19 अगस्त 2018

ॐ खं ब्रह्म







यजुर्वेद चत्वारिंशोऽध्याय

ईशा वास्यामिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत।
तेन यत्केन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विध्दनम॥1॥

भावार्थ - सृष्टि में जो कुछ भी है, सब ईश द्वारा आवृत-आच्छादित है। केवल उसके द्वारा दिये गये का ही उपयोग करो। लालच मत करो। धन किसका है?

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥

भावार्थ - यहाँ कर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की कामना करें। कर्म मनुष्य को लिप्त नही करते। यह तुम्हारे लिए है। इसके अतिरिक्त परम कल्याण का कोई अन्य मार्ग नही है।

आसुर्या नाम ते लोकाऽ अन्धेन तमसावृता:।
ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जना:॥3॥

भावार्थ - वे लोग आसुर्य नाम से जाने जाते हैं। वे गहन अन्धकार से घिरे रहते हैं। वे आत्मा का हनन करने वाले प्रेतरूप में भी वैसे ही अन्धकारयुक्त लोकों में जाते हैं।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाऽ आप्नुवन् पूर्वमर्शत।
तद्धावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥4॥

भावार्थ - चंचलतारहित वह ईश मन से भी अधिक वेगवान है। वह स्फूर्तिवान पहले से ही है। उसे देवगण (मन, इन्द्रिय) प्राप्त नही कर पाते। वह स्थिर रहते हुए भी दौड़कर अन्य से आगे निकल जाता है। उसके अन्तर्गत ही गतिशील वायु-जल को धारण किये रहता है।

तदेजति तन्नैजति तहुरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:॥5॥

भावार्थ - वह गतिशील भी है, और स्थिर है, वह दूर से दूर भी है, और निकट से निकट भी है। वह सबके अन्दर भी है तथा सबके बाहर भी है।

यस्तु सर्वणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति॥6॥

भावार्थ - सभी भूतों को आत्मतत्व में ही स्थित अनुभव करता है तथा सभी भूतों के अन्दर इस आत्मतत्व को समाहित अनुभव करता है, तब वह किसी प्रकार भ्रमित नहीं होता।

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:।
तत्र को मोह: क: शोक ऽएकत्वमनुपश्यत:॥7॥

भावार्थ - जिस स्थिति में यह जान लेता है कि यह आत्मतत्व ही समस्त भूतों के रूप में प्रकट हुआ है, उस एकत्व की अनुभूति की स्थिति में मोह अथवा शोक कहाँ टिक सकते है?

स पर्यगाच्छुक्रमकायभव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याताथथ्यतोर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:॥8॥

भावार्थ - वह सर्वव्यापी है, तेजस्वी है। देहरहित, स्नायुरहित एवं छिद्ररहित है। वह शुद्ध और निष्पाप है। वह कवि, मनीषी, सर्वजयी और स्वयं ही उत्पन्न होने वाला है। उसने अनादिकाल से ही सबके लिए यथायोग्य अर्थों की व्यवस्था बनाई है।

अन्धं तमः प्र विशन्ति येसंभूतिमुपासते।
ततो भूयऽइव ते तमो यऽ उसंभूत्याम्रताः॥9॥

भावार्थ - जो केवल असंभूति (विनाश) की उपासना करते हैं वे घोर अंधकार में घिर जाते हैं, और जो केवल संभूति की ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अंधकार में फंस जाते हैं।

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नास्तद्विचचक्षिरे॥10॥

भावार्थ - जिन देवपुरुषों ने हमारे लिये विशेषरूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों से सुना है कि संभूतियोग का प्रभाव भिन्न है, और असंभूतियोग का प्रभाव उससे भिन्न है।

संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते॥11॥

भावार्थ - संभूति (सृजन) तथा विनाश इन दोनों कलाओं को एक साथ जानो। विनाश की कला से मृत्यु को पार करके, तथा संभूति की कला से अमृतत्व की प्राप्ति की जाती है।

अन्धं तमः प्रविशन्ति येअविद्यामुपसते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाम्रताः॥12॥

भावार्थ - जो अविद्या की उपासना करते हैं, वे गहन अंधकार से घिर जाते हैं, और जो विद्या की उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अज्ञान में फंस जाते हैं।

अन्यदेवाहुर्विद्यायाऽ अन्यदाहुरविद्यायाः।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥13॥

भावार्थ - जिन देवपुरुषों ने हमारे लिये विशेष रूप से कहा है, उन धीर पुरुषों से हमने सुना है कि विद्या का प्रभाव कुछ और है, और अविद्या का प्रभाव उससे भिन्न है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्या मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥14॥

भावार्थ - विद्या तथा अविद्या दोनों का ज्ञान एक साथ प्राप्त करो। अविद्या के प्रभाव से मृत्यु को पार करके विद्या द्वारा अमृत तत्व की प्राप्ति की जाती है।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम।
ओ३म क्रतो स्मर क्लिबे स्मर कृतं स्मर॥15॥

भावार्थ - यह जीवन वायु, अग्नि आदि तथा अमृत के संयोग से बना है। शरीर तो अंततः भस्म हो जाने वाला है। हे संकल्पकर्ता, तुम परमात्मा का स्मरण करो, अपनी सामर्थ्य का स्मरण करो, और जो कर्म कर चुके हो, उनका स्मरण करो।

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽ उक्तिं विधेम॥16॥

भावार्थ - हे अग्ने, हमें श्रेष्ठ मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले चलें। हे विश्व के अधिष्ठातादेव, आप कर्म मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। हमें कुटिल पापकर्मों से बचायें। हम बहुशः (भूयिष्ठ) नमन करते हुए आप से विनय करते हैं।

हिरण्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम।
योसावादित्ये पुरूषः सोसावहम। ॐ खं ब्रह्म॥17॥

भावार्थ - सोने के पात्र से सत्य का मुख ढंका हुआ है। वह जो आदित्यरूप पुरूष है, वही मैं हूँ। ॐ आकाशरूप में ब्रह्म ही संव्याप्त है।

15 अगस्त 2018

पवित्र किताबों का बोझ


=पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है=

मुसलमानों की पवित्र किताब कुरआन इतनी बचकानी है, इतनी आदिम है।
उसका कारण है मोहम्मद अनपढ़ थे। वह खुद लिख नहीं सकते थे।
उन्होंने कहा होगा, और किसी और ने लिखा होगा।
उन्हें खुद धक्का लगा था जब उन्होंने आवाज सुनी थी।

वे पहाड़ पर अपनी भेड़ों बकरियों को चरा रहे थे। उन्हें सुनाई पड़ा - लिखो। 
उन्होंने सब तरफ देखा कोई नजर नहीं आया। दुबारा उन्होंने सुना - लिखो।

उन्होंने कहा - मैं निरक्षर हूँ, मैं लिख नहीं सकता। और तुम कौन हो?
वहाँ कोई नहीं था। वे बहुत कंप रहे थे, बहुत भयभीत हो गये थे।

और यह एक अस्थिर-मन का लक्षण है। 
जो अपने अचेतन से आ रही आवाज को बाहर से आ रही आवाज समझने की गलती कर रहा था।
यह उनका खुद का अचेतन था। 
परंतु चेतन के लिए अचेतन बहुत दूर है।
वह भीतर ही है। परंतु यदि मन असंतुलित हो।

और मोहम्मद का चित्त असंतुलित था।
इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनका पूरा जीवन एक धर्मांध का जीवन रहा है। लोगों को मारना, और मारकर धर्मांतरित करना।
“या तुम अनुयायी बनो, नहीं तो मरने के लिए तैयार रहो।”

इस्लाम ने दुनियां के एक तिहाई लोगों को धर्मांतरित किया है, तर्क से नहीं बल्कि तलवार से। वे तर्क करने के लिए सक्षम नहीं थे, और ना ही उनकी क्षमता थी पढ़ने, लिखने या विचार करने की।

तो जब उन्होंने इस अचेतन आवाज को सुना तो वे कंपते हुए, ज्वरग्रस्त और भयभीत होकर घर की तरफ दौड़े। वे बिस्तर में घुस गये, और अपनी पत्नी से कहा - मैं किसी से नहीं कह सकता कि खुद ईश्वर ने मेरे साथ बातचीत की है, मैं खुद भरोसा नहीं कर पा रहा हूँ। लगता है मैं पागल हुआ हूँ। शायद रेगिस्तान और पहाड़ियों की बहुत ज्यादा गर्मी में टहलने के कारण मैं भ्रांति में हूँ, या ऐसा ही कुछ है। मैंने सुना..और मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ ताकि मैं भारमुक्त हो जाऊँगा।

उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया।

इसलिए मैं तुमसे बारबार कहता हूं, कि नेताओं को अनुयायियों की जरूरत होती है। खुद को यह विश्वास दिलाने के लिये कि वे नेता हैं।

उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया कि वह सच में ईश्वर ही था। तुम पागल नहीं हो, ईश्वर सच में तुमसे बोला है।

वह स्त्री निश्चित ही मोहम्मद से प्रेम करती थी, क्योंकि उसकी उम्र चालीस साल की थी, और वह सिर्फ छब्बीस साल का था। और वह गरीब, असंस्कृत, अशिक्षित था। फिर भी उस अमीर स्त्री ने उससे शादी की थी। तो निश्चित ही वह स्त्री उस आदमी के प्रेम में थी।

उसने उसे विश्वास दिलाया - तुम चिंता मत करो, और आवाजें आयेगी। यह निश्चित ही शुरूआत है, इसलिए ईश्वर ने कहा ‘लिखो’ अगर तुम लिख नहीं सकते, तो फिकर मत करो। तुम सिर्फ इतना बता दो कि तुम्हें क्या कहा गया है, हम उसे लिखेंगे।

इस तरह कुरआन लिखी गई। और यह एक दिन, एक महीने, या एक साल में नहीं लिखी गई है, क्योंकि मोहम्मद सुस्पष्ट व्यक्ति नहीं थे। उसे पूरी जिंदगी लगी। कभीकभार कोई बात निकलती थी और वह कहता था - लिखो।

कुरआन को लिखने में कई साल लगे है, और उसमें से जो निकला है, वह करीब-करीब निरर्थक है। यह एक समझदार मनुष्य से भी नहीं निकली है, ईश्वर का तो क्या कहना। अगर कहीं कोई ईश्वर है तो?

अगर यह किताबें उस ईश्वर का प्रमाण है तो वह ईश्वर सच में नासमझ है। अब कुरआन अजीब चीजों के बारे में कहती है, जिनका मुसलमान अनुगमन करते है क्योंकि वह एक पवित्र किताब है।

मोहम्मद की खुद की नौ पत्नियां थी। वह गरीब था। उसमें एक पत्नी संभालने का भी सामर्थ्य नहीं था। परन्तु चूंकि एक अमीर स्त्री उसके प्रेम में पड़ी थी, वह चालीस साल की थी, और वह छब्बीस साल का, वह स्त्री जल्दी ही मर जायेगी फिर उसे उसका सारा धन मिलेगा। इसलिए उसने किसी भी तरह की सुंदर स्त्री से शादी करने की शुरुआत की जो उसे मिल सकती थी।

और उसने कुरआन में कहा कि - हर मुसलमान को चार पत्नियां करने का अधिकार है। यह ईश्वर का मुसलमानों को दिया गया विशेष उपहार है।

दूसरा कोई भी धर्म चार पत्नियां करने की अनुमति नहीं देता है। अब तुम्हें चार पत्नियां कहां मिलेंगी? प्रकृति में पुरुष और स्त्री हमेशा लगभग समान अनुपात में होते हैं, लिहाजा एक पुरूष, एक पत्नी यह बहुत ही प्राकृतिक व्यवस्था लगती है क्योंकि उनका अनुपात समान है। परन्तु यदि एक पुरुष चार पत्नियों से शादी कर रहा है, वह दूसरे तीन पुरूषों की पत्नियां ले रहा है। अब वे दूसरे तीन आदमी, वे क्या करेंगे?

यह इस्लाम की अच्छी कूटनीति बनी। इन दूसरे तीन मुसलमानों ने दूसरों की पत्नियों छीनना, मुस्लिम की नहीं, बल्कि गैर-मुस्लिमों की, और उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करना।

वस्तुत: जब भी कोई स्त्री मुसलमान से शादी करती है, तब वह भी मुसलमान बनती है, किसी विशेष धर्मांतरण की आवश्यकता नहीं होती है। और खासतौर से भारत से उन्होंने हजारों स्त्रियों को पकड़ा। हिंदू समाज संकट में था, और यहूदियों की तरह हिंदू भी धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते हैं।

यह दो सबसे पुराने धर्म हैं, जो धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते हैं। यहूदी जन्म से यहूदी बनता है, और हिंदू जन्म से हिंदू बनता है। और एक बार कोई हिंदू स्त्री मुसलमान बन गई, तो वह पतित हो जाती है। वह अछूत बन गई, उसको हिंदू धर्म में वापस नहीं लिया जा सकता है।

तो उन्होंने हर जगह से स्त्रियों को खोजा जिससे उन्हें उनकी आबादी अत्यधिक रूप से बढ़ाने में मदद मिली। आप तथ्य देखते हो? अगर ज्यादा स्त्रियां उपलब्ध हो तो आदमी चाहे जितने बच्चे पैदा कर सकता है, परन्तु एक स्त्री एक साल में एक ही बच्चे को जन्म दे सकती है। उसे दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए एक साल और लगता है। मुसलमानों की आबादी जल्द बढ़ी क्योंकि हर मुसलमान को चार पत्नियां करने का अधिकार दिया गया है।

और तलवार से..यह बहुत आश्चर्यजनक है कि लोग इसमें विश्वास करते है।

कुरआन कहती है कि - अगर आप किसी को इस्लाम में धर्मांतरित नहीं कर सकते हो, तो बेहतर होगा कि उसे मार डालो, क्योंकि आपने उसे मुक्ति दिलाई है, एक गलत जिंदगी जीने से, जो वह जीने जा रहा था। उसकी भलाई के लिए उसे मुक्त कर दो।

इस तरह उन्होंने बेहिसाब लोगों को मुक्ति दिलवायी, और मुक्ति दिलवाते गये। दोनों में से किसी भी एक तरीके से आप मुक्त हो सकते हैं, अगर आप इस्लाम धर्म स्वीकार करते हैं तब भी, क्योंकि ईश्वर दयालु है।

मुसलमान होने के लिए तीन चीजों में आस्था होनी चाहिए - एक ईश्वर, एक पैगंबर मोहम्मद, और एक पवित्र किताब कुरआन। बस यह तीन आस्थायें, और आप बच जाते हैं। अगर आप इन तीन आस्थाओं से बचना नहीं चाहते हो, तो तलवार तुरन्त आपको छुटकारा देगी।

परन्तु वे आपको गलत जीवन जीने की अनुमति नहीं देते। वे जानते हैं सही जीवन क्या है, और उनके जीवन जीने के तरीके के अलावा बाकी सब जीवन जीने के तरीके गलत हैं।

यह सब पवित्र किताबें हैं। इन पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है। तो सबसे पहले मैं तुम्हें कहना चाहता हूँ कि मेरी सहित कोई भी किताब पवित्र नहीं है। सब मनुष्य निर्मित है। हाँ, वहाँ कुछ अच्छी तरह लिखी गई किताबें, और कुछ अच्छी तरह ना लिखी गई किताबें है। परन्तु वहाँ पवित्र और अपवित्र जैसी श्रेणियों में कोई किताब नहीं है।

--ओशो-- 
=फ्रॉम अनकांशसनेस टू कांशसनेस= 
प्रवचन - 17

11 अगस्त 2018

गर्भपात या कन्या हत्या




एक युवा महिला एक लेडी डॉक्टर के पास गई, और बोली - डॉक्टर, मैं एक गंभीर समस्या में हूँ, और आपकी सहायता चाहती हूँ। 

डॉक्टर - हाँ, बेखौफ कहो।

महिला - मैं गर्भवती हूँ, आप किसी से कहियेगा नहीं लेकिन मैंने एक जान पहचान के सोनोग्राफी लैब से यह जान लिया है कि मेरे गर्भ में एक बच्ची है। मैं पहले से एक बेटी की माँ हूँ, और मैं किसी हालत में दो बेटियाँ नहीं चाहती।

डाक्टर ने कहा - ठीक है, तो मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूँ? 

महिला बोली - मैं चाहती हूँ कि इस गर्भ को गिराने में आप मेरी मदद करें। 

डाक्टर अनुभवी और समझदार थी। उन्होंने थोङी देर सोचा, और कहा - मुझे लगता है कि मेरे पास एक सरल रास्ता है जो आपकी मुश्किल हल कर देगा।


महिला बहुत खुश हुई।

डाक्टर ने कहा - हम एक काम करते हैं। आप दो बेटियाँ नहीं चाहती ना, तो पहली बेटी को मार देते हैं जिससे आप इस अजन्मी बच्ची को जन्म दे सकें, और आपकी समस्या का हल भी हो जाए। वैसे भी हमको एक बच्ची को मारना है, तो पहली वाली को ही मार देते है ना? 

महिला ने तुरन्त विरोध किया - न ना डाक्टर, हत्या करना गुनाह है, पाप है, और वैसे भी मैं अपनी बेटी को बहुत चाहती हूँ। उसको खरोंच भी आती है, तो दर्द का अहसास मुझे होता है।

डाक्टर - पहली बेटी की हत्या करो, या इस अजन्मी बेटी की, गुनाह तो दोनों हैं, दोनों ही पाप हैं।

यह बात उस महिला को समझ आ गई।
वह स्वयं की सोच पर लज्जित हुई, और पश्चाताप करते हुए घर चली गई।

=बेटी बचाओ=
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साभार - दोनों चित्र व शब्दरचना इंटरनेट

मूलस्रोत - अज्ञात

05 अगस्त 2018

देवीजी



किसी किसी का जीवन ही मुझे प्रभावित करता है फ़िर यदि वह व्यक्ति आध्यात्मिक हो, और भाग्यवश मुझसे जुङा भी हो, तो ये ‘सोने पर सुहागा’ जैसा ही है। सात वर्ष की आयु से ही स्वस्फ़ूर्त तपस्या में रत हो जाने वाली ‘देवीजी’ के नाम से सुविख्यात बालसाध्वी सुश्री अरुणा देवी एक ऐसा ही आध्यात्मिक व्यक्तित्व है।

देवीजी के सरल सहज निश्छल स्वभाव, भोलापन और वाणी की मधुरता में एक चुम्बकीय आकर्षण है, जो किसी को भी हठात उनकी तरफ़ खिंचने को विवश कर देता है। अपने इसी सरल सौम्य व्यक्तित्व और प्राणिमात्र के प्रति सहज स्नेह से आज हजारों लोग उनसे जुङे हुये हैं, और उनकी कथा सतसंग आदि के माध्यम से प्रभुभक्ति की ओर प्रेरित हुये हैं।

लेकिन देवीजी से मेरा जुङाव और लगाव उनकी आत्म-उपासना और क्रियात्मक समाधि आदि योगों को लेकर हुआ, जबकि वह मुझसे मिलीं।

देवीजी जब बाल्यावस्था में ही तप उन्मुख हुयीं, तो घरवालों ने उन्हें उस एकान्त स्थान से उठाना, डराना चाहा, जहाँ वह तप हेतु बैठी थीं, पर वह बिलकुल भी विचलित नही हुयी, और निर्विघ्न साधनारत रहीं। जबकि उल्टे उनके तप में विघ्न पहुँचाने वालों को कुछ डरावने और अप्रिय अनुभव प्राकृतिक रूप से हुये, और भयभीत होकर उन्होंने इसे नियत की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया।



इसके बाद देवीजी का तप बारह-तेरह वर्ष निर्विघ्न चलता रहा।

तदुपरान्त जानकार लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में उनसे पधारने का आग्रह और कुछ उपदेश आदि देने का निवेदन करने लगे। तभी बाल्यावस्था की अवस्था में ही उन्होंने कुछ कथा सतसंग जैसे धार्मिक कार्य भी किये। जो आज भी यदाकदा जारी हैं।

देवीजी स्थायी रूप से वृन्दावन में वास करती हैं, और आगरा आने पर अक्सर ही हमारे यहाँ मेहमान होती हैं।

कहते हैं कि कन्या का जन्म लेना घर में लक्ष्मी आगमन के समान ही है। पर किसी भक्तकन्या का जन्म लेना तो जैसे स्वयं देवी का अवतरण होने जैसा ही है। इसलिये मुझे कोई आश्चर्य नही कि घरवालों से लेकर बाहर वाले तक उन्हें ‘देवीजी’ कहकर पुकारते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

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कथा सतसंग आदि के आयोजन हेतु देवीजी का संपर्क न.  
78953 91377
 (बात करने का समय शाम 5 बजे।)

देवीजी के फ़ेसबुक “पेज” का लिंक (क्लिक करें)


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21 जून 2018

भावना और विश्वास की मौत


विश्वास साहब अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानते थे।
कारण यह था कि उनके दोनों पुत्र आईआईटी करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवानिवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आये, और उनके साथ ही रहे।
परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ।
उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये; परन्तु उनका मन वहाँ बिलकुल नहीं लगा, और वे भारत लौट आये।
दुर्भाग्य से विश्वास साहब की पत्नी को लकवा हो गया, और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने-पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी।
विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्म का निर्वहन कर रहे थे।


एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया, और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए।
रात्रि के लगभग दो बजे हार्टअटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई।
पत्नी प्रात: छह बजे जब जागी, तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्यकर्म से निवृत्त होने में उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते-करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई।
चूंकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी, उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया, और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची। उसने पति को हिलाया-डुलाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे।


पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम में लगा हुआ था।
पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया।
लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक पहुँचीं।
और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया।
पड़ोसी के नंबर जैसे-तैसे लगाये।
पङोसी भला इंसान था।
फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था, अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस-पड़ोस के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया।
दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे।
उन्होंने देखा, विश्वास साहब पलंग पर मृत पड़े थे तथा पत्नी भावना टेलीफोन के पास मृत पड़ी थी। पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई।
जनाजा दोनों का साथ-साथ निकला।
पूरा मौहल्ला कंधा दे रहा था।
परन्तु वो दो कंधे मौजूद नहीं थे, जिसकी माँ-बाप को उम्मीद थी।
शायद वे कंधे करोड़ों रुपये की कमाई के भार से पहले ही दबे हुए थे।
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(साभार - Virendra Singh‎) कापी पेस्ट 

नोट - जहाँ से यह विवरण लिया है, विवरण पोस्ट करने वाले का कहना है कि ये सत्य घटना है।

18 जून 2018

आखिर, बात क्या थी?



यह फ़ोटो फ़ेसबुक से मिला है।
लेकिन वहाँ इस फ़ोटो से सम्बन्धित विवरण कुछ नहीं था।
सिर्फ़ दुःख प्रतीकात्मक संवेदना चिह्न अंकित थे, और RIP जैसे शब्द टंकित थे।
ये बङी दुखद, शोचनीय, विचारणिय, चिन्तनीय, निन्दनीय सामाजिक स्थिति है,
कि इस दम्पत्ति ने एक मासूम बालिका के साथ अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर दी।





मैंने इस फ़ोटो से सम्बन्धित जानकारी नेट माध्यम से पता करने की कोशिश की।
कुछ हासिल नहीं हुआ।
आप में से किसी को इस सम्बन्ध में कुछ जानकारी हो, तो कृपया कमेंट द्वारा बतायें।
पहला चित्र आरीजनल है। दूसरा बङा दिखाने के लिये ‘कट’ किया है।
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ये पोस्ट करने के चार घन्टे बाद

दीपक अरोरा ने इस दुखद चित्र से सम्बन्धित पूरी जानकारी खोज दी।
ये चित्र महाराष्ट्र का है, और ये परिवार आर्थिक तंगी से पीङित था।

जानकारी के लिये निम्न लिंक पर जायें।


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=710664959265540&set=a.125308037801238.1073741829.100009661272559&type=3&hc_location=ufi


15 जून 2018

नीलाम ए दो दीनार


“नीलाम ए दो दीनार”
हिन्दू महिलाओं का दुखद कङवा इतिहास!
जबरदस्ती की धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे को ढोते अक्लमंद हिंदुओं के लिये (इतिहास) 
समय! 
ग्यारहवीं सदी (ईसा बाद)
भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर अभी-अभी राजा जयपाल की पराजय हुई।
पराजय के पश्चात अफगानिस्तान के एक शहर ‘गजनी’ का एक बाज़ार,
ऊँचे से एक चबूतरे पर खड़ी कम उम्र की सैंकड़ों हिन्दू स्त्रियों की भीङ,
जिनके सामने वहशी से दीखते, हज़ारों बदसूरत किस्म के लोगों की भीड़,
जिसमें अधिकतर अधेड़ या उम्र के उससे अगले दौर में थे।
कम उम्र की उन स्त्रियों की स्थिति देखने से ही अत्यंत दयनीय प्रतीत हो रही थी।
उनमें अधिकाँश के गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें खिंची हुई थी।
मानों आंसुओं को स्याही बनाकर हाल ही में उनके द्वारा झेले गए भीषण यातनाओं के दौर की दास्तान को प्रारब्ध ने उनके कोमल गालों पर लिखने का प्रयास किया हो।
एक बात जो उन सबमें समान थी।
किसी के भी शरीर पर, वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा, नाममात्र को भी नहीं था। 
सभी सम्पूर्ण निर्वसना थी।

सभी के पैरों में छाले थे, मानो सैंकड़ों मील की दूरी पैदल तय की हो।
सामने खङी वहशियों की भीड़, वासनामयी आँखों से उनके अंगों की नाप-जोख कर रही थी।
कुछ मनबढ़ आंखों के स्थान पर हाथों का प्रयोग भी कर रहे थे।
सूनी आँखों से अजनबी शहर, और अनजान लोगों की भीड़, को निहारती उन स्त्रियों के समक्ष हाथ में चाबुक लिए, क्रूर चेहरे वाला, घिनौने व्यक्तित्व का, एक गंजा व्यक्ति खड़ा था।
सफाचट मूंछ, बेतरतीब दाढ़ी, उसकी प्रकृतिजन्य कुटिलता को चार चाँद लगा रही थी।

दो दीनार, दो दीनार, दो दीनार...
हिन्दुओं की खूबसूरत औरतें, शाही लडकियां, कीमत सिर्फ दो दीनार,
ले जाओ, ले जाओ, बांदी बनाओ,
एक लौंडी, सिर्फ दो दीनार,
दुख्तरे हिन्दोस्तां, दो दीनार,
भारत की बेटी का मोल, सिर्फ दो दीनार.. 
उस स्थान पर आज एक मीनार है।
जिस पर लिखे शब्द आज भी मौजूद हैं - दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार  
अर्थात वो स्थान - जहाँ हिन्दू औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुईं।


महमूद गजनवी हिन्दुओं के मुँह पर अफगानी जूता मारने, उनको अपमानित करने के लिये अपने सत्रह हमलों में लगभग चार लाख हिन्दू स्त्रियों को पकड़ कर घोड़ों के पीछे, रस्सी से बांध कर गजनी उठा ले गया।
महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था।
वे अपने पिता, भाई, पतियों को निरीह, कातर, दारुण स्वर में पुकार कर बिलख-बिलख कर रो रही थीं। अपनी रक्षा के लिए पुकार रही थीं। लेकिन करोङों हिन्दुओं के बीच से उनकी आँखों के सामने वो निरीह असहाय स्त्रियाँ मुठ्ठी भर निर्दयी कामांध मुसलमान सैनिकों द्वारा घसीट कर भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गईं।
रोती बिलखती इन लाखों हिन्दू नारियों को बचाने न उनके पिता बढ़े, न पति उठे, न भाई।
और न ही इस विशाल भारत के करोड़ों जन-सामान्य लोगों का विशाल हिन्दू समाज।
महमूद गजनी ने इन हिन्दू लड़कियों, औरतों को ले जाकर गजनवी के बाजार में भेङ बकरियों के समान बेच ड़ाला।
विश्व के किसी भी धर्म के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार नही हुआ।
जैसा हिन्दुओं के साथ हुआ।
और ऐसा इसलिये हुआ, क्योंकि इन्होंने तलवार को हाथ से छोड़ दिया।
इनको बताया गया कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ेगा। 
तब भगवान स्वयं उन्हें बचाने आयेंगे, अवतरित होंगे।
हिन्दुओं! भारत के गद्दार सेकुलर आपको मिटाने की साजिश रच रहे हैं।
आजादी के बाद यह षङयंत्र धर्म-परिवर्तन कराने के नाम पर हुआ।
आज भारत में, आठ राज्यों में, हिन्दुओं की संख्या 2-5% बची है।
हिन्दुओं को समझना चाहिये कि,
भगवान भी अव्यवहारिक अहिंसा व अतिसहिष्णुता को नपुसंकता करार देते हैं।
भगवान भी उन्हीं की मदद करते हैं।
जो अपनी मदद खुद करते हैं।
(कापी) मूल स्रोत चित्र व लेख - अज्ञात
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लेख का स्रोत सूत्र -


https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Someone/%E0%A4%B9-%E0%A4%A8-%E0%A4%A6-%E0%A4%93-%E0%A4%B8-%E0%A4%AC-%E0%A4%B6%E0%A4%B0-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%88-%E0%A4%9C-%E0%A4%A4/

09 जून 2018

माँ, और बस..माँ


दोनों कवितायें कापी पेस्ट हैं, मूल लेखक अज्ञात हैं।
कविताओं में कवित्त नियम तो नहीं, पर दर्द और संवेदना अवश्य है,
जो मानवीय तल पर सोचने पर विवश करती है।
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दूध पिलाया जिसने, छाती से निचोड़कर।
एक गिलास पानी, कभी उसे पिला न सका॥
बुढ़ापे का सहारा हूँ, अहसास दिला न सका।
पेट पर सुलाने वाली को, मखमल पर सुला न सका॥
वो भूखी सो गई बहू के डर से, एक बार मांगकर।
मैं रोटी के दो कौर, उसे खिला न सका॥
नजरें उन बूढ़ी आंखों से, कभी मिला न सका ।
वो दर्द दिल में सहती रही, और मैं तिलमिला न सका॥
जो जीवन भर, ममता के रंग, पहनाती रही मुझे।
दो जोड़ी कपङे कभी, उसे सिला न सका॥
बीमार बिस्तर से उसे, शिफा दिला न सका।
खर्च के डर से, बड़े अस्पताल ले जा न सका । 
बेटा कह के दम तोङने के बाद से, अब तक सोच रहा हूँ।
दवाई, इतनी भी महंगी न थी, कि मैं ला ना सका॥


एक बच्चे ने कब्रिस्तान जाकर
बस्ता माँ की कब्र पर फेंका,
आँखों में आंसू, भर्राये गले,
और शिकायती लहजे में कहा,
तेरी नींद पूरी हो गयी हो, तो चल उठ
और चल मेरे साथ, और चलकर जबाब दे
मेरी टीचर को, वो रोजाना मुझसे कहती है,
कि तेरी माँ बहुत लापरवाह है।
जो न तुझे अच्छी तरह तैयार करके भेजती है।
और न तुझे अच्छी तरह होमवर्क कराती है।
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जिन्दगी में माँ का न होना उसी तरह है।
जिस तरह कङकती धूप में पेङ का न होना।
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- पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है । ग्यारह साल की बेटी पिता से बोली।
पिता - वाह क्या बात है, खिलाओ फिर पापा को।
बेटी खुशी से दौड़ती रसोई में गई और कटोरा भरकर हलवा ले आई।
पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा।
पिता की आँखों मे आँसू थे।
- क्या हुआ पापा, अच्छा नही लगा।
पिता - नही बेटी, बहुत अच्छा बना है।
पिता ने पूरा कटोरा खाली कर दिया।
तभी माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई, और बोली- ला मुझे भी खिला तेरा हलवा।
पिता ने बेटी को पचास रु. इनाम में दिए, बेटी खुशी से मम्मी के लिए हलवा लेकर आई।
उसने हलुवे की पहली चम्मच मुँह में डाली, फ़िर तुरन्त थूक दिया, और बोली - ये क्या बनाया है, ये हलवा है, इसमें चीनी नहीं, नमक भरा है..और आप कैसे खा गये, मेरे बनाये खाने में तो कभी नमक मिर्च कम, तेज है, कहते रहते हो, और बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो।

पिता (हंसते हुए) - पगली, तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का, जिसमें नोंकझोंक रूठना मनाना सब चलता है; मगर ये बेटी है, कल चली जाएगी, लेकिन आज इसे वो एहसास, वो अपनापन, महसूस हुआ, जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बङे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है, फिर वो जैसा भी हो, मेरे लिए सबसे बेहतर, और सबसे स्वादिष्ट है; बेटियां अपने पापा की परियां, राजकुमारी होती हैं, जैसे तुम अपने पापा की हो।
वो रोते हुए पति के सीने से लग गई, और सोचने लगी,
“इसीलिए हर लङकी अपने पति में अपने पापा की छवि ढूंढ़ती है”
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हर बेटी अपने पिता के बेहद करीब या यूँ कहे कलेजे का टुकड़ा होती है। इसीलिये उसकी विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है। इसीलिये पिता हर समय अपनी बेटी की फिक्र करता है, क्योंकि हर बेटी अपने पापा की परी होती है।
(कापी पेस्ट)

20 मई 2018

सतकबीर - एक उत्तम चैनल

जिन खोजा तिन पाईया, गहरे पानी पैठि।

यद्यपि “सतकबीर” यूटयूब चैनल मैंने खोजा नहीं, बल्कि उसके एक भजन वीडियो पर निगाह जाते ही अनायास संयोगवश मिल गया।
दरअसल मैं कुछ ऐसी भजन आदि सामग्री की तलाश में था, जिसे मुझसे सम्पर्क करने वाले सन्तमत के आध्यात्म जिज्ञासुओं को सहज उपलब्ध करा सकूँ।
वैसे ‘सतकबीर’ मिलने से पहले मुझे यूटयूब पर श्री प्रहलाद सिंह टिपाणिया के गाये भजन मिल चुके थे, और तुलनात्मक उपलब्ध अन्य से, वह बेहतर थे।
फ़िर भी, क्योंकि टिपाणिया जी के शब्दों और गायकी दोनों में ही राजस्थानी लहजे का पुट था।
अतः वे मेरी दृष्टि में सभी हिन्दीभाषियों के लिये उतने उपयोगी नहीं थे।
तब इसी दौरान मुझे ‘सतकबीर’ मिला, जिसकी शान्त, शीतल, मधुर मीठी गायकी और कर्णप्रिय मद्धिम संगीत ने जैसे मन मोह लिया, मन्त्रमुग्ध कर दिया।
यहाँ तक होता, फ़िर भी ठीक था।
लेकिन सतकबीर ने वीडियो दृश्यांकन करने में आधुनिक और मनोरंजन पूर्ण विधा, कल्पना को संयुक्त किया है। जिसके बारे में कहना उचित नही। 
वह आप स्वयं देखें।
https://www.youtube.com/channel/UCzwKhQ5yUo4k9b__AVqj3cA/videos 
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मेरे अनुसार ‘सतकबीर’ में वही सब विशेषता है, जिसे एक आध्यात्मिक जिज्ञासु खोजता है।
विशेष बात यह कि यहाँ ‘कबीर सागर’ (सम्पूर्ण) अनुराग सागर, बीजक, दोहावली, शब्दावली आदि की वृहद आडियो वीडियो श्रंखला है तथा कबीर के जीवन से सम्बन्धित कई अन्य वीडियो हैं।
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तब ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ 
स्वयं इस चैनल के वीडियो का अवलोकन करते हुये एक सुखद अनुभव करें।
जो कि बहुत कुछ मैं कम शब्दों के कारण लिख न सका।
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स्पष्टीकरण - न तो ये चैनल मेरा है, और न ही मैं चैनल से सम्बन्धित किसी को भी दूर-दूर तक जानता हूँ ।
बस एक अच्छे स्थान और सामग्री को पारमार्थिक भाव से सूचित कर रहा हूँ।
सतकबीर चैनल का लिंक, जहाँ सभी वीडियो लिस्टेड हैं।

https://www.youtube.com/channel/UCzwKhQ5yUo4k9b__AVqj3cA/videos


मन ही मन को पकड़ता, किस विध आवै हाथ।
ज्ञान घोड़े असवार हो, फिर देखो इसकी जात॥

मन बिन ज्ञान न उपजे, मन बिन मिटे न बांस।
मन ही काटे जाल को, और मन ही मन को फांस॥

19 मई 2018

क्या है, चित्र में रहस्य?

अनजाने में ही कभी-कभी कोई चित्र गहरे आध्यात्मिक रहस्यों वाला बन जाता है।
जो उस समय भी चित्र के सृजनकर्ता को पता नही होता, और बाद में भी।
Unknowingly, a picture sometimes becomes deep spiritual mysteries.
At that time even the creator of the picture would not have known, and later also.
ऐसा ही शायद @अविनाश के साथ भी है। (चित्र में)
This is probably also with @avinash.(in the photo)
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इस चित्र में 6-7 मुख्य बिन्दु हैं,
जो सृष्टि के रहस्य या बनावट या तरीके को स्पष्ट दिखा रहे हैं।
This picture has 6-7 main points,
Who are showing the mystery or nature of the creation or the manner in which it is clearly visible.
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फ़िर से ध्यान दें - 6-7 मुख्य बिन्दु..
Note again - 6-7 main points ..
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अब अपने दिमाग पर जोर डालिये, और टिप्पणी करिये,
कि इसमें ऐसा क्या है, जो सृष्टि रहस्य से सम्बन्धित है।
Now emphasize your mind, and make a comment,
What is this, that is related to the creation of the universe?
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वैसे मैं चित्र में कुछ चिह्न बनाना चाहता था।
पर आपकी दिमागी क्षमता बढ़े, इसलिये ऐसा नहीं किया।
Well I wanted to make a some mark in the picture.
But your brain power increases, So did not do this.

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यह लेख सिर्फ़ ऊपर के चित्र के लिये है।
This article is just for the picture above.

21 अप्रैल 2018

गूढ़ शब्द


सारनाम या सारशब्द वह मूल-ध्वनि है, 
जो आदि-सृष्टि के समय ‘आत्मा’ में उठने वाली पहली आवाज थी।
यही गुप्त है। इसी के प्रकंपन से सृष्टि की समस्त जङ, चेतन वस्तुयें
वृद्धि और हास को प्राप्त होती हैं।
वृद्धि और हास का यह क्रम हर क्षण और निरन्तर है।
सिर्फ़ अपनी ‘वास्तविक पहचान’ भूलने और स्व-स्थ के बजाय
मन-स्थ होने से ऐसा अहसास होता है। जैसे ही स्व-स्थ होंगे,
मनस्थ जो दरअसल कुछ है ही नहीं, खत्म हो जायेगा।
और यह नींद, स्वपन टूटने जैसा होगा।
स्व-पन (हमारी ही क्रियेट की अवस्था)
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दुनियां में फ़ंसकर वीरान हो रहा है।
खुद को भूलकर हैरान हो रहा है॥



॥परमात्मा॥ को
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हिन्दू शास्त्रों (ब्रह्मसूत्र) में ब्रह्मसूर्य तथा रूप को ‘ब्रह्मज्योति’ कहा।
(जिसे ज्ञान-दृष्टि से अनुभव किया जाता है।)
गुरूग्रन्थ साहिब में ॐकार, तथा रूप को चांदना कहा।
(जो अंतर की आंख से दिखायी देता है।)
वेदों में उसके रूप को ‘भर्गो ज्योति’ कहा।
(जिसे ‘उपनयन’ अर्थात अन्तरदृष्टि से अनुभव किया जाता है।)
गीता में उसे परमात्म तत्व कहा है। 
बाइबिल में ‘गाड’ कहा है तथा उसके रूप को डिवाइन लाइट।
(जो ‘थर्ड-आई’ अर्थात तीसरे नेत्र से अनुभव में आता है।)
कुर’आन में ‘अल्लाह’ तथा रूप को ‘नूर’ कहा है।
(जो चश्मे-वसीरत से नजर आता है।)


रवि पंचक जाके नहीं, ताहि चतुर्थी नाहिं।
तेहि सप्तक घेरे रहे, कबहुँ तृतीया नाहिं॥(रामचरित मानस)
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रवि पंचक..रवि से पाँचवाँ यानी गुरूवार (रवि, सोम, मंगल, बुद्ध, गुरू)
अर्थात जिनको गुरू नहीं है, तो उसको चतुर्थी नहीं होगी।
चतुर्थी यानी बुध (रवि, सोम, मंगल, बुध) अर्थात बुद्धि नहीं आयेगी।
बुद्धि न होने के कारण उसे ‘तेहि सप्तक घेरे रहे’
सप्तक..शनि (रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि)
अर्थात उसको शनि घेरकर रखेगा।
और ‘कबहुँ तृतीया नाहिं।’
तृतीया..मंगल (रवि, सोम, मंगल)
(उसके जीवन में मंगल नहीं होगा।)

जिसके जीवन में गुरू नहीं। 
उसका जीवन अभी शुरू नहीं॥
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पर्वत ऊपर हर बहै, घोड़ा चढ़ि बसै गाँव।
बिना फूल भौरा रस चाहें, कहु बिरवा को नाँव॥ 
(बीजक साखी-36)

पर्वत पर हल चलाना, घोड़े पर चढ़कर (उस पर) गांव बसाना,
और (मन) भौंरा बिना फ़ूल के ही रस चाहे,
तो उस वृक्ष का नाम क्या हो सकता है?

10 अप्रैल 2018

परिचय को अंग



पिव परिचय तब जानिये, पिव सों हिलमिल होय।
पिव की लाली मुख परै, परगट दीसै सोय॥

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गई लाल॥

जिन पांवन भुईं बहु फ़िरै, घूमें देस विदेस।
पिया मिलन जब होईया, आंगन भया विदेस॥

उलटि समानी आप में, प्रगटी जोति अनंत।
साहिब सेवक एक संग, खेलें सदा बसंत॥

जोगी हुआ झक लगी, मिटि गइ ऐंचातान।
उलटि समाना आप में, हुआ ब्रह्म समान॥

हम वासी वा देस के, जहाँ पुरुष की आन।
दुख सुख कोइ व्यापै नहीं, सब दिन एक समान॥

हम वासी वा देस के, बारह मास बसंत।
नीझर झरै महा अमी, भीजत हैं सब संत॥

हम वासी वा देस के, गगन धरन दुइ नांहि।
भौंरा बैठा पंख बिन, देखौ पलकों मांहि॥

हम वासी वा देस के, जहाँ ब्रह्म का कूप।
अविनासी बिनसै नहीं, आवै जाय सरूप॥

हम वासी वा देस के, आदि पुरुष का खेल।
दीपक देखा गैब का, बिन बाती बिन तेल॥

हम वासी वा देस के, बारह मास विलास।
प्रेम झरै बिगसै कमल, तेजपुंज परकास॥

हम वासी वा देस के, जाति वरन कुल नांहि।
सब्द मिलावा ह्वै रहा, देह मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, रूप वरन कछु नांहि।
सैन मिलावा ह्वै रहा, शब्द मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, पिंड ब्रह्मंड कछु नांहि।
आपा पर दोइ बिसरा, सैन मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, गाजि रहा ब्रह्मंड।
अनहद बाजा बाजिया, अविचल जोत अखंड॥

संसै करौं न मैं डरौं, सब दुख दिये निवार।
सहज सुन्न में घर किया, पाया नाम अधार॥

बिन पांवन का पंथ है, बिन बस्ती का देस।
बिना देह का पुरुष है, कहैं कबीर संदेस॥

नौन गला पानी मिला, बहुरि न भरिहै गौन।
सुरति सब्द मेला भया, काल रहा गहि मौन॥

हिल मिल खेले सब्द सों, अन्तर रही न रेख।
समझै का मत एक है, क्या पंडित क्या सेख॥

अलख लखा लालच लगा, कहत न आवै बैन।
निज मन धसा सरूप में, सदगुरू दीन्ही सैन॥

कहना था सो कहि दिया, अब कछु कहा न जाय।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय॥

जो कोइ समझै सैन में, तासों कहिये धाय।
सैन बैन समझे नहीं, तासों कहै बलाय॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया, जागी जोति अनंत।
संसै छूटा भय मिटा, मिला पियारा कंत॥

उनमुनि लागी सुन्न में, निसदिन रहि गलतान।
तन मन की कछु सुधि नहीं, पाया पद निरबान॥

उनमुनि चढ़ी अकास को, गई धरनि सें छूट।
हंस चला घर आपने, काल रहा सिर कूट॥

उनमुनि सों मन लागिया, गगनहि पहुँचा जाय।
चांद बिहूना चांदना, अलख निरंजन राय॥

उनमुनि सों मन लागिया, उनमुनि नहीं बिलंगि।
लौन बिलंग्या पानिया, पानी नौन बिलगि॥

पानी ही ते हिम भया, हिम ही गया बिलाय।
जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाय॥

मेरी मिटि मुक्ता भया, पाया अगम निवास।
अब मेरे दूजा नही, एक तुम्हारी आस॥

सुरति समानी निरति में, अजपा माही जाप।
लेख समाना अलेख में, आपा माही आप॥

सुरति समानी निरति में, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परिचय भया, खुल गया सिंधु दुवार॥

गुरू मिले सीतल भया, मिटी मोह तन ताप।
निस बासर सुख निधि लहूं, अन्तर प्रगटे आप॥

सुचि पाया सुख ऊपजा, दिल दरिया भरपूर।
सकल पाप सहजै गया, साहिब मिले हजूर॥

तत पाया तन बीसरा, मन धाया धरि ध्यान।
तपन मिटी सीतल भया, सुन्न किया अस्थान॥

कौतुक देखा देह बिना, रवि ससि बिना उजास।
साहेब सेवा माहीं है, बेपरवाही दास॥

नेव बिहूंना देहरा, देह बिहूना देव।
कबीर तहाँ बिलंबिया, करै अलख की सेव॥

देवल मांहि देहुरी, तिल जैसा विस्तार।
माहीं पाती फ़ूल जल, माहीं पूजनहार॥ 

पवन नहीं पानी नहीं, नहि धरनी आकास।
तहाँ कबीरा संतजन, साहिब पास खवास॥

अगुवानी तो आइया, ज्ञान विचार विवेक।
पीछै हरि भी आयेंगे, सारे सौंज समेत॥

पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान।
कहिबे की सोभा नही, देखै ही परमान॥

सुरज समाना चांद में, दोउ किया घर एक।
मन का चेता तब भया, पुरब जनम का लेख॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतर भया उजास।
सुख करि सूती महल में, बानी फ़ूटी वास॥

आया था संसार में, देखन को बहुरूप।
कहै कबीरा संत हो, परि गया नजर अनूप॥

पाया था सो गहि रहा, रसना लागी स्वाद।
रतन निराला पाइया, जगत ठठोला बाद॥

हिम से पानी ह्वै गया, पानी हुआ आप।
जो पहिले था सो भया, प्रगटा आपहि आप॥

कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ पुरबले लेख।
देखो भाग कबीर का, लेख से भया अलेख॥

जब मैं था तब गुरू नहीं, अब गुरू हैं मैं नाहिं।
कबीर नगरी एक में, दो राजा न समांहि॥

मैं जाना मैं और था, मैं तजि ह्वै गय सोय।
मैं तैं दोऊ मिटि गये, रहे कहन को दोय॥

अगम अगोचर गम नहीं, जहाँ झिलमिली जोत।
तहाँ कबीरा रमि रहा, पाप पुन्न नहि छोत॥

कबीर तेज अनंत का, मानो सूरज सैन।
पति संग जागी सुन्दरी, कौतुक देखा नैन॥

कबीर देखा एक अंग, महिमा कही न जाय।
तेजपुंज परसा धनी, नैनों रहा समाय॥

कबीर कमल प्रकासिया, ऊगा निरमल सूर।
रैन अंधेरी मिटि गई, बाजै अनहद तूर॥

कबीर मन मधुकर भया, करै निरन्तर बास।
कमल खिला है नीर बिन, निरखै कोइ निज दास॥

कबीर मोतिन की लङी, हीरों का परकास।
चांद सूर की गम नही, दरसन पाया दास॥

कबीर दिल दरिया मिला, पाया फ़ल समरत्थ।
सायर मांहि ढिंढोरता, हीरा चढ़ि गया हत्थ॥

कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरू नांहि।
अब गुरू दिल में देखिया, गावन को कछु नांहि॥

कबीर दिल दरिया मिला, बैठा दरगह आय।
जीव ब्रह्म मेला भया, अब कछु कहा न जाय॥

कबीर कंचन भासिया, ब्रह्म वास जहाँ होय।
मन भौंरा तहाँ लुब्धिया, जानेगा जन कोय॥

गगन गरजि बरसै अमी, बादल गहिर गम्भीर।
चहुँदिस दमके दामिनी, भीजै दास कबीर॥

गगन मंडल के बीच में, झलकै सत का नूर।
निगुरा गम पावै नहीं, पहुँचै गुरूमुख सूर॥

गगन मंडल के बीच में, महल पङा इक चीन्हि।
कहै कबीर सो पावई, जिहि गुरू परचै दीन्हि॥

गगन मंडल के बीच में, बिना कलम की छाप।
पुरुष तहाँ एक रमि रहा, नहीं मन्त्र नहि जाप॥

गगन मंडल के बीच में, तुरी तत्त इक गांव।
लच्छ निसाना रूप का, परखि दिखाया ठांव॥

गगन मंडल के बीच में, जहाँ सोहंगम डोर।
सब्द अनाहद होत है, सुरति लगी तहँ मोर॥

गरजै गगन अमी चुवै, कदली कमल प्रकास।
तहाँ कबीरा संतजन, सत्तपुरुष के पास॥

गरजै गगन अमी चुवै, कदली कमल प्रकास।
तहाँ कबीरा बंदगी, कर कोई निजदास॥

दीपक जोया ज्ञान का, देखा अपरम देव।
चार वेद की गम नहीं, तहाँ कबीरा सेव॥

मान सरोवर सुगम जल, हंसा केलि कराय।
मुक्ताहल मोती चुगै, अब उङि अंत न जाय॥

सुन्न महल में घर किया, बाजै सब्द रसाल।
रोम रोम दीपक भया, प्रगटै दीन दयाल॥

पूरे से परिचय भया, दुख सुख मेला दूर।
जम सों बाकी कटि गई, साईं मिला हजूर॥70

परिचय को अंग 2



सुरति उङानी गगन को, चरन बिलंबी जाय।
सुख पाया साहेब मिला, आनंद उर न समाय॥

जा वन सिंघ न संचरै, पंछी उङि नहि जाय।
रैन दिवस की गमि नही, रहा कबीर समाय॥

सीप नही सायर नही, स्वाति बूंद भी नांहि।
कबीर मोती नीपजै, सुन्न सरवर घट मांहि॥

काया सिप संसार में, पानी बूंद सरीर।
बिना सीप के मोतिया, प्रगटे दास कबीर॥

घट में औघट पाइया, औघट माहीं घाट।
कहैं कबीर परिचय भया, गुरू दिखाई बाट॥

जा कारन मैं जाय था, सो तो मिलिया आय।
साईं ते सनमुख भया, लगा कबीरा पाय।

जा कारन मैं जाय था, सो तो पाया ठौर।
सो ही फ़िर आपन भया, को कहता और॥

जा दिन किरतम ना हता, नहीं हाट नहि बाट।
हता कबीरा संतजन, देखा औघट घाट॥

नहीं हाट नहि बाट था, नही धरति नहि नीर।
असंख जुग परलै गया, तबकी कहैं कबीर॥

चाँद नहीं सूरज नहीं, हता नही ओंकार।
तहाँ कबीरा संतजन, को जानै संसार॥

धरति गगन पवनै नही, नहि होते तिथि वार।
तब हरि के हरिजन हुते, कहैं कबीर विचार॥

धरति हती नहि पग धरूं, नीर हता नहि न्हाऊं।
माता ते जनम्या नहीं, क्षीर कहाँ ते खाऊं॥

अगन नहीं जहँ तप करूं, नीर नहि तहँ न्हाऊं।
धरती नहीं जहँ पग धरूं, गगन नहिं तहँ जाऊं॥

पांच तत्व गुन तीन के, आगे मुक्ति मुकाम।
तहाँ कबीरा घर किया, गोरख दत्त न राम॥

सुर नर मुनिजन औलिया, ये सब उरली तीर।
अलह राम की गम नहीं, तहँ घर किया कबीर॥

सुर नर मुनिजन देवता, ब्रह्मा विस्नु महेस।
ऊंचा महल कबीर का, पार न पावै सेस॥

जब दिल मिला दयाल सों, तब कछु अंतर नांहि।
पाला गलि पानी भया, यौं हरिजन हरि मांहि॥

ममता मेरा क्या करै, प्रेम उघारी पोल।
दरसन भया दयाल का, सूल भई सुख सोल॥

सुन्न सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव।
सदा समूह सुख बिलसिया, बिरला जानै भेव॥

सुन्न सरोवर मीन मन, नीर तीर सब देव।
सुधा सिंधु सुख बिलसहीं, बिरला जाने भेव॥

लौन गला पानी मिला, बहुरि न भरिहै गून।
हरिजन हरि सों मिल रहा, काल रहा सिर धुन॥

गुन इन्द्री सहजे गये, सदगुरू करी सहाय।
घट में नाम प्रगट भया, बकि बकि मरै बलाय॥

जब लग पिय परिचय नहीं, कन्या क्वारी जान।
हथ लेवो हूं सालियो, मुस्किल पङि पहिचान॥

सेजै सूती रग रम्हा, मांगा मान गुमान।
हथ लेवो हरि सूं जुर्यो, अखै अमर वरदान॥

पूरे सों परिचय भया, दुख सुख मेला दूर।
निरमल कीन्ही आतमा, ताते सदा हजूर॥

मैं लागा उस एक सों, एक भया सब मांहि।
सब मेरा मैं सबन का, तहाँ दूसरा नांहि॥

भली भई जो भय पङी, गई दिसा सब भूल।
पाला गलि पानी भया, ढूलि मिला उस कूल॥

चितमनि पाई चौहटे, हाङी मारत हाथ।
मीरां मुझ पर मिहर करि, मिला न काहू साथ॥

बरसि अमृत निपज हिरा, घटा पङे टकसार।
तहाँ कबीरा पारखी, अनुभव उतरै पार॥

मकर तार सों नेहरा, झलकै अधर विदेह।
सुरति सोहंगम मिलि रहि, पल पल जुरै सनेह॥

ऐसा अविगति अलख है, अलख लखा नहि जाय।
जोति सरूपी राम है, सब में रह्यो समाय॥

मिलि गय नीर कबीर सों, अंतर रही न रेख।
तीनों मिलि एकै भया, नीर कबीर अलेख॥

नीर कबीर अलेख मिलि, सहज निरंतर जोय।
सत्त सब्द औ सुरति मिलि, हंस हिरंबर होय॥

कहना था सो कहि दिया, अब कछु कहना नाहिं।
एक रही दूजी गई, बैठा दरिया मांहि॥

आया एकहि देस ते, उतरा एक ही घाट।
बिच में दुविधा हो गई, हो गये बारह बाट॥

तेजपुंज का देहरा, तेजपुंज का देव।
तेजपुंज झिलमिल झरै, तहाँ कबीरा सेव॥

खाला नाला हीम जल, सो फ़िर पानी होय।
जो पानी मोती भया, सो फ़िर नीर न होय॥

देखो करम कबीर का, कछु पूरबला लेख।
जाका महल न मुनि लहै, किय सो दोस्त अलेख॥

मैं था तब हरि नही, अब हरि है मैं नाहिं।
सकल अंधेरा मिटि गया, दीपक देखा मांहि॥

सूरत में मूरत बसै, मूरत में इक तत्व।
ता तत तत्व विचारिया, तत्व तत्व सो तत॥

फ़ेर पङा नहि अंग में, नहि इन्द्रियन के मांहि।
फ़ेर पङा कछु बूझ में, सो निरुवारै नांहि॥

साहेब पारस रूप है, लोह रूप संसार।
पारस सो पारस भया, परखि भया टकसार।

मोती निपजै सुन्न में, बिन सायर बिन नीर।
खोज करंता पाइये, सतगुरू कहै कबीर॥

या मोती कछु और है, वा मोती कछु और।
या मोती है सब्द का, व्यापि रहा सब ठौर॥

दरिया मांही सीप है, मोती निपजै मांहिं।
वस्तु ठिकानै पाइये, नाले खाले नांहि॥

चौदा भुवन भाजि धरै, ताहि कियो बैराट।
कहै कबीर गुरू सब्द सो, मस्तक डारै काट॥

हमकूं स्वामी मति कहो, हम हैं गरीब अधार।
स्वामी कहिये तासु कूं, तीन लोक विस्तार॥

हमकूं बाबा मति कहो, बाबा है बलियार।
बाबा ह्वै करि बैठसी, घनी सहेगा मार॥

यह पद है जो अगम का, रन संग्रामे जूझ।
समुझे कूं दरसन दिया, खोजत मुये अबूझ॥

सीतल कोमल दीनता, संतन के आधीन।
बासों साहिब यौं मिले, ज्यौं जल भीतर मीन॥

कबीर आदू एक है, कहन सुनन कूं दोय।
जल से पारा होत है, पारा से जल होय॥

दिल लागा जु दयाल सों, तब कछु अंतर नांहि।
पारा गलि पानी भया, साहिब साधू मांहि॥

ऐसा अविगति रूप है, चीन्है बिरला कोय।
कहै सुनै देखै नहीं, ताते अचरज मोय॥

सत्तनाम तिरलोक में, सकल रहा भरपूर।
लाजै ज्ञान सरीर का, दिखवै साहिब दूर॥

कबीर सुख दुख सब गया, गय सो पिंड सरीर।
आतम परमातम मिलै, दूधै धोया नीर॥

गुरू हाजिर चहुदिसि खङे, दुनी न जानै भेद।
कवि पंडित कूं गम नही, ताके बपुरे वेद॥

जा कारन हम जाय थे, सनमुख मिलिया आय।
धन मैली पिव ऊजला, लाग सकी नहि पांय॥

भीतर मनुवा मानिया, बाहिर कहूं न जाय।
ज्वाला फ़ेरी जल भया, बूझी जलती लाय॥

तन भीतर मन मानिया, बाहिर कबहू न लाग।
ज्वाला ते फ़िरि जल भया, बुझी जलती आग॥

जिन जेता प्रभु पाइया, ताकूं तेता लाभ।
ओसे प्यास न भागई, जब लग धसै न आभ॥

अकास बेली अमृत फ़ल, पंखि मुवे सब झूर।
सारा जगहि झख मुआ, फ़ल मीठा पै दूर॥

तीखी सुरति कबीर की, फ़ोङ गई ब्रह्मंड।
पीव निराला देखिया, सात दीप नौ खंड॥

ना मैं छाई छापरी, ना मुझ घर नहि गांव।
जो कोई पूछै मुझसों, ना मुझ जाति न ठांव॥ 

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