21 जून 2018

भावना और विश्वास की मौत


विश्वास साहब अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानते थे।
कारण यह था कि उनके दोनों पुत्र आईआईटी करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवानिवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आये, और उनके साथ ही रहे।
परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ।
उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये; परन्तु उनका मन वहाँ बिलकुल नहीं लगा, और वे भारत लौट आये।
दुर्भाग्य से विश्वास साहब की पत्नी को लकवा हो गया, और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने-पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी।
विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्म का निर्वहन कर रहे थे।


एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया, और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए।
रात्रि के लगभग दो बजे हार्टअटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई।
पत्नी प्रात: छह बजे जब जागी, तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्यकर्म से निवृत्त होने में उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते-करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई।
चूंकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी, उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया, और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची। उसने पति को हिलाया-डुलाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे।


पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम में लगा हुआ था।
पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया।
लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक पहुँचीं।
और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया।
पड़ोसी के नंबर जैसे-तैसे लगाये।
पङोसी भला इंसान था।
फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था, अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस-पड़ोस के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया।
दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे।
उन्होंने देखा, विश्वास साहब पलंग पर मृत पड़े थे तथा पत्नी भावना टेलीफोन के पास मृत पड़ी थी। पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई।
जनाजा दोनों का साथ-साथ निकला।
पूरा मौहल्ला कंधा दे रहा था।
परन्तु वो दो कंधे मौजूद नहीं थे, जिसकी माँ-बाप को उम्मीद थी।
शायद वे कंधे करोड़ों रुपये की कमाई के भार से पहले ही दबे हुए थे।
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(साभार - Virendra Singh‎) कापी पेस्ट 

नोट - जहाँ से यह विवरण लिया है, विवरण पोस्ट करने वाले का कहना है कि ये सत्य घटना है।

18 जून 2018

आखिर, बात क्या थी?



यह फ़ोटो फ़ेसबुक से मिला है।
लेकिन वहाँ इस फ़ोटो से सम्बन्धित विवरण कुछ नहीं था।
सिर्फ़ दुःख प्रतीकात्मक संवेदना चिह्न अंकित थे, और RIP जैसे शब्द टंकित थे।
ये बङी दुखद, शोचनीय, विचारणिय, चिन्तनीय, निन्दनीय सामाजिक स्थिति है,
कि इस दम्पत्ति ने एक मासूम बालिका के साथ अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर दी।





मैंने इस फ़ोटो से सम्बन्धित जानकारी नेट माध्यम से पता करने की कोशिश की।
कुछ हासिल नहीं हुआ।
आप में से किसी को इस सम्बन्ध में कुछ जानकारी हो, तो कृपया कमेंट द्वारा बतायें।
पहला चित्र आरीजनल है। दूसरा बङा दिखाने के लिये ‘कट’ किया है।
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ये पोस्ट करने के चार घन्टे बाद

दीपक अरोरा ने इस दुखद चित्र से सम्बन्धित पूरी जानकारी खोज दी।
ये चित्र महाराष्ट्र का है, और ये परिवार आर्थिक तंगी से पीङित था।

जानकारी के लिये निम्न लिंक पर जायें।


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=710664959265540&set=a.125308037801238.1073741829.100009661272559&type=3&hc_location=ufi


15 जून 2018

नीलाम ए दो दीनार


“नीलाम ए दो दीनार”
हिन्दू महिलाओं का दुखद कङवा इतिहास!
जबरदस्ती की धर्मनिरपेक्षता, भाईचारे को ढोते अक्लमंद हिंदुओं के लिये (इतिहास) 
समय! 
ग्यारहवीं सदी (ईसा बाद)
भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर अभी-अभी राजा जयपाल की पराजय हुई।
पराजय के पश्चात अफगानिस्तान के एक शहर ‘गजनी’ का एक बाज़ार,
ऊँचे से एक चबूतरे पर खड़ी कम उम्र की सैंकड़ों हिन्दू स्त्रियों की भीङ,
जिनके सामने वहशी से दीखते, हज़ारों बदसूरत किस्म के लोगों की भीड़,
जिसमें अधिकतर अधेड़ या उम्र के उससे अगले दौर में थे।
कम उम्र की उन स्त्रियों की स्थिति देखने से ही अत्यंत दयनीय प्रतीत हो रही थी।
उनमें अधिकाँश के गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें खिंची हुई थी।
मानों आंसुओं को स्याही बनाकर हाल ही में उनके द्वारा झेले गए भीषण यातनाओं के दौर की दास्तान को प्रारब्ध ने उनके कोमल गालों पर लिखने का प्रयास किया हो।
एक बात जो उन सबमें समान थी।
किसी के भी शरीर पर, वस्त्र का एक छोटा सा टुकड़ा, नाममात्र को भी नहीं था। 
सभी सम्पूर्ण निर्वसना थी।

सभी के पैरों में छाले थे, मानो सैंकड़ों मील की दूरी पैदल तय की हो।
सामने खङी वहशियों की भीड़, वासनामयी आँखों से उनके अंगों की नाप-जोख कर रही थी।
कुछ मनबढ़ आंखों के स्थान पर हाथों का प्रयोग भी कर रहे थे।
सूनी आँखों से अजनबी शहर, और अनजान लोगों की भीड़, को निहारती उन स्त्रियों के समक्ष हाथ में चाबुक लिए, क्रूर चेहरे वाला, घिनौने व्यक्तित्व का, एक गंजा व्यक्ति खड़ा था।
सफाचट मूंछ, बेतरतीब दाढ़ी, उसकी प्रकृतिजन्य कुटिलता को चार चाँद लगा रही थी।

दो दीनार, दो दीनार, दो दीनार...
हिन्दुओं की खूबसूरत औरतें, शाही लडकियां, कीमत सिर्फ दो दीनार,
ले जाओ, ले जाओ, बांदी बनाओ,
एक लौंडी, सिर्फ दो दीनार,
दुख्तरे हिन्दोस्तां, दो दीनार,
भारत की बेटी का मोल, सिर्फ दो दीनार.. 
उस स्थान पर आज एक मीनार है।
जिस पर लिखे शब्द आज भी मौजूद हैं - दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार  
अर्थात वो स्थान - जहाँ हिन्दू औरतें दो-दो दीनार में नीलाम हुईं।


महमूद गजनवी हिन्दुओं के मुँह पर अफगानी जूता मारने, उनको अपमानित करने के लिये अपने सत्रह हमलों में लगभग चार लाख हिन्दू स्त्रियों को पकड़ कर घोड़ों के पीछे, रस्सी से बांध कर गजनी उठा ले गया।
महमूद गजनवी जब इन औरतों को गजनी ले जा रहा था।
वे अपने पिता, भाई, पतियों को निरीह, कातर, दारुण स्वर में पुकार कर बिलख-बिलख कर रो रही थीं। अपनी रक्षा के लिए पुकार रही थीं। लेकिन करोङों हिन्दुओं के बीच से उनकी आँखों के सामने वो निरीह असहाय स्त्रियाँ मुठ्ठी भर निर्दयी कामांध मुसलमान सैनिकों द्वारा घसीट कर भेड़ बकरियों की तरह ले जाई गईं।
रोती बिलखती इन लाखों हिन्दू नारियों को बचाने न उनके पिता बढ़े, न पति उठे, न भाई।
और न ही इस विशाल भारत के करोड़ों जन-सामान्य लोगों का विशाल हिन्दू समाज।
महमूद गजनी ने इन हिन्दू लड़कियों, औरतों को ले जाकर गजनवी के बाजार में भेङ बकरियों के समान बेच ड़ाला।
विश्व के किसी भी धर्म के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार नही हुआ।
जैसा हिन्दुओं के साथ हुआ।
और ऐसा इसलिये हुआ, क्योंकि इन्होंने तलवार को हाथ से छोड़ दिया।
इनको बताया गया कि जब-जब धरती पर अत्याचार बढ़ेगा। 
तब भगवान स्वयं उन्हें बचाने आयेंगे, अवतरित होंगे।
हिन्दुओं! भारत के गद्दार सेकुलर आपको मिटाने की साजिश रच रहे हैं।
आजादी के बाद यह षङयंत्र धर्म-परिवर्तन कराने के नाम पर हुआ।
आज भारत में, आठ राज्यों में, हिन्दुओं की संख्या 2-5% बची है।
हिन्दुओं को समझना चाहिये कि,
भगवान भी अव्यवहारिक अहिंसा व अतिसहिष्णुता को नपुसंकता करार देते हैं।
भगवान भी उन्हीं की मदद करते हैं।
जो अपनी मदद खुद करते हैं।
(कापी) मूल स्रोत चित्र व लेख - अज्ञात
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लेख का स्रोत सूत्र -


https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Someone/%E0%A4%B9-%E0%A4%A8-%E0%A4%A6-%E0%A4%93-%E0%A4%B8-%E0%A4%AC-%E0%A4%B6%E0%A4%B0-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%88-%E0%A4%9C-%E0%A4%A4/

09 जून 2018

माँ, और बस..माँ


दोनों कवितायें कापी पेस्ट हैं, मूल लेखक अज्ञात हैं।
कविताओं में कवित्त नियम तो नहीं, पर दर्द और संवेदना अवश्य है,
जो मानवीय तल पर सोचने पर विवश करती है।
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दूध पिलाया जिसने, छाती से निचोड़कर।
एक गिलास पानी, कभी उसे पिला न सका॥
बुढ़ापे का सहारा हूँ, अहसास दिला न सका।
पेट पर सुलाने वाली को, मखमल पर सुला न सका॥
वो भूखी सो गई बहू के डर से, एक बार मांगकर।
मैं रोटी के दो कौर, उसे खिला न सका॥
नजरें उन बूढ़ी आंखों से, कभी मिला न सका ।
वो दर्द दिल में सहती रही, और मैं तिलमिला न सका॥
जो जीवन भर, ममता के रंग, पहनाती रही मुझे।
दो जोड़ी कपङे कभी, उसे सिला न सका॥
बीमार बिस्तर से उसे, शिफा दिला न सका।
खर्च के डर से, बड़े अस्पताल ले जा न सका । 
बेटा कह के दम तोङने के बाद से, अब तक सोच रहा हूँ।
दवाई, इतनी भी महंगी न थी, कि मैं ला ना सका॥


एक बच्चे ने कब्रिस्तान जाकर
बस्ता माँ की कब्र पर फेंका,
आँखों में आंसू, भर्राये गले,
और शिकायती लहजे में कहा,
तेरी नींद पूरी हो गयी हो, तो चल उठ
और चल मेरे साथ, और चलकर जबाब दे
मेरी टीचर को, वो रोजाना मुझसे कहती है,
कि तेरी माँ बहुत लापरवाह है।
जो न तुझे अच्छी तरह तैयार करके भेजती है।
और न तुझे अच्छी तरह होमवर्क कराती है।
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जिन्दगी में माँ का न होना उसी तरह है।
जिस तरह कङकती धूप में पेङ का न होना।
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- पापा मैंने आपके लिए हलवा बनाया है । ग्यारह साल की बेटी पिता से बोली।
पिता - वाह क्या बात है, खिलाओ फिर पापा को।
बेटी खुशी से दौड़ती रसोई में गई और कटोरा भरकर हलवा ले आई।
पिता ने खाना शुरू किया और बेटी को देखा।
पिता की आँखों मे आँसू थे।
- क्या हुआ पापा, अच्छा नही लगा।
पिता - नही बेटी, बहुत अच्छा बना है।
पिता ने पूरा कटोरा खाली कर दिया।
तभी माँ बाथरूम से नहाकर बाहर आई, और बोली- ला मुझे भी खिला तेरा हलवा।
पिता ने बेटी को पचास रु. इनाम में दिए, बेटी खुशी से मम्मी के लिए हलवा लेकर आई।
उसने हलुवे की पहली चम्मच मुँह में डाली, फ़िर तुरन्त थूक दिया, और बोली - ये क्या बनाया है, ये हलवा है, इसमें चीनी नहीं, नमक भरा है..और आप कैसे खा गये, मेरे बनाये खाने में तो कभी नमक मिर्च कम, तेज है, कहते रहते हो, और बेटी को बजाय कुछ कहने के इनाम देते हो।

पिता (हंसते हुए) - पगली, तेरा मेरा तो जीवन भर का साथ है, रिश्ता है पति पत्नी का, जिसमें नोंकझोंक रूठना मनाना सब चलता है; मगर ये बेटी है, कल चली जाएगी, लेकिन आज इसे वो एहसास, वो अपनापन, महसूस हुआ, जो मुझे इसके जन्म के समय हुआ था। आज इसने बङे प्यार से पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया है, फिर वो जैसा भी हो, मेरे लिए सबसे बेहतर, और सबसे स्वादिष्ट है; बेटियां अपने पापा की परियां, राजकुमारी होती हैं, जैसे तुम अपने पापा की हो।
वो रोते हुए पति के सीने से लग गई, और सोचने लगी,
“इसीलिए हर लङकी अपने पति में अपने पापा की छवि ढूंढ़ती है”
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हर बेटी अपने पिता के बेहद करीब या यूँ कहे कलेजे का टुकड़ा होती है। इसीलिये उसकी विदाई के समय सबसे ज्यादा पिता ही रोता है। इसीलिये पिता हर समय अपनी बेटी की फिक्र करता है, क्योंकि हर बेटी अपने पापा की परी होती है।
(कापी पेस्ट)

20 मई 2018

सतकबीर - एक उत्तम चैनल

जिन खोजा तिन पाईया, गहरे पानी पैठि।

यद्यपि “सतकबीर” यूटयूब चैनल मैंने खोजा नहीं, बल्कि उसके एक भजन वीडियो पर निगाह जाते ही अनायास संयोगवश मिल गया।
दरअसल मैं कुछ ऐसी भजन आदि सामग्री की तलाश में था, जिसे मुझसे सम्पर्क करने वाले सन्तमत के आध्यात्म जिज्ञासुओं को सहज उपलब्ध करा सकूँ।
वैसे ‘सतकबीर’ मिलने से पहले मुझे यूटयूब पर श्री प्रहलाद सिंह टिपाणिया के गाये भजन मिल चुके थे, और तुलनात्मक उपलब्ध अन्य से, वह बेहतर थे।
फ़िर भी, क्योंकि टिपाणिया जी के शब्दों और गायकी दोनों में ही राजस्थानी लहजे का पुट था।
अतः वे मेरी दृष्टि में सभी हिन्दीभाषियों के लिये उतने उपयोगी नहीं थे।
तब इसी दौरान मुझे ‘सतकबीर’ मिला, जिसकी शान्त, शीतल, मधुर मीठी गायकी और कर्णप्रिय मद्धिम संगीत ने जैसे मन मोह लिया, मन्त्रमुग्ध कर दिया।
यहाँ तक होता, फ़िर भी ठीक था।
लेकिन सतकबीर ने वीडियो दृश्यांकन करने में आधुनिक और मनोरंजन पूर्ण विधा, कल्पना को संयुक्त किया है। जिसके बारे में कहना उचित नही। 
वह आप स्वयं देखें।
https://www.youtube.com/channel/UCzwKhQ5yUo4k9b__AVqj3cA/videos 
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मेरे अनुसार ‘सतकबीर’ में वही सब विशेषता है, जिसे एक आध्यात्मिक जिज्ञासु खोजता है।
विशेष बात यह कि यहाँ ‘कबीर सागर’ (सम्पूर्ण) अनुराग सागर, बीजक, दोहावली, शब्दावली आदि की वृहद आडियो वीडियो श्रंखला है तथा कबीर के जीवन से सम्बन्धित कई अन्य वीडियो हैं।
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तब ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ 
स्वयं इस चैनल के वीडियो का अवलोकन करते हुये एक सुखद अनुभव करें।
जो कि बहुत कुछ मैं कम शब्दों के कारण लिख न सका।
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स्पष्टीकरण - न तो ये चैनल मेरा है, और न ही मैं चैनल से सम्बन्धित किसी को भी दूर-दूर तक जानता हूँ ।
बस एक अच्छे स्थान और सामग्री को पारमार्थिक भाव से सूचित कर रहा हूँ।
सतकबीर चैनल का लिंक, जहाँ सभी वीडियो लिस्टेड हैं।

https://www.youtube.com/channel/UCzwKhQ5yUo4k9b__AVqj3cA/videos


मन ही मन को पकड़ता, किस विध आवै हाथ।
ज्ञान घोड़े असवार हो, फिर देखो इसकी जात॥

मन बिन ज्ञान न उपजे, मन बिन मिटे न बांस।
मन ही काटे जाल को, और मन ही मन को फांस॥

19 मई 2018

क्या है, चित्र में रहस्य?

अनजाने में ही कभी-कभी कोई चित्र गहरे आध्यात्मिक रहस्यों वाला बन जाता है।
जो उस समय भी चित्र के सृजनकर्ता को पता नही होता, और बाद में भी।
Unknowingly, a picture sometimes becomes deep spiritual mysteries.
At that time even the creator of the picture would not have known, and later also.
ऐसा ही शायद @अविनाश के साथ भी है। (चित्र में)
This is probably also with @avinash.(in the photo)
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इस चित्र में 6-7 मुख्य बिन्दु हैं,
जो सृष्टि के रहस्य या बनावट या तरीके को स्पष्ट दिखा रहे हैं।
This picture has 6-7 main points,
Who are showing the mystery or nature of the creation or the manner in which it is clearly visible.
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फ़िर से ध्यान दें - 6-7 मुख्य बिन्दु..
Note again - 6-7 main points ..
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अब अपने दिमाग पर जोर डालिये, और टिप्पणी करिये,
कि इसमें ऐसा क्या है, जो सृष्टि रहस्य से सम्बन्धित है।
Now emphasize your mind, and make a comment,
What is this, that is related to the creation of the universe?
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वैसे मैं चित्र में कुछ चिह्न बनाना चाहता था।
पर आपकी दिमागी क्षमता बढ़े, इसलिये ऐसा नहीं किया।
Well I wanted to make a some mark in the picture.
But your brain power increases, So did not do this.

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यह लेख सिर्फ़ ऊपर के चित्र के लिये है।
This article is just for the picture above.

21 अप्रैल 2018

गूढ़ शब्द


सारनाम या सारशब्द वह मूल-ध्वनि है, 
जो आदि-सृष्टि के समय ‘आत्मा’ में उठने वाली पहली आवाज थी।
यही गुप्त है। इसी के प्रकंपन से सृष्टि की समस्त जङ, चेतन वस्तुयें
वृद्धि और हास को प्राप्त होती हैं।
वृद्धि और हास का यह क्रम हर क्षण और निरन्तर है।
सिर्फ़ अपनी ‘वास्तविक पहचान’ भूलने और स्व-स्थ के बजाय
मन-स्थ होने से ऐसा अहसास होता है। जैसे ही स्व-स्थ होंगे,
मनस्थ जो दरअसल कुछ है ही नहीं, खत्म हो जायेगा।
और यह नींद, स्वपन टूटने जैसा होगा।
स्व-पन (हमारी ही क्रियेट की अवस्था)
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दुनियां में फ़ंसकर वीरान हो रहा है।
खुद को भूलकर हैरान हो रहा है॥



॥परमात्मा॥ को
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हिन्दू शास्त्रों (ब्रह्मसूत्र) में ब्रह्मसूर्य तथा रूप को ‘ब्रह्मज्योति’ कहा।
(जिसे ज्ञान-दृष्टि से अनुभव किया जाता है।)
गुरूग्रन्थ साहिब में ॐकार, तथा रूप को चांदना कहा।
(जो अंतर की आंख से दिखायी देता है।)
वेदों में उसके रूप को ‘भर्गो ज्योति’ कहा।
(जिसे ‘उपनयन’ अर्थात अन्तरदृष्टि से अनुभव किया जाता है।)
गीता में उसे परमात्म तत्व कहा है। 
बाइबिल में ‘गाड’ कहा है तथा उसके रूप को डिवाइन लाइट।
(जो ‘थर्ड-आई’ अर्थात तीसरे नेत्र से अनुभव में आता है।)
कुर’आन में ‘अल्लाह’ तथा रूप को ‘नूर’ कहा है।
(जो चश्मे-वसीरत से नजर आता है।)


रवि पंचक जाके नहीं, ताहि चतुर्थी नाहिं।
तेहि सप्तक घेरे रहे, कबहुँ तृतीया नाहिं॥(रामचरित मानस)
-------------------
रवि पंचक..रवि से पाँचवाँ यानी गुरूवार (रवि, सोम, मंगल, बुद्ध, गुरू)
अर्थात जिनको गुरू नहीं है, तो उसको चतुर्थी नहीं होगी।
चतुर्थी यानी बुध (रवि, सोम, मंगल, बुध) अर्थात बुद्धि नहीं आयेगी।
बुद्धि न होने के कारण उसे ‘तेहि सप्तक घेरे रहे’
सप्तक..शनि (रवि, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि)
अर्थात उसको शनि घेरकर रखेगा।
और ‘कबहुँ तृतीया नाहिं।’
तृतीया..मंगल (रवि, सोम, मंगल)
(उसके जीवन में मंगल नहीं होगा।)

जिसके जीवन में गुरू नहीं। 
उसका जीवन अभी शुरू नहीं॥
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पर्वत ऊपर हर बहै, घोड़ा चढ़ि बसै गाँव।
बिना फूल भौरा रस चाहें, कहु बिरवा को नाँव॥ 
(बीजक साखी-36)

पर्वत पर हल चलाना, घोड़े पर चढ़कर (उस पर) गांव बसाना,
और (मन) भौंरा बिना फ़ूल के ही रस चाहे,
तो उस वृक्ष का नाम क्या हो सकता है?

10 अप्रैल 2018

परिचय को अंग



पिव परिचय तब जानिये, पिव सों हिलमिल होय।
पिव की लाली मुख परै, परगट दीसै सोय॥

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गई लाल॥

जिन पांवन भुईं बहु फ़िरै, घूमें देस विदेस।
पिया मिलन जब होईया, आंगन भया विदेस॥

उलटि समानी आप में, प्रगटी जोति अनंत।
साहिब सेवक एक संग, खेलें सदा बसंत॥

जोगी हुआ झक लगी, मिटि गइ ऐंचातान।
उलटि समाना आप में, हुआ ब्रह्म समान॥

हम वासी वा देस के, जहाँ पुरुष की आन।
दुख सुख कोइ व्यापै नहीं, सब दिन एक समान॥

हम वासी वा देस के, बारह मास बसंत।
नीझर झरै महा अमी, भीजत हैं सब संत॥

हम वासी वा देस के, गगन धरन दुइ नांहि।
भौंरा बैठा पंख बिन, देखौ पलकों मांहि॥

हम वासी वा देस के, जहाँ ब्रह्म का कूप।
अविनासी बिनसै नहीं, आवै जाय सरूप॥

हम वासी वा देस के, आदि पुरुष का खेल।
दीपक देखा गैब का, बिन बाती बिन तेल॥

हम वासी वा देस के, बारह मास विलास।
प्रेम झरै बिगसै कमल, तेजपुंज परकास॥

हम वासी वा देस के, जाति वरन कुल नांहि।
सब्द मिलावा ह्वै रहा, देह मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, रूप वरन कछु नांहि।
सैन मिलावा ह्वै रहा, शब्द मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, पिंड ब्रह्मंड कछु नांहि।
आपा पर दोइ बिसरा, सैन मिलावा नांहि॥

हम वासी वा देस के, गाजि रहा ब्रह्मंड।
अनहद बाजा बाजिया, अविचल जोत अखंड॥

संसै करौं न मैं डरौं, सब दुख दिये निवार।
सहज सुन्न में घर किया, पाया नाम अधार॥

बिन पांवन का पंथ है, बिन बस्ती का देस।
बिना देह का पुरुष है, कहैं कबीर संदेस॥

नौन गला पानी मिला, बहुरि न भरिहै गौन।
सुरति सब्द मेला भया, काल रहा गहि मौन॥

हिल मिल खेले सब्द सों, अन्तर रही न रेख।
समझै का मत एक है, क्या पंडित क्या सेख॥

अलख लखा लालच लगा, कहत न आवै बैन।
निज मन धसा सरूप में, सदगुरू दीन्ही सैन॥

कहना था सो कहि दिया, अब कछु कहा न जाय।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय॥

जो कोइ समझै सैन में, तासों कहिये धाय।
सैन बैन समझे नहीं, तासों कहै बलाय॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया, जागी जोति अनंत।
संसै छूटा भय मिटा, मिला पियारा कंत॥

उनमुनि लागी सुन्न में, निसदिन रहि गलतान।
तन मन की कछु सुधि नहीं, पाया पद निरबान॥

उनमुनि चढ़ी अकास को, गई धरनि सें छूट।
हंस चला घर आपने, काल रहा सिर कूट॥

उनमुनि सों मन लागिया, गगनहि पहुँचा जाय।
चांद बिहूना चांदना, अलख निरंजन राय॥

उनमुनि सों मन लागिया, उनमुनि नहीं बिलंगि।
लौन बिलंग्या पानिया, पानी नौन बिलगि॥

पानी ही ते हिम भया, हिम ही गया बिलाय।
जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाय॥

मेरी मिटि मुक्ता भया, पाया अगम निवास।
अब मेरे दूजा नही, एक तुम्हारी आस॥

सुरति समानी निरति में, अजपा माही जाप।
लेख समाना अलेख में, आपा माही आप॥

सुरति समानी निरति में, निरति रही निरधार।
सुरति निरति परिचय भया, खुल गया सिंधु दुवार॥

गुरू मिले सीतल भया, मिटी मोह तन ताप।
निस बासर सुख निधि लहूं, अन्तर प्रगटे आप॥

सुचि पाया सुख ऊपजा, दिल दरिया भरपूर।
सकल पाप सहजै गया, साहिब मिले हजूर॥

तत पाया तन बीसरा, मन धाया धरि ध्यान।
तपन मिटी सीतल भया, सुन्न किया अस्थान॥

कौतुक देखा देह बिना, रवि ससि बिना उजास।
साहेब सेवा माहीं है, बेपरवाही दास॥

नेव बिहूंना देहरा, देह बिहूना देव।
कबीर तहाँ बिलंबिया, करै अलख की सेव॥

देवल मांहि देहुरी, तिल जैसा विस्तार।
माहीं पाती फ़ूल जल, माहीं पूजनहार॥ 

पवन नहीं पानी नहीं, नहि धरनी आकास।
तहाँ कबीरा संतजन, साहिब पास खवास॥

अगुवानी तो आइया, ज्ञान विचार विवेक।
पीछै हरि भी आयेंगे, सारे सौंज समेत॥

पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान।
कहिबे की सोभा नही, देखै ही परमान॥

सुरज समाना चांद में, दोउ किया घर एक।
मन का चेता तब भया, पुरब जनम का लेख॥

पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतर भया उजास।
सुख करि सूती महल में, बानी फ़ूटी वास॥

आया था संसार में, देखन को बहुरूप।
कहै कबीरा संत हो, परि गया नजर अनूप॥

पाया था सो गहि रहा, रसना लागी स्वाद।
रतन निराला पाइया, जगत ठठोला बाद॥

हिम से पानी ह्वै गया, पानी हुआ आप।
जो पहिले था सो भया, प्रगटा आपहि आप॥

कुछ करनी कुछ करम गति, कुछ पुरबले लेख।
देखो भाग कबीर का, लेख से भया अलेख॥

जब मैं था तब गुरू नहीं, अब गुरू हैं मैं नाहिं।
कबीर नगरी एक में, दो राजा न समांहि॥

मैं जाना मैं और था, मैं तजि ह्वै गय सोय।
मैं तैं दोऊ मिटि गये, रहे कहन को दोय॥

अगम अगोचर गम नहीं, जहाँ झिलमिली जोत।
तहाँ कबीरा रमि रहा, पाप पुन्न नहि छोत॥

कबीर तेज अनंत का, मानो सूरज सैन।
पति संग जागी सुन्दरी, कौतुक देखा नैन॥

कबीर देखा एक अंग, महिमा कही न जाय।
तेजपुंज परसा धनी, नैनों रहा समाय॥

कबीर कमल प्रकासिया, ऊगा निरमल सूर।
रैन अंधेरी मिटि गई, बाजै अनहद तूर॥

कबीर मन मधुकर भया, करै निरन्तर बास।
कमल खिला है नीर बिन, निरखै कोइ निज दास॥

कबीर मोतिन की लङी, हीरों का परकास।
चांद सूर की गम नही, दरसन पाया दास॥

कबीर दिल दरिया मिला, पाया फ़ल समरत्थ।
सायर मांहि ढिंढोरता, हीरा चढ़ि गया हत्थ॥

कबीर जब हम गावते, तब जाना गुरू नांहि।
अब गुरू दिल में देखिया, गावन को कछु नांहि॥

कबीर दिल दरिया मिला, बैठा दरगह आय।
जीव ब्रह्म मेला भया, अब कछु कहा न जाय॥

कबीर कंचन भासिया, ब्रह्म वास जहाँ होय।
मन भौंरा तहाँ लुब्धिया, जानेगा जन कोय॥

गगन गरजि बरसै अमी, बादल गहिर गम्भीर।
चहुँदिस दमके दामिनी, भीजै दास कबीर॥

गगन मंडल के बीच में, झलकै सत का नूर।
निगुरा गम पावै नहीं, पहुँचै गुरूमुख सूर॥

गगन मंडल के बीच में, महल पङा इक चीन्हि।
कहै कबीर सो पावई, जिहि गुरू परचै दीन्हि॥

गगन मंडल के बीच में, बिना कलम की छाप।
पुरुष तहाँ एक रमि रहा, नहीं मन्त्र नहि जाप॥

गगन मंडल के बीच में, तुरी तत्त इक गांव।
लच्छ निसाना रूप का, परखि दिखाया ठांव॥

गगन मंडल के बीच में, जहाँ सोहंगम डोर।
सब्द अनाहद होत है, सुरति लगी तहँ मोर॥

गरजै गगन अमी चुवै, कदली कमल प्रकास।
तहाँ कबीरा संतजन, सत्तपुरुष के पास॥

गरजै गगन अमी चुवै, कदली कमल प्रकास।
तहाँ कबीरा बंदगी, कर कोई निजदास॥

दीपक जोया ज्ञान का, देखा अपरम देव।
चार वेद की गम नहीं, तहाँ कबीरा सेव॥

मान सरोवर सुगम जल, हंसा केलि कराय।
मुक्ताहल मोती चुगै, अब उङि अंत न जाय॥

सुन्न महल में घर किया, बाजै सब्द रसाल।
रोम रोम दीपक भया, प्रगटै दीन दयाल॥

पूरे से परिचय भया, दुख सुख मेला दूर।
जम सों बाकी कटि गई, साईं मिला हजूर॥70

परिचय को अंग 2



सुरति उङानी गगन को, चरन बिलंबी जाय।
सुख पाया साहेब मिला, आनंद उर न समाय॥

जा वन सिंघ न संचरै, पंछी उङि नहि जाय।
रैन दिवस की गमि नही, रहा कबीर समाय॥

सीप नही सायर नही, स्वाति बूंद भी नांहि।
कबीर मोती नीपजै, सुन्न सरवर घट मांहि॥

काया सिप संसार में, पानी बूंद सरीर।
बिना सीप के मोतिया, प्रगटे दास कबीर॥

घट में औघट पाइया, औघट माहीं घाट।
कहैं कबीर परिचय भया, गुरू दिखाई बाट॥

जा कारन मैं जाय था, सो तो मिलिया आय।
साईं ते सनमुख भया, लगा कबीरा पाय।

जा कारन मैं जाय था, सो तो पाया ठौर।
सो ही फ़िर आपन भया, को कहता और॥

जा दिन किरतम ना हता, नहीं हाट नहि बाट।
हता कबीरा संतजन, देखा औघट घाट॥

नहीं हाट नहि बाट था, नही धरति नहि नीर।
असंख जुग परलै गया, तबकी कहैं कबीर॥

चाँद नहीं सूरज नहीं, हता नही ओंकार।
तहाँ कबीरा संतजन, को जानै संसार॥

धरति गगन पवनै नही, नहि होते तिथि वार।
तब हरि के हरिजन हुते, कहैं कबीर विचार॥

धरति हती नहि पग धरूं, नीर हता नहि न्हाऊं।
माता ते जनम्या नहीं, क्षीर कहाँ ते खाऊं॥

अगन नहीं जहँ तप करूं, नीर नहि तहँ न्हाऊं।
धरती नहीं जहँ पग धरूं, गगन नहिं तहँ जाऊं॥

पांच तत्व गुन तीन के, आगे मुक्ति मुकाम।
तहाँ कबीरा घर किया, गोरख दत्त न राम॥

सुर नर मुनिजन औलिया, ये सब उरली तीर।
अलह राम की गम नहीं, तहँ घर किया कबीर॥

सुर नर मुनिजन देवता, ब्रह्मा विस्नु महेस।
ऊंचा महल कबीर का, पार न पावै सेस॥

जब दिल मिला दयाल सों, तब कछु अंतर नांहि।
पाला गलि पानी भया, यौं हरिजन हरि मांहि॥

ममता मेरा क्या करै, प्रेम उघारी पोल।
दरसन भया दयाल का, सूल भई सुख सोल॥

सुन्न सरोवर मीन मन, नीर निरंजन देव।
सदा समूह सुख बिलसिया, बिरला जानै भेव॥

सुन्न सरोवर मीन मन, नीर तीर सब देव।
सुधा सिंधु सुख बिलसहीं, बिरला जाने भेव॥

लौन गला पानी मिला, बहुरि न भरिहै गून।
हरिजन हरि सों मिल रहा, काल रहा सिर धुन॥

गुन इन्द्री सहजे गये, सदगुरू करी सहाय।
घट में नाम प्रगट भया, बकि बकि मरै बलाय॥

जब लग पिय परिचय नहीं, कन्या क्वारी जान।
हथ लेवो हूं सालियो, मुस्किल पङि पहिचान॥

सेजै सूती रग रम्हा, मांगा मान गुमान।
हथ लेवो हरि सूं जुर्यो, अखै अमर वरदान॥

पूरे सों परिचय भया, दुख सुख मेला दूर।
निरमल कीन्ही आतमा, ताते सदा हजूर॥

मैं लागा उस एक सों, एक भया सब मांहि।
सब मेरा मैं सबन का, तहाँ दूसरा नांहि॥

भली भई जो भय पङी, गई दिसा सब भूल।
पाला गलि पानी भया, ढूलि मिला उस कूल॥

चितमनि पाई चौहटे, हाङी मारत हाथ।
मीरां मुझ पर मिहर करि, मिला न काहू साथ॥

बरसि अमृत निपज हिरा, घटा पङे टकसार।
तहाँ कबीरा पारखी, अनुभव उतरै पार॥

मकर तार सों नेहरा, झलकै अधर विदेह।
सुरति सोहंगम मिलि रहि, पल पल जुरै सनेह॥

ऐसा अविगति अलख है, अलख लखा नहि जाय।
जोति सरूपी राम है, सब में रह्यो समाय॥

मिलि गय नीर कबीर सों, अंतर रही न रेख।
तीनों मिलि एकै भया, नीर कबीर अलेख॥

नीर कबीर अलेख मिलि, सहज निरंतर जोय।
सत्त सब्द औ सुरति मिलि, हंस हिरंबर होय॥

कहना था सो कहि दिया, अब कछु कहना नाहिं।
एक रही दूजी गई, बैठा दरिया मांहि॥

आया एकहि देस ते, उतरा एक ही घाट।
बिच में दुविधा हो गई, हो गये बारह बाट॥

तेजपुंज का देहरा, तेजपुंज का देव।
तेजपुंज झिलमिल झरै, तहाँ कबीरा सेव॥

खाला नाला हीम जल, सो फ़िर पानी होय।
जो पानी मोती भया, सो फ़िर नीर न होय॥

देखो करम कबीर का, कछु पूरबला लेख।
जाका महल न मुनि लहै, किय सो दोस्त अलेख॥

मैं था तब हरि नही, अब हरि है मैं नाहिं।
सकल अंधेरा मिटि गया, दीपक देखा मांहि॥

सूरत में मूरत बसै, मूरत में इक तत्व।
ता तत तत्व विचारिया, तत्व तत्व सो तत॥

फ़ेर पङा नहि अंग में, नहि इन्द्रियन के मांहि।
फ़ेर पङा कछु बूझ में, सो निरुवारै नांहि॥

साहेब पारस रूप है, लोह रूप संसार।
पारस सो पारस भया, परखि भया टकसार।

मोती निपजै सुन्न में, बिन सायर बिन नीर।
खोज करंता पाइये, सतगुरू कहै कबीर॥

या मोती कछु और है, वा मोती कछु और।
या मोती है सब्द का, व्यापि रहा सब ठौर॥

दरिया मांही सीप है, मोती निपजै मांहिं।
वस्तु ठिकानै पाइये, नाले खाले नांहि॥

चौदा भुवन भाजि धरै, ताहि कियो बैराट।
कहै कबीर गुरू सब्द सो, मस्तक डारै काट॥

हमकूं स्वामी मति कहो, हम हैं गरीब अधार।
स्वामी कहिये तासु कूं, तीन लोक विस्तार॥

हमकूं बाबा मति कहो, बाबा है बलियार।
बाबा ह्वै करि बैठसी, घनी सहेगा मार॥

यह पद है जो अगम का, रन संग्रामे जूझ।
समुझे कूं दरसन दिया, खोजत मुये अबूझ॥

सीतल कोमल दीनता, संतन के आधीन।
बासों साहिब यौं मिले, ज्यौं जल भीतर मीन॥

कबीर आदू एक है, कहन सुनन कूं दोय।
जल से पारा होत है, पारा से जल होय॥

दिल लागा जु दयाल सों, तब कछु अंतर नांहि।
पारा गलि पानी भया, साहिब साधू मांहि॥

ऐसा अविगति रूप है, चीन्है बिरला कोय।
कहै सुनै देखै नहीं, ताते अचरज मोय॥

सत्तनाम तिरलोक में, सकल रहा भरपूर।
लाजै ज्ञान सरीर का, दिखवै साहिब दूर॥

कबीर सुख दुख सब गया, गय सो पिंड सरीर।
आतम परमातम मिलै, दूधै धोया नीर॥

गुरू हाजिर चहुदिसि खङे, दुनी न जानै भेद।
कवि पंडित कूं गम नही, ताके बपुरे वेद॥

जा कारन हम जाय थे, सनमुख मिलिया आय।
धन मैली पिव ऊजला, लाग सकी नहि पांय॥

भीतर मनुवा मानिया, बाहिर कहूं न जाय।
ज्वाला फ़ेरी जल भया, बूझी जलती लाय॥

तन भीतर मन मानिया, बाहिर कबहू न लाग।
ज्वाला ते फ़िरि जल भया, बुझी जलती आग॥

जिन जेता प्रभु पाइया, ताकूं तेता लाभ।
ओसे प्यास न भागई, जब लग धसै न आभ॥

अकास बेली अमृत फ़ल, पंखि मुवे सब झूर।
सारा जगहि झख मुआ, फ़ल मीठा पै दूर॥

तीखी सुरति कबीर की, फ़ोङ गई ब्रह्मंड।
पीव निराला देखिया, सात दीप नौ खंड॥

ना मैं छाई छापरी, ना मुझ घर नहि गांव।
जो कोई पूछै मुझसों, ना मुझ जाति न ठांव॥ 

09 अप्रैल 2018

सुमिरन को अंग 4



सुमिरन को अंग 

तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरति निरति थिर होय।
कहैं कबीर उस पलक को, कल्प न पावै कोय॥

जाप मरै अजपा मरै, अनहद भी मरि जाय।
सुरति समानी सब्द में, ताहि काल न खाय॥

बिना सांच सुमिरन नहीं, भेदी भक्ति न सोय।
पारस में परदा रहा, कस लोहा कंचन होय॥

हिरदे सुमिरनि नाम की, मेरा मन मसगूल।
छवि लागै निरखत रहूँ, मिटि गये संसै सूल॥

देखा देखी सब कहै, भोर भये हरि नाम।
अरध रात को जन कहै, खाना जाद गुलाम॥

नाम रटत अस्थिर भया, ज्ञान कथत भया लीन।
सुरति सब्द एकै भया, जल ही ह्वैगा मीन॥

कहता हूँ कहि जात हूँ, सुनता है सब कोय।
सुमिरन सों भल होयगा, नातर भला न होय॥

कबीर माला काठ की, पहिरी मुगद डुलाय।
सुमिरन की सुधि है नहीं, डीगर बांधी गाय॥

नाम जपे अनुराग से, सब दुख डारै धोय।
विश्वासे तो गुरू मिले, लोहा कंचन होय॥

सब मंत्रन का बीज है, सत्तनाम ततसार।
जो कोई जन हिरदै धरे, सो जन उतरै पार॥

जब जागै तब नाम जप, सोवत नाम संभार।
ऊठत बैठत आतमा, चालत नाम चितार॥

सुमिरन ऐसो कीजिये, खरे निशाने चोट।
सुमिरन ऐसो कीजिये, हाले जीभ न होठ॥

ओठ कंठ हाले नहीं, जीभ न नाम उचार।
गुप्तहि सुमिरन जो लखे, सोई हंस हमार॥

अंतर हरि हरि होत है, मुख की हाजत नाहि।
सहजे धुनि लागी रहे, संतन के घट मांहि॥

अंतर जपिये रामजी, रोम रोम रकार।
सहजे धुन लागी रहे, येही सुमिरन सार॥

कबीर मन निश्चल करो, सत्तनाम गुन गाय।
निश्चल बिना न पाईये, कोटिक करो उपाय॥

निसदिन एकै पलक ही, जो कहु नाम कबीर।
ताके जनमो जनम के, जैहै पाप शरीर॥

सुरति फ़ंसी संसार में, ताते परिगो दूर।
सुरति बांधि अस्थिर करो, आठों पहर हजूर॥

नाम साँच गुरू साँच है, आप साँच जब होय।
तीन साँच जब परगटे, विष का अमृत होय॥

मनुवा तो गाफ़िल भया, सुमिरन लागै नांहि।
घनी सहेगा सासना, जम के दरगह मांहि॥

हाथों में माला फ़िरे, हिरदा डामाडूल।
पग तो पाला में पङा, भागन लागे सूल॥

वाद विवादा मत करो, करु नित एक विचार।
नाम सुमिर चित्त लाय के, सब करनी में सार॥

वाद करै सो जानिये, निगुरे का वह काम।
सन्तों को फ़ुरसत नहीं, सुमिरन करते नाम॥

भक्ति भजन हरि नाम है, दूजा दुःख अपार।
मनसा वाचा कर्मना, कबीर सुमिरन सार॥

जागन में सोवन करै, सोवन में लव लाय।
सुरति डोर लागी रहे, तार तूटि नहि जाय॥

जोइ गहै निज नाम को, सोई हंस हमार।
कहै कबीर धर्मदास सों, उतरे भवजल पार॥

कबीर सुमिरन अंग को, पाठ करे मन लाय।
विद्याहिन विद्या लहै, कहै कबीर समुझाय॥

जो कोय सुमिरन अंग को, पाठ करे मन लाय।
भक्ति ज्ञान मन ऊपजै, कहै कबीर समुझाय॥

जो कोय सुमिरन अंग को, निसि बासर करै पाठ।
कहै कबीर सो संतजन, संधै औघट घाट॥

08 अप्रैल 2018

सुमिरन को अंग 3




सुमिरन को अंग

सुमिरन सों मन जब लगै, ज्ञानांकुस दे सीस।
कहैं कबीर डोलै नहीं, निश्चै बिस्वा बीस॥

सुमिरन मन लागै नही, विषहि हलाहल खाय।
कबीर हटका ना रहै, करि करि थका उपाय॥

सुमिरन मांहि लगाय दे, सुरति आपनी सोय।
कहै कबीर संसार गुन, तुझै न व्यापै कोय॥

सुमिरन सुरति लगाय के, मुख ते कछू न बोल।
बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल॥

सुमिरन तूं घट में करै, घट ही में करतार।
घट ही भीतर पाइये, सुरति सब्द भंडार॥

राजा राना राव रंक, बङो जु सुमिरै नाम।
कहैं कबीर सबसों बङा, जो सुमिरै निहकाम॥

सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम।
निहकामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम॥

जप तप संजम साधना, सब कछु सुमिरन मांहि।
कबीर जाने भक्तजन, सुमिरन सम कछु नांहि॥

थोङा सुमिरन बहुत सुख, जो करि जानै कोय।
हरदी लगै न फ़िटकरी, चोखा ही रंग होय॥

ज्ञान कथे बकि बकि मरै, काहे करै उपाय।
सतगुरू ने तो यों कहा, सुमिरन करो बनाय॥

कबीर सुमिरन सार है, और सकल जंजाल।
आदि अंत मधि सोधिया, दूजा देखा काल॥

कबीर हरि हरि सुमिरि ले, प्रान जाहिंगे छूट।
घर के प्यारे आदमी, चलते लेंगे लूट॥

कबीर चित चंचल भया, चहुँदिस लागी लाय।
गुरू सुमिरन हाथे घङा, लीजै बेगि बुझाय॥

कबीर मेरी सुमिरनी, रसना ऊपर राम।
आदि जुगादि भक्ति है, सबका निज बिसराम॥

कबीर राम रिझाय ले, जिभ्या के रस स्वाद।
और स्वाद रस त्याग दे, राम नाम के स्वाद॥

कबीर मुख से राम कहु, मनहि राम को ध्यान।
रामक सुमिरन ध्यान नित, यही भक्ति यहि ज्ञान॥

राम नाम गुन गावते, तोहि न आवै लाज।
जो कोइ लाजै राम से, ताका तन बेकाज॥

जीना थोङा ही भला, हरि का सुमिरन होय।
लाख बरस का जीवना, लेखै धरै न कोय॥

निज सुख आतमराम है, दूजा दुख अपार।
मनसा वाचा करमना, कबीर सुमिरन सार॥

जो बोलो तो राम कहु, अन्त कहूँ मति जाय।
कहै कबीर निसदिन कहै, सुमिरन सुरति लगाय॥

नर नारी सब नरक है, जब लगि देह सकाम।
कहै कबीर सो पीव को, जो सुमिरै निहकाम॥

दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, दुख काहे को होय॥

सुख में सुमिरन ना किया, दुख में कीया याद।
कहै कबीर ता दास की, कौन सुनै फ़रियाद॥

साई सुमिर मति ढील कर, जो सुमिर ते लाह।
इहाँ खलक खिदमत करै, उहाँ अमरपुर जाह॥

सांई यौं मति जानियो, प्रीति घटे मम चीत।
मरूं तो सुमीरत मरूं, जीयत सुमिरूं नीत॥

साईं को सुमिरन करै, ताको बंदे देव।
पहली आप उगावही, पाछे लारै सेव॥

चिंता तो सतनाम की, और न चितवै दास।
जो कछु चितवै नाम बिनु, सोई काल की फ़ांस॥

पांच संगि पिव पिव करै, छठा जो सुमिरै मन।
आई सुरति कबीर की, पाया राम रतन॥

मन जो सुमिरै राम को, राम बसै घट आहि।
अब मन रामहि ह्वै रहा, सीस नवाऊं काहि॥

तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूँय।
बारी तेरे नाम पर, जित देखूँ तित तूँय॥

तू तू करता तू भया, तुझमें रहा समाय।
तुझ मांही मन मिलि रहा, अब कहुँ अन्त न जाय॥

रग रग बोलां रामजी, रोम रोम रंकार।
सहजे ही धुन होत है, सोई सुमिरन सार॥

सहजे ही धुन होत है, पल पल घटही मांहि।
सुरति सब्द मेला भया, मुख की हाजत नांहि॥

अजपा सुमिरन घट विषे, दीन्हा सिरजन हार।
ताही सों मन लगि रहा, कहैं कबीर विचार॥

सांस सांस पर नाम ले, वृथा सांस मति खोय।
ना जानै इस सांस को, आवन होय न होय॥

सांस सुफ़ल सो जानिये, जो सुमिरन में जाय।
और सांस यौं ही गये, करि करि बहुत उपाय॥

कहा भरोसा देह का, बिनसि जाय छिन मांहि।
सांस सांस सुमिरन करो, और जतन कछु नांहि॥

जाकी पूंजी सांस है, छिन आवै छिन जाय।
ताको ऐसा चाहिये, रहे नाम लौ लाय॥

कहता हूं कहि जात हूँ, कहूँ बजाये ढोल।
स्वासा खाली जात है, तीन लोक का मोल॥

ऐसे महँगे मोल का, एक सांस जो जाय।
चौदह लोक न पटतरै, काहे धूर मिलाय॥

माला सांसउ सांस की, फ़ेरै कोइ निज दास।
चौरासी भरमै नहीं, कटै करम की फ़ांस॥

माला फ़ेरत मन खुशी, ताते कछू न होय।
मन माला के फ़ेरते, घट उजियारो होय॥

माला फ़ेरत जुग गया, मिटा न मन का फ़ेर।
कर का मनका डार देम मन का मनका फ़ेर॥

जे राते सतनाम सों, ते तन रक्त न होय।
रति इक रक्त न नीकसे, जो तन चीरै कोय॥

माला तो कर में फ़िरै, जीभ फ़िरै मुख मांहि।
मनवा तो दहु दिस फ़िरै, यह तो सुमिरन नांहि॥

माला फ़ेरूँ ना हरि भजूँ, मुख से कहूँ न राम।
मेरा हरि मोको भजे, तब पाऊँ बिसराम॥

माला मोसे लङि पङी, का फ़ेरत है मोहि।
मन की माला फ़ेरि ले, गुरू से मेला होय॥

माला फ़ेरै कह भयो, हिरदा गांठि न खोय।
गुरू चरनन चित राचिये, तो अमरापुर जोय॥

कबीर माला काठ की, बहुत जतन का फ़ेर।
माला सांस उसांस की, जामें गांठ न मेर॥

क्रिया करै अंगुरि गिनै, मन धावै चहुँ ओर।
जिहि फ़ेरै साईं मिलै, सो भय काठ कठोर॥150

सुमिरन को अंग 2





सुमिरन को अंग

जैसे फ़निपति मंत्र सुनि, राखै फ़नहि सिकोर।
तैसे वीरा नाम ते, काल रहै मुख मोर॥

सबको नाम सुनावहु, जो आयेगो पास।
सब्द हमारो सत्त है, दृढ़ राखो विस्वास॥

होय विवेकी सब्द का, जाय मिले परिवार।
नाम गहै सो पहुँचई, मानो कहा हमार॥

सुरति समावे नाम में, जग से रहे उदास।
कहै कबीर गुरू चरन में, दृढ़ राखो विस्वास॥

अस औसर नहि पाइहौ, धरो नाम कङिहार।
भौसागर तरि जाव जब, पलक न लागे वार॥

आसा तो इक नाम की, दूजी आस निवार।
दूजी आसा मारसी, ज्यौं चौपर की सार॥

कोटि करम कटि पलक में, रंचक आवै नाम।
जुग अनेक जो पुन्य करु, नही नाम बिनु ठाम॥

सपने में बरराई के, धोखे निकरै नाम।
वाके पग की पानही, मेरे तन को चाम॥

जाकी गांठी नाम है, ताके है सब सिद्धि।
कर जोरै ठाढ़ी सबै, अष्ट सिद्धि नव निद्धि॥

हयवर गयवर सघन घन, छत्र धुजा फ़हराय।
ता सुख ते भिक्षुक भला, नाम भजत दिन जाय॥

पारस रूपी नाम है, लोहा रूपी जीव।
जब सो पारस भेंटिहै, तब जिव होसी सीव॥

पारस रूपी नाम है, लोह रूप संसार।
पारस पाया पुरुष का, परखि परखि टकसार॥

सुख के माथे सिल परै, नाम ह्रदे से जाय।
बलिहारी वा दुख की, पल पल नाम रटाय॥

लेने को सतनाम है, देने को अंनदान।
तरने को आधीनता, बूङन को अभिमान॥

लूटि सकै तो लूटि ले, रामनाम की लूट।
नाम जु निरगुन को गहौ, नातर जैहो खूट॥

कहैं कबीर तूं लूटि ले, रामनाम भंडार।
काल कंठ को जब गहे, रोकै दसहूं द्वार॥

कबीर निर्भय नाम जपु, जब लग दीवे बाति।
तेल घटे बाती बुझै, सोवोगे दिन राति॥

कबीर सूता क्या करै, जागी जपो मुरार।
एक दिना है सोवना, लंबे पांव पसार॥

कबीर सूता क्या करै, उठिन भजो भगवान।
जम घर जब ले जायेंगे, पङा रहेगा म्यान॥

कबीर सूता क्या करै, गुन सतगुरू का गाय।
तेरे सिर पर जम खङा, खरच कदे का खाय॥

कबीर सूता क्या करै, सूते होय अकाज।
ब्रह्मा को आसन डिग्यो, सुनी काल की गाज॥

कबीर सूता क्या करै, ऊठि न रोवो दूख।
जाका वासा गोर में, सो क्यों सोये सूख॥

कबीर सूता क्या करै, जागन की कर चौंप।
ये दम हीरा लाल है, गिन गिन गुरू को सौंप॥

कबीर सूता क्या करै, काहे न देखै जागि।
जाके संग ते बीछुरा, ताहि के संग लागि॥ 

अपने पहरै जागिये, ना परि रहिये सोय।
ना जानौ छिन एक में, किसका पहरा होय॥

नींद निसानी मीच की, उठु कबीरा जाग।
और रसायन छांङि के, नाम रसायन लाग॥

सोया सो निस्फ़ल गया, जागा सो फ़ल लेहि।
साहिब हक्क न राखसी, जब मांगे तब देहि॥

केसव कहि कहि कूकिये, ना सोइये असरार।
रात दिवस के कूकते, कबहुँक लगै पुकार॥

कबीर क्षुधा है कूकरी, करत भजन में भंग।
याकूं टुकङा डारि के, सुमिरन करूं सुरंग॥

गिरही का टुकङा बुरा, दो दो आंगुल दांत।
भजन करैं तो ऊबरे, नातर काढ़ै आंत॥

बाहिर क्या दिखलाइये, अन्तर जपिये नाम।
कहा महोला खलक सों, पर्यो धनी सो काम॥

गोविंद के गुन गावता, कबहु न कीजै लाज।
यह पद्धति आगे मुकति, एक पंथ दो काज॥

गुन गाये गुन ना कटै, रटै न नाम वियोग।
अहिनिस गुरू ध्यायो नहीं, पावै दुरलभ जोग॥

सतगुरू का उपदेस, सतनाम निज सार है।
यह निज मुक्ति संदेस, सुनो संत सत भाव से॥

क्यौं छूटै जम जाल, बहु बंधन जिव बांधिया।
काटै दीनदयाल, करम फ़ंद इक नाम से॥

काटहु जम के फ़ंद, जेहि फ़ंदे जग फ़ंदिया।
कटै तो होय निसंक, नाम खङग सदगुरू दिया॥

तजै काग को देह, हंस दसा की सुरति पर।
मुक्ति संदेसा येह, सत्तनाम परमान अस॥

सुमिरन मारग सहज का, सदगुरू दिया बताय।
सांस सांस सुमिरन करूं, इक दिन मिलसी आय॥

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय।
कहैं कबीर सुमिरन किये, साईं मांहि समाय॥

सुमिरन की सुधि यौं करो, जैसे कामी काम
कहैं कबीर पुकारि के, तब प्रगटै निज नाम॥

सुमिरन की सुधि यौं करो, ज्यौं गागर पनिहार।
हालै डोलै सुरति में, कहैं कबीर विचार॥

सुमिरन की सुधि यौं करो, ज्यौं सुरभी सुत मांहि।
कहै कबीरा चारा चरत, बिसरत कबहूं नांहि॥

सुमिरन की सुधि यौं करो, जैसे दाम कंगाल।
कहैं कबीर बिसरै नहीं, पल पल लेत संभाल॥

सुमिरन की सुधि यौं करो, जैसे नाद कुरंग।
कहैं कबीर बिसरै नहीं, प्रान तजै तिहि संग॥

सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यौं सुई में डोर।
कहैं कबीर छूटै नही, चलै ओर की ओर॥

सुमिरन सों मन लाइये, जैसे कीट भिरंग।
कबीर बिसारे आपको, होय जाय तिहि रंग॥

सुमिरन सों मन लाइये, जैसे दीप पतंग॥
प्रान तजै छिन एक में, जरत न मोरै अंग॥

सुमिरन सों मन लाइये, जैसे पानी मीन।
प्रान तजै पल बीछुरे, दास कबीर कहि दीन॥१००

कबीर से कहना

राजीव जी नमस्कार,
मैंने आपके blog पर कुछ सवाल पूछे हैं, उनका उत्तर देने की  कृपा करें।
09/28/2017 6:16AM
सर आपने कोई answer नहीं दिया।
09/28/2017 2:44PM
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उत्तर - wait करो।
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Ok
09/28/2017 9:39PM
लेकिन कब तक?
09/29/2017 6:24AM
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उत्तर - प्रश्न पूछने के बाद 1 week तक लग जाता है, भले ही ans दूसरे दिन मिल जायें, पर इतना इंतजार जरूरी है।
--------------------
Ok
10/02/2017 8:37PM
राजीव जी अगर वहाँ blogspot पर आप मेरे सवालों का जबाब नही दे सकते, तो कृपया यहाँ दीजिये।
आप शादीशुदा हैं क्या?
देखिये जब तक आप मेरे सारे सवालों का जबाब पूरी तरह से नही देंगे, मैं आपका पीछा नही छोङूंगा..हा हा हा
मुझे आपसे बहुत कुछ पूछना है।
क्योंकि सोऽहंग नाम को प्रचलन में आपने लाया है।
मुझे गहराई से बतायें।
सोऽहंग को मैंने net पर बहुत search किया, लेकिन पढ़ा केवल आपके blog पर
आपके blog पर पढ़ने के बाद तो net पर ऐसे आग सी लग गयी।
यही नाम कई सन्तों द्वारा show करने लगा। इससे पहले केवल सोऽहम के बारे में ही सुना था।
अब काफ़ी सुनने को मिल रहा है।
मैंने शुरूआत ॐ से की थी। फ़िर सोऽहम मिला।
उस पर search किया, अब सोऽहंग मिला आपके द्वारा, यानी पता लगा।
आगे चलेंगे, तो शायद होऽहंग मिलेगा। यानी ये काल मेरे साथ पूरा खिलवाङ कर रहा है।
actually मैं सच्चे सदगुरू की तलाश में हूँ, जो मुझे शुरू से अन्त तक पूरा ज्ञान दे
आगे शायद होऽहंग के बारे में सुनने को मिले।
ये काल मुझे पूरा तरह उलझा रहा है।
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8/4/2018 9:48 am

Hello
कैसे हो राजीव जी?
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उत्तर - ठीक।
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कहाँ तक पहुँचे sir भक्ति मार्ग में?
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उत्तर - घर तक।
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यानी अनामी लोक तक या उससे भी आगे?
क्या आप रामपाल के बारे में जानते हैं?
आजकल youtube पर उनके बहुत video देखने को मिलते हैं।
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उत्तर - खास नहीं।
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लेकिन उसका ज्ञान कुछ अजीब सा है।
आप उनके शिष्यों के video youtube पर देखेंगे, तो उनके कुछ शिष्य सतलोक जाने का दावा करते हैं।
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उत्तर - जीवन अल्प है।
कार्य महत्वपूर्ण है।
और अपने ही गम बहुत हैं।
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हा हा great thing
अच्छा मुझे ये बतायें, सोऽहंग क्या सारशब्द है, या ये शुरूआत है?
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उत्तर - सोऽहंग - जीव मन वायु  
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समझा नही, जरा खोल के बतायें, आपका fan हूँ।
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उत्तर - मन से उत्पन्न वासना वायु, जो ब्रह्म को जीव में बदल देती है।
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पता नहीं, सतपुरूष ने क्या सोचा है मेरे बारे में।
Ok मान लीजिये मैं शिवानन्द से दीक्षा ले लूँ, तो शुरूआत कैसे होगी? 
क्योंकि मैं अनुभव नहीं, सतपुरूष को साकार रूप में देखना और उनसे बात करना चाहता हूँ। 
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उत्तर - हा हा, दिवा-स्वपन।
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दिवा स्वपन क्या है?
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उत्तर - बेसिर-पैर की कल्पना।
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Ok यानी ऐसा कल्पना में ही हो सकता है।
आपके गुरू का ज्ञान read किया था मैंने, उन्होंने तो काफ़ी कुछ बताया है।
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उत्तर - अच्छा! ऐसा..
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हाँ, ऐसा ही,
उन्होंने तो सतलोक, अलख लोक, अगम लोक और अनामी लोक के बारे में कबीर की वाणी में समझाया है।
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उत्तर - सोच अपनी अपनी ।
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आप गुरूजी से अलग क्यों हो गये?
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उत्तर - जुङे कब थे?
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आप अपने blog पर तो उनका खूब जोर-शोर से प्रचार करते हैं।
वैसे आपकी सोऽहंग वाली बात काफ़ी अच्छी लगी।
काल को जीव में बदल देती है ये वायु।
वासना भर देती है, जीव के अन्दर।
राधास्वामी पंथ में भी सोऽहंग का जाप दिया जाता है, लेकिन वो लोग भटक रहे हैं
सोऽहंग सीधे शब्दों में आपके according चलें तो सोऽहंग को हंऽसो कर दो, यही सत्य है ना।
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उत्तर - 100%
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सोऽहंग first name हो गया, second और third क्या है?
यानी मैं आपके संकेतों को समझ रहा हूँ।
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उत्तर - all - self presound
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क्या मुझे ये direct स्वांस पर ध्यान देना चाहिये, या गुरू के आशीर्वाद के बाद?
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उत्तर - as u like
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English नही आती हिन्दी में बतायें गुरूजी।
All self presound क्या?
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उत्तर - सभी - स्वस्फ़ूर्ति ध्वनि (शब्द)
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लेकिन डरता हूँ, बिना गुरू स्वासो हंऽसो पर ध्यान दूँ, तो आपके वाली position ना आ जाये।
जैसे आप हो गये थे six month में,
भटकाइये मत, सही सही बतायें, मैं आपसे काफ़ी सन्तुष्ट हूँ।
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उत्तर - मृत्यु, या किसी गम्भीर परिणाम से भयभीत को, इससे दूर ही रहना चाहिये।
-------------------
लेकिन ज्ञान तो चाहिये गुरूजी, कैसे लूँ?
डर भी तो काल ने ही पैदा कर रखा है।
---------------
उत्तर -
ज्ञान का पंथ कृपाण की धारा।
तनिक डिगे तो आरमपारा।
जो है, उसको स्वीकारना, भोगना ही नियति है।
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गुरू बिना कैसा ज्ञान? और मैं तो आपको गुरू मानने लगा हूँ कहीं न कहीं।
अबकी बार कबीर से मिलें तो कहना, राजेश नाम का युवक है, उस पर भी जरा सा ध्यान दे लो। भटक रहा है।
कभी शिवानन्द पर ध्यान देता है, कभी रामपाल पर ध्यान देता है, तो कभी प्रकाशमुनि पर, कभी गरीबदास पर, तो कभी गुरूनानक पर, कभी धर्मदास पर, कभी राजीव कुलश्रेष्ठ पर..
कभी मधु परमहंस पर, कभी ओशो पर।
अब एक गुरू से और बात करना चाहता है, छोटे गुरू, पर उसे सही मार्ग दिखाये।

13 मार्च 2018

सुमिरन को अंग



सुमिरन को अंग

नाम रतन धन पाय कर, गांठी बांध न खोल।
नहि पाटन नहि पारखी, नहि गाहक नहि मोल॥

नाम रतन धन संत पहँ, खान खुली घट मांहि।
सेंत मेंत ही देत हूं, गाहक कोई नांहि॥

नाम नाम सब कोइ कहै, नाम न चीन्है कोय।
नाम चीन्हि सतगुरू मिलै, नाम कहावै सोय॥

नाम बिना बेकाम है, छप्पन भोग विलास।
क्या इन्द्रासन बैठना, क्या बैकुंठ निवास॥

नाम रतन सो पाइहिं, ज्ञान दृष्टि जेहि होय।
ज्ञान बिना नहिं पावई, कोटि करै जो कोय॥

नाम जो रती एक है, पाप जु रती हजार।
आध रती घट संचरै, जारि करै सब छार॥

नाम जपत कुष्ठी भला, चुइ चुइ परै जु चाम।
कंचन देह किस काम की, जा मुख नाहीं नाम॥

नाम जपत कन्या भली, साकट भला न पूत।
छेरी के गल गलथना, जामें दूध न मूत॥

नाम जपत दरिद्री भला, टूटी घर की छानि।
कंचन मंदिर जारि दे, जहाँ न सदगुरू नाम॥

नाम लिया जिन सब लिया, सब सास्त्रन को भेद।
बिना नाम नरके गये, पढ़ि गुनि चारों वेद॥

नाम पियू का छोङि के, करै आन का जाप।
वेस्या केरा पूत ज्यौं, कहै कौन को बाप॥

आदिनाम वीरा अहै, जीव सकल ल्यौ बूझ।
अमरावै सतलोक ले, जम नहि पावै सूझ॥

आदिनाम पारस अहै, मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह॥

आदिनाम निज सार है, बूझि लेहु सो हंस।
जिन जान्यो निज नाम को, अमर भयो सो बंस॥

आदिनाम निज मूल है, और मंत्र सब डार।
कहै कबीर निज नाम बिनु, बूङि मुवा संसार॥

कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय।
आदिनाम जो गुप्त जप, बिरला जाने कोय॥

सत्तनाम निज औषधि, कोटिक कटै विकार।
विष वारी विरकत रहै, काया कंचन सार॥

यह औषधि अंग ही लगि, अनेक उघरी देह।
कोऊ फ़ेर कूपथ करै, नहि तो औषधि येह॥

सत्तनाम निज औषधि, सदगुरू दई बताय।
औषधि खाय रु पथ रहै, ताकी वेदन जाय॥

सतनाम विस्वास, करम भरम सब परिहरै।
सदगुरू पुरवै आस, जो निरास आसा करै॥

राम नाम को सुमिरतां, उधरे पतित अनेक।
कहैं कबीर नहि छांङिये, राम नाम की टेक॥

राम नाम को सुमिरता, हँसि कर भावै खीझ।
उलटा सुलटा नीपजै, ज्यौं खेतन में बीज॥

राम नाम जाना नहीं, लागी मोटी खोर।
काया हांठी काठ की, ना वह चढ़े बहोर॥

ॐकार निश्चै भया, सो कर्ता मति जान।
सांचा सब्द कबीर का, परदे मांहि पिछान॥

जो जन होइ है जौहरी, रतन लेहि बिलगाय।
सोहंग सोहंग जपि मुआ, मिथ्या जनम गंवाय॥

सबहि रसायन हम करि, नहीं, नाम सम कोय।
रंचक घट में संचरै, सब तन कंचन होय॥

जबहि नाम हिरदै धरा, भया पाप का नास।
मानो चिनगी आग की, परी पुरानी घास॥

कोई न जम सें बांचिया, नाम बिना धरि खाय।
जे जन विरही नाम के, ताको देखि डराय॥

पूंजि मेरी नाम है, जाते सदा निहाल।
कबीर गरजे पुरुष बल, चोरी करै न काल॥

कबीर हमरे नाम बल, सात दीप नव खंड।
जम डरपै सब भय करै, गाजि रहा ब्रह्मांड॥

कबीर हरि के नाम में, सुरति रहै करतार।
ता मुख सें मोती झरे, हीरा अनंत अपार॥

कबीर हरि के नाम में, बात चलावै और।
तिस अपराधी जीव को, तीन लोक कित ठौर॥

कबीर सब जग निरधना, धनवंता नहि कोय।
धनवंता सो जानिये, राम नाम धन होय॥

साहेब नाम संभारता, कोटि विघन टरि जाय।
राई मार वसंदरा, केता काठ जराय॥

कबीर परगट राम कहू, छानै राम न गाय।
फ़ूसक जोङा दूरि करू, बहुरि न लागे लाय॥

कबीर आपन राम कहि, औरन राम कहाय।
जा मुख राम न नीसरै, ता मुख राम कहाय॥

कबीर मुख सोई भला, जा मुख निकसै राम।
जा मुख राम न नीकसै, सो मुख है किस काम॥

कबीर हरि के मिलन की, बात सुनी हम दोय।
कै कछु हार को नाम ले, कै कर ऊंचा होय॥

कबीर राम रिझाय ले, जिह्वा सों कर प्रीत।
हरि सागर जनि बीसरै, छीलर देखि अनीत॥

कबीर राम रिझाय ले, मुख अमृत गुन गाय।
फ़ूटा नग ज्यौं जोरि मन, संधै संधि मिलाय॥

कबीर नैन झर लाइये, रहट वहै निस जाम।
पपिहा यौं पी पी करै, कबीर मिलेंगे राम॥

कबीर कठिनाई खरी, सुमिरत हरि को नाम।
सूली ऊपर नट विधा, गिरै तो नांहि ठाम॥

लंबा मारग दूर घर, विकट पंथ बहु मार।
कहो संत क्यौं पाइये, दुर्लभ गुरू दीदार॥

सूंन सिखर चढ़ि घर किया, सहज समाधि लगाय।
नाम रतन धन तहँ मिला, सतगुरू भये सहाय॥

घटहि नाम की आस करू, दूजी आस निरास।
बसै जु नीर गंभीर में, क्यौं वह मरै पियास॥

जा घट प्रीत न प्रेम रस, पुनि रसना नहि नाम।
ते नर पसु संसार में, उपजि मरे बेकाम॥

जैसे माया मन रमै, तैसा राम रमाय।
तारामंडल बेधि के, तब अमरापुर जाय॥

ज्ञान दीप परकास करि, भीतर भवन जराय।
तहाँ सुमिर सतनाम को, सहज समाधि लगाय॥

एक नाम को जानि के, मेटु करम का अंक।
तबही सो सुचि पाइ है, जब जिव होय निसंक॥

एक नाम को जानि करि, दूजा देइ बहाय।
तीरथ व्रत जप तप नहीं, सतगुरू चरन समाय॥50

12 मार्च 2018

भक्ति को अंग



भक्ति को अंग


भक्ति द्राविङ ऊपजी, लाये रामानंद।
परगट करी कबीर ने, सात दीप नवखंड॥

भक्ति भाव भादौं नदी, सबहि चली घहराय।
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय॥

भक्ति पान सों होत है, मन दे कीजै भाव।
परमारथ परतीति में, यह तन जाये जाव॥

भक्ति बीज बिनसै नहीं, आय पङै जो झोल।
कंचन जो विष्ठा पङै, घटै न ताको मोल॥

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनंत।
ऊंच नीच घर औतरै, होय संत का संत॥

भक्ति कठिन आती दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय।
भक्ति जु न्यारी भेष सें, यह जानै सब कोय॥

भक्ति भेष बहु अंतरा, जैसे धरनि अकास।
भक्त लीन गुरू चरन में, भेष जगत की आस॥

भक्ति रूप भगवंत का, भेष आहि कछु और।
भक्त रूप भगवंत है, भेष जु मन की दौर॥

भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरू होय सहाय।
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरन भाग मिलाय॥

भक्ति दुहीली गुरुन की, नहि कायर का काम।
सीस उतारैं हाथ सों, ताहि मिलै सतनाम॥

भक्ति दुहीली राम की, नहि कायर का काम।
निस्प्रेही निरधार को, आठ पहर संग्राम॥

भक्ति दुहीली नाम की, जस खांडे की धार।
जो डोलै सो कटि पङै, निहचल उतरै पार॥

भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय।
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझौ आय॥

भक्ति निसैनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय।
जिन जिन मन आलस किया, जनम जनम पछिताय॥
 
भक्ति बिना नहि निसतरै, लाख करै जो कोय।
सब्द सनेही ह्वै रहै, घर को पहुँचै सोय॥

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दसवैं भाय।
मन तो मैंगल ह्वै रहा, कैसे आवै जाय

भक्ति दुवारा मोकला, सुमिरी सुमिरि समाय।
मन को तो मैदा किया, निरभय आवै जाय॥

भक्ति सोइ जो भाव सों, इक मन चित को राख।
सांच सील सों खोलिये, मैं तैं दोऊ नाख॥

भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ ले जाय।
कहैं कबीर कछु भेद नहीं, कहा रंक कहा राय॥

भक्ति सरब ही ऊपरै, भागिन पावै सोय।
कहै पुकारै संतजन, सत सुमिरत सब कोय॥

भक्ति बिनावै नाम बिन, भेष बिना ये होय।
भक्ति भेष बहु अन्तरा, जानै बिरला कोय॥

कबीर गुरू की भक्ति करु, तज विषया रस चौज।
बार बार नहि पाइये, मनुष जनम की मौज॥

कबीर गुरू की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार।
धुंवा का धौराहरा, बिनसत लगे न वार॥

कबीर गुरू की भक्ति का, मन में बहुत हुलास।
मन मनसा मांजै नही, होन चहत है दास॥

कबीर गुरू की भक्ति से, संसै डारा धोय।
भक्ति बिना जो दिन गया, सो दिन सालै मोय॥

जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय।
नाता तोङै गुरू भजै, भक्त कहावै सोय॥

छिमा खेत भल जोतिये, सुमिरन बीज जमाय।
खंड ब्रह्मांड सूखा पङै, भक्ति बीज नहि जाय॥

जल ज्यौं प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम।
माता प्यारा बालका, भक्ति प्यारी राम॥

प्रेम बिना जो भक्ति है, सो निज दंभ विचार।
उदर भरन कै कारनै, जनम गंवायो सार॥

भाग बिना नहिं पाइये, प्रेम प्रीति का भक्त।
बिना प्रेम नहि भक्ति कछु, भक्त भर्यो सब जक्त॥

जहाँ भक्त तहाँ भेष नहि, वरनाश्रम तहाँ नाहि।
नाम भक्ति जो प्रेम सों, सो दुरलभ जग मांहि॥

भाव बिना नहि भक्ति जग, भक्ति बिना नहि भाव।
भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव॥

गुरू भक्ति अति कठिन है, ज्यौं खांडे की धार।
बिना सांच पहुँचै नहीं, महा कठिन व्यवहार॥

कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय।
भक्ति करै कोइ सूरमा, जाति बरन कुल खोय॥

जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चित लाय।
कहैं कबीर सतगुरू मिलै, आवागवन नसाय॥

जब लग भक्ति सकाम है, तब लग निस्फ़ल सेव।
कहै कबीर वह क्यौं मिलै, निहकामी निज देव॥

जान भक्त का नित मरन, अनजाने का राज।
सर औसर समझै नहीं, पेट भरन सों काज॥

मन की मनसा मिटि गई, दुरमति भइ सब दूर।
जन मन प्यारा राम का, नगर बसै भरपूर॥

मेवासा मोहै किया, दुरिजन काढ़ै दूर।
राज पियारे राम का, नगर बसै भरपूर॥

आरत ह्वै गुरू भक्ति करु, सब कारज सिध होय।
करम जाल भौजाल में, भक्त फ़ंसे नहि कोय॥

आरत सों गुरूभक्ति करु, सब सिध कारज होय।
कूपा मांग्या राछ है, सदा न फ़वसी कोय॥

सबसों कहूं पुकार कै, क्या पंडित क्या सेख।
भक्ति ठानि सब्दै गहै, बहुरि न काछै भेष॥

देखा देखी भक्ति का, कबहु न चढ़सी रंग।
विपति पङै यौं छांङसी, केंचुली तजत भुजंग॥

देखा देखी पकङिया, गई छिनक में छूट।
कोइ बिरला जन बाहुरै, जाकी गहरी मूठ॥

तोटै में भक्ति करै, ताका नाम सपूत।
मायाधारी मसखरै, केते गये अऊत॥

ज्ञान संपूरन ना भिदा, हिरदा नांहि जुङाय।
देखा देखी भक्ति का, रंग नहीं ठहराय॥

खेत बिगार्यो खरतुआ, सभा बिगारी कूर।
भक्ति बिगारी लालची, ज्यौं केसर में धूर॥

तिमिर गया रवि देखते, कुमति गई गुरूज्ञान।
सुमति गई अति लोभ से, भक्ति गई अभिमान॥

निर्पक्षी की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान।
निरदुंदी की मुक्ति है, निर्लोभी निरबान॥

विषय त्याग वैराग है, समता कहिये ज्ञान।
सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान॥

विषय त्याग वैराग रत, समता हिये समाय।
मित्र सत्रु एकौ नहीं, मन में राम बसाय॥

जब लग आसा देह की, तब लग भक्ति न होय।
आसा त्यागी हरि भजै, भक्त कहावै सोय॥

चार चिह्न हरि भक्ति के, प्रगट दिखाई देत।
दया धर्म आधीनता, परदुख को हरि लेत॥

और कर्म सब कर्म हैं, भक्ति कर्म निहकर्म।
कहैं कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न आई काज।
जिहिको कियो भरोसवा, तिहिते भाई गाज॥

इन्द्र राजसुख भोगकर, फ़िर भौसागर मांहि।
यह सरगुन की भक्ति है, निर्भय कबहूं नांहि॥

भक्त आप भगवान है, जानत नाहि अयान।
सीस नबावै साधु कूं, बूझि करै अभिमान॥

सत्त भक्ति तरवार है, बांधे बिरला कोय।
कोइ एक बांधे सूरमा, तन मन डारै खोय॥

भक्ति महल बहु ऊंच है, दूरहि ते दरसाय।
जो कोई जन भक्ति करै, सोभा बरनि न जाय॥

भक्तन की यह रीत है, बँधे करै जो भाव।
परमारथ के कारनै, या तन रहै कि जाव॥

भक्ति भक्ति बहु कठिन है, रती न चाले खोट।
निराधार का खेल है, अधर धार की चोट॥

भक्ति निसैनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय।
नीचै बाघिन लुकि रही, कुचल पङे कूं खाय॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जानै भेव।
पूरन भक्ति जब मिलै, कृपा करै गुरूदेव॥

सदगुरू की किरपा बिना, सत की भक्ति न होय।
मनसा वाचा कर्मना, सुनि लीजो सब कोय॥

दुख खंडन भव मेटना, भक्ति मुक्ति बिसराम।
वा घर राचे साथ री, यही भक्ति को नाम॥

भक्ति बीज है प्रेम का, परगट पृथ्वी मांहि।
कहै कबीर बोया घना, निपजै कोइक ठांहि॥

भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति भक्ति में फ़ेर।
एक भक्ति तो अजब है, इक है दमङी सेर॥

भक्त उलटि पीछै फ़िरे, संत धरै नहि पांव।
परतछ दीसै जीवताँ, मुआ मांहिला भाव॥

दया गरीबी दीनता, सुमता सील करार।
ये लच्छन हैं भक्ति के, कहै कबीर विचार॥

सलिल भक्त कहुं ना तरै, जावै नरक अघोर।
सतगुरू सें सनमुख नहीं, धर्मराय के चोर॥

संत सुहागी सूरमा, सब्दै उठे जाग।
सलिल सब्द मानै नहीं, जरि बरि लागे आग॥

सदगुरू सब्द उथापही, अपनी महिमा लाय।
कहैं कबीर वा जीव कूं, काल घसीटै जाय॥

सांच सब्द खाली करै, आपन होय सयान।
सो जीव मनमुखी भये, कलियुग के व्रतमान॥

11 मार्च 2018

दासातन को अंग




दासातन को अंग

गुरू समरथ सिर पर खङे, कहा कमी तोहि दास।
रिद्धि सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छांङै पास॥

दुख सुख सिर ऊपर सहै, कबहू न छाङै संग।
रंग न लागै और का, व्यापै सदगुरू रंग॥

धूम धाम सहता रहै, कबहू न छाङै संग।
पाहा बिन लागे नही, कपङा के बहु रंग॥

कबीर गुरू सबको चहै, गुरू को चहै न कोय।
जब लग आस सरीर की, तब लग दास न होय॥

कबीर गुरू के भावते, दूरहि ते दीसन्त।
तन छीना मन अनमना, जग ते रूठि फ़िरन्त॥

कबीर खालिक जागिया, और न जगै कोय।
कै जागै विषया भरा, दास बंदगी जोय॥

कबीर पांचौ बलधिया, ऊजङ ऊजङ जांहि।
बलिहारी वा दास की, पकङि जु राखै बांहि॥

काजर केरी कोठरी, ऐसो यह संसार।
बलिहारी वा दास की, पैठी निकसनहार॥

काजर केरी कोठरी, काजर ही का कोट।
बलिहारी वा दास की, रहै नाम की ओट॥

निरबंधन बंधा रहै, बंधा निरबंध होय।
करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय॥

दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावै दास।
पानी के पीये बिना, कैसे मिटै पियास॥

दासातन हिरदे बसै, साधुन सों आधीन।
कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लौ लीन॥

नाम धराया दास का, मन में नाहीं दीन।
कहैं कबीर सो स्वान गति, औरहि के लौलीन॥

नाम धरावै दास को, दासातन में लीन।
कहैं कबीर लौलीन बिन, स्वान बुद्धि कहि दीन॥

स्वामी होना सोहरा, दुहरा होना दास।
गाडर आनी ऊन को, बांधी चरै कपास॥

दास दुखी तो हरि दुखी, आदि अन्त तिहूंकाल।
पलक एक में प्रगट ह्वै, छिन में करूं निहाल॥

दास दुखी तो मैं दुखी, आदि अन्त तिहुंकाल।
पलक एक में प्रगटि के, छिन में करै निहाल॥

कबीर कुल सो ही भला, जा कुल उपजै दास।
जा कुल दास न ऊपजै, सो कुल आक पलास॥

भली भई जो भय मिटा, टूटी कुल की लाज।
बेपरवाही ह्वै रहा, बैठा नाम जहाज॥

कबीर भये हैं केतकी, भंवर भये सब दास।
जहँ जहँ भक्ति कबीर की, तहँ तहँ मुक्ति निवास॥

दास कहावन कठिन हैं, मैं दासन का दास।
अब तो ऐसा ह्वै रहूं, पांव तले की घास॥

काहूं को न संतापिये, जो सिर हंता सोय।
फ़िर फ़िर वाकूं बंदिये, दास लच्छ है सोय॥

लगा रहै सतनाम सों, सबही बंधन तोङ।
कहै कबीर वा दास सों काल रहै हथ जोङ॥

दास कहावन कठिन है, जब लग दूजी आन।
हांसी साहिब जो मिलै, कौन सहै खुरसान॥

डग डग पै जो डर करै, नित सुमिरैं गुरूदेव।
कहैं कबीर वा दास की, साहिब मानै सेव॥

निहकामी निरमल दसा, नित चरनों की आस।
तीरथ इच्छा ता करै, कब आवै वा दास॥

चंदन डरपि सरप सों, मति रे बिगाङै बास।
सरगुन डरपै निगुन सों, जग सें डरपै दास॥

10 मार्च 2018

सेवक को अंग



सेवक को अंग

सेवक सेवा में रहै, अन्त कहूं नहि जाय।
दुख सुख सिर ऊपर सहै, कहैं कबीर समुझाय॥

सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय।
कहैं कबिर सेवा बिना, सेवक कभी न होय॥

सेवक मुखै कहावई, सेवा में दृढ नांहि।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी मांहि॥

सेवक सेवा में रहै, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर कूसेवका, सनमुख ना ठहराव॥

सेवक फ़ल मांगै नहीं, सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर ता दास पर, काल करै नहिं घात॥

सेवक स्वामी एक मत, मत में मत मिल जाय।
चतुराई रीझै नहीं, रीझै मन के भाय॥

सेवक कुत्ता राम का, मुतिया वाका नांव।
डोरी लागी प्रेम की, जित खैंचे तित जांव॥

तू तू करु तो निकट ह्वै, दुर दुर करु तो जाय।
ज्यौं गुरू राखै त्यौं रहै, जो देवै सो खाय॥

फ़ल कारन सेवा करै, निसदिन जाँचे राम।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चाहै चौगुना दाम॥

सब कुछ गुरू के पास है, पाइये अपने भाग।
सेवक मन सोंप्या रहै, रहै चरन में लाग॥

सदगुरू सब्द उलंघि कर, जो सेवक कहुँ जाय।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समुझाय॥

सतगुरू बरजै सिष करै, क्यौं करि बाचै काल।
दहुँ दिसि देखत बहि गया, पानी फ़ूटी पाल॥

सतगुरू कहि जो सिष करै, सब कारज सिध होय।
अमर अभय पद पाइये, काल न झांकै कोय॥

साहिब को भावै नहीं, सों हमसों जनि होय।
सदगुरू लाजै आपना, साधु न मानै कोय॥

साहिब जासों ना रुचै, सो हमसों जनि होय।
गुरू की आज्ञा में रहूं, बल बुधि आपा खोय॥

साहिब के दरबार में, कमी काहू की नांहि।
बंदा मौज न पावहीं, चूक चाकरी मांहि॥

द्वार धनी के पङि रहै, धका धनी का खाय।
कबहुक धनी निवाजिहै, जो दर छांङि न जाय॥

आस करै बैकुंठ की, दुरमति तीनों काल।
सुक्र कही बलि ना करी, तातै गयो पाताल॥

गुरू आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल।
लोक वेद दोनौं गये, आगे सिर पर काल॥

भुक्ति मुक्ति मांगौं नहीं, भक्ति दान दे मोहि।
और कोइ जांचौं नहीं, निसदिन जांचौं तोहि॥

भोग मोक्ष मांगों नहीं, भक्ति दान गुरूदेव।
और नही कुछ चाहिये, निसदिन तेरी सेव॥

यह मन ताको दीजिये, सांचा सेवक होय।
सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय॥

अनराते सुख सोवना, राते निंद न आय।
ज्यौं जल छूटी माछरी, तलफ़त रैंन बिहाय॥

राता राता सब कहै, अनराता नहि कोय।
राता सोई जानिये, जा तन रक्त न होय॥

राता रक्त न नीकसे, जो तन चीरै कोय।
जो राता गुरू नाम सों, ता तन रक्त न होय॥

सीलवंत सुर ज्ञान मत, अति उदार चित होय।
लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय॥

दयावंत धरमक ध्वजा, धीरजवान प्रमान।
सन्तोषी सुखदायका, सेवक परम सुजान॥

चतुर विवेकी धीर मत, छिमावान बुधिवान।
आज्ञावान परमत लिया, मुदित प्रफ़ुल्लित जान॥

ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सों हेत।
सत्यवान परमारथी, आदर भाव सहेत॥

पट दरसन को प्रेम करि, असन बसन सों पोप।
सेव करैं हरिजनन की, हरषित परम संतोष॥

यह सब लच्छन चित धरै, अप लच्छन सब त्याग।
सावधान सम ध्यान है, गुरू चरनन में लाग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग।
कहैं कबीर बिसरै नहीं, यह गुरूमुख को अंग॥

गुरूमुख गुरू चितवत रहै, जैसे साह दिवान।
और कभी नहि देखता, है वाही को ध्यान॥

गुरूमुख गुरू आज्ञा चलै, छांङि देइ सब काम।
कहैं कबीर गुरूदेव को, तुरत करै परनाम॥

उलटे सुलटे वचन के, सीष न मानैं दूख।
कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरूमुख॥

सुरति सुहागिन सोइ सहि, जो गुरू आज्ञा मांहि।
गुरू आज्ञा जो मेटहीं, तासु कुसल ह्वै नांहि॥

गुरू आज्ञा लै आवही, गुरू आज्ञा लै जाय।
कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय॥

कहैं कबीर गुरू प्रेमवश, क्या नियरै क्या दूर।
जाका चित जासों बसै, सो तिहि सदा हजूर॥

कबीर गुरू औ साधु कूं, सीस नवावै जाय।
कहैं कबीर सो सेवका, महा परम पद पाय॥

07 मार्च 2018

संगति को अंग



संगति को अंग

कबीर संगति साधु की, नित प्रति कीजै जाय।
दुरमति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय॥

कबीर संगति साधु की, कबहूं न निस्फ़ल जाय।
जो पै बोवै भूमि के, फ़ूलै फ़लै अघाय॥

कबीर संगति साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिलै, साकट संग न जाय॥

कबीर संगति साधु की, ज्यौं गंधी का बास।
जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी बास सुवास॥

कबीर संगति साधु की, निस्फ़ल कभी न होय।
होसी चंदन वासना, नीम न कहसी कोय॥

कबीर संगति साधु की, जो करि जानै कोय।
सकल बिरछ चंदन भये, बांस न चंदन होय॥

 कबीर चंदन संग से, बेधे ढाक पलास।
आप सरीखा करि लिया, जो ठहरा तिन पास॥

मलयागिरि के पेङ सों, सरप रहै लिपटाय।
रोम रोम विष भीनिया, अमृत कहा समाय॥

एक घङी आधी घङी, आधी हूं पुनि आध।
कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध॥

घङी ही की आधी घङी, भाव भक्ति में जाय।
सतसंगति पल ही भली, जम का धका न खाय॥

जा पल दरसन साधु का, ता पल की बलिहार।
सत्तनाम रसना बसै, लीजै जनम सुधार॥

ते दिन गये अकारथी, संगति भई न सन्त।
प्रेम बिना पसु जीवना, भक्ति बिना भगवंत॥

जा घर गुरू की भक्ति नहीं, संत नही मिहमान।
ता घर जम डेरा दिया, जीवत भये मसान॥

रिद्धि सिद्धि मांगू नहि, मांगूं तुम पै येह।
नित प्रति दरसन साधु का, कहै कबीर मुहि देह॥

मेरा मन हंसा रमै, हंसा गगनि रहाय।
बगुला मन मानै नहीं, घर आंगन फ़िर जाय

कबीरा वन वन मैं फ़िरा, ढ़ूंढ़ि फ़िरा सब गाम।
राम सरीखा जन मिलै, तब पूरा ह्वै काम॥

कबीर तासों संग कर, जो रे भजिहैं राम।
राजा राना छत्रपति, नाम बिना बेकाम॥

कबीर लहरि समुद्र की, कभी न निस्फ़ल जाय।
बगुला परखि न जानई, हंसा चुगि चुगि खाय॥

कबीर मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फ़ल पाय॥

कबीर खाई कोट की, पानी पिवै न कोय।
जाय मिले जब गंग में, सब गंगोदक होय॥

कबीर कलह रु कलपना, सतसंगति से जाय।
दुख वासों भागा फ़िरै, सुख में रहै समाय॥

संगति कीजै सन्त की, जिनका पूरा मन।
अनतोले ही देत हैं, नाम सरीखा धन॥

साधु संग अन्तर पङे, यह मति कबहूं होय।
कहै कबीर तिहुलोक में, सुखी न देखा कोय॥

मथुरा कासी द्वारिका, हरिद्वार जगन्नाथ।
साधु संगति हरि भजन बिन कछू न आवै हाथ॥

साखि सब्द बहुते सुना, मिटा न मन का दाग।
संगति सों सुधरा नही, ताका बङा अभाग॥

साधुन के सतसंग ते, थर थर कांपै देह।
कबहूं भाव कुभाव ते, मत मिटि जाय सनेह॥

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय॥

राम राम रटिबो करै, निसदिन साधुन संग।
कहो जु कौन विचारते, नैना लागत रंग॥

मन दीया कहुं और ही, तन साधुन के संग।
कहैं कबीर कोरी गजी, कैसे लागे रंग॥

भुवंगम बास न बेधई, चंदन दोष न लाय।
सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय॥

चंदन परसा बावना, विष ना तजै भुजंग।
यह चाहै गुन आपना, कहा करै सतसंग॥

कबीर चंदन के निकट, नीम भि चंदन होय।
बूङे बांस बङाइया, यौं जनि बूङो कोय॥

चंदन जैसे संत हैं, सरप जैसा संसार।
वाके अंग लिपटा रहै, भागै नही विकार॥

चंदन डर लहसुन करै, मति रे बिगारै बास।
सगुरा निगुरा सों डरै, जग से डरपै दास॥

कबीर कुसंग न कीजिये, लोहा जल न तिराय।
कदली सीप भुजंग मुख, एक बूंद तिर भाय॥

कबीर कुसंग न कीजिये, जाका नांव न ठांव।
ते क्यौं होसी बापरा, साध नहि जिहि गांव॥

कबीर गुरू के देस में, बसि जानै जो कोय।
कागा ते हंसा बनै, जाति बरन कुल खोय॥ 

कबीर कहते क्यों बने, अनबनता के संग।
दीपक को भावै नहीं, जरि जरि मरैं पतंग॥

ऊजल बुंद अकास की, पङि गइ भूमि बिकार।
माटी मिलि भई कीच सों, बिन संगति भौ छार॥

हरिजन सेती रूठना, संसारी सों हेत।
ते नर कबहु न नीपजे, ज्यौं कालर का खेत॥

गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरनि मंझार।
मूरख मित्र न कीजिये, बूङो काली धार॥

मूरख को समझावते, ज्ञान गांठि का जाय।
कोयला होय न ऊजल, सौ मन साबुन लाय॥

कोयला भि होय ऊजल, जरि बरि ह्वै जो सेत।
मूरख होय न ऊजला, ज्यौं कालर का खेत॥

संगति अधम असाधु की, मीच होय ततकाल।
कहैं कबीर सुन साधवा, बानी ब्रह्म रसाल॥

मेर निसानी मीच की, कूसंगति ही काल।
कहैं कबीर सुन प्रानिया, बानी ब्रह्म संभाल॥

ऊंचे कुल कह जनमिया, करनी ऊंच न होय।
कनक कलस मद सों भरा, साधुन निंदा सोय॥

जानि बूझ सांची तजै, करै झूठ सों नेह।
ताकी संगति रामजी, सपनेहू मति देह॥

काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान।
काचा सेती मिलत ही, ह्वै तन धन की हान॥

तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल।
काची सरसों पेलि के, खरी भया नहिं तेल॥

कुल टूटै कांची पङी, सरा न एकौ काम।
चौरासी वासा भया, दूर पङा हरिनाम॥

दाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।
कोटि जतन परमौधिये, कागा हंस न होय॥

जग सों आपा राखिये, ज्यौं विषहर सो अंग।
करो दया जो खूब है, बुरा खलक का संग॥

जीवन जोवन राजमद, अविचल रहै न कोय।
जु दिन जाय सतसंग में, जीवन का फ़ल सोय॥

ब्राह्मन केरी बेटिया, मांस शराब न खाय।
संगति भई कलाल की, मद बिन रहा न जाय॥

साखि सब्द बहुतहि सुना, मिटा न मन का मोह।
पारस तक पहुँचा नहीं, रहा लोह का लोह॥

माखी चंदन परिहरे, जहँ रस मिलि तहँ जाय।
पापी सुनै न हरिकथा, ऊंधे कै उठि जाय॥

पुरब जनम के भाग से, मिले संत का जोग।
कहैं कबीर समुझै नहीं, फ़िर फ़िर, चाहै भोग॥

जहाँ जैसी संगति करैं, तहँ तैसा फ़ल पाय।
हरि मारग तो कठिन है, क्यौं करि पैठा जाय॥

ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट।
ज्ञानी अज्ञानी मिल, होवै माथा कूट॥

सज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात।
गदहा सों गदहा मिले, खाबे दो दो लात॥

मैं मांगूं यह मांगना, मोहि दीजिये सोय।
संत समागम हरिकथा, हमरे निसदिन होय।

कंचन भौ पारस परसि, बहुरि न लोहा होय।
चंदन बास पलास बिधि, ढाक कहै न कोय॥

पहिले पट पासै बिना, बीघे पङै न भात।
पासै बिन लागे नहीं, कुसुँभ बिगारै साथ॥

कबीर सतगुरू सेविये, कहा साधु को रंग।
बिन बगुरे भिगोय बिना, कोरै चङै न रंग॥

कबीर विषधर बहु मिले, मनिधर मिला न कोय।
विषधर को मनिधर मिले, विषधर अमृत होय॥

प्रीति करो सुख लेन को, सो सुख गयो हिराय।
जैसे पाई छछुंदरी, पकङि सांप पछिताय॥

जो छोङै तो आंधरा, खाये तो मरि जाय।
ऐसे खंध छछुंदरी, दोउ भांति पछताय॥

सांप छछुंदर दोय कूं, नौला नीगल जाय।
वाकूं विष बेङै नहीं, जङी भरोसे खाय॥

कूसंगति लागे नहीं, सब्द सजीवन हाथ।
बाजीगर का बालका, सोवै सरपकि साथ॥

पानी निरमल अति घना, पल संगे पल भंग।
ते नर निस्फ़ल जायेंगे, करै नीच को संग॥

निगुनै गांव न बासिये, सब गुन को गुन जाय।
चंदन पङिया चौक में, ईंधन बदले जाय॥

संगति को वैरी घनो, सुनो संत इक बैन।
येही काजल कोठरी, येही काजल नैन॥

साधू संगति परिहरै, करै विषय को संग।
कूप खनी जल बाबरे, त्यागि दिया जल गंग॥

अनमिलता सों संग करि, कहा बिगोयो आप।
सत्त कबीर यों कहत है, ताहि पुरबलो पाप॥

लकङी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनो सींचो जानि के, यही बङन की रीति॥

मैं सींचो हित जानि के, कठिन भयो है काठ।
ओछी संगति नीच की, सिर पर पाङी वाट॥

साधू सब्द सुलच्छना, गांधी हाट बनेह।
जो जो मांगे प्रीति सों, सो सो कौङी देह॥

तरुवर जङ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज।
तारै पन बोरै नहीं, बाँह गहै की लाज॥

साधु संगति गुरूभक्ति जु, निष्फ़ल कबहूं न जाय।
चंदन पास है रूखङा, कबहुँक चंदन भाय॥

संत सुरसरी गंगजल, आनि पखारा अंग।
मैले से निरमल भये, साधूजन के संग॥

चर्चा करु तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय।
ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय॥

संगति कीजै साधु की, दिन दिन होवै हेत।
साकट काली कामली, धोते होत न सेत॥

साधु संगति गुरूभक्ति रु, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय।
ओछी संगति खर सब्द रु, घटत घटत घटि जाय॥

संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सों संग।
लर लर लोई होत है, तऊ न छाङै रंग॥

सत संगति सबसों बङी, बिन संगति सब ओस।
सतसंगति परमानता, कटै करम को दोस॥

साहिब दरसन कारनै, निसदिन फ़िरूं उदास।
साधू संगति सोधि ले, नाम रहै उन पास॥

तेल तिली सों ऊपजै, सदा तेल को तेल।
संगति को बेरो भयो, ताते नाम फ़ुलेल॥

हरिजन केवल होत हैं, जाको हरि का संग।
विपति पङै बिसरै नहीं, चङै चौगुना रंग॥

भीख को अंग



भीख को अंग

मांगन मरन समान है, मति कोई मांगो भीख।
मांगन ते मरना भला, यह सतगुरू की सीख॥

मांगन मरन समान है, सीख दई मैं तोहि।
कहैं कबीर सदगुरू सुनो, मति रे मंगाउ मोहि॥

मांगन मरन समान है, तोहि दई मईं सीख।
कहैं कबीर समुझाय के, मति कोई मांगै भीख॥

मांगन गय सो मर रहे, मरै जु मांगन जांहि।
तिनते पहिले वे मरे, होत करत हैं नांहि॥

उदर समाता मांगि ले, ताको नाहीं दोष।
कहैं कबीर अधिका गहि, ताकी गति ना मोष॥

अजहूं तेरा सब मिटै, जो मानै गुरू सीख।
जब लग तूं घर में रहै, मति कहुं मांगै भीख॥

उदर समाता अन्न ले, तनहि समाता चीर।
अधिकहि संग्रह ना करै, तिसका नाम फ़कीर॥

अनमांगा तो अति भला, मांग लिया नहि दोष।
उदर समाता मांगि ले, निश्चै पावै मोष॥

अनमांगा उत्तिम कहा, मध्यम मांगि जु लेय।
कहै कबीर निकृष्ट सो, पर घर धरना देय॥

सहज मिलै सो दूध है, मांगि मिलै सो पानि।
कहैं कबीर वह रकत है, जामें ऐंचातानि॥

आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह।
यह तीनों तबही गये, जबहि कहा कछु देह॥

भीख तीन परकार की, सुनहु संत चित लाय।
दास कबीर परगट कहै, भिन्न भिन्न अरथाय॥

उत्तिम भीख है अजगरी, सुनि लीजै निज बैन।
कहैं कबीर ताके गहै, महा परम सुख चैन॥

भंवर भीख मध्यम कही, सुनो संत चितलाय।
कहैं कबीर ताके गहैं, मध्यम मांहि समाय॥

खर कूकर की भीख जो, निकृष्ट कहावे सोय।
कहैं कबीर इस भीख सें, मुक्ति कबहूं न होय॥

भेष को अंग



भेष को अंग

कबीर भेष अतीत का, अधिक करै अपराध।
बाहिर दीसै साधु गति, अन्तर बङा असाध॥

कबीर वह तो एक है, परदा दीया भेष।
भरम करम सब दूर कर, सबही मांहि अलेख॥

तत्व तिलक तिहुलोक में, सत्तनाम निजसार।
जन कबीर मस्तक दिया, सोभा अगम अपार॥

तत्व तिलक की खानि है, महिमा है निजनाम।
अछै नाम वा तिलक को, रहै अछै बिसराम॥४

तत्व तिलक माथे दिया, सुरति सरवनी कान।
करनी कंठी कंठ में, परसा पद निरवान॥

तत्वहि फ़ल मन तिलक है, अछै बिरछ फ़ल चार।
अमर महातम जानि के, करो तिलक ततसार॥

त्रिकुटी ही निजमूल है, भ्रकुटी मध्य निसान।
ब्रह्म दीप अस्थूल है, अगर तिलक निरवान॥

अगर तिलक सिर सोहई, बैसाखी उनिहार।
सोभा अविचल नाम की, देखो सुरति विचार॥

जैसि तिलक उनहार है, तस सोभा अस्थीर।
खम्भ ललाटे सोहई, तत्व तिलक गंभीर॥

मध्य गुफ़ा जहँ सुरति है, उपरि तिलक का धाम।
अमर समाधि लगावई, दीसै निरगुन नाम॥

द्वादस तिलक बनावही, अंग अंग अस्थान।
कहैं कबीर विराजहीं, ऊजल हंस अमान॥

ऊजल देखि न धीजिये, बग ज्यौं मांडै ध्यान।
धौरै बैठि चपेटसी, यौं ले बूङै ज्ञान॥

चाल बकुल की चलत है, बहुरि कहावै हंस।
ते मुक्ता कैसे चुगै, पङै काल के फ़ंस॥

साधु भया तो क्या हुआ, माला पहिरी चार।
बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार॥

जेता मीठा बोलवा, तेता साधु न जान।
पहिले थाह दिखाइ करि, औडै देसी आन॥

मीठे बोल जु बोलिये, ताते साधु न जान।
पहिले स्वांग दिखाय के, पीछे दीसै आन॥

बांबी कूटै बाबरा, सरप न मारा जाय।
मूरख बांबी ना डसै, सरप सबन को खाय॥

माला तिलक लगाय के, भक्ति न आई हाथ।
दाढ़ी मूंछ मुढ़ाय के, चले दुनी के साथ॥

दाढ़ी मूंछ मुंङाय के, हुआ घोटम घोट।
मन को क्यौं नहि मूंडिये, जामें भरिया खोट॥

केसन कहा बिगारिया, मूंङा सौ सौ बार।
मन को क्यौं नहि मूंङिये, जामें विषय विकार॥

मन मेवासी मूंडिये, केसहि मूंडै काहि।
जो कुछ किया सो मन किया, केस किया कुछ नाहिं॥

मूंड मुंङावत दिन गया, अजहु न मिलिया राम।
राम नाम कहो क्या करै, मन के औरै काम॥

मूंङ मुंङाये हरि मिले, सब कोई लेह मुंङाय।
बार बार के मूंङते, भेङ न बैकुंठ जाय॥

स्वांग पहिरि सोहरा भया, दुनिया खाई खुंद।
जा सेरी साधू गया, सो तो राखी मूंद॥

भूला भसम रमाय के, मिटी न मन की चाह।
जो सिक्का नहि साँच का, तब लग जोगी नाहं॥

ऐसी ठाठां ठाठिये, बहुरि न यह तन होय।
ज्ञान गूदरी ओढ़िये, काढ़ि न सकही कोय॥

मन माला तन सुमरनी, हरिजी तिलक दियाय।
दुहाई राजा राम की, दूजा दूरि कियाय॥

मन माला तन मेखला, भय की करै भभूत।
राम मिला सब देखता, सो जोगी अवधूत॥

माला फ़ेरै मनमुखी, बहुतक फ़िरै अचेत।
गांगी रोलै बहि गया, हरि सों किया न हेत॥

माला फ़ेरै कछु नहीं, डारि मुआ गल भार।
ऊपर ढ़ोला हींगला, भीतर भरी भंगार॥

माला फ़ेरै क्या भयाम गांठ न हिय की खोय।
हरि चरना चित राखिये, तो अमरापुर जोय॥

माला फ़ेरै कछु नहीं, काती मन के हाथ।
जब लग हरि परसै नहीं, तब लग थोथी बात॥

ज्ञान संपुरन ना बिधा, हिरदा नहि भिदाय।
देखा देखी पकरिया, रंग नही ठहराय।

बाना पहिरै सिंघ का, चले भेङ की चाल।
बोली बोले सियार की, कुत्ता खावै फ़ाल॥

भरम न भागै जीव का, बहुतक धरिया भेष।
सतगुरू मिलिया बाहिरै, अन्तर रहा अलेख॥

तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय।
सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय॥

हम तो जोगी मनहि के, तन के हैं ते और।
मन को जोग लगावतां, दसा भई कछु और॥

पहिले बूङी पिरथवी, झूठे कुल की लार।
अलख बिसार्यो भेष में, बूङि काल की धार॥

चतुराई हरि ना मिलै, यह बातों की बात।
निस्प्रेही निरधार का, गाहक दीनानाथ॥

जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम।
मन काचे नाचे व्रिथा, सांचे सांचे राम॥

हम जाना तुम मगन हो, रहै प्रेमरस पाग।
रंच पौन के लागते, उठै आग से जाग॥

सीतल जल पाताल का, साठि हाथ पर मेख।
माला के परताप ते, ऊपर आया देख॥

करिये तो करि जानिये, सरिखा सेती संग।
झिर झिर जिमि लोई भई, तऊ न छाङै रंग॥

संसारी साकट भला, कन्या क्वारी माय।
साधु दुराचारी बुरा, हरिजन तहाँ न जाय॥

वैरागी विरकत भला, गिरा पङा फ़ल खाय।
सरिता को पानी पिये, गिरही द्वार न जाय॥

गिरही द्वारै जाय के, उदर समाता लेय।
पीछे लागे हरि फ़िरै, जब चाहै तब देय॥

सिष साखा संसार गति, सेवक परतछ काल।
वैरागी छावै मढ़ी, ताको मूल न डाल॥

जो मानुष गृहि धर्मयुत, राखै सील विचार।
गुरूमुख बानी साधु संग, मन वच सेवा सार॥

सेवक भाव सदा रहै, वहम न आनै चित्त।
निरनै लखी यथार्थ विधि, साधुन को करै मित्त॥

सत्त सील दाया सहित, बरते जग व्यौहार।
गुरू साधू का आश्रित, दीन वचन उच्चार॥

बहु संग्रह विषयान को, चित्त न आवै ताहि।
मधुकर इमि सब जगत जिव, घटि बढ़ि लखि बरताहि।

गिरही सेवै साधु को, साधू सुमरै नाम।
यामें धोखा कछु नहीं, सरै दोउ का काम॥

गिरही सेवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द।
कहै कबीर वैरागि को, निरवानी निरदुंद॥

सब्द विचारे पथ चले, ज्ञान गली दे पांव।
क्या रमता क्या बैठता, क्या ग्रह कंदला छांव॥

जैसा मीठा घृत पकै, तैसा फ़ीका साग।
राम नाम सों राचहीं, कहै कबीर वैराग॥

पांच सात सुमता भरी, गुरू सेवा चित लाय।
तब गुरू आज्ञा लेय के, रहे दिसंतर जाय॥

गुरू आज्ञा तें जो रमै, रमते तजै सरीर।
ताको मुक्ति हजूर है, सदगुरू कहै कबीर॥

गुरू के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दूख।
कहैं कबीर ता दूख पर, बारौं कोटिक सूख॥

सतगुरू अधम उधारना, दया सिंधु गुरू नाम।
गुरू बिनु कोई न तरि सकै, क्या जप अल्लह राम॥

माला पहिरै कौन गुन, मन दुविधा नहि जाय।
मन माला करि राखिये, गुरूचरनन चित लाय॥

मन का मस्तक मूंडि ले, काम क्रोध का केस।
जो पांचौ परमौधि ले, चेला सबही देस॥

माला तिलक बनाय के, धर्म विचारा नांहि।
माल विचारी क्या करै, मैल रहा मन मांहि॥

माल बनाई काठ की, बिच में डारा सूत।
माल विचारी क्या करै, फ़ेरनहार कपूत॥

माल तिलक तो भेष है, राम भक्ति कछु और।
कहै कबीर जिन पहिरिया, पाँचौ राखै ठौर॥

माला तो मन की भली, औ संसारी भेष।
माला फ़ेरे हरि मिले, हरहट के गल देख।

मन मैला तन ऊजला, बगुला कपटी अंग।
तासों तो कौआ भला, तन मन एकहि रंग॥

कवि तो कोटिन कोटि है, सिर के मूंङे कोट।
मन के मूंङे देख करि, ता संग लीजै ओट॥

भेष देखि मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान।
बिना कसौटी होती नहीं, कंचन की पहिचान॥

फ़ाली फ़ूली गाङरी, ओढ़ि सिंघ की खाल।
सांचा सिंघ जब आ मिले, गाडर कौन हवाल॥

पांचौ में फ़ूला फ़िरै, साधु कहावै सोय।
स्वान न मेलै बाघरो, बाघ कहाँ से होय॥

बोली ठाली मसखरी, हांसी खेल हराम।
मद माया औ इस्तरी, नहि संतन के काम॥

भांड भवाई खेचरी, ये कुल को बेवहार।
दया गरीबी बंदगी, संतन का उपकार॥

दूध दूध सब एक है, दूध आक भी होय।
बाना देखि न बंदिये, नैना परखो सोय॥

बाना देखी बंदिये, नहि करनी सों काम।
नीलकंठ कीङा चुगै. दरसन ही सों काम॥

कबीर भेष भगवंत का, माला तिलक बनाय।
उनकूं आवत देखि के, उठि कर मिलिये धाय॥

गिरही को चिंता घनी, वैरागी को भीख।
दोनों का बिच जीव है, देहु न सन्तो सीख॥

वैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार।
दोउ चूकि खाली पङै, ताको वार न पार॥

घर में रहै तो भक्ति करूं, नातर करूं वैराग।
वैरागी बंधन करै, ताका बङा अभाग॥

धारा तो दोनों भली, गिरही कै वैराग।
गिरही दासातन करै, वैरागी अनुराग॥

अजर जु धान अतीत का, गिरही करै अहार।
निश्चै होई दरिद्री, कहैं कबीर विचार॥

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