29 नवंबर 2011

रहस्य जानने की दो ही विध्यायें हैं कुण्डलिनी और अद्वैत

कोई इंसान खुद को साई का अवतार कहता है । साईं बाबा एक महान संत थे । क्या उनका भी कोई अवतार हो सकता है ? क्या सत्य साईं साईं बाबा के अवतार थे ? मेरी नजर में वो एक झूठा इंसान है । जिसे लोगों ने अवतार बना कर मंदिर में बिठा दिया ।
ans - पहली बात तो यही है कि लोग खुद ही गलती पर है । उन्हें साई का सही मतलब ही नही पता । साई भक्ति में प्राप्ति की एक उपाधि है । जैसे आपने साधुओं के कई तरह के मत सम्प्रदाय नागा । गिरी । पुरी । अघोरी । वैष्णव आदि देखे होंगे । इनमें भी पद उपाधियाँ होती हैं । और तब किसी उपाधि का अवतार कैसे हो सकता है ?
मैंने कई लेखों में प्रसंगवश खुद ही ये माना है । बताया है कि शिरडी के साई बाबा सच्चे अर्थों में सन्त थे । लेकिन इसके अतिरिक्त ज्ञात साईयों में कोई भी सच्चा नहीं है । यानी उसे अलौकिक सत्ता से साई उपाधि प्राप्त हुयी हो । यहाँ ये भी महत्वपूर्ण है । अभी बीच में पायलट बाबा भले ही विवादित हुये हों । लेकिन उनका अपने स्तर अनुसार ज्ञान सत्य है । और वे तकनीकी तौर पर अलौकिक सत्ता से जुङे हैं ।
अब बात अवतार की । अवतार - अंश । आधा । और पूर्ण स्थिति से होता है । यानी अवतारी शरीर 5 तत्वों के पुतले को जरूरत अनुसार शक्ति अंश देना । उदाहरण के लिये छोटे अवतारों को विभिन्न शक्तियाँ अपना अंश यथायोग्य समय के लिये प्रदान करती हैं । जैसे कहीं युद्ध । आपदा आदि स्थिति बनने पर विभिन्न देश एक ही मंच पर सयुंक्त होकर एक समूह रूप कार्य करते हैं । ठीक यही स्थिति अवतार की होती है ।
दूसरी एक बात और भी है । कुण्डलिनी ज्ञान से ये अति दुर्लभ मानव शरीर यूँ ही बारबार मिलने लगे । तो इसकी वैल्यू ही फ़िर क्या है । इस तरह तो बहुत से सिद्ध । देवता । महात्मा आदि फ़िर स्वेच्छा से शरीर धारण करने लगेंगे । तब फ़िर ये सुर दुर्लभ ? कहाँ रहा । ये तो सहज सुलभ हो गया ।
अब शिरडी के साई बाबा ने जो भी उच्चता अपनी भक्ति और ज्ञान से प्राप्त की । वो उन्हें ऊपर मिल गया । फ़िर वे यहाँ क्या करेंगे । कार्यकर्ताओं कर्मचारियों की कमी तो नहीं है सत्ता के पास । दूसरे दोनों बाबाओं के स्वभाव आचरण में जमीन आसमान का अंतर है । एक बात यदि ये भी मानी जाये कि साई अपने पुण्य फ़ल को प्राप्त करने हेतु आये । तो जितना वैभव यहाँ आपके उल्लखित साई का था । वह तो वहाँ बहुत मामूली है ।
हाँ एक बात की संभावना बनती है । कभी कभी सत्ता शेष रह गये कार्यों के लिये दुबारा आत्मा को उसी या किसी भूमिका के लिये निर्धारित समय के लिये नियुक्त करती है । तब वे अपना कार्य पूरा करके चले जाते हैं । लेकिन वे कोई आडम्बर या प्रचार नहीं करते । जैसे सन्त ज्ञानेश्वर ज्ञानेश्वरी गीता की टीका करने हेतु ही आये थे । और कार्य समाप्त कर चले गये । विवेकानन्द । रामतीर्थ कार्य समाप्त होते ही चले गये । व्यास वेद आदि  गृन्थों के कार्य हेतु आये थे ।
ज्योतिष शास्त्रों के ज्ञाता ऐसा कहते हैं कि - जन्मकुण्डली के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? अगले जन्म में क्या होंगे ? आपको क्या लगता है कि ऐसा संभव है ?  
ans - ज्योतिष शास्त्रों के ज्ञाता । अनजाने ही सही आपने एकदम सही शब्द का प्रयोग किया है । शास्त्रों के ज्ञाता । न कि ज्योतिष विज्ञान के ज्ञाता । जी हाँ । एकदम सही कहते हैं वे । पर ऐसा होने के लिये ज्योतिष विज्ञान का ज्ञाता होना जरूरी है ।
तकनीकी तौर पर । या क्रियात्मक तौर पर । सृष्टि में रहस्य जानने की दो ही विध्यायें हैं । कुण्डलिनी योग । और अद्वैत योग । और इन दोनों में ही कामन है - चेतनधारा या स्वांस । दोनों में ही प्रवेश इसी के माध्यम से होता है । और कैसी भी कोई युक्ति नहीं है । पर दोनों में एक महत्वपूर्ण फ़र्क है । कुण्डलिनी और उसकी असंख्य शाखाओं में किसी भी योग ज्ञान में खुद को लय करना होता है । जबकि अद्वैत में ये सभी कुछ स्थिति दर स्थिति साधक में स्वयं लय होते जाते हैं ।
कुण्डलिनी की तन्त्र मन्त्र आदि बहुत सी स्थितियाँ बनती हैं । जिनमें विधिवत निपुणता प्राप्त करके ही उसका उपयोग होता है । अद्वैत में सिर्फ़ सकंल्प विस्तार होता है । कुण्डलिनी अगर 10 स्थितियों से लय कराती है ।  तो अद्वैत उतने ही समय में 10 हजार लय कराता है ।
अब आपके प्रश्न अनुसार कुण्डलिनी की ही एक शाखा ज्योतिष विज्ञान पर बात करते हैं । तब शब्द जन्म कुण्डली पर ध्यान दे । जब किसी रस्सी को गोल लपेटे देकर एकत्र किया जाता है । वह कुण्डली होती है । जैसे सर्प कुण्डली मारकर बैठता है । यानी जाहिर है । जन्म कुण्डली शब्द बङी गहराई लिये हुये है । पूरे जन्म का लेखा जोखा । तब जो इस विज्ञान को तकनीकी क्रियात्मक तौर पर जानता होगा । वो आसानी से न सिर्फ़ वर्तमान जन्म का बल्कि अगले पिछले जन्मों का अपनी काबलियत अनुसार विवरण बता सकता है । क्योंकि जब वो आपकी कुण्डली ( के कारण । आंतरिक सरंचना ) देखेगा । तो कारण ( शरीर ) में पहुँच जायेगा । और आराम से बता देगा । प्रसिद्ध उदाहरणों में भीष्म पितामह बिना ज्योतिष के ही कारण में हजारों साल पीछे जाने की क्षमता रखते थे ।
आपके किसी पिछले लेख में "दसवां द्वार" का जिक्र आया था । ये दसवां द्वार से आपका क्या तात्पर्य है ?
ans - सामान्य चौङाई वाले माथे पर । सामान्य आकृति के सिर में । जहाँ से बाल शुरू होते हैं । वहाँ से चार अंगुल पीछे । लगभग सिर के मध्य में । खोपङी में 1 सेमी नीचे दसवाँ द्वार है । यहाँ झींगुर जैसी आवाज में अखण्ड अनहद ध्वनि निरन्तर हो रही है । यही मोक्ष द्वार है । अगर कोई इंसान इस द्वार तक पहुँच जाये । मतलब ध्यान अवस्था में इस ध्वनि को सुनने लगे । तो उसका मनुष्य जन्म पक्का हो जाता है । यदि द्वार के पार नहीं हो पाया तो । द्वार से पार हो जाने पर तो वह मोक्ष की तरफ़ बङ ही गया ।
बाकी 9 द्वारों में 2 कान ( मृत्यु समय यहाँ से प्राण निकलने पर - प्रेत योनि ) 2 आँख ( कीट पतंगा योनि ) 2 नाक छिद्र ( पक्षी योनि  ) 1 मुख ( पशुवत योनियाँ ) 1 लिंग या योनि छिद्र ( विभिन्न जल जीव ) 1 गुदा मार्ग ( नरक )
आपके शेष प्रश्नों को उत्तर यथासंभव विस्तार से अलग अलग लेखों के माध्यम से देने का प्रयास रहेगा ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

27 नवंबर 2011

धरती पर मौजूद है स्वर्ग का रास्ता

Q  क्या स्वर्ग का रास्ता इस धरती पर मौजूद है ? (एक पाठक)
Ans - आपके प्रश्न भाव के अनुसार स्वर्ग जाने का बहुचर्चित, सटीक और सबसे प्रमाणिक वर्णन धार्मिक इतिहास में युधिष्ठर और उनके भाईयों का आता है । जब वे परीक्षित को राज्य सौंपकर स्वयं स्वर्गारोहण हेतु हिमालय पर गये और रास्ते में द्रौपदी सहित एक-एक पाण्डव बीच में ही मृत्यु को प्राप्त हुये और अन्त में केवल युधिष्ठर और उनका कुत्ता शेष रह गया । तब उन्हें लेने दिव्य विमान से धर्मराज आये और फ़िर थोङी आनाकानी के बाद कुत्ता सहित स्वर्ग गये ।
यहाँ ध्यान रहे, ये पाण्डव गौतम ऋषि की नारी अहिल्या जो हनुमान की सगी नानी थी, के साथ उस समय के इन्द्र द्वारा छल से काम भोग करने पर गौतम ऋषि के द्वारा शापित हुये थे और तब इन्द्र का तेज 5 भागों में बँट गया और वे ही  5 पांडव बने थे । जबकि अभी इस समय इन्द्र की पदवी भक्त प्रहलाद को प्राप्त है ।
अब सवाल ये उठता है कि पांडव स्वर्गारोहण हेतु हिमालय ही क्यों गये थे ?
इसी प्रसंग में एक और महत्वपूर्ण बात याद आती है कि रावण की अनेक महत्वाकाक्षाओं में एक इच्छा स्वर्ग तक सीङी बनवाने की भी थी । जिसका अन्तिम समय उसने इस कार्य के लिये लापरवाह रहने के प्रति अफ़सोस भी किया था । इससे भी जाहिर होता है कि - ये कार्य संभव था । क्योंकि रावण के लिये तो स्वर्ग जाना (बहुत आसान) सुबह की सैर के समान था और दूसरी बात ये भी कि प्रथ्वी से स्वर्ग की ऊँचाई बहुत अधिक नहीं है ।
जैसा कि मैं हमेशा कहता आया कि आपके सामने कोई  भी प्रश्न हो, कोई भी इच्छा हो,जिज्ञासा हो । उसका रास्ता इसी जीवन से और फ़िर आपके शरीर से ही प्राप्त होगा । दूसरा कोई उपाय नहीं है । तब एक महत्वपूर्ण चीज पर गौर करिये । किसी को यात्रा पर जाना हो । कोई यन्त्र निर्मित करना हो । किसी तकनीक में सुधार करना हो । जिन्दगी का छोटे से छोटा बङे से बङा कार्य हो । इसके लिये एक चीज की सख्त आवश्यकता होती है नक्शा, ढांचा, रूपरेखा, माडल आदि ।
इसी आधार पर शरीर में प्रथ्वी की स्थिति देखिये । यह गुदा मार्ग और लिंग या योनि के मध्य है । जिसको मूलाधार चक्र कहते हैं और नाभि तक आते आते विष्णु लोक आ जाता है । जो स्वर्ग से काफ़ी ऊपर है । इससे नीचे बृह्मा का लोक है । जिसको जननेन्द्रिय मूल स्थित समझें । ये भी स्वर्ग से ऊपर ही है । क्योंकि इन्द्र के तुलनात्मक ये 3 देवता प्रमुख हैं । तो इनके स्थान भी ऊँचे होगे । 
इससे सिद्ध होता है कि मूलाधार चक्र और जननेन्द्रिय चक्र के मध्य ही स्वर्ग की स्थिति है । ये तो मैं पहले ही कई बार बता चुका हूँ कि विराट स्थिति और मनुष्य शरीर स्थिति एकदम समान है । विराट की एक एक तिनका चीज इसमें मौजूद है ।
आगे की बात से आपको थोङी भ्रान्ति पैदा हो सकती है । क्योंकि आज मनुष्य की जानकारी के विस्तार से यह बात अटपटी है । क्योंकि प्रथ्वी की स्थिति आज के समय में सभी जानते हैं ।
अभी मैंने कहा - प्रथ्वी से स्वर्ग की ऊँचाई थोङी ही है । यानी ये अलग है । लेकिन एक दूतावास के तौर पर, मनुष्य शरीर की तरह प्रथ्वी पर भी इनके स्थान हैं । जिनमें सिर्फ़ भारत का
हिमालयी क्षेत्र स्वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है । मध्य का मैदानी भाग प्रथ्वी और अमेरिका पाताल लोक का प्रतिनिधित्व करता है । जिसमें नागलोक आदि अन्यान्य बहुत से लोक आते हैं । स्वर्ग, प्रथ्वी, पाताल ये तीन प्रमुख होते हैं ।
भले ही आज आवागमन के एक से एक साधन मौजूद हैं और हम प्रथ्वी के चप्पे चप्पे पर पहुँच सकते हैं । फ़िर भी इस प्रथ्वी पर तमाम स्थान अभी भी दुर्गम हैं । इंसानी पहुँच से परे हैं और रहेंगे । ऐसे ही क्षेत्रों में हिमालय भी एक है । जिसके बहुत से हिस्सों के एकदम नजदीक जाकर भी आप प्रतिबन्धित क्षेत्र की सीमा में एक इंच भी पैर नहीं रख सकते । यद्यपि बहुत से दुस्साहसी लोगों ने समय समय पर ऐसी धृष्टता की है । जिसका एक ही परिणाम निकला - असमय ही मौत ।
इसी सम्बन्ध में त्रेता युग का बहुचर्चित प्रसंग भी स्मरण हो आता है । जब हनुमान जी लक्ष्मण के लिये संजीवन बूटी लेने हिमालय गये । तब दिव्य प्रकाश से झिलमिलाती आलोकित बूटियाँ उनके पहुँचते ही अदृश्य हो गयी और फ़िर उनके रक्षक देवता से अनुमति आदि मिलने पर ही प्रकट हुयीं । ये बात भी हिमालय के दैवीय क्षेत्र होने को स्पष्टतया कहती है ।
अब आगे बात करें । कुछ भारतीय पर्वतारोही जो धार्मिक भावना के साथ हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में भृमण पर गये । उन्होंने गन्धर्व घाटी, फ़ूलों की घाटी आदि के साथ साथ एक स्थान स्वर्ग सीङी का आँखों देखा वर्णन किया है और ये कोई प्रतीकात्मक नहीं है कि जमी हुयी बर्फ़ में कभी कोई वैसी छोटी मोटी आकृति बन गयी हो । जिससे तमाम किवदन्तियों का जन्म हुआ हो । बल्कि ये आसमान को छूती हुयी बर्फ़ से बनी सीङी आकृति है । जो सदैव ही रहती है और वहाँ पहुँच पाने पर लगातार आराम से देखी जा सकती है ।
इसकी पहली सीङी 30 फ़ुट लम्बी और 15 फ़ुट ऊँची है । जो कृमशः इंच इंच घटती हुयी ऊपर की ओर पतली होती चली गयी है और इसका अंतिम छोर नजर नहीं आता । अब एक और मजे की बात है । हालांकि 15 फ़ुट ऊँचाई कोई खास नहीं होती । इस गणित पर किसी भी साधन द्वारा दस बीस पचास सीङी तो आराम से चढ़ा जा सकता है ।
लेकिन नहीं, आप किसी भी बाह्य उपाय से एक सीङी भी नहीं चढ सकते । चाहे लाख कोशिश कर लें । 
फ़िर इसका एक ही उपाय है । आप सबसे निचली सीङी पर ठीक ईसामसीह जैसी स्थिति में बाँहे फ़ैलाकर मगर मुँह सीङी की तरफ़ चिपकाकर एकदम चिपक कर खङे हो जायें । बस और कुछ नहीं करना । और ध्यान रहे ये पूरी बर्फ़ से निर्मित है और तापमान क्या होगा बताने की आवश्यकता नहीं । तो अब तक तीन खास परिणाम देखने सुनने में आये । आपको एकदम सुन्नता आ जायेगी । चेतना शून्य हो जाती है ।
एक - आँख खुलने पर आप वहाँ से कुछ फ़र्लांग से लेकर 6-7 किमी दूर पीछे पहुँच जायेंगे । जिस मार्ग से आप पहुँचे थे ।
दो - आपको ये पता नहीं होगा कि कितनी देर बाद आपकी चेतना लौटी पर जब लौटेगी । आप पहली सीङी पर 15 फ़ुट ऊँचे चढ चुके होंगे । वो भी बिना हिले डुले ।
तीन - आगे का भी तरीका यही है । उसी भक्ति भाव से फ़िर चिपक कर खङे हो जायें और फ़िर देखें । आगे क्या होता है । इस तरह से तीसरी सीङी पर पहुँच जाने तक का विवरण प्रकाश में आया है । इससे ऊपर का मेरी जानकारी में तो नहीं आया ।
इसमें भी कई विभिन्नतायें नजर आयीं । जब तीसरी सीङी पर आगे हेतु प्रयास किया गया । तो कोई पहली सीङी पर वापस आ गया । तो कोई दूसरी सीङी पर और कोई कोई इससे भी पीछे मार्ग में पहुँच गया ।
इसका जो सबसे रोचक वर्णन मेरी जानकारी में आया । वह ये था कि इस तरह गये लोगों ने जो तीसरी सीङी पर पहुँचे थे । वहाँ ऐसे ही प्रयासरत 10-12 तक अन्य अपरिचित लोगों को चेतना लौटने पर वहाँ पाया । पहले ये सभी लोग एक मौन भाषा में एक अजीब वार्तालाप सा करते रहे । फ़िर अचानक ही आक्रामक होकर एक दूसरे का गला दबाने लगे । अनुभव कर्ताओं ने बताया । स्वयं ऐसी स्थिति बनी । जिस पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं था । सबके साथ इसका परिणाम क्या हुआ । ये बताने वाला भी कोई नहीं था । बस जो लोग अपना अनुभव बताते हैं । वह या तो पहली सीङी पर या दूसरी या मार्ग में वापस ।
तब आगे क्या होता है । कैसे कहा जाये ।
हो सकता है । कुछ लोग काफ़ी ऊपर तक गये हों । कुछ स्वर्ग चले गये हों । खास बात यही है कि इसकी बनावट में जरा भी संशय वाली बात नहीं है । बर्फ़ीले क्षेत्र में होने के बाबजूद भी यह एकदम स्पष्ट जीने की सीङियों जैसी ही है और ऊपर को भी सीङी की डिजायन में ही पूर्ण नियम अनुसार ही निर्मित है ।
अब इसका सही रहस्य तो इस पर चढ़ने वाला और फ़िर वापिस आने वाला ही बता सकता है । या कोई अलौकिक जानकारी रखने वाले इस मार्ग के पथिक हुये महात्मा द्वारा ही ये बताना संभव है ।
लिखने को इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है । पर मेरा उत्तर अपने स्तर पर न होकर प्रमाणिक जानकारी के आधार पर और आपके प्रश्न की मूल भावना के अनुसार है । तब उसके अनुसार प्रथ्वी पर स्वर्ग क्षेत्र और उसके रास्ते का सबसे प्रमाणिक उल्लेख यही है और ये जगह गन्धमादन पर्वत से है ।
पहले कभी मेरी भी स्वर्ग और स्वर्ग जाने में गहरी दिलचस्पी थी । तब मैंने इस विवरण का गहन चिंतन मनन किया था । मेरे हिसाब से इस सीङी का जो रहस्य है कि - कोई भी इंसान अपने पूर्व संचित पुण्य पाप संस्कार धन द्वारा ही किसी अच्छे बुरे स्थान पर या किसी भी अच्छे बुरे इंसान से  किसी भी उद्देश्य से या निरुद्देश्य भी कारणवश ही मिलता है । अकारण कुछ भी नहीं होता ।
तब ये सीङी भी अनगिनत अलौकिक रहस्यों में से एक है । जो वास्तव में रास्ता भी हो सकती है और दिव्यता की ओर बढने हेतु प्रेरक भी । कोई स्वर्ग लायक स्थिति का पूर्ण पुण्यवान इसकी पहली सीङी से लग कर सीधा स्वर्ग में भी जा सकता है और शायद गये भी होंगे । अब वे अलौकिकता की गूढ़ता नियम के आधार पर बताने तो आयेंगे नहीं कि - ऐसा भी होता है या ऐसा मेरे साथ हुआ ।
दूसरे जो लोग पहली सीङी या तीसरी सीङी से वापिस आ गये । जाहिर है कुछ न कुछ पुण्य संस्कार से ही वे वहाँ तक पहुँचे और तब सीङी ने स्पष्ट बता दिया कि - तुम्हारा पुण्य स्तर इतना ही बनता है । गौर करिये कुछ को सीङी ने पीछे भी फ़ेंक दिया ।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उन्होंने लगभग कंकाल स्थिति के कुछ शव भी वहाँ देखे । इस परिणाम की बहुत स्थितियाँ बनती हैं । जो इस मार्ग से इस तरीके से स्वर्ग गये । उनकी स्थूल देह तो छूट ही जानी थी । कुछ अपनी हठता के चलते भी मृत्यु को प्राप्त हो सकते हैं । कुछ ऐसी भावना के साथ जबरन प्राणान्त कर सकते हैं कि - यहाँ मरने पर स्वर्ग निश्चित है और ये कोई चौंकाने वाली बात नहीं है । आज भी बनारस में मोक्ष की आशा से रहने आये लोग जब बहुत दिन रहते रहते ऊब जाते हैं और मृत्यु नहीं होती । तब वे जबरन ही स्व मृत्यु कर लेते हैं । जिसका आधार यही मान्यता है कि - काशी में देह त्यागने पर मोक्ष प्राप्त होता है । उनकी धारणा बन जाती है । मौत स्वाभाविक हो या सुसाइड से । मुख्य बात काशी में मरना है । सोचिये एक भीङ भाङ वाले शहर में जब इस तरह की सोच और घटनायें हो सकती हैं । तो उस निर्जन दुर्गम रहस्यमय अलौकिक क्षेत्र में क्या घटता होगा ? जहाँ गिनती के दस बीस लोग मुश्किल ही पहुँचते होंगे । इसके बारे में स्पष्ट क्या कहा जा सकता है ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

25 नवंबर 2011

तुम मेरी और दो डग चलो मैं तुम्हारी ओर चार डग चलता हूँ

जय गुरुदेव !  राजीव जी नमस्ते ! गुरूजी से मिलने से पहले मैं बहुत कर्मकाण्ड करता था । मेरा इनसे बहुत लगाव था । अब मैं ये सब छोड़ चूका हूँ । व गुरूजी द्वारा बताये रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहा हूँ । आज मैंने मंगलवार का वृत भी नहीं किया । लेकिन दिल में दुःख सा होता है जी । जिनको मानता हुआ मैं बड़ा हुआ । आज एकदम से सब छोड़ दिया । मंदिर के पास से गुजरता हूँ । तो ग्लानि सी मन में आती है ।
गुरूजी ने कहा है कि हमेशा चलते हु्ये । काम करते हु्ये भजन करो । सांस पर ध्यान दो । इसमें ढाई अक्षर ( सो हम । जो हमेशा अपने आप हो रहा है ) का भजन कैसे करे । ये मैं समझ नहीं पा रहा । सांस लेते समय " सो " का ध्यान नासिका से अन्दर जा रही सांस पर करे । या जो सांस नाभि तक पहुँच रही है । उस पर करें  । व सांस बाहर निकालते समय " हम " का ध्यान नासिका से सांस निकलते हुए पर करें । या अन्दर । भैया ! मेरे प्रश्नों से आपको परेशानी हो । या आप जवाब नहीं देना चाहे । तो कोई बात नहीं । लेकिन नाराज न होना । एक दीक्षित ।
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मंगल भवन अमंगल हारी  । दृवहु  सो दशरथ अजिर बिहारी । कौन सा असली है ? वो मंगल का वार ( दिन ) वृत ( वरतना ) हनुमान का बरताव क्या है ? हनु - मान । जिसने अपनी मान रखने की चाहत को हनु यानी मार दिया है । समाप्त कर दिया है । वही हनुमान है । अब ये अमंगल को हरने वाला मंगल भवन कौन सा है । आपका शरीर ही ना । जो भी  सुख चैन आपको महसूस होगा । इसी के द्वारा तो होगा । अब दशरथ । यानी दसों दिशाओं में निरन्तर दौङने वाला ये मन जब इस शरीर में स्थिति अजर बिहारी प्रभु की तरफ़ दृवित होकर बहता है । तो सब अमंगल समाप्त होकर मंगल ही मंगल हो जाता है । अब इसी से अन्दाजा लगा लें । आप वास्तव में हनुमान का बरताव और मंगल का बरत करते थे ।
तेरे पूजन को भगवान । बना मन मन्दिर आलीशान । आप शिक्षक हैं । बच्चों को शिक्षा देते हैं । आपके छात्र यदि क से कबूतर ही कहते रहें । और कबूतर के चित्र को ही कबूतर मानें । और आसमान में मुक्त भाव से विचरते कबूतर को कबूतर मानने से इंकार ही कर दें । क्योंकि आपने तो चित्र वाला ही और क से बताया है । तो आपको कितनी झूँझल होगी । अब क भी खत्म करो । चित्र भी खत्म करो । अब असली की तरफ़ जाने का प्रयोजन हुआ है । इसलिये छोङा कहाँ । अब तो असली प्राप्त होगा । आपके अन्दर ही सुगन्धित धूपवत्ती भी जल रही है । घण्टा 


शंख मजीरों की ध्वनि भी हो रही है । असली देव भी बैठा है । तो छोङा कहाँ । सही रूप में तो अब जुङने वाले हैं । वो भी जाने कितने जन्म भटकने के बाद । तो अब ग्लानि हो कि खुशी हो ।
सामान्य स्वांस 4 सेकेण्ड में पूर्ण होती है । 2 सेकेण्ड में कुम्भक यानी स्वांस भरना - सो‍ऽऽ । फ़िर अगले 2 सेकेण्ड में स्वांस रेचक यानी स्वांस बाहर निकलना - हंऽऽऽऽग । कुम्भक और रेचक के बीच की स्थिति जिसमें स्वांस भरी रहती है । उसे पूरक कहते हैं । कुण्डलिनी का पूरा योग ही ॐ ह्यी क्लीं आदि बीज मन्त्रों के साथ इसी कुम्भक पूरक रेचक पर आधारित होता है । पर उसका तरीका बेहद जटिल और भिन्नता लिये हुये है । साथ ही कठिन और खतरे वाला भी है । इसमें पूरक में स्वांस को रोके रहना । कुम्भक में स्वांस को इच्छानुसार गति देना । और रेचक यानी छोङने आदि में भी बहुत सी बातें होती है । इसलिये इसे सहज योग तो कतई नहीं कह सकते ।
खैर..4 सेकेण्ड में 1 स्वांस के आवागमन के हिसाब से 1 मिनट में 15 स्वांस बनती हैं । और 1 घण्टे में 900 । इस तरह 24 घण्टे में 21600 । इसलिये सिर्फ़ 3 घण्टे के नाम अभ्यास से भी 2700 अजपा को देख सकते हैं ।
अब क्योंकि इसको अजपा कहा गया है । जिसकी वजह यह है कि स्वांस आपके लेने से तो आ जा नहीं रही । वह तो 24 घण्टे स्वयँ आ जा रही है । अगर लेने की बात होती । तो फ़िर जपा होता । लेकिन वह तो स्वयं ही है । अजपा है ।
अब गौर से समझिये । मैं आपसे कहूँ कि - ये मकान देखिये । या यह वृक्ष देखिये ।  तो आप उसके किस हिस्से पर पहले निगाह डालेंगे । जैसे मैं कह दूँ । ये खिङकी पहले देखो । दरबाजा पहले देखो । दीवाल बाद में देखना । साइड में उसके बाद देखना । अब ये तो बङी टेंशन की बात हो गयी । और लगभग असंभव भी । क्योंकि दरबाजा देखते समय खिङकी भी नजर में आ सकती है । दूसरे हिस्से पर भी नजर जा सकती है । क्योंकि नजर के विस्तार में तो मकान क्या और आसपास का हिस्सा भी आ रहा है । यहाँ तक कि कैमरे का फ़ोकस भी आप एकदम बताये गये स्थान पर सही सही नहीं घुमा सकते । वह भी आउट साइड हो ही जायेगा । उसको भी हर बार सैट करना ही होगा । तो ये सहज कहाँ हुआ । ये तो बङा जटिल और टेंशन वाला हो गया । फ़िर ये सुमरन कहाँ हुआ । ये तो उलझन हो गयी ।
अब इसका दूसरा पहलू समझें । मैं कहता हूँ । मकान पर नजर रखिये । और कोई भी नियम नहीं । अब कितना आसान हो गया । बस मकान पर निगाह रखनी है । वह किस जगह जा रही है । इससे कोई फ़र्क नहीं । कुछ ही दिनों के अभ्यास से आप पायेंगे । आपको ये भी नहीं लग रहा कि आप मकान पर निगाह रख रहे हैं । वह तो खुद ही आपसे जुङ गया । परिचित सा हो गया । और बिना प्रयास ही आपकी निगाह में रहने लगा । यह सहज योग हुआ । सहज भक्ति हुयी ।
और भी समझिये । बिना किसी नियम के आप मकान को सहजता से देख पायेंगे । अपने अन्दर सहेज पायेंगे । महसूस कर पायेंगे । पर नियम बताने से पूरा ध्यान नियम पर ही लगा रहेगा । अक्सर हाथ से माला फ़ेरने वाले लोग अपना अनुभव बताते हैं  कि उनका ध्यान सुमरन पर कम 108 वें बङे मनके पर अधिक रहता है । फ़िर कितने चक्र पूरे किये । इस पर अधिक रहता है । अब बताईये । ये भावपूर्ण सुमरन हुआ । या बेगार हुयी । मजदूरी हुयी । टेंशन हुयी ।
तो मुख्य बात है । समर्पण । आप जैसा भी सुमरन कर पाते हैं । वह भाव भक्ति का सुमरन ही आपको प्रवीण कर देगा । आप तो युवा हैं । अध्यापक हैं । हमारे बहुत से शिष्य 70 आयु को पार कर चुके हैं । उतने शिक्षित समझदार भी नहीं हैं । उन्हें खूब समझाया । पर ठीक से नहीं समझ आया । लेकिन एक बात उन्हें समझ आ गयी । सुबह शाम ध्यान पर बैठते हैं । रात को नींद नहीं आ रही । बिस्तर पर बैठकर भाव से बैठ जाते हैं । और भाव रहता है । सुमरन कर लूँ । बस उतने से ही उनका काम होने लगा । प्रभु के लिये बैठे । प्रभु उनकी सुनने लगे - तुम मेरी और दो डग चलो । मैं तुम्हारी ओर चार डग चलता हूँ ।
बस कर्ता नहीं है । उनके अन्दर । और यही असली समर्पण है । और कर्ता है । तो फ़िर कर लो । लगाओ अक्ल । पर आपकी जिज्ञासा भी अनुचित नहीं । नयी दीक्षा है । सतसंग भी अधिक नहीं ।
इसलिये सार यही है कि आप कैसे भी ध्यान दो । वह आटोमेटिकली ही आपको सही तरीके पर ले आयेगा । और ये बात सिर्फ़ यहीं लागू नहीं होती । आप छोटे बच्चे को खाने का सही तरीका सिखाओ । पर वह एकदम नहीं सीख सकता । मुँह सना लेगा । कपङे खराब करेगा । और आप किसी हालत में उसे ठीक नहीं सिखा सकते । वह खुद ही अभ्यास से ठीक सीखेगा । करत करत अभ्यास के जङमति होत सुजान । रसरी आवत जात ही सिल पर परे निशान ।
आपने साइकिल सीखी होगी । पहले हैंडल ठीक से पकङना । पैडल पर ध्यान । सामने ध्यान । फ़िर भी डगमगा रहे हैं । गिर भी जाते हैं । मगर अभ्यास के बाद निपुण हो गये । अब साइकिल चला रहे हैं । ये भी ख्याल नहीं । कैसे चल रही है । अपने आप ही चलने लगी ।
इसका सबसे सशक्त उदाहरण - पनिहारिनों द्वारा बिना पकङे मटकी सिर पर ले जाना है । बात भी कर रही हैं । चल रही हैं । मगर मटकी आराम से रखी है । अब ये सहज योग हो गया ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को सादर प्रणाम ।

23 नवंबर 2011

इंसानी शरीर में चलती फ़िरती प्रेतनी

1 अक्सर लोगों के मुख से यह सुनने में आया है कि - चुङैल के पैर उलटे होते हैं । क्या ये सच है ?
इसका सिद्धांत मुझे समझ नहीं आता । क्या ये इसलिए कहा जाता है कि सृष्टि कृमानुसार उनकी गति नहीं होती ।
2 तिर्यक योनि के अंतर्गत कौन आते हैं ?
3 भारतीय योग दर्शन में पूर्व जन्म को जानने के सिद्धांत और यौगिक क्रियाओं का युक्ति पूर्ण वर्णन किया है । सिद्धांत कुछ इस तरह है - किसी एक ध्येय पदार्थ में धारणा, ध्यान और समाधि । इन तीनों का पूर्णत: एकत्व होने से ‘संयम’ हो जाता है । संयम करते करते योगी संयम पर आरूढ़ हो जाता है अर्थात उसका चित्त पूर्णत: उसके अधीन हो जाता है । चित्त परिपक्व व निर्मल होने से उसकी ऋतंभरा बुद्धि में अलौकिक ज्ञान का प्रकाश आ जाता है । जिससे योगी को बाह्य और आंतरिक प्रत्येक वस्तु के स्वरूप का यथार्थ और पूर्ण ज्ञान हो जाता है । पूर्व जन्म का ज्ञान होना संभव है ?
4 ज्योतिष शास्त्रों के ज्ञाता ऐसा कहते हैं कि - जन्मकुंडली के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे । अगले जन्म में क्या होंगे ? आपको क्या लगता है कि ऐसा संभव है ?  
5 जीव जब निद्रावस्था में होता है । तो बुद्धि कहां चली जाती है ?
6 मनुष्य किसकी इच्छा से बोलता है ?
7 लोगों को अकसर यह कहते सुना है कि चौराहे पर फ़लाना टोटका करके पीछे मुङकर न देखें । वो क्यों भला ?
8 क्या भटकती आत्माओं का निर्धारित क्षेत्रफल भी होता है या फ़िर वे स्वतंत्र ही विचरण करती हैं ।
9 जिस व्यक्ति की सङक दुर्घटना में मौत हो जाती है । तो कुछ आत्मा भटकती रहती हैं । क्या वे वहीं चौराहे आदि वृक्ष पर अपना डेरा डाल देती हैं ?
10 भटकती आत्माओं का भोजन क्या होता है ? उनका दैनिक क्रियालाप कैसे होता है ?
11 क्या हम इसी जीवन में उन रहस्य को जान सकते हैं । जिसे मनुष्य मरने के बाद जान पाता है ?
12 शरीर में मन की स्थिति कहां होती है ?
13 आपके किसी पिछले लेख में ‘दसवां द्वार’का जिक्र आया था । ये दसवां द्वार से आपका क्या तात्पर्य है ?
14 क्या स्वर्ग का रास्ता इस धरती पर मौजूद है ?
15 मोक्ष और मुक्ति में क्या अंतर है ?
16 सम्मोहन शक्ति कैसे काम करती है ?
17 मैंने कहीं पढा था बिना गुरू से आज्ञा लेकर जो मंत्र को प्रयोग में लाता है । वह निगुरा कहलाता है । तथा उसको कोई भी मंत्र सिद्ध नहीं होता । क्या पुस्तकों में लिखे गए सभी मंत्र कीलित (Locked) होते हैं । बिना वांछित दाम दिये (मतलब बिना गुरू की दीक्षा लिये । बिना गुरू की आज्ञा लिये) वह मन्त्र प्रयोग में नही लाया जा सकता । यहां तक कि गायत्री जैसे महामंत्र को भी गुरूमुख में ग्रहण किया जाता है । जरा खुल कर इस बारे में बताएं ?
अगर इस बात में सच्चाई है । तो टीवी, पत्र पत्रिकाओं, अखबारों, सतसंग संकीर्तन आदि में बताये गये मंत्रों के जप से कोई लाभ नहीं होता । मंदिर में मैंने अकसर लोगों को किन्हीं मंत्रो का जप करते देखा है । उनसे पूछो तो कहते हैं कि घर पर मंत्र जपने से ज्यादा महत्व मंदिर में भगवान के समक्ष जप ही कर लेना । क्या इस जप से कोई लाभ भी मिलता है ।
18 डायन का वास्तविक स्वरूप क्या है ? क्या वो इंसान शरीर में चलती फ़िरती प्रेतनी है या फ़िर एक औरत का दिमागी फ़ितूर, चरित्रहीन, संस्कारहीन होना है ? दरअसल मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर डायन बनने की स्थिति क्या है । लोग डायन ही क्यों कहते हैं । इस नाम का क्या अर्थ है ?
19 कोई इंसान खुद को साई का अवतार कहता है । साईं बाबा एक महान संत थे । क्या उनका भी कोई अवतार हो सकता है । क्या सत्य साईं साईं बाबा के अवतार थे ? मेरी नजर में वो एक झूठा इंसान है । जिसे लोगों ने अवतार बना कर मंदिर में बिठा दिया ।
20 आपका पिछला लेख ‘डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है’ पढ़ा मैंने । अब यकीन तो नहीं होता पर आप कहते हैं । तो ऐसा ही होगा । 
इस लेख में एक जगह आपने कहा कि - सूक्ष्म शरीर यानि आत्मा आपको दिखाई देते हैं । वैसे ही अन्यों को भी दिखाई देते हैं । इस लाइन को पढ़ते हुए मुझे एक वाकया याद आ गया । जो मैं आपको बताता हूं । बात पिछले महीने की है । गोरखपुर के कुशीनगर के एन ब्लाक के तीन मंजिला भवन में आमिर रहता है । करवाचौथ के दिन दोपहर करीब तीन बजे रेलिंग के पास खङा होकर सीढ़ी पर रखे साइकिल के ऊपर सीढ़ी की वह फ़ोटो खींचने लगा ।
तभी तस्वीर में उभरी एक आकृति देखकर वह चौंक गया । साइकिल के ऊपर सीढ़ी की जाली से सटी साङी पहने महिला की छाया फ़ोटो में नजर आई । कक्षा 8 में पढ़ने वाले अविनाश पुत्र नंदराज  व कक्षा 6 में पढ़ने वाले आदर्श पुत्र अनिल ने बताया कि रात में छत पर पायल की झंकार किसी महिला के रोने की आवाज उन्होंने सुनी है । महिलाओं ने भी इस बात की पुष्टि की ।
उसी मकान के छत से दस साल के भीतर तीन लोग गिर चुके हैं पर उनको कोई नुकसान नहीं हुआ । अब इन सब बातों को जोङकर देखा जाए तो मामला भूतनी का लगता है । 
जो भी हो, मैं आपको उसकी खींची तस्वीर इस मेल के साथ भेज रहा हूं । अब आप ही देख कर बताएं कि आखिर यह आकृति है किसकी । क्योंकि आपके अलावा इस विषय को ठीक से कोई समझ नहीं सकता ।
21  ये बात इसी साल की है । उन दिनों श्राद्ध चल रहे थे । उस दिन मैं काफ़ी फ़्री था और छत पर कुर्सी डाले मोबायल में गाने सुन रहा था । शाम के 5 ही बजे थे । तभी मुझे बहुत ही मनमोहक सी सुगंध आई । जिस जगह मैं बैठा था । वो सुगंध सिर्फ़ उसी जगह आ रही थी । मुझे बङा ताज्जुब हुआ कि आखिर ये सुगंध आ कहां से रही है । फ़िर मैंने थोङा इधर उधर से टहल कर पता लगाना चाहा कि आसपास के मकान से तो नहीं आ रही पर ऐसा कुछ नहीं था । फ़िर मैं वापस आकर अपनी जगह पर बैठ गया और उसके कुछ 5 मिनट बाद फ़िर वही सुगंध आ गई । अब मेरा दिमाग हरकत में आ गया था और मैंने छत पर बङे गौर से निगाह डाली पर कुछ नजर नहीं आया । वो सुगंध मेरे बाईं ओर से आ रही थी । जैसे कोई अदृश्य चीज मेरे आसपास है पर नजर नहीं आ रही । वो सुगंध इतनी ज्यादा मनभावन, मनमोहक थी कि मैं शब्दों में वर्णित नहीं कर सकता । जैसे सीधे स्वर्ग से ही आ रही हो । उस वक्त मुझे थोडा अजीब लग रहा था । अब आप ही बतायें । वो क्या था ?
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इत्तफ़ाक की बात है कि कल ही मुझे 3 महीने बाद फ़ुरसत सी मिली । इस मेल के कुछ उत्तर जो बङे हो सकते हैं । अलग अलग लेखों के माध्यम से विस्तार से दूँगा ।
वास्तव में मेरी इच्छा आजीवन हिमालयी क्षेत्र के किसी एकान्त में रहने की थी । फ़िर द्वैत जीवन में मेरे जीवन में एक भयानक एक्सीडेंट हुआ और परिस्थितियों ने मुझे जटिल संस्कार भोगने पर मजबूर कर दिया । सभी रहस्य तो मैं नहीं बता सकता पर अपने जीवन के शेष 38 साल एक सजा के समान मुझे कुछ नियमों में बिताने होंगे । जिनमें लगभग 10 साल माता पिता का शेष जीवन है । इससे पहले मैं विभिन्न स्थानों पर रहा और आना जाना भी रहा । संक्षेप में आज से सिर्फ़ 10 साल पहले मेरे दो सयुंक्त लक्ष्य थे । एक बालीवुड में स्थापित होना और दूसरा उसी के साथ साथ द्वैत में अधिकतम ऊँचाई प्राप्त करना । क्योंकि पूर्व संस्कारों के कारण मैं सिर्फ़ साधु नहीं बन सकता था । लेकिन 10 साल पहले मेरे जीवन में ऐसा भूचाल आया । जिसने मुझे हर तरह से तहस नहस कर दिया । मेरा पूरा जीवन ही रिफ़्यूजी की भांति कटा और अब तो मैं मर ही चुका हूँ । सिर्फ़ पिंजर मरना शेष रह गया है । भले ही एकदम क्लियरली न सही । मेरे तमाम जीवन की झलक मेरे लेखन में हैं । और आगे तो मैं इसी लेख - डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है, के साथ सीरीज ही लिखने वाला था । जिसमें तमाम यौगिक रहस्य आने थे । फ़िलहाल नहीं कह सकता । जिन्दगी कहाँ ले जायेगी ?
मोक्ष और मुक्ति में अंतर - अद्वैत का मोक्ष, पूर्ण मुक्त होना होता है । यानी आत्मा की अपनी मर्जी, स्वछन्द, स्ववश, हमेशा के लिये । द्वैत में मुक्ति होती है । जो 4 प्रकार की होती है । संक्षेप में इस मुक्ति का मतलब जीवात्मा मनुष्य योनि या 84 या प्रेत आदि अन्य योनियों  के कष्ट पूर्ण जीवन की अपेक्षा ऐश्वर्य भोग विलास युक्त जीवन स्व स्थिति अनुसार हजारों साल के लिये प्राप्त करता है । इसके बाद पुण्य भक्ति फ़ल समाप्त होते ही फ़िर इसी चक्र में गिरा दिया जाता है ।
शरीर में मन की स्थिति - आँखों के पीछे होती है । लेकिन ये कोई अलग विशेष उपकरण नहीं होता । बेर की गुठली के समान आकृति वाले अंतकरण के चार छिद्र होते हैं - मन, बुद्धि, चित्त, अहम । इसी को मोटे अन्दाज में मन कहते हैं । 5 कच्चे तत्वों 25 प्रकृति 5 ज्ञान इन्द्रियाँ 5 कर्म इन्द्रियों से मिलकर बने इस शरीर का राजा मन होता है । इन सबका योग 40 हुआ । मनुष्य को इसी बात का बोध रहे । इसीलिये 40 kg weight को 1 मन कहने का सिद्धांत बनाया गया । क्योंकि मन का समस्त खेल इन 40 पर ही निर्भर है ।
आपके शेष प्रश्नों को उत्तर यथासंभव विस्तार से अलग अलग लेखों के माध्यम से देने का प्रयास रहेगा ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

22 नवंबर 2011

डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है

2 साल से भी कम उमृ में बचपन से ही सूक्ष्म शरीरों को खुली आखों से सहज ही देखना मेरे लिये साधारण अनुभव था । और मैं बहुत लम्बे समय तक इन्हें किसी को आश्चर्य सा प्रकट हुये इसलिये नहीं कहता था कि मुझे लगता था । जैसे ये मुझे दिखते हैं । औरों को भी दिखते होंगे । इसलिये मैं इन्हें सामान्य बात ही समझता था । और बचपन से ही देखते रहने के कारण कोई भय भी महसूस नहीं करता था ।
बस एक बात अलग थी कि ये सब जो दिखता था । ये क्या था । ये मेरी समझ में नहीं आता था । तब जब मैं उसे दूसरों से या बङों से पूछता था कि ये क्या था ? तब उन्हें बहुत आश्चर्य होता था । इस तरह धीरे धीरे अनुभव से मुझे समझ में आया कि - मैं कभी कभी कुछ अलग देखता हूँ । इस तरह के पात्र सत्ता के विशेष नियन्त्रण देख रेख में होते हैं । यधपि ठीक समय आने से पहले उन्हें भी खुद की स्थिति का पता नहीं होता । इसके प्रमाण हेतु बहुत से पौराणिक पात्र हैं । जो अपने को ही भूल गये थे । जैसे हनुमान । अपनी उङने की क्षमता भूल गये थे । जैसे शेषनाग के अवतार बलराम अपने को भूल गये थे । तब श्रीकृष्ण ने उन्हें याद दिलाया । इसलिये ऐसे पात्रों के साथ स्वचालित व्यवस्था ये बन जाती है कि न वे किसी को बता पाते हैं । न कोई समझ पाता है । यदि बात थोङी आकर्षित करे भी । तो बच्चा है । भृमित हो गया होगा । बातें बना रहा है । झूठ बोल रहा है आदि कहकर बात खत्म हो जाती हैं । सबसे बङी बात । योगमाया ऐसी परिस्थिति मनस्थिति बना देती है कि सब कुछ सामान्य ही लगता है । उदाहरण स्वरूप - राम के लंका विजय से लौटने के बाद ठीक 1 महीने के बराबर समय यानी 720 घण्टे का दिन रहा था । और राम से सभी जनता प्रेमवश व्यक्तिगत मिलना चाहती थी । तब राम एक ही समय में अनेक होकर सबसे मिले । फ़िर ये बेहद असाधारण बात सब भूल गये । या कहना चाहिये । उन्हें पता ही नहीं चला कि अभी कुछ ऐसा अदभुत भी हुआ था । क्योंकि यदि याद रहती । तो उनकी जिन्दगी असमंजस से भर जाती । और दिन रात सब यही सोचते रहते । यशोदा और कौशल्या को राम और श्रीकृष्ण द्वारा विराट रूप में अपने भगवत स्वरूप के दर्शन कराना । यदि उनको याद बना रहता । तो वे कभी पुत्रवत सामान्य व्यवहार नहीं कर पाती । इसलिये योगमाया ने कुछ समय के लिये जागृत हुयी अंतदृष्टि पर माया आवरण डाल दिया । फ़िर वे सामान्य हो गयीं ।
तब मेरे साथ भी समय के साथ साथ ऐसी स्थिति बनने लगी कि मैंने कहना ही छोङ दिया । वैसे भी सभी सरकारी नौकरी पेशा परिवार में थे । किसी को फ़ुरसत ही न थी कि ऐसी फ़ालतू की बातों पर ध्यान देता । और हरेक के लिये एकाकीपन भरपूर था । इससे  स्वतः प्राकृतिक साधना की परिस्थितियाँ निर्मित होने लगी । अब बचपन से एक बङा फ़ासला तय करके सीधा अब से लगभग दस साल पहले की बात करते हैं । अब तक मुझे इतने अनुभव हो चुके थे कि उन्हें गिनना या याद रखना । एकदम फ़ालतू की बात थी । शरीर से बहुत बार सोने के समान कण निकलना । और चन्दन की वारिश घर में होना आदि तो कई लोगों ने देखी थी । और कई तरह से परखा भी था । पर जिसके बारे में कुछ जानकारी ही न हो । उसके बारे में कोई भी क्या कह सकता था । बात आयी गयी हो गयी ।
पर समय आ चुका था । मेरी योग यात्रा काफ़ी परिपक्व स्थिति में आ पहुँची थी । तब दस साल पहले । मैं सामान्य ही था । पर लोगों को मैं अपसेट या पागल महसूस होता है । यहाँ तक कि तमाम लोगों ने सुझाव दिया कि मुझे इलेक्ट्रिक शाटस लगवा देने से मैं सही हो जाऊँगा । और घरवाले भी ऐसा सोचने लगे । ये बात अलग है । उल्टे मैंने ही सबको यौगिक इलेक्ट्रिक शाटस लगा दिये । जिससे सब घबरा गये । हालांकि अभी भी मेरे तमाम परिचित मुझे पागल ही समझते हैं । जिसका अनुमानित कारण उन्होंने मेरा बहुत अध्ययन करना बताया । मुझे पागल समझने की वजह थी । मेरी अजीव सी बातें । और अधिकतर समय अकेले ही हँसते रहना । अकेला ही रहना ।
पर बात यौगिक रहस्यों की है । श्री महाराज जी से मेरा अभी मिलना नहीं हुआ था । मैं उनके बारे में कुछ भी जानता तक न था । और लगभग दस साल पहले अनजाने में ही मैं एक विलक्षण योग करता था । कहीं से पढा नहीं । सुना नहीं । किसी ने बताया नहीं । स्वतः स्फ़ूर्त ।
मेरी कुण्डलिनी पहले ही जागृत थी । और मैं यूँ ही अन्दाज में सिर्फ़ दाँये कान में उंगली डालकर अनहद ध्वनियाँ सुनता था । मुश्किल से तीन चार मिनट के अभ्यास से ही अति विशाल योग भूमियाँ दृश्यमान हो उठती थी । जिस किसी ने सन्तमत की किताबें पढी होंगी । उसे पता होगा । मस्तिष्क के दायें भाग की ध्वनि को सुनना वर्जित किया गया है । क्योंकि यह सिद्ध क्षेत्र है । यहाँ सब सिद्ध जगत । सिद्ध लोक आदि हैं । जिनमें अपरिपक्व साधकों को अनेक खतरे । महामायावी खेल । और कदम कदम पर मौत तक की बिसात बिछी हुयी होती है । पर उस समय न मुझे ये पता था । न कोई बताने वाला मार्गदर्शक था । दूसरे मुझे बहुत डर के बाद भी खुद मजा आता था ।
अब ये बङी रोमांचक स्थिति होती थी । मैं अपने घर के बङे आंगन में या पिछवाङे बगिया में बैठा हुआ ही ये योग करता था । और सिद्ध क्षेत्र प्रकट हो जाता था । अति विशाल सिद्ध क्षेत्र की कौन सी भूमि या स्थान प्रकट होगा । ये मेरी उस वक्त बनी तत्कालिक वासना पर निर्भर था । अब स्थिति ये हो जाती थी कि वहाँ दूसरा जगत प्रगट हो जाता था । योग में रुचि रखने वाले । और साधक गौर से समझें । मैं अपने घर में बैठा हूँ । घर के सदस्य अपने काम में लगे चहलकदमी कर रहे हैं । और मैं वहीं होते हुये भी बहुत दूर । लाखों योजन दूर के आसमानी सिद्ध क्षेत्र में हूँ । इस स्थिति की बारीकता को समझना उचित है । मैं कोई ध्यान नहीं कर रहा । कोई आँखें बन्द नहीं । कुछ नहीं कर रहा । साधारण बैठा हूँ । बस कुछ मिनट अभ्यास से एकाग्र होकर वहाँ स्थिति हो गया । अब यहाँ एक ही समय में तीन मिश्रित स्थितियाँ बनती हैं । एक - मैं सामान्य घर में बैठा हूँ । और दुनियादारी वाली सामान्य स्थिति । यानी मुझे घर के लोग । घर आदि सब नजर आ रहा है । अलौकिकता वाली कोई बात नहीं । दो - मैं सिर्फ़ अपने को संसार में अकेला अनुभव मात्र कर रहा हूँ । घर और घर के लोग आदि कुछ नजर नहीं आ रहा । और सिद्ध क्षेत्र की भूमि मुझे स्पर्श कर रही है । यानी आखों और शरीर से महज एक फ़ुट दूर । इसमें खासियत ये होती है कि सामने ही प्रकट भूमि नजर आती है । पीछे स्पष्ट अहसास होता है कि घर भी है । और प्रथ्वी आदि भी हैं । यानी दोनों मिश्रित भूमियाँ । और भी ठीक से समझें । तो पीछे का ख्याल आते ही प्रथ्वी । और सामने देखते ही सिद्ध लोक । अब मैं एक सेतु की तरह दोनों के मध्य हुआ । इस दृश्य को ठीक से समझने के लिये कल्पना करें कि आपकी आँखों के सामने अभी प्रथ्वी का दृश्य धरातल आकाश आदि सब कुछ मौजूद है । और योगस्थ होते ही यहाँ किसी सुदूर लोक की भूमि दृश्य धरातल आकाश आदि ज्यों का त्यों दिखने लगे । बिलकुल वैसा ही जैसी पूर्व में प्रथ्वी नजर आ रही थी । पूर्ण रूप में । न कि कोई छोटा सा दृश्य बन जाये । जैसे कोई जादुई शीशा या बङी स्क्रीन देख रहे हों । ऐसा नहीं ।
तीन - प्रकट भूमि में आकर्षण पैदा होते ही । प्रथ्वी गायब । और मैं उस दृश्य के अन्दर । ऐसा तभी होगा । जब सुन्नता या शून्यता गहरा जायेगी । और जब किसी सूक्ष्म लोक के प्रति खिंचाव बनेगा । तो साधक स्वतः ही उतना सूक्ष्म हो ही जायेगा । तभी प्रवेश होगा ।
अब मेरे साथ यहाँ विशेष बात जो होती थी कि मैं इसके लिये कुछ भी करता नहीं था । बस भाव गहराता था । और वैसा होने लगता था । मैं ज्यों का त्यों साधारण बैठा ही रहता । हाँ घर की आवाजें दृश्य आदि खत्म । अब उनकी जगह । उस लोक की नयी आवाजें । और वहाँ के दृश्य ।
यही से कभी कभी डर पैदा हो जाता था । जब महासूर्य । अज्ञात परिधियाँ । अनजाने लोग । मायावी क्षेत्रों के विचित्र अनुभव में रहना होता था । यहाँ मैं अपनी स्थिति को भूल गया कि मैं अपने घर में ही हूँ । और योगस्थ हूँ । बल्कि सुन्नता की स्थिति में मैं नये लोक में विचरण कर रहा हूँ । और बिलकुल वहीं के निवासियों जैसा ही हूँ । बल्कि उस समय यही लगता है कि मैं वहीं का हूँ । लेकिन जैसे ही मन में तिनका भर भी पूर्व स्मृति खुद की हुयी । डर व्याप्त होने लगा । और - ये मैं कहाँ आ गया । लगने लगा । वापिस कैसे जाऊँ । ये डर होने लगा । ये स्वाभाविक था । पर यही गङबङ थी । ठीक इसी स्थिति के एक्सप्रेसन मैं कुछ ऐसा होता था कि घर के लोग मुझे असामान्य या पागल समझते । लेकिन उधर मुझे मजा भी आ रहा होता । और मैं फ़िर उधर का भावात्मक खिंचाव होते ही फ़िर उसी भूमि में पहुँच जाता ।
प्रारम्भिक अवस्था में । योग स्थितियों में डर लगना । एक सामान्य और स्वाभाविक बात है । इसलिये सफ़ल योगियों से जब कोई नया साधक डर लगने की बात कहता है । तो उनका एक ही जबाब होता है - डर के पास रहने से डर खत्म हो जाता है ।
एकदम सही बात  है । कितनी बार डरोगे । बार बार के अभ्यास से फ़िर वह खेल के समान लगेगा । पर थोङी अङचन और होती थी । दरअसल मैं सोचता था कि उसी स्थान पर दोबारा जाऊँ । जहाँ अभी गया था । तब डर नहीं लगेगा । पर ऐसा तभी तो सम्भव है । जब मैं जानकारी मैं एक एक चीज को समझ कर गया होऊँ । मैंने तो अनजाने ही उल्टा सीधा विचार किया । और शून्यता में चला गया । तब उसी स्थिति के अनुसार भूमि या लोक में पहुँचा । अब मजे की बात देखो । खुद ही सोच रहा हूँ कि कोई राक्षस कोई मायावी आदि मिले । फ़िर खुद ही डरता हूँ । जब छोटा था । तब रामलीला में राम के वन जाने तक की लीला एकदम बोरिंग लगती । लेकिन जैसे ही शूर्पनखा की नाक कटती । और रावण एण्ड कंपनी एंटर होती । मजा आने लगता । कभी कभी तो इतनी उत्तेजना हो जाती कि चिल्लाकर सीता को बता दूँ । लक्ष्मण रेखा के बाहर मत आना । लक्ष्मण को बता दूँ - सीता की बात मत मानों । वह मायावी मृग है । एक तरफ़ उन खल पात्रों के बिना मजा भी नहीं । दूसरी तरफ़ । नायकों की बुद्धि पर तरस भी आता । अरे मुझे इनकी  चालाकी पता है । फ़िर इनको क्यों नहीं पता । जबकि निश्चित है । रामलीला में रावण एण्ड फ़ैमिली का ही पूरा क्रेज बनता है । वरना शायद बच्चा तो छोङो । बूढे भी रामलीला देखने न जायें ।
वही बात यहाँ भी थी । डर भी है । मजा भी है । सबसे बङी बात । मुझे ये बहुत मामूली सी बात लग रही है कि महज कान में तीन मिनट उँगली डालकर मैं ये सब अदभुत देख रहा हूँ । और उस वक्त अधिकारिक तौर पर पता न होने से मुझे ये भी पता नहीं कि मैं लाखों योजन दूर आ गया हूँ । और बृह्माण्ड की अति ऊँचाई पर सिद्ध क्षेत्र में हूँ । क्योंकि मैंने विधिवत ज्ञान हासिल नहीं किया था । द्वैत में कोई गुरु नहीं था । मेरी सारी क्रियायें हठ योग वाली थी । अति अहम वाली थी । और मजे की बात ये थी कि मुझे तब ये भी पता नहीं था कि ये जो मैं करता हूँ । वह वास्तव में " हठ योग " है । क्योंकि मैंने पहले ही कहा । ये सब बात गुरु से या विधिवत ज्ञान से ही पता चलती है । वैसी चेतावनियाँ मैं हँसी में उङा देता था । तब बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती । मूढता पूर्वक किये हठ योग का एक ही परिणाम होता है - मौत ।
और वह मेरे पास ही टहलती रहती थी । पर दबोच क्यों नहीं पाती थी । इसमें एक रहस्य था । और दबोच भी लिया था । वो भी चार महीने निरन्तर । पर मारने वाले से बचाने वाला बङा होता है । भले ही मैं अनभिज्ञ था । पर नाम सत्ता मेरा कवच बनकर रक्षा कर रही थी । और ये सारी गतिविधियाँ मेरी पूर्व स्मृति लौटाने का हिस्सा मात्र थे । जो तान्त्रिक मान्त्रिक भक्ति युक्त मैं पिछले तीन जन्मों से था । और हर बार अन्तिम पर्चे में फ़ेल हुआ था । उससे आगे की बात होने का प्रयोजन था ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

20 नवंबर 2011

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 26

अष्टावक्र उवाच - तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा । तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यं एकाकी रमते तु यः । 17-1
अष्टावक्र बोले - जो पुरुष । नित्य तृप्त है । शुद्ध इन्द्रिय वाला है । और अकेला रमता है । उसे ही ज्ञान का फल । और योग के अभ्यास का फल प्राप्त होता है । 1
न कदाचिज्जगत्यस्मिन तत्त्वज्ञा हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम । 17-2
तत्व ज्ञानी । इस जगत के लिए । कभी भी । खेद को । प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि ( वह जानता है कि ) उसी एक से । यह बृह्मांड मंडल पूर्ण है । 2 
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निंबपल्लवाः । 17-3
ये कोई भी बिषय । स्वात्माराम ( आत्मा में रमण करने वाले ) को । कभी भी । हर्षित नहीं करते हैं । जैसे सल्लकी ( गन्नों ) के पत्तों से प्रसन्न हुए । हाथी को । नीम के पत्ते । हर्षित नहीं करते । 3
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासिता । अभुक्तेषु निराकांक्षी तदृशो भवदुर्लभः । 17-4
जो भोगे हुए । भोगों में । आसक्त नहीं । होता है । और अभुक्त । पदार्थों के प्रति । आकांक्षा रहित है । ऐसा मनुष्य । संसार में दुर्लभ है । 4
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 25

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते । भोगमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः । 17-5
इस संसार में । भोग और मोक्ष की । इच्छा वाले ( अनेकों मनुष्य ) देखे जाते हैं । परन्तु । भोग और मोक्ष की । आकांक्षा से रहित । कोई विरला ही महापुरुष है । 5
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा । कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि । 17-6
धर्म । अर्थ । काम । मोक्ष । जीवन । और मरण । किस उदार चित्त के लिए । गृहण और त्याग करने योग्य । नहीं है ? ( अर्थात इनसे कौन उदासीन है ।) 6
वांछा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ । यथा जीविकया तस्माद धन्य आस्ते यथा सुखम । 17-7
विश्व के । लय होने में । जिसका राग नहीं है । उसकी स्थिति में । जिसको द्वेष नहीं है । यथा प्राप्य जीविका द्वारा । जो पुरुष । सुख पूर्वक रहता है । इसी कारण । वह धन्य है । 7
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन्नास्ते यथा सुखम । 17-8
इस ज्ञान से । मैं कृतार्थ हूँ । इस प्रकार । जिसकी बुद्धि । गलित ( निष्ठ ) हो गयी है । ऐसा ज्ञानी पुरुष । देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । सुख पूर्वक रहता है । 8 
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 24

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च । न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे । 17-9
जिसके लिए । संसार सागर । नष्ट हो गया है । ऐसे पुरुष की । दृष्टि । शून्य हो जाती है । चेष्टाएँ ( व्यापार ) व्यर्थ हो जाती हैं । इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं । उसकी ( संसार में ) कोई इच्छा । अथवा विरक्ति नहीं रहती है । 9
न जागृति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः । 17-10
न जागता है । न सोता है । न पलक को खोलता है । और न पलक को बंद करता है । आश्चर्य है । मुक्त चित्त ( ज्ञानी ) कैसी उत्कृष्ट दशा में । वरतता ( रहता ) है । 10
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः । समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते । 17-11
जीवन मुक्त ज्ञानी । सब जगह । स्वस्थ ( शांत ) सब जगह । निर्मल । अन्तःकरण वाला । दिखलाई देता है । और सब जगह । सब वासनाओं से रहित होकर । विराजता ( रहता ) है । 11
पश्यन शृण्वन स्पृशन जिघ्रन्न अश्नन गृण्हन वदन व्रजन । ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः । 17-12
देखता हुआ । सुनता हुआ । स्पर्श करता हुआ । सूंघता हुआ । खाता हुआ । ग्रहण करता हुआ । बोलता हुआ । जाता हुआ । निश्चय ही । राग द्वेष से मुक्त ( छूटा ) हुआ । ऐसा महापुरुष मुक्त ( ज्ञानी ) है । 12
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

अष्टावक्र गीता वाणी ध्वनि स्वरूप - 23

न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृण्हाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः । 17-13
न निंदा करता है । न स्तुति करता है । न हर्ष को प्राप्त होता है । न क्रोध करता है । न देता है । न लेता है । ज्ञानी सर्वत्र रस रहित है । 13
सानुरागां स्त्रियं दृष्टवा मृत्युं वा समुपस्थितम । अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः । 17-14
प्रीति युक्त स्त्री को । और समीप में स्थित । मृत्यु को देख कर । व्याकुलता से रहित । और शांत महापुरुष । निश्चय ही मुक्त ( ज्ञानी ) है । 14
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु विपत्सु च । विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः । 17-15
सुख में । दुःख में । नर ( पुरुष ) में । नारी ( स्त्री ) में । संपत्तियों में । विपत्तियों में । ज्ञानी बिशेष रूप से । सर्वत्र समदर्शी ( भेद रहित ) है । 15
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे । 17-16
जिस मनुष्य के लिए । न हिंसा है । न दयालुता है । न उदंडता है । न दीनता है । न आश्चर्य है । और न क्षोभ है । उसी का संसार क्षीण हुआ है । ( वही जीवन मुक्त है ) 16
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः । असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते । 17-17
जो न बिषयों में । द्वेष करने वाला । और न ( ही ) बिषयों में । लोभ करने वाला है । तथा जो सदा । आसक्ति रहित । मन से प्राप्त । और अप्राप्त । वस्तुओं का । भोग करता है । वही जीवनमुक्त है । 17
अष्टावक्र त्रेता युग के महान आत्मज्ञानी सन्त हुये । जिन्होंने जनक को कुछ ही क्षणों में आत्म साक्षात्कार कराया । आप भी  इस दुर्लभ गूढ रहस्य को इस वाणी द्वारा आसानी से जान सकते हैं । इस वाणी को सुनने के लिये नीचे बने नीले रंग के प्लेयर के प्ले > निशान पर क्लिक करें । और लगभग 3-4 सेकेंड का इंतजार करें । गीता वाणी सुनने में आपके इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड पर उसकी स्पष्टता निर्भर है । और कम्प्यूटर के स्पीकर की ध्वनि क्षमता पर भी । प्रत्येक वाणी 1 घण्टे से भी अधिक की है । इस प्लेयर में आटोमेटिक ही वाल्यूम 50% यानी आधा होता है । जिसे वाल्यूम लाइन पर क्लिक करके बढा सकते हैं । इस वाणी को आप डाउनलोड भी कर सकते हैं । इसके लिये प्लेयर के अन्त में स्पीकर के निशान के आगे एक कङी का निशान या लेटे हुये  8 जैसे निशान पर क्लिक करेंगे । तो इसकी लिंक बेवसाइट खुल जायेगी । वहाँ डाउनलोड आप्शन पर क्लिक करके आप इस वाणी को अपने कम्प्यूटर में डाउनलोड कर सकते हैं । ये वाणी न सिर्फ़ आपके दिमाग में अब तक घूमते रहे कई प्रश्नों का उत्तर देगी । बल्कि एक  मुक्तता का अहसास भी करायेगी । और तब हर कोई अपने को बेहद हल्का और आनन्द युक्त महसूस करेगा ।

14 नवंबर 2011

रात में ध्यान करने में मुझे डर क्यों लगता है ?

मेरे प्रिय आत्मन ! राजीव जी ! नमस्कार । आगरा से आने के बाद ये मेरी पहली मेल है । और इसकी वजह है । एक सवाल । वो ये कि 1 - जब कोई भी साधक योग करता है । और योग की उच्च अवस्था में वो आपने सूक्ष्म शरीर को अपनी मर्जी से  स्थूल देह से बाहर निकाल सकता है । क्या ऐसा भी हो सकता है कि चाहने पर भी सूक्ष्म शरीर कभी वापस ही न आये ?
2 - क्या सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करने से सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर का तालमेल बिगड़ जाता है । और योगी गंभीर रोगों से गृसित हो जाता है ?
3 - रात में ध्यान करने में मुझे डर क्यों लगता है ? एक नये दीक्षित ।
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हँसदीक्षा का कोई साधक जब हँस ज्ञान को सफ़लता पूर्वक पास करके हँस की आखिरी अवस्था में आ जाता है । तब स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर द्वारा बाहर निकलने की स्थिति बनती है । और प्रायः हरेक साधक पहली कुछ स्थितियों में भयभीत हो ही जाता है । जब वह अपनी देह से खुद को अलग देखता है । लेकिन उससे पहले ही वह बहुत से अलौकिक बृह्माण्डी अनुभवों से गुजर चुका होता है । और इन हजारों अनुभवों से साधक में पूर्व ही योग परिपक्वता आ जाती है । जब शरीर से बाहर निकलने की स्थिति बनती है । तब गुरु को अपने आप पता लग जाता है । तब परमहँस दीक्षा कर दी जाती है । फ़िर भय लगना बन्द हो जाता है । और साधक शरीर से बाहर निकलने लगता है । और ऐसा कभी नहीं होता कि सूक्ष्म शरीर कभी वापिस ही न आये । क्योंकि आत्मज्ञान अमरता और निडरता प्रदान करता है । स्थायी सुख आनन्द देता है ।
2 - सहज योग में योगी कभी योग से गंभीर रोगों से गृसित नहीं होता । हठ योग । मनमुखता । लालच । वासना आकर्षण । गुरु के प्रति दुर्भाव । सिद्धियों की कामना । और उनका दुरुपयोग आदि ये नुकसानदायक है । द्वैत ज्ञान के विभिन्न प्रयोगों में ऐसे नुकसान होने की पूरी संभावना होती है । जब कोई शक्ति प्रकट होती है । और साधक भयभीत आदि हो जाता है । तब वह बिगङ सकता है । अतः सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के अलग होने से कोई तालमेल नहीं बिगङता ।
3 - आपकी अभी शुरूआती अवस्था है । तब पुराने संस्कारों के कारण नयी स्थितियों से भय लगता है । पर ये कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाता है । सहज योग में डर वाली कोई बात ही नहीं है ।
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ये थे आपके टू द प्वाइंट उत्तर । अब इस ज्ञान से सम्बन्धित कुछ अन्य बातों पर निगाह डालें । त्रेता युग में दशरथ

पुत्र भगवान श्रीराम की गुरु वशिष्ठ जी द्वारा सिर्फ़ हँसदीक्षा ही हुयी थी । इसलिये उनका समस्त आचरण मर्यादा के अन्दर था । परमहँस ज्ञान उनको नहीं हुआ था । भगवान श्रीकृष्ण परमहँस दीक्षा से दीक्षित थे । वे मर्यादा । पाप पुण्य । कर्ता अकर्ता से ऊपर थे ।
शिरडी के साई बाबा भी स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर लोक लोकन्तरों की यात्रा करते थे । लेकिन उनका ज्ञान जङ ज्ञान और द्वैत भक्ति के अंतर्गत आता था । इस स्थिति में शरीर से अलग होने पर शरीर मृतक के समान हो जाता है । लेकिन शंकराचार्य जी का यही ज्ञान चेतन ज्ञान था ।
शरीर से निकलने की एक नहीं बल्कि कई तरह की स्थितियाँ बनती हैं । परकाया प्रवेश । दूसरा शरीर बना लेना । एक साथ कई जगह प्रकट होना । हवा या आसमान में मुक्त विचरण करना । सशरीर जाना । या सूक्ष्म शरीर से जाना । सब कुछ योगी की मेहनत तपस्या और प्राप्ति पर निर्भर है ।
आत्मा रूपी हँस के ज्ञान । भक्ति । वैराग्य ये तीन पंख ( दो इधर उधर और एक पूँछ ) होते हैं । साधारण अज्ञान जीव स्थिति में यह पंख घायल होकर टूट गये हैं । और मजबूरन ये हँस अज्ञान भूमि पर बैठ गया है । जब काफ़ी पुण्यकर्मों से इसे कोई सन्त मिलता हैं । और ज्ञान देता है । तब उसे अपनी वास्तविकता पता चलते ही संसार से वैराग्य होने लगता है । और पूर्व ही ( सन्त कृपा से ) ज्ञानयुक्त होने से वह पूर्ण भाव से भक्ति करता है । यानी ये तीनों पंख फ़िर से स्वस्थ हो जाते हैं । और हँस उङने लगता है । अज्ञान से ज्ञान की ओर । तब ही वह सही तरीके से यात्रा करता है । यानी साधना में विभिन्न अनुभव होना । और स्थितियाँ बनना ।
मतलब ज्ञान का सही समझ में आना । और उसे गृहण करना । ये ज्ञान पंख है । यही फ़िर भाव द्वारा असली ज्ञान बनता है । जब ये ज्ञान हो जाता है । ये संसार मेरा वास्तविक स्थान नहीं है । तब इससे वैराग्य हो जाता है । ये दूसरा पंख हुआ । ज्ञान और वैराग्य स्वस्थ होने से भक्ति की तरफ़ जुङाव खुद ही हो जायेगा । क्योंकि भक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है - भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावे प्रानी । तो सार ये है कि ये  ज्ञान । भक्ति । वैराग्य तीनों पूर्ण होने पर ही असली बात बनती है । बाकी सिर्फ़ वैराग्य जागृत होने से शान्ति और व्यर्थ कलेशों से मुक्ति हो जाती है । या सिर्फ़ ज्ञान होने से तमाम असमंजस खत्म हो जाते हैं । जीव ज्ञान से विभिन्न लाभ उठा सकता है । और सिर्फ़ भक्ति करने से उसे सत ऊर्जा प्राप्त होती है । जिससे सांसारिक सुख शान्ति अर्थ प्राप्तियाँ आदि लाभ होते हैं ।
अगर गहराई से सोचें । तो किसी भी सांसारिक प्राप्ति हेतु भी ये तीन अंग आवश्यक हैं । ज्ञान ( जो प्राप्त करना है । उसका सही ज्ञान होना ) वैराग्य ( दूसरी चीजों पर धन समय आदि व्यय न करके । लक्ष्य की तरफ़ तन मन धन मोङ देना ) भक्ति ( भक्त जुङने से कहते हैं । किसी चीज की जानकारी करके । समय देते हुये । उसके प्रति प्रयत्नशील होना ही भक्ति है । )
अब ये साधक के स्वभाव और जीवन परिस्थिति और लक्ष्य पर निर्भर है कि वह अपने आपको कैसे व्यवस्थित करता है । और क्या प्राप्त करता है । ईश्वरीय सत्ता का तन्त्र बहुत सख्त है । यह एक तिनका भर भी किसी के साथ रियायत नहीं करता । चाहे वह जीव ज्ञान से जुङा हो । या अज्ञान स्थिति में हो । इसलिये भक्ति से मजबूत होने की सोच और प्रेरणा होनी चाहिये । न कि याचना और कमजोरी का भाव । तभी भक्ति करना सही मायनों में सार्थक भी है ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

11 नवंबर 2011

चलो सत्यकीखोज करें

ईद बहुत पावन पर्व है । परन्तु आज हमें यह जानने की जरुरत है कि वो कैसा खुदा है । जो बकरे का बलिदान मांगता है । मैं जानना चाहता हूँ कि किसी मूक जानवर की क़ुर्बानी ( बलिदान ) मात्र से क्या फायदा होता है ? मैं किसी धर्म सम्प्रदाय के खिलाफ नहीं हूँ । परन्तु मैं हर दकियानूसी सिद्धांतों के खिलाफ हूँ । जो आज धर्म के नाम पर चल रहे हैं । सिर्फ एक तर्क हमारा समाधान नहीं है । उस बात का । जो हम सब कहीं न कहीं महसूस करते है कि कुछ तो गड़बड़ है ? जिसका अभी समाधान करना बाकी है । प्रगट रूप से मैं एक मानव हूँ । इस धरती पर रहता हूँ । मेरा क्या अस्तित्व है ? कितने जन्म या एक जन्म से क्या होगा ? शायद आप मेरे प्रश्नों को न समझ पायें । पर यह गुत्थी हम मिलकर सुलझा सकते हैं  । आप आप हैं । मैं मैं हूँ । क्या आप अपने धर्म को समझ सके हैं ? कुरआन । बाइबल में । या गीता । वेदों में क्या लिखा है ? मैं नहीं जानता । परन्तु मैं सच को जानना चाहता हूँ । खुदा शब्द का अर्थ क्या है ? सबसे पहले कुरआन में ये कहा लिखा गया ? मुझे अभी बहुत कुछ ढूंडना है । चलो सत्य की खोज करें । एक पाठक ।
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अभी 3-4 दिन पहले की ही बात है । मैं श्री महाराज जी के समीप बैठा हुआ था । तभी TV का चैनल बदलते समय डिस्कबरी चैनल के एक दृश्य पर मेरी निगाह गयी । और मैंने उसी चैनल को लगे रहने देने का आगृह किया । उस समय जंगली शेरों के ऊपर कोई कार्यकृम आ रहा था । मैंने पहले भी कहा है । 84 लाख योनियों के कष्ट । और प्रतिक्षण मौत के मुँह में असुरक्षित और भयभीत जीवन जीने को जानना है ।  तो आराम से डिस्कबरी चैनल पर अनुभव कर सकते हैं । लिखा पढी अलग बात है । पर मैंने तो 84 के अध्यात्म को यहीं से अधिक जाना है ।
खैर..दृश्य के अनुसार किसी विदेशी जंगली गाय भैंस के बच्चा पैदा हो रहा था । तमाम तरह के जानबरों के झुण्ड आसपास विचरण कर रहे थे । दस बारह शेर शेरनियाँ और उनके बच्चे भी आसपास घूम रहे थे । लम्बे सूखे के बाद मानसून आ पहुँचा था । और बादल आसमान पर घुमङने लगे थे । सबसे पहले तो यही बात थी कि शिकार और शिकारी एकदम आमने सामने थे । मौत और मरने वाला एकदम करीब थे । क्योंकि जंगल छोङकर कहाँ जायें । बस कुछ ही फ़ासला उनके बीच था । और झुण्ड होने से वे अपने आपको कुछ कम भयभीत महसूस कर रहे थे ।
कैमरा फ़िर पैदा होते बच्चे पर जाकर रुक गया । और बच्चा योनि मार्ग से लटकता हुआ अंततः जमीन पर गिर

गया । एक शेरनी बङे आराम से इस दृश्य को देख रही थी । हमारे कमरे में बैठे सब लोग भी उत्सुकता से इस दृश्य को देख रहे थे । बच्चे के गिरते ही जुगाली सी करती हुयी शेरनी हठात उठ बैठी । बच्चे की माँ पहले ही इस बात से आशंकित और भयभीत अवस्था में बच्चे को जन्म दे रही थी । वह एकदम छिटक कर भागती हुयी अपने झुण्ड में शामिल हो गयी । बच्चा वहीं का वहीं पङा रह गया । अपनी जान से ज्यादा कुछ प्यारा नहीं होता । मुश्किल से 1 मिनट पहले नये जीवन में आया बच्चा शायद कुछ भी समझने की स्थिति में नहीं था । और स्वाभाविक ही माँ के दुलार भरे स्पर्श और चाटने की प्रतीक्षा कर रहा था । पर भयभीत माँ ने उसे उसकी हालत पर बेरहमी से छोङ दिया था ।
शेरनी बङे आराम से उठकर उसके पास पहुँची । और डाक्यूमेंटरी के वर्णन अनुसार वह भूखी नहीं थी । पर बच्चे का मुलायम नर्म गर्म माँस उसे आकर्षित कर रहा था । उसने जाकर हाँफ़ते से बच्चे को अपने अगले पैर के कठोर नख से टहोका । फ़िर ऐसा दो तीन बार किया । बच्चे के अन्दर भय जागृत हो गया । पर अभी वह मुश्किल से 7 मिनट का हुआ होगा । अगर एडिटिंग को मानें । तो अधिकतम 15 मिनट का होगा । बेहद कमजोर सा बच्चा लङखङाता हुआ उठा । और धीरे धीरे बचने की कोशिश में आगे चलने लगा । उस समय उसका पूरा समुदाय और कुल खानदान समाज देश वहाँ मौजूद था । पर मानों सबने उसे अनदेखा कर दिया था । अतः अब वह और उसके निकट मौजूद उसका काल था ।
अब बच्चा अधिक डर चुका था । और भूखी कमजोर अवस्था में भी यथासंभव तेज भागने की कोशिश कर रहा था । जबकि शेरनी आराम से उसके पीछे चलती हुयी निश्चिंत भाव से बारबार उसकी कमर पर बाँये पैर का नख फ़िरा देती  थी । कुछ मिनट तक चूहे बिल्ली जैसा खेल खिलाने के बाद शेरनी ने हल्के अन्दाज में ही पंजे से आकृमण किया । और बच्चे को गिरा दिया । इसके बाद भी बच्चे ने दो तीन बार बचने की असफ़ल कोशिश की । और फ़िर दम तोङ दिया । इसी दृश्य के बीच बीच में दिखाये दृश्य में एक छोटे भैंसे जैसे जीवित जीव पर छोटे ही भेङियों का झुण्ड आकृमण सा कर रहा था । और फ़िर उसे गिराकर जीवित ही फ़ाङते हुये खाने लगे । वह भी तमाम कुटुम्ब समुदाय के बीच अपने आपको खुद ही असहाय सा मरते हुये देखता रहा ।
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जाहिर है । किसी में अगर थोङी भी संवेदना है । तो ये दृश्य उसे विचलित कर सकता है । सोचने पर मजबूर कर

सकता है । हालांकि ये एक प्राकृतिक व्यवस्था है । पर इसी के आध्यात्मिक पहलू भी हैं । अतः अब मेरे मन में कुछ प्रश्न थे ।
1 - बच्चे ने अभी ठीक से आँखें भी नहीं खोली थी । पर उसे शेर से खतरे या डर का कैसे पता था । उसे तो अभी कोई जानकारी ही नहीं हुयी थी । किसी ने सिखाया भी नहीं था ।
2 - उसकी ये 84 श्रंखला महज गर्भकाल और 20-30 मिनट का जीवन लेकर आयी थी । इस स्थिति में क्या उसका कोई पिता या माता थी । या कोई समाज था । जिसमें वह उत्पन्न हुआ था । मेरे विचार से वह नितांत असहाय स्थिति में अकेला ही था ।
3 - निश्चय ही इस घटना के तमाम आध्यात्मिक पहलू थे । जो तमाम मनुष्यों से जुङे हैं । क्योंकि जानवरों की जिन्दगी में यह आम घटना है । वे उससे कोई सीख नहीं ले सकते ।
4 - इस 20-30 मिनट की जिन्दगी का क्या सन्देश था । क्या ये उसका भोग था । या शेरनी द्वारा अगले जन्म का कर्म तैयार होना । आदि
- तब श्री महाराज जी ने बताया - डर और आवश्यक ज्ञान परिस्थितियाँ प्रत्येक जीव के साथ उसकी तब स्थिति अनुसार आती हैं । जहाँ ये दृश्य डरावना था । वहाँ इसका फ़ल सुखदायक भी है । थोङे से कष्ट के बाद । एक लम्बा 


कष्टदायक जीवन । आसानी से खत्म हो गया । इस जीव श्रेणी में इसकी 84 इतनी ही थी । चाहे वह 84 जीव हो । या अन्य किसी भी योनि का जीव । भोग स्तर पर सभी अकेले ही हैं । दूसरे के भोग में कोई हिस्सा नहीं ले सकता । न दे सकता । 84 योनियाँ भोग योनियाँ ही हैं । अतः शेरनी का कोई नया कर्म नहीं बना था । क्योंकि मनुष्य के सभी कर्मफ़ल भोग मनुष्य शरीर में भोग पाना ही सम्भव नहीं है । अतः इस तरह की पशुवत भोग स्थितियाँ ही अधिक बनती हैं । अतः शेरनी ने अपने पूर्व मनुष्य जन्म का बदला इस बच्चे द्वारा किये गये तब मनुष्य जन्म के कर्म का इस तरह चुका लिया । अब इस पूर्व जन्म कर्म के प्रकार बहुत से हो सकते हैं । पर मुख्य बदला यही है । उतनी देर मौत का भय । माँ से विलगाव । सभी परिजनों के होते हुये भी नितांत असहाय अवस्था में भी अकेला । फ़िर उसकी हत्या । लेकिन परदे के पार । दूसरी अवस्था में यह मात्र उसकी भोजन पूर्ति थी । यानी एक मामूली सी घटना के पीछे कितना बङा इतिहास छिपा है । ये इसका आध्यात्मिक पहलू है ।
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खुदा शब्द का अर्थ क्या है ? खुदा । खुदी । खुद्दार । खुद्दारी । खुद आदि शब्द महज भाषान्तर है । इसका सही अर्थ अहम या मैं ही है । मैं या मेरे द्वारा । खुदी । खुद्दार । खुद्दारी शब्द खुदा से ही बने हैं । जिनको आसानी से समझा जा सकता है । यानी खुद होना । आईये । रामचरित मानस में इसको देखते हैं ।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ।  सो मायाबस भयउ गोसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाई । जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई । तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ।
ईश्वर का अँश ये अविनाशी जीव जब उससे अलग हुआ । तब अहम भाव जागृत होने से हुआ । तब उस स्थिति का पहला शब्द " सोहम " था । इसी सोहम से मन का निर्माण हुआ है । मन यानी माना हुआ । सोहम का सीधा सा अर्थ है । सो - हम । यानी - वही मैं हूँ । फ़िर ये उसी अहम भाव से मन के द्वारा विभिन्न खेल खेलता गया ।  और खेल में इस कदर लवलीन हुआ कि " सोहम " यानी वही - मैं हूँ । ये बात भी भूल गया । और कृमशः शक्तिहीनता को प्राप्त हुआ । इसलिये पहली पंक्ति जहाँ हर्ष सुख प्रदान करती है - ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल

सहज सुख रासी ।  यानी ईश्वर का अँश ये जीव अविनाशी है । चेतन है । अमल यानी मलरहित है । और सहज ही सुखों का भण्डार इसके पास है ।
लेकिन तभी आगे की लाइन बेहद डरा देती है - सो मायाबस भयउ गोसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाई । अपने ही बनाये खेल के मायावश होकर ये  बन्दर तोते आदि की तरह अपने ही कर्मजाल जाल में फ़ँस गया । तब क्या हुआ - जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई । इस पूर्ण चेतन में जङ शरीर और जङ पदार्थों से आसक्ति के कारण ग्रंथि यानी गाँठ पङ गयी । यधपि ये गाँठ मिथ्या है । फ़िर भी बहुत कठिनाई से छूटती है ।
और फ़िर आगे इसी को सत्य मान बैठा - तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी । यानी ये स्व बृह्म स्थिति से संसारी जीव हो गया । और अब न वह गाँठ खुल पाती है । और न ये सुखी हो पा रहा है ।
परन्तु मैं सच को जानना चाहता हूँ - बुद्ध सच को जानने की जब अपनी सभी कोशिश करके हार गये । तब उन्होंने भी चिल्लाकर यही कहा - मैं सच को जानना चाहता हूँ । तब उनके अंतर में आकाशवाणी हुयी - हे साधक ! अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर ।
बुद्ध बहुत देर " शरीर का माध्यम " क्या है ? सोचते रहे । और अंततः सही जगह पर पहुँच गये । फ़िर उन्हें बोध हुआ ।
यह अटल और गूढ बात मैंने बिना प्रयत्न आपको बता दी । आप भी  " शरीर का माध्यम " से सच का पता लगा सकते हो ।  ये तमाम सत्य खोजियों का एक मत सिद्धांत है - जो पिण्डे सो बह्माण्डे । यानी शरीर में वह सब कुछ ज्ञात हो सकता है । जो बृह्माण्ड में है । क्योंकि शरीर इसी बृह्माण्ड का इलेक्ट्रानिक सर्किट माडल है । हो सकता है । एक व्यक्ति आजीवन चन्द्रमा आदि ग्रहों पर अंतरिक्ष यानों द्वारा न जा सके । पर शरीर रहस्यों द्वारा कुछ ही सेकेण्डों में जा सकता है । जाते हैं । हमेशा जाते रहे हैं । आगे भी जाते रहेंगे । इसलिये सभी सच मनुष्य शरीर के अन्दर है । बस जरूरत उसको जानने की है ।
क्या आप अपने धर्म को समझ सके हैं - धर्म का शाब्दिक अर्थ धारण करना है । आप जो भी मन के द्वारा विचार आवरण धारण कर लेते हो । उसी को धर्म मानने लगते हो । यह देह धर्म कहलाता है । यह देही अवस्था रहने तक रहता है । और उसी के साथ समाप्त हो जाता है । पर आत्मा अनादि और सनातन है । अतः उसका धर्म भी सनातन है । यानी जो कभी बदलता नहीं । सदा एक सा ही रहता है । और सनातन धर्म की परिभाषा ही यह है कि - मैं न मन हूँ । न शरीर हूँ । बल्कि मैं शुद्ध चैतन्य अविनाशी आत्मा हूँ । इसको जानकर सब जाना हुआ ही हो जाता है । क्योंकि सबका मूल यही है ।
मूक जानवर की क़ुर्बानी ( बलिदान ) मात्र से क्या फायदा होता है - जो फ़ायदा होता है । वो मैंने शेरनी के उदाहरण में लिख दिया । निश्चित ही ये फ़ायदा होगा ही होगा । बाकी अहम से ये सारा खेल बना है । अहम से ही जीव दुर्गति को प्राप्त हुआ । अतः अहम की ही कुरबानी देने को कहा जाता है । कुरबानी का मतलब अपने " मैं " का गला काटना । जिससे फ़िर आत्मा या अपनी असली पहचान का बोध होने लगे । लेकिन शब्दों के हेरफ़ेर के चलते भृमवश इसके मायने बदल गये । और तमाम कुरीतियाँ विभिन्न समाजों के प्रचलन में आ गयीं ।
रामायण में लिखा है - सब मम प्रिय । सब मम उपजाये । सब मेरे द्वारा ही उत्पन्न है । और सभी मुझे प्रिय हैं । फ़िर वह कैसे क्यों किसी से कहेगा कि - इसकी हत्या करके मुझे भेंट करो ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

10 नवंबर 2011

साधारण स्थिति का मृत्यु ज्ञान

ज्ञान और बिज्ञान वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । ज्ञान किसी चीज की अनुभवजन्य स्थिति है । और बिज्ञान उसी चीज की सिद्ध हो चुकी स्थिति । अतः इन दोनों में ही किन्तु परन्तु । कही सुनी बातों । बनाबटी धारणाओं का स्थान नहीं होता । बल्कि जाना हुआ । प्रयोग किया हुआ । सिद्ध किया हुआ..ही कहा जाता है । सभी योनियों का जीवन एक निरन्तर यात्रा है । किसी का उत्थान हो रहा है । किसी का पतन हो रहा है । तो किसी का उत्थान पतन मिश्रित हो रहा है ।
और ये ही तीन स्थितियाँ जीवन के हर भाव में बनती हैं । सही । गलत । सही गलत मिश्रित । दिन । रात । दिन रात मिश्रित संध्याकाल । सुख । दुख । सुख दुख मिश्रित । पाना । खोना । खोना पाना मिश्रित । दरअसल इस रहस्य के पीछे तीन गुणों - सत रज तम.. का बिज्ञान काम करता है । इन तीन गुणों पर आधारित ही ये समस्त सृष्टि खेल संचालित है । इन गुणों की अधीनता में देवता आदि बङी शक्तियाँ भी आती है । इसको सरलता से समझने हेतु - सत ( सही या उत्तम ज्ञान पक्ष ) रज ( गुण की क्रियाशीलता ) तम ( गलत या अँधेरा अज्ञान पक्ष ) अब सत के प्रभावी होने से सात्विकता सत्य ज्ञान या उजलापन बढ जाता है । तम के प्रभावी होने से अज्ञानता अँधेरा और तामसिकता प्रभावी हो जाती है । इन दोनों गुणों के मिश्रित ‍% से अन्य विभिन्न स्थितियाँ बनती हैं । उस क्रियाशील स्थिति को रजोगुण कहा जाता है ।
उदाहरण के लिये सतोगुण की अधिकता जब रजोगुण से मिश्रित हो । तब एक राजा धर्मप्रिय दयालु आदि सभी अच्छे गुणों की परिभाषा वाला होता है । लेकिन जब यही राजा तमोगुण की अधिकता के साथ रजोगुण के साथ मिश्रित हो । तव वह दुष्ट पापी अत्याचारी क्रूर आदि हो जाता है । इसके भी अलावा जब रजोगुण की क्रियाशीलता सतगुण और तमगुण दोनों से मिश्रित हो रही हो । तो उस राजा में मिश्रित गुण यानी दयालुता क्रूरता । पापी धर्मात्मा । दुष्टता सज्जनता आदि मिश्रित भाव होती है । और ये बात छोटे से छोटे से लेकर बङे से बङे पर लागू होती है । योग और सन्तज्ञान इन गुणों से ऊपर गुणातीत होता है । तुलसीदास जी ने कहा है - कहिय तात सो परम विरागी । तृण सम सिद्ध तीन गुन त्यागी ।
तब जीवन को ठीक से समझने हेतु जीवन से अधिक मृत्यु का अध्ययन आवश्यक है । क्योंकि जीवन का नियन्त्रण तो बहुत कुछ हमारे हाथों में है । सहनीय स्थिति है । सहारा देने वाले भी हैं । परन्तु मृत्यु उपरान्त जीव एकदम असहाय दीन हीन है । और तब उसके कर्मफ़ल ही साथी हैं - राजा हो या रंक सभी का अन्त एक सा होय । हमारे यहाँ देहाती क्षेत्र में शमशान की एक बङी मजेदार परिभाषा कही जाती  है । जो काफ़ी हद दूसरे भावों में ठीक भी लगती है । समशान ( शब्द बदलाव पर ध्यान दें ) यानी यहाँ आकर सभी की शान सम ( बराबर ) हो जाती है । राजा का शरीर हो । या भिखारी का । उसे समान रूप से मिट्टी में मिलना ही होगा । कोई भेदभाव नहीं ।
पर ये बात सिर्फ़ शरीर के लिये ठीक है । क्योंकि शरीर ही मरता है । जीव तो मरता ही नहीं । तब इसके लिये आगे हेतु बहुत सटीक बात कही गयी है - आये हैं सो जायेंगे । राजा रंक फ़कीर । एक सिंहासन चढ चले । एक बंधे जंजीर ।
यानी मृत्यु के बाद की दो मुख्य स्थितियाँ । एक ने जीवन का लक्ष्य जिस अनुपात में प्राप्त कर लिया हो । वह उसी अनुपात में सिंहासन पर चढकर बाइज्जत जायेगा । और आगे भी स्व स्थिति अनुसार राज प्राप्त करेगा । दूसरे ने इस अमूल्य जीवन को व्यर्थ गंवा दिया हो । उसे सजा के तौर पर जंजीर में बँधे हुये अपराधी के समान ताङना सहित जाना होगा । और पुण्य कर्म आदि की निर्धनता स्थिति से दीर्घकाल तक गुजरना होगा ।
इसीलिये मैंने कहा । जीवन से अधिक मौत का अध्ययन आवश्यक है । तब आईये देखें । मरते कैसे हैं ? और  इसको जानना समझना बहुत कठिन नहीं । बल्कि बहुत सरल है ।
मृत्यु भले ही एकदम सिर काट देने से हो । या एक्सीडेंट में परखचे उङ जाने पर । या सामान्य तरीके से । असल क्रिया समान ही होगी । और उतने ही समय में होगी । कैसे ?
कृमशः निचले चक्रों का टूटना । या तत्वों का अपने तत्वों में लय होना । सबसे पहले गुदा लिंग के बीच स्थित प्रथ्वी चक्र ( या तत्व ) ढहा । ये जल तत्व में विलीन होता है । जो इसके ठीक ऊपर है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी आसानी से देख सकते हैं । प्रथ्वी ही जल में लय ( समाती ) होती है । जल कभी प्रथ्वी में लय नहीं होता । क्योंकि प्रथ्वी का निर्माण ही जल के फ़ेने से हुआ है । इसका सबसे बङा प्रमाण 75% जल और 25% प्रथ्वी होना है

। इस तरह ये प्रथ्वी तत्व जल तत्व में विलीन हो गया । शरीर में एक तत्व खत्म हो गया । मृत्यु के समय इसका ज्ञान या 1 - पहचान स्वतः मल निकल जाना है । जिसको आम भाषा में मल खसकना कहा जाता है । इसमें भले ही मृतक ने बहुत दिनों से कौर न खाया हो । पर उसको बहुत सारा मल आता है ।
अब आगे जल तत्व अग्नि में लय होता है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी जल का अग्नि में स्थिति होना साफ़ नजर आता है । जब सूर्य की गरमी या अग्नि ताप से जल वाष्पित हो जाता है । जल तत्व लिंग मूल में स्थिति होता है । इसके अग्नि तत्व में लीन होते ही अधिकांश मृतकों का मूत्र निकल जाता है । और 2 - पहचान हेतु उनका गला सूखने लगता है । तब बहुधा लोग पानी गंगाजल आदि पिलाते हैं ।
इसके आगे अग्नि तत्व वायु तत्व में लीन होता है । सांसारिक स्थूल स्थिति में भी अग्नि का वायु में स्थिति होना साफ़ नजर आता है । जब जलती अग्नि वायु में लय हो रही होती है । अग्नि तत्व की स्थिति नाभि में है । यहाँ ये पंचाग्नि रूप में है । पर मूल अग्नि तत्व ही है । इसका कार्य शरीर को गर्म रखना । ऊर्जा देना । खाना पचाना आदि बहुत से कार्य हैं । अग्नि तत्व के वायु तत्व में लीन होते ही मृतक का शरीर ठण्डा पङ जाता है । तब आपने देखा होगा । बहुत से लोग मृतक के शरीर को हाथ से रगङकर गर्म रखने की चेष्टा करते हैं । अग्नि तत्व लीन होने की 3 - पहचान यही है । शरीर का ठण्डा पङ जाना ।
इस तरह - प्रथ्वी । जल । अग्नि 3 तत्व कृमशः वायु में लीन हो गये । अब आगे वायु तत्व शरीर को छोङता है । तब पहचान 4 - इसके द्वारा चलती - स्वांस । धङकती नसें नाङियाँ । नब्ज आदि वायु गतिविधियाँ शान्त हो जाती हैं । और प्राण का चलना बन्द हो जाता है । और तब मृतक को जिलाने का प्रयास कर रहे परिजन या डाक्टर आदि निराश होकर कह देते हैं - अब कुछ नहीं रहा । 
साधारण या ज्ञान रहित मनुष्य और 84 के जीवों की मृत्यु स्थिति यहीं तक हैं । क्योंकि जीते जी वे आकाश या आकाश तत्व या इससे ऊपर की स्थितियाँ प्रयोगात्मक या व्यवहारिक स्तर पर नहीं जानते । और अपने ज्ञान स्तर में इन्हीं 4 तत्वों में जीवन भर बरतते हैं । तो स्वाभाविक ही गति भी यहीं तक होती हैं । आँख । कान । नाक । मुँह । लिंग । गुदा । साधारण ज्ञानरहित जीवों के प्राण इन्हीं 9 द्वारों में से किसी 1 द्वार से निकलते हैं ।  और जिस द्वार से भी निकलते हैं । वह फ़ैलकर विकृत हो जाता है । थोङा गौर से देखने पर स्पष्ट पता चल जाता है । प्राण कहाँ से निकले हैं ।
आगे भी साधारण स्थितियों की ही बात करते हैं । 84 लाख योनियों के परिणाम को प्राप्त हुये जीवों को खास कोई लेने नहीं आता । मन । बुद्धि । चित्त । अहम । इन 4 से मिलकर बना अंतकरणः यानी सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर से 


निकलकर एक अँधेरे मैदान में पहुँचता है । जहाँ निराधार अक्षर यानी ज्योति कुछ ऊँचाई पर निरन्तर स्वतः प्रकाशित है । वहाँ इसी का पीला मद्धिम सा प्रकाश फ़ैला होता है । इसी ज्योति के आधार पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । तब वह अंतकरण रूपी सूक्ष्म शरीर इसके चारों ओर घूमता है । ध्यान रहे । अब एक स्वचालित ढंग से आपके तमाम कर्मों के आधार पर निचोङ रूप वहाँ 84 लाख योनियों में से किसी के भी परिणाम अनुसार 3-4 शरीर मैदान में स्वतः नजर आने लगेंगे । आप अपने भाव अनुसार खुद ही लपकोगे । क्योंकि शरीर रहित हो जाने पर शरीर बहुत अच्छा लगता है । जल्दी से कोई भी शरीर प्राप्त करने की इच्छा बलबती हो जाती है । चाहे वह पशु पक्षी का ही क्यों न हो । ये एक स्वतः भाव बन जाता है । बस उनमें से किसी शरीर के प्रति इच्छा बनते ही सूक्ष्म शरीर उसमें समा जाता है । और जीवात्मा प्राप्त  84 के उसी जीव गर्भ में चली जाती है । यहाँ एक विशेष बात ये है कि वहाँ दिखाई देने वाले सभी शरीर पूर्ण आकार वाले होंगे । जैसे हाथी चूहा मोर बिलाव आदि सभी युवा और स्वस्थ शरीर जैसे आकार वाले । न कि शिशु आकार के । ये 84 लाख योनियों में जाने वाले की अन्तिम गति हुयी ।
इसके बाद साधारण स्थिति में ही तीन मुख्य गतियाँ -  प्रेत । नरक । और मनुष्य रूप पुनर्जन्म भी होती हैं । 84 की स्थिति लगभग 70% जीवों की बनती है । शेष 30% में ये तीनों आते हैं । जिनमें मनुष्य रूप में पुनर्जन्म का % 1% से भी काफ़ी कम होता है ।
प्रेत - दोनों कानों में से किसी से भी प्राण निकलने पर जीवात्मा प्रेत बन जाता है । बाँये कान से प्राण निकलने पर इसी प्रथ्वी । और नीच लोक स्थिति का । तथा शक्तिहीन प्रेत बनता है । क्योंकि बाँया भाग काल क्षेत्र के अंतर्गत आता है । दाँये कान से प्राण निकलने पर इससे ऊँची स्थिति । उच्च लोक । गण आदि तथा शक्तियुक्त प्रेत बनता है । क्योंकि दाँया भाग सिद्ध क्षेत्र के अंतर्गत आता है । ये मृत्यु उपरान्त प्रेतक स्थितियाँ हुयीं ।
नरक - पाप कर्मानुसार नरक को प्राप्त हुये जीवात्मा को उसके द्वारा जीवन में अपनाये गये यम ( यम की पूरी जानकारी हेतु अष्टांग योग के 8 अंग - यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार । धारणा ध्यान समाधि देखें ) के आधार पर लेने यमदूत या जमदूत आते हैं । जिनको देहाती बोली में जमघट्टा कहा जाता है । इनकी आकृतियों की भयंकरता या सामान्य डरावना पन व्यक्ति के जीवन आचरण पर निर्भर करता है । क्योंकि उसी आधार पर ये दिखते हैं । या सताते हैं । मारते हैं । यही यात्रा बेहद कष्टदायक है । जो अलग अलग स्थिति अनुसार 13 से लेकर अधिक दिनों तक में पूर्ण होती है । इसी जीव की यमपुरी आदि में पेशी होती है । और फ़िर सजा अनुसार इसे तय नरक में भेज दिया जाता है । जिनमें खास नरकों की संख्या ही हजारों में हैं ।
पुनर्जन्म - आयु शेष रहने पर । या किसी अपवाद स्वरूप । या अन्य कोई विशेष वजह होने पर जीवात्मा मनुष्य का मनुष्य रूप पुनर्जन्म भी होता है । पर ये 1 का भी 1% ही होता है । यानी ना के बराबर । इसका सबसे बङा प्रमाण यही हैं । यदि ये इतना आसान और सुलभ होता । तो तमाम गृंथ सन्त ज्ञानी आदि मनुष्य शरीर को अति दुर्लभ नहीं बताते । जिसकी देवता भी इच्छा करते हैं ।
मृत्यु बाद पुनर्जन्म होने वाले इस जीवात्मा की विभिन्न मुख्य स्थितियाँ बन सकती हैं । कुछ समय का नरक भी हो सकता है । 2-4 जीवों तक की 84 भी हो सकती है । 1-2 साल को प्रेत भी बन सकता है । या सीधे सीधे ही जन्म ले सकता है ।
स्वर्ग - बहुत अच्छे और काफ़ी पुण्य कर्मों और सीमित दिव्य ज्ञान से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । पुण्य फ़ल और ज्ञान स्थिति अनुसार ही स्वर्ग में रहने की अवधि और स्थान अधिकार आदि तय होता है । इसमें भी जीवात्मा की स्थिति अनुसार मृत्यु बाद लेने देवदूत या उच्च लोग दिव्य विमान द्वारा आते हैं । साधारण मृत्यु के बाद उच्चता में ये सबसे पहली मगर सबसे निम्न स्थिति है । जो वास्तव में ज्ञान के बिना हो ही नहीं सकती । क्योंकि पुण्य कर्म और प्रयोगात्मक हवन यज्ञ आदि करने की इच्छा । बिना ज्ञान भाव जागे कोई कैसे कर सकता है । और अज्ञानता में तो करेगा ही नहीं । अतः ये साधारण जीवों की मृत्यु स्थिति हुयी ।

08 नवंबर 2011

11 nov 2011 को प्रथ्वी जीव लेखा जोखा समाप्त

11 nov 2011 अगले दिनों की इससे बङी और महत्वपूर्ण सूचना कुछ हो ही नहीं सकती कि इस प्रथ्वी की वर्तमान निर्माण स्थिति और इस पर रहते जीवों का समस्त लेखा जोखा इसी 11 nov 2011 तक के लिये था । जो अब समाप्त हो चुका है । अब इसको पूरी तरह तो मैं भी नहीं समझा पाऊँगा । पर इसको यूँ भी मान लो । नव निर्माण नयी व्यवस्था हेतु धीरे धीरे कार्यवाही शुरू हो जायेगी । इस समय प्रथ्वी की आवादी 7 अरब है । जबकि इस प्रथ्वी का क्षेत्रफ़ल संसाधन अधिकतम 2 अरब आवादी के ठीक से रहने के अनुसार है ।  ध्यान रहे अधिकतम 2 अरब । और इस 2 अरब में बच्चे । बूढे । जवान । स्त्री । पुरुष सभी आते हैं । ध्यान रहे । मैं अधिकतम 2 अरब की बात कह रहा हूँ । वास्तव में तो लगभग डेढ अरब संख्या में ही उत्थान पतन होते रहना चाहिये । जैसे कभी पौने दो अरब पहुँच जाये । और कभी 1 अरब पर आ जाये । तो प्रथ्वी की विभिन्न परिस्थितियों का संतुलन बना रहता है । जाहिर है । अभी आवादी तिगने से अधिक है । अतः प्रकृति द्वारा इस व्यवस्था को संतुलन करने का समय आ गया है ।
ये असंतुलन सिर्फ़ मानव आवादी में ही नहीं है । छोटे कीट पतंगो से लेकर विशालकाय पशु वृक्ष पहाङ नदियाँ वन भूमि मिट्टी आदि सब में हो चुका है । जबकि इनका समग्र संतुलन बनाये रखने में बहुत बङा हाथ होता है ।
तब जिस प्रकार आप विभिन्न अवसरों पर अपने घर कालोनी नगर आदि की सफ़ाई अभियान सा चलाते हैं । वैसे ही यह प्रकृति का सफ़ाई अभियान होगा । जिसके कई स्थानों से संकेत मिलने शुरू हो गये हैं । यानी साफ़ शब्दों में खण्ड प्रलय की क्रिया शुरू हो गयी । जैसा कि ऊपर मैंने कहा । विभिन्न ज्ञानियों के मतानुसार सभी जीवों की 


लिखित व्यवस्था रिकार्ड  11 nov 2011 तक का ही है । ये बात मैं नहीं कह रहा । बल्कि सदियों पहले से अनेक तत्व दर्शियों द्वारा कही गयी है । चाहे वो माया सभ्यता का कलेण्डर हो । या अन्य स्रोत । सभी ने एकमत ही - संवत 2000 के ऊपर हाहाकारी योग..बताया है । और ये संवत 2000 चल ही रहा है । खास बात यही है कि लिखित ब्यौरे के अनुसार  11 nov 2011 तक ही जिन जीवों की जैसी व्यवस्था होनी थी । हो जायेगी । अब इसके बाद उनके द्वारा किया गया कोई भी तात्कालिक उपाय काम नहीं करेगा । और बचे जीवों की स्थिति रिफ़्यूजी वाली ही होगी । जैसे कि मैंने कहा था । अच्छे हँस जीव । अन्य श्रेणी के भक्त । अपनी सबलता के चलते इस संघर्ष में निज स्थिति अनुसार संभल सकते हैं । बाकी जो अपनी गलतियों से उदासीनता से निर्बलता को प्राप्त हो चुके हैं । वे असहाय ही हैं । जब भी किसी देश में युद्ध जैसी विभीषका या अन्य आपदा स्थितियाँ बनती हैं । तब वहाँ के निवासियों के साथ जो गुजरता है । वही बात है ।


कल ही की बात है । सन्त समाज के बीच किसी ने बढती जमीन महंगाई की बात की । तब बताया - अब इतने बने बनाये मकान खाली होने वाले हैं कि लोग कहेंगे । इसमें आ जाईये ।
अब इस बारे में ठीक से कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि - कहाँ क्या कैसे होगा ? और स्पष्ट कहना उचित भी नहीं बनता । पर 11 nov 2011 से जनवरी तक का समय इसके लिये खास है । यानी इन्हीं दिनों में संतुलन की कार्यवाही आरम्भ हो जायेगी । जैसे बढा हुआ अतिकृमण आदि हटाने के लिये पूर्व कागजी कार्यवाही आदि निर्धारित करके बुलडोजर चलना शुरू हो जाता है । फ़िर ये भी पक्का नहीं कहा जा सकता कि यह सब कितने दिनों तक चलेगा ? फ़िर भी ये सब 2017 तक चल सकता है ।
क्यों ? क्योंकि जीवों को shift भी करना होता है । और यकायक 5 अरब ( सिर्फ़ मानव ) जीवों को shift करना आसान बात भी नहीं हैं । इस परिवर्तन रूपरेखा के अधिंकाश संकेत जमीनी हैं । क्योंकि प्राकृतिक व्यवस्था को दुरुस्त करने हेतु बिगङी जमीन सरंचना को ठीक करना सबसे महत्वपूर्ण है ।
जैसे मिट्टी में खनिज उर्वरक तत्वों की कमी । जल का दूषित होना । वायु का दूषित होना । बेढंगा निर्माण हो

जाना । जिसमें वन्य प्रदेशों वन्य जीवों का नष्ट हो जाना आदि है । अब जाहिर है । ये काम मानवीय स्तर पर और स्थूल मशीनों द्वारा तो होगा नहीं । इसलिये सीधी सी बात है । जमीन के अन्दर से विस्फ़ोट द्वारा ही यह हो सकता है । और सभी बिज्ञान द्वारा भी जानते हैं । ज्वालामुखी विस्फ़ोट से ही ये सभी बदलाव अधिकतर संभव होते हैं । तभी जल स्रोत शुद्ध होते हैं । तभी मिट्टी को नये शक्तिशाली खनिज और उर्वरक तत्व प्राप्त होते हैं । हडप्पा मोहन जोदङो जैसी तमाम सभ्यतायें नगर सहित जमीन में समा जाती हैं । और नयी सभ्यताओं के लिये जमीन तैयार हो जाती है ।
मैं पहले ही कह चुका । ये सब नयी व्यवस्था और नये बदलाव हेतु होगा । तब अनुमानतः 2017 तक प्रथ्वी और निर्वासित पुनर्वासित जीवों की सैटिंग हो जाने पर नया लेखा जोखा तैयार किया जाये । और तब तक ये व्यवस्था ठीक उसी तरह निर्धारित कर्मचारियों के अधीन होगी । जो अतिकृमण में खास व्यवस्था हेतु नियुक्त होते हैं ।
इस खास समय में सन्त महात्मा अन्य देव शक्तियाँ उन लोगों की भी नियम अंतर्गत सहायता नहीं करती । जो एकदम पङी मुसीवत से घबराकर हाय हाय करते हैं । और तत्काल सहायता चाहते हैं । काफ़ी पहले से जुङे हुये 


लोग तो अपनी स्थिति अनुसार सेफ़ जोन में होते ही हैं । और जो इससे पूर्व भाव बना चुके । प्रार्थना अर्जी लगा चुके । उनको भी थोङा कामचलाऊ लाभ मिल जाता है । पर अभी यानी 11 nov 2011 से कोई प्रार्थना काम नहीं करती । कबीर साहब ने स्पष्ट कहा है - सुख में सुमरन ना किया । दुख में करता याद । कह कबीर ता दास की । कौन सुने फ़रियाद ।
ज्यादातर तत्वदर्शी सन्त इस समय सांसारिक सम्बन्धों से हट गये हैं । गतिविधियाँ बहुत सीमित कर दी हैं । नये लोगों जीवों की उनसे बात नहीं हो सकती । अपने से जुङे लोगों को भक्ति ध्यान अधिक से अधिक करने की सलाह दे रहे हैं । व्यर्थ के कार्यों को समाप्त करने का उपदेश बता रहे हैं । दूरस्थ यात्रायें भी हानिकारक हैं । क्योंकि अब कभी भी कुछ भी हो सकता है । ये एक तरह से ब्लेक आउट स्थिति का समय है ।
मैं भी इस अवधि में बहुत कम लेख आदि नये कार्य ना के बराबर ही करूँगा । क्योंकि जिस प्रकार भयानक आपदा के समय सभी अपने अपनों का ख्याल ही करते हैं । तब मेरा भी दायित्व बनता है । लगभग 5000 हमारे अपने जीव हैं । और कुछ विभिन्न स्तरों पर भाव से जुङे हुये । दूसरे इस महा बदलाव को देखने जानने की उत्सुकता किसे नहीं होगी । तब देखें । क्या होता है ।

07 नवंबर 2011

पुरानी हवेली

हैल्लो राजीव जी ! रविवार का दिन होने की वजह से मेरे पास काफ़ी समय था । पिछले लेख में मैने आपसे कहा था कि - कहानी "डायन" मेरी पसंदीदा कहानी है । और उसी कहानी से संबन्धित कुछ फ़ोटो मैं आपको जरूर भेजूंगा । तो मैने कहानी के कुछ अंश दोबारा पढे । और फ़िर मेरे दिमाग में ऐसी जगह का जिक्र आया कि इस तरह की जगह तो शायद मैं जानता हूं ? हमारे शहर के नजदीक ही यह इलाका पडता है । पहाडी पर बना किले और उसके नीचे का पूरा इलाका लगभग 200-250 साल पुराना है । और यहाँ के मंदिर भी काफ़ी पुराने है ।
किले से तो काफ़ी बार इस जगह को निहारा है । पर यहां आना कभी नही हुआ । फ़िर मैंने बिना देरी किये गाडी निकाली । और पहुँच गये इस पुराने शहर में । शहर की गलियां काफ़ी सकरी और घुमावदार होने की वजह से गाडी चलाने में थोडी दिक्कत आ रही थी । शाम का समय होने के कारण मुझे अंधेरा होने का भी डर था । अंधेरे में फ़ोटो लेना काफ़ी मुश्किल होता है ।
पर जब मैं यहां पहुंचा । तो मुझे थोडा ताज्जुब हुआ कि यहां ज्यादातर लोग छोटी-सी बस्ती टायप में रहते हैं । और जगह जगह पुरानी इमारते हैं । जो कि अब खंडहरनुमा हो चुकी हैं । सबसे पहले तो मेरी नजर एक पुराने मंदिर की तरफ़ पडी ( देखें चित्र सं 1,13 )  मंदिर से देखने पर थोडी दूर तक नजारे का लुत्फ़ उठाया जा सकता है । आगे चलें । तो एक छोटी सी पहाडी पर बने खण्डहर पर नजर पडी ( चित्र सं 14 देखें )  फ़िर मैं एक पुरानी हवेली की तरफ़ गया । जिसका दरवाजा थोडा सा खुला था । पर कुंडी लगी हुई नहीं थी ( देखें चित्र सं 3,4,5,6,7,21,22 )....थोडा सा अंदर झांक कर देखा । तो एक महिला दिखाई दी । अंदर आने की इजाजत मिलने पर पता चला कि वे लोग इस खंडहरनुमा हवेली की रखवाली के लिए रखे गये है ।
एक बुजुर्ग उम्र लगभग 75 साल । बुजुर्ग महिला । और एक अन्य महिला । जिसकी उमृ लगभग 30-35 साल । वे 


लोग राजपूत मालूम पडते थे । मैंने उनसे हवेली की कुछ फ़ोटो लेने की गुजारिश की । तो थोडी ना नुकुर के बाद पैसे लेने की बात पर वो राजी हो गया । उसने बताया कि ये हवेली सालों से खाली पडी है । यहां कोई नहीं रहता । और न ही कभी कोई आता है । अंदर से हवेली का मुआयना करने पर जो मैंने महसूस किया । वो मैं आपको बता नहीं सकता ।
शाम के लगभग 5.15 बजे होंगे । पर हवेली की शांति बडी ही डरावनी महसूस हो रही थी । अंदर के कमरों से बेहद दुर्गंध आ रही थी । हालांकि वह बुजुर्ग उस हवेली में झाडू कभी कभार कर देता है । पर बिना देख-संभाल के हवेली की दुर्दशा दर्दनाक मालूम हो रही थी । कुछ फ़ोटो मैंने हवेली के खाली पडे कमरों के भी लिए । जहां काफ़ी अंधेरा था । उस बुजुर्ग ने थोडी जिद की । तो मुझे चाय के लिये रूकना पडा । और फ़िर मैं बाहर को निकल गया ।
थोडा आगे जाने पर मालूम पडा कि यह रास्ता महल के पिछले दरवाजे की ओर जाता है । और उसी रास्ते पर यह हवेली थी । मैने गाडी वापस घुमा ली । और उसी से सट कर जाता दूसरे रास्ते पर चल दिये । यहां और भी कई सारी पुरानी हवेली हैं । कुछ फ़ोटो सडक से सटे पुराने मंदिरो और मकानों के लिये । अंधेरा बढता जा रहा था । आधा घण्टा तक मैंने आसपास के कुछ और फ़ोटो भी लिये ।
ये पूरा इलाका कुछ 2-3 किमी. के दायरे मे फ़ैला होगा । शाम के 6 बज चुके थे । और अंधेरा घिर चुका था ।  मेरे लिये और फ़ोटो लेना मुमकिन नहीं था । इसलिए फ़ोटो शूट का कार्यकृम यही समाप्त करना पडा । और इस तरह मेरी आज की शाम का The End हुआ । मैंने गाडी की हैड लाइट आन की । और गाडी को घर की तरफ़ दौडा दी । मैं आपको कुछ और अच्छे फ़ोटो भी भेजना चाहता था । पर अंधेरे पर किसका बस चलता है ।
तो राजीव जी ! ये फ़ोटो जो मैंने आपको इस मेल के साथ भेजे हैं । अपनी पसंद के अनुसार आप इन्हें कहानी में पोस्ट कर दीजिये । आप चाहें तो दूसरी प्रेत कहानी में भी इन्हें लगा सकते है । ये बताएं कि अगली प्रेत कहानी किस विषय पर होगी । कहानी में कामरसता । और नग्नता का दायरा सीमित हो । तो वह कहानी पर हावी नहीं होता । बल्कि उससे कहानी की पकड और मजबूत होती है । साथ ही मनोरंजन और ज्ञान विषय का होना भी बहुत जरूरी है । इस बारे में फ़िर कभी चर्चा करेंगे । अगला मेल मैं आपको जल्द ही "पुनर्जन्म के सिद्धांत" पर लिखूंगा । राजू
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आपने तो पूरी एक हारर कहानी ही लिख दी भाई । और बङी खतरनाक रहस्यमय जगह की सैर भी करा दी । मेरे पास फ़ोटो अनजिप करने का साफ़्टवेयर नहीं है । अतः अनजिप फ़ोटो ही भेजें । वैसे आपके अन्दर लेखन क्वालिटी तो है ।
अभी इन दिनों लगभग दीपावली से पहले से आना जाना लगा हुआ है । इसलिये समय बहुत कम मिलता है । सर्दियों में दिन भी छोटा होने लगा । मैं कुछ भी लिखते समय पहले से तय नहीं करता । जो भी लिखता है । अपने आप लिखता चला जाता है ।
वास्तव में बहुत खतरनाक प्रेत कथा लिखी जा सकती है । पर एकदम सत्य वर्णन से वह प्रभावी और हानिकारक हो जायेगी । लोगों को प्रभावित कर सकती है । इसलिये मैं - कहीं की ईंट कहीं का रोङा । भानुमती ने कुनबा जोङा .फ़ार्मूले से लिखता हूँ । गूढ और अलौकिक घटनायें लिखने का यही सिद्धांत है । वे सब संकेत में लिखी जाती हैं । इसलिये घटना कहीं की । पात्र बदले हुये । और तथ्य इधर से उधर संयुक्त कर तब मिश्रित कहानी लिखी जाती है । इसलिये सत्य पर आधारित होते हुये भी वह असत्य हो जाती है । मनोरंजन भी उसका प्रभाव खत्म करने के लिये डालता हूँ । सीरियस और डरावनी कथा गम्भीरता से लिखने पर निसंदेह हानिकारक होगी । और ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं है ।
अगली प्रेतकथा मैंने अभी शुरू भी नहीं की । पर देखो । थोङा थोङा करके लिखना शुरू करता हूँ । अभी सन्त समागम में व्यस्तता अधिक है ।

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