चमक रहा है । गोलीगंगी (जिसको लोग श्री गंगाजी कहते हैं) बनकर गा रहा है । पर्वत बनकर सब्ज दुशाले ओढ़े कुम्भकरण की तरह पैर पसारे सुषुप्ति में लिपट रहा है ।
पर अपनी एक सूरत बहुत ही ज्यादा भारी है । मैं हवा हूँ बेहिस्सों-हरकत बेजान ।
मेरी सत्ता पाये बिना पत्ता नही हिल सकता, मुझ बिन सब दीमक की तरह सो जाता है । जली हुयी रस्सी की तरह रह जाता है । 
काम बिगङने लगा, मैं किसको इल्जाम दूँ ? मेरे बिना और कुछ हो भी ।
ओ मौत ! बेशक उङा दे इस एक जिस्म को, मेरे और अजसाम ही मुझे कुछ कम नही । सिर्फ़ चांद की किरणें चांदी की तारें पहन कर चैन से काट सकता हूँ ।
पहाङी नदी नालों के भेस में गीत गाता फ़िरूंगा । वहरे अमवाज (समुद्री लहरें) के लिबास में लहराता फ़िरूंगा । मैं ही वादे-खुशखराम (प्रातःकालीन शीतल सुगन्धित वायु) नसीमे-मस्ताना गाम हूँ । मेरी यह सूरते-सैलानी हर वक्त रवानी में रहती है ।
इस रूप में पहाङों से उतरा, मुर्झाते पौधों को ताजा किया, गुलों को हँसाया, बुलबुल को रुलाया, दरवाजों को खङखङाया, सोतों को जगाया, किसी का आँसू पौंछा किसी का घूंघट उङाया । इसको छेढ़ उसको छेढ़ तुझको छेढ़..वह गया..वह गया । न कुछ साथ रखा न किसी के हाथ आया ।    
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न केनचद्विक्रीता विक्रीता इव संस्थिताः ।
वत मूढ़ा वयं सर्वे जानाना अपिशांवरम । योगवाशिष्ठ
- यद्यपि किसी ने हमें बेचा नही तथापि बिके हुये के समान स्थिति
है । खेद की बात है कि जानकर भी यह माया है, हम मूढ़ हो गये हैं ।

08 दिसंबर 2016

फ़क्कङ साधु की मौज

एक साधु की गुदढ़ी (कन्था) चोरी हो गयी । चोरी क्या हो गयी, हँसी हँसी में वहीं के एक कांस्टेबल ने छुपा ली । साधु पुलिस स्टेशन के आसपास ही रहता था ।
मौज में आकर रिपोर्ट लिखाने गया - अरे मैं लुट गया ! लुट गया ! गरीब बेचारा लुट गया ।
थानेदार - तुम्हारा क्या चोरी हो गया ?
साधु - सब कुछ ! एक तो रजाई गयी है ।
- और क्या ? - चादर ।
- और क्या ? - कोट और अंगरखा ।
- और क्या ? - तकिया ।
- और क्या ? - आसन ।
थानेदार - कुछ और भी ?
साधु - हाँ छतुरी भी चली गयी ।
थानेदार - बस इतना ही कि कुछ और भी ?
साधु - हजूर !

थानेदार - और भी कुछ, खूब स्मरण कर लो ।
साधु - और...और...और..(बताता गया)
वह कांस्टेबल जिसने चोरी की थी, पास ही खङा था । 
चोरी गये सामान की इतनी लम्बी लिस्ट सुनकर बेबस सा हँसा और गाली देकर बोला - और.. और.. और..बोले जाता है । तेरा चोरी गया माल ‘बस’ होगा कि नहीं । तेरी झोपङी है कि सौदागर की कोठी ? इतना (माल) असबाव कहाँ से आ गया ?
इतना कहकर कांस्टेबल साधु की गुदढ़ी उठा लाया और बोला - हजूर, बस इसका इतना माल चोरी हुआ है और इसने दर्जनों चीजें गिना दी ।
थानेदार (साधु से) - क्या तुम पहचान सकते हो कि ये गुदढ़ी तुम्हारी है ?
साधु - हाँ मेरी है और किसकी है ।
इतना कहकर झटपट गुदढ़ी कन्धे पर डाल थाने से बाहर दौङ गया ।
थानेदार ने सिपाहियों को आज्ञा दी - इसे फ़टाफ़ट पकङो, जाने न पाये ।
और साधु को धमका कर कहा - तेरा चालान होगा बाबा, तूने झूठी रिपोर्ट लिखाई । हमें धोखा देने की कोशिश की ।
फ़क्कङ साधु जो देह और प्राण की चिन्ता एवं पाप-पुण्य के बन्धन से बिलकुल मुक्त था ।
भय और आशा से आबद्ध (थानेदार) की रुष्टता को क्या समझता ।
मुस्करा कर बोला - हम झूठ नही बोलते हैं ।

यह कहकर उसने गुदढ़ी को ओढ़कर दिखाया और बोला - यह देखो मेरी रजाई ।
उसी गुदढ़ी को नीचे बिछाकर बोला - यह देखो मेरा बिछौना ।
उसी गुदढ़ी को सिर के ऊपर तानकर बोला - यह देखो मेरी छतुरी ।
गुदढ़ी को तह करके नीचे डाला और ऊपर बैठता हुआ बोला - यह मेरा आसन, आदि आदि ।
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वह व्यक्ति जिसने विश्व के आश्रयदाता (ब्रह्म) का जाना है, उसका तो सभी कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म हो गया । 
सम्बन्धी और निकटवर्ती है तो ब्रह्म !
शासक और शासित हैं तो ब्रह्म !
प्रेम करने वाले या वैर रखने वाले हैं तो ब्रह्म !
माता, बहन, भाई, हैं तो ब्रह्म !
उसके बाग और बिटप ब्रह्म !
उसकी लेखनी और कृपाण ब्रह्म !
उसके लिये तो ब्रह्म ही साधु की गुदढ़ी है । सारा घरबार जायदाद ब्रह्म है ।
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काला हरना जंगल चरना, ओह भी छलबल खूब करे ।
काला हस्ती रहे फ़ौजन में, फ़ौजन का श्रंगार करे ।
काला बादल लरजे गरजे, जहाँ पङे तहाँ छल्ल करे ।
काला खांडा रहे म्यान में, जहाँ पङे दो टूक करे ।
काली ढाल मर्द के कन्धे, जहाँ लढ़े तहाँ ओट करे ।
काला नाग बांबी का राजा, जिसका काटा तुरत मरे ।
काला डोल कुंयें के अन्दर, जिसका पानी शान्त करे ।
काली भैंस बजर का बट्ट, दूध शक्ति बल अधिक करे ।
काला तवा रसोई भीतर, खाकर रोटी खलक जिये ।
काली कोकिल कूके हूके, जिसका शब्द तन मन हरे ।
काला है तेरे नैनन सुरमा, तू काले का नाम धरे ।
काला है तेरे नैनन तारा, तू काले का नाम धरे ।
काले तेरे बाल सांप से, तू काले का नाम धरे ।
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गोरी री तुम गोरम गोरी, बात करे गुरु ज्ञान की चेरी ।
दाँत दामिनी चमक दमक में, नैन बने जानों आम की कैरी ।
इतना गुमान कहा करे राधा, खोल घूंघट मुख देखन दे री ।

05 दिसंबर 2016

दानवराज

इलूमिनाती (लैटिन इलूमिनातुस का बहुवचन) ‘प्रबुद्ध’ एक ऐसा नाम है जो कई समूहों, दोनों ऐतिहासिक और आधुनिक और दोनों वास्तविक और काल्पनिक को संदर्भित करता है । ऐतिहासिक तौर पर यह विशेष रूप से बवारियन इलूमिनाती को संदर्भित करता हैं जो 1 मई 1776 को स्थापित की गई एक प्रबुद्धता-युग गुप्त समिति है । (विकीपीडिया)
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मुझे मात्र किसी देश के आर्थिक व्यवहार पर नियंत्रण चाहिए, उस देश में कौन शासन करता है इसकी मुझे कोई परवाह नही - Rothschild
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#The_Mechanism_of_Zionism
#The_Big_Bank_Theory.
आचार्य चाणक्य के अनुसार दूसरों के पास अपना धन रखने वाला घोर मूर्ख होता है । उन्होंने वर्णन किया है -
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम ।
तडागोदरसंस्थानां परीस्रव इवाम्भसाम । 
अर्थ - हमारे द्वारा कमाए गए धन का suitable Use करना ही धन की रक्षा के समान है । इसी
प्रकार किसी तालाब या बर्तन में भरा हुआ जल यदि उपयोग न किया जाए तो सड़ जाता है । व्यक्ति धन कमाता है तो उसका सदुपयोग करना चाहिए । काफी लोग धन को अत्यधिक collect करके रखते हैं, उसका उपयोग नहीं करते हैं ।
जैसा आज सभी लोग बैंक को अपनी पूरी संपत्ति दे रहे हैं । अगर Safety के अलावा देखें तो ये सिर्फ ‘ब्याज’ (interest) के लिये होता है और भारतीय तो इतने मूर्ख हैं कि पैसे के साथ साथ
gold को भी बैंक+gold companies को दे देते हैं ।
Dual nature - हमारे पैसों पर बैंक हमें 1-2.5% तक ब्याज देता है । जबकि अगर हम ही इससे loan मांगे तो भयंकर कागजी कार्रवाई के साथ 9-12% ब्याज चुकानी पङेगी ।
मतलब लगभग 4 गुना ब्याज ।
दरअसल Banking system बहुत vital role play करता है zionism में ।
ये Mechanism_of_Zionism का महत्वपूर्ण लिंक है ।
1 हर साल सैकङों गरीब किसान loan के बाद चुका नहीं पाते और आत्महत्या के शिकार होते हैं । बैंक फिर घर-खेत की कुर्की कर लेते हैं । यानि पैसों के बदले जमीन मिली ।
2 Economic control = nation control
3 Cashless society को बढ़ावा देने के साथ ही पब्लिक को digital करते हैं यानि पूरा कंट्रोल
computer पर ।
4 Cashless society = full invisible control by bank mafias.
Cashless future - आज आप ज्यादातर बैंको में बिना account के draft नहीं बनवा सकते । Account जरूरी है । ये होगा तो आदमी कुछ पैसा भी रखेगा ।
पैसा अंदर, कार्ड बाहर, हो गये Cashless
अब आपके पैसे पर computer का राज है ।
Banking system की पिक्चर को Superhit करने में debit+credit card का hero जितना
योगदान है ।
1 Credit card से आप कर्जा ले सकते हैं, तुरन्त shopping करके कर्ज में डुबकी लगाओ ।
2 कार्ड होगा तो fast+huge shopping होगी । Manufacturing industry चमकेंगी ।
3 credit card से कोई भूखा नही मरेगा, सबको कर्ज मिलता है ।
4 इस कार्ड का रसगुल्ला मीठा तो है लेकिन डायबिटीज जल्दी करता है । आदत बुरी चीज होती है ।
पहला आधुनिक बैंक इटली में 1406 में स्थापित किया गया था, इसका नाम बैंको दि सैन जिओर्जिओ (सेंट जॉर्ज बैंक) था । ब्याज बैंक की oxygen होती है ।
आज लगभग हर बैंक Jacob Rothschild banking system पर आधारित है ।
भारत में RBI प्रमुख कठपुतली है rothschild की ।
Rothschild Banking Dynasty के संस्थापक Mayer Amschel Rothschild ने कहा था -  ‘मुझे मात्र किसी देश के आर्थिक व्यवहार पर नियंत्रण चाहिए, उस देश में कौन शासन करता है इसकी मुझे कोई परवाह नही ।’
यहाँ आप ध्यान दीजिए ।
The Rothschilds पूरी दुनियां के 200 से अधिक देशों को मात्र Money Power से control करते हैं । बाकी उस देश में कौन सा शासक शासन कर रहा है उसकी इनको कोई चिंता नही

इनकी सफलता का रहस्य है ‘Fractional Reserve Banking System’ 
अब आपको Zionism का Basic समझ आ गया होगा ।
इन सभी समस्याओं के मूल हैं - Israeli bank mafia
मात्र 20,000 Sq. Km area + 90 लाख जनसंख्या वाला देश Israeli ये दुनियां के राजाओं का देश है । आप इस देश के आकार पर मत जाईए क्योंकि यहूदी हमेशा 100 साल आगे की प्लानिंग बनाकर चलते हैं । ये लोग Mind Game के Expert हैं । इतने बडे अमेरिका को इतना छोटा इजरायल वहाँ अपने यहूदी बंधुओं के सहयोग से control करता है ।
(sayanim) और अमेरिका Israel के लिए दुनियां का नेता बने घूमते रहता है । US अपने लिए कुछ भी नहीं करता । वो सब कुछ Israeli Banker Mafias के लिए करता है । इन बैंकर माफियाओं का उद्देश्य है विश्व के लोगों को नास्तिक बनाकर अपना एक नया धर्म स्थापित करके New World Order लाना ।
इसके लिए ये लोग भारत के पीछे हाथ धोकर पङे है क्योंकि कलियुग में धर्म का आखिरी चरण मात्र भारत में ही सुरक्षित है ।
हमारी परिवार व्यवस्था को तोङने के लिए हमारे समाज में Lesbian, Gay, लिव इन रिलेशनशिप जैसे भद्दे कर्म की विचारधारा, स्त्री-पुरुष समानता की विचारधारा घुसेङने वाली यही Israeli Banker Mafias है । 
ये लोग दानव है । ये लङाई धर्म और अधर्म के बीच है ।
International Politics + industrial control -  
संयुक्त राष्ट्रसंघ (U.N) विश्व आरोग्य संस्था (WHO) UNICEF जैसी बडी संस्थाएँ इनकी बपौती
हैं । क्योंकि इनके संस्थापक भी यही लोग है । इसलिए ये संस्था वही निर्णय करती है जो इन Bankster Mafias के हित में होता है ।
U.S Army+NATO को कई बार मजाकिया तौर पर Israel की राष्ट्रीय सेना भी कहा जाता है । #NATO और अमेरिकी सेना दुनियां भर में अपने Base बनाकर पूरे विश्व को अपने नियंत्रण मे ले रही है ।
अमेरिका की Federal Reserve, Switzerland की Swiss Banks, इंग्लैंड की Bank Of England, भारत की Reserve Bank Of India सहित विश्व के अन्य सभी देशों के Central बैंकों पर इन यहूदी बैंकर माफियाओं का कब्जा है ।
इन Banksters के हाथ में बङी बङी Multinational Companies जैसे कि Pepsi, Coca Cola, McDonalds, KFC, MONSANTO, Cargill, Pharma Companies, GAZPROM, Schulmberger, De Beers सहित सभी बङी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनके नियंत्रण में हैं । 
ज्ञात रहे इन बङी कंपनियों में विश्व में Gold, Diamond, लोखंड, गैस, तेल के उत्पादन क्षेत्रों में Monopoly रखने वाली कंपनियों का समावेश होता है । इस प्रकार से विश्व में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर इनका पूरा control है ।
ये चंद मुठ्ठी भर लोग विश्व की 7 अरब की आबादी पर नियंत्रण करते हैं ।
पहले ये माफिया विश्व के देशों को जबरदस्ती WTO, GATT जैसी भयंकर संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करते हैं । इस प्रकार के संधियों में जो शर्तें होती हैं । वो शर्तें हमेशा MNCs के हित में ही होती है । उन देशों को Loan देने के बहाने उन देशों को कर्ज के मायाजाल मे फंसा देते हैं । फिर बाद में वहाँ की कठपुतली सरकार द्वारा उस देश के प्राकृतिक संसाधनों की लूट मचाना शुरु कर देते हैं । उसके संसाधनों पर नियंत्रण कर लेते हैं ।
यदि किसी देश की सरकार इन बैंकर माफियाओं की आज्ञा मानने से मना करती है तो ये लोग अपने नियंत्रण की Print-Social-Electronics Media के उपयोग द्वारा उस सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करवाते हैं । उस देश के विपक्ष को भी इस काम में अपने पाले में ले लेते हैं
Example - इराक में सद्दाम हुसैन, Egypt के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, Libya के तानाशाह
मुअम्मर गद्दाफी को बैंकर माफियाओं की disrespect (आज्ञा की अवहेलना) करने के कारण सत्ता से दूर होना पङा और उनमें से सद्दाम हुसैन + गद्दाफी को मौत के घाट भी इन्ही बैंकर माफियाओं ने उतारा था ।
जो नेता इन Banksters का विरोध करेगा उसको मौत के घाट उतार दिया जायेगा । ये काम CIA, Mossad-Sayanim, MI6 जैसी जासूसी संस्थाओं द्वारा करवाया जाता है ।
जैसा पहले कहा गया है ‘अगर आप बैंक लूटना चाहते हैं तो आप बंदूक खरीद लें और अगर पूरे शहर को लूटना है तो एक बैंक खोल लें ।’
अंत में एक सवाल - कर्ज का मर्ज नहीं होता । भारत से लेकर अमेरिका तक कर्ज में है ।
कहा जाता है कि दुनियां पर सैकङों trillion का कर्ज है । ये कर्ज किसने चढ़ा रखा है ? 
जवाब जरूर दें ।
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आभार : Venkatesh Bhrugu
Statutory warning : share करें, बिना साभार किये कापी पेस्ट का लाभ उठाकर bank mafia की तरह लोभी न बनें । धन्यवाद !
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एक अत्यंत नीच रहस्यमय दुनिया - इलुमिनाटी 1
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03 दिसंबर 2016

आत्मबोध के सूत्र

षट संपत्ति आदि तप से पापविहीन, शान्तचित्त, वैराग्यवान मुमुक्ष पुरुषों को आवश्यक यह आत्मबोध विधिपूर्वक वर्णित है । 
दूसरे साधनों से ज्ञान ही एक स्वयं मोक्ष का साधन है । बिना ज्ञान के मोक्ष सिद्ध नही होता ।
(जैसे बिना अग्नि के रसोई)
विरोध न रखने से कर्म अज्ञान को दूर नही कर सकता । ज्ञान ही अज्ञान का नाश करता है । 
(जैसे तेज गहन अंधकार को)
आत्मा अज्ञान से ढका हुआ सा है । अज्ञान के दूर होते ही अकेला और स्वयं प्रकाशित होता है ।
(जैसे बादल हटने से सूर्य)
जीवात्मा अज्ञान से मलीन है । ज्ञान के अभ्यास से ही निर्मल होता है । ज्ञान हो जाने पर ज्ञान का अभ्यास स्वयं नाश हो जाता है ।
(जैसे जल को निर्मली)
राग द्वेष से भरा हुआ संसार स्वपन (के बराबर) ही है । अपने समय में (अज्ञान में संसार, नींद में स्वपन) सच्चा ही मालूम होता है । किन्तु ज्ञान होने, जानने पर झूठा ही हो जाता है ।
(जैसे अंधेरे में रस्सी का सर्प)
जब तक सबका आधार अद्वितीय ब्रह्म नही जाना जाता तब तक संसार सत्य ही मालूम होता है ।
(जैसे सीप में चांदी)
अनेकानेक प्रकार के जीव नित्यस्वरूप सच्चिदानन्द में बंधे हुये सं-कल्पित (ही) हैं ।
(जैसे सुवर्ण में कङे)
इन्द्रियों का स्वामी सर्वव्यापी परमात्मा अनेक प्रकार की उपाधियों में मिलकर उनके भेद से जुदा सा मालूम होता है और उन उपाधियों का नाश होते ही अकेला (ही) दीख पङता है ।
(जैसे आकाश)
जाति, (ग्रहस्थ, सन्यास आदि) आश्रम, नाम आदिक अनेक प्रकार की उपाधि के वश से ही आत्मा में कल्पित हैं ।
(जैसे जल में मीठा, खारी तथा नीला, सफ़ेद रंग)
पञ्चीकरण महाभूत से उत्पन्न, कर्मों का समूह, सुख दुख भोगने का घर ‘शरीर’ कहाता है । 
पाँच प्राण, दस इन्द्रियां, मन, बुद्धि इन 17 तत्वों से युक्त अपञ्चीकरण महाभूत से उत्पन्न सुख दुःख आदि भोगों का साधन करने वाला ‘सूक्ष्म शरीर’ है । 
कहने में न आने वाला अनादिकाल की माया से भरा हुआ ‘कारण शरीर’ कहाता है ।
आत्मा इन तीनों उपाधियों (शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर) से अलग ‘निरुपाधि’ है ।
आत्मा निर्मल है । अन्नमय आदि पाँच कोशों के संयोग से उस उस धर्म वाला सा स्थित जान पङता है ।
(जैसे नीले आदि वस्त्रों के साथ स्फ़टिक मणि)
कोशों से युक्त निर्मल अन्तरात्मा को युक्ति से विचार पूर्वक ग्रहण करना चाहिये ।
(जैसे कूटने से भूसी आदि से मिले धान्य को)
तो भी सब में रहता हुआ आत्मा सब में नही मालूम होता ।
(जैसे निर्मल दर्पण में प्रतिबिम्ब)
देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्रकृति इन सबसे विलक्षण इनके कार्यों का साक्षी आत्मा सदैव ही राजा के समान है । 
अज्ञानियों का आत्मा इन्द्रियों के मेल होने में व्यापारी सा दिखाई देता है । 
(जैसे दौङते हुये बादलों में दौङता चन्द्र) 
देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि ये सब चैतन्यात्मा का आसरा लेकर अपने अपने कार्यों में लगते हैं ।
(जैसे सूर्योदय पर जीव)
देह, इन्द्रिय, गुण, कर्म ये सब निर्मल सच्चिदानन्द परमात्मा में अज्ञान से कल्पित हैं ।
(जैसे आकाश में श्यामता)
मन की उपाधि का (कर्ता भोक्तापन आदि) आत्मा में अज्ञान से कल्पना किया जाता है ।
(जैसे जल का हिलना, जल में चन्द्र प्रतिबिम्ब)
सुख दुःख इच्छा आदि राग जो कि बुद्धि में उसके होते ही रहते हैं । सुषुप्ति अवस्था में उस बुद्धि के नाश हो जाने पर नही रहते । इसलिये ये बुद्धि के ही धर्म हैं आत्मा के नहीं ।
जैसे सूर्य का प्रकाशपना, जल की शीतलता, अग्नि की उष्णता स्वभाव से है । ऐसे ही आत्मा का सत्य, शाश्वत होना, ज्ञान, आनन्दस्वरूप, निर्मल होना ये स्वाभाविक है ।
आत्मा का सत्य चैतन्य का अंश और बुद्धि के सुख, दुःख, इच्छा आदि कार्य ये दोनों मिलकर अज्ञान से ‘मैं जानता हूँ, सुखी हूँ दुःखी हूँ’ ऐसे व्यवहार चलते हैं ।
आत्मा के विकार नही है और बुद्धि के ज्ञान नही होता । जीवात्मा सब मलीनता को जान के ‘मैं करता हूँ, मैं देखता हूँ’ ऐसा मोहित होता है ।
रस्सी को सर्प की तरह, आत्मा को जीव जानकर भय प्राप्त होता है । यदि ‘मैं जीव नही आत्मा ही हूँ’ ऐसा जाने तो निर्भय होता है ।
एक ही आत्मा बुद्धि और इन्द्रियों को प्रकाशित करता है । उन जङों से आत्मा प्रकाशित नही होता ।
(जैसे दीपक घङे को)
आत्मा ज्ञानरूप होने से अपने जानने पर दूसरे के जानने की इच्छा नहीं होती । जैसे दीपक को दूसरे दीपक की इच्छा नहीं होती । ऐसे ही आत्मा स्वयं प्रकाश करता है ।
‘नेति नेति’ इस वेदवाक्य से सब उपाधियों का निषेध कर ‘तत्वमसि’ महावाक्य से जीवात्मा परमात्मा की एकता जाने ।
विद्यमान शरीर आदिक जो दिखाई पङता है बुलबुले की भांति नाशवान जाने और मैं इनसे विलक्षण निर्मल ब्रह्म हूँ ऐसा जाने ।
जन्म, मरण, बुढ़ापा, दुबला होना आदि देह में हैं मुझ में नहीं हैं । क्योंकि मैं उससे अन्य हूँ और बिना इन्द्रिय वाला हूँ । इससे शब्द, स्पर्श आदि विषयों का संग भी मेरा नही है ।
मन रहित होने से राग, द्वेष, दुःख, भय आदि मुझ में नहीं हैं । मैं प्राणरहित मनरहित निर्मल रूप हूँ ।
इस आत्मा से प्राण, मन, समस्त इन्द्रियां, आकाश, वायु, अग्नि, जल और संसार के धारण करने वाली प्रथ्वी उत्पन्न होती है । 
सत, रज, तम गुण से रहित, आना जाना जैसी क्रियाओं से रहित, संकल्प विकल्प से रहित, मायिक दोषों से रहित, जन्म आदि षट विकारों से रहित, निराकार, सदा मुक्तस्वरूप, निर्मल ही हूँ ।
मैं आकाश की तरह सब में बाहर भीतर रहने वाला, नाशरहित, सदा सब में बराबर निर्दोष, सबसे अलग, निर्मल, अचल हूँ ।
सदा स्वच्छ, मुक्त, एक अखण्ड आनन्द जो सत्य, अनन्त, ज्ञानरूप परब्रह्म है, वह ही मैं हूँ ।
ऐसी प्रतिदिन की अभ्यास वाली यह वासना कि - मैं ब्रह्म ही हूँ । अज्ञान के विक्षेपों को दूर करती है ।
(जैसे रसायन रोगों को)
एकान्त स्थान में आसन पर बैठ वैराग्यवान व जितेन्द्रिय हो एकाग्रचित्त कर उस अनन्त अद्वितीय परमात्मा का ध्यान करे ।
सुन्दर बुद्धि वाला पुरुष बुद्धि से सब दिखते हुये संसार को आत्मा में ही लीन करके सदा निर्मल आकाश की तरह एक परमात्मा का ध्यान करे ।
आत्मज्ञानी पुरुष सब नाम वर्ण आदि छोङ के पूरे चैतन्यानन्द रूप से रहता है ।
जानने वाला व जानने की वस्तु और जिसके द्वारा जाना जाये, ये भेद परमात्मा में नही है । सच्चिदानन्द रूप होने से अपने आप ही प्रकाशित होता है ।
इस प्रकार सदा अरणिरूपी आत्मा में मंथनरूपी ध्यान करने से उत्पन्न हुयी अग्निरूपी अभ्यास की गति सारे ईंधनरूपी अज्ञान को भस्म करती है ।
पहले घोर अन्धकार के दूर करते अरुण (ललाई) की तरह ज्ञान से अज्ञान दूर होता है फ़िर सूर्य की तरह आत्मा अपने आप ही उदय होता है ।
निरन्तर रहता हुआ भी आत्मा अज्ञान से न रहने के ही बराबर है और उस अज्ञान के दूर होते पहले ही से रहता हुआ सा मालूम होता है ।
(जैसे गले का आभूषण)
भ्रम से ठूंठ में मनुष्य की तरह ब्रह्म में जीवत्व किया गया है । जीव का तत्व स्वरूप उस ब्रह्म के देखने से अज्ञान से हुआ जीवभाव दूर हो जाता है ।
अपना तत्वरूप जान लेने से उत्पन्न हुआ ज्ञान शीघ्र ही ‘मैं, मेरा, यह’ अज्ञान दूर करता है ।
(जैसे ज्ञान होने पर दिशा का भ्रम)
अच्छे प्रकार का ब्रह्मज्ञानी योगाभ्यास में लगा हुआ ज्ञानदृष्टि से अपने ही में सबको स्थित और सब एक आत्मा है, ऐसा देखता है ।
यह सब संसार आत्मा ही है । आत्मा से अन्य कुछ नही है । जैसे मिट्टी और घङे आदि मिट्टी ही हैं । ऐसे ही सबको अपनी आत्मा ही देखता है ।
और उस ब्रह्म का जानने वाला पहले के नाम वर्ण आदि उपाधि और गुणों को छोङ देवें सच्चिदानन्द रूप होने से जीता ही हुआ मुक्तिरूप हो जाता है ।
(जैसे कीङा भ्रमर)
योगाभ्यास करने वाला मोहरूपी समुद्र को उतर राग द्वेष आदि राक्षसों को मार शान्ति से भरा हुआ अपनी आत्मा ही में आराम करता हुआ विराजमान होता है ।
बाहर के झूठे सुखों का लगाव छोङ आत्मसुख से युक्त अपने अंतस में ही घङे में रखे दीपक की तरह साफ़ प्रकाशता है ।
नाम वर्ण आदि उपाधियों में रहता हुआ भी मुनि उनके धर्मों से आकाश की तरह नहीं लिपटता है । सब कुछ जानता हुआ भी अज्ञानी की तरह रहे और बिना लगाव वायु की तरह आचरण करे ।
मनन करने वाला उपाधियों के दूर होने से भगवान में पूरी तरह लीन होता है ।
(जैसे जल में जल, आकाश में आकाश और अग्नि में अग्नि)
जिस आत्म लाभ से अधिक दूसरा लाभ नही, जिस सुख से अधिक दूसरा सुख नहीं । जिस ज्ञान से अधिक दूसरा ज्ञान नहीं । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जिस आत्मा को देखकर और देखना नही रहता व जिस आत्मरूप हो जाने पर फ़िर होना नही होता व जिसका ज्ञान होने से और जानना नही रहता । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जो एक, नित्य, अनन्त, अद्वितीय, सच्चिदानन्द ऊपर नीचे तिरछे पूर्ण है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जो अविनाशी, एक, अखंड, आनन्दरूप, बारबार नेति नेति रूप से वेदान्त द्वारा समझाया जाता है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
उस अखन्ड आनन्दरूप परमात्मा के लव मात्र आनन्द का आसरा लेकर सब ब्रह्मा आदिक क्रम से अधिकाधिक आनन्दित होते हैं ।
सारी वस्तु उस परमात्मा से मिली हुयी है और सब व्यवहार में भी उसका मेल है । इसलिये ब्रह्म सर्वत्र है ।
(जैसे सभी दूध में घी)
जो बहुत बारीक अणु नही है, स्थूल नही है, छोटा नही है, बङा नही है, न जन्म लेता है न मरता है और रूप गुण वर्ण नाम आदि नही है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
जिस परमात्मा के प्रकाश से सूर्य आदि प्रकाशित होते हैं और जिस सूर्य आदि के प्रकाश से वह नही प्रकाशित होता है । जिससे यह सब संसार सुशोभित है । वही ‘ब्रह्म है’ ऐसा विचार करे ।
परमब्रह्म अपने आप भीतर बाहर व्याप कर सारे संसार को प्रकाशित करता हुआ जलते हुये अग्नि से लोहे के गोले सा प्रकाशित होता है ।
ब्रह्म संसार से विलक्षण है । ब्रह्म से अन्य कुछ भी नही है । यदि ब्रह्म से अन्य मालूम हो तो झूठ है ।
(जैसे निर्जल स्थान में जल की तरह सूर्य की किरण)
जो जो दिखाई सुनाई पङता है । वह ब्रह्म से अन्य नही होता है और वह तत्वज्ञान से अद्वितीय सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है ।
ज्ञान दृष्टि वाला सच्चिदानन्द परमात्मा को सब में रहता हुआ देखता है । अज्ञान दृष्टि वाला नही देखता है ।
(जैसे अन्धा प्रकाश करते हुये सूर्य को)
वेदान्त श्रवण मनन आदि से जगाये हुये ज्ञान रूपी अग्नि से जले हुये सब मलीनताओं से छूटा हुआ जीव सोने की तरह अपने आप चमचमाता है ।
आत्मा ज्ञानरूपी सूर्य है । आकाशरूपी ह्रदय में उदय हो अंधकाररूपी अज्ञान को दूर कर सब में व्याप्त होकर सबको धारण करते व सबको प्रकाशित करते सुशोभित होता है ।
जो विचार त्यागी पुरुष स्थान समय आदि को बिना देखे शीत उष्ण आदि को दूर करने वाले सब में रहने वाले मायारहित, नित्य, आनन्दरूप अपने आत्मतीर्थ को सेवन करता है । वह सब कुछ जानने वाला सब में रहता हुआ मुक्त होता है ।
श्री परमहंस परिब्राजकाचार्य श्री मच्छंकराचार्य ‘आत्मबोध’

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