12 अगस्त 2013

मनुष्य कैसे बना - डार्विन

डार्विन के अनुसार जैव-विकास का कृम Order of Evolution according to Darwin  डार्विन अपने लम्बे ?? अनुसंधान के बाद जिस नतीजे पर पहुँचे । वो संक्षेप में इस तरह समझा जा सकता है ।
1 Chordates ( Fish )  डार्विन के अनुसार पृथ्वी पर सर्वप्रथम जलीय जीव Aquatic Organism आये । समुद्रों में जलीय जीव, सरल से जटिल होने शुरू हुये ।
मेरी बात - समुद्रों में आज भी जलीय जीव है । और जबसे मानव ने वैज्ञानिक आधार पर सोचना जानना शुरू किया । तबसे उसने कितने जीवों में ऐसा " सरल से जटिल " परिवर्तन देखा । मेरी बात ठीक से समझें । क्योंकि डार्विन के अनुसार भले ही यह बदलाव लाखों वर्षों में हुआ । पर इसमें एक निरन्तरता अवश्य थी । सभी जीव एक निश्चित तारीख से बदलना शुरू नहीं हुये । और एक निश्चित तारीख को ही नहीं बदले । जाहिर है । वही 

प्रक्रिया आज भी जारी रहनी चाहिये । और समुद्र से ऐसे जीव मिलते रहने चाहिये । जो कोई मछली से आधा बन्दर बन रहा हो । कोई व्हेल से थोङी लङकी बन रही हो । कोई हिप्पोकेम्पस में हाथी की सूँङ बन गयी हो । मेढक का 10% कंगारू बन गया हो । अरे भाई लाखों वर्षों से बदल रहे हैं । तो अब इस लाखों में कुछ और वर्ष जुङ गये ।
अरे डार्विन मियां ! दूर क्यों गये । पहले अपनी दाङी ही देख लेते कि वो हमेशा सबकी ठुड्डी पर ही उगती है । किसी की हथेली या कोहनी पर नहीं । क्योंकि आपके समय तक लाखों मनुष्य बदलाव की प्रक्रिया से गुजरते हुये बहुत लम्बा चल आये होंगे । पर आपने किसी स्त्री ( सामान्य नियम । अपवाद या हारमोंस गङबङ वाले नहीं ) की दाङी मूँछे देखी क्या ? उसे भी तो मूँछ ऐंठकर रुतबा झाङने का दिल करता होगा ।
2 Tetrapodes ( Amphibian with legs )  उसके बाद ऐसे जीवों का विकास हुआ । जो पानी और जमीन दोनों जगह पर रहने के लिए अनुकूलित थे । इन जीवों को उभयचरी ( Amphibian ) कहा जाता है । 
- मैं इसको भी मान लेता । यदि आज व्हेल दो पैरों पर चलने लगी होती । और मगरमच्छ पेङ पर चढकर जामुन खाता । और बहुत से हाथी आज थल के बजाय जल में भी रहना पसन्द करते । फ़िर ध्यान दें । ये सभी जीव

बहुत पुराने हैं । और विकासशील भारत की तरह तेजी से विकास कर रहे हैं । क्योंकि विकासवाद का सिद्धांत निरन्तर और धीरे धीरे विकास की बात कहता है । और मैं भी उसी अनुसार कह रहा हूँ । तो ज्यादा नहीं । तो सौ दो सौ तो ऐसे अजूबे दिखाई देते ।
3 Mammals  विकास का कृम आगे बढा । और स्तनधारी Mammalian जानवरों का विकास हुआ । जिनकी वजह से दैत्याकार डाइनासोर का अंत हुआ ।
- जिसे स्टीवन स्पीलवर्ग ने उसका हड्डा खोजकर फ़िर से जिन्दा कर दिया । वैसे ये गाडजिला कौन था ?
4 Primates ( to Hominidae )  इन स्तनधारी जानवरों में धीरे धीरे आधुनिक मानव के लक्षण दिखने लगे थे । 
- वाह डार्विन साहब वाह । यहाँ मेरी हार हो गयी । वाकई आज पशु इंसान से कहीं बहुत अधिक श्रेष्ठ है । सारी इंसानियत पशुओं में ही रह गयी है । वाकई विकास का यह चक्र इंसान के लिये ऐसा ( उल्टा ) घूमा कि इंसान वापस ( आपके अनुसार ) अपने मूल पशुता में लौट गया । तेजी से लौट रहा है । शायद इससे सिद्ध हो सकता है । इंसान का मूल पशु ही है । और उसका स्वभाव पशुता ।
5 Hominidae before Homo Erectus ( more like humans but much shorter )  फिर पेड़ों पर रहने वाले शारीरिक रूप से कम विकसित पर मानसिक रूप से बुद्धिमान जीवों का निर्माण हुआ । 
- हालांकि हम किसी भी तथ्य या धारणा की घोर उपेक्षा या उपहास भी नहीं कर सकते । फ़िर भी कोई तथ्य स्पष्ट और पूर्ण व्याख्या के साथ न हो । तो उसके बारे में अनेक तर्क और विचार शाखायें निकलती हैं । पर  क्योंकि ये डार्विन की अति हास्यास्पद और सच्चाई से रहित कल्पना ही है । अतः किसी परी कथा के समान कृमबद्ध ऐसी कल्पना का बन जाना स्वाभाविक ही होता है । पर जैसा कि डार्विन वैज्ञानिक था । और वैज्ञानिक दिल की अपेक्षा दिमाग से अधिक काम लेते हैं । अतः निसंदेह थोङे से ही विचार से जाना जा सकता है कि डार्विन ने ये थ्योरी बनाते समय दिमाग से काम ही नहीं लिया । ये बात पूरी मजबूती से कहने का मेरा आधार यही है कि खुद विज्ञान का मुख्य सिद्धांत ही यही है कि - पदार्थ आदि में जो क्रिया नियमानुसार एक बार होती है । या हो सकती है । वही हमेशा होती है । तभी तो विज्ञान किसी चीज को नियम को " सिद्ध " कर पाता है । उदाहरण के लिये हम सृष्टि की अनगिनत चीजों में से किसी एक को ले लें । जैसे - प्रयोग के लिये हम दूध को एक बर्त्तन में तब तक के लिये खुला रख दें । और प्रत्येक दिन उसमें होने वाले परिवर्तनों को नोट करें । जब तक उसके सूख कर कण कण न हो जायें । तो हम इस दूध पर ये प्रयोग दस साल बाद या हजार साल बाद भी करें । तो परिणाम समान ही आयेगा । यदि ऐसा न होता । तो फ़िर टेक्नोलोजी शब्द का मतलब ही खत्म हो जाता । क्योंकि ( ऊपर ) ये सिर्फ़ तथ्य है । उसकी व्याख्या नहीं । अतः अस्पष्ट है ।
6 Homo Erectus (  to Homo Sapiens  )  इसके बाद बने आदि मानव, औजारों और हथियारों का इस्तेमाल करना सीख गए थे । 
- आज भी एक नया पैदा हुआ बच्चा कौन होता है । आदि मानव ही न । आदि यानी जीवन की शुरूआत । और गौर करें । ये कितनी तेजी से अपने परिवेश से स्वतः सीखता है । इसके लिये अभी भी आप एक आसान प्रयोग कर सकते हैं । एक शहर का तेज तर्रार बच्चा । एक पिछङे गांव का बच्चा । और एक लगभग आदिवासी बच्चा । शहर का बच्चा - बोलचाल तकनीक शिक्षा आदि के मामले में बुद्धिमान होगा । पिछङे गांव का बच्चा - खेती से सम्बन्धित । पशु आदि की जानकारी । प्रकृति के कीट पतंग से परिचय और ग्रामीण कार्यों में पारंगत होगा । ग्रामीण जीवन शैली खान पान उसका शरीर ( तीनों की एक ही आयु होने पर ) सौष्ठव पूर्व के शहरी बच्चे से दुगना या ढाई गुना मजबूत बनायेगी । और एक आदिवासी जंगली जीवन के निकट होगा । उसके सभी कार्य और जीवन शैली इन दोनों बच्चों को दुस्साहसी ही लगेंगे ।  उसका खान पान ये दोनों बच्चे खाना तो दूर छूने से घबरायेंगे । इससे क्या सिद्ध होता है । हम जैसे परिवेश में होते हैं । वैसे जीना सीख लेते हैं । और आवश्कताओं के अनुरूप साधन संसाधन भी खोज ( बना ) लेते हैं । आप गौर करें । तो इतनी बुद्धि तो पशु पक्षियों में भी होती है ।  अतः ये नितांत मूर्खता की बात है । आज भी बहुत से लोग होल्डर में बल्ब नहीं लगा पाते । और बहुत से आम इंसान ( बिजली मैकेनिक नहीं ) अपने घर की पूरी या जरूरत अनुसार बिजली फ़िटिंग आदि तक कर ( सुधार ) लेते हैं । अतः डार्विन ने जैसे आदि मानव और उसके विकास की कल्पना की । वह कभी नहीं था । और यदि है । तो इतनी विकसित सभ्यता के बाद आज भी है । एकाध नहीं । हजारों लाखों है । और दुर्भाग्य से मुझे कुछ ज्यादा ही मिलते हैं । मेरी बात समझिये । दिमागी स्तर पर पाषाण युग का मानव । और अति विकसित सभ्यता का मानव । और फ़िर इनके मध्य के अनेकों स्तर । ये आज भी जीते जागते चलते फ़िरते आपके अध्ययन के लिये मौजूद हैं । फ़िर क्यों जंगलों । गुफ़ाओं । जमीन के अन्दर मरे हड्डे खोजने में समय बरबाद करते हो ।
7 Homo Sapiens - और फिर पूर्ण विकसित आधुनिक मानवों का आगमन हुआ ।
- अब देखिये । ये " पूर्ण विकसित मानव " शब्द मुझे फ़िर भृम में डाल रहा है । जबकि ये डार्विन ने उस ( अपने ) समय में कहा था । पर क्या अभी ( आज ) का मानव " पूर्ण विकसित " है ? दरअसल एक अध्यात्म विज्ञानी होने के नाते मैं पूर्ण पुरुष या पूर्ण मानव की परिभाषा बखूबी समझता हूँ । हाँ डार्विन का मतलब ये हो सकता है । शहर गांव आदि की स्थापना कर वर्तमान मनुष्य जो एक निश्चित और सुरक्षित सी जिन्दगी जीने लगा । वो डार्विन की परिभाषा में पूर्ण विकसित था । एक कामन भाव में ऐसा कहा जा सकता है । वरना मानव के विकास का उत्थान पतन और कभी क्षणिक ठहराव सृष्टि चक्र के नियमानुसार कर्म गुण आदि से प्रभावित होकर निरन्तर परिवर्तनशील रहता है ।
कुल मिलाकर मेरी खीज डार्विन को लेकर नहीं है । बल्कि उन मूढ भारतीयों को लेकर है । जो सृष्टि जीवन आदि के रहस्यों के लिये डार्विन जैसों पर आश्रित रहते हैं । और उनके तुच्छ ज्ञान को सगर्व पाठय पुस्तकों में लगवाते हैं । जबकि सम्पूर्ण और शाश्वत ज्ञान कभी भी और अभी भी सिर्फ़ भारतीय धरोहर ही था । है । और हमेशा रहेगा । क्यों ? इसके कुछ विशेष कारण हैं । जिन पर चर्चा फ़िर कभी । 
( ये निम्न पंक्तियां मैंने पहले लिखी हैं । और ऊपर की बाद में । अतः पढने में सामजस्य कर लें । )
- ये जानकारी और ब्लाग का लिंक मुझे स्वपनिल ने भेजा है । और इसमें नया कुछ भी नहीं है । पर दुर्भाग्यवश मनुष्य का निर्माण और विकास जिसे ये विदेशी लोग जैव विकास कहते हैं । हमें चार्ल्स डार्विन जैसे लोगों से जानना पङता है । क्योंकि यही हमारी अलग अलग कक्षाओं की पाठय पुस्तकों में पढाया भी जाता है । शायद आपको जानकारी न हो । विदेशियों की कूटनीति और फ़ूटनीति ही ये होती है कि किसी देश को जङ सहित कब्जा करना या नष्ट करना हो । तो उसकी मूल सभ्यता संस्कृत और विरासती ज्ञान को नष्ट कर दो । और उसकी जगह अपनी सभ्यता संस्कृत विकसित कर दो । पर थोङा सा अन्तर है । ये ऐसा इस्लामी सभ्यता की तरह जोर जबरदस्ती का फ़ार्मूला न अपनाकर आपको मानसिक तौर पर पंगु और शारीरिक तौर पर आरामपरस्त और विभिन्न व्यसनों का व्यसनी बना देते हैं । और फ़िर मजबूरन आपके दाँत महँगे कालगेट हड्डी चूर्ण से ही साफ़ होते हैं । आपको ये भी बताया ( डराया ) जाता है कि कैसे आपके चकाचक साफ़ मारबल के घर में घुटनों चलते बच्चे को जीवाणु नुकसान पहुँचा सकते हैं । और इसके लिये सिर्फ़ उनका ये या वो प्रोडक्ट ही सुरक्षा देता है आदि आदि । ये थोङी सी लाइनों का जिक्र मैंने सिर्फ़ इसीलिये आपको याद दिलाने हेतु किया था कि आपको झटका लगे - कहाँ आ गये आप ? कभी आपने गौर किया है कि ये आपका भारत ही है । या कोई अन्य देश ?
चलिये मूड खराब हो गया । इसलिये कुछ और बात करते हैं । जहाँ तक मेरी बात है । क्योंकि मैं मोटी बुद्धि का हूँ । मुझे न्यूटन की तरह इस बात से टेंशन नहीं होती कि - सेब नीचे ही क्यों गिरा । आसमान में क्यों नहीं चला गया । इससे ये पूछो कि सेव आसमान में चले जाते । तो फ़िर तुम खाते क्या ? इसलिये मैं कभी सेब के नीचे गिरने का इंतजार भी नहीं करता । बल्कि गिरने से पहले ही तोङ लेता हूँ ।
खैर..जहाँ तक मेरी जानकारी है । जैव विकासवाद का यही सिद्धांत हम भारतीयों को भी पढाया जाता है । मैं मजाक नहीं कर रहा । गहराई से मेरी बात समझें । चार्ल्स डार्विन कब हुआ ? उस समय वैश्विक ज्ञान की उनके देश में क्या स्थिति थी । स्वयं उसके खोजे गये सिद्धांत क्या कहते हैं ? उसकी मनोस्थिति किससे प्रभावित थी ? और उसकी खोजों की क्या परिस्थितियां थी आदि आदि । यदि हम ऐसे तथ्यों पर विचार करेंगे । तो चाहे वो चार्ल्स डार्विन हो । या सर हाइजैक न्यूटन । या कोई अन्य । इनको उठाकर रद्दी की टोकरी में डाल देंगे । क्योंकि इनके ज्ञान ? की उससे बेहतर जगह कोई नहीं है ।
मैं फ़िर से एक महत्वपूर्ण तथ्य आपके सामने रखता हूँ । एक कोशिकीय जीव अमीबा से या मानवाकार कपि से या डार्विन के विकासवाद सिद्धांत से क्या ये सिद्ध हो गया कि प्रथ्वी पर जीवन का विकास ऐसे ही हुआ है ? और ये सब सिद्धांत कितने पुराने हैं ? तो फ़िर हमारे पास इन सब रहस्यों को लेकर जो एक अति पुरातन समृद्ध और स्पष्ट ज्ञान विज्ञान मौजूद है । उसको भी बच्चों युवाओं को क्यों नहीं पढाया जाता । मैं बताता हूँ । यही है । अंग्रेजों की कू्टनीति । किसी के भी विरासती ज्ञान को नष्ट करना । 

Comparision - Evolution according to Darwin and according to Dashavtar
जैव-विकास - दसावतार के रूप में Evolution in form of Dasaavatar of Lord Vishnu  
http://purvanchalbloggerassociation.blogspot.in/2012/11/evolution-in-form-of-dasaavatar-of-lord.html
बृह्मा ने सृजन कैसे किया ? पढें - Creation by Brahma 
http://purvanchalbloggerassociation.blogspot.in/2012/11/creation-by-brahma.html

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