02 दिसंबर 2018

आत्मा के स्वरूप





=आत्मा के स्वरूप=

आत्मा के शुद्ध चेतनस्वरूप को ‘हंसदेह’ कहते हैं। इस स्थिति में आत्मा ब्रह्म के तदरूप हो जाता है।

आत्मा में ‘अह्मब्रह्मास्मि’ के भाव को ‘अज्ञानग्रन्थि’ कहते हैं। इस अभिमानयुक्त अवस्था को आत्मा का ‘केवल्यदेह’ कहते हैं।

प्रकृति की और प्रवाह होने से आत्मा में प्रकृतिभोग की इच्छा बलवती हो जाती है। इस अवस्था को ‘महाकारण देह’ कहते हैं। यह आत्मा की आनन्दरहित भ्रमयुक्त सत-चित अवस्था है।

भोगइच्छा से जीव का सम्बन्ध प्रकृति से होता है। चेतनआत्मा और जड़प्रकृति के सम्बन्ध को ‘कारणशरीर’ कहते हैं। इसी को ‘जड़चेतन की ग्रन्थि’ भी कहते हैं।

इस ग्रन्थि के कारण जीव प्रकृति के बन्धन में पड़ जाता है। उसे पाँच प्राण, दस इन्द्रिय, चार अन्त:करण तत्वों का ‘सूक्ष्मशरीर’ प्राप्त हो जाता है।

सूक्ष्मशरीर रज-वीर्य के संयोग होने से माता के गर्भ में प्रवेश करता है, और दस मास में ‘स्थूलशरीर’ धारण कर जन्म लेता है।

27 नवंबर 2018

ध्यान का लक्ष्य, सत्य क्या?




सन्तमत में ‘नकटा गुरू’ शीर्षक से एक द्रष्टांत है। यद्यपि मजे की बात है कि अब इसे सुनाया नहीं जाता, या फ़िर पूर्ण ढीठता से सुनाते हैं? द्रष्टांत यह है कि एक अपराधी की सजा के तौर पर नाक काट दी गयी। कालांतर में यह नये अवतार ‘सदगुरू’ रूप में प्रकट हुआ।
और जैसा कि अक्सर होता है कि भागे हुये अपराधी या दण्डित अभियुक्त, धर्म और धार्मिक चोले की आङ लेते हैं। इस गुरू ने भी वैसा ही किया, और ऊँची-ऊँची बातों द्वारा जनसामान्य पर मोहिनी डालने लगा।

तब किसी बुद्धिजीवी व्यक्ति ने पूछा कि - गुरूजी, आपकी नाक कैसे कट गयी?
उसने कहा - बिना नाक कटे ईश्वर/परमात्म दर्शन संभव नहीं। इसलिये ईश्वर दर्शन करना है तो नाक कटाना अनिवार्य है। इसके बाद भी यह सस्ता सौदा ही है।

लोगों को लगा कि वाकई सिर्फ़ नाक कट जाने से ईश्वर दर्शन होते हैं, तो सौदा सस्ता ही है। फ़िर जैसा कि प्रायः होता ही है, आरम्भ में कुछ लोग नाक कटाने के लिये तैयार हो गये।
गुरू ने नाक काटी, और कान में दीक्षामंत्र के बजाय कहा - देखो, अब नाक तो कट गयी। इसलिये सभी से कहो कि तुम्हें ईश्वर दर्शन हुआ। ऐसी अनुभूति हुयी। ऐसा ध्यान, ऐसी समाधि हुयी, अन्यथा लोग तुम्हारा उपहास करेंगे।

बात सच थी, और मजबूरी भी थी। अतः वह लोग कहने लगे - वाकई अदभुत बात है। नाक कटते ही हमें ईश्वर दर्शन हुये।  

फ़िर तो गुरूजी के पास नाक कटाने के लिये अनेक लोग आने लगे।
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कोई भी भक्ति/ज्ञान/योग/गुरूधारणा इन सभी का उद्देश्य जीते जी मोक्ष या सत्यदर्शन कराना है, और प्रत्येक क्रिया का तुरन्त परिणाम पाना है, न कि दस वर्ष, बीस वर्ष, या मृत्यु उपरान्त। 

मज्जन फ़ल पावहु तत्काला, काक होय पिक बकउ मराला।

लेकिन आश्चर्य की बात है कि यही हो रहा है। दस-बीस वर्ष तक गुरूधारण के बाद भी कोई ज्ञान नहीं हुआ, ध्यान नहीं हुआ, प्राप्ति नहीं हुयी। फ़िर भी कहते हैं कि - हाँ, अच्छा ध्यान हो रहा है, ऐसे अनुभव हो रहे हैं, समाधि हो रही है आदि आदि। हमारे गुरूदेव की बङी कृपा है।

उल्लेखनीय है कि यह बात आत्मज्ञान मंडलों की है। दूसरे मतों की तो जाने ही दें।
असल में वर्तमान गुरू-शिष्य परंपरा में एक बङा दोष तो यही है कि शिष्य को पता ही नही कि सही अर्थों में उसका लक्ष्य क्या है, और वह किस प्राप्ति के लिये प्रयासरत है? और गुरू इस बारे में बताता नहीं, या फ़िर स्वयं नहीं जानता। दूसरे, यदि बताये तो वह खुद परेशानी में आ जायेगा।

विचार करिये - तब ध्यान का लक्ष्य या सत्य क्या है? 

आपे मैं जब आपा निरष्या, अपनपै आपासूझ्या।
आपैकहत सुनतपुनि अपनाँ, अपनपै आपाबूझ्या॥

अपनैपरचै लागी तारी, अपनपै आपसमाँनाँ।
कहैकबीर जे आपबिचारै, मिटिगया आवनजाँना॥  

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सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था
साध्वी अरूणादेवी आश्रम
बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (. प्र)

phone -
78953 91377
82185 31326

08 नवंबर 2018

साध्वी अरूणा देवी आश्रम




                                          =श्री सदगुरूदेव नमः=

परमपिता परमात्मा एवं सदगुरूदेव श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’ की असीम कृपा से छटीकरा, वृन्दावन स्थिति ‘माँ धाम’ वृद्धाश्रम के समीप ‘बसेरा कालोनी’ में सतसंग, ध्यान और निःअक्षर दीक्षा आदि कार्यक्रमों को अनवरत चलाये रखने हेतु ‘साध्वी अरूणा देवी आश्रम’ का निर्माण कार्य इसी दीपावली पर विधिविधान पूर्वक सम्पन्न हो गया।



                             तीनलोक है देह में, रोमरोम में धाम।
                         सतगुरू बिन नहि पाइये, सत्तसार निजनाम॥

1 दिसंबर 2018 से आश्रम की सतसंग, ध्यान, सत्तनाम दीक्षा आदि गतिविधियां भलीभांति आरम्भ हो जायेंगी। आश्रम का प्रमुख उद्देश्य समर्थ सदगुरू के सानिंध्य में सुरति-शब्द योग सहजयोग, क्रियायोग, राजयोग जैसी आत्मविद्याओं के योगसाधक को ‘ध्यान में गहन प्रविष्टि’ का विशेष प्रयोगात्मक अनुभव कराना, मुख्य आत्मचेतना से निरन्तर जोङना तथा सैद्धांतिक, स्वास्थय आदि पहलुओं पर उनका समाधान करना है।

                        अक्षरआदि जगत में, जाका सब विस्तार।
                         सदगुरू दाया पाईये, सत्तनाम निजसार॥

इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी आश्रम के फ़ोन न. 78953 91377 पर प्राप्त कर सकते हैं।



गौसेवा एवं अन्य धर्मार्थ, परमार्थिक कार्यों हेतु इच्छुक दानदाता चित्र में दिये गये खाता विवरण में धन सहयोग कर सकते हैं। कोई भी दानराशि भेजने के पूर्व संदेश/टिप्पणी/फ़ोन आदि द्वारा पूर्व सूचित अवश्य करें। एवं वह दानराशि किस धर्म-प्रयोजन हेतु तथा निष्काम/सकाम, गुप्त/प्रकट आदि किस भाव में दान की गयी है। इससे अवश्य अवगत करायें।

                                सचुपाया सुखऊपजा, दिलदरिया भरपूर।
                               सकलपाप सहजे गया, सदगुरू मिले हजूर॥

यह संस्था पूर्णतः धर्म-विज्ञान और आध्यात्मिक नियम परम्पराओं पर कार्य करने हेतु संकल्पबद्ध है। अतः पहले भलीभांति ही संस्था के उद्देश्य/नियम/कार्य आदि की जानकारी प्राप्त कर संस्था से जुङें।

संरक्षण
सदगुरू श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’
परमानन्द शोध संस्थान
साध्वी अरूणा देवी आश्रम
“माँ धाम” वृद्धाश्रम के पास/साइड में
बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र.)

(सहज समाधि, राजयोग दीक्षा की प्रतिष्ठित संस्था)

<<धर्मबोध>>

जय धर्मदेव __/\__


सतसंग, सूत्रों आदि हेतु ‘साध्वी अरूणा देवी’ का पेज
https://www.facebook.com/balsadhvi.arunadevi

02 अक्तूबर 2018

धर्म-स्थापना




यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

शास्त्र अनुसार श्रीकृष्ण की आयु 125 वर्ष थी, और कलियुग की अवधि लगभग 5500 वर्ष हो चुकी है। मोटे अनुमान के मुताबिक आठ-दस हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण इस प्रथ्वी पर सशरीर थे।
और उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान कहा था - यदा यदाहि धर्मस्य..जब जब धर्म की हानि होती है..तब मैं अवतरित हो पुनः धर्म की स्थापना करता हूँ।

फ़िर..‘धर्मसंस्थापनार्थाय..’ उन्होंने ‘जन्म से अशरीर होने तक’ कई असुरों को ‘मोक्ष’ करा दिया।

लेकिन?

क्या श्रीकृष्ण के समय में, या देहत्याग के बाद, प्रथ्वी पर धर्म-स्थापना हो चुकी थी?
क्योंकि सबसे पहले तो यदुवंशी ही अभिमानी होकर आपस में मर मिटे। इसके बाद भी असुर और असुरता से मानवीय संघर्ष और युद्ध जारी रहा।

श्रीकृष्ण के बाद शुकदेव जी आदि जैसे ज्ञानी पुरूष मौजूद थे। जिन्होंने परीक्षित को जीते जी मोक्ष कराया।

सिर्फ़ श्रीकृष्ण काल से ही इतिहास का अध्ययन करें तो तब से अब तक ‘धर्म-संस्थापकों’ की लम्बी सूची उपलब्ध है। लेकिन प्रसिद्ध लोगों में क्रमशः बुद्ध, महावीर, ईसामसीह, मुहम्मद, गोरखनाथ, कबीर, नानक आदि आदि उल्लेखनीय हैं।

इसके बाद ताजातरीन और ‘स्वघोषित महापुरूषों’ में ओशो, कृष्णमूर्ति जैसे विचारकों, और साधु वर्ग में आने वालों (इनके नाम बताना आवश्यक नहीं) की गिनती ‘कुछ हजार’ में निश्चय ही है।

इसके बाद मोक्षदायिनी भगवत सप्ताह कथा करने वाले ‘व्यास’ और अब तो ‘व्यासिनें’ भी बङी संख्यां में यकायक अवतरित हुये। इतने कि सरकार को इनका सरकारी रिकार्ड रखना भी महत्वहीन लगा।

तो..

बहुत समय से मैं इसी विषय पर शोध/खोज कर रहा हूँ कि इन धर्मधन्य विभूतियों ने आखिर वह ‘धर्म-स्थापना’ किस मुहल्ले या ग्राम में की है। किसी पाठक को ज्ञात हो तो कृपया टिप्पणी में उल्लेख करें।

19 अगस्त 2018

ॐ खं ब्रह्म







यजुर्वेद चत्वारिंशोऽध्याय

ईशा वास्यामिदं सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत।
तेन यत्केन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विध्दनम॥1॥

भावार्थ - सृष्टि में जो कुछ भी है, सब ईश द्वारा आवृत-आच्छादित है। केवल उसके द्वारा दिये गये का ही उपयोग करो। लालच मत करो। धन किसका है?

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥2॥

भावार्थ - यहाँ कर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की कामना करें। कर्म मनुष्य को लिप्त नही करते। यह तुम्हारे लिए है। इसके अतिरिक्त परम कल्याण का कोई अन्य मार्ग नही है।

आसुर्या नाम ते लोकाऽ अन्धेन तमसावृता:।
ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जना:॥3॥

भावार्थ - वे लोग आसुर्य नाम से जाने जाते हैं। वे गहन अन्धकार से घिरे रहते हैं। वे आत्मा का हनन करने वाले प्रेतरूप में भी वैसे ही अन्धकारयुक्त लोकों में जाते हैं।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवाऽ आप्नुवन् पूर्वमर्शत।
तद्धावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥4॥

भावार्थ - चंचलतारहित वह ईश मन से भी अधिक वेगवान है। वह स्फूर्तिवान पहले से ही है। उसे देवगण (मन, इन्द्रिय) प्राप्त नही कर पाते। वह स्थिर रहते हुए भी दौड़कर अन्य से आगे निकल जाता है। उसके अन्तर्गत ही गतिशील वायु-जल को धारण किये रहता है।

तदेजति तन्नैजति तहुरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:॥5॥

भावार्थ - वह गतिशील भी है, और स्थिर है, वह दूर से दूर भी है, और निकट से निकट भी है। वह सबके अन्दर भी है तथा सबके बाहर भी है।

यस्तु सर्वणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति॥6॥

भावार्थ - सभी भूतों को आत्मतत्व में ही स्थित अनुभव करता है तथा सभी भूतों के अन्दर इस आत्मतत्व को समाहित अनुभव करता है, तब वह किसी प्रकार भ्रमित नहीं होता।

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:।
तत्र को मोह: क: शोक ऽएकत्वमनुपश्यत:॥7॥

भावार्थ - जिस स्थिति में यह जान लेता है कि यह आत्मतत्व ही समस्त भूतों के रूप में प्रकट हुआ है, उस एकत्व की अनुभूति की स्थिति में मोह अथवा शोक कहाँ टिक सकते है?

स पर्यगाच्छुक्रमकायभव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याताथथ्यतोर्थान व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:॥8॥

भावार्थ - वह सर्वव्यापी है, तेजस्वी है। देहरहित, स्नायुरहित एवं छिद्ररहित है। वह शुद्ध और निष्पाप है। वह कवि, मनीषी, सर्वजयी और स्वयं ही उत्पन्न होने वाला है। उसने अनादिकाल से ही सबके लिए यथायोग्य अर्थों की व्यवस्था बनाई है।

अन्धं तमः प्र विशन्ति येसंभूतिमुपासते।
ततो भूयऽइव ते तमो यऽ उसंभूत्याम्रताः॥9॥

भावार्थ - जो केवल असंभूति (विनाश) की उपासना करते हैं वे घोर अंधकार में घिर जाते हैं, और जो केवल संभूति की ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अंधकार में फंस जाते हैं।

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नास्तद्विचचक्षिरे॥10॥

भावार्थ - जिन देवपुरुषों ने हमारे लिये विशेषरूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों से सुना है कि संभूतियोग का प्रभाव भिन्न है, और असंभूतियोग का प्रभाव उससे भिन्न है।

संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते॥11॥

भावार्थ - संभूति (सृजन) तथा विनाश इन दोनों कलाओं को एक साथ जानो। विनाश की कला से मृत्यु को पार करके, तथा संभूति की कला से अमृतत्व की प्राप्ति की जाती है।

अन्धं तमः प्रविशन्ति येअविद्यामुपसते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाम्रताः॥12॥

भावार्थ - जो अविद्या की उपासना करते हैं, वे गहन अंधकार से घिर जाते हैं, और जो विद्या की उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अज्ञान में फंस जाते हैं।

अन्यदेवाहुर्विद्यायाऽ अन्यदाहुरविद्यायाः।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥13॥

भावार्थ - जिन देवपुरुषों ने हमारे लिये विशेष रूप से कहा है, उन धीर पुरुषों से हमने सुना है कि विद्या का प्रभाव कुछ और है, और अविद्या का प्रभाव उससे भिन्न है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्या मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥14॥

भावार्थ - विद्या तथा अविद्या दोनों का ज्ञान एक साथ प्राप्त करो। अविद्या के प्रभाव से मृत्यु को पार करके विद्या द्वारा अमृत तत्व की प्राप्ति की जाती है।

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम।
ओ३म क्रतो स्मर क्लिबे स्मर कृतं स्मर॥15॥

भावार्थ - यह जीवन वायु, अग्नि आदि तथा अमृत के संयोग से बना है। शरीर तो अंततः भस्म हो जाने वाला है। हे संकल्पकर्ता, तुम परमात्मा का स्मरण करो, अपनी सामर्थ्य का स्मरण करो, और जो कर्म कर चुके हो, उनका स्मरण करो।

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमऽ उक्तिं विधेम॥16॥

भावार्थ - हे अग्ने, हमें श्रेष्ठ मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले चलें। हे विश्व के अधिष्ठातादेव, आप कर्म मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। हमें कुटिल पापकर्मों से बचायें। हम बहुशः (भूयिष्ठ) नमन करते हुए आप से विनय करते हैं।

हिरण्येन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम।
योसावादित्ये पुरूषः सोसावहम। ॐ खं ब्रह्म॥17॥

भावार्थ - सोने के पात्र से सत्य का मुख ढंका हुआ है। वह जो आदित्यरूप पुरूष है, वही मैं हूँ। ॐ आकाशरूप में ब्रह्म ही संव्याप्त है।

15 अगस्त 2018

पवित्र किताबों का बोझ


=पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है=

मुसलमानों की पवित्र किताब कुरआन इतनी बचकानी है, इतनी आदिम है।
उसका कारण है मोहम्मद अनपढ़ थे। वह खुद लिख नहीं सकते थे।
उन्होंने कहा होगा, और किसी और ने लिखा होगा।
उन्हें खुद धक्का लगा था जब उन्होंने आवाज सुनी थी।

वे पहाड़ पर अपनी भेड़ों बकरियों को चरा रहे थे। उन्हें सुनाई पड़ा - लिखो। 
उन्होंने सब तरफ देखा कोई नजर नहीं आया। दुबारा उन्होंने सुना - लिखो।

उन्होंने कहा - मैं निरक्षर हूँ, मैं लिख नहीं सकता। और तुम कौन हो?
वहाँ कोई नहीं था। वे बहुत कंप रहे थे, बहुत भयभीत हो गये थे।

और यह एक अस्थिर-मन का लक्षण है। 
जो अपने अचेतन से आ रही आवाज को बाहर से आ रही आवाज समझने की गलती कर रहा था।
यह उनका खुद का अचेतन था। 
परंतु चेतन के लिए अचेतन बहुत दूर है।
वह भीतर ही है। परंतु यदि मन असंतुलित हो।

और मोहम्मद का चित्त असंतुलित था।
इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनका पूरा जीवन एक धर्मांध का जीवन रहा है। लोगों को मारना, और मारकर धर्मांतरित करना।
“या तुम अनुयायी बनो, नहीं तो मरने के लिए तैयार रहो।”

इस्लाम ने दुनियां के एक तिहाई लोगों को धर्मांतरित किया है, तर्क से नहीं बल्कि तलवार से। वे तर्क करने के लिए सक्षम नहीं थे, और ना ही उनकी क्षमता थी पढ़ने, लिखने या विचार करने की।

तो जब उन्होंने इस अचेतन आवाज को सुना तो वे कंपते हुए, ज्वरग्रस्त और भयभीत होकर घर की तरफ दौड़े। वे बिस्तर में घुस गये, और अपनी पत्नी से कहा - मैं किसी से नहीं कह सकता कि खुद ईश्वर ने मेरे साथ बातचीत की है, मैं खुद भरोसा नहीं कर पा रहा हूँ। लगता है मैं पागल हुआ हूँ। शायद रेगिस्तान और पहाड़ियों की बहुत ज्यादा गर्मी में टहलने के कारण मैं भ्रांति में हूँ, या ऐसा ही कुछ है। मैंने सुना..और मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ ताकि मैं भारमुक्त हो जाऊँगा।

उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया।

इसलिए मैं तुमसे बारबार कहता हूं, कि नेताओं को अनुयायियों की जरूरत होती है। खुद को यह विश्वास दिलाने के लिये कि वे नेता हैं।

उस स्त्री ने उसे विश्वास दिलाया कि वह सच में ईश्वर ही था। तुम पागल नहीं हो, ईश्वर सच में तुमसे बोला है।

वह स्त्री निश्चित ही मोहम्मद से प्रेम करती थी, क्योंकि उसकी उम्र चालीस साल की थी, और वह सिर्फ छब्बीस साल का था। और वह गरीब, असंस्कृत, अशिक्षित था। फिर भी उस अमीर स्त्री ने उससे शादी की थी। तो निश्चित ही वह स्त्री उस आदमी के प्रेम में थी।

उसने उसे विश्वास दिलाया - तुम चिंता मत करो, और आवाजें आयेगी। यह निश्चित ही शुरूआत है, इसलिए ईश्वर ने कहा ‘लिखो’ अगर तुम लिख नहीं सकते, तो फिकर मत करो। तुम सिर्फ इतना बता दो कि तुम्हें क्या कहा गया है, हम उसे लिखेंगे।

इस तरह कुरआन लिखी गई। और यह एक दिन, एक महीने, या एक साल में नहीं लिखी गई है, क्योंकि मोहम्मद सुस्पष्ट व्यक्ति नहीं थे। उसे पूरी जिंदगी लगी। कभीकभार कोई बात निकलती थी और वह कहता था - लिखो।

कुरआन को लिखने में कई साल लगे है, और उसमें से जो निकला है, वह करीब-करीब निरर्थक है। यह एक समझदार मनुष्य से भी नहीं निकली है, ईश्वर का तो क्या कहना। अगर कहीं कोई ईश्वर है तो?

अगर यह किताबें उस ईश्वर का प्रमाण है तो वह ईश्वर सच में नासमझ है। अब कुरआन अजीब चीजों के बारे में कहती है, जिनका मुसलमान अनुगमन करते है क्योंकि वह एक पवित्र किताब है।

मोहम्मद की खुद की नौ पत्नियां थी। वह गरीब था। उसमें एक पत्नी संभालने का भी सामर्थ्य नहीं था। परन्तु चूंकि एक अमीर स्त्री उसके प्रेम में पड़ी थी, वह चालीस साल की थी, और वह छब्बीस साल का, वह स्त्री जल्दी ही मर जायेगी फिर उसे उसका सारा धन मिलेगा। इसलिए उसने किसी भी तरह की सुंदर स्त्री से शादी करने की शुरुआत की जो उसे मिल सकती थी।

और उसने कुरआन में कहा कि - हर मुसलमान को चार पत्नियां करने का अधिकार है। यह ईश्वर का मुसलमानों को दिया गया विशेष उपहार है।

दूसरा कोई भी धर्म चार पत्नियां करने की अनुमति नहीं देता है। अब तुम्हें चार पत्नियां कहां मिलेंगी? प्रकृति में पुरुष और स्त्री हमेशा लगभग समान अनुपात में होते हैं, लिहाजा एक पुरूष, एक पत्नी यह बहुत ही प्राकृतिक व्यवस्था लगती है क्योंकि उनका अनुपात समान है। परन्तु यदि एक पुरुष चार पत्नियों से शादी कर रहा है, वह दूसरे तीन पुरूषों की पत्नियां ले रहा है। अब वे दूसरे तीन आदमी, वे क्या करेंगे?

यह इस्लाम की अच्छी कूटनीति बनी। इन दूसरे तीन मुसलमानों ने दूसरों की पत्नियों छीनना, मुस्लिम की नहीं, बल्कि गैर-मुस्लिमों की, और उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करना।

वस्तुत: जब भी कोई स्त्री मुसलमान से शादी करती है, तब वह भी मुसलमान बनती है, किसी विशेष धर्मांतरण की आवश्यकता नहीं होती है। और खासतौर से भारत से उन्होंने हजारों स्त्रियों को पकड़ा। हिंदू समाज संकट में था, और यहूदियों की तरह हिंदू भी धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते हैं।

यह दो सबसे पुराने धर्म हैं, जो धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते हैं। यहूदी जन्म से यहूदी बनता है, और हिंदू जन्म से हिंदू बनता है। और एक बार कोई हिंदू स्त्री मुसलमान बन गई, तो वह पतित हो जाती है। वह अछूत बन गई, उसको हिंदू धर्म में वापस नहीं लिया जा सकता है।

तो उन्होंने हर जगह से स्त्रियों को खोजा जिससे उन्हें उनकी आबादी अत्यधिक रूप से बढ़ाने में मदद मिली। आप तथ्य देखते हो? अगर ज्यादा स्त्रियां उपलब्ध हो तो आदमी चाहे जितने बच्चे पैदा कर सकता है, परन्तु एक स्त्री एक साल में एक ही बच्चे को जन्म दे सकती है। उसे दूसरे बच्चे को जन्म देने के लिए एक साल और लगता है। मुसलमानों की आबादी जल्द बढ़ी क्योंकि हर मुसलमान को चार पत्नियां करने का अधिकार दिया गया है।

और तलवार से..यह बहुत आश्चर्यजनक है कि लोग इसमें विश्वास करते है।

कुरआन कहती है कि - अगर आप किसी को इस्लाम में धर्मांतरित नहीं कर सकते हो, तो बेहतर होगा कि उसे मार डालो, क्योंकि आपने उसे मुक्ति दिलाई है, एक गलत जिंदगी जीने से, जो वह जीने जा रहा था। उसकी भलाई के लिए उसे मुक्त कर दो।

इस तरह उन्होंने बेहिसाब लोगों को मुक्ति दिलवायी, और मुक्ति दिलवाते गये। दोनों में से किसी भी एक तरीके से आप मुक्त हो सकते हैं, अगर आप इस्लाम धर्म स्वीकार करते हैं तब भी, क्योंकि ईश्वर दयालु है।

मुसलमान होने के लिए तीन चीजों में आस्था होनी चाहिए - एक ईश्वर, एक पैगंबर मोहम्मद, और एक पवित्र किताब कुरआन। बस यह तीन आस्थायें, और आप बच जाते हैं। अगर आप इन तीन आस्थाओं से बचना नहीं चाहते हो, तो तलवार तुरन्त आपको छुटकारा देगी।

परन्तु वे आपको गलत जीवन जीने की अनुमति नहीं देते। वे जानते हैं सही जीवन क्या है, और उनके जीवन जीने के तरीके के अलावा बाकी सब जीवन जीने के तरीके गलत हैं।

यह सब पवित्र किताबें हैं। इन पवित्र किताबों का मनुष्य की आत्मा पर भारी बोझ है। तो सबसे पहले मैं तुम्हें कहना चाहता हूँ कि मेरी सहित कोई भी किताब पवित्र नहीं है। सब मनुष्य निर्मित है। हाँ, वहाँ कुछ अच्छी तरह लिखी गई किताबें, और कुछ अच्छी तरह ना लिखी गई किताबें है। परन्तु वहाँ पवित्र और अपवित्र जैसी श्रेणियों में कोई किताब नहीं है।

--ओशो-- 
=फ्रॉम अनकांशसनेस टू कांशसनेस= 
प्रवचन - 17

11 अगस्त 2018

गर्भपात या कन्या हत्या




एक युवा महिला एक लेडी डॉक्टर के पास गई, और बोली - डॉक्टर, मैं एक गंभीर समस्या में हूँ, और आपकी सहायता चाहती हूँ। 

डॉक्टर - हाँ, बेखौफ कहो।

महिला - मैं गर्भवती हूँ, आप किसी से कहियेगा नहीं लेकिन मैंने एक जान पहचान के सोनोग्राफी लैब से यह जान लिया है कि मेरे गर्भ में एक बच्ची है। मैं पहले से एक बेटी की माँ हूँ, और मैं किसी हालत में दो बेटियाँ नहीं चाहती।

डाक्टर ने कहा - ठीक है, तो मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूँ? 

महिला बोली - मैं चाहती हूँ कि इस गर्भ को गिराने में आप मेरी मदद करें। 

डाक्टर अनुभवी और समझदार थी। उन्होंने थोङी देर सोचा, और कहा - मुझे लगता है कि मेरे पास एक सरल रास्ता है जो आपकी मुश्किल हल कर देगा।


महिला बहुत खुश हुई।

डाक्टर ने कहा - हम एक काम करते हैं। आप दो बेटियाँ नहीं चाहती ना, तो पहली बेटी को मार देते हैं जिससे आप इस अजन्मी बच्ची को जन्म दे सकें, और आपकी समस्या का हल भी हो जाए। वैसे भी हमको एक बच्ची को मारना है, तो पहली वाली को ही मार देते है ना? 

महिला ने तुरन्त विरोध किया - न ना डाक्टर, हत्या करना गुनाह है, पाप है, और वैसे भी मैं अपनी बेटी को बहुत चाहती हूँ। उसको खरोंच भी आती है, तो दर्द का अहसास मुझे होता है।

डाक्टर - पहली बेटी की हत्या करो, या इस अजन्मी बेटी की, गुनाह तो दोनों हैं, दोनों ही पाप हैं।

यह बात उस महिला को समझ आ गई।
वह स्वयं की सोच पर लज्जित हुई, और पश्चाताप करते हुए घर चली गई।

=बेटी बचाओ=
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साभार - दोनों चित्र व शब्दरचना इंटरनेट

मूलस्रोत - अज्ञात

05 अगस्त 2018

देवीजी



किसी किसी का जीवन ही मुझे प्रभावित करता है फ़िर यदि वह व्यक्ति आध्यात्मिक हो, और भाग्यवश मुझसे जुङा भी हो, तो ये ‘सोने पर सुहागा’ जैसा ही है। सात वर्ष की आयु से ही स्वस्फ़ूर्त तपस्या में रत हो जाने वाली ‘देवीजी’ के नाम से सुविख्यात बालसाध्वी सुश्री अरुणा देवी एक ऐसा ही आध्यात्मिक व्यक्तित्व है।

देवीजी के सरल सहज निश्छल स्वभाव, भोलापन और वाणी की मधुरता में एक चुम्बकीय आकर्षण है, जो किसी को भी हठात उनकी तरफ़ खिंचने को विवश कर देता है। अपने इसी सरल सौम्य व्यक्तित्व और प्राणिमात्र के प्रति सहज स्नेह से आज हजारों लोग उनसे जुङे हुये हैं, और उनकी कथा सतसंग आदि के माध्यम से प्रभुभक्ति की ओर प्रेरित हुये हैं।

लेकिन देवीजी से मेरा जुङाव और लगाव उनकी आत्म-उपासना और क्रियात्मक समाधि आदि योगों को लेकर हुआ, जबकि वह मुझसे मिलीं।

देवीजी जब बाल्यावस्था में ही तप उन्मुख हुयीं, तो घरवालों ने उन्हें उस एकान्त स्थान से उठाना, डराना चाहा, जहाँ वह तप हेतु बैठी थीं, पर वह बिलकुल भी विचलित नही हुयी, और निर्विघ्न साधनारत रहीं। जबकि उल्टे उनके तप में विघ्न पहुँचाने वालों को कुछ डरावने और अप्रिय अनुभव प्राकृतिक रूप से हुये, और भयभीत होकर उन्होंने इसे नियत की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया।



इसके बाद देवीजी का तप बारह-तेरह वर्ष निर्विघ्न चलता रहा।

तदुपरान्त जानकार लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में उनसे पधारने का आग्रह और कुछ उपदेश आदि देने का निवेदन करने लगे। तभी बाल्यावस्था की अवस्था में ही उन्होंने कुछ कथा सतसंग जैसे धार्मिक कार्य भी किये। जो आज भी यदाकदा जारी हैं।

देवीजी स्थायी रूप से वृन्दावन में वास करती हैं, और आगरा आने पर अक्सर ही हमारे यहाँ मेहमान होती हैं।

कहते हैं कि कन्या का जन्म लेना घर में लक्ष्मी आगमन के समान ही है। पर किसी भक्तकन्या का जन्म लेना तो जैसे स्वयं देवी का अवतरण होने जैसा ही है। इसलिये मुझे कोई आश्चर्य नही कि घरवालों से लेकर बाहर वाले तक उन्हें ‘देवीजी’ कहकर पुकारते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

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कथा सतसंग आदि के आयोजन हेतु देवीजी का संपर्क न.  
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 (बात करने का समय शाम 5 बजे।)

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