07 अगस्त 2013

पापियों का विनाश करेगा कल्कि अवतार

आज सुबह ही मैंने फ़ेस बुक पेज पर एक लेख पढा । उस लेख का विषय यही था कि भारत अब भी विदेशी शक्तियों का गुलाम है । भारत का सम्पूर्ण राजतन्त्र मीडिया और अन्य प्रमुख हस्तियाँ विदेशी कुचालों का शिकार होकर वश या विवश उनसे लुटने को विवश हैं । फ़ेसबुक पर ऐसे अनेकानेक पेज हैं । जो इस अन्याय भृष्टाचार आदि के विरुद्ध लगभग खुला और चुनौतीपूर्ण आन्दोलन चलाये हुये हैं । यहाँ समझना होगा कि इंटरनेट अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ एक सबसे सस्ता और सुलभ संचार तन्त्र हैं । जिससे कोई भी घर बैठे ऐसे किसी भी आन्दोलन आदि में पूर्ण सहयोग कर सकता है । और नवीनतम सूचनाओं को तुरन्त प्राप्त भी कर सकता है । 
यह सभी कुछ अपनी जगह ठीक ही है । पर लेख में मुझे एक लाइन ने विशेष आकर्षित किया । जिसके अनुसार 

दिवंगत श्री राजीव दीक्षित ने विदेशी भृष्टाचार को समूल मिटाने के लिये 1 00 000 ऐसे नवयुवकों की चाह की थी । जिनको मरने का डर ना हो । दूसरा एक अन्य बिन्दु ये भी था कि अब पाप भृष्टाचार चरम पर है । अतः कल्कि जैसा कोई अवतार ही इन पापियों का विनाश करेगा । और ऐसे लोगों को बेसब्री से उसी कल्कि अवतार का इंतजार है । एक और भी लाइन आकर्षित कर रही थी । अब सनातन धर्म की स्थापना का समय आ गया है । युग परिवर्तन होने वाला है आदि । ये कुछ मुख्य बिन्दु हैं । जिनको अक्सर आप देखते होंगे । या सहभागिता भी करते होंगे ।
पर इन सभी बिन्दुओं पर मेरे विचार अलग हैं । अगर हम सबसे बङे मुद्दे ( कुछेक देशी या विदेशी व्यक्तियों की मनमानी ) पर ही विचार करें । तो एक तरफ़ तो आप पाप , अवतार , 

भगवान और सनातन धर्म जैसे बिन्दुओं पर पूरी आस्था और दृण विश्वास से बात करते हैं । और दूसरी तरफ़ ये भी मानते हैं कि कुछेक राक्षस श्रेणी के व्यक्ति अधर्म का शासन लगभग जबरन ही चला रहे हैं । और इसके लिये किसी अवतार की आवश्यकता है ? गौर करें । तो ये हास्यास्पद अज्ञानयुक्त और एकदम विरोधाभासी है । हाँ यदि आप नास्तिक परिभाषा में सिर्फ़ मनुष्य स्तर पर धर्म अधर्म युद्ध की बात कर रहे होते । तब ये अधिक सही होता । पर भगवत सत्ता को बीच में लेने से पूरी बात खराब हो जाती है । इससे  ये साबित होता है कि भगवान इतना निरीह और वेवश है कि उसे मुठ्ठी भर मनुष्य स्तर ? ( ध्यान दें कि राक्षसों के पास दैवीय अलौकिक मायावी शक्तियां होती हैं ) के लोगों का विनाश करने के लिये शरीरधारी बनना होगा । क्या इसका मतलब ये नहीं कि भले ही अदृश्य सही । पर वह सत्ता काल्पनिक ही है । जिसकी मर्जी के बिना एक पत्ता नहीं

हिल सकता । और जब अधर्म रूपी ये पत्ते हिल रहे हैं । तो जाहिर है । उसी की मर्जी ( वास्तव में सृष्टि संविधान के अनुसार ) से हिल रहे हैं । दूसरे  इससे हिन्दू धर्म या सनातन धर्म के कुछ प्रमुख सूत्र भी गलत हो जाते हैं । जैसे - वही परमात्मा सबमें है । भगवान कण कण में व्याप्त है । सबका मालिक एक है ।
नाना भांति राम विस्तारा । रामायन सत कोटि अपारा । 
राम जन्म के हेत अनेका । अति विचित्र एक ते एका । 
कोऊ न काहू सुख दुख कर दाता । निज कर कर्म भोग सब भ्राता ।
इसलिये आप किसी अधर्मी मनुष्य सत्ता के लिये सिर्फ़ किसी समूह या किसी मनुष्य को उसकी मनमानी सहित उत्तरदायी ठहराते हैं । तो ये पूरी तरह गलत है । किसी भी व्यक्ति या तन्त्र या समूह से कोई एक व्यक्ति अनेक व्यक्ति समाज या पूरा देश भी पीङित है । तो उस व्यक्ति से अधिक दोषी पीङित वर्ग है । देखिये - हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम से प्रकट होत मैं जाना । कितनी देर लगती है । यदि भाव सच्चा हो ।
किन्हीं भी ऐतहासिक तथ्यों सामयिक आंकङों गिनती में उलझने के बजाय उदाहरण के तौर पर मान लें कि आपका सोचा हुआ कल्कि अवतार ( या सनातन धर्म ) सिर्फ़ 500 साल या महज 100 साल बाद ही हो जाये । तो उससे आपको क्या लाभ होगा ? क्योंकि तब तक ( आज का एक वर्ष का बालक भी ) आपमें से कोई नहीं बचेगा । 
या उसमें ( अवतार के समय या अवतार के लिये ) आपके श्रम या क्रांति योगदान का क्या महत्व होगा ? 
अब मैं विश्व प्रसिद्ध दिवंगत राजीव दीक्षित की बात करूँगा । एक आंतरिक योगी होने के नाते मैं जानता ( देखा ) हूँ । राजीव दीक्षित इस समय पक्षी योनि में चील पक्षी के रूप में है । ये मैंने आपको सिर्फ़ जानकारी ही दी है । मेरा कोई आग्रह नहीं । आप इसे सच ही मानें । लेकिन जीवित राजीव दीक्षित के जीवनकाल को विचारों को आवाहन को आप विभिन्न संचार माध्यमों से अवश्य जानते होंगे । राजीव दीक्षित धन से सम्पन्न थे । विश्व प्रसिद्ध योग गुरु से जुङे थे । चरित्रवान और ईमानदार थे । सात्विक और स्वदेशी विचारों के थे । कानून और भृष्टाचार की बारीक जानकारी रखते थे । विश्व प्रसिद्ध थे । उनके हजारों ( या लाखों ) समर्थक थे । और उन्होंने यथासम्भव क्रांति भी की । परन्तु परिणाम क्या निकला ? मेरे हिसाब से टांय टांय फ़िस्स । एक और बिन्दु पर गौर कीजिये । राजीव दीक्षित जिस क्रांति का सूत्रपात कर गये हैं । ( जितनी जानकारी उन्होंने इंटरनेट या पुस्तकों आदि में आम जनता को दी है । ) उसे रामदेव या बालकृष्ण या कोई अन्य बढा पायेगा । या बढा रहा है ? क्योंकि इंटरनेट पर चित्र लगाने और लेख लिखने से कभी धर्म युद्ध नहीं लङे जा सकते । जमीनी हकीकत और काल्पनिकता में जमीन आसमान जैसा ही फ़र्क होता है । 
अगर आप मेरी मानें । तो रामदेव को अनुलोम विलोम से बहुत ज्यादा कुछ नहीं आता । और बालकृष्ण किसी आयुर्वेदाचार्य या कोई अन्य चार्य के बजाय रामदेव का विश्वसनीय सेक्रेटरी अधिक है । बस ये उसकी असली योग्यता है । आयुर्वेद या वैश्विक भृष्टाचार आदि के जो मुद्दे गतिविधियां पतंजलि से उभरे । और जिसकी वजह से पतंजलि विश्व प्रसिद्ध हुआ । वह सिर्फ़ राजीव दीक्षित की मेहनत और शोध कार्यों की देन थे । वरना अभी आप देख लो क्या इन पर कोई सार्थक कार्य ( उतनी ही गर्मजोशी से ) हो रहा है । जैसा राजीव के समय निरन्तर होता था ।
लेकिन मैंने कुछ अलग बात कहने के लिये चर्चा शुरू की है । जब राजीव दीक्षित हर तरह से शक्ति ( साधनों से ) सम्पन्न थे । धर्म के लिये कार्य कर रहे थे । तो जाहिर है । प्रभु के प्रति उनमें आस्था भी रही होगी । और वह 1 00 000 जुझारू नवयुवकों की सेना अधर्मी विधर्मी लोगों के विरुद्ध युद्ध लङने के लिये तैयार करना चाहते थे । फ़िर भी ऐसा हर अंग शक्तिशाली राजा असमय ही रहस्यमय मौत का शिकार हो गया । सम्भावना किसी गहरे षङयन्त्र की लगाई जाती है । 
दरअसल ( विस्तार में न जाकर ) मैं कहना चाहता हूँ कि इस सृष्टि या बृह्माण्ड में वास्तव में एक ऐसी ही सत्ता का नियन्त्रण है । जिसकी मर्जी के बिना वास्तव में पत्ता भी नहीं हिल सकता । और उसका एक ही सरल और सादा सा उपदेश है । तुम पहले स्वयं को सुधारो । खुद को सनातन ऊर्जा से जोङो । जब तुम एक मजबूत स्थिति में आ जाओ । तब स्वयं के साथ साथ दूसरों को सुधारने में सहयोग करो । तब तुम्हीं कल्कि अवतार हो । तुम्ही राम हो । तुम्ही कृष्ण हो । और तुम्ही सनातन धर्म हो । और इस सबके लिये किसी लम्बे समय के इंतजार किसी फ़ालतू अवतार आदि की आवश्यकता ही नहीं है ।
और ध्यान रहे । ये सब मैं साधु छाप फ़ालतू उपदेश नहीं कर रहा । बल्कि जमीनी स्तर पर निरन्तर बहुत तेजी से कार्य भी कर रहा हूँ । मेरे धर्म योद्धा अलग अलग स्तर पर तेजी से अलौकिक शक्तियों के साथ तैयार भी हो रहे हैं ।
देखिये किसी भी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये उसके तन्त्र को समझना होता है । उसका हिस्सा बनना होता है । फ़िर उसके अनुसार पहले खुद को बाद में अन्य को जरूरत के अनुसार परिवर्तित करना होता है । तब वह सम्भव होता है । जो आप चाहते हैं ।
जो इच्छा करिहो मन माहीं । राम कृपा कछु दुर्लभ नाहीं ।
सकल पदारथ हैं जग माहीं । कर्म हीन नर पावत नाहीं ।
जा पर कृपा राम की होई । ता पर कृपा करे सब कोई । 
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिमि हरि सरन न एक हू बाधा ।
विशेष - क्षमा चाहूँगा । इस लेख को और भी अधिक विस्तार से लिखना चाहता था । पर व्यस्तता और समय के अभाव से अभी मुमकिन नहीं । लेकिन जो बिन्दु आपको अटपटे अस्पष्ट या ठेस पहुँचाने वाले लगे । उनको आप बतायेंगे । तो मैं उन्हें विस्तार से स्पष्ट कर दूँगा । साहेब ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम । 

मेरे अनुरोध पर उपलब्ध कराये गये लिंक -
ISCKON
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youtube link - http://www.youtube.com/watch?v=Ba_lbbIjxtU 

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http://purvanchalbloggerassociation.blogspot.in/2012_11_01_archive.html

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