14 नवंबर 2011

रात में ध्यान करने में मुझे डर क्यों लगता है ?

मेरे प्रिय आत्मन ! राजीव जी ! नमस्कार । आगरा से आने के बाद ये मेरी पहली मेल है । और इसकी वजह है । एक सवाल । वो ये कि 1 - जब कोई भी साधक योग करता है । और योग की उच्च अवस्था में वो आपने सूक्ष्म शरीर को अपनी मर्जी से  स्थूल देह से बाहर निकाल सकता है । क्या ऐसा भी हो सकता है कि चाहने पर भी सूक्ष्म शरीर कभी वापस ही न आये ?
2 - क्या सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करने से सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर का तालमेल बिगड़ जाता है । और योगी गंभीर रोगों से गृसित हो जाता है ?
3 - रात में ध्यान करने में मुझे डर क्यों लगता है ? एक नये दीक्षित ।
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हँसदीक्षा का कोई साधक जब हँस ज्ञान को सफ़लता पूर्वक पास करके हँस की आखिरी अवस्था में आ जाता है । तब स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर द्वारा बाहर निकलने की स्थिति बनती है । और प्रायः हरेक साधक पहली कुछ स्थितियों में भयभीत हो ही जाता है । जब वह अपनी देह से खुद को अलग देखता है । लेकिन उससे पहले ही वह बहुत से अलौकिक बृह्माण्डी अनुभवों से गुजर चुका होता है । और इन हजारों अनुभवों से साधक में पूर्व ही योग परिपक्वता आ जाती है । जब शरीर से बाहर निकलने की स्थिति बनती है । तब गुरु को अपने आप पता लग जाता है । तब परमहँस दीक्षा कर दी जाती है । फ़िर भय लगना बन्द हो जाता है । और साधक शरीर से बाहर निकलने लगता है । और ऐसा कभी नहीं होता कि सूक्ष्म शरीर कभी वापिस ही न आये । क्योंकि आत्मज्ञान अमरता और निडरता प्रदान करता है । स्थायी सुख आनन्द देता है ।
2 - सहज योग में योगी कभी योग से गंभीर रोगों से गृसित नहीं होता । हठ योग । मनमुखता । लालच । वासना आकर्षण । गुरु के प्रति दुर्भाव । सिद्धियों की कामना । और उनका दुरुपयोग आदि ये नुकसानदायक है । द्वैत ज्ञान के विभिन्न प्रयोगों में ऐसे नुकसान होने की पूरी संभावना होती है । जब कोई शक्ति प्रकट होती है । और साधक भयभीत आदि हो जाता है । तब वह बिगङ सकता है । अतः सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के अलग होने से कोई तालमेल नहीं बिगङता ।
3 - आपकी अभी शुरूआती अवस्था है । तब पुराने संस्कारों के कारण नयी स्थितियों से भय लगता है । पर ये कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाता है । सहज योग में डर वाली कोई बात ही नहीं है ।
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ये थे आपके टू द प्वाइंट उत्तर । अब इस ज्ञान से सम्बन्धित कुछ अन्य बातों पर निगाह डालें । त्रेता युग में दशरथ

पुत्र भगवान श्रीराम की गुरु वशिष्ठ जी द्वारा सिर्फ़ हँसदीक्षा ही हुयी थी । इसलिये उनका समस्त आचरण मर्यादा के अन्दर था । परमहँस ज्ञान उनको नहीं हुआ था । भगवान श्रीकृष्ण परमहँस दीक्षा से दीक्षित थे । वे मर्यादा । पाप पुण्य । कर्ता अकर्ता से ऊपर थे ।
शिरडी के साई बाबा भी स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर को बाहर निकालकर लोक लोकन्तरों की यात्रा करते थे । लेकिन उनका ज्ञान जङ ज्ञान और द्वैत भक्ति के अंतर्गत आता था । इस स्थिति में शरीर से अलग होने पर शरीर मृतक के समान हो जाता है । लेकिन शंकराचार्य जी का यही ज्ञान चेतन ज्ञान था ।
शरीर से निकलने की एक नहीं बल्कि कई तरह की स्थितियाँ बनती हैं । परकाया प्रवेश । दूसरा शरीर बना लेना । एक साथ कई जगह प्रकट होना । हवा या आसमान में मुक्त विचरण करना । सशरीर जाना । या सूक्ष्म शरीर से जाना । सब कुछ योगी की मेहनत तपस्या और प्राप्ति पर निर्भर है ।
आत्मा रूपी हँस के ज्ञान । भक्ति । वैराग्य ये तीन पंख ( दो इधर उधर और एक पूँछ ) होते हैं । साधारण अज्ञान जीव स्थिति में यह पंख घायल होकर टूट गये हैं । और मजबूरन ये हँस अज्ञान भूमि पर बैठ गया है । जब काफ़ी पुण्यकर्मों से इसे कोई सन्त मिलता हैं । और ज्ञान देता है । तब उसे अपनी वास्तविकता पता चलते ही संसार से वैराग्य होने लगता है । और पूर्व ही ( सन्त कृपा से ) ज्ञानयुक्त होने से वह पूर्ण भाव से भक्ति करता है । यानी ये तीनों पंख फ़िर से स्वस्थ हो जाते हैं । और हँस उङने लगता है । अज्ञान से ज्ञान की ओर । तब ही वह सही तरीके से यात्रा करता है । यानी साधना में विभिन्न अनुभव होना । और स्थितियाँ बनना ।
मतलब ज्ञान का सही समझ में आना । और उसे गृहण करना । ये ज्ञान पंख है । यही फ़िर भाव द्वारा असली ज्ञान बनता है । जब ये ज्ञान हो जाता है । ये संसार मेरा वास्तविक स्थान नहीं है । तब इससे वैराग्य हो जाता है । ये दूसरा पंख हुआ । ज्ञान और वैराग्य स्वस्थ होने से भक्ति की तरफ़ जुङाव खुद ही हो जायेगा । क्योंकि भक्ति के बिना कुछ भी संभव नहीं है - भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावे प्रानी । तो सार ये है कि ये  ज्ञान । भक्ति । वैराग्य तीनों पूर्ण होने पर ही असली बात बनती है । बाकी सिर्फ़ वैराग्य जागृत होने से शान्ति और व्यर्थ कलेशों से मुक्ति हो जाती है । या सिर्फ़ ज्ञान होने से तमाम असमंजस खत्म हो जाते हैं । जीव ज्ञान से विभिन्न लाभ उठा सकता है । और सिर्फ़ भक्ति करने से उसे सत ऊर्जा प्राप्त होती है । जिससे सांसारिक सुख शान्ति अर्थ प्राप्तियाँ आदि लाभ होते हैं ।
अगर गहराई से सोचें । तो किसी भी सांसारिक प्राप्ति हेतु भी ये तीन अंग आवश्यक हैं । ज्ञान ( जो प्राप्त करना है । उसका सही ज्ञान होना ) वैराग्य ( दूसरी चीजों पर धन समय आदि व्यय न करके । लक्ष्य की तरफ़ तन मन धन मोङ देना ) भक्ति ( भक्त जुङने से कहते हैं । किसी चीज की जानकारी करके । समय देते हुये । उसके प्रति प्रयत्नशील होना ही भक्ति है । )
अब ये साधक के स्वभाव और जीवन परिस्थिति और लक्ष्य पर निर्भर है कि वह अपने आपको कैसे व्यवस्थित करता है । और क्या प्राप्त करता है । ईश्वरीय सत्ता का तन्त्र बहुत सख्त है । यह एक तिनका भर भी किसी के साथ रियायत नहीं करता । चाहे वह जीव ज्ञान से जुङा हो । या अज्ञान स्थिति में हो । इसलिये भक्ति से मजबूत होने की सोच और प्रेरणा होनी चाहिये । न कि याचना और कमजोरी का भाव । तभी भक्ति करना सही मायनों में सार्थक भी है ।
- आप सबके अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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