02 नवंबर 2011

आपके भीतर कोई व्यक्ति नहीं है

सत्य शब्दों से परे है - सत्य पर चर्चा चल रही थी कि मैं भी आ गया । सुनता हूं । जो बात कह रहे हैं । वे अध्ययनशील हैं । विभिन्न दर्शनों से परिचित हैं । कितने मत हैं । और कितने विचार हैं । सब उन्हें ज्ञात मालूम होते हैं । बुद्धि उनकी भरी हुई है - सत्य से तो नहीं । सत्य के संबंध में औरों ने जो कहा है - उससे । जैसे औरों ने जो कहा है । उस आधार से भी सत्य जाना जा सकता है । सत्य जैसे कोई मत है । विचार है । और कोई बौद्धिक तार्किक निष्कर्ष है । विवाद उनका गहरा होता जा रहा है । और अब कोई भी किसी की सुनने की स्थिति में नहीं है । प्रत्येक बोल रहा है । पर कोई भी सुन नहीं रहा है । मैं चुप हूं । फिर किसी को मेरा स्मरण आता है । और वे मेरा मत जानना चाहते हैं । मेरा तो कोई मत नहीं है । मुझे तो दिखता है कि जहां तक मत है । वहां तक सत्य नहीं है । विचार की जहां सीमा समाप्ति है । सत्य का वहां प्रारंभ है । मैं क्या हूं ? वे सभी सुनने को उत्सुक हैं । 1 कहानी कहता हूं - 1 साधु था - बोधिधर्म । वह ईसा की छठी सदी में चीन गया था । कुछ वर्ष वहां रहा । फिर घर लौटना चाहा । और अपने शिष्यों को इकट्ठा किया । वह जानना चाहता था कि सत्य में उनकी कितनी गति हुई है । उसके उत्तर में 1 ने कहा - मेरे मत से सत्य स्वीकार अस्वीकार के परे है । न कहा जा सकता है कि - है । न कहा जा सकता है कि - नहीं है । क्योंकि ऐसा ही उसका स्वरूप है ।
बोधिधर्म बोला - तेरे पास मेरी चमड़ी है ।
दूसरे ने कहा - मेरी दृष्टिं में सत्य अंतर्दृष्टि है । उसे 1 बार पा लिया । फिर खोना नहीं है ।
बोधिधर्म बोला - तेरे पास मेरा मांस है ।
तीसरे ने कहा - मैं मानता हूं कि पंच महाभूत शून्य हैं । और पंच स्कंध भी अवास्तविक हैं । यह शून्यता ही सत्य है ।
बोधिधर्म ने कहा - तेरे पास मेरी हड्डियां हैं ।
और अंतत: वह उठा । जो जानता था । उसने गुरु के चरणों में सिर रख दिया । और मौन रहा । वह चुप था । और उसकी आंखें शून्य थी । बोधिधर्म ने कहा - तेरे पास मेरी मज्जा है । मेरी आत्मा है । और यही कहानी मेरा उत्तर है ।
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हर आदमी के भीतर बहुत से आदमी हैं । आप 1 भीड़ हैं । आपके भीतर कोई व्यक्ति नहीं है । आप कोई इंडिविजुअल नहीं हैं । आपके भीतर तो 1 भीड़ भरी हुई है । महावीर ने कहा है - मनुष्य बहु चित्तवान है । हम साधारणतः सोचते हैं कि 1 ही चित्त है । हमारे पास । महावीर कहते हैं - बहु चित्तवान है । अभी आधुनिक खोजें भी कहती हैं । मनुष्य पोलीसाइकिक है । उसमें बहुत से मन 1 ही साथ हैं । और आप खुद विचार करें । तो दिखाई पड़ेगा । बहुत से चित्त हैं । आपके पास । जब आप क्रोध में होते हैं । तो क्या आपके पास वही चित्त है । जब आप बाद में पश्चात्ताप करते हैं ? पश्चात्ताप करने वाला चित्त बिलकुल दूसरा है । क्रोध करने वाला चित्त बिलकुल दूसरा है । इसीलिए आप बारबार पश्चात्ताप करते हैं । और फिर बारबार क्रोध करते हैं । जिस चित्त ने पश्चात्ताप किया । उसकी आवाज उस चित्त तक नहीं पहुंची । जो कि क्रोध करता है । अन्यथा अन्यथा क्रोध बंद हो गया होता । 1 ही भूल आप हजार बार करते हैं । और भूल को करने के बाद पछताते हैं । दुखी होते हैं । निर्णय लेते हैं कि अब यह भूल नहीं करूंगा । अगर आप 1 ही आदमी होते । आपके भीतर 1 ही मन होता । तो निर्णय पूरा हो जाता । लेकिन आपके भीतर बहुत मन हैं । जो मन निर्णय करता है । वह मन अलग है । और जो मन क्रिया करता है । वह मन अलग है । इसलिए आपके निर्णय निर्णय रहे आते हैं । और जीवन जैसा है । वह वैसा ही चलता जाता है । रात्रि आप तय करके सोते हैं कि सुबह 4 बजे उठ आऊंगा । पूरे मन से निर्णय करते हैं कि मैं सुबह 5 बजे उठूंगा । सुबह 4 बजे कोई आपके भीतर कहता है । पड़े रहो । क्या फायदा है । सर्दी है । आप सो जाते हैं । सुबह उठकर पछताते हैं । और सोचते हैं । यह कैसे हुआ ? मैंने तय किया था कि उठूंगा । फिर उठा नहीं । कल जरूर उठूंगा । कल आप फिर पाते हैं । आपके भीतर कोई कह रहा है । क्या फायदा उठने का । सर्दी बहुत है । सोए रहो । यह मन क्या वही है । जिसने निर्णय किया था ? या कि कोई दूसरा है ?

आपका मन बहुत खंडों में विभाजित है । उसमें बहुत टुकड़े टुकड़े हैं । और इन टुकड़ों के कारण आपके भीतर 1 जटिलता पैदा हो जाती है । जिसका मन 1 नहीं है । वह जटिल होगा ही । और जटिलता अनंत गुना हो जाती है । क्योंकि 1 मन दूसरे मन के विरोध में है । थोड़ा विचार करें । आपने अपने ही हाथ से ये विरोध खड़े कर लिए हैं । शिक्षा और संस्कार ने मन को खंड खंड कर दिया है । उसकी अखंडता नष्ट हो गई है । उसका इंटीग्रेशन नहीं है । आप कहते हैं कि आप 1 आदमी हैं । क्योंकि आपका 1 ही नाम है । 1 ही लेबल है । सारे लोग जानते हैं कि आप 1 ही आदमी हैं । अपने भीतर खोजें । तो आपको बहुत आदमी वहां मिलेंगे । आपके विरोध में । आपसे भिन्न । अनेक अनेक आवाजें आपको भीतर सुनाई पड़ेंगी ।
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