07 नवंबर 2011

पुरानी हवेली

हैल्लो राजीव जी ! रविवार का दिन होने की वजह से मेरे पास काफ़ी समय था । पिछले लेख में मैने आपसे कहा था कि - कहानी "डायन" मेरी पसंदीदा कहानी है । और उसी कहानी से संबन्धित कुछ फ़ोटो मैं आपको जरूर भेजूंगा । तो मैने कहानी के कुछ अंश दोबारा पढे । और फ़िर मेरे दिमाग में ऐसी जगह का जिक्र आया कि इस तरह की जगह तो शायद मैं जानता हूं ? हमारे शहर के नजदीक ही यह इलाका पडता है । पहाडी पर बना किले और उसके नीचे का पूरा इलाका लगभग 200-250 साल पुराना है । और यहाँ के मंदिर भी काफ़ी पुराने है ।
किले से तो काफ़ी बार इस जगह को निहारा है । पर यहां आना कभी नही हुआ । फ़िर मैंने बिना देरी किये गाडी निकाली । और पहुँच गये इस पुराने शहर में । शहर की गलियां काफ़ी सकरी और घुमावदार होने की वजह से गाडी चलाने में थोडी दिक्कत आ रही थी । शाम का समय होने के कारण मुझे अंधेरा होने का भी डर था । अंधेरे में फ़ोटो लेना काफ़ी मुश्किल होता है ।
पर जब मैं यहां पहुंचा । तो मुझे थोडा ताज्जुब हुआ कि यहां ज्यादातर लोग छोटी-सी बस्ती टायप में रहते हैं । और जगह जगह पुरानी इमारते हैं । जो कि अब खंडहरनुमा हो चुकी हैं । सबसे पहले तो मेरी नजर एक पुराने मंदिर की तरफ़ पडी ( देखें चित्र सं 1,13 )  मंदिर से देखने पर थोडी दूर तक नजारे का लुत्फ़ उठाया जा सकता है । आगे चलें । तो एक छोटी सी पहाडी पर बने खण्डहर पर नजर पडी ( चित्र सं 14 देखें )  फ़िर मैं एक पुरानी हवेली की तरफ़ गया । जिसका दरवाजा थोडा सा खुला था । पर कुंडी लगी हुई नहीं थी ( देखें चित्र सं 3,4,5,6,7,21,22 )....थोडा सा अंदर झांक कर देखा । तो एक महिला दिखाई दी । अंदर आने की इजाजत मिलने पर पता चला कि वे लोग इस खंडहरनुमा हवेली की रखवाली के लिए रखे गये है ।
एक बुजुर्ग उम्र लगभग 75 साल । बुजुर्ग महिला । और एक अन्य महिला । जिसकी उमृ लगभग 30-35 साल । वे 


लोग राजपूत मालूम पडते थे । मैंने उनसे हवेली की कुछ फ़ोटो लेने की गुजारिश की । तो थोडी ना नुकुर के बाद पैसे लेने की बात पर वो राजी हो गया । उसने बताया कि ये हवेली सालों से खाली पडी है । यहां कोई नहीं रहता । और न ही कभी कोई आता है । अंदर से हवेली का मुआयना करने पर जो मैंने महसूस किया । वो मैं आपको बता नहीं सकता ।
शाम के लगभग 5.15 बजे होंगे । पर हवेली की शांति बडी ही डरावनी महसूस हो रही थी । अंदर के कमरों से बेहद दुर्गंध आ रही थी । हालांकि वह बुजुर्ग उस हवेली में झाडू कभी कभार कर देता है । पर बिना देख-संभाल के हवेली की दुर्दशा दर्दनाक मालूम हो रही थी । कुछ फ़ोटो मैंने हवेली के खाली पडे कमरों के भी लिए । जहां काफ़ी अंधेरा था । उस बुजुर्ग ने थोडी जिद की । तो मुझे चाय के लिये रूकना पडा । और फ़िर मैं बाहर को निकल गया ।
थोडा आगे जाने पर मालूम पडा कि यह रास्ता महल के पिछले दरवाजे की ओर जाता है । और उसी रास्ते पर यह हवेली थी । मैने गाडी वापस घुमा ली । और उसी से सट कर जाता दूसरे रास्ते पर चल दिये । यहां और भी कई सारी पुरानी हवेली हैं । कुछ फ़ोटो सडक से सटे पुराने मंदिरो और मकानों के लिये । अंधेरा बढता जा रहा था । आधा घण्टा तक मैंने आसपास के कुछ और फ़ोटो भी लिये ।
ये पूरा इलाका कुछ 2-3 किमी. के दायरे मे फ़ैला होगा । शाम के 6 बज चुके थे । और अंधेरा घिर चुका था ।  मेरे लिये और फ़ोटो लेना मुमकिन नहीं था । इसलिए फ़ोटो शूट का कार्यकृम यही समाप्त करना पडा । और इस तरह मेरी आज की शाम का The End हुआ । मैंने गाडी की हैड लाइट आन की । और गाडी को घर की तरफ़ दौडा दी । मैं आपको कुछ और अच्छे फ़ोटो भी भेजना चाहता था । पर अंधेरे पर किसका बस चलता है ।
तो राजीव जी ! ये फ़ोटो जो मैंने आपको इस मेल के साथ भेजे हैं । अपनी पसंद के अनुसार आप इन्हें कहानी में पोस्ट कर दीजिये । आप चाहें तो दूसरी प्रेत कहानी में भी इन्हें लगा सकते है । ये बताएं कि अगली प्रेत कहानी किस विषय पर होगी । कहानी में कामरसता । और नग्नता का दायरा सीमित हो । तो वह कहानी पर हावी नहीं होता । बल्कि उससे कहानी की पकड और मजबूत होती है । साथ ही मनोरंजन और ज्ञान विषय का होना भी बहुत जरूरी है । इस बारे में फ़िर कभी चर्चा करेंगे । अगला मेल मैं आपको जल्द ही "पुनर्जन्म के सिद्धांत" पर लिखूंगा । राजू
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आपने तो पूरी एक हारर कहानी ही लिख दी भाई । और बङी खतरनाक रहस्यमय जगह की सैर भी करा दी । मेरे पास फ़ोटो अनजिप करने का साफ़्टवेयर नहीं है । अतः अनजिप फ़ोटो ही भेजें । वैसे आपके अन्दर लेखन क्वालिटी तो है ।
अभी इन दिनों लगभग दीपावली से पहले से आना जाना लगा हुआ है । इसलिये समय बहुत कम मिलता है । सर्दियों में दिन भी छोटा होने लगा । मैं कुछ भी लिखते समय पहले से तय नहीं करता । जो भी लिखता है । अपने आप लिखता चला जाता है ।
वास्तव में बहुत खतरनाक प्रेत कथा लिखी जा सकती है । पर एकदम सत्य वर्णन से वह प्रभावी और हानिकारक हो जायेगी । लोगों को प्रभावित कर सकती है । इसलिये मैं - कहीं की ईंट कहीं का रोङा । भानुमती ने कुनबा जोङा .फ़ार्मूले से लिखता हूँ । गूढ और अलौकिक घटनायें लिखने का यही सिद्धांत है । वे सब संकेत में लिखी जाती हैं । इसलिये घटना कहीं की । पात्र बदले हुये । और तथ्य इधर से उधर संयुक्त कर तब मिश्रित कहानी लिखी जाती है । इसलिये सत्य पर आधारित होते हुये भी वह असत्य हो जाती है । मनोरंजन भी उसका प्रभाव खत्म करने के लिये डालता हूँ । सीरियस और डरावनी कथा गम्भीरता से लिखने पर निसंदेह हानिकारक होगी । और ऐसा मेरा कोई इरादा नहीं है ।
अगली प्रेतकथा मैंने अभी शुरू भी नहीं की । पर देखो । थोङा थोङा करके लिखना शुरू करता हूँ । अभी सन्त समागम में व्यस्तता अधिक है ।
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