11 नवंबर 2011

चलो सत्यकीखोज करें

ईद बहुत पावन पर्व है । परन्तु आज हमें यह जानने की जरुरत है कि वो कैसा खुदा है । जो बकरे का बलिदान मांगता है । मैं जानना चाहता हूँ कि किसी मूक जानवर की क़ुर्बानी ( बलिदान ) मात्र से क्या फायदा होता है ? मैं किसी धर्म सम्प्रदाय के खिलाफ नहीं हूँ । परन्तु मैं हर दकियानूसी सिद्धांतों के खिलाफ हूँ । जो आज धर्म के नाम पर चल रहे हैं । सिर्फ एक तर्क हमारा समाधान नहीं है । उस बात का । जो हम सब कहीं न कहीं महसूस करते है कि कुछ तो गड़बड़ है ? जिसका अभी समाधान करना बाकी है । प्रगट रूप से मैं एक मानव हूँ । इस धरती पर रहता हूँ । मेरा क्या अस्तित्व है ? कितने जन्म या एक जन्म से क्या होगा ? शायद आप मेरे प्रश्नों को न समझ पायें । पर यह गुत्थी हम मिलकर सुलझा सकते हैं  । आप आप हैं । मैं मैं हूँ । क्या आप अपने धर्म को समझ सके हैं ? कुरआन । बाइबल में । या गीता । वेदों में क्या लिखा है ? मैं नहीं जानता । परन्तु मैं सच को जानना चाहता हूँ । खुदा शब्द का अर्थ क्या है ? सबसे पहले कुरआन में ये कहा लिखा गया ? मुझे अभी बहुत कुछ ढूंडना है । चलो सत्य की खोज करें । एक पाठक ।
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अभी 3-4 दिन पहले की ही बात है । मैं श्री महाराज जी के समीप बैठा हुआ था । तभी TV का चैनल बदलते समय डिस्कबरी चैनल के एक दृश्य पर मेरी निगाह गयी । और मैंने उसी चैनल को लगे रहने देने का आगृह किया । उस समय जंगली शेरों के ऊपर कोई कार्यकृम आ रहा था । मैंने पहले भी कहा है । 84 लाख योनियों के कष्ट । और प्रतिक्षण मौत के मुँह में असुरक्षित और भयभीत जीवन जीने को जानना है ।  तो आराम से डिस्कबरी चैनल पर अनुभव कर सकते हैं । लिखा पढी अलग बात है । पर मैंने तो 84 के अध्यात्म को यहीं से अधिक जाना है ।
खैर..दृश्य के अनुसार किसी विदेशी जंगली गाय भैंस के बच्चा पैदा हो रहा था । तमाम तरह के जानबरों के झुण्ड आसपास विचरण कर रहे थे । दस बारह शेर शेरनियाँ और उनके बच्चे भी आसपास घूम रहे थे । लम्बे सूखे के बाद मानसून आ पहुँचा था । और बादल आसमान पर घुमङने लगे थे । सबसे पहले तो यही बात थी कि शिकार और शिकारी एकदम आमने सामने थे । मौत और मरने वाला एकदम करीब थे । क्योंकि जंगल छोङकर कहाँ जायें । बस कुछ ही फ़ासला उनके बीच था । और झुण्ड होने से वे अपने आपको कुछ कम भयभीत महसूस कर रहे थे ।
कैमरा फ़िर पैदा होते बच्चे पर जाकर रुक गया । और बच्चा योनि मार्ग से लटकता हुआ अंततः जमीन पर गिर

गया । एक शेरनी बङे आराम से इस दृश्य को देख रही थी । हमारे कमरे में बैठे सब लोग भी उत्सुकता से इस दृश्य को देख रहे थे । बच्चे के गिरते ही जुगाली सी करती हुयी शेरनी हठात उठ बैठी । बच्चे की माँ पहले ही इस बात से आशंकित और भयभीत अवस्था में बच्चे को जन्म दे रही थी । वह एकदम छिटक कर भागती हुयी अपने झुण्ड में शामिल हो गयी । बच्चा वहीं का वहीं पङा रह गया । अपनी जान से ज्यादा कुछ प्यारा नहीं होता । मुश्किल से 1 मिनट पहले नये जीवन में आया बच्चा शायद कुछ भी समझने की स्थिति में नहीं था । और स्वाभाविक ही माँ के दुलार भरे स्पर्श और चाटने की प्रतीक्षा कर रहा था । पर भयभीत माँ ने उसे उसकी हालत पर बेरहमी से छोङ दिया था ।
शेरनी बङे आराम से उठकर उसके पास पहुँची । और डाक्यूमेंटरी के वर्णन अनुसार वह भूखी नहीं थी । पर बच्चे का मुलायम नर्म गर्म माँस उसे आकर्षित कर रहा था । उसने जाकर हाँफ़ते से बच्चे को अपने अगले पैर के कठोर नख से टहोका । फ़िर ऐसा दो तीन बार किया । बच्चे के अन्दर भय जागृत हो गया । पर अभी वह मुश्किल से 7 मिनट का हुआ होगा । अगर एडिटिंग को मानें । तो अधिकतम 15 मिनट का होगा । बेहद कमजोर सा बच्चा लङखङाता हुआ उठा । और धीरे धीरे बचने की कोशिश में आगे चलने लगा । उस समय उसका पूरा समुदाय और कुल खानदान समाज देश वहाँ मौजूद था । पर मानों सबने उसे अनदेखा कर दिया था । अतः अब वह और उसके निकट मौजूद उसका काल था ।
अब बच्चा अधिक डर चुका था । और भूखी कमजोर अवस्था में भी यथासंभव तेज भागने की कोशिश कर रहा था । जबकि शेरनी आराम से उसके पीछे चलती हुयी निश्चिंत भाव से बारबार उसकी कमर पर बाँये पैर का नख फ़िरा देती  थी । कुछ मिनट तक चूहे बिल्ली जैसा खेल खिलाने के बाद शेरनी ने हल्के अन्दाज में ही पंजे से आकृमण किया । और बच्चे को गिरा दिया । इसके बाद भी बच्चे ने दो तीन बार बचने की असफ़ल कोशिश की । और फ़िर दम तोङ दिया । इसी दृश्य के बीच बीच में दिखाये दृश्य में एक छोटे भैंसे जैसे जीवित जीव पर छोटे ही भेङियों का झुण्ड आकृमण सा कर रहा था । और फ़िर उसे गिराकर जीवित ही फ़ाङते हुये खाने लगे । वह भी तमाम कुटुम्ब समुदाय के बीच अपने आपको खुद ही असहाय सा मरते हुये देखता रहा ।
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जाहिर है । किसी में अगर थोङी भी संवेदना है । तो ये दृश्य उसे विचलित कर सकता है । सोचने पर मजबूर कर

सकता है । हालांकि ये एक प्राकृतिक व्यवस्था है । पर इसी के आध्यात्मिक पहलू भी हैं । अतः अब मेरे मन में कुछ प्रश्न थे ।
1 - बच्चे ने अभी ठीक से आँखें भी नहीं खोली थी । पर उसे शेर से खतरे या डर का कैसे पता था । उसे तो अभी कोई जानकारी ही नहीं हुयी थी । किसी ने सिखाया भी नहीं था ।
2 - उसकी ये 84 श्रंखला महज गर्भकाल और 20-30 मिनट का जीवन लेकर आयी थी । इस स्थिति में क्या उसका कोई पिता या माता थी । या कोई समाज था । जिसमें वह उत्पन्न हुआ था । मेरे विचार से वह नितांत असहाय स्थिति में अकेला ही था ।
3 - निश्चय ही इस घटना के तमाम आध्यात्मिक पहलू थे । जो तमाम मनुष्यों से जुङे हैं । क्योंकि जानवरों की जिन्दगी में यह आम घटना है । वे उससे कोई सीख नहीं ले सकते ।
4 - इस 20-30 मिनट की जिन्दगी का क्या सन्देश था । क्या ये उसका भोग था । या शेरनी द्वारा अगले जन्म का कर्म तैयार होना । आदि
- तब श्री महाराज जी ने बताया - डर और आवश्यक ज्ञान परिस्थितियाँ प्रत्येक जीव के साथ उसकी तब स्थिति अनुसार आती हैं । जहाँ ये दृश्य डरावना था । वहाँ इसका फ़ल सुखदायक भी है । थोङे से कष्ट के बाद । एक लम्बा 


कष्टदायक जीवन । आसानी से खत्म हो गया । इस जीव श्रेणी में इसकी 84 इतनी ही थी । चाहे वह 84 जीव हो । या अन्य किसी भी योनि का जीव । भोग स्तर पर सभी अकेले ही हैं । दूसरे के भोग में कोई हिस्सा नहीं ले सकता । न दे सकता । 84 योनियाँ भोग योनियाँ ही हैं । अतः शेरनी का कोई नया कर्म नहीं बना था । क्योंकि मनुष्य के सभी कर्मफ़ल भोग मनुष्य शरीर में भोग पाना ही सम्भव नहीं है । अतः इस तरह की पशुवत भोग स्थितियाँ ही अधिक बनती हैं । अतः शेरनी ने अपने पूर्व मनुष्य जन्म का बदला इस बच्चे द्वारा किये गये तब मनुष्य जन्म के कर्म का इस तरह चुका लिया । अब इस पूर्व जन्म कर्म के प्रकार बहुत से हो सकते हैं । पर मुख्य बदला यही है । उतनी देर मौत का भय । माँ से विलगाव । सभी परिजनों के होते हुये भी नितांत असहाय अवस्था में भी अकेला । फ़िर उसकी हत्या । लेकिन परदे के पार । दूसरी अवस्था में यह मात्र उसकी भोजन पूर्ति थी । यानी एक मामूली सी घटना के पीछे कितना बङा इतिहास छिपा है । ये इसका आध्यात्मिक पहलू है ।
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खुदा शब्द का अर्थ क्या है ? खुदा । खुदी । खुद्दार । खुद्दारी । खुद आदि शब्द महज भाषान्तर है । इसका सही अर्थ अहम या मैं ही है । मैं या मेरे द्वारा । खुदी । खुद्दार । खुद्दारी शब्द खुदा से ही बने हैं । जिनको आसानी से समझा जा सकता है । यानी खुद होना । आईये । रामचरित मानस में इसको देखते हैं ।
ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ।  सो मायाबस भयउ गोसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाई । जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई । तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ।
ईश्वर का अँश ये अविनाशी जीव जब उससे अलग हुआ । तब अहम भाव जागृत होने से हुआ । तब उस स्थिति का पहला शब्द " सोहम " था । इसी सोहम से मन का निर्माण हुआ है । मन यानी माना हुआ । सोहम का सीधा सा अर्थ है । सो - हम । यानी - वही मैं हूँ । फ़िर ये उसी अहम भाव से मन के द्वारा विभिन्न खेल खेलता गया ।  और खेल में इस कदर लवलीन हुआ कि " सोहम " यानी वही - मैं हूँ । ये बात भी भूल गया । और कृमशः शक्तिहीनता को प्राप्त हुआ । इसलिये पहली पंक्ति जहाँ हर्ष सुख प्रदान करती है - ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल

सहज सुख रासी ।  यानी ईश्वर का अँश ये जीव अविनाशी है । चेतन है । अमल यानी मलरहित है । और सहज ही सुखों का भण्डार इसके पास है ।
लेकिन तभी आगे की लाइन बेहद डरा देती है - सो मायाबस भयउ गोसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाई । अपने ही बनाये खेल के मायावश होकर ये  बन्दर तोते आदि की तरह अपने ही कर्मजाल जाल में फ़ँस गया । तब क्या हुआ - जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई । इस पूर्ण चेतन में जङ शरीर और जङ पदार्थों से आसक्ति के कारण ग्रंथि यानी गाँठ पङ गयी । यधपि ये गाँठ मिथ्या है । फ़िर भी बहुत कठिनाई से छूटती है ।
और फ़िर आगे इसी को सत्य मान बैठा - तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी । यानी ये स्व बृह्म स्थिति से संसारी जीव हो गया । और अब न वह गाँठ खुल पाती है । और न ये सुखी हो पा रहा है ।
परन्तु मैं सच को जानना चाहता हूँ - बुद्ध सच को जानने की जब अपनी सभी कोशिश करके हार गये । तब उन्होंने भी चिल्लाकर यही कहा - मैं सच को जानना चाहता हूँ । तब उनके अंतर में आकाशवाणी हुयी - हे साधक ! अपने शरीर के माध्यम पर ध्यान कर ।
बुद्ध बहुत देर " शरीर का माध्यम " क्या है ? सोचते रहे । और अंततः सही जगह पर पहुँच गये । फ़िर उन्हें बोध हुआ ।
यह अटल और गूढ बात मैंने बिना प्रयत्न आपको बता दी । आप भी  " शरीर का माध्यम " से सच का पता लगा सकते हो ।  ये तमाम सत्य खोजियों का एक मत सिद्धांत है - जो पिण्डे सो बह्माण्डे । यानी शरीर में वह सब कुछ ज्ञात हो सकता है । जो बृह्माण्ड में है । क्योंकि शरीर इसी बृह्माण्ड का इलेक्ट्रानिक सर्किट माडल है । हो सकता है । एक व्यक्ति आजीवन चन्द्रमा आदि ग्रहों पर अंतरिक्ष यानों द्वारा न जा सके । पर शरीर रहस्यों द्वारा कुछ ही सेकेण्डों में जा सकता है । जाते हैं । हमेशा जाते रहे हैं । आगे भी जाते रहेंगे । इसलिये सभी सच मनुष्य शरीर के अन्दर है । बस जरूरत उसको जानने की है ।
क्या आप अपने धर्म को समझ सके हैं - धर्म का शाब्दिक अर्थ धारण करना है । आप जो भी मन के द्वारा विचार आवरण धारण कर लेते हो । उसी को धर्म मानने लगते हो । यह देह धर्म कहलाता है । यह देही अवस्था रहने तक रहता है । और उसी के साथ समाप्त हो जाता है । पर आत्मा अनादि और सनातन है । अतः उसका धर्म भी सनातन है । यानी जो कभी बदलता नहीं । सदा एक सा ही रहता है । और सनातन धर्म की परिभाषा ही यह है कि - मैं न मन हूँ । न शरीर हूँ । बल्कि मैं शुद्ध चैतन्य अविनाशी आत्मा हूँ । इसको जानकर सब जाना हुआ ही हो जाता है । क्योंकि सबका मूल यही है ।
मूक जानवर की क़ुर्बानी ( बलिदान ) मात्र से क्या फायदा होता है - जो फ़ायदा होता है । वो मैंने शेरनी के उदाहरण में लिख दिया । निश्चित ही ये फ़ायदा होगा ही होगा । बाकी अहम से ये सारा खेल बना है । अहम से ही जीव दुर्गति को प्राप्त हुआ । अतः अहम की ही कुरबानी देने को कहा जाता है । कुरबानी का मतलब अपने " मैं " का गला काटना । जिससे फ़िर आत्मा या अपनी असली पहचान का बोध होने लगे । लेकिन शब्दों के हेरफ़ेर के चलते भृमवश इसके मायने बदल गये । और तमाम कुरीतियाँ विभिन्न समाजों के प्रचलन में आ गयीं ।
रामायण में लिखा है - सब मम प्रिय । सब मम उपजाये । सब मेरे द्वारा ही उत्पन्न है । और सभी मुझे प्रिय हैं । फ़िर वह कैसे क्यों किसी से कहेगा कि - इसकी हत्या करके मुझे भेंट करो ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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