01 अगस्त 2013

दूसरे गुरु की जिज्ञासा


भाईजी ! जय गुरूदेव । मैं काफी दिनों से आपका ब्लाग सत्यकीखोज पढ़ रहा हूँ । आज गुरू पूर्णिमा के दिन आपकी पोस्ट पढ़ी । एक जिज्ञासा आयी मन में । सो आपको मेल कर रहा हूँ । मैं परम सन्त बाबा जय गुरूदेव जी महाराज का अनुयायी हूँ । और उन्हीं से नामदान लिया है । बाबाजी ने पिछले वर्ष शरीर त्याग दिया । मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि क्या मैं उनके बताये अनुसार साधना करता रहूँ ? अथवा कोई दूसरे गुरू से नामदान लूँ ।  आप इस विषय में मेरा कोई मार्गदर्शन करें । आपका आभार । मनीष वार्ष्णेय
- मैंने आप लोगों से अनुरोध किया था कि आप मेरे गुरु मण्डल से शिष्य हैं । अथवा किसी अन्य मण्डल से । मैं सम्पूर्ण मानव जाति के मार्गदर्शन उत्थान और आत्मिक जाग्रति हेतु ही कार्यरत हूँ । क्योंकि आप लोग ज्ञान पूर्वक कम देखा देखी और प्रभावित 

होकर किसी गुरु से गुरुदीक्षा अधिक ले लेते हो । ऐसे ज्ञान का सिद्धांत और नियम जाने बिना वो ज्ञान लेना न लेना बराबर ही होता है । समय की बरबादी अधिक होती है । अतः इसीलिये मैंने कहा था कि जब तक मैं सशरीर हूँ । आप मुझसे भरपूर लाभ उठा सकते हैं । लेकिन इसके लिये कोई भी प्रश्न पूछने से पहले आपको कुछ बातें अवश्य बतानी चाहिये । आपको गुरुदीक्षा लिये कितना समय हो गया । नाम या ध्यान का अभ्यास कितने समय तक करते हैं । आपको क्या लौकिक और अलौकिक अनुभव हुये । तथा सबसे महत्वपूर्ण गुरु से जुङने के बाद आपके जीवन में क्या उल्लेखनीय परिवर्तनीय हुये । यहाँ ये बात ध्यान रहे कि बहुत से लोग कहते हैं । हमारे कुछ काम बने । हमें शान्ति मिली । यह सब इतनी जल्दी नहीं होता । अर्थात मरने के बाद मिलता है । या दूसरा गुरु नहीं करना चाहिये आदि आदि । पर ध्यान रहे । इसमें गुरु ज्ञान या प्रभु भक्ति जैसा कुछ नहीं है । बल्कि ये सामान्य बातें हैं । जो आपके आचरण में सुधार और भक्ति भाव से फ़लित हुयी हैं । मोक्ष ज्ञान और ध्यान चेतन समाधि आदि मामूली चीजें नहीं हैं । यदि आप इनको थोङा सा भी गम्भीरता से और सही तरीके से लेते हो । तो इनके परिणाम बहुत शीघ्र आते हैं । 
हालांकि मैं किसी भी मण्डल या व्यक्ति की आलोचना का पक्षधर नहीं हूँ । फ़िर भी सही बात बताना और सत्य कहना मेरा नैतिक कर्तव्य है । बाबा जय गुरुदेव के कई अनुयायी उनके जीवित रहते ही मेरे पास आ चुके हैं । और ज्ञान ध्यान का सही रहस्य जानकर भौंचक्का ही रह

गये । सही नामदान क्या है ? कैसे लिया दिया जाता है । इसके बाद क्या परिवर्तन होता है ? ये कोई ऐसी सामान्य बातें नहीं हैं । जो सभी को सही ही मालूम हों । व्यस्तता और आपाधापी भरी इस जिन्दगी में प्रभु भक्ति और मोक्ष भी इंसान औपचारिकता सी निभाता हुआ करता है । और अन्तकाल में पछताता है । आछे दिन पाछे गये किया न हरि से हेत । अब पछताये होत क्या । जब चिङिया चुग गयी खेत । और..राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट । अन्तकाल पछतायेगा जब देह जायेगी छूट । अक्सर तभी होश आता है । जब मुगदर लिये भयंकर यमदूतों से सामना होता है । 
खैर..मनीश जी मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ । मैं आपके ज्ञान ध्यान अभ्यास आदि के बारे में सब जानता हूँ । क्योंकि आपने मुझसे मार्गदर्शन की आशा की है । तो मैं यही कहना चाहूँगा कि आप हमारे यहाँ दिल्ली या फ़िरोजाबाद ( के पास 22 किमी दूर ) आकर मिलें । और असली सत्य को जानें । तब आपको ज्ञात होगा कि आप वास्तविकता से कितने दूर थे । संक्षेप में आप जो भी और जितनी साधना कर रहे हैं । वह परिणाम में लगभग व्यर्थ ही है ।

सभी चित्र हमारे चिन्ताहरण मुक्त मण्डल आश्रम से


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