01 अगस्त 2013

फ़िर देखिये कमाल


ਨਿਮਾਨਾ पोस्ट " शिवजी कैलाश पर दिखाई क्यों नहीं देते - मुकेश " पर एक टिप्पणी । 
भगवन ! अगर कोई आदमी अपने जीवन में मनमुख ही रहा । और अंतर की आवाज़ को न सुनकर भोगों में ही डूबा रहे । परन्तु भक्ति सच्चे दिल से करे । तो क्या उसका उद्धार संभव है ?
अपनी बात - मुझे आश्चर्य होता है कि स्वभावतः मैं काफ़ी आलसी इंसान हूँ । मुझे खाना और सोना नहीं सिर्फ़ सोना प्रिय है । शीतल मन्द मधुर बयार के झोंके और गुदगुदा नरम बिस्तर और अति गहन निद्रा यदि ये हो । तो मुझे मानों मनवांछित वरदान मिला हो । और मैं इसका कारण भी जानता हूँ कि कम से कम इस जीवन में आज तक ये मुझे नसीब नहीं हुआ । बल्कि इसके विपरीत मैं शरणार्थी शिविरों में रहने वालों की भांति आज तक इधर उधर भटकता ही रहा । तब नींद कहाँ और चैन कहाँ ? लेकिन मजे की बात ये हैं कि ईश्वरीय सत्ता मेरे इस स्वभाव के विपरीत मुझसे जी तोङ कार्य लेती रही । आज भी ले रही है । परन्तु 45

साल की जिन्दगी में इस अथक मेहनत ने मुझे इतना अक्षय धन दिया है कि इसका राई दाना जैसा भाग भी मैं खर्च करूँ । तो इस पूरी प्रथ्वी को चल अचल सम्पदा सहित एक सेकेण्ड में खरीद सकता हूँ । एक अच्छी बात ये है कि मेरा ये ( अक्षय ) धन शरीर छूट जाने के बाद भी काम आयेगा । जैसा कि भौतिक धन वर्तमान शरीर तक ही काम आता है । आपको पता होगा । विश्व विजेता सिकन्दर ने अपनी धन सम्पदा से कहा था - मेरे साथ चलेगी । और उसने जबाब दिया - हमारा साथ यहीं तक होता है । अब मेरा जीवन सिर्फ़ 35 वर्ष लगभग और शेष रहा है । और कहीं न कहीं मुझे इसके तेजी से बीत जाने का इंतजार है । क्योंकि आत्मज्ञान में जब कोई मुक्त श्रेणी का अभ्यर्थ्री चुना जाता है । तो  फ़िर उसका अन्तिम रज वीर्य निर्मित मल मूत्र शरीर बेहद कष्टदायी हो जाता है । क्योंकि उसे अभी तक हुये करोङों जन्मों के छोटे बङे पाप समूह इसी अन्तिम शरीर से शारीरिक वेदना और मानसिक वेदना का घोर अनुभव करते हुये भोगने होते हैं । काया से जो पातक होई । बिनु भुगते छूटे नहीं 

कोई । एक और बात होती है । जो अन्तिम शरीर को कष्टकारी बनाती है । त्याग परमार्थिक और वैरागी यानी एक तरह से अपने लिये नीरस जीवन जीना होता है । और स्वयं कष्ट उठाकर दूसरों को सुख पहुँचाना होता है । मान अपमान यश अपयश और लगभग कांटों की सेज  के समान जीवन । मीरा जी की बात याद है आपको - सूली ऊपर सेज पिया ( परमात्मा ) की । किस विधि मिलना होय । और देखें - जो मैं ऐसा जानती भगत्ति करें दुख होय । नगर ढिंढोंरा पीटती भगति न करियो कोय । ( सिर्फ़ साधकों की प्रेरणा और मार्गदर्शन हेतु )
उत्तर - आपने एक अच्छे भाव से अपनी बात कही है । परन्तु वह अज्ञानतावश ही है । मैं आपको दो उदाहरण देता हूँ । जैसे कोई व्यक्ति कहे कि वह सच्चे दिल से सज्जनता का आचरण मानने वाला हो । परन्तु काम दुर्जन व्यक्ति के ही करे । तो क्या समाज में उसका सम्मान प्रतिष्ठा सम्भव है ? और जैसे कोई व्यक्ति अपनी पत्नी ( सच्चे दिल से भक्ति ) से बहुत प्रेम करता हो । पर स्वभाव वश ( मनमुख ) वैश्यागामी हो । तो क्या वाकई वह सच्चा आदर्श व्यक्ति है । दरअसल भोगों में डूबा मनमुख व्यक्ति कभी सच्चे दिल से भक्ति कर ही नहीं सकता । और जो सही क्ति को थोङा भी जानता करता होगा । सांसारिक भोग उसके लिये नीरस हो जाते हैं । बोदा नशा शराब का उतर जाय प्रभात । नाम खुमारी नानका चढी रहे दिन रात । सबही रसायन हम किये नही नाम सम कोय । रंचक तन में संचरे सब तन कंचन होय । ऊपर दोहों में जो " नाम " शब्द आया है । देखिये ये दोहे उसके लिये क्या कह रहे हैं । शायद आप मनमुख और इसका विलोम गुरुमुख शब्द के सही अर्थ नहीं जानते । मनमुख का अर्थ विष रूपी विषयों की वासना द्वारा काल माया के शिकंजे में फ़ँसा वासना के नशे का आदी जीव है । और गुरु क्योंकि व्यक्ति नहीं होता । वह आत्मा का ज्ञान और शाश्वत स्वरूप होता है । अतः कोई भी गुरुमुख विष और अमृत या सार और थोथे का फ़र्क समझ जाता है । अतः जैसे ही आप अपने उद्धार की सोचते हुये सच्चे दिल से भक्ति करने की प्रभु दरबार में अर्जी लगाते हैं । सभी सांसारिक भोगों का सच कि वे कितने जहरीले और घातक हैं ?  अन्त में दुष्परिणाम वाले हैं । आपके सामने खुलने लगता है । और फ़िर सच्चाई को कृमशः जानते हुये आप धीरे धीरे खुद ही विषय भोगों से उदासीन होने लगते हैं । ये कोई महज जबानी उपदेश नहीं है । आप सिर्फ़ एक बार सच्चे दिल से साहेब ( परमात्मा ) से अर्जी लगायें कि - मैं तेरी भक्ति करके अपना उद्धार करना चाहता हूँ । फ़िर देखिये क्या कमाल होता है ?
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