31 अगस्त 2013

और जानिये - र का चमत्कार

- प्यारे बच्चो ! र को हिन्दी वर्णमाला में क्या कहते हैं ? 
- मास्टर जी र को र ही कहते हैं । और उर्दू में रे और अंग्रेजी में आर कहते हैं ।.. और पंजाबी उङिया बंगाली सिंधी मराठी पश्तो फ़ारसी में क्या कहते हैं । हमें नहीं पता । और हमें इसलिये नहीं पता । क्योंकि आपने कभी बताया ही नहीं । और आपने इसलिये नहीं बताया कि खुद आपको ही कौन सा पता है ? ही ही ही
- शाबास सत्यकीखोज पढ पढकर वो भी बुद्धिमान हो गये । जिन्हें क से कौआ और ल से लोमङी तक का पता नहीं था ।
...आज प्रश्नों के उत्तर देने का मन नहीं था । क्योंकि प्रश्नों का स्तर अधिकतर बहुत साधारण सा ही होता है । और मैं आपको अपने बहुत थोङे से शेष बचे जीवन में बहुत कुछ रहस्य बता देना चाहता हूँ । वो जो मैं जानता हूँ ?
क्या आपने कभी सोचा है कि - हम किसी भी वस्तु आदि को किसी  विशेष शब्द या नाम से क्यों पुकारते हैं ? जैसे जल, वायु, चित्र, वर्ण, व्याघ्र , मृग आदि आदि वे तमाम शब्द या नाम जिनके द्वारा हम जीवन की समस्त गतिविधियों को सुचारु रूप से क्रियान्वित कर पाते हैं । उदाहरण के लिये " दूध " शब्द को ले लीजिये । अब सोचें कि दूध को दूध ही क्यों कहा जाता है ? तो जब आप इसका शब्द शोधन करोगे । तो आपको पता चलेगा कि दूध को दुग्ध या पय आदि भी कहा जाता है । जैसे ये भी पता चल सकता है कि बहुप्रचलित दही शब्द वास्तव में कोई शब्द ही नहीं है । बल्कि दधि

से बिगङकर दही हुआ है । इस तरह खोजते खोजते जब आप किसी वस्तु के यथार्थ नाम ( शब्द मूल ) तक पहुँच जाते हैं । यानी वास्तव में जो उसका शुद्ध और मूल ( जङ या उत्पत्ति ) नाम रहा है । तब आपके सामने फ़िर एक समस्या उत्पन्न हो जाती है । जैसे ठीक है कि दूध का शुद्ध और मूल दुग्ध ही है । मगर दुग्ध भी क्यों है ? तब जाहिर सी बात है कि आप दुग्ध की ही चीरफ़ाङ ( सन्धि विच्छेद । पोस्टमार्टम या आंतरिक तकनीक जानना ) करोगे । और जब आपने दुग्ध को भी विच्छेद किया । तो द + उ + ग + ध ये बना । ध्यान रहे । मैं अभी ये सब मोटे तौर पर ही कह रहा हूँ । क्योंकि जब आप द या ध को भी विच्छेद करोगे । तो वो आधा द‌‍ ( मतलब हलन्त लगा ) + अ होगा । और ध + अ होगा । अब दुग्ध के रासायनिक परीक्षण ( रस या धातु ) में आपको द + उ + ग + ध घटक कृमशः मिले हुये प्राप्त हुये । ( ध्यान दें । आप इनको किसी और कृम जैसे ग + ध + उ + द में नहीं जोङ सकते । नहीं तो दुग्ध की जगह कोई और ही पदार्थ बन जायेगा । )

फ़िर आपको पता चला कि दुग्ध में तो - लोहा कैल्शियम प्रोटीन वसा आदि तमाम रस धातु मिली हुयी हैं । तब जाकर इस एक तरल पदार्थ का निर्माण हुआ । अब आप दुग्ध और दधि को तो भूल गये । और द + उ + ग + ध के चक्कर ( घनचक्कर ) में उलझ गये । आपने सोचा कि द उ ग ध अक्षरों में ऐसा क्या और क्यों है ? जो दुग्ध बन जाता है । तब आप द उ आदि अक्षरों का मूल खोजोगे कि ये क्या हैं ? और इनकी उत्पत्ति कहाँ से हो रही है । तब आप पाओगे । किसी अज्ञात चेतना से उसी के ( या किसी के ) शाश्वत नियम अनुसार । एक संकुचन द्वारा । ( इच्छा ) वायु उत्पन्न होकर । कंपन के द्वारा तरंग में । और तरंग से गति में रूपान्तरित होकर जब विभिन्न अवयवों से संयोग कर इच्छानुसार क्रिया करती है । तब उसी से सृष्टि के तमाम पदार्थों की उत्पत्ति हो रही है । नहीं समझे । जैसे आपने क अक्षर का स्पष्ट दोष रहित उच्चारण किया । तो चेतना की इच्छा । फ़िर वायु । फ़िर कंपन । फ़िर तरंग और फ़िर इसका निश्चित तंत्र से गुजरकर यंत्र में बदलना । पूरी अखिल सृष्टि मौटे तौर पर इसी चेतना > ऊर्जा > गति > आकर्षण के सिद्धांत पर कार्य करती है । लेकिन अभी मैं इसके सूक्ष्म कारणों सिद्धांत आदि में नहीं जाऊँगा । क्योंकि इससे पहले स्थूल रूप से आपको अक्षर ( पदार्थ या दूसरे भाव में स्थिति ) के बारे में जानना होगा । 

मैंने कई बार आपको कहा है कि र अक्षर और गति एक ही बात है । क्योंकि इसमें दौङना धातु ( या क्रिया ) निहित है । सबसे पहले ये देखिये कि हिन्दी लेखन में सिर्फ़ र ही वह अक्षर है । जो प्रत्येक अक्षर के आगे पीछे ऊपर नीचे दायें बायें सर्वत्र गति कर सकता है । देखें - सूर्य । पत्र । चक्र । ट्रक । श्रम । वृत । और इसके बाद बिन्दी है । बिन्दी या बिन्दु कंपन है । क्योंकि इसमें न की ध्वनि होती है । जैसे टन्न की ध्वनि का हम किसी मशीन द्वारा ग्राफ़ देखें । तो इसमें स्फ़ोट के घात अनुसार पहले दूर दूर और फ़िर कृमशः पास होते ( गतिज ) बिन्दु नजर आयेंगे । र स्थूल गति का सिद्धांत है । और बिन्दी ( ध्वनि से उत्पन्न कंपन ) सूक्ष्म ( मन की गति ) गति का सिद्धांत है । इसके बाद सिर्फ़ प्रकाश ( मन से भी तेज । चेतना की स्थिति अनुसार इच्छित लक्ष्य पर लगभग तुरन्त ही ) की गति का सिद्धांत है । लेकिन अभी हम र यानी स्थूल गति के रहस्य की ही बात करेंगे । अक्सर आपने सुना पढा होगा कि - चिङिया फ़ुर्र से उङ गयी । गाङी सर्र से निकल गयी । ऐसा इसलिये कहते हैं । क्योंकि इनकी गति में ऐसी ही ध्वनि होती है । अब आप फ़िर वही बात देखें कि र का मुख उच्चारण पूरी वर्णमाला में सबसे अलग गतिमान तरीके से होता है । किसी भी अन्य अक्षर के उच्चारण में ऐसी क्रिया नहीं होती । सिर्फ़ ल का इससे मिलता मगर तकनीकी भिन्नता लिये होता है । अब आप हुर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रऽऽऽऽऽऽऽऽ ( हुर्र या भुर्र ) शब्द का उसी तरह उच्चारण करें । जैसे ग्रामीण बच्चे प्रायः कल्पित गाङी चलाने की कल्पना करते हुये भागते समय करते हैं । आप पायेंगे कि आपके मुँह के अन्दर कोई चक्र या पंखा सा तेजी से घूमने लगा । लेकिन यदि आप हुल्ल्ल शब्द का उच्चारण करेंगे । तो ऐसा नहीं होगा । मेरी जानकारी में हिन्दी वर्णमाला को छोङकर आपको विश्व की किसी वर्णमाला में यह चमत्कार या शाश्वत सिद्धांत नहीं मिलेगा । और हिन्दी वर्णमाला के किसी भी अन्य अक्षर या द्वि त्रय आदि अक्षर संयोजन से भी ऐसी गतिज क्रिया नहीं बनेगी । सिवाय छुक छुक अक्षर संयोजन के । ध्यान रहे । यदि आप पुक पुक या फ़ुक फ़ुक या हुप हुप जैसा संयोजन करेंगे । तो गति तो होगी । मगर वैसी ही । जैसे कोई वस्तु एक निश्चित और बहुत सीमित दायरे में ऊपर नीचे गतिमान है । और छुक छुक में भी एक निश्चित बंधी हुयी गति ही है ।
अब आप विशेष गौर करें कि यदि आप सिर्फ़ र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र का उच्चारण करते हैं । तो यह संभव नहीं । इससे पहले आपको इसे किसी माध्यम ( यन्त्र ) जैसे हु या भु या कोई भी अन्य अक्षर आधार के साथ जोङना ही होगा । अन्यथा गति कहाँ से और कितनी उत्पन्न हुयी । और किस चेतना स्रोत से जुङी है । क्या उपयोग होगा । ये सभी समीकरण गङबङा जायेंगे । क्योंकि मैंने र को स्थूल गति कहा है । रमने वाला ।
तो अब आप समझे कि आपके शरीर में र अक्षर जिस स्थान से उत्पन्न होकर और जिस क्रिया ( तंत्र ) से गुजरकर एक गतिमान प्रवाह या यांत्रिक ऊर्जा जैसी स्थितियों में परिवर्तित होता है । ठीक यही स्थूल गति का सिद्धांत किसी वाहन वायुयान या जीवधारियों आदि में होता है । अतः सिर्फ़ हिन्दी वर्णमाला ही ऐसी है । जिसमें चेतना > ऊर्जा > गति > आकर्षण = पदार्थ ( और इनको मिलाकर बनती है सृष्टि ) इन सभी का मूल रहस्य समाहित है । और आपको हैरानी होगी । इस सबको जानना एकदम सरल है । बस आपको चाहिये होगा - एक छोटी सी हिन्दी व्याकरण की किताब । संस्कृत हिन्दी शब्दकोष । और फ़िर स्वयं अक्षरों के विभिन्न उच्चारण आदि प्रयोग द्वारा उसके मूल को जानना । और सबसे जरूरी - राजीव बाबा । इन चार का संयोजन होते ही आप सृष्टि रहस्य और फ़िर स्वयं के रहस्य को जानने की सरल सहज यात्रा पर जा सकते हैं । 
फ़िलहाल गृहकार्य में आप अ आ से क्ष त्र ज्ञ तक का सही तरीके से बारबार उच्चारण करें । और देखें कि उच्चारण में क्या और किस तरह से क्रिया होती है । और उसका परिणाम ( पदार्थ ) क्या होता है ?
और ये भी देखिये - य र ल व ये चार अंतःस्थ व्यंजन होते हैं । इनके उच्चारण में वायु मुख के किसी भाग को पूरी तरह स्पर्श नहीं करती । 
- श ष स ह ये चार ऊष्म व्यंजन होते हैं । इनके उच्चारण में वायु मुख के विभिन्न भागों से टकराकर ऊष्मा ( गर्मी या ताप ) पैदा करती है ।
- ङ और ढ ये दो अतिरिक्त व्यंजन हैं । इनके उच्चारण में वायु जीभ से टकराकर चापस आती है । और फ़िर बाहर निकलती है । इनसे कोई शब्द शुरू नहीं होता ।
विशेष - समय का अभाव और बीच बीच में व्यवधान । ये अक्सर मुझे वह नहीं कहने देते । जो मैं कहना चाहता हूँ ।
आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्म प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

आत्महत्या कोई कर ही नहीं सकता

मरौ वे जोगी मरौ ! ऐसा अदभुत वचन है । कहते हैं - मर जाओ । मिट जाओ । बिलकुल मिट जाओ । मरौ वे जोगी मरौ मरौ मरन है मीठा ?
क्योंकि मृत्यु से ज्यादा मीठी और कोई चीज इस जगत में नहीं है ।
तिस मरणी मरौ...और ऐसी मृत्यु मरो । जिस मरणी गोरष मरि दीठा ।
जिस तरह से मरकर गोरख को दर्शन उपलब्ध हुआ । ऐसे ही तुम भी मर जाओ । और दर्शन को उपलब्ध हो जाओ ।
एक मृत्यु है । जिससे हम परिचित हैं । जिसमें देह मरती है । मगर हमारा अहंकार और हमारा मन जीवित रह जाता है । वही अहंकार नये गर्भ लेता है । वही अहंकार नयी वासनाओं से पीड़ित हुआ फिर यात्रा पर निकल जाता है । एक देह से छूटा नहीं कि दूसरी देह के लिये आतुर हो जाता है । तो यह मृत्यु तो वास्तविक मृत्यु नहीं है ।
मैंने सुना है । एक आदमी ने गोरख से कहा कि मैं आत्महत्या करने की सोच रहा हूं । गोरख ने कहा - जाओ और करो । मैं तुमसे कहता हूं । तुम करके बहुत चौंकोगे ।
उस आदमी ने कहा - मतलब ? मैं आया था कि आप समझायेंगे कि मत करो । मैं और साधुओं के पास भी गया । सभी ने समझाया कि भाई, ऐसा मत करो । आत्महत्या बड़ा पाप है ।
गोरख ने कहा - पागल हुए हो । आत्महत्या कोई कर ही नहीं सकता । कोई मर ही नहीं सकता । मरना संभव नहीं है । मैं तुमसे कहे देता हूं - करो । करके बहुत चौंकोगे । करके पाओगे कि अरे, देह तो छूट गयी । मैं तो वैसा का वैसा हूं । और अगर असली आत्महत्या करनी हो । तो फिर मेरे पास रुक जाओ । छोटा मोटा खेल करना हो । तो तुम्हारी मर्जी । कूद जाओ किसी पहाड़ी से । लगा लो गर्दन में फांसी । असली मरना हो । तो रुक जाओ मेरे पास । मैं तुम्हें वह कला दूंगा । जिससे महामृत्यु घटती है । फिर दुबारा आना न हो सकेगा । लेकिन वह महामृत्यु भी सिर्फ हमें महामृत्यु मालूम होती है । इसलिए उसको मीठा कह रहे हैं ।
मरौ वे जोगी मरौ । मरौ मरन है मीठा ।
तिस मरणी मरौ । जिस मरणी गोरष मरि दीठा ।
ऐसी मृत्यु तुम्हें सिखाता हूं । गोरख कहते हैं - जिस मृत्यु से गुजर कर मैं जागा । सोने की मृत्यु हुई है । मेरी नहीं । अहंकार मरा । मैं नहीं । द्वैत मरा । मैं नहीं । द्वैत मरा । तो अद्वैत का जन्म हुआ । समय मरा । तो शाश्वतता मिली । वह जो क्षुद्र सीमित जीवन था । टूटा । तो बूंद सागर हो गयी । निश्चित ही जब बूंद सागर में गिरती है । तो 1 अर्थ में मर जाती है । बूंद की तरह मर जाती है । और 1 अर्थ में पहली बार महाजीवन उपलब्ध होता है - सागर की भांति जीती है ।
रहीम का वचन है -
बिंदु भी सिंधु समान, को अचरज कासों कहें ।
हेरनहार हैरान, रहिमन अपने आपने ।
रहीम कहते हैं - बिंदु भी सिंधु के समान है । को अचरज कासों कहें । किससे कहें । कौन मानेगा । बात इतनी विस्मयकारी है । कौन स्वीकार करेगा कि बिंदु और सिंधु के समान है कि बूंद सागर है कि अणु में परमात्मा विराजमान है कि क्षुद्र यहां कुछ भी नहीं है कि सभी में विराट समाविष्ट है ।
बिंदु भी सिंधु समान, को अचरज कासों कहें ।
ऐसे अचरज की बात है । किसी से कहो । कोई मानता नहीं । अचरज की बात ऐसी है । जब पहली दफा खुद भी जाना था । तो मानने का मन न हुआ था - हेरनहार हैरान ।
जब पहली दफा खुद देखा था । तो मैं खुद ही हैरान रह गया था । हेरनहार हैरान । रहिमन अपने आपने ।
देखता था खुद को । और हैरान होता था । क्योंकि मैंने तो सदा यही जाना था कि क्षुद्र हूं । लेकिन स्वयं का विराट तभी अनुभव में आता है । जब क्षुद्र की सीमाएं कोई तोड़ देता है । क्षुद्र का अतिक्रमण करता है जब कोई ।
अहंकार होकर तुमने कुछ कमाया नहीं । गंवाया है । अहंकार निर्मित करके तुमने कुछ पाया नहीं । सब खोया है । बूंद रह गये हो । बड़ी छोटी बूंद रह गये हो । जितने अकड़ते हो । उतने छोटे होते जाते हो ।
अकड़ना और और अहंकार को मजबूत करता है । जितने गलोगे । उतने बड़े हो जाओगे । जितने पिघलोगे । उतने बड़े हो जाओगे । अगर बिलकुल पिघल जाओ । वाष्पीभूत हो जाओ । तो सारा आकाश तुम्हारा है । गिरो सागर में तो तुम सागर हो जाओ । उठो आकाश में वाष्पीभूत होकर । तो तुम आकाश हो जाओ । तुम्हारा होना । और परमात्मा का होना 1 ही है ।
बिंदु भी सिंधु समान, को अचरज कासों कहें ।
लेकिन जब पहली दफे तुम्हें भी अनुभव होगा । तुम भी एकदम गूंगे हो जाओगे । गूंगे केरी सरकस. अनुभव तो होने लगेगा । स्वाद तो आने लगेगा । अमृत तो भीतर झरने लगेगा कंठ में । मगर कहने के लिये शब्द न मिलेंगे । को अचरज कासों कहें ! कैसे कहें बात इतने अचरज की है ? जिन्होंने हिम्मत करके कहा - अहं ब्रह्मास्मि । सोचते हो । कोई मानता है ?
मंसूर ने कहा - अनलहक ! मैं परमात्मा हूं । सूली पर चढ़ा दिया लोगों ने । जीसस को मार डाला । क्योंकि जीसस ने यह कहा कि वह जो आकाश में है - मेरा पिता और मैं । हम दोनों 1 ही हैं । पिता और बेटा 2 नहीं हैं । यहूदी क्षमा न कर सके । जब भी किसी ने घोषणा की है भगवत्ता की । तभी लोग क्षमा नहीं कर सके । बात ही ऐसी है । को अचरज कासों कहें । किससे कहने जाओ ? जिससे कहोगे । वही इनकार करने लगेगा । ओशो

30 अगस्त 2013

मेरा पढाई में मन नहीं लगता है

राजीव जी ! सादर प्रणाम । मैं आपके ब्लॉग का काफी समय से एक मूक पाठक हूँ । निस्संदेह ज्ञान का सागर है । ऐसे ब्लॉग को लिखने के लिये आप प्रशंसा और आदर के पात्र हैं । मेरा नमन स्वीकार करें । एक निवेदन है - द्वैत और अद्वैत की विवेचना कर मेरे जैसे अज्ञानी पाठकों पर उपकार करें । आपका लक्ष्मण सिंह
उत्तर - मैं आपके प्रश्न का ( सही ) आशय नहीं समझा । अद्वैत शब्द का मतलब किसी भी चीज के सिर्फ़ एक पक्ष से है । जैसे सुख हो । पर दुख न हो । प्रकाश हो । पर अंधेरा न हो । अतः अद्वैत ( ज्ञान ) में परमात्मा ( या परमात्म सृष्टि या हँस जीव या मुक्त आत्मायें या अति महा शक्तियां या कहिये आत्मा की बेहद उच्च स्थितियां हैं ) और वहाँ के हँसों के लोक दीप आदि आते हैं । यह सभी कुछ जीवन मरण से परे है । दैहिक दैविक भौतिक से भी परे है । यहाँ का जीवन प्रकाश भोजन आदि सभी कुछ सिर्फ़ " अदभुत " ही कहा जा सकता है । यही प्रत्येक जीवात्मा का असली घर है । क्योंकि जीवात्मा अमर है । और अमृत ही उसका भोजन है । मन के पार जाने की योग  क्रिया द्वारा इसका न सिर्फ़ बोध होता है । बल्कि इसकी प्राप्ति भी होती है । मगर इसकी चाभी ( या ज्ञान ) सिर्फ़ सच्चे सन्तों के पास होता है । खास बात यह है कि - इस ज्ञान में ज्ञान योग प्रधान होता है । यानी कर्म योग की महत्ता नहीं है ।
द्वैत - शब्द का मतलब ही किसी भी भाव के दो पक्षों से है । जैसे - जीवन फ़िर मरण । रात फ़िर दिन । सुख फ़िर दुख । अतः द्वैत में कर्म प्रधान होता है । इसमें सिर्फ़ कर्म का ही ज्ञान हो पाता है । स्थिति का ही ज्ञान हो पाता है । स्थिति और उपाधि से परे निरुपाधि का ज्ञान नहीं होता । अतः इसमें किसी भी परिस्थिति से मुक्ति होती है । जबकि अद्वैत ज्ञानी हर स्थिति परिस्थिति से मुक्त होता है ।
फ़िर भी आप द्वैत अद्वैत के किस पक्ष को जानना चाहते हैं । उस पर अपने भाव लिखें । मैं आपकी जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने की कोशिश करूँगा ।
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सर ! कृपया एक और समाधान करें - मैं एक 12 वीं का विद्यार्थी हूँ । मैं हमेशा 5-6 घण्टे पढने का प्रयास करता हूँ । पर पता नहीं । क्या कारण है कि मैं चाहकर भी पढ नहीं पाता हूँ । और मेरा मन एकाग्रचित नहीं रह पाता । जब मैं पढने बैठता हूँ । तो मेरा मन पता नहीं किधर चला जाता है । और मैं भूल जाता हूँ कि मैं पढ रहा हूँ । जब दोबारा ध्यान आता है कि मैं पढ रहा हूँ । उसके बाद तो मन में बेचेनी सी होती है । और 1 मिनट भी पढाई में मन नहीं लगता है । फिर मैंने आपसे सलाह लेने का निश्चय किया । मुझे आपसे बङी उम्मीद है कि आप इसका हल जरूर देंगे । ( फ़ेसबुक पर एक मैसेज । नाम खोलना मुझे उचित नहीं लगा )
उत्तर - आप इन चार शब्दों ( वास्तव में मूल मंत्रों ) पर विशेष ध्यान दें । ये चार जीवन में प्रत्येक क्षण हैं - रुचि । खतरा । केन्द्रीयकरण या केन्द्रित होना । और फ़िर सन्तुलन ।
अब इनको समझें । आप बिना रुचि के कोई कार्य नहीं कर सकते । और कार्य में रुचि तभी होगी । जब आपको कार्य के परिणाम ( फ़ल ) का सही ज्ञान होगा । मतलब कार्य करने से हमें क्या प्राप्त होगा । और कार्य न करने पर हम किस चीज से वंचित रहेंगे । लेकिन अगर सिर्फ़ यही बात भी होती । तो भी आवश्यक नहीं कि किसी भी कार्य में हमारा पूर्ण रुझान हो ही जाता । तब बात आती है - खतरे की । मतलब यदि हम कुछ आवश्यक कार्यों में लापरवाही करें । या बिलकुल न करें । तो भविष्य में उसके गम्भीर परिणाम क्या होंगे ?
इस सम्बन्ध में एक बहुत ही रोचक दृष्टांत है । एक साधु के बारे में प्रसिद्ध था कि - वह लोगों का भविष्य बता देता है । तब एक आदमी उसके पास गया । और बोला - मैं इस बात को लेकर हैरान हूँ कि आप कभी कोई गलत बात ( या कार्य )  नहीं करते । दूसरे लोग जिस तरह के फ़ालतू लङाई झगङे या समय की बर्बादी वाले अन्य कार्य करते हैं । वह भी आप नहीं करते । और बङे सार्थक तरीके से जैसे पूरी सतर्कता से जीवन यापन कर रहे हैं ।
तब वह साधु व्यक्ति बोला - वह सब छोङो । मुझे अभी अभी एक अजीब बात पता हो रही कि - तुम सात दिन के अन्दर मर जाने वाले हो । अतः जाओ । अपने परिवार के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार करो । और मनचाहा खाओ पियो । सात दिन अपनी जिन्दगी भरपूर रूप से जियो ।
उस व्यक्ति को जैसे लकवा मार गया । वह घर चला आया । और किसी को बिना कुछ बताये चुपचाप लेट गया । सातवें दिन वह साधु उस व्यक्ति के पास पहुँचा । और बोला - मैं जानने आया हूँ । ये सात दिन तुमने कैसे बिताये । तब वह व्यक्ति बोला - कैसे बिताता । तबसे हर क्षण मुझे मौत ही नजर आती रही । अतः और व्यर्थ की चीजें मैं सोच ही नहीं पाया ।
वह साधु बोला - बस ठीक है । मैंने तुमसे झूठ कहा था । तुम अभी मरने वाले नहीं हो । अब तुम्हें समझ में आया । मुझे ये अच्छी तरह पता है कि यदि मैंने जीवन व्यर्थ में गंवा दिया । तो अन्त में उसका परिणाम क्या होगा ? और व्यर्थ में मैं जो भी गलत करूँगा । उसका भी परिणाम क्या होगा ? इसीलिये मैं फ़ालतू चीजों के बारे में सोच भी नहीं पाता । क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ । जीवन कब समाप्त हो जायेगा । इसका किसको पता है ?
तो जब हम ऐसे खतरों के प्रति जागरूक हो जाते हैं । तो हम सार्थक लक्ष्यों की तरफ़ स्वतः केन्द्रित हो जाते हैं । या कृमशः होने लगते हैं । और तब जीवन केक प्रत्येक कार्य में हमारा अदभुत सन्तुलन हो जाता है । आपको आश्चर्य होगा । इसी सन्तुलन को बुद्ध महावीर या तमाम योगियों ने समता कहा है ।
जहाँ तक पढाई से अरुचि या मन हटने की बात है । सीधी सी बात है कि आप उसको ग्रहण नहीं कर पा रहे । उसमें जो रस है । वह आपसे नहीं निकल रहा । जबकि मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि किसी भी अध्ययन में उसका एक विशेष रस है । बस आपको उसका मूल , तरीका , ध्येय , प्राप्ति जैसे बिन्दुओं को जानना होगा ।
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मांसाहारी जानवर तो मांस पर ही निर्भर होते है । क्या मांसाहारी जानवरों का मांस खाना भी पाप है ? दीपक
उत्तर - आपने देखा होगा कि जब तक कोई अपराधी कानून के शिकंजे में नहीं फ़ँसता । तब तक वह सही गलत ( का संविधान ) बङे मनमाने ढंग से बताता है । जैसे - अरे कुछ नहीं होता । कोई भगवान नहीं है । भगवान भी पापियों का साथ अधिक देता है । खुद देख लो पापी मौज कर रहे हैं । महंगाई भृष्टाचार इतना है कि आदमी नम्बर दो का काम न करे । तो मर ही जाये ।
ऐसे ही माँसाहारियों के कुछ कुतर्क देखिये - अगर इनको खाया नहीं जायेगा । तो इनकी संख्या कितनी हो जायेगी । भारतीय धर्म ग्रन्थों में भी भगवान जैसे चरित्रों ने शिकार आदि किये । कोई हम अकेले ही थोङे ही खाते हैं । एक हम नहीं खायेंगे । उससे क्या अन्तर आ जायेगा ।
लेकिन ये सिर्फ़ मन को समझाना भर है । सच्चाई नहीं है ।
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जिस लडकी ने आसाराम बापू पर आरोप लगाए थे । उस लडकी की सहेली ने मीडिया के सामने उससे हुई बातचीत के बारे में बताया । और आरोप का खण्डन किया । आप भी देखिए ।
http://www.youtube.com/watch?v=oyeWUJpz5SA

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बलात्कार तो ईसाईयों के पादरी भी करते हैं । कभी इतनी लम्बी कवरेज देखी । किसी ने भारतीय दलाल मीडिया के परदे पर ??
http://www.youtube.com/watch?v=Nc5bXVVcbts&feature=youtu.be
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इस पोस्ट को वायरस की तरह फैला दीजिए l  तभी देश का भविष्य बचने की कोई उम्मीद है l  नहीं तो एक समय ऐसा आएगा । जब आपका सारा बैंक बैलेंस जिम्बावे देश के लोगों की तरह जीरो हो जाएगा l या नोटों की गड्डी तो बहुत होगी । लेकिन उसके बदले में सामान कुछ नहीं मिलेगा l

पहली पोस्ट https://www.facebook.com/photo.php?fbid=380596492068551&set=a.123905557737647.17980.100003546114467&type=1&theater

दूसरी पोस्ट https://www.facebook.com/notes/siddharth-bharodiya/रुपया-गीरा-या-जनता-का-नसीब-/232067490279453
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अर्ज़ किया है - मत निकालो मेरा जनाज़ा उसकी गली से यारों । वर्ना उसकी माँ कहेगी कि - कमीना मरते मरते भी एक राउंड लगा गया ।
साभार शान फ़ेसबुक पेज से

अभी और भी है ।

28 अगस्त 2013

मांस खाना निश्चय ही घोर पाप है

Rajiv  ji aap ko mera anant koti koti pranam, maine aap ko ek sawal kiya tha . uska jawab mujhko mila . is liye  dhanyawad . rajeev ji pahle mai aap ko mera parichay deta hun . mera nam nitin hai . mai maharastra me rahata hun . 15 th art pad raha hun . meri age 22 sal hai . 
ek din aise hi net per baitha hua tha . our kuchh  tantra mantra ki website search kar raha tha . tab achanak aap ki site mili . tab maine aap ke 2 lekh padhe . mujhe bahut pasand aye .  tab se maine abi tak aap ke bahut lekh padhe hai . our mujh jaise agyani ko kuchh gyan mila hai .  mujhe aap ki site bahut pasand aayi hai. Rajeev ji mai aap ko kuchh sawal karunga . asha hai aap mere sawal ka jawab jaldi denge.

Q 1 -  rajeev ji mai hans diksha le sakta hun kya ?  agar le sakta hun . to mujhe maharasta me diksha milegi . ya aap ke ashram me aakar leni hogi . kyon ki mai itani dur tak nahi aa sakta . aur ghar wale bhi nahi chhodenge .

- विश्व का कोई भी व्यक्ति चाहे वो किसी भी जाति धर्म समुदाय आदि से हो । हँस दीक्षा ले सकता है । क्योंकि ये सभी इंसानों के लिये ही है । ये परमात्मा की भक्ति है । न कि किसी विशेष जाति धर्म की । और सभी धर्म एक बात निश्चय ही स्वीकार करते हैं कि - सबका मालिक 1 ही है ।
देखें - सबहि सुलभ सब दिन सब देशा । सेवत सादर शमन कलेशा । महाराष्ट्र में आपको दीक्षा नहीं मिल सकती है । बल्कि आपको चिन्ताहरण आश्रम में या दिल्ली में ही दीक्षा मिलेगी ।
जहाँ तक आने जाने का प्रश्न है । प्यासा ही कुंये के पास जाता है । कुंआ नहीं । इसलिये ज्ञान के लिये आपको कुछ उपाय तो करना ही होगा । अभी आप इतनी दूर ( महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश ) नहीं आ सकते । पर मृत्यु उपरांत जीव को भयंकर यमदूतों के साथ कैदी रूप में रोते बिलखते हुये बेहद लम्बी कष्ट युक्त यात्रा करनी होती है । तब क्या और कैसे होगा ? और तब किसी भी जीव के घरवाले भी उसे तुरन्त छोङ देते हैं । देखें - दुनियां में है दो दिन का मेला जुङा । हँस जब भी उङा तब अकेला उङा ।

Q 2 - Kya diksha lene ke baad hum apane ghar per he sadhna kar sakate hain  ? kya hame aashram aana padega ? our diksha lene ke baad hume kaun se niyamon ka palan karana hoga.
- क्योंकि ये परमात्मा की भक्ति है । और वही सबका एकमात्र पिता है । अतः इस सुमिरन में कोई भी ढोंग पाखंड प्रपंच नही है । आप चलते फ़िरते उठते बैठते सोते जागते कहीं भी इस सुमिरन को आसानी से कर सकते हैं । देखें - भाव कुभाव अनख आलस हू । नाम जपत मंगल सब दिस हू । क्योंकि इसमें आपके शरीर में होते अजपा नाम ( महामंत्र ) को जाग्रत किया जाता है । जिस पर बस ध्यान देना होता है । मुँह से कुछ बोलना आदि नहीं होता । एक बार नामदान मिलने के बाद आश्रम आने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है । लेकिन आपके भाग्यवश शुभ संस्कार उदय हो जायें । और ऐसे हालात बने कि आश्रम आकर आपको गुरु दर्शन का अवसर बने । तो आप एक बार नहीं । हजार बार आ सकते हैं । एक रहस्य की बात है कि जब आप गुरु से सच्चे ह्रदय से प्रार्थना करते हैं कि - हे गुरुदेव ऐसी कृपा करें कि मैं आपके दर्शन और नामदान ले सकूँ । तो कुदरती रूप से ऐसी परस्थितियां बन जाती हैं कि सभी रुकावटें दूर हो जाती हैं । अतः इस बारे में कोई चिन्ता करने की आवश्यकता ही नहीं है । बस एक बार प्रार्थना करके देखें । हमारे यहाँ कोई नियम नहीं है । बस आप अधिक से अधिक सुमरन करें । ये ज्ञान आपका आचरण और आंतरिक शुद्धता में परिवर्तन स्वयं ही करता है । अतः अच्छे नियम आदि स्वतः ही आपके व्यवहार में आ जाते हैं । हम कोई नियम जबरन नहीं लादते ।

Q 3 - rajeev ji mai abhi bhagwan shankar ki puja aur naam jap karta hun . per mera koi guru nahi hai . kya bina guru ki aisi puja path karna sahi hai. Maine aap ke kisi lekh me pada tha ki shiv shakti kalyankari  shakti hai . kya shiv shakti hume parmatma se mila sakati hai.
- लगभग पूरे विश्व के सभी धर्मों में ही इसी तरह की मनमुखी पूजा का प्रचलन है कि - खुद को जो ठीक लगे । वही सही मान लिया जाता है । सब भगवान देखेगा । ऐसा सोचकर । पर यह एकदम गलत है । आप कल्पना करो कि आप टीवी के सामने बैठकर उसको अगरबत्ती फ़ूल प्रसाद आदि चढाकर कहो - टीवी शुरू हो जा । हमें ये समाचार दिखा । वो फ़िल्म कार्यकृम दिखा आदि । तो क्या वो करेगा ? अब भगवान शंकर कौन क्या है । उनका मंत्र क्या है ? पूजा क्या है ? ये सब जाने बिना किसी से पढ सुनकर खुद निर्णय लेना उचित नहीं है । क्योंकि ये कोई सिद्ध सांसारिक चीज नहीं है । जैसे दूध से दही जमना । बिना गुरु के ऐसी पूजा करना न उचित ही है । न अनुचित ही । क्योंकि ये निरर्थक कार्य की तरह है । इससे सिर्फ़ भाव अच्छा होता है । जिससे आगे के लिये जिज्ञासा और मार्ग बनता है । 
शिव शक्ति कल्याणकारी शक्ति है । पर शंकर से शिव का क्या मतलब ? वो ( इनके तुलनात्मक ) कल्पनातीत महाशक्ति है । शंकर जैसे उनके यहाँ पानी भरने का कार्य करते हैं । मतलब शिव बहुत अलग हैं । और शंकर बहुत अलग । शिवोह्म - यानी सर्वात्मा । और शंकर तमोगुण का प्रतिनिधि एक अत्यन्त छोटा देवता । शिव शक्ति हो । या अन्य कोई भी बङी से बङी शक्ति आपको परमात्मा से कोई नहीं मिला सकता । सिवाय आपके । और इसके लिये समर्थ गुरु की शरण में जाना होता है । देखें - सन्त मिलें तो मैं मिल जाऊँ सन्त न मोते न्यारे । बिना सन्त के ना मिल पाऊँ कोटि जतन कर डारो । मोर वचन चाहे पङ जाय फ़ीका । सन्त वचन पत्थर की लीका ।
Q  4 - Hamare pure world me hans dikshit log kitane hain ? aur kitane logon  ko aatm gyan hua hai ?
- आत्मज्ञान दुर्लभ ज्ञान की श्रेणी में आता है । और संसार में द्वैत पूजा का प्रचलन अधिक होता है । अतः बहुत कम लोग इस ज्ञान को जानते हैं । और सबसे बङी बात इस ज्ञान के सच्चे सन्त बहुत ही कम मिलते हैं । यह सिर्फ़ जीव की अत्यन्त भाव पूर्ण प्रार्थना से ही सम्भव है । पूरा आत्म ज्ञान गिने चुने लोगों को ही हो पाता है । इसीलिये इसके लिये बिरला शब्द का प्रयोग किया जाता है । देखें - कोटि नाम संसार में तिन से मुक्ति न होय । आदि नाम जो गुप्त है बूझे बिरला कोय ।
Q 5 - Hans diksha lene ke baad hume aatm gyan kitane dino me hota hai.
- इसमें यदि साधक धैर्य से चलता रहे । तो साधारणतः चार जन्म लगते हैं । जैसे मान लो किसी की इसी जन्म में शुरूआत हुयी । तो तीन जन्म और लेना होगा । लेकिन कोई पहले ही दो जन्म से यात्रा करता आया है । तो उसकी यात्रा बीच से शुरू हो जायेगी । और आगामी दो जन्म में समाप्त हो जायेगी । इसके अतिरिक्त परिस्थितियों गुरु कृपा और ऊँच नीच संस्कारों का भी फ़र्क पङता है ।
Q 6 - Rajeev ji humara jeev kisne tayyar kiya hai . koi to hoga . humare jeev ko banane wala.
- वास्तव में तुम्हारा जीव किसी और ने नहीं । स्वयं तुमने ही तैयार किया है । क्योंकि और कोई दूसरा है ही नहीं । तुम्हारी कोई इच्छा चाह ही तुम्हारे जीवन का बीज बन जाती है । और तुम आत्मा से जीवात्मा बन जाते हो । दिव्य भोगों की चाह होने पर उस संस्कार बीज से दिव्यात्मा बन जाते हो । जैसे अभी तुम बिजनेस मेन बनना चाहो । डाकू बनना चाहो । तो स्वयं तुम ही तो बनते हो ।
Q 7 -  sharab pina, mans khana, bhog karna kya ye paap hai  kya ?  agar ye  paap hai . to aghori sadhak our bhairvi sadhak sadhana ke samay iska use kyon  karate hai.
- शराब पीना पाप नहीं है । पर शराब के नशे में जो तमाम व्यभिचार शराबी से होते हैं । वो पाप का कारण ( बीज ) बन जाते हैं । मांस खाना निश्चय ही घोर पाप है । क्योंकि इससे मारे गये जीव को बेहद कष्ट से गुजरना होता है । और किसी को भी कष्ट पहुँचाना ही महापाप है । देखें - परहित सरस धर्म नहीं भाई । पर पीङा सम नहीं अधिकाई ।  बस ये सोच लो कि - ऐसे ही तुम्हें या तुम्हारे प्रिय को कोई काटे मारे भूने खाये । तो तुम्हें कैसा लगेगा ? व्यर्थ के भोग करना और रोगों को गले लगाना एक समान ही है । यह साधारण अनुभव से ही जाना जा सकता है । अघोरी साधक भैरव साधक अनपढ जाहिल और मूर्ख गंवार होते हैं । और मूर्खों के बारे में क्या कहा जाये ।
Bas rajeev ji aaj itana he . mere aise bahut sawal hai . fir aap ki seva me  aaunga . aur ek bar thanx rajeev ji.

मरने की कला सीखो

कल गुरुकुल कांगड़ी के भूतपूर्व उपकुलपति सत्यव्रत का आश्रम में आना हुआ । दर्शन उन्हें आश्रम दिखाने ले गयी । सत्यव्रत ने उपनिषद पर किताबें लिखी हैं । वेदों के ज्ञाता हैं । इस देश में कुछ थोड़े ही लोग वेद को इतनी गहराई से जानते होंगे । जैसा सत्यव्रत जानते हैं । उनके वक्तव्य, उनके विचार मैंने पढ़े हैं । मगर उनका भी प्रश्न दर्शन से यही था कि आप अपने गुरु को भगवान क्यों कहती हैं ? उनका भी । ऐसे हमारे पंडित में और अज्ञानी में जरा भी भेद नहीं है । दर्शन ने ठीक उत्तर दिया उन्हें । दर्शन ने कहा - भगवान तो आप भी हैं । मगर आपको इसका स्मरण नहीं है । और उन्हें स्मरण आ गया है । मुंहतोड़ जवाब था । 2 टूक जवाब था । और पंडित जब कोई इस आश्रम में आये । तो ध्यान रखना । ऐसा ही ठीक ठीक जवाब देना । उपनिषद पर किताबें लिखी हैं सत्यव्रत ने । जरूर " अहं ब्रह्मास्मि " शब्द के करीब आये होंगे । ऐसा कौन है । जो नहीं आया है । जरूर यह महावाक्य सोचा होगा । विचारा होगा - तत्वमसि श्वेतकेतु ! हे श्वेतकेतु, तू वही है । और इस पर विवेचन भी किया होगा । इस पर व्याख्यान भी दिये होंगे । लेकिन यह बात ऊपर ऊपर गुजर गयी । इससे तो सीधी साधी दर्शन में ज्यादा गहरी उतर गयी । यह पांडित्य ही रहा । थोथा, कचरे जैसा । इसका कोई मूल्य नहीं । 2 कौड़ी इसका मूल्य नहीं ।
उपनिषद कहते हैं - तुम वही हो । और उपनिषद कहते हैं - मैं ब्रह्म हूं । फिर भी तुम पूछे चले जा रहे हो कि क्यों किसी को भगवान कहें ? मैं तुमसे पूछता हूं । ऐसा कौन है । जिसको भगवान न कहें ?
रामकृष्ण से किसी ने पूछा - भगवान कहां है ? तो रामकृष्ण ने कहा - यह मत पूछो, यह पूछो कि कहां नहीं है ?
नानक को काबा के पुरोहितों ने कहा - पैर हटा लो काबा की तरफ से । शर्म नहीं आती । साधु होकर पवित्र मंदिर की तरफ पैर किये हो ?
नानक ने कहा - मेरे तुम पैर उस तरफ हटा दो । जिस तरफ पवित्र परमात्मा न हो । मैं क्या करूं । कहां पैर रखूं ? किसी तरफ तो पैर रखूंगा । लेकिन वह तो सब तरफ मौजूद है । सभी दिशाओं को उसी ने घेरा है । लेकिन मुझे चिंता नहीं होती । नानक ने कहा - क्योंकि वही बाहर है । वही भीतर है । उसका ही पत्थर है । उसके ही पैर हैं । मैं भी क्या करूं ? मैं बीच में कौन हूं ?
दर्शन ने ठीक कहा कि जाग जायेंगे । तो आपको भी पता चलेगा कि भगवान ही विराजमान है । इससे ही मैं चकित होता हूं कि जिनको हम तथाकथित ज्ञानी कहते हैं । और यही ज्ञानी लोगों को चलाते हैं ।
अंधा अंधा ठेलिया, दोनों कूप पड़त ।
बड़ी बड़ी उपाधियां हैं - सत्यव्रत सिद्धांतालकार ! सिद्धात के जानने वाले 
। सिद्धि के बिना कोई सिद्धांत को नहीं जानता । शास्त्र पढ़कर कोई सिद्धांत नहीं जाने जाते । स्वयं में उतरकर जाने जाते हैं ।
बिंदु भी सिंधु समान, को अचरज कासों कहें ।
हेरनहार हैरान, रहिमन अपने आपने ।
रहीम कहते हैं - अपने भीतर देखा । तो मैं खुद ही हैरान रह गया हूं चकित, अवाक । खुद ही भरोसा नहीं आ रहा है कि मैं और परमात्मा । यह जो उठ रही है वाणी भीतर से । अनलहक का नाद उठ रहा है । यह जो अहं ब्रह्मास्मि की गज आ रही है । यह जो ॐकार जग रहा है । मुझे ही भरोसा नहीं आता कि मैं, रहीम मैं, मेरे जैसा क्षुद्र, साधारण आदमी..मैं और भगवान । बिंदु भी सिंधु समान । अब मैं किससे कहूं । खुद ही भरोसा नहीं आता । तो किससे कहूं ?
इसका ही तुम्हें भरोसा दिलाने को यहां मैं बैठा हूं । यह भरोसा आ जाए  जो । समझना सत्संग हुआ । मेरे पास बैठ बैठ कर सिद्धात अलंकार मत बन जाना । सिद्ध बनो । इससे कम में कुछ भी न होगा । इससे कम का कोई मूल्य नहीं है । मरने की कला सीखो । मरो हे जोगी मरो । बूंद की तरह मरो । तो समुंदर की तरह हो जाओ । मृत्यु की कला ही महाजीवन को पाने की कला है । ओशो

26 अगस्त 2013

हनुमान चालीसा का रहस्य

आईये आज गोस्वामी तुलसीदास कृत " हनुमान चालीसा " के मूल रहस्य की बात करते हैं । क्योंकि इसको ( किसी साधारण कवि ने नहीं ) तुलसीदास ने लिखा है । और इसका योग साधना से गहरा सम्बन्ध है । इसमें जो मुख्य पात्र हनुमान है । उसका अर्थ ही ऐसे साधक या भक्त से है - जो पूर्णतया मान रहित होकर भक्त हो गया हो । मैंने कल के ( शंकर का धनुष तोङने वाले ) लेख में कहा था । आपको आध्यात्म में प्रत्येक पात्र का नाम विशेष अर्थ लिये मिलेगा । यही बात हनुमान पवन सुत आदि नाम में भी है । एक और बात भी है । ये विशेष प्रकार के भक्ति पद 40 दोहों में क्यों होते हैं ? मेरे विचार से - 5  तत्वों का शरीर + 5 ज्ञानेन्द्रियां + 5 कर्मेन्द्रियां + शरीर की 25 प्रकृतियां = 40 इसलिये ये इसी मनुष्य शरीर की ज्ञान अज्ञान भक्ति आदि का वर्णन है । तब आईये । हनुमान चालीसा का सही अर्थ समझने की कोशिश करें ।
श्री गुरु चरण सरोज रज । निज मनु मुकुर सुधारि ।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु । जो दायकु फल चारि ।
( श्री ) का अर्थ सम्पदा या ऐश्वर्य से है । ये जिसके भी आगे लगा है । उसके ऐश्वर्य का प्रतीक है । ये जिस अस्तित्व के साथ जुङा हो । उसके वैभव को दर्शाता है । अतः इसको हमेशा इसी अन्दाज में समझें ।
( गुरु ) शब्द में गु और रु दो अक्षर हैं । गु अंधकार और रु प्रकाश का द्योतक है । और संयुक्त गुरु शब्द ज्ञान का पर्याय है । यानी एक ऐसा अस्तित्व..जो आत्मा से जीवात्मा के बीच में ज्ञान अज्ञान और प्रकाश अंधकार का अंतर या बोध कराये । एक दूसरे भाव में गुरु को अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला भी कहते हैं । कुल मिलाकर बात एक ही है ।
( चरन सरोज रज ) अब यहाँ मैं सनातन धर्म जो आजकल हिन्दू धर्म के नाम से अधिक प्रचलित हो गया है पर एक विशेष बात कहना चाहूँगा । जो इस धर्म को सर्वोच्च और सबसे अलग खास श्रेणी में ले जाती है । देखिये - सिर्फ़ गुरु के चरण ( सरोज ) कमल ( रज..की ) धूल की ही बात कही गयी है । गुरु के पूर्ण अस्तित्व को तो 

छोङिये । अभी चरणों की भी बात नही है । अभी तो चरण रज में ही इतनी शक्ति है कि ( निज मनु मुकुर सुधारि ) मेरे ( भक्त के ) मन ( अंतःकरण ) रूपी दर्पण को स्वच्छ कर देती है ।
( बरनऊँ रघुबर बिमल जसु ) बरनउँ ( वर्णन करना ) चेतन पुरुष ( रघुवर ) विमल ( निर्विकारी ) जसु ( यश या प्रकाश )
( जो दायकु फल चारि ) यानी धर्म अर्थ काम मोक्ष । ये चार फ़ल देने वाला है । सिर्फ़ धूल में ये ताकत है कि धर्म ( तत्व ज्ञान ) अर्थ ( लाभ या सार्थक कर्म या सार्थक जीवन ) काम ( विभिन्न सात्विक वृतियां ) और एक सम्पूर्ण खुशहाल जीवन के बाद मोक्ष ( मुक्त होना ) यानी कोई कर्म बेङी भी नहीं बनी । न पाप की । न पुण्य की ।
अब जरा गौर करें । विश्व के किसी भी धर्म ( वाणी ) में ये हिम्मत या ताकत है कि इतनी बङी बात कह सके ? ईसाई और इस्लाम धर्म सभी प्राप्ति मरणोपरांत और भक्ति का फ़ल जन्नत या स्वर्ग बताते हैं । जबकि देखिये - यही तुलसीदास कितनी सरलता से स्वर्ग को अत्यन्त तुच्छ बता रहे हैं -
एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ।
हे भाई ! इस शरीर के फल विषय कर्म नहीं है । क्योंकि इस जगत के भोगों की तो बात ही क्या ( यदि तुम्हें स्वर्ग भी मिल जाये ) तो वह स्वर्ग भी थोङे समय का ही है । और 84  लाख योनियों के दुःखदायी अन्त को ही प्राप्त होता है ।
तो देखा आपने । सिर्फ़ दो लाइनों में ही अपार महिमा छुपी है ।
बुद्धि हीन तनु जानि के । सुमिरौ पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि । हरहु कलेस विकार ।
- स्वयं को बुद्धि हीन स्वीकार करते हुए । यानी किसी भी अहं भाव से रहित । पूर्ण समर्पण से । ( सुमिरौ पवन कुमार ) सुमिरौ ( भावपूर्ण स्मरण ) कौन करता है - पवन कुमार ? अधिकांश लोग ये समझते हैं कि ये चालीसा पढने वाले द्वारा " हनुमान " के सुमिरन की बात है । नहीं । आपकी स्वांस क्या है ? पवन यानी वायु । और इससे जो जीव रूपी पुत्र उत्पन्न हुआ । वही कुमार है । यानी भक्त । मान रहित भक्त - हनुमान ।
मुझे ( आत्म ) बल ( निश्चयात्मक ) बुद्धि ( और आध्यात्म ज्ञान ) विद्या दीजिये । जिससे मेरे कलेश और दोष दूर हों । गौर करें । ये सभी प्रार्थना भक्त ने गुरु से की है ।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ।
राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ।
- मान रहित भक्त ज्ञान और ( सद ) गुणों का समुद्र होकर तीनों लोकों में प्रकाशित हुआ जय पाता है । अब यहाँ कपीश शब्द के लिये समझना होगा । एक तो सभी गूढ ज्ञान संकेतात्मक है । दूसरे हनुमान के समान ही वानर कुल ( पुराने समय में बहुत से स्थानों पर पशु पक्षियों के नाम पर जातियों के नामकरण का रिवाज था । जैसे - गृद्ध । रिछ । वानर । सर्प ) में उत्पन्न भक्त । तीसरे रामायण प्रतीकात्मक है । और ये भी सच है कि - जहाँ यह 

आंतरिक सूक्ष्म जगत के बारे में बताता है । वही जन सामान्य हेतु उसका स्थूल रूप भी प्रकट हुआ । गूढ का मतलब ही यह है कि - किसी भी चीज को रहस्यमय अन्दाज से बताना ।
राम दूत ( राम का सन्देश या जानकारी देता हुआ भक्त ) साधारण जीव की अपेक्षा अतुल्य ( आत्म ) बल से युक्त होता है ।
अंजनि पुत्र ( की व्याख्या करने पर बहुत विस्तार होगा । पर विकारी कामनाओं से उत्पन्न जीव समझा जा सकता है । वायु पुत्र की उपाधि ( क्यों ? ऊपर )
महावीर विक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ।
कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ।
- यानी राम भक्त कुमति को हटाकर सुमति को अपनाकर महावीर विक्रम ( शूरवीर ) बजरंगी आदि गुणों से युक्त हो जाता है । स्वर्ण के समान चमकती देह ( यानी रोगादि से ) निर्दोष सुन्दर वेशभूषा युक्त ।
हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ।
शंकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ।
- हाथ वज्र ( कर्मठता और मजबूती के साथ ) औ ध्वजा बिराजै ( कर्मक्षेत्र में विजय पताका फ़हराते हुये ) साधारण तपस्वी वेश में ।
शंकर के अंश और केसरी पुत्र ( यहाँ फ़िर से रूपक में सत्य घटित अंश जोङा गया है । जो कि ऐसी रचनाओं के लिये आवश्यक भी होता है । वैसे इसका अन्य रहस्य भी है । जो अति विस्तार की वजह से सम्भव नहीं है ) ऐसा महा तेजस्वी प्रतापी भक्त । जो संसार द्वारा वंदनीय है ।
विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लषन सीता मन बसिया ।
- विद्यावान ( मूल ज्ञान को जानने वाले ) गुनी ( गुणवान ) अति चातुर ( साधुओं के लिये " सयाना " शब्द का प्रयोग भी किया जाता है - बुद्धि होय जो परम सयानी । अर्थात तभी वो सृष्टि और खुद के रहस्य को जान सकता है ) राम काज करिबे को आतुर ( अर्थात निष्काम कर्म । कोई ऐसा कर्म नहीं । जिसमें खुद की भावना जुङी हो । क्योंकि सृष्टि ही सिया राम मय है ) प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ( शब्द नाम से जो सृष्टि रहस्य या चेतन रहस्य ध्यान भक्ति में अनुभव होते हैं । राम जनम के हेत अनेका । अति विचित्र एक ते एका । राम कथा जे सुनत अघाहीं । रस विशेष तिन जाना नाहीं ) राम लषन सीता मन बसिया (  चेतन जीव और माया तीनों को समझना । देखें लेख - शंकर के धनुष तोङने का रहस्य )
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंक जरावा ।
भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ।
- अपने सूक्ष्म रूप । सुरति और माया को देखना । योग विशालता से असुर भूमि को नष्ट करना । योग बल से असुरत्व का विनाश । वास्तव में एक भक्त द्वारा चेतन ज्ञान में यह भक्ति कार्य ही है ।
लाय सजीवन लखन जियाये । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ।
लाय सजीवन लखन जियाये ( अहम से त्वम तक की साधना में स्वाभाविक ही कई स्थानों पर कृमशः प्राप्त होते योगबल से साधक में अक्सर अहम घटने के बजाय और भी अधिक होता है । पूर्ण ज्ञान न होने तक ये स्वाभाविक प्रक्रिया ही है । तब वह तमोगुण से प्रभावित शक्तिहीन अचेत हो जाता है । ऐसे में उसका ( अभि ) मान रहित भाव ( हनुमान ) फ़िर से उसके लिये संजीवनी ( पुनः जीवनदायी ) का कार्य करता है ) परमात्म सत्ता ऐसे भक्त को हर्षपूर्वक ह्रदय से लगाती है । यानी भरपूर नेह बरसाती है । तब प्रभु उसकी सराहना करते हैं कि - तुम मुझे ( किसी भी कार्य में ) भरण पोषण ( भरत ) करने वाले भाई के समान ही प्रिय हो ।
सहस बदन तुम्हरो जस गावै । अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।
- हजारों जीव तुम्हारे यश ( भक्ति से जो मिला ) से भक्ति हेतु प्रेरित होंगे । ऐसा प्रभु का स्नेह आशीर्वाद होता है । सनक आदि ऋषि बृह्मा आदि देव मुनि नारद सरस्वती और शेषनाग..
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोविद कहि सके कहाँ ते ।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ।
यम कुबेर आदि दिग्पाल भी इस भक्त महिमा का बखान नहीं कर सकते हैं । फिर कवि और विद्वान कैसे कर पायेंगे । तुमने सुग्रीव पर उपकार करते हुये उसे राम से मिलाया । और राजपद दिलाया । ये फ़िर रूपक में सत्य कथानक जोङा गया है । हालांकि इसका भी रहस्य है । पर वो कम से कम इस लेख में बताना सम्भव नहीं )
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना । लंकेश्वर भए सब जग जाना ।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।
- योग या भक्ति मार्ग में ( आंतरिक और बाह्य दोनों रूप से ) एक ही प्रकार में भी दो तरह के अच्छे और बुरे जीव ( आत्माओं ) से मिलना होता है । जैसे राक्षसों में भी क्रूर और सदभावना युक्त । ऐसे असुर प्रवृति भी " राम भक्त " से लाभ उठाकर अपने उद्धार का बीज बो देते हैं ।
जुग सहस्त्र जोजन..इसका अर्थ यही है कि योग क्रियाओं में ऐसी घटनायें राम भक्त के लिये महज खेल के समान हैं ।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं ।
दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।
- हँस की पांच मुद्रिकाओं में से एक जिसमें मुख के तालु में जीभ लगाकर अभ्यास किया जाता है । जिससे तालु कमजोर होकर वहाँ बहुत सूक्ष्म छेद हो जाता है । तब अभ्यास से इस मुद्रिका के सिद्ध होने पर कई ऋद्धि सिद्धि और विशेष साधक में उङने की क्षमता आ जाती है । संसार के जितने भी बेहद कठिन और असंभव से कार्य हैं । वो राम भक्त के लिये बहुत आसान हो जाते हैं । जो इच्छा करिहो मन माहीं । राम कृपा कुछ दुर्लभ नाहीं ।
राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डरना ।
- एक मजेदार बात कही जाती है । यह आला ( अल्लाह ) का घर है । खाला ( मौसी ) का नहीं । शीश ( अभिमान ) उतार भूमि धरो । तब पैठो घर माहिं । यानी पूर्णतया मान रहित हुये बिना परमात्मा के दरवाजे में भी प्रवेश सम्भव नहीं । सभी सुख ऐसे राम भक्त की सेवा में हाजिर रहते हैं । और ये दूसरों को सुखी और निर्भय भी करता है ।
आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ।
- इसका ( तप भक्ति योग ) तेज सहन करने की शक्ति वाला तीन लोक के दायरे में नहीं होता । भूत ( पूर्व जन्म के दुर्बल या पापी या दुष्ट संस्कार । ) पिशाच ( तमोगुण से आक्रामक होने वाली अति नीच वृतियां ) ये महावीर भक्त जब सत्य शब्द नाम से जुङता है । तो पास भी नहीं फ़टकते । 
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ।
संकट तें हनुमान छुडावैं । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै
- सभी ( भव ) रोगों का और सभी कलेशों का वीर हनुमान द्वारा किये जाने वाले निरंतर जप ( अखंड अजपा ) से समूल नाश हो जाता है । यहाँ विशेश सोचने वाली बात है कि हनुमान अगर निरंतर ..राम राम ? जपते रहते थे । फ़िर वो अन्य तमाम सेवा कार्य कैसे करते थे ? जाहिर है । वह कोई गूढ ( अजपा ) जप ही है । ऐसा भक्त ( पूर्व संस्कारवश आये ) संकटो से आसानी से मुक्त हो जाता है । बस उसे मन वचन और कर्म से भक्ति युक्त होना होगा ।
सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ।
और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ।
- निर्लेप प्रभु के सभी कार्य वास्तव में उनके ऐसे ही भक्तों से संपन्न होते हैं । प्रभु की कृपा दृष्टि मात्र से । ऐसे भक्त को सभी इच्छाओं के साथ अनन्त और अमर जीवन रूपी फ़ल प्राप्त होता है ।
चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ।
साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।
आपका प्रताप चारों युगों में विद्यमान रहता है । आपका प्रकाश सारे जगत में प्रसिद्ध है । मान रहित होना साधु संतों की रक्षा करता है । ऐसा असुरता का नाश करने वाला भक्त प्रभु को प्रिय है ।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ।
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।
आठ सिद्धियां और नौ निधियां ऐसे भक्त को सहज प्राप्त हैं । ऐसे नियम का अनुभव ( जानकी ) वही स्वांस द्वारा सुरति शब्द योग । जान क्या है ? स्वांस का चलना ही तो है । भक्त के ज्ञान में आता है । राम रसायन ( शब्द नाम से उत्पन्न रस विशेष । जिससे सभी रसों की उत्पत्ति हुयी है । देखें - सबहिं रसायन हम किये नहिं नाम सम कोय । रंचक तन में संचरे सब तन कंचन होय ) ऐसे भक्त को प्राप्त है । जिससे वह सदा भक्ति में सलंग्न रहता है ।

तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ।
अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ।
- अधिकांश लोग सोचते हैं कि हनुमान का भजन या सुमरण करने से राम ( परमात्मा ) की प्राप्ति हो सकती है ? यह एकदम गलत है । दरअसल इसका मतलब है ( तुम्हरे भजन ) यानी हनुमान जो भजन ध्यान करते हैं । उससे ही राम की प्राप्ति होती है । रामचरित मानस में भी आया है - महामंत्र जोई जपत महेशू । काशी मुक्ति हेतु उपदेशू । यानी शंकर जिस महामंत्र का भजन करते हैं । वही काशी ( शरीर ) ..मन मथुरा दिल द्वारिका काया काशी जान । के मुक्त करने हेतु उपदेश है । और राम को पा लेने के बाद जन्म जन्म ( वास्तव में कर्म फ़ल संस्कार और गर्भ योनियों से छुटकारा होना ) के दुःख नष्ट हो जाते हैं । वह कोई नई बात नहीं है । इस शरीर का परम लक्ष्य यानी अपने मूल को प्राप्त ( रघुवर पुर ) कर हरि भक्त ( अनन्त चेतना से जुङना ) हो जाता है ।
और देवता चित न धरई । हनुमत से हि सर्व सुख करई ।
संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।
- और देवताओं में उलझने की आवश्यकता ही नहीं है । हनुमत ( इसी भक्ति से ) से ही सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं । देखें - भक्ति स्वतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहि प्राणी । सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिमि हरि शरन न एक हू बाधा । कर्म संस्कार रूपी संकट कटकर सभी दुःख दर्द दूर हो जाते हैं । यदि बलबीर हनुमान वाला भजन ध्यान आप करते हैं ।
जै जै जै हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ।
जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ।
- यहाँ तुलसीदास एक भक्त भाव में इसी मानरहित भक्त की योग स्थिति की विनय करते हैं कि - जिस प्रकार गुरु की असीम कृपा होती है । वैसे ही मेरा यह मानरहित भाव हमेशा जयी हो । अर्थात भाव गिरे नहीं । जो इस ( शब्द नाम ) का सौ बार पाठ करता है । वह प्रत्येक भव बन्धन से छूटकर महासुख को प्राप्त होता है । देखें - कहे हू कह जात हू कहूँ बजाकर ढोल स्वांसा खाली जात है..तीन लोक का मोल ? और - जासु नाम सुमरत एक बारा । उतरहिं नर भव सिंधु अपारा । राम एक तापस तिय ( अहिल्या ) तारी । नाम कोटि खल सुमति सुधारी ।
जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ।
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा ।
- अतः जो इन चालीस पदों में छिपे सत्य को समझकर अपना लेता है । तो शंकर साक्षी है । उसका ज्ञान सिद्ध होने में कोई संशय नहीं है । इसलिये तुलसीदास इस सत्य को जानकार सदा के लिये ही हरि ( चेतन राम ) का दास हो गया । हे प्रभु ! सिर्फ़ आप ही मेरे ह्रदय में रहें । दूसरा कोई असत्य भाव या अस्तित्व न आये ।
पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप ।
राम लषन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप । 
पवन तनय ( तो सभी हैं । पर जो जान गया ऐसा भक्त जीव । हर घट तेरा साईयां सेज न सूनी कोय । बलिहारी उन घटन की जिन घट प्रकट होय । ) संकट दूर होना । मंगल मूर्ति यानी स्वयं का अमंगल रहित अस्तित्व । राम लषन सीता सहित ( इस आत्मा और चेतन माया जीव सृष्टि ज्ञान सहित ) सभी देवताओं के स्वामी मेरे ह्रदय में वास करें । अर्थात मेरा भाव इससे कभी हटे नहीं ।
सार विशेष - आपने देखा होगा । ज्ञान लेखन आदि विधाओं की अलग अलग गूढ सी शैलियां हैं । जो व्यक्ति के चिंतन मनन विकास आदि के लिये हैं । और जो सृष्टि को चलाये रखने के लिये आवश्यक है । अगर ऐसा नहीं होता । तो भगवान को मनुष्य की रोटी दाल वस्त्र आदि की पूर्ति के लिये इतने घुमावदार प्रपंच की क्या आवश्यकता थी । वो सीधे ऐसे वृक्ष ( या अन्य माध्यम ) बना सकता था । जिन पर दाल रोटी वस्त्र आदि सभी लगते । और कोई झंझट ही न होता । और सोचिये बिना झंझटों के जिन्दगी का क्या अर्थ होता - मनुष्य या मशीन ? इसी  नजरिये से आप आध्यात्म ज्ञान को जानेंगे । तभी वास्तविक रहस्यों से अवगत होंगे । वही बात इस चालीसा में भी है ।

25 अगस्त 2013

श्रीराम द्वारा शंकर के धनुष तोङने का रहस्य

आप यदि रामायण के पात्रों उनकी उत्पत्ति और अजीब से घटनाकृमों पर बिना किसी पूर्वाग्रह या धार्मिक चश्मा लगाये बिना गौर करें । तो ये सभी कुछ आपको प्रतीकात्मक और किसी गूढ रहस्य का संकेतात्मक ही लगेगा । जैसे प्रमुख पात्र राम चेतना ( गति ) के द्योतक चेतन ( पुरुष ) हैं । मैंने पहले भी बताया कि राम में र अक्षर चेतना और म अक्षर माया के लिये है । यानी ऐसी चेतना जो माया के साथ मिलकर ये सृष्टि खेल खेल रही है । इसके दूसरे पात्र लक्ष्मण ( जिसका लक्ष्य मन की गतिविधियां हैं - यानी जीवात्मा ) इसके तीसरे प्रमुख पात्र सीता ( वेदेही आदि नाम ) को विभिन्न घटकों के साथ अलग अलग स्थिति में माया और सुरति खास कहा गया है - राम लखन बिच सीय सोहे ऐसे । जीव बृह्म बिच माया जैसे । इसको माया और सुरति क्यों कहा गया है । इसको देखें - हमारा अंतःकरण - मन ( माने हुये को ) । बुद्धि ( सही गलत आदि निश्चय निर्णय करने वाली ) । चित्त ( इच्छा का आकार या चाह ) । अहम यानी मैं भाव इन चार अंगों से बना है । अगर आप सनातन धर्म से थोङा भी परिचित हैं । तो आत्मा से अलग सृष्टि विकार है ।

माया है । और ये सृष्टि अंतःकरण रूपी इसी मन से ( तीन गुणों के साथ क्रिया करके ) निर्मित संचालित और नष्ट भी होती है । अतः सीता बराबर माया ( सिर्फ़ एक स्थिति ) यही है । और गूढ अर्थों में सुरति को ही सीता कहा जाता है । सहज योग बिज्ञान के प्रयोगकर्ता जानते हैं । मन बुद्धि चित्त अहम ये चारों अंग ( छिद्र ) जब योग क्रिया द्वारा एक हो जाते हैं । तब इन्हीं को सुरति कहा जाता है । सुरति शब्द का बहुत सरल सा अर्थ है । सु + रति = अपनी चाह । सुरति वास्तव में सुनती है । और निरति देखती है । पर इस पर अधिक बात करना विषयांतर ही होगा ।
क्योंकि मैं आज आपको राम द्वारा शंकर के धनुष को तोङने का असली रहस्य बता रहा हूँ । राम हँस योगी थे । और मर्यादा पुरुष थे । हँस योगी की पहुँच बृह्म की चोटी तक ही होती है । यानी पारबृह्म ( का आरम्भ भी ) इनकी पहुँच से बाहर होता है । क्योंकि ये परमहँस ज्ञान का विषय है । राम इसीलिये मर्यादा पुरुष की भूमिका में थे ।

क्योंकि बृह्म की चोटी तक बृह्म का कायदा कानून चलता है । यानी यहाँ तक की स्थिति वाला कोई भी नियम से बाहर जाता है । तो वो असुर भाव में परिवर्तित हो जायेगा ।
रामायण के तीन प्रमुख पात्र राम ( अदृश्य चेतन पुरुष ) सीता ( सुरति और माया ) और लक्ष्मण ( जीवात्मा ) ये वास्तव में किसी भी हँस ज्ञान साधक के लिये आत्मा से जीवात्मा होकर सृष्टि रूपी खेल का ज्ञान अज्ञान जानने के भाव हैं । हँस का नीर क्षीर विवेक और साधू ऐसा चाहिये..थोथा देय उङाय । और वस्तुतः स्वयं की वास्तविकता से परिचित होना भी है - कैसा अदभुत खेल बनाया । ईश्वर बृह्म जीव और माया । यानी ये चारों एक ही है ।
अब क्योंकि बात शंकर के धनुष तोङने की है । शंकर तमोगुण का प्रतिनिधित्व करने वाले देव हैं । बात को समझिये । धनुष से क्या होता है ? इच्छित लक्ष्य का वेधन किया जाता है । यानी ऐसा धनुष जिससे सभी तमोगुणी लक्ष्य वेधन ( शिकार ) किये जाते हैं । इसके बहुत ही भारी और मजबूत होने का वर्णन भी है । बिलकुल सही है । तमोगुण बेहद भारी जटिल और बेहद मजबूत भी होता है । ये धनुष कहाँ रखा था - जनक की यज्ञशाला में । जनक यानी शरीर उत्पन्न करने वाला पिता । यानी मनुष्य शरीर में स्थित सभी कुछ । यज्ञशाला क्या है - आपके पेट में जो पंचाग्नि जल रही है । यही यज्ञशाला है । इसमें प्राण वायु द्वारा होम किया जाता है । कुण्डलिनी या सहज योग में सभी मन्त्र ॐ क्लीं आदि बीज मन्त्रों या महामन्त्र सोहं के साथ इसी प्राणवायु के द्वारा संयोग या योग क्रिया की जाती है । तो ये तमोगुण 

लक्ष्यों वाला धनुष इन्हीं जीवन से सम्बन्धित क्रियाओं के मध्य स्थित था । 
सीता इन्हीं जनक की पुत्री ( अंश ) थी । आत्मज्ञान सम्बन्धित ग्रन्थों में प्रथम स्त्री अष्टांगी थी । जो सतपुरुष ने कालपुरुष की वासना ( सृष्टि चाह ) हेतु भेजी थी । हँस ज्ञान में इसको सीता कहा जाता है । और चेतन पुरुष को राम कहा जाता है । क्योंकि जब यही चेतन पुरुष जीव संज्ञा में आ जाता है । तब माया रूपी सृष्टि में यह इसकी विभिन्न मन इच्छायें पूर्ण करती हुयी सहयोग करती है । लेकिन जब जीव अपने मूल यानी आत्मा हेतु अपनी पहचान के लिये मुढता है । तव यह सुरति हो जाती है । सीधी सी बात है । जब मन बुद्धि चित्त अहम के सभी खेलों से ( ऊबकर ) निवृति हुयी । और ये चारों अंग एक हो गये । ( जो अभी तक विभिन्न वासनाओं में बिखरे हुये थे ) तब ये भक्त स्थिति के लिये तैयार हो जाती है । हँस ज्ञान में चेतन पुरुष चेतना और माया का क्या संयोग ? बस यही जाना जाता है । परमहँस ज्ञान में यही सुरति राधा (  रा - चेतना युक्त । धा - दौङना ) और चेतन पुरुष कृष्ण ( अनहद शब्द ध्वनि का आकर्षण या चुम्बकीय शक्ति ) होता है । यानी हँस को पार कर गयी सुरति ऊपर के आकर्षण से खिंचने लगी । क्योंकि यहीं से कभी नीचे उतरी थी । आत्मज्ञान की भाषा में इसे सुरति शब्द योग कहा जाता है । देखें - जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाये । सुरति समानी शब्द में ताको काल न खाय । यानी काल की सीमा से जीव बाहर हो गया । यानी ये राधा कृष्ण का योग किसी भी साधक को कृष्ण स्तरीय योगेश्वर बना देता है । पर आत्म ज्ञान यहीं खत्म नहीं हो जाता । बल्कि अभी बहुत बहुत आगे जाना है । लेकिन उसके बजाय मूल विषय पर आते हैं ।
और इस धनुष को सीता ने खेल खेल में उठा लिया । सीधी सी बात है । माया का प्रमुख हथियार या खिलौना ही तमोगुण है । तो फ़िर धनुष उठाना क्या बङी बात है । जब योग स्थिति में ये एकाग्र होकर सुरति हो जाती है । तब तमोगुण इसके लिये बहुत ही हल्का हो जाता है । क्योंकि तमोगुण सिर्फ़ अज्ञान मात्र है । यानी अंधकार । और हँस साधक इस अज्ञान को ज्ञान यानी ( आत्म ) प्रकाश द्वारा जानने लगता है । तो सीधी सी बात है कि अज्ञान रूपी भार भारहीन हो जाता है । तब भी धनुष को उठाना कोई बङी बात नहीं है ।
अब लक्ष्मण की बात देखिये । यह जीव के अहंकार मैं पन और अक्खङपन की भूमिका है । जो रामायण में जगह जगह दृष्टिगोचर होती है । फ़िर ध्यान दें कि ये राम लक्ष्मण और सीता तीन अलग अलग नहीं हैं । बल्कि संयुक्त ही एक शरीर में स्थितियों का अन्तर है । राम सिया मैं सब जग जानी । करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानि । जब लक्ष्मण जीव भाव स्थिति में होता है । तब वह अहंकारी बात कहता है । पर राम और गुरु का ध्यान या संकेत आते ही भाव में विनमृता आदि स्थिति परिवर्तन हो जाता है । कुल मिलाकर पूरी और असल बात बहुत विस्तार युक्त है । अतः संक्षेप में ही बताया जा सकता है । जब लक्ष्मण की प्रवृतियों का आप सूक्ष्म अध्ययन करेंगे । तो बात स्पष्ट हो जायेगी ।
अब आ जाईये - राम पर । राम यानी हँस साधक । हँस योगी । आध्यात्म की सूक्ष्मता से परिचित न होने पर आपको संशय हो सकता है कि - धनुष राम ने क्यों उठाया । दरअसल यहाँ लक्ष्मण जीव की भूमिका में है । और जीव तमोगुण रूपी भार बिना चेतन या योग संयोग के नहीं उठा सकता । और राम..अब जीव के साथ ऐकाकार चेतन हँस साधक की भूमिका - रमता के संग समता हुय गयी । परो भिन्न पर पानी । मतलब चेतन के साथ एकता हो गयी । जब ते रघुनायक मोहे अपनाया । तब ते मोहि न व्यापे माया .. आदि आदि ।
यानी अब इस हँस साधक ने अपने योगबल से परिचय या संयोग होते ही शंकर के इस तमोगुणी लक्ष्यों वाले धनुष को उसी सुरति से उठा लिया । जो सुरति पहले जीव भाव में मायावी थी । वह अब भक्ति भाव में भक्त ( चेतन शक्ति से जुङना ) हो गयी । जैसे ही धनुष उठाया । अज्ञान रूपी सृष्टि कांपने लगी । और साधक के समक्ष से अहंकार छल कपट आदि दोष भागने लगे । या दूर हो गये । देखिये रामायण भी यही कहती है ।
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ।
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ।
राजाओं की आशा रूपी रात्रि नष्ट हो गई । उनके वचन रूपी तारों के समूह का चमकना बंद हो गया ( वे मौन हो गए ) अभिमानी राजा रूपी कुमुद संकुचित हो गए । और कपटी राजा रूपी उल्लू छिप गए ।
और फ़िर धनुष को तोङ डाला । और सीता ( सुरति द्वारा ) लक्ष्मण ( जीव ) का राम से एका ( विवाह हुआ ) । कहन सुनन की बात नही देखा देखी बात । दूल्हा दुल्हनि मिल गये फ़ीकी पङी बारात । सुरति समानी शब्द में ताको काल न खाय । शब्द भी यहाँ ररंकार ध्वनि या चेतन को कहा गया है । यानी हँस ज्ञान का पूर्ण हो जाना ।
अब देखिये । इस ज्ञान प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण अंग - गुरु । जब राम धनुष को उठाने चले । तो उन्होंने गुरु को मन ही मन प्रणाम किया । यहाँ एक बङी ही गूढ बात है । मैं फ़िर से कहता हूँ । तुलसीदास ने राम का चरित्र कविता के माध्यम से आपके मनोरंजन के लिये नहीं लिखा कि कुछ भी घटना कृम अनुसार कविता बन जाये ठीक ही है । बल्कि एक एक बात सटीक और बेहद रहस्यमय है । प्रश्न ये उठता है कि - राम ने अपने गुरु को मन ही मन प्रणाम क्यों किया ? प्रकट रूप से क्यों नहीं । दरअसल ये गुरु शिष्य मर्यादा का नियम था । अगर राम प्रकट रूप से प्रणाम करते । और तमोगुण रूपी धनुष नहीं तोङ पाते । तो उनकी वजह से गुरु की हँसी होती । जो कि शिष्य की मर्यादा के प्रतिकूल था । अतः राम ने मन ही मन प्रणाम करते हुये मर्यादा का पालन भी किया । और धनुष न तोङ पाने की स्थिति का पूरा दोषी भी स्वयं को ही रखा । क्योंकि धनुष नहीं टूटता । तो गुरु का तो कोई दोष नहीं था । शिष्य ही कहीं न कहीं अयोग्य था ।  
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा॥
मन ही मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया । और तिनके के समान धनुष को उठा लिया ।
विशेष - जैसा कि मैं हमेशा ही कहता हूँ कि इस लेख को भी आप सभी अंगों में पूर्ण हरगिज न मानें । स्थिति वर्णन भी मुख्य मुख्य और स्थूलता लिये हुये हैं । क्योंकि इतनी ही घटना में जितने पात्र और स्थितियां हैं । उन सभी का हरेक पहलू से वर्णन करने पर एक छोटा ग्रन्थ तैयार हो जायेगा ।
जैसा कि तुलसीदास ने कहा भी है ।
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनत न जात बखानी । यानी ये कथा अकथनीय है । कहना संभव ही नहीं । सिर्फ़ इसको योग भक्ति द्वारा ही समझा अनुभव किया जा सकता है ।
- आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

24 अगस्त 2013

सोचकर बोलना ये नगद का सौदा है

अभी लगभग 1 महीने पहले की बात है । जब एक व्यक्ति मेरे पास आया । और प्रत्येक दुनियावी इंसान के समान ही उसने लोभ लालच और संशय युक्त अन्दाज में कहा - मैं काफ़ी परेशान हूँ । कई कामों में हाथ डाला । धन लगाया । पर असफ़लता ही हाथ लगी । और ये कुछ समय से ही है । ऐसा भी नहीं कि मैं अनुभवहीन हूँ । पर अब समझ नहीं पा रहा । ऐसा क्यों हो रहा है ?
आपको शायद आश्चर्य होगा कि यदि परेशानियों के प्रकार और कारणों की विभिन्नता को न देखकर यदि किसी भी परेशान व्यक्ति के कामन भाव देखें जायें । तो कम से कम मेरे सामने यही होते हैं । मुझे एक आदत सी है कि - अब ये क्या कहेगा ।
और मैं हमेशा की तरह यही कहता हूँ - आप मुझसे क्या चाहते हैं ?

और याचना पूर्ण प्रतिक्रिया होती है - आपका आशीर्वाद मिल जाये । कुछ कृपा हो जाये । बस यही काफ़ी है हमारे लिये ।
पर मेरी साधुगीरी अलग ही तरह की है - आशीर्वाद अपनी जगह है । स्पष्ट बताओ । चाहते क्या हो ?
तब अक्सर इंसान संकोचवश कुछ कह नहीं पाते । दरअसल वे कहना चाहते हैं - हम धन दौलत स्वास्थय और परिवार के साथ सुखी हो जायें । और अन्त में ( सभी को ) कोई स्वर्ग वगैरह भी दिला दो । कोई कोई यह भी कह देता है - हमें तो बस प्रभु की भक्ति ( करें ) और दर्शन हो जायें बस । क्योंकि वे जानते हैं । प्रभु ने सबको मालामाल भी किया है । और अन्त में अपने धाम भी ले गये ।
और जब उनका सही समय था ।  तब वे सोचते भी यही थे कि - प्रभु की हम पर अपार कृपा है । और हम अपने कर्तव्य भक्ति पूजा आदि सभी कुछ सही कर रहें हैं । अतः वे अभी के लिये और मृत्यु बाद के लिये भी निश्चित थे । ये तो जब महामारी के दिन शुरू हुये । तब उन्हें सन्तों की याद आयी । और लगा कि कहीं कुछ गङबङ है । दुख में सुमिरन सब करें । सुख में करे न कोय ।
पर मैं भी अपनी ही तरह का साधु हूँ । मैं कहता हूँ - यदि एक तरफ़ आपको दस करोङ रुपया और दूसरी तरफ़ परमात्मा में.. से एक चुनने को दिया जाये । तो आपको क्या चाहिये । सोचकर गम्भीरता से बोलना । नगद का सौदा है । बाद में किन्तु परन्तु नहीं चलेगी ।
अब उत्तर सुनिये - पैसा भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है । घर परिवार को भी देखना है । आप सब समझते ही हैं । 

कोशिश रहेगी कि - परमात्मा को प्राप्त किया जाये ।
अगर आपको इस उत्तर से हैरानी होती है । तो ये सिर्फ़ आपका अज्ञान ही है । ये पूर्णतया लोभ लालच से भरपूर । पूर्ण अज्ञान युक्त । लगभग सभी की ही धारणा है । एक मनचाहा सुखी जीवन । वो भी परमात्मा के वीसा कार्ड से बिल भर के । और मृत्यु के बाद उस धाम की प्राप्ति । जिसके बारे में सभी जाति धर्मों की धर्म पुस्तकें ऐसा मोहक वर्णन करती हैं कि मुँह से लार ही टपकने लगे । बस परमात्मा का ( से ) इतना ही मतलब है । इतनी ही जानकारी है । और उससे सम्बन्ध बनाये रखने हेतु यही कारण है ।
और मैं कहता हूँ - तुम अपने असमंजस को लेकर चूक गये । तुम्हें सन्तों से कैसे मिलें ? इसका अनुभव ही नहीं

है । अतः दुविधा में दोनों गये । माया मिली न राम । परमात्मा का मिल जाना ही अपने आप सब कुछ मिल जाना है । इतना सरल सा भेद भी तुम्हारी समझ में न आया । और धन को लेकर भी तुम संशय में थे । संकोच में थे । अन्यथा तुम्हें धन ही मिल जाता ।
इस एक उदाहरण के बाद अब समझिये । इन्हें निश्चय ही दस करोङ रुपया किसी न किसी माध्यम से ( गङा । पङा । खङा ) मिल जाता । लेकिन जिसके कानून से बाहर एक पत्ता नहीं हिल सकता । वहाँ यदि तुम्हारे द्वारा ही पैदा की गयी समस्यायें यदि ऐसे हल होने लगे । गुनाहों की माफ़ी मिलने लगे । और राम राम अल्लाह अल्लाह वाहेगुरु कहकर तुम उत्तम गति को भी प्राप्त हो जाओ । तो सोचो । फ़िर जीवन में समस्या नाम की चीज भी क्या रही ? जब प्रत्येक समस्या का एक सर्वोच्च स्तरीय हल अदृश्य भगवान के रूप में मौजूद है । अतः दस करोङ रुपया मिलता अवश्य । पर किसी सरकारी सहायता

जैसा नहीं । जिसे लौटाना नहीं पङता । और दूसरी तरफ़ परमात्मा मिलता अवश्य । पर उसके लिये भी जो करना निर्धारित है । उसके बगैर कभी नहीं । अतः हमारे सभी अज्ञानजनित दुःखों का कारण घोर अज्ञानता ही है । और वो अज्ञानता सिर्फ़ इतनी ही है कि - खुद को कर्ता मान लेना । खुद का अस्तित्व मान लेना । जबकि ये दोनों ही महा भृम हैं । न तुम कर्ता ही हो । और न ही तुम्हारा ये अस्तित्व ? है । दरअसल जैसे ही ये दोनों चीजें अहम स्तर पर प्रबल हो उठती हैं । तब तुम कर्ता के साथ साथ तुरन्त भोक्ता भी बन जाते हो । और फ़िर इस भोग से पीछा छुङाना इतना आसान नहीं है । जङ चेतन ग्रन्थि पर गयी । यधपि मृषा ( मिथ्या ) छूटत कठिनाई ।
इस सम्बन्ध में श्री महाराज जी कहते हैं - बन्धन मोक्ष मन के धर्म हैं । आत्मा के नहीं । आत्मा सदा सर्वदा मुक्त ही है । बन्धन में कभी आया ही नहीं । फ़िर मुक्त होना कैसा ? यानी तुम मन से ही बँधे हो । मन से ही मान भी रहे हो । और मन से ही भोगते भी हो ।
इस सम्बन्ध में एक प्रेरक और रोचक दृष्टांत भी श्री महाराज जी अक्सर  सुनाते हैं ।
एक व्यक्ति के यहाँ कुछ गधे थे । एक शाम जब गधे काम से वापस आये । तो एक गधे के पैरों में बाँधने वाली पगही ( रस्सी ) कहीं खो गयी । तब उस व्यक्ति ने अपने पिता से कहा - एक गधे की रस्सी खो गयी है । इसे कैसे बाँधू ? उसके पिता ने कहा - झूठमूठ का बाँध दे । यानी उसके पैरों के साथ ऐसी ही क्रिया कर । जैसे वास्तव में उसे रस्सी से बाँध रहा हो । उसने ऐसा ही किया । 
सुबह उसने सारे गधे खोल दिये । और झूठमूठ का बँधा क्योंकि बँधा ही नहीं था । उसे नहीं खोला । सारे गधे आगे बढने लगे । पर वह ज्यों का त्यों ही खङा रहा । डण्डा मारा । फ़िर भी नहीं हिला । तब उसने पिता से कहा - ये गधा नहीं चल रहा ।
उसके पिता ने कहा - तूने चलाने से पहले उसे खोला था ।
वह हैरानी से बोला - वह बँधा ही कहाँ है । जो खोलूँ ।
उसका पिता बोला - जैसे कल बाँधा था । वैसे ही उसको खोल भी दे ।
उसने फ़िर उसके पैरों से वही झूठमूठ क्रिया की । जो खोलने पर करते हैं । और आश्चर्य की बात । गधा तुरन्त अपने स्थान से नित्य की तरह आगे बढ गया ।
बिलकुल ऐसा ही तुम्हारे साथ है । सारे बन्धन सारे दुःख तुम्हारे अज्ञानवश ही हैं । अगर इन झूठमूठ के बन्धनों से बाहर आ जाओ । तो एक आनन्दमय जीवन तुम्हारा इंतजार कर रहा है ।
- आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम । 
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वैदिक गणित सीखने के लिये भारती कृष्ण तीरथ जी की पुस्तक - Vedic Mathematics का लिंक 
http://www.flipkart.com/vedic-mathematics-8120801644/p/itmdytehcpcjdhtb?pid=9788120801646&_l=j9Xfifej1tnSUjNow6B3Vw--&_r=8EIiwaUoH87BbdAmr+twIQ--&ref=faa51a98-9d38-4841-a76d-75e3a76df7bf 

http://www.dhoopchhaon.com/2012/01/vedic-mathematics-multiplication-using.html

22 अगस्त 2013

चलने वाले चल संभल के हम भी कभी इंसान थे

कल अचानक मैंने राजस्थान के अलवर जिले में स्थिति भानगढ किले के बारे में पढा । लेकिन अचानक शब्द मेरे चौंकने को नहीं दर्शाता । मुझे ऐसी बहुत सी प्रसिद्ध किले जैसी इमारतों और अनाम साधारण जगहों का भी पता है । जहाँ इस किस्म के प्रेतवासे होते हैं । इसलिये चौंकने वाली बात नहीं है । बल्कि बात ये है कि - किसी भी प्रेतग्रस्त क्षेत्र को लेकर  जन साधारण में जानकारी के अभाव में कैसी कैसी बातें प्रचलित हो जाती हैं । और मैं अपने सोचने के अलग अन्दाज को लेकर कुछ अलग ही सोचता हूँ । सबसे पहले मैंने ये सोचा कि - ये किला सत्रहवीं शताब्दी में बना है । यानी तीन सौ साल पहले । और नारायण दत्त श्रीमाली अभी कुछ ही दशक पहले हुआ । भूत प्रेत और डाकिनी शाकिनी कर्ण पिशाचिनी जाने कौन कौन सी बलाय को लेकर पुस्तकें लिखीं । प्रचार भी किया कि - ये सब उनके वश में है । ये विद्या वो विद्या । ये सिद्धि वो सिद्धि आदि आदि । तो अपने ही क्षेत्र की एक प्रसिद्ध और ऐतहासिक जगह पर उनकी नजर नहीं गयी । या तमाम लोग ( या राजस्थान सरकार ) दस बीस पचास हजार खर्च कर श्रीमाली से कोई अनुष्ठान करा के भूतों से किले को छुङवा लेते । जो श्रीमाली और ऐसी चीजों में विश्वास रखते हैं । ध्यान रहे । श्रीमाली का उदाहरण मैं सिर्फ़ इस क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति के तौर पर सिर्फ़ उदाहरण के लिये ही दे रहा हूँ । जन जागरूकता के उद्देश्य से दे रहा हूँ । वरना श्रीमाली ने मेरी कोई भेंस नहीं खोली है । और भी तमाम दिग्गज ? लोग टीवी इंटरनेट किताबों

आदि में गाल बजाते रहते हैं । तब आप लोगों को कभी ख्याल नहीं आता कि - ऐसे लोगों से कहो कि भैया ये कीमती चीज यहाँ बरबाद हो रही है । इस पर कोई हाथ आजमाओ । तो प्रचार अपने आप हो जाये । वो भी विश्व स्तर पर । सन्तों की पूरी फ़ौज राजनीति राजनीति खेल रही है । उस पर इसका कोई समाधान नहीं है । 
आप ठीक से समझें । मैं इसी किले या किसी एक स्थान या किसी एक व्यक्ति या किसी एक कारण की बात नहीं कह रहा । बल्कि अंधी धार्मिकता की बात कह रहा हूँ ।
खैर..इस किले की किवदंती कहानी में कोई बहुत सुन्दर राजकुमारी रत्नावती और काले जादू का कलुआ कोई सिंघिया था । जिसने इत्र की शीशी पर जादू कर दिया । राजकुमारी ने उस शीशी को पत्थर पर फ़ोङ दिया । जादू शीशी से पत्थर में घुस गया । और पत्थर क्रोधित होकर कलुआ जादूगर सिंघिया के ही पीछे पङ गया । और उसे मार डाला । इस पर उसने किले से सम्बन्धित सभी लोगों को शाप दिया । और सभी मारे गये आदि आदि ।
अरे अक्ल बन्दरो ! क्यों अक्ल के पीछे हमेशा लठ्ठ लेकर ही दौङते हो । जो वो बेचारी भेजे में तो आना दूर । भय से तुम्हारे पास भी नहीं आ पाती ।
ये बताओ । आज कबाङे का काम इतनी जोरों पर है कि छोटे मोटे कबाङी भी लखपति से कम नहीं है । मेरा मतलब सिर्फ़ नाम ही कबाङी है । वरना बीबी बच्चों पर भी चार पहिया गाङी है । फ़िर किसी कबाङी के कबाङ में आज दिन तक अलादीन जैसा कोई चिराग निकला ?

ये करिश्माई किस्से सिर्फ़ कई सौ साल पहले ही क्यों हुये । आज क्या वैसे तांत्रिक मर गये ? या रत्नावती सी खूबसूरत छोरियां नहीं हैं ? अगर एक तान्त्रिक द्वारा पूरा राजमहल और पूरी सत्ता ही ध्वस्त होकर मृत्यु के परिणाम को प्राप्त हो सकती है । तो फ़िर - दस जनपथ । कांग्रेस पार्टी । मनमोहन सिंह । सोनिया गाँधी और राहुल आदि आदि को नर्क में पहुँचाने का अरमान रखने वाले सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही हजारों है । जो दस बीस लाख रुपया भी खर्च कर सकते हैं । तो एक इत्र की शीशी प्रियंका के लिये भी फ़ुङवा दी जाये ।
अब समझिये । मेरा मतलब । ऐसा नहीं है कि - ऐसी विद्यायें नहीं हैं । चिराग का जिन्न भी नहीं है । या इसको करने वाले व्यक्ति नहीं हैं । सभी है । पर क्योंकि जनता में इस क्षेत्र में असली जानकारी का अभाव होता है । इसलिये कुछ की कुछ बात बन जाती है । सच वह नहीं होता । जो प्रसारित प्रचारित हो जाता है । और तब बेशकीमती जगहें स्थान अभिशापित सा रह जाती हैं ।
अब मैं अधिक विस्तार में न जाकर ऐसी जगहों के ठीक होने और बहुत आसानी से प्रेत मुक्त होने के उपाय बताता हूँ । आज तरह तरह के विद्युत उपकरणों के होने से ये सब बहुत आसान है । सबसे पहले ऐसी जगह को एकदम झाङ पोंछकर स्वच्छ कर दिया जाये । इसको कुछ समय तक लगातार धुलाई की जाये । फ़िर बङिया पुताई करा दी जाये ।

कोई भी कमरा बन्द न रखें । खास तौर से रात में भी भकाभक उजाला रहे । ऐसी व्यवस्था हो । दिन में लगातार चहल पहल जारी रहे । यदि सामान्य लोगों को भय लगता हो । तो निडर और भक्ति में आस्था रखने वाले लोग पहल कर सकते हैं । या उनके साथ रह सकते हैं । शोरगुल या कीर्तन आदि लगातार होने दें । क्योंकि ये प्रेतों को सख्त नापसन्द है । कुछ खास रामचरित मानस के दोहे और अन्य भक्ति मन्त्र किले की दीवारों पर लिखवा दिये जायें । आते जाते लोग अनायास इसको पढेंगे । इससे सात्विक तरंगे माहौल में क्रियाशील हो जाती हैं । जो प्रेतों के लिये जानी दुश्मन हैं । मुश्किल से पन्द्रह दिन में भूत प्रेत का सफ़ाया ऐसे हो जायेगा । जैसे लादेन और सद्दाम का हुआ था । क्योंकि ये सभी चीजें प्रेतों को कष्ट पहुँचाती हैं ।
आप लोग मुझसे एक शाश्वत सवाल ( तर्क ) कर सकते हैं कि - वो तो ठीक है । मगर इस बिल्ली के गले में घन्टी बाँधेगा कौन ? क्योंकि कोई गम्भीर प्रेत समस्या या किसी की जान चली गयी तो ? ऐसा भय आम इंसान को होता ही है ।
और जबाब वही सदाबहार है - ये बिल्ली बिलौटा कोई भी हो । मैं इसके गले में घण्टी नहीं घण्टा बाँध दूँगा । और तब मुझे इसके लिये ( अपने स्तर पर ) ऊपर लिखे उपाय प्रपंच करने की भी कोई आवश्यकता नहीं । मैंने कभी भगवान के लिये एक अगरबत्ती नहीं जलायी । फ़िर इन भूतों को धूप बत्ती और लड्डू क्या खिलाऊँगा । वैसे मैं प्रेतों को कोई घृणित चीज या त्याज्य वस्तु के तौर पर भी नहीं देखता । दरअसल ये भी कभी इंसान थे । जो अपने कर्म संस्कार और तमाम अन्य कारणों से आज अदृश्य सूक्ष्म शरीर वाले होकर दारुण कष्ट भोग रहे हैं । अतः कम से कम मुझे सशरीर इंसानों और अशरीर प्रेतों में कोई अन्तर नहीं लगता । उनकी दुष्टता की काल्पनिक कहानियां अधिक हैं । सच्चाई के तल पर ऐसा नहीं होता है । जैसे इंसानों में सज्जन दुष्ट दोनों हैं । वैसे ही प्रेतों में भी हैं । क्योंकि वे कोई एलियन नहीं । पूर्व के इंसान ही हैं ।
खैर..किसी भी संयोग से ऐसा कोई मामला मेरे पास आता है । तो पहले तो मुझे कुछ कहने करने की आवश्यकता ही नहीं होती । फ़िर भी अगर आवश्यक हो । तो मैं सिर्फ़ इतना ही कहता हूँ - अब यहाँ से दफ़ा हो जाओ सब ।... मुझे नहीं पता । अमेरिका जाओ । रूस जाओ । या जहन्नुम में जाओ । बस इतना ही मेरा इलाज है । इतना ही मेरा मन्त्र है ।
लेकिन..अभी सवाल एक और भी है । जो तर्क युक्त भी है । कोई भी कह सकता है कि - जब सभी सही स्थिति की मुझे जानकारी है । उपाय भी है । सामर्थ्य भी है । तो मैं जन हितार्थ स्वयं ( अपने ही स्तर पर ) ही ऐसा क्यों नहीं कर लेता ?
और जबाब भी सरल ही है - मैंने ऊपर ही कहा । मेरे लिये सशरीरी और अशरीरी में कोई भेद नहीं । मेरे लिये वे भी शरीर रहित इंसान ही हैं । उनके भी दुख दर्द हैं । परेशानियां हैं । मैंने ऊपर कहा । मुझे बहुत से ऐसे स्थानों की जानकारी है । जहाँ प्रेत रहते हैं । कुछ तो मेरे आगरा निवास के पीछे पार्क में ही वृक्ष पर रहते हैं । तो क्या सबको भगा दूँ । वे भी तो कहीं रहेंगे ।
लेकिन..किले आदि जैसी महत्वपूर्ण जगहें प्रेतों के रहने का स्थान नहीं होती । ये सिर्फ़ लोगों की अज्ञानता और भयवश ऐसी स्थितियां बन जाती हैं । और संविधान अनुसार भी प्रेतों से अकारण किसी को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिये । अतः यदि लोग ऐसा महसूस करते हैं कि ये जगह खाली होनी चाहिये । या यह गलत है । तो निश्चय ही ऐसा संभव है ।
क्या करना होगा - किसी भी कार्य के लिये प्रभुसत्ता के कानून की जानकारी होना आवश्यक है । ध्यान रहे । प्रभु के लिये वे भूत प्रेत आदि न होकर एक जीव ही हैं । अतः ऐसे समस्या समाधान के लिये उन लोगों को आगे आना होता है । जिनका समस्या से सम्बन्ध है । या फ़िर उनकी ऐसी भावना है । उन्हें बाकायदा एक प्रार्थना ( अर्जी ) करनी होती है । और फ़िर उपचार के लिये बताये तरीकों पर अमल करना होता है । बस बात खत्म ।
एक दिन शाम सहर को निकले । दिल में कुछ अरमान थे ।
एक तरफ़ थीं झोपडियां । एक तरफ़ शमशान थे ।
पाँव तले एक हड्डी आई । उसके यही बयान थे ।
ऐ चलने वाले चल संभल के  । हम भी कभी इंसान थे ।
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21 अगस्त 2013

और फ़िर शुरू होता है - मौत का तांडव

आत्माओं का घर - डर की सच्ची कहानियाँ । किला । जहाँ सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्माएं । पुराने किले । मौत । हादसों । अतीत । और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है । ऐसी कोई जगह जहाँ मौत का साया बनकर रूहें घुमती हों । उन जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है । और एक अजीब दुनिया के सामने जिसके बारे में उसे कोई अंदाजा नहीं होता है । अपने घुटने टेक देता है । दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले हैं । जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है । और वहाँ आज भी रूहों का वास है । दुनियाँ में ऐसी जगहों के बारे में लोग जानते हैं । लेकिन बहुत कम ही लोग होते हैं । जो इनसे रूबरू होने की हिम्मत रखते हैं । जैसे हम दुनियां में अपने होने या ना होने की बात पर विश्वास करते हैं । वैसे ही हमारे दिमाग के एक कोने में इन रूहों की दुनिया के होने का भी आभास होता है । ये दीगर बात है कि कई लोग दुनिया के सामने इस मानने से इंकार करते हों ।

लेकिन अपने तर्कों से आप सिर्फ अपने दिल को तसल्ली दे सकते हैं । दुनियां की हकीकत को नहीं बदल सकते हैं । कुछ ऐसा ही एक किले के बारे में आपको बताऊँगा । जो कि अपने सीने में एक शानदार बनावट के साथ  साथ एक बेहतरीन अतीत भी छुपाए हुए है । अभी तक आपने इस सीरीज के लेखों में केवल विदेश के भयानक और डरावनी जगहों के बारे में पढ़ा है । लेकिन आज आपको अपने ही देश यानी कि भारत के एक ऐसे डरावने किले के बारे में बताया जायेगा । जहाँ सूरज डूबते ही रूहों का कब्जा हो जाता है । और शुरू हो जाता है - मौत का तांडव । राजस्थान के दिल जयपुर में स्थित इस किले को भानगड़ के किले के नाम से जाना जाता है । तो आइये । इस लेख के माध्यम से भानगड़ किले की रोमांचकारी सैर पर निकलते हैं । भानगड़ किला एक शानदार अतीत के आगोश में सत्रहवीं शताब्दी में बनवाया गया था । इस किले का निर्माण मान सिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने करावाया था । राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे । उस

समय भानगड़ की जनसंख्या तकरीबन 10,000 थी । भानगढ़ अलवर जिले में स्थित एक शानदार किला है । जो कि बहुत ही विशाल आकार में तैयार किया गया है । चारो तरफ से पहाड़ों से घिरे इस किले में बेहतरीन शिल्प कलाओ का प्रयोग किया गया है । इसके अलावा इस किले में भगवान शिव, हनुमान आदि के बेहतरीन और अति प्राचीन मंदिर विद्यमान हैं । इस किले में कुल पांच द्वार हैं । और साथ साथ एक मुख्य दीवार है । इस किले में दृण और मजबूत पत्थरों का प्रयोग किया गया है । जो अति प्राचीन काल से अपने यथास्थिति में पड़े हुये हैं । भानगड किले पर काले जादूगर सिंघिया का शाप - भानगड़ किला देखने में जितना शानदार है । उसका अतीत उतना ही भयानक है । आपको बता दें कि - भानगड़ किले के बारे में प्रसिद्व एक कहानी के अनुसार भानगड़ की राजकुमारी रत्नावती जो कि नाम के ही अनुरूप बेहद खूबसूरत थी । उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी । और  देश के कोने कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छुक थे । उस समय उनकी उमृ महज 18 वर्ष ही थी । और उनका यौवन उनके रूप में और निखार ला चुका था । उस समय कई राज्यों से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे । उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकती थीं ।

राजकुमारी रत्नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची । और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी । उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी एक सिंघीया नाम का व्यक्ति खड़ा होकर उन्हें बहुत ही गौर से देख रहा था । सिंघीया उसी राज्य में रहता था । और वो काले जादू का महारथी था । ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दीवाना था । और उनसे प्रगाण प्रेम करता था । वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था । इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र की बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी । उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया । जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था । तस्वीरों में देखें । बङी-बड़ी एक्ट्रेस से भी सेक्सी हैं - ये हसीनायें । राजकुमारी रत्नावती ने उस इत्र के बोतल को उठाया । लेकिन उसे वही पास के एक पत्थर पर पटक दिया । पत्थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गया । और सारा इत्र उस पत्थर पर बिखर गया । इसके बाद से ही वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंघीया के पीछे चल पड़ा । और तांत्रिक को कुचल दिया । जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी । मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि - इस किले में रहने वाले सभी लोग जल्द ही मर जायेंगे । और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे । और ताउम्र उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी । उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगड और अजबगढ़ के बीच युद्व हुआ । जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये । यहाँ तक कि राजकुमारी रत्नावती भी उस शाप से नहीं बच सकी । और उनकी भी मौत हो गयी । एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्ले आम के बाद वहाँ मौत की चीखें गूंज गयीं । और आज भी उस किले में उनकी रूहें घुमती हैं । किले में सूर्यास्त के बाद प्रवेश निषेध है । फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है । किले के चारों तरफ आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया ( ए एस आई ) की टीम मौजूद रहती है । ए एस आई ने सख्त हिदायत दे रखा है कि सूर्यास्त के बाद इस इलाके में किसी भी व्यक्ति के रूकने के लिए मनाही है । इस किले में जो भी सूर्यास्त के बाद गया । वो कभी भी वापस नहीं आया है । कई बार लोगों को रूहों ने परेशान किया है । और कुछ लोगों को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है ।
इस ऐतिहासिक किले की यात्रा करने के लिए आप नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें । और जानें कि आप कैसे इस जगह जा सकते हैं । कैसे करें - भानगढ़ की यात्रा ?
किले में रूहों का कब्जा - इस किले में कत्ले आम किये गये लोगों की रूहें आज भी भटकती हैं । कई बार इस समस्या से रूबरू हुआ गया है । एक बार भारतीय सरकार ने अर्धसैनिक बलों की एक टुकड़ी यहाँ लगायी थी । ताकि इस बात की सच्चाई को जाना जा सके । लेकिन वो भी असफल रही । कई सैनिकों ने रूहों के इस इलाके में होने की पुष्ठि की थी । इस किले में आज भी जब आप अकेले होंगे । तो तलवारों की टंकार और लोगों की चीख को महसूस कर सकते हैं । इसके अलावा इस किले के भीतर कमरों में महिलाओं के रोने या फिर चूडि़यों के खनकने की भी आवाजें साफ सुनी जा सकती हैं । किले के पिछले हिस्से में जहाँ एक छोटा सा दरवाजा है । उस दरवाजे के पास बहुत ही अंधेरा रहता है । कई बार वहाँ किसी के बात करने या एक विशेष प्रकार के गंध को महसूस किया गया है । वहीं किले में शाम के वक्त बहुत ही सन्नाटा रहता है । और अचानक ही किसी के चीखने की भयानक आवाज इस किले में गूँज जाती है । आपको यह आर्टिकल कैसा लगा । कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर दें । साभार विकीपीडिया

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आज '' रक्षाबन्धन '' है । यानी मनहूस सेकुलरों का धर्म निरपेक्षता का नगाड़ा जोर शोर से बजाने का पसंदीदा त्यौहार ।
और आज मनहूस सेकुलर सेकुलरता का नगाड़ा बजाते हुए लोगों को बहकाने के लिये रानी कर्णवती और दिल्ली के बादशाह हुमायूँ को राखी भेजने का किस्सा  नमक मिर्च लगाकर सुनायेंगे । लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस कहानी का सच क्या है ? दरअसल ये कलंक कथा है । एक धार्मिक हिन्दू महारानी के राखी पर अटूट विश्वास । और, उसके साथ मुस्लिम जनित विश्वासघात करता तैमूरलंग के वंशज हुमायूँ का ।
आयें । आज उस कलंक गाथा की वास्तविकता से आपको परिचय करवाता हूँ ।
हुआ कुछ यूँ था कि मालवा और गुजरात में राज्य कर रहा बहादुर शाह दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूँ का जानी दुश्मन था । क्योंकि बहादुर शाह ने हुमायूँ के जानी दुश्मनों को अपने राज्य में शरण दे रखी थी । जिनमें प्रमुख था - इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ । हुमायूँ की सौतेली बहन मासूमा सुल्तान के पति मोहम्मद जमाँ मिर्जा और हुमायूँ के खून का प्यासा बाबर का ही अपना सगा बहनोई मीर मोहम्मद मेंहदी ख्वाजा ( याद रखें कि मुस्लिमों में ये बहुत आम है )
इधर बहादुर शाह ने हुमायूँ से दुश्मनी के कारण हुमायूँ के सारे के सारे दुश्मनों को अपने पास बैठा रखे थे ।
इस तरह बहादुर शाह हुमायूँ का नम्बर एक का दुश्मन बन गया  था । क्योंकि बहादुर शाह से हुमायूँ की जान और राजपाट के जाने का खतरा था । इसलिये हुमायूँ बहादुर शाह को किसी भी हालत में समाप्त करना चाहता था । और वो इसके लिए उचित मौके की तलाश में था । सौभाग्य से इसी बीच उसे मौका मिल गया । क्योंकि जब बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला किया । और चित्तौड़ के किले को घेर लिया । तो धर्म परायण रानी कर्णवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर उसे राखी भाई बना लिया । और उससे सहायता करने की गुहार लगाई ।
इस मौके को पाते ही हुमायूँ ने जो पहले से बहादुर शाह के लिये घात लगाये था । मौके का फायदा उठाने की गरज से ये सोचा कि बहादुर शाह राजपूतों से उलझा है । और ऐसे में उस पर अचानक हमला कर दो । और दुश्मन को खत्म कर दो । और इसी इरादे से हुमायूँ दिल्ली से पूरे लाव-लश्कर के साथ चला । न कि कर्णवती की रक्षा के लिये ।
यही कारण था कि हुमायूँ दिल्ली से चल तो दिया । लेकिन रानी कर्णवती की राखी की लाज बचाने के स्थान पर वह रास्ते में डेरा ड़ालकर बैठ गया । और बहादुर शाह के कमजोर होने का इंतज़ार करता रहा । इधर चित्तौड़ की रानी ने उस हुमायूँ को सन्देश पर सन्देश भेजा । लेकिन हुमायूँ अपनी जगह से टस से मस नही हुआ । और दूर में ही बैठा मौज मस्ती मनाता रहा । क्योंकि अपनी बहन से ही शारीरिक सम्बन्ध बनाने वाला हुमायूँ क्या जाने राखी अथवा अपनी बहन की अस्मिता को ? उसे तो सिर्फ मतलब था - अपने दुश्मन बहादुर शाह से । इधर बहादुर शाह ने रानी कर्णवती के चित्तौड़ किले को जीतकर उसे जी भर कर लूटा । इस तरह रानी कर्णवती की राखी की लाज मुसलमान घुड़सवारों की टापों के नीचे कुचल गयी । इसके बाद बहादुर शाह चित्तौड़ को लूटकर जब जाने लगा । तो हुमायूँ ने लूट का माल हड़पने तथा, कमजोर हो चुके बहादुर शाह का खत्म करने के लिए उसका गुजरात तक पीछा किया ।
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इस तरह की एक दूसरी राखी भोपाल की रानी कमलावती ने दोस्त मोहम्मद को बाँधी थी कि वह उसकी राखी की लाज रखे । और उसके पति के हत्यारे बाड़ी बरेली के राजा का वध करे । और दोस्त मोहम्मद ने बाड़ी बरेली के राजा का कत्ल कर भी दिया । जिसके बदले में रानी ने अपने इस राखी भाई को जागीर और बहुत सा धन दिया ।
परन्तु धन और जागीर पाने के बाद और शक्तिशाली हो गये दोस्त मोहम्मद ने भोपाल की रानी और अपनी राखी बहन कमलावती का सफ़ाया कर पूरे भोपाल राज्य को ही हड़प लिया ।
यही हकीकत है - इन ऐतिहासिक हिन्दू-मुस्लिम राखी भाई बहनों की ।
जागो हिन्दू । और अपनी आँखें खोलो । नहीं तो सबके सब बारी बारी इसी तरह बेमौत मारे जाओगे । जय महाकाल !
साभार Kumar Satish's फ़ेसबुक 

जप माला के 108 मनकों का रहस्य ।

सियाराम मय सब जग जानी । करहु प्रनाम जोरि जुग पानि ।
1अ 2 आ 3  इ 4  ई 5  उ 6  ऊ 7  ऋ 8  ऋ 9  लृ 10  लृ् 11 ए 12 ऐ 13 ओ 14 औ 15 अं 16 अः
1 क  2 ख  3 ग  4 घ  5 ङ । 6च  7 छ  8 ज  9 झ  10 ञ । 11 ट  12 ठ  13  ड  14  ढ  15 ण । 16  त  17 थ  18  द  19 ध  20  न । 21 प  22 फ  23 ब  24  भ  25 म । 26 य  27 र  28 ल  29 व । 30 श  31  ष  32  स  33  ह 34  क्ष 35  त्र 36  ज्ञ
सीताराम 
स + ई ( सी ) त + आ ( ता ) र + आ ( रा ) म
32 + 4 = 36    16  +  2 = 18     27 + 2  = 29     25
( 9 )                    ( 9 )                    ( 2 )           ( 7 )
36 + 18 = 54 = 5 + 4 = ( 9 ) |  29  + 25 = 54 = 5 + 4 = ( 9 )
54 + 54 = 108

आईये आज जपने की माला में 108 मनके क्यों होते हैं । इस पर बात करते हैं । सबसे पहले अंक विद्या के अनुसार 108  को चाहे किसी तरह से जोङें । इनका योग 9  ही आयेगा । जैसे 10+ 8  = 18 = 1 + 8 = 9 या 1+0+8 = 9 यही बात सीता और राम शब्दों के अंक योग पर भी  होती है । 9 अंक अंकों की पूर्णता का द्योतक है । अर्थात 9 के बाद कोई अंक नहीं आता । पूरी गणना गणित 1 से 9 के ही अन्दर है । अतः सीता शब्द का अंक योग 54 है । और राम का भी 54 ही है । और दोनों का योग 108 होता है ।
इसके अलावा 108 का एक दूसरा रहस्य भी है । 108 में सबसे पहले 1 अंक आता है । जो परमात्मा का द्योतक है । इसके बाद 0 आता है । और 0 ( से नहीं ) में ही सृष्टि उत्पन्न हुयी है । यहाँ 0 का मतलब कुछ नहीं होने से हैं । यानी आज जहाँ ये तमाम सृष्टि स्थिति है । ये स्थान तक नहीं था । तब अन्य चीजों की तो बात ही छोङ दें ।
अब 1 परमात्मा तो शाश्वत है ही । था । और हमेशा रहता है । इसके बाद 2 ( द्वैत ) 3 ( गुण ) 4 ( लोक ) 5 ( महाभूत ) आदि आदि का खेल है । 1 परमात्मा में तो कोई बात नहीं है । लेकिन 2 ( द्वैत ) से तमाम खेल प्रंपच शुरू हो जाता है । इसलिये इसमें कोई कृम या ये ठीक ऐसे ही था है । बताना लगभग असंभव है । क्योंकि एकदम कई चीजें एक साथ घटीं । हाँ लेकिन 2 से 9 तक एक बात पूर्ण सत्य है कि इन्हीं आठ अंकों में 0 रूपी परदे ( या स्थान पर ) पर जीवन था । इसलिये यदि 0 न हो । तो कोई कृम गणना आदि कुछ नहीं हो सकता । 0 की यही भूमिका है । 1 की चेतना से 8 का खेल । 8 यानी 2 से 9 । यह 8 क्या है ? मन के 8 वर्ग या भाव । ये आठ भाव ये हैं - 1 काम ( विभिन्न इच्छायें । वासनायें ) । 2 क्रोध । 3 लोभ । 4 मोह । 5 मद ( घमण्ड  ) । 6 मत्सर ( जलन ) । 7 ज्ञान । 8 वैराग । आप खूब कोशिश कर लें । इन आठ भावों से अधिक कोई भी नया भाव नहीं खोज पायेंगे । और एक तुच्छ जीव से लेकर उच्च ( महा ) आत्मा ( वास्तव में महा जीवात्मा ) तक इन्हीं आठ भावों में जीवन का ये खेल चल रहा है । यही 108 का रहस्य है । सीताराम शब्द में सीता माया है । और राम चेतन पुरुष है । इसीलिये भक्ति हेतु जपी जाने वाली माला में 108 मनकों की परम्परा बनायी गयी है । 

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