28 अगस्त 2013

मरने की कला सीखो

कल गुरुकुल कांगड़ी के भूतपूर्व उपकुलपति सत्यव्रत का आश्रम में आना हुआ । दर्शन उन्हें आश्रम दिखाने ले गयी । सत्यव्रत ने उपनिषद पर किताबें लिखी हैं । वेदों के ज्ञाता हैं । इस देश में कुछ थोड़े ही लोग वेद को इतनी गहराई से जानते होंगे । जैसा सत्यव्रत जानते हैं । उनके वक्तव्य, उनके विचार मैंने पढ़े हैं । मगर उनका भी प्रश्न दर्शन से यही था कि आप अपने गुरु को भगवान क्यों कहती हैं ? उनका भी । ऐसे हमारे पंडित में और अज्ञानी में जरा भी भेद नहीं है । दर्शन ने ठीक उत्तर दिया उन्हें । दर्शन ने कहा - भगवान तो आप भी हैं । मगर आपको इसका स्मरण नहीं है । और उन्हें स्मरण आ गया है । मुंहतोड़ जवाब था । 2 टूक जवाब था । और पंडित जब कोई इस आश्रम में आये । तो ध्यान रखना । ऐसा ही ठीक ठीक जवाब देना । उपनिषद पर किताबें लिखी हैं सत्यव्रत ने । जरूर " अहं ब्रह्मास्मि " शब्द के करीब आये होंगे । ऐसा कौन है । जो नहीं आया है । जरूर यह महावाक्य सोचा होगा । विचारा होगा - तत्वमसि श्वेतकेतु ! हे श्वेतकेतु, तू वही है । और इस पर विवेचन भी किया होगा । इस पर व्याख्यान भी दिये होंगे । लेकिन यह बात ऊपर ऊपर गुजर गयी । इससे तो सीधी साधी दर्शन में ज्यादा गहरी उतर गयी । यह पांडित्य ही रहा । थोथा, कचरे जैसा । इसका कोई मूल्य नहीं । 2 कौड़ी इसका मूल्य नहीं ।
उपनिषद कहते हैं - तुम वही हो । और उपनिषद कहते हैं - मैं ब्रह्म हूं । फिर भी तुम पूछे चले जा रहे हो कि क्यों किसी को भगवान कहें ? मैं तुमसे पूछता हूं । ऐसा कौन है । जिसको भगवान न कहें ?
रामकृष्ण से किसी ने पूछा - भगवान कहां है ? तो रामकृष्ण ने कहा - यह मत पूछो, यह पूछो कि कहां नहीं है ?
नानक को काबा के पुरोहितों ने कहा - पैर हटा लो काबा की तरफ से । शर्म नहीं आती । साधु होकर पवित्र मंदिर की तरफ पैर किये हो ?
नानक ने कहा - मेरे तुम पैर उस तरफ हटा दो । जिस तरफ पवित्र परमात्मा न हो । मैं क्या करूं । कहां पैर रखूं ? किसी तरफ तो पैर रखूंगा । लेकिन वह तो सब तरफ मौजूद है । सभी दिशाओं को उसी ने घेरा है । लेकिन मुझे चिंता नहीं होती । नानक ने कहा - क्योंकि वही बाहर है । वही भीतर है । उसका ही पत्थर है । उसके ही पैर हैं । मैं भी क्या करूं ? मैं बीच में कौन हूं ?
दर्शन ने ठीक कहा कि जाग जायेंगे । तो आपको भी पता चलेगा कि भगवान ही विराजमान है । इससे ही मैं चकित होता हूं कि जिनको हम तथाकथित ज्ञानी कहते हैं । और यही ज्ञानी लोगों को चलाते हैं ।
अंधा अंधा ठेलिया, दोनों कूप पड़त ।
बड़ी बड़ी उपाधियां हैं - सत्यव्रत सिद्धांतालकार ! सिद्धात के जानने वाले 
। सिद्धि के बिना कोई सिद्धांत को नहीं जानता । शास्त्र पढ़कर कोई सिद्धांत नहीं जाने जाते । स्वयं में उतरकर जाने जाते हैं ।
बिंदु भी सिंधु समान, को अचरज कासों कहें ।
हेरनहार हैरान, रहिमन अपने आपने ।
रहीम कहते हैं - अपने भीतर देखा । तो मैं खुद ही हैरान रह गया हूं चकित, अवाक । खुद ही भरोसा नहीं आ रहा है कि मैं और परमात्मा । यह जो उठ रही है वाणी भीतर से । अनलहक का नाद उठ रहा है । यह जो अहं ब्रह्मास्मि की गज आ रही है । यह जो ॐकार जग रहा है । मुझे ही भरोसा नहीं आता कि मैं, रहीम मैं, मेरे जैसा क्षुद्र, साधारण आदमी..मैं और भगवान । बिंदु भी सिंधु समान । अब मैं किससे कहूं । खुद ही भरोसा नहीं आता । तो किससे कहूं ?
इसका ही तुम्हें भरोसा दिलाने को यहां मैं बैठा हूं । यह भरोसा आ जाए  जो । समझना सत्संग हुआ । मेरे पास बैठ बैठ कर सिद्धात अलंकार मत बन जाना । सिद्ध बनो । इससे कम में कुछ भी न होगा । इससे कम का कोई मूल्य नहीं है । मरने की कला सीखो । मरो हे जोगी मरो । बूंद की तरह मरो । तो समुंदर की तरह हो जाओ । मृत्यु की कला ही महाजीवन को पाने की कला है । ओशो

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