22 अगस्त 2013

चलने वाले चल संभल के हम भी कभी इंसान थे

कल अचानक मैंने राजस्थान के अलवर जिले में स्थिति भानगढ किले के बारे में पढा । लेकिन अचानक शब्द मेरे चौंकने को नहीं दर्शाता । मुझे ऐसी बहुत सी प्रसिद्ध किले जैसी इमारतों और अनाम साधारण जगहों का भी पता है । जहाँ इस किस्म के प्रेतवासे होते हैं । इसलिये चौंकने वाली बात नहीं है । बल्कि बात ये है कि - किसी भी प्रेतग्रस्त क्षेत्र को लेकर  जन साधारण में जानकारी के अभाव में कैसी कैसी बातें प्रचलित हो जाती हैं । और मैं अपने सोचने के अलग अन्दाज को लेकर कुछ अलग ही सोचता हूँ । सबसे पहले मैंने ये सोचा कि - ये किला सत्रहवीं शताब्दी में बना है । यानी तीन सौ साल पहले । और नारायण दत्त श्रीमाली अभी कुछ ही दशक पहले हुआ । भूत प्रेत और डाकिनी शाकिनी कर्ण पिशाचिनी जाने कौन कौन सी बलाय को लेकर पुस्तकें लिखीं । प्रचार भी किया कि - ये सब उनके वश में है । ये विद्या वो विद्या । ये सिद्धि वो सिद्धि आदि आदि । तो अपने ही क्षेत्र की एक प्रसिद्ध और ऐतहासिक जगह पर उनकी नजर नहीं गयी । या तमाम लोग ( या राजस्थान सरकार ) दस बीस पचास हजार खर्च कर श्रीमाली से कोई अनुष्ठान करा के भूतों से किले को छुङवा लेते । जो श्रीमाली और ऐसी चीजों में विश्वास रखते हैं । ध्यान रहे । श्रीमाली का उदाहरण मैं सिर्फ़ इस क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति के तौर पर सिर्फ़ उदाहरण के लिये ही दे रहा हूँ । जन जागरूकता के उद्देश्य से दे रहा हूँ । वरना श्रीमाली ने मेरी कोई भेंस नहीं खोली है । और भी तमाम दिग्गज ? लोग टीवी इंटरनेट किताबों

आदि में गाल बजाते रहते हैं । तब आप लोगों को कभी ख्याल नहीं आता कि - ऐसे लोगों से कहो कि भैया ये कीमती चीज यहाँ बरबाद हो रही है । इस पर कोई हाथ आजमाओ । तो प्रचार अपने आप हो जाये । वो भी विश्व स्तर पर । सन्तों की पूरी फ़ौज राजनीति राजनीति खेल रही है । उस पर इसका कोई समाधान नहीं है । 
आप ठीक से समझें । मैं इसी किले या किसी एक स्थान या किसी एक व्यक्ति या किसी एक कारण की बात नहीं कह रहा । बल्कि अंधी धार्मिकता की बात कह रहा हूँ ।
खैर..इस किले की किवदंती कहानी में कोई बहुत सुन्दर राजकुमारी रत्नावती और काले जादू का कलुआ कोई सिंघिया था । जिसने इत्र की शीशी पर जादू कर दिया । राजकुमारी ने उस शीशी को पत्थर पर फ़ोङ दिया । जादू शीशी से पत्थर में घुस गया । और पत्थर क्रोधित होकर कलुआ जादूगर सिंघिया के ही पीछे पङ गया । और उसे मार डाला । इस पर उसने किले से सम्बन्धित सभी लोगों को शाप दिया । और सभी मारे गये आदि आदि ।
अरे अक्ल बन्दरो ! क्यों अक्ल के पीछे हमेशा लठ्ठ लेकर ही दौङते हो । जो वो बेचारी भेजे में तो आना दूर । भय से तुम्हारे पास भी नहीं आ पाती ।
ये बताओ । आज कबाङे का काम इतनी जोरों पर है कि छोटे मोटे कबाङी भी लखपति से कम नहीं है । मेरा मतलब सिर्फ़ नाम ही कबाङी है । वरना बीबी बच्चों पर भी चार पहिया गाङी है । फ़िर किसी कबाङी के कबाङ में आज दिन तक अलादीन जैसा कोई चिराग निकला ?

ये करिश्माई किस्से सिर्फ़ कई सौ साल पहले ही क्यों हुये । आज क्या वैसे तांत्रिक मर गये ? या रत्नावती सी खूबसूरत छोरियां नहीं हैं ? अगर एक तान्त्रिक द्वारा पूरा राजमहल और पूरी सत्ता ही ध्वस्त होकर मृत्यु के परिणाम को प्राप्त हो सकती है । तो फ़िर - दस जनपथ । कांग्रेस पार्टी । मनमोहन सिंह । सोनिया गाँधी और राहुल आदि आदि को नर्क में पहुँचाने का अरमान रखने वाले सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही हजारों है । जो दस बीस लाख रुपया भी खर्च कर सकते हैं । तो एक इत्र की शीशी प्रियंका के लिये भी फ़ुङवा दी जाये ।
अब समझिये । मेरा मतलब । ऐसा नहीं है कि - ऐसी विद्यायें नहीं हैं । चिराग का जिन्न भी नहीं है । या इसको करने वाले व्यक्ति नहीं हैं । सभी है । पर क्योंकि जनता में इस क्षेत्र में असली जानकारी का अभाव होता है । इसलिये कुछ की कुछ बात बन जाती है । सच वह नहीं होता । जो प्रसारित प्रचारित हो जाता है । और तब बेशकीमती जगहें स्थान अभिशापित सा रह जाती हैं ।
अब मैं अधिक विस्तार में न जाकर ऐसी जगहों के ठीक होने और बहुत आसानी से प्रेत मुक्त होने के उपाय बताता हूँ । आज तरह तरह के विद्युत उपकरणों के होने से ये सब बहुत आसान है । सबसे पहले ऐसी जगह को एकदम झाङ पोंछकर स्वच्छ कर दिया जाये । इसको कुछ समय तक लगातार धुलाई की जाये । फ़िर बङिया पुताई करा दी जाये ।

कोई भी कमरा बन्द न रखें । खास तौर से रात में भी भकाभक उजाला रहे । ऐसी व्यवस्था हो । दिन में लगातार चहल पहल जारी रहे । यदि सामान्य लोगों को भय लगता हो । तो निडर और भक्ति में आस्था रखने वाले लोग पहल कर सकते हैं । या उनके साथ रह सकते हैं । शोरगुल या कीर्तन आदि लगातार होने दें । क्योंकि ये प्रेतों को सख्त नापसन्द है । कुछ खास रामचरित मानस के दोहे और अन्य भक्ति मन्त्र किले की दीवारों पर लिखवा दिये जायें । आते जाते लोग अनायास इसको पढेंगे । इससे सात्विक तरंगे माहौल में क्रियाशील हो जाती हैं । जो प्रेतों के लिये जानी दुश्मन हैं । मुश्किल से पन्द्रह दिन में भूत प्रेत का सफ़ाया ऐसे हो जायेगा । जैसे लादेन और सद्दाम का हुआ था । क्योंकि ये सभी चीजें प्रेतों को कष्ट पहुँचाती हैं ।
आप लोग मुझसे एक शाश्वत सवाल ( तर्क ) कर सकते हैं कि - वो तो ठीक है । मगर इस बिल्ली के गले में घन्टी बाँधेगा कौन ? क्योंकि कोई गम्भीर प्रेत समस्या या किसी की जान चली गयी तो ? ऐसा भय आम इंसान को होता ही है ।
और जबाब वही सदाबहार है - ये बिल्ली बिलौटा कोई भी हो । मैं इसके गले में घण्टी नहीं घण्टा बाँध दूँगा । और तब मुझे इसके लिये ( अपने स्तर पर ) ऊपर लिखे उपाय प्रपंच करने की भी कोई आवश्यकता नहीं । मैंने कभी भगवान के लिये एक अगरबत्ती नहीं जलायी । फ़िर इन भूतों को धूप बत्ती और लड्डू क्या खिलाऊँगा । वैसे मैं प्रेतों को कोई घृणित चीज या त्याज्य वस्तु के तौर पर भी नहीं देखता । दरअसल ये भी कभी इंसान थे । जो अपने कर्म संस्कार और तमाम अन्य कारणों से आज अदृश्य सूक्ष्म शरीर वाले होकर दारुण कष्ट भोग रहे हैं । अतः कम से कम मुझे सशरीर इंसानों और अशरीर प्रेतों में कोई अन्तर नहीं लगता । उनकी दुष्टता की काल्पनिक कहानियां अधिक हैं । सच्चाई के तल पर ऐसा नहीं होता है । जैसे इंसानों में सज्जन दुष्ट दोनों हैं । वैसे ही प्रेतों में भी हैं । क्योंकि वे कोई एलियन नहीं । पूर्व के इंसान ही हैं ।
खैर..किसी भी संयोग से ऐसा कोई मामला मेरे पास आता है । तो पहले तो मुझे कुछ कहने करने की आवश्यकता ही नहीं होती । फ़िर भी अगर आवश्यक हो । तो मैं सिर्फ़ इतना ही कहता हूँ - अब यहाँ से दफ़ा हो जाओ सब ।... मुझे नहीं पता । अमेरिका जाओ । रूस जाओ । या जहन्नुम में जाओ । बस इतना ही मेरा इलाज है । इतना ही मेरा मन्त्र है ।
लेकिन..अभी सवाल एक और भी है । जो तर्क युक्त भी है । कोई भी कह सकता है कि - जब सभी सही स्थिति की मुझे जानकारी है । उपाय भी है । सामर्थ्य भी है । तो मैं जन हितार्थ स्वयं ( अपने ही स्तर पर ) ही ऐसा क्यों नहीं कर लेता ?
और जबाब भी सरल ही है - मैंने ऊपर ही कहा । मेरे लिये सशरीरी और अशरीरी में कोई भेद नहीं । मेरे लिये वे भी शरीर रहित इंसान ही हैं । उनके भी दुख दर्द हैं । परेशानियां हैं । मैंने ऊपर कहा । मुझे बहुत से ऐसे स्थानों की जानकारी है । जहाँ प्रेत रहते हैं । कुछ तो मेरे आगरा निवास के पीछे पार्क में ही वृक्ष पर रहते हैं । तो क्या सबको भगा दूँ । वे भी तो कहीं रहेंगे ।
लेकिन..किले आदि जैसी महत्वपूर्ण जगहें प्रेतों के रहने का स्थान नहीं होती । ये सिर्फ़ लोगों की अज्ञानता और भयवश ऐसी स्थितियां बन जाती हैं । और संविधान अनुसार भी प्रेतों से अकारण किसी को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिये । अतः यदि लोग ऐसा महसूस करते हैं कि ये जगह खाली होनी चाहिये । या यह गलत है । तो निश्चय ही ऐसा संभव है ।
क्या करना होगा - किसी भी कार्य के लिये प्रभुसत्ता के कानून की जानकारी होना आवश्यक है । ध्यान रहे । प्रभु के लिये वे भूत प्रेत आदि न होकर एक जीव ही हैं । अतः ऐसे समस्या समाधान के लिये उन लोगों को आगे आना होता है । जिनका समस्या से सम्बन्ध है । या फ़िर उनकी ऐसी भावना है । उन्हें बाकायदा एक प्रार्थना ( अर्जी ) करनी होती है । और फ़िर उपचार के लिये बताये तरीकों पर अमल करना होता है । बस बात खत्म ।
एक दिन शाम सहर को निकले । दिल में कुछ अरमान थे ।
एक तरफ़ थीं झोपडियां । एक तरफ़ शमशान थे ।
पाँव तले एक हड्डी आई । उसके यही बयान थे ।
ऐ चलने वाले चल संभल के  । हम भी कभी इंसान थे ।
http://www.youtube.com/watch?v=SwxGm0lVSPQ&feature=youtube_gdata_player

http://www.youtube.com/watch?v=hBCvyrqrSXQ&feature=youtube_gdata_player


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