31 दिसंबर 2010

जब सृष्टि 3 घन्टे को रुक गयी ??


और ये ज्यादा पुरानी बात भी नहीं है । बस लगभग 150 वर्ष पहले पहले की बात है । भारत के प्रसिद्ध संत स्वामी रामतीर्थ पानी के जहाज से अमेरिका जा रहे थे । उसी जहाज में किसी देश का बादशाह सवार था । रामतीर्थ जी बडी मौज वाले संत थे । अचानक उन्हें मौज आयी और वे बोले , " ऐ एक जहाज में दो बादशाह नहीं जा सकते ।"उनकी बात सुनकर बादशाह को बेहद आश्चर्य हुआ । साधारण वेशभूषा के एक इंसान की यह बात सुनकर उसने बडे व्यंग्य से कहा ," कहां के बादशाह है , आप ? "
" पूरी सृष्टि का । " उसी मौज में साधु ने जवाव दिया ।
" लेकिन । " राजा बोला ," मेरे राज्य में मेरा हुकुम चलता और आपका ? "
रामतीर्थ ने फ़िर से मौज में ही जबाब दिया । और मेरा हुकुम पूरी सृष्टि पर चलता है । ये सूरज । धरती । चांद । तारे । सब मेरी आग्या का पालन करते हैं । बेहद दुस्साहस भरी यह बात सुनकर बादशाह चकित रह गया । उससे कुछ बोलते न बना । अपनी बात की पुष्टि के लिये रामतीर्थ ने ऊर्ध्व ( केन्द्रसत्ता ) में ध्यान स्थिर किया और सधे स्वर में बोले ," सब वहीं के वहीं ठहर जाओ । " सभी सूर्य । चांद । तारे आदि अपनी अपनी कक्षा में स्थिर हो गये । तीन घन्टे सृष्टि रुकी रही । तब रामतीर्थ की आग्या के बाद फ़िर से आगे बडी । बादशाह उनके पैरों पर गिर पडा । इसी क्रम में रामतीर्थ जब अमेरिका आदि देशों में पहुंचे । तो उनकी वाणी आदि सुनकर । चमत्कृत होकर लोग कहने लगे । ईसा आ गये । ईसा दोबारा आ गये । रामतीर्थ ने कहा । ठहरो । मैं ईसा नहीं । ईसा का बाप हूं ? "
** कुछ लोगों को मेरा ये लेख अजीव और किसी भी तरह हजम न होने वाला ही लगेगा । पर इस तरह सृष्टि एक बार नहीं । कई बार शक्तियों द्वारा रोकी गयी है । राम के जन्म । और लंका से वापसी पर सृष्टि एक महीने रुकी रही थी । मांडव्य ऋषि और कोढी ब्राह्मण की पतिवृता सती पत्नी के विवाद में सृष्टि 6 महीने तक रुकी । जिसे बाद में बडे देवताओं की मध्यस्थता के बाबजूद चलाया गया । स्वरूपानंद जी के एक शिष्य ने स्टीमर वाले द्वारा खुद को ले जाने पर एक घन्टे के लिये प्रकृति के सिस्टम को प्रभावित कर दिया । मूसा के गुरु खिजर साहब सृष्टि को तो नही रोकते थे । पर ऐसे अनेकों उदाहरण हैं । जब प्रकृति उनके आगे हाथ जोडकर खडी हो गयी । जिसमें उन्होंने 12 साल पूर्व डूबी बुढिया की बारात को जिंदा करने का आदेश दिया । और बारात जीवित हो गयी । ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण है । जब सामर्थ्यवान योगियों ने सृष्टि को रोक दिया ।
**** अब जो आपके मन में घुमड रहा है । यदि सृष्टि रुक जाती है । घडियां रुक जाती हैं । तो हडकम्प मच
जाना चाहिये ? ये बात तो बडे जोर शोर से इतिहास में दर्ज हो्नी चाहिये । दर्ज है । रामायण में दर्ज है ।
पुराणों में दर्ज है ।.. और अभी भी कभी रुक जाय । तो आपको पता भी नहीं चलेगा कि सृष्टि इतने समय तक रुकी रही थी । और इसकी वजह ये है कि अग्यान स्थिति में ..? आप भी उसी प्रकृति का ही हिस्सा हो । ये मामला फ़्रीज हो जाने जैसा है । आप सब कार्य कर रहें होंगे । और आपको लगेगा कि सब कुछ वैसा ही चल रहा है । पर ये सब अन्मन्स्यकता जैसा फ़ील होगा ।
* रामतीर्थ द्वारा खुद को ईसा का बाप बताना भी गलत नहीं था । रामतीर्थ उस वक्त परमात्मा से । परमात्मा में स्थित थे । ध्यान रहे । स्वामी रामतीर्थ परमहंस संत थे ।.. जब हंसा परमहंस हुय जावे । पारबृह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे । ( स्वामी रामतीर्थ का जीवन विवरण आदि साथ में प्रकाशित है ।
swami Ramteerth का जन्म पंजाब के मुरलीवाला village के निवासी पण्डित हीरानंद के परिवार में सन 1873 ई. में दीवाली के दिन हुआ । इनके बचपन का नाम teerathram था । इनके जन्म के कुछ दिन बाद ही mother का देहान्त हो गया । तब इनका पालन पोषण इनकी बुआ ने किया । ये बचपन से ही बेहद कमजोर थे । 5 वर्ष की age में इनकी पडाई शुरू हो गयी । और इन्होंने प्राथमिक स्तर पर फारसी की शिक्षा प्राप्त की । 10 वर्ष की age तक प्राथमिक शिक्षा पूरी करके इनका इसी age में विवाह हो गया । और इसके बाद आगे की पढाई के लिए तीरथराम गुजरांवाला गये । वहां इनके father के मित्र धन्नाराम रहते थे । उन्हीं के यहां रहकर तीरथराम की पढाई हुयी । 14 वर्ष की age में तीरथराम ने मैट्रिक परीक्षा में state में first position प्राप्त किया । तब उन्हें state की ओर से छात्रवृत्ति दी गयी । फ़िर आगे की पढाई के लिए तीरथराम लाहौर गये । इनके father की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी । वे तीरथराम को आगे पढाने में असमर्थ थे । तब तीरथराम ने छात्रवृत्ति के सहारे ही आगे पढने का निर्णय लिया । उनकी पडाई में अनेक विघ्न आये । पर तीरथराम अपने will power से सारी बाधाओं को पार कर गये । उन्होंने इण्टरमीडिएट परीक्षा first class में उत्तीर्ण की । life की भीषण परिस्थितियां तीरथराम के धैर्य और आत्मविश्वास की परीक्षा पर परीक्षा लिए जा रही थी । उनके father तीरथराम की wife को उनके पास छोड गये । पहले तो अपने ही खाने की समस्या थी । अब wife की और हो गयी । कभी कभी तो दोनों लोगों को भूखा रहना पडता । तीरथराम नंगे पांव विद्यालय जाते थे । B A की परीक्षा में उन्हें संस्कृत और फारसी विषयों में तो बहुत अच्छे नम्बर मिले । पर english में वह fail हो गये । इसलिये full exam में ही fail कर दिया गया । अब क्या होता ? कहीं से कोई सहारा भी नहीं था । तब उन्हें झंडूमल नाम के मिठाई वाले ने सहारा दिया । उसने तीरथराम के परिवार के लिये भोजन आवास आदि की व्यवस्था की । इस सहारे से तीरथराम का हौसला बडा । और next year उन्होने अपनी मेहनत से पूरे विश्वविद्यालय में B A exam में first position प्राप्त किया । इस समय तीरथराम की age 19 वर्ष की थी । तीरथराम ने लाहौर विश्वविद्यालय से ही math subject में परास्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । इसके बाद वे सियालकोट में अमेरिकन मिशन द्वारा संचालित 1 school में शिक्षण कार्य करने लगे । तब उन्हें 80 रुपये per month वेतन मिलता था । इसी समय उनकी पत्नी ने 2 पुत्रों को जन्म दिया । जिनका नाम मदन गोस्वामी और ब्रह्मानन्द था । लेकिन कुछ समय बाद ही तीरथराम का मन संसार से उचट गया । और उनकी व्याकुलता दिनों दिन बढती गयी । अंत में 25 वर्ष की age में नौकरी घर परिवार छोडकर तीरथराम ऋषिकेश के पास ब्रह्मपुरी में निवास करने लगे । कहा जाता है कि इसी स्थान पर तीरथराम को दिव्यज्ञान की प्राप्ति हुयी । 28 वर्ष की अवस्था में तीरथराम 1 नया बदलाव हुआ । वे तीरथराम से swami Ramteerth हो गये । और संन्यास भाव में आ गये । टेहरी के महाराज ने आपके ज्ञान से प्रभावित होकर आपको देश विदेश की यात्रा करने हेतु कहा । swami Ramteerth जापान एवं america की यात्रा पर गये । इन देशों में के लोगों को उन्होने india के महान प्राचीन ज्ञान से परिचित कराया । america में swami Ramteerth लगभग 2 वर्षो तक रहे । विदेश यात्रा से लौटकर वे महाराज टेहरी के विशेष आग्रह पर टेहरी राज्य में ganga के किनारे एक cottage में निवास करने लगे । 1 दिन ब्रह्ममुहूर्त में स्वामी रामतीर्थ गंगास्नान हेतु गये । और स्नान करते हुये आगे बढते ही गये । और 1 भंवर में फंस गये । वहीं उनकी जलसमाधि बन गयी । यह घटना 1906 की है । इस समय उनकी age मात्र 33 वर्ष की थी । वे hindi sanskrit और फारसी के अच्छे कवि थे ।

25 दिसंबर 2010

मुझसे पूछे । आप भी बताओ ?

लेखकीय -- अलग अलग समय पर जिग्यासुओं द्वारा उठाये गये कुछ प्रश्न ? ? क्या आपके पास इनका कोई सटीक उत्तर है ? अगर है । तो बतायें ।
रामायण के कुछ प्रश्न ? ?
Q.1 . राम ने बालि को इसलिये मारा कि अनुज वधू पुत्रबधू के समान होती है । और उसे कामदृष्टि से देखना अपराध है । लेकिन बाद में सुग्रीव ने तारा को पत्नी समान ही रखा था ? ?
Q ..2 सुग्रीव आदि वानर ही थे । ये भी प्रश्न है ? रामायण के अनुसार वानर ही थे क्योकि हनुमान की पूंछ थी । लेकिन ये कौन से स्पेशल वानर थे । जो स्त्री उद्देश्य के लिये मनुष्य औरतों को रखते थे ? ?
Q.. 3 तुलसी के अनुसार समुद्र पर पुल बनाते समय नल नील ने राम नाम लिखकर पत्थर तैराकर पुल बनाया था । किन्तु वाल्मीक के अनुसार चीड । साखू । अशोक जैसे लम्बे और लठ्ठेनुमा वृक्षों की सहायता से पुल बनाया था । जो कि ज्यादा कठिन भी नहीं जान पडता ? ?
Q.. 4 जब हनुमान अशोक वाटिका में पहली बार सीता से मिले थे । तो उन्होंने कहा कि मैं आपको अभी ले जाता हूं । तो सीता ने कहा । जीवन में सिर्फ़ एक बार ?? रावण ने अपहरण के समय मुझे गोद में उठा लिया था । उसके अतिरिक्त मैंने कभी किसी पराये पुरुष का स्पर्श नहीं किया । लेकिन इससे पहले विराध राक्षस ने भी उठाया था ? ? इसके अलावा पहले तो हनुमान सीता को मां मानते थे । दूसरे वे उसी समय कह रहे थे । कि पूरी लंका को राक्षसों के समेत उठाकर राम के चरणों में पटक दूं ? मेरा मतलब है कि हनुमान किसी वृक्ष या शिला आदि को उखाडकर उस पर बैठाकर सीता को ला सकते थे । तो स्पर्श नहीं होता । जब रावण जैसा बलात्कारी नीच भावना से स्पर्श कर सकता है । तो मां की तरह मानने वाले के स्पर्श में क्या बुराई थी । क्या मातायें अपने पुत्र पुरुषों का स्पर्श करे । तो ये पराये पुरुष वाली फ़ील देता है ? ?
Q..5 ये अत्रि की पत्नी अनसूया ने कहा । इसका मतलब है । ऐसी औरतें ? उस समय भी थी ?? अरण्य काण्ड । तुमने तीनों लोकों में नारी के पतिव्रत धर्म को महिमामंडित कर दिया है । हे सुभगे । जो अपने पति के गुण । अवगुण का विचार किये बिना उसे ईश्वर के समान सम्मान देती है । और प्रत्येक दुख- सुख में उसका अनुसरण करती है । उस स्त्री के चरणों पर स्वर्ग स्वयं न्यौछावर होता है । पति चाहे कितना ही कुरूप । दुश्चरित्र । क्रोधी । निर्धन क्यों न हो । वह पत्नी के लिये सदैव श्रद्धेय है । उसके जैसा कोई दूसरा सम्बन्ध नहीं होता । पति की सच्ची सेवा ही स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करती है । जो स्त्री अपने पति में दुर्गुण देखती है । उस पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये उसके साथ नित्य कलह करती है । तथा उसकी अवमानना और उसकी आज्ञाओ की अवहेलना करती है । उसे इस लोक में अपयश तो मिलता ही है । पर मृत्यु के पश्चात नर्क को भी जाती है ।
Q.. 6 इसे पढे -- इस पर प्रसन्न होकर अनुसूया ने कहा । हे जानकी । सदा सौभाग्वती रहो । यद्यपि तुमने कुछ भी नहीं माँगा है । तथापि मैं तुम्हें यह दिव्यमाला देती हूँ । इस माला के फूल कभी नहीं कुम्हलायेंगे । ये दिव्य वस्त्र स्वीकार करो । ये न कभी मैले होंगे । और न फटेंगे । यह सुगन्धित अंगराग भी मैं तुम्हें देती हूँ । जो कभी फीका नहीं पड़ेगा । (..लेकिन हनुमान जी ने जब उन्हें लंका में पहली बार देखा । तो उनके वस्त्र मलिन यानी गन्दे थे ? ध्यान रहे । सीताजी कथा के अनुसार अनुसूया बाले वस्त्र ही पहने हुये थी । वे वनवास में वही वस्त्र पहनती थीं ? ? )
Q .7 .हनुमान जी जब लंका जलाकर समुद्र में पूंछ बुझा रहे थे । तो पसीने की एक बूंद गिरी । जिसे मछली ने निगल लिया । इससे उसके गर्भ में मनुष्य बालक आ गया । बाद में जब अहिरावण के यहां यह मछली काटी गयी । तो यह बालक निकल आया । जिसे उसने मकरध्वज कहा । और जिसे उसने पहरेदार के रूप में रख लिया ।लेकिन इसी युद्ध में अहिरावण जब राम लक्षमण का अपहरण कर पातालपुरी उनकी बलि देने ले गया । और हनुमान उनको छुडाने गये । तो द्वार पर उनका युवा पुत्र मकरध्वज पहरेदारी के लिये नियुक्त था । सवाल ये है कि मकरध्वज कुछ ही दिनों में युवा हो गया ? ?

24 दिसंबर 2010

ध्यान की घोषणा उसे बहुत उपद्रव में डाल देगी

बुद्ध की बिना घोषणा के 99 को पता नहीं चल सकता था । बुद्ध को पता चलेगा । जो जाग गया । उसको पता चलेगा कि किसको हो गया । लेकिन शेष जो सोए हुए हैं । उन्हें कैसे पता चलेगा ? उन्हें तो कोई जागा हुआ घोषणा करेगा । तभी पता चलेगा ।
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इसी कला के कारण इस देश में गुरु के चरणों में झुकने का मूल्य बना । वह तो प्रतीक है । वह तो बाह्य प्रतीक है - भीतर की घटना का । भीतर को कैसे कहें ? तो बाहर के किसी प्रतीक से कहते हैं । दुनिया के किसी देश ने पैरों में झुकने की कला नहीं खोजी । एक अपूर्व संपदा से वे वंचित रह गए ।
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मेरे पास लोग आते हैं । मेरे पास संन्यासी आते हैं । वे कहते हैं - जिन लोगों को आपके पास ध्यान उपलब्ध हो गया है । आप उनके नाम की घोषणा क्यों नहीं करते ? मैं कहता हूं - इसीलिए नहीं करता हूं । क्योंकि बड़ी जलन होगी । बड़ी ईर्ष्या पैदा होगी । अगर मैं 1 के नाम की घोषणा करूंगा कि यह ध्यान को उपलब्ध हो गया । तो बाकी सब उसके दुश्मन हो जायेंगे । और बड़ी राजनीति पैदा होगी । और बड़ी खींचातान मच जाएगी । वह नाहक कष्ट मे पड़ जाएगा । ध्यान की घोषणा उसे बहुत उपद्रव में डाल देगी । और दूसरे, जो ध्यान की चेष्टा में लगे थे । वे तो चेष्टा छोड़ देंगे । वे किसी भांति यह सिद्ध हो जाए कि इस आदमी को ध्यान नहीं मिला है । इस चेष्टा में लग जाएंगे ।
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चढ़ जाओ घरों की मुंडेर पर । और चिल्लाओ वहाँ से । क्योंकि तुम्हें जो मिला है । बहुतों को उसकी जरूरत है । और उन्हें उसका कोई पता नहीं । और इतने पास है - जीसस ।
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प्रेम किसी को नहीं जानता । प्रेम न तो जाति को जानता है । न कुल को जानता है । न कुलीनता को जानता है । न धन को जानता । प्रेम का धन से क्या सम्बन्ध है ? प्रेम न रंग को जानता है । हड्डी मांस मज्जा से प्रेम का सम्बन्ध क्या है ? तुम हिन्दू हो कि मुसलमान कि जैन कि ईसाई, प्रेम का लेना देना क्या है ?
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उपनिषद पैदा न होते । वेद पैदा न होते । कुरान बाइबल पैदा न होते । यह धम्मपद कैसे पैदा होता ? यह मुंडेर पर कुछ लोग चढ़ गए । और चिल्लाए । यह जानते हुए चिल्लाए कि चिल्लाने भर से तुम्हारी प्यास नहीं बुझ जाएगी । लेकिन चिल्लाने से शायद तुम्हें पता चल जाए कि किस दिशा में स्रोत है जल का । तुम शायद चल पड़ो ।
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जिसको तुम प्रेम करते हो । उसी को तुम घृणा करते हो । क्योंकि तुम्हारा प्रेम पूरा नहीं है । तुमने कभी इस बात को गौर से देखा । जिसको तुम प्रेम करते हो । उसी को घृणा करते हो । और जिसको तुम श्रद्धा करते हो । उसी पर तुम्हारी भीतर भीतर अश्रद्धा और संदेह भी चलते रहते हैं । तुम प्रतीक्षा में रहते हो । कब मौका मिल जाए कि इस श्रद्धा को फेंक दें उठाकर । सिद्ध हो जाए कि अश्रद्धा सही है । तो तुम ऐसा मौका चूकोगे नहीं । तुम झपटकर ले लोगे ।
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इस बात को खयाल रखना । जितनी ऊंची बात है । उतनी ही इनकार करनी आसान । जितनी नीची बात है । उतनी इनकार करनी कठिन ।
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मेरे प्रेम की गठरी में थोड़े शब्द हैं । तो ढेर सारा मौन है । कुछ उदासियां हैं । तो अनंत हसीं है । मेरी इस गठरी में दुबकी है कई अजन्मीं खुशियां । मेरे प्रेम की गठरी में कच्चे पक्के रास्ते हैं । तो जंगली पगडंडियां भी हैं । मेरे वहाँ कस्तूरी बसती है । वन वन भटकती नहीं । मेरे पास मृगछौने सा समय करता है किलोल । मेरे प्रेम की गठरी में चुटकी भर ठिठुरन है । तो अंजुरी भर धूप है । मेरी इस पोटली में 1 ऐसी छीनी है । जिससे हो सकता है - आसमान में सुराख । मेरे प्रेम की गठरी में 1 छांव है । जहां सुस्ताता है - उस पार का बटोही । मेरे यहाँ हुआ करती हैं तृप्ति की कई कई नदियां । मेरे पास लहरों की कथा है - नित्य प्रवाहमान । मैंने अपनी गठरी में बाँधा है - 1 नई धरती । 1 नया आसमान । 
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असल में ज्ञान जिसको हो गया है । वह बिना बोले कैसे चुप रहेगा ? 
कि जिस आदमी को जल का स्रोत मिल गया है । और तुम प्यासे भटक रहे मरुस्थल में । प्यास से तुम्हारी आखें निकली आ रही हैं । तुम्हारी सांस टूटी जा रही है । तुम्हारे पैर डगमगा रहे हैं । धूल धूसरित, धूप में जलते मरुस्थल में तुम भटक रहे हो । और मुझे पता है कि जल स्रोत पास ही है । और मैं चुप रहूंगा । मैं चिल्लाऊंगा ।
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बुद्ध का चचेरा भाई देवदत्त बुद्ध से दीक्षा लिया । संन्यस्त हुआ । लेकिन यह देखकर उसे बड़ी पीड़ा होने लगी । क्योंकि वह चचेरा भाई था । तो वह सोचता था । बुद्ध के बाद नंबर 2 कम से कम मेरा होना चाहिए । लेकिन उसका तो कोई नंबर ही नहीं लग रहा था । वहां तो और लोग आते गए । और ज्ञान को उपलब्ध होते गए । और देवदत्त पीछे पड़ता गया । कतार में दूर होने लगा । उसको चोट भारी लगी । वह भिक्षुओं को लेकर, गिरोह को लेकर अलग हो गया । फिर उसने बुद्ध को मारने के बड़े उपाय किए । बुद्ध के ऊपर पागल हाथी छोड़ा । बुद्ध ध्यान करते थे । तो 1 चट्टान उनके ऊपर सरका कर गिरायी । जब चट्टान बुद्ध के पास से सरकती हुई गयी । इंच इंच बचे । बाल बाल बचे । तो किसी ने पूछा कि - संयोग की बात कि आप बच गए । बुद्ध ने कहा - संयोग की बात नहीं । चट्टान कोई मेरी चचेरा भाई तो नहीं । चट्टान को मुझसे क्या लेना देना है । जब पागल हाथी बुद्ध पर छोड़ा - देवदत्त ने । और पागल हाथी आकर उनके चरणों में झुक गया । बजाय उनको मार डालने के । रौंद डालने के । तब भी किसी ने कहा कि - अपूर्व चमत्कार ! बुद्ध ने कहा - कुछ भी चमत्कार नहीं । पागल हाथी कोई मेरा शिष्य तो नहीं । मुझसे बदला लेने का कोई कारण तो नहीं ।
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बुद्ध पुरुष तो नदी की भांति हैं । तुम अगर प्यासे हो - सत्य के । तो झुको । नहीं कि तुम्हारे झुकने से बुद्ध पुरुषों को कुछ मिलता है । तुम्हारे झुकने से क्या मिलेगा ? तुम्हारे पास ही कुछ नहीं है । तुमसे मिलना क्या है ? तुम यह मत सोचना कि तुमने कोई आभार किया किसी बुद्ध पुरुष के चरणों में झुककर । नहीं । उसने तुम्हें झुकने दिया । उसने ही आभार किया । क्योंकि झुककर तुम्हें ही मिलेगा । झुककर तुम कुछ खोने को नहीं हो । खोने को तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं ।
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महावीर का 1 दूसरा विरोधी उनका ही दामाद था । वह भी शिष्य हुआ था । वह भी विरोध में चला गया । महावीर के 500  शिष्यों को अपने साथ लेकर निकल गया । अब हमारे देश में तो ऐसा है कि दामाद का पैर छूते हैं । तो जब शादी हुई होगी । तो महावीर ने उसके पैर छुए होंगे । और फिर जब महावीर संन्यस्त हो गए । शान को उपलब्ध हुए । और दामाद भी संन्यस्त हुआ । तो उसे महावीर के पैर छूने पड़े । वह बदला लिया । वह क्षमा नहीं कर सका । उसने महावीर के संघ में पहला उपद्रव खड़ा किया । पहली राजनीति खड़ी की ।
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कितने दिनों की जिन्दगी है । मात्र 15 000 या 20 000 दिन । साल नहीं । दिन शेष रहे हैं । क्या कर लोगे ? कितनों को कंधे पर घाट पर छोड़ आये ? तुम तो अपने आपसे मिल लो । तो थोड़ा जीवन में दूरी आ जायेगी ।
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कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से । जो व्यक्ति, जीवन गुणों के अनुसार वर्तित हो रहा है । और कर्म भी महा प्रकृति की विराट लीला के हिस्से हैं । ऐसा जान लेता है । वह कर्म में अनासक्त हो जाता है । ऐसे व्यक्ति को दुख नहीं व्यापता । ऐसे व्यक्ति को सुख नहीं व्यापता । ऐसे व्यक्ति को सफलता असफलता समान हो जाती है । ऐसे व्यक्ति को यज्ञ अपयज्ञ 1 ही अर्थ रखते हैं । ऐसे व्यक्ति को जीवन मृत्यु में भी कोई फर्क नहीं रह जाता है । और ऐसी चित्त दशा में ही परमात्मा का, सत्य का, आनंद का अवतरण है । इसलिए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - तू भाग मत । तू इस भांति बरत । समझ कि जो हो रहा है । हो रहा है । तू उसके बीच में अपने को भारी मत बना । अपने को बीच में बोझिल मत बना । जो हो रहा है । उसे होने दे । और तू उस होने के बाहर अनासक्त खड़ा हो जा । यदि तू अनासक्त खड़ा हो सकता है । तो फिर युद्ध ही शांति है । और अगर तू अनासक्त खड़ा नहीं हो सकता । तो शांति भी युद्ध बन जाती है ।

22 दिसंबर 2010

सभी मनुष्य प्रेम करने के पात्र हैं


तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई सचमुच तुम्हें प्रेम करता है ? आदमी के व्यक्तित्व के 3 तल हैं । उसका शरीर विज्ञान । उसका शरीर । उसका मनोविज्ञान । उसका मन । और उसका अंतरतम या शाश्वत आत्मा । प्रेम इन तीनों तलों पर हो सकता है । लेकिन उसकी गुणवत्ताएं अलग होंगी । शरीर के तल पर वह मात्र कामुकता होती है । तुम भले ही उसे प्रेम कहो । क्योंकि शब्द प्रेम काव्यात्म लगता है । सुंदर लगता है । लेकिन 99%  लोग उनके सेक्स को प्रेम कहते हैं । सेक्स जैविक है । शारीरिक है । तुम्हारी केमिस्ट्री । तुम्हारे हार्मोन । सभी भौतिक तत्व उसमें संलग्न हैं । तुम 1 स्त्री या 1 पुरुष के प्रेम में पड़ते हो । क्या तुम सही सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया ? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते । तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है । तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते । क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है । तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा ? तुम्हारे शरीर विज्ञान में । तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है । जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर । उसके हार्मोन की ओर । उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है । यह प्रेम प्रसंग नहीं है । यह रासायनिक प्रसंग है । जरा सोचो । जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो । वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सेक्स बदलवा ले । और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे । तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे ? कुछ भी नहीं बदला । सिर्फ केमिस्ट्री । सिर्फ हार्मोन । फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया ? सिर्फ 1%  लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं । कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास 1 संवेदनशीलता होती है । जो शरीर के पार देख सकती है । वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं । क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं । इसे 1 बुनियादी नियम की तरह याद रखो । तुम जहां भी रहते हो । उसके पार नहीं देख सकते । यदि तुम अपने शरीर में जीते हो । स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो । तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे । यह प्रेम का शारीरिक तल है । लेकिन संगीतज्ञ, चित्रकार, कवि 1 अलग तल पर जीता है । वह सोचता 

नहीं । वह महसूस करता है । और चूंकि वह हृदय में जीता है । वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है । सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं । यह विरल है । मैं कह रहा हूं । शायद केवल 1%  - कभी कभार । दूसरे तल पर बहुत लोग क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं । जबकि वह अत्यंत सुंदर है ? लेकिन 1 समस्या है । जो बहुत सुंदर है । वह बहुत नाजुक भी है । वह हार्डवेयर नहीं है । वह अति नाजुक शीशे से बना है । और 1 बार शीशा गिरा । और टूटा । तो इसे वापस जोड़ने का कोई उपाय नहीं होता । लोग इतने गहरे जुड़ना नहीं चाहते कि वे प्रेम की नाजुक पर्तों तक पहुंचें । क्योंकि उस तल पर प्रेम अपरिसीम सुंदर होता है । लेकिन उतना ही तेजी से बदलता भी है । भावनाएं पत्थर नहीं होतीं । वे गुलाब के फूलों की भांति होती हैं । इससे तो प्लास्टिक का फूल लाना बेहतर है । क्योंकि वह हमेशा रहेगा । और रोज तुम उसे नहला सकते हो । और वह ताजा रहेगा । तुम उस पर जरा सी फ्रेंच सुगंध छिड़क सकते हो । यदि उसका रंग उड़ जाए । तो तुम उसे पुन: रंग सकते हो । 
प्लास्टिक दुनिया की सबसे अविनाशी चीजों में 1 है । वह स्थिर है । स्थायी है । इसीलिए लोग शारीरिक तल पर रुक जाते हैं । वह सतही है । लेकिन स्थिर है । कवि, कलाकार लगभग हर दिन प्रेम में पड़ते रहते हैं । उनका प्रेम गुलाब के फूल की तरह होता है । जब तक होता है । तब तक इतना सुगंधित होता है । इतना जीवंत । हवाओं में । बारिश में सूरज की रोशनी में नाचता हुआ । अपने सौंदर्य की घोषणा करता हुआ । लेकिन शाम होते होते वह मुरझा जाएगा । और उसे रोकने के लिए तुम कुछ नहीं कर सकते । हृदय का गहरा प्रेम हवा की तरह होता है । जो तुम्हारे कमरे में आती है । वह अपनी ताज़गी, अपनी शीतलता लाती है । और बाद में विदा हो जाती है । तुम उसे अपनी मुट्ठी में बांध नहीं सकते । बहुत कम लोग इतने साहसिक होते हैं कि क्षण क्षण जीएं । जीवन को बदलते रहें । इसलिए उन्होंने ऐसा प्रेम करने का सोचा है । जिस पर वे निर्भर रह सकते हैं । मैं नहीं जानता । तुम किस प्रकार का प्रेम जानते हो ? शायद पहले किस्म का । शायद दूसरे किस्म का । और तुम भयभीत हो कि अगर तुम अपने अंतरतम में पहुंचो । तो तुम्हारे प्रेम का क्या होगा ? निश्चय ही वह खो जाएगा । लेकिन तुम कुछ नहीं खोओगे । एक नए किस्म का प्रेम उभरेगा । जो कि लाखों में एकाध व्यक्ति के भीतर उभरता है । उस प्रेम को केवल प्रेम पूर्णता कहा जा सकता है । पहले प्रकार के प्रेम को सेक्स कहना चाहिए । दूसरे प्रेम को प्रेम कहना चाहिए । तीसरे प्रेम को प्रेम पूर्णता कहना चाहिए । एक गुणवत्ता । असंबोधित । न खुद अधिकार जताता है । न किसी को जताने देता है । यह प्रेम पूर्ण गुणवत्ता ऐसी मूलभूत क्रांति है कि उसकी कल्पना करना भी अति कठिन है । पत्रकार मुझसे पूछते रहते हैं - यहां पर इतनी स्त्रियां क्यों हैं ? स्वभावत: प्रश्न संगत है । और जब मैं जवाब देता हूं । तो उन्हें धक्का लगता है । उन्हें यह उत्तर अपेक्षित नहीं था । मैंने उनसे कहा - मैं पुरुष हूं । उन्होंने अविश्वसनीय रूप से मुझे देखा । मैंने कहा - यह स्वाभाविक है कि स्त्रियां बहुत बड़ी संख्या में होंगी । क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी में जो भी जाना है । वह है । या तो सेक्स । या बहुत विरले क्षणों में प्रेम । लेकिन उन्हें कभी प्रेम पूर्णता का स्वाद नहीं मिला । मैंने उन पत्रकारों से कहा - तुम यहां पर जो पुरुष देखते हो । उनमें भी बहुत से गुण विकसित हुए हैं । जो बाहर के समाज में दबे रह गए होंगे । बचपन से ही लड़के से कहा जाता है - तुम लड़के हो । लड़की नहीं हो । एक लड़के की तरह बरताव करो । आंसू लड़कियों के लिए होते हैं । तुम्हारे लिए नहीं । मर्द बनो । अत: हर लड़का उसके स्त्रैण गुणों को खारिज करता रहता है । और जो भी सुंदर है । वह सब स्त्रैण है । तो अंतत: जो शेष रहता है । वह सिर्फ 1 बर्बर पशु । उसका पूरा काम ही है । बच्चों को पैदा करना । लड़की के भीतर कोई पुरुष के गुण पालने की इजाजत नहीं होती । अगर वह पेड़ पर चढ़ना चाहे । तो उसे फौरन रोक देंगे - यह लड़कों के लिए है । लड़की के लिए नहीं । कमाल है । यदि लड़की पेड़ पर चढ़ना चाहती है । तो यह पर्याप्त प्रमाण है कि उसे चढ़ने देना चाहिए । सभी पुराने समाजों ने स्त्री और पुरुष के लिए भिन्न भिन्न कपड़े बनाए हैं । यह सही नहीं है । क्योंकि हर पुरुष 1 स्त्री भी है । वह 2 स्रोतों से आया है । उसके पिता और उसकी मां । दोनों ने उसके अंतस को बनने में योगदान दिया है । और हर स्त्री पुरुष भी होती है । हमने दोनों को नष्ट कर दिया । स्त्री ने समूचा साहस, हिम्मत, तर्क, युक्ति खो दी । क्योंकि इन्हें पौरुष की गुणवत्ताएं माना जाता है । और पुरुष ने प्रसाद, संवेदनशीलता, करुणा, दयालुता खो दी । दोनों आधे हो गए । यह 1 बड़ी समस्याओं में 1 है । जिसे हमें हल करना है । कम से कम हमारे लोगों के लिए । मेरे संन्यासियों को दोनों होना है - आधा पुरुष । आधी स्त्री । यह उन्हें समृद्ध बनाएगा । उनके पास वे सभी गुणवत्ताएं होंगी । जो मनुष्य के लिए संभव हैं । केवल आधी ही नहीं । अंतरतम के बिंदु पर । तुम्हारे भीतर सिर्फ प्रेम पूर्णता की 1 सुवास होती है । तो डरो मत । तुम्हारा भय सही है । जिसे तुम प्रेम कहते हो । वह विदा हो जाएगा । लेकिन उसकी जगह जो आएगा । वह अपरिसीम है । अनंत है । तुम बिना लगाव के प्रेम करने में सफल होओगे । तुम अनेक लोगों से प्रेम कर सकोगे । क्योंकि 1 व्यक्ति से प्रेम करना । खुद को गरीब रखना है । वह 1 व्यक्ति तुम्हें 1 अनुभव दे सकता है । लेकिन कई कई लोगों से प्रेम करना । तुम चकित होओगे कि हर व्यक्ति तुम्हें 1 नया अहसास, नया गीत, नई मस्ती देता है । इसीलिए मैं विवाह के खिलाफ हूं । कम्यून में विवाह खारिज कर देने चाहिए । लोग चाहें । तो तह ए जिंदगी 1 दूसरे के साथ रह सकते हैं । लेकिन यह 1 कानूनी आवश्यकता नहीं होगी । लोगों को कई संबंध बनाने चाहिए । प्रेम के जितने अनुभव संभव हैं । उतने लेने चाहिए । उन्हें मालकियत नहीं जमाना चाहिए । और किसी को अपने ऊपर मालकियत नहीं करने देना चाहिए । क्योंकि वह भी प्रेम को नष्ट करता है । सभी मनुष्य प्रेम करने के पात्र हैं । एक ही व्यक्ति के साथ आजीवन बंधकर रहने की जरूरत नहीं है । यह 1 कारण है कि दुनिया में लोग इतने ऊबे हुए क्यों लगते हैं । वे तुम जैसे हंस क्यों नहीं सकते ? वे तुम्हारी तरह नाच क्यों नहीं सकते ? वे अदृश्य जंजीरों से बंधे हैं । विवाह, परिवार, पति, पत्नी, बच्चे । वे हर तरह के कर्तव्यों, जिम्मेदारियों और त्याग के बोझ तले दबे हैं । और तुम चाहते हो कि वे हंसें । मुस्कुराएं । और आनंद मनाएं ? तुम असंभव की मांग कर रहे हो । लोगों के प्रेम को स्वतंत्र करो । लोगों को मालकियत से मुक्त करो । लेकिन यह तभी होता है । जब तुम ध्यान में अपने अंतरतम को खोजते हो । इस प्रेम का अभ्यास नहीं किया जा सकता । मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आज रात किसी अलग स्त्री के पास जाओ । अभ्यास की खातिर । तुम्हें कुछ हासिल नहीं होगा । और तुम अपनी पत्नी को भी खो दोगे । और सुबह तुम बेवकूफ दिखाई दोगे । यह अभ्यास का सवाल नहीं है । यह तुम्हारे अंतरतम को खोजने का सवाल है । अंतरतम की खोज के साथ अवैयक्तिक प्रेम पूर्णता, इम्पर्सनल लविंगनैस पैदा होती है । फिर तुम सिर्फ प्रेम होते हो । और वह फैलता जाता है । पहले मनुष्यों पर, फिर जल्दी ही पशु, पक्षी, पेड़ पर्वत, तारे…। वह दिन भी आता है । जब यह पूरा अस्तित्व तुम्हारी महबूबा बनता है । और जो इसको उपलब्ध नहीं होता । वह मात्र जीवन व्यर्थ गंवा रहा है । हां, तुम्हें कुछ चीजें खोनी होंगी । लेकिन वे निरर्थक हैं । तुम्हें इतना कुछ मिलेगा कि तुम्हें दोबारा याद भी न आएगी कि तुमने क्या खोया है । एक विशुद्ध अवैयक्तिक प्रेम पूर्णता रहेगी । जो किसी के भी अंतरतम में प्रविष्ट हो सकती है । यह निष्पत्ति है । ध्यान पूर्ण स्थिति की । मौन की । अपने अंतस में गहरे डूबने की । मैं केवल तुम्हें राजी करने की कोशिश कर रहा हूं । जो है । उसे खोने से डरो मत । ओशो ।
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महावीर की अहिंसा की संपूर्ण धारणा । अस्तित्व के प्रति सम्मान । इन शब्दों के द्वारा बेहतर प्रदर्शित की जा सकती है । अहिंसा केवल ` छोटा सा भाग है । यह होता रहेगा । तुम जितना स्वयं को खोजोगे । उतने तुम उन सभी वस्तुओं के प्रति जिम्मेदार होओगे । जिनकी तुमने कभी फिक्र नहीं की । इसे कसौटी समझो कि जितना तुम लोगों के प्रति, वस्तुओं के प्रति, अस्तित्व के प्रति जिम्मेदार महसूस करो । उतना तुम समझो कि तुम सही मार्ग पर हो । ओशो
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तो जब ध्यान करो । तब ऐसे करना । जैसे सारा जीवन दाव पर लगा है । तब ही उस महा घडी का आगमन होगा । वह महा सौभाग्य का क्षण आएगा । जब तुम पाओगे । अब विसर्जन का समय आ गया । अब ध्यान को भी छोड़ दें । अब ध्यान से भी ऊपर उठ जाएं । अब समाधि । अब समाधान । अब मंजिल । 
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हिंडो तो घलादे सतगुरु म्हारा ।
हिंडो तो घलादे सतगुरु म्हारा बाग़ में जी । 
सतगुरु म्हारा, हिंडे हिंडे सुरता नार । 
काया तो नगरिये में सतगुरु म्हारा आमली जी ।
सतगुरु म्हारा छाई छाई च्यारू मेर ।
अगर चन्दन को सतगुरु म्हारा पालणों जी ।
सतगुरु म्हारा रेशम डोर घलाय ।
पांच सखी मिल पाणी डे न निसरी जी ।
सतगुरु मेरा पांचू ही एक ऊणीयार ।
नाथ गुलाब से सतगुरु म्हारा विनती जी ।
सतगुरु मेरा गावै गावै भानीनाथ ।

हमने आत्मविजय प्राप्त कर ली


मीरदाद - पाप के विषय में तुम्हे बता दिया गया है । और यह तुम जान जाओगे कि मनुष्य पापी कैसे बना ? तुम्हारा कहना है । और वह सारहीन भी नहीं है कि परमात्मा का प्रतिबिम्ब और प्रति रूप मनुष्य यदि पापी है । तो स्पष्ट है कि पाप का स्रोत स्वयं परमात्मा ही है । इस तर्क में भोले भाले लोगों को 1 जाल है । और तुम्हे मेरे साथियो, मैं जाल में फँसने नहीं दूँगा । इसलिए इस जाल को मैं तुम्हारे रास्ते से हटा दूँगा । ताकि तुम इसे अन्य मनुष्यों के रास्ते से हटा सको । परमात्मा में कोई पाप नहीं । क्या सूर्य का अपने प्रकाश में से मोमबत्ती को प्रकाश देना पाप है ? न ही मनुष्य में पाप है । क्या 1 मोमबत्ती के लिये धूप में जलकर अपने आपको मिटा देना । और इस प्रकार सूर्य के साथ मिल जाना पाप है ? लेकिन पाप है उस मोमबत्ती में । जो अपना प्रकाश बिखेरना नहीं चाहती । और जब उसे जलाया जाता है । तो दियासलाई तथा दियासलाई जलाने वाले हाथ को कोसती है । पाप है उस मोमबत्ती में । जिसे धूप में जलने में शर्म आती है । और जो इसीलिये सूर्य से छिपा लेना चाहती है । मनुष्य ने प्रभु के विधान का उलंघन करके पाप नहीं किया । बल्कि पाप किया है उस विधान के प्रति । अपने अज्ञान पर पर्दा डालकर । हाँ, पाप तो अंजीर पत्ते के आवरण से अपनी नग्नता छिपाने में था । क्या तुमने मनुष्य के पतन की कथा नहीं पढ़ी ? जो शब्दों की दृष्टि से सरल और संक्षिप्त । परन्तु अर्थ की दृष्टि से गहरी और महान है ? क्या तुमने नहीं पढ़ा कि जब परमात्मा, मनुष्य परमात्मा में से नया नया निकला था । तो किस प्रकार वह शिशु परमात्मा जैसा था - निश्चेष्ट, गतिहीन, सृजन में असमर्थ ? क्योंकि परमात्मा के सभी गुणों से युक्त होते हुए भी वह सब शिशुओं की तरह अपनी अनंत शक्तियों और योग्यताओं को प्रयोग में लाने में ही नहीं । बल्कि उन्हें जानने में भी असमर्थ था । 1 सुंदर शीशी में बन्द अकेले बीज की तरह था मनुष्य अदन की वाटिका में । शीशी में पड़ा बीज बीज ही रहेगा । और जब तक उसे उसकी प्रकृति के अनुकूल मिटटी में दवाया न जाये । और उसका खोल फूट न जाये । उसके अन्दर बन्द चमत्कार सजीव होकर प्रकाश में नहीं आयेगा । परन्तु मनुष्य के पास उसकी प्रकृति के अनुकूल कोई मिटटी नहीं थी । जिसमें वह अपने आपको रोपता । और अंकुरित हो जाता । उसके चेहरे को किसी अन्य समरूपी चेहरे में अपनी झलक नहीं मिलती थी । उसके मानवी कान को कोई अन्य मानव स्वर सुनाई नहीं देता था । उसका मानव स्वर किसी अन्य मानव कण्ठ में गूँजकर नहीं लौटता था । उसके एकाकी ह्रदय के साथ 1 सुर होने के लिए कोई अन्य ह्रदय नहीं था । इस संसार में, जिसे उपयुक्त जोड़ों के रूप में अपनी यात्रा पर रवाना किया गया था । मनुष्य अकेला था । बिलकुल अकेला । वह अपने लिए 1 अजनबी था । उसके करने के लिये अपना कोई काम नहीं था । और न ही था उसके लिए निर्धारित कोई मार्ग । अदन उसके लिये वही था । जो किसी शिशु के लिये 1 आरामदेह पालना होता है - निष्क्रिय आनंद की 1 अवस्था । वह उसके लिए सब प्रकार की सुख सुविधा का स्थान था । नेकी और बदी के ज्ञान का वृक्ष । तथा जीवन का वृक्ष । दोनों उसकी पहुँच में थे । फिर भी वह उनके फल तोड़ने और चखने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता था । क्योंकि उसकी रूचि और उसकी संकल्प शक्ति । उसके विचार तथा उसकी कामनाएँ । यहाँ तक कि उसका जीवन भी । सब उसके अंदर बंद पड़े थे । और इस प्रतीक्षा में थे कि उन्हें कोई धीरे धीरे खोले । उन्हें स्वयं खोलना उसके लिए सम्भव नहीं था । अतएव उसे अपने अंदर से ही अपने लिए 1 साथी पैदा करने के लिए विवश किया गया । 1 ऐसा हाथ । जो उसके बंधन खोलने में उसका सहायक बने । उसे सहायता और कहाँ से मिल सकती थी सिवाय अपने अंदर के ? जो दिव्यत्व से संम्पन होने के कारण सहायता से भरपूर था ? और यह बात अत्यन्त महत्वपूर्ण है । 
किसी नई मिटटी और सांस से नहीं बनी थी - हौवा । बल्कि आदम की अपनी ही मिटटी और सांस थी । उसकी हड्डी में से 1 हड्डी । उसके मांस में से मांस का 1 टुकड़ा । कोई अन्य जीव रंगमंच पर प्रकट नहीं हुआ था । बल्कि स्वयं उसी 1 आदम को युगल बना दिया गया था - 1 पुरुष आदम । और 1 स्त्री आदम । इस प्रकार उस अकेले, दर्पण रहित चेहरे को 1 साथी और 1 दर्पण मिल जाता है । और वह नाम जो पहले किसी मानव स्वर में नहीं गूँजा था । अदन की वीथिकाओं में ऊपर नीचे सर्वत्र मधुर स्वरों में गूँजने लगता है । और वह ह्रदय जिसकी उदास धड़कन 1 सूने वक्ष में दबी पड़ी थी । 1 साथी वक्ष में 1 साथी ह्रदय के अंदर अपनी गति महसूस करने और धड़कन सुनने लगता है । इस प्रकार चिंगारी रहित फौलाद का उस चकमक पत्थर से मेल हो जाता है । और उसमे से बहुत सी चिंगारियाँ पैदा कर देता है । इस प्रकार अनजली मोमबत्ती दोनों सिरों से जला दी जाती है ।
मोमबत्ती 1 है । बत्ती 1 है । और रोशनी भी 1 है । यद्यपि वह देखने में 2 अलग अलग सिरों से पैदा हो रही है । इस प्रकार शीशी में पड़े बीज को वह मिटटी मिल जाती है । जिसमें अंकुरित होकर वह अपने रहस्य प्रकट कर सकता है । इस प्रकार अपने आप से अनजान एकत्व द्वैत को जन्म देता है । ताकि द्वैत में निहित संघर्ष और विरोध के द्वारा उसे अपने एकत्व का ज्ञान कराया जा सके । इस प्रक्रिया में भी मनुष्य अपने परमात्मा का सही प्रतिबिम्ब है । उसका प्रतिरूप है ।
क्योंकि परमात्मा आदि चेतना अपने आपमें से शब्द को प्रकट करता है । और शब्द तथा चेतना दोनों दिव्य ज्ञान में 1 हो जाते हैं । द्वैत कोई दण्ड नहीं है । बल्कि एकत्व की प्रकृति में निहित 1 प्रक्रिया है । उसकी दिव्यता के प्रकट होने का 1 आवश्यक साधन । कैसा बचपना है । और किसी तरह सोचना । कैसा बचपना है यह विश्वास करना कि इतनी बड़ी प्रक्रिया से उसका मार्ग 3 बीसी और 10 सालों या 3 बीसी 10 लाख सालों में भी तय करवाया जा सकता है । आत्मा का परमात्मा बनना क्या कोई मामूली बात है ?
क्या परमात्मा इतना कठोर और कंजूस मालिक है कि देने के लिए उसके पास पूरा अनन्त काल होते हुए भी वह मनुष्य को फिर से 1 होकर, अपने ईश्वरत्व तथ परमात्मा के साथ अपनी एकता का पूरी तरह ज्ञान प्राप्त करके वापस अपने मूलधाम अदन में पहुँचने के लिए केवल सत्तर बर्ष का इतना कम समय प्रदान करे ? लंबा है द्वैत का मार्ग । और मूर्ख हैं वे । जो इसे तिथि पत्रों से नापते हैं । अनन्त काल सितारों के चक्कर नहीं गिनता । जब निष्क्रिय, गतिहीन, सृजन में असमर्थ आदम को 1 से 2 कर दिया गया । तो वह तुरंत क्रियाशील, गतिमान, तथा सृजन और सन्तानोत्पादन में समर्थ हो गया ।
2 कर दिए जाने पर आदम का पहला काम क्या था ? वह था नेकी और बदी के ज्ञान के वृक्ष का फल खाना । और इस प्रकार अपने सारे संसार को अपने जैसा ही 2 कर देना । अब सब कुछ वैसा न रहा था । जैसा पहले था - निष्पाप और निश्चिन्त । बल्कि सब कुछ अच्छा या बुरा । लाभकारी या हानिकारक । सुखकर या कष्टकर हो गया था । 2 विरोधी दलों में बँट गया था । जबकि पहले 1 था । और जिस सांप ने हौवा को नेकी और बदी का स्वाद चखने के लिए फुसलाया था । क्या वह उस सक्रिय किन्तु अनुभवहीन द्वैत की गहरी आवाज नहीं थी ? जो कुछ करने तथा अनुभव प्राप्त करने के लिए अपने आपको प्रेरित कर रहा था ? यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस आवाज को पहले हौवा ने सुना । और उसका कहा माना । क्योंकि हौवा मानो सान का पत्थर थी । अपने साथी में छिपी शक्तियों को प्रकट करने के लिए बनाया गया उपकरण । इस प्रथम मानव कथा में चोरी से अदन के पेड़ों में से अपना मार्ग बना रही । इस प्रथम स्त्री की सजीव कल्पना के लिये क्या तुम अक्सर रुक नहीं गये । 1 ऐसी स्त्री की कल्पना । जो घबराई हुई थी । जिसका ह्रदय पिंजरे में बन्द पक्षी की तरह फड़फड़ा रहा था । जिसकी आँखें चारों तरफ देख रहीं थीं कि कहीं कोई ताक तो नहीं रहा है । और जिसके मुंह में पानी भर आया था । जब उसने अपना कांपता हुआ हाथ उस लुभावने फल की ओर बढ़ाया था ? क्या तुमने अपनी सांस रोक नहीं ली । जब उसने वह फल तोड़ा । और उसके कोमल गूदे में अपने दांत गड़ा दिये । ऐसी क्षणिक मिठास का स्वाद लेने के लिये । जो स्वयं उसके और उसकी संतान के लिये कड़वाहट में बदलने बाली थी ?
क्या तुमने जी जान से नहीं चाहा कि जब हौवा अपना विवेक शून्य कार्य करने ही बाली थी । परमात्मा उसी समय प्रकट होकर उसकी उन्मत धृष्टता को रोक देता । बजाय बाद में प्रकट होने के जैसा कि कहानी में होता है ? और जब हौवा ने वह गुनाह कर ही लिया । तो क्या तुमने नहीं चाहा कि आदम के पास इतना विवेक और साहस होता कि वह अपने आपको हौवा का सह अपराधी बनने से रोक लेता ?
किन्तु न तो परमात्मा ने हस्तक्षेप किया । न आदम ने अपने आपको रोका । क्योंकि परमात्मा नहीं चाहता था कि उसका प्रतिरूप उससे भिन्न हो । यह उसकी इच्छा और योजना थी कि मनुष्य अपनी खुद की इच्छा और योजना को संजोये । और दिव्य ज्ञान द्वारा अपने आपको 1 करने के लिये द्वैत का लंबा रास्ता तय करे । जहाँ तक आदम का सवाल है । वह चाहता भी तो अपनी पत्नी के दिये फल को खाने से अपने आपकी रोक नहीं सकता था । वह फल खाने के लिये बाध्य था । केवल इसलिये कि उसकी पत्नी वह फल खा चुकी थी । क्योकि दोनों 1 शरीर थे । और दोनों एक दूसरे के कर्मों के लिये उत्तरदायी थे ।
क्या परमात्मा मनुष्य के नेकी और बदी का फल खाने से अप्रसन्न और क्रुद्ध हुआ ? यह सम्भव नहीं था । क्योकि परमात्मा जानता था कि मनुष्य फल खाये बिना नहीं रह सकेगा । और वह चाहता था कि मनुष्य फल खाये । किन्तु वह यह भी चाहता था कि मनुष्य पहले ही जान ले कि खाने का परिणाम क्या होगा । और उसमें परिणाम का सामना करने की शक्ति हो । और मनुष्य में वह शक्ति थी । और मनुष्य ने फल खाया । और मनुष्य ने परिणाम का सामना किया ।
और वह परिणाम था - मृत्यु । क्योंकि प्रभु इच्छा से क्रियाशील 2 बनने में मनुष्य कि क्रिया रहित एकता समाप्त हो गई । अतएव मृत्यु कोई दण्ड नहीं है । बल्कि जीवन का 1 पक्ष है । द्वैत का ही 1 अंश है । क्योकि द्वैत की प्रकृति है । सब वस्तुओं को 1 से 2 का रूप दे देना । प्रत्येक वस्तु को 1 परछाईं प्रदान कर देना ।
इसलिए आदम ने अपनी परछाईं पैदा कर ली हौवा के रूप में । और अपने जीवन के लिये दोनों ने 1 परछाईं पैदा कर ली । जिसका नाम है - मृत्यु । परन्तु आदम और हौवा मृत्यु की छाया में रहते हुये भी प्रभु के जीवन में परछाईं रहित जीवन जी रहे हैं ।
द्वैत 1 निरंतर संघर्ष है । और संघर्ष यह भ्रम पैदा करता है कि 2 विरोधी पक्ष अपने आपको मिटा देने पर तुले हैं । विरोधी दिखने वाले पक्ष वास्तव में एक दूसरे के पूरक हैं । एक दूसरे के साधक हैं । और कन्धे से कन्धा मिलाकर 1 ही उद्देश्य के लिये, सम्पूर्ण शांति, एकता और दिव्य ज्ञान से उत्पन्न होने वाले संतुलन के लिये कार्यरत हैं । परन्तु भ्रम की जड़ ज्ञानेन्द्रियों में जमी हुई है । और वह जब तक बना रहेगा । जब तक ज्ञानेन्द्रियां हैं ।
इसलिए आदम की आँखें खुलने के बाद प्रभु ने जब उसे बुलाया । तो उसने उत्तर दिया - मैंने बाग़ में तेरी आवाज सुनी । और मैं डर गया । क्योंकि मैं नंगा था । और मैंने अपने आपको छिपा लिया ।
आदम ने यह भी कहा - जो स्त्री तूने मुझे साथी के रूप में दी थी । उसने मुझे वृक्ष का फल दिया । और मैंने खाया ।
हौवा और कोई नहीं थी । आदम का अपना ही हाड मांस थी । फिर भी आदम के इस नवजात मैं पर विचार करो । जो आँख खुलने के बाद अपने आपको हौवा से, परमात्मा से, और परमात्मा की समूची रचना से भिन्न, पृथक और स्वतन्त्र समझने लगा ।
1 भ्रम था यह - मैं । उस अभी अभी खुली आँख का 1 भ्रम था । परमात्मा से पृथक हुआ यह व्यक्तित्व । इसमें न सार था । न यथार्थ । इसका जन्म इसलिये हुआ था कि इसकी मृत्यु के माध्यम से मनुष्य अपने वास्तविक अहम को पहचान ले । जो परमात्मा का अहम है । यह भ्रम तब लुप्त होगा । जब बाहर की आँख के सामने अँधेरा छा जाएगा । और अंदर की आँख के सामने प्रकाश हो जाएगा । और इसने यद्यपि आदम को चकरा दिया । फिर भी इसने उसके मन में 1 प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न कर दी । और उसकी कल्पना को लुभा लिया ।
मनुष्य के लिये । जिसे किसी भी अहम का अनुभव न हुआ हो । 1 ऐसा अहम पा लेना । जिसे वह पूरी तरह अपना कह सके । सचमुच 1 बहुत बड़ा प्रलोभन था । और उसके मिथ्याभिमान के लिये बहुत बड़ा प्रोत्साहन भी । और आदम अपने इस भ्रामक अहम के प्रलोभन और बहकावे में आ गया । यद्यपि वह इसके लिये लज्जित था । क्योंकि वह अवास्तविक था । नग्न था । फिर भी वह इसे त्यागने के लिये तैयार नहीं था । वह तो इसे अपने पूरे ह्रदय से और अपने नये मिले समूचे कौशल से पकडे बैठा था । उसने अंजीर के पत्ते सीकर जोड़ लिये । तथा अपने लिए 1 आवरण तैयार कर लिया । जिससे वह अपने नग्न व्यक्तित्व को ढक ले । और उसे परमात्मा की सर्व-वधि दृष्टि से बचाकर अपने ही पास रखे ।
इस प्रकार अदन, आनंदपूर्ण भोलेपन की अवस्था । अपने आप से बेखबर एकता, पत्तों का आवरण 1 से 2 बने मनुष्य के हाथ से निकल गई । और मनुष्य तथा दिव्य जीवन के वृक्ष के बीच ज्वाला की तलवारें खड़ी हो गईं ।
मनुष्य नेकी और बदी के दोहरे द्वार से अदन से बाहर आया था । वह दिव्य ज्ञान के इकहरे द्वार से अदन के अंदर जाएगा । वह दिव्य जीवन के वृक्ष की ओर पीठ किये निकला था । उस वृक्ष की ओर मुंह किये प्रवेश करेगा । जब वह अपने लम्बे कठिन सफ़र पर रवाना हुआ था । तो अपनी नग्नता पर लज्जित था । और अपनी लज्जा को छिपाये रखने के लिये आतुर । जब वह अपनी यात्रा के अंत में पहुँचेगा । तो उसकी पवित्रता आवरण मुक्त होगी । और उसे अपनी नग्नता पर गर्व होगा । 
परन्तु ऐसा तब तक नहीं होगा । जब तक कि पाप मनुष्य को पाप से मुक्त न कर दे । क्योकि पाप स्वयं अपने विनाश का कारण सिद्ध होगा । और पाप आवरण के सिवाय और कहाँ है ? हाँ, पाप और कुछ नहीं है । सिवाय उस दीवार के । जो मनुष्य ने अपने और परमात्मा के बीच में खड़ी कर ली है । अपने क्षण भर अहम और अपने स्थायी अहम के बीच । वह ओट जो शुरू में अंजीर के मुट्ठी भर पत्ते थी । अब 1 विशाल परकोटा बन गई है । क्योंकि जब मनुष्य ने अदन के भोलेपन को उतार फेंका । तबसे वह अधिकाधिक पत्ते जमा करने और आवरण पर आवरण सीने में जी जान से जुटा हुआ है ।
आलसी लोग अपने मेहनती पड़ोसियों द्वारा फेंके गए चीथड़ों से अपने आवरणों के छेदों पर पैबन्द लगा लगाकर संतोष कर लेते हैं । पाप की पौशाक पर लगाया गया हर पैबन्द पाप ही होता है । क्योंकि वह उस लज्जा को स्थायी बनाने का साधन होता है । जिसे परमात्मा से अलग होने पर मनुष्य ने पहली बार और बड़ी तीव्रता के साथ महसूस किया था । क्या मनुष्य अपनी लज्जा पर विजय पाने के लिये कुछ कर रहा है ?
अफ़सोस, उसके सब उद्यम लज्जा पर लादे गए लज्जा के ढेर हैं । आवरणों पर चढ़े और आवरण हैं ।
मनुष्य की कलाएं और विद्याएं आवरणों के सिवाय और क्या हैं ?
उसके साम्राज्य राष्ट्र, जातीय अलगाव, और युद्ध के मार्ग पर चल रहे धर्म । क्या ये आवरण की पूजा के सम्प्रदाय नहीं हैं ? उसके उचित और अनुचित, मान और अपमान, न्याय और अन्याय के नियम । उसके असंख्य सामजिक सिद्धांत और रूढ़ियाँ । क्या वे आवरण नहीं हैं ? उसके द्वारा अमूल्य का मूल्यांकन और उसका अमित को मापना । असीम को सीमांकित करना । क्या यह सब उस लुंगी पर और पैबन्द लगाना नहीं है । जिस पर पहले ही कई पैबन्द लगे हुए हैं । पीड़ा से भरे सुखों के लिए उसकी अमिट भूख । निर्धन बना देने वाले धन के लिए उसका लोभ । दास बना देने वाले प्रभुत्व के लिए उसकी प्यास । और तुच्छ बना देने वाली शान के लिए उसकी लालसा । क्या ये सब आवरण नहीं हैं ?
नग्नता को ढकने के लिये अपनी दयनीय आतुरता में मनुष्य ने बहुत अधिक आवरण पहन लिये हैं । जो समय के साथ उसकी त्वचा इतने कसकर चिपक गए हैं कि अब वह उनमे और अपनी त्वचा में भेद नहीं कर पाता । और मनुष्य साँस लेने के लिये तड़पता है । वह अपनी अनेक त्वचाओं से छुटकारा पाने के लिये प्रार्थना करता है । अपने बोझ से छुटकारा पाने के लिये मनुष्य अपने उन्माद में सब कुछ करता है । लेकिन वही 1 काम नहीं करता । जो वास्तव में उसे उसके बोझ से छुटकारा दिला सकता है । और वह है - उस बोझ को फेंक देना । वह अपनी अतिरिक्त त्वचाओं से मुक्त होना चाहता है । पर अपनी पूरी शक्ति से उनसे चिपका हुआ है । वह आवरण मुक्त होना चाहता है । पर साथ ही चाहता है कि पूरी तरह कपडे पहने रहे ।
निवारण होने का समय समीप है । और मैं अतिरिक्त त्वचाओं को । आवरणों को । उतार फेंकने में तुम्हारी सहायता करने के लिए आया हूँ । ताकि त्वचाओं को उतार फेंकने में तुम भी संसार के उन सब लोगों की सहायता कर सको । जिनमें तड़प है । मैं तो केवल विधि बताता हूँ । किन्तु अपनी त्वचा को उतार फेंकने का काम हर 1 को स्वयं ही करना होगा । चाहे वह कितना ही कष्टदायी क्यों न हो ।
अपने आपसे अपने बचाव के लिये किसी चमत्कार की प्रतीक्षा न करो । न ही पीड़ा से डरो । क्योंकि आवरण रहित ज्ञान तुम्हारी पीड़ा को स्थायी आनंद में बदल देगा । फिर यदि दिव्य ज्ञान की नग्नता में तुम्हारा अपने आपसे सामना हो । और यदि परमात्मा तुम्हें बुलाकर पूछे - तुम कहाँ हो ? तो तुम शर्म महसूस नहीं करोगे । न तुम डरोगे । न ही तुम परमात्मा से छिपोगे । बल्कि तुम अडोल, बन्धन मुक्त, दिव्य शांति से युक्त खड़े रहोगे । और परमात्मा को उत्तर दोगे - हमारे प्रभु, हमारी आत्मा, हमारे अस्तित्व, हमारे एकमात्र अहम । हमें देखिये । लज्जा, भय,   और पीड़ा से हम नेकी और बदी के लम्बे, विषम और टेढ़े मेढ़े उस रास्ते पर चलते रहे हैं । जिसे आपने हमारे लिये समय के आरम्भ में निर्धारित किया था । निज घर के लिए महाविरह ने हमारे पैरों को प्रेरणा दी । और विश्वास ने हमारे ह्रदय को थामे रखा । और अब दिव्य ज्ञान ने हमारे बोझ उतार दिये हैं । हमारे घाव भर दिये हैं । और हमें वापस आपकी पावन उपस्थिति में ला खड़ा किया है । नेकी और बदी से मुक्त । जीवन और मृत्यु के आवरणों से मुक्त । द्वैत के सभी भ्रमों से मुक्त । आपके सर्वग्राही अहम के सिवाय । और हर अहम से मुक्त । अपनी नग्नता को छिपाने के लिये । कोई आवरण पहने बिना । हम लज्जा मुक्त, प्रकाशमान भयरहित होकर आपके सम्मुख खड़े हैं । देखिये । हम 1 हो गये हैं । देखिये, हमने आत्मविजय प्राप्त कर ली है । और परमात्मा तुम्हें अनन्त प्रेम से गले लगा लेगा । और तुम्हे सीधे अपने दिव्य जीवन वृक्ष तक ले जायेगा । यही शिक्षा थी मेरी नूह को । यही शिक्षा है मेरी तुम्हें ।
नरौंदा - यह बात भी मुर्शिद ने तब कही थी । जब हम अँगीठी के पास बैठे थे । पाप और आवरण । अध्याय 32

21 दिसंबर 2010

उम्र के साथ ऊर्जा व शक्ति कम होने लगती है

चुकंदर का सेवन अधिकतर लोग सलाद के रूप में या जूस बनाकर करते हैं । इसके लाल रंग के कारण अधिकतर लोग सिर्फ इसे खून बढ़ाने वाली चीज के रूप में ही जानते हैं । और इसका उपयोग भी इसीलिए करते हैं । लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं । इसे खाने के एक नहीं अनेक फायदे हैं । आज हम बताने जा रहे हैं । कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में ।
गुणों से भरपूर - सोडियम पोटेशियम, फॉस्फोरस, क्लोरीन, आयोडीन, आयरन और अन्य महत्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं । इसे खाने से हीमोग्लोबिन बढ़ता है । उम्र के साथ ऊर्जा व शक्ति कम होने लगती है । चुकंदर का सेवन अधिक उम्र वालों में भी ऊर्जा का संचार करता है । इसमें एंटीआक्सीडेंट पाए जाते हैं । जो हमेशा जवान बनाएं रखते हैं ।
त्वचा के लिए फायदेमंद - यदि आपको आलस महसूस हो रही हो । या फिर थकान लगे । तो चुकंदर खा लीजिये । इसमें कार्बोहाइड्रेट होता है । जो शरीर की एनर्जी बढाता है । सफेद चुकंदर को पानी में उबाल कर छान लें । यह पानी फोड़े, जलन और मुहांसों के लिए काफी उपयोगी होता है । खसरा और बुखार में भी त्वचा को साफ करने में इसका उपयोग किया जा सकता है ।
दिल की बीमारियां - चुकंदर में नाइट्रेट नामक रसायन होता है । जो रक्त के दबाव को काफी कम कर देता है । और दिल की बीमारी के जोखिम को भी कम करता है । चुकंदर एनीमिया के उपचार में बहुत उपयोगी माना जाता है । यह शरीर में रक्त बनाने की प्रक्रिया में सहायक होता है । आयरन की प्रचुरता के कारण यह लाल रक्त कोशिकाओं को सक्रिय रखने की क्षमता को बढ़ा देता है । इसके सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और घाव भरने की क्षमता भी बढ़ जाती है ।
हाई ब्लड प्रेशर में - लंदन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने रोज चुकंदर का जूस पीने वाले मरीजों को अध्ययन में शामिल किया । उन्होंने रोज चुकंदर का मिक्स जूस [ गाजर या सेब के साथ ]  पीने वाले मरीजों के हाई ब्लड प्रेशर में कमी पाई । अध्ययन के मुताबिक रोजाना केवल दो कप चुकंदर का मिक्स जूस पीने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है । हालांकि इसका ज्यादा सेवन घातक साबित हो सकता है ।
कब्ज और बवासीर - चुकंदर का नियमित सेवन करेंगे । तो कब्ज की शिकायत नहीं होगी । बवासीर के रोगियों के लिए भी यह काफी फायदेमंद होता है । रात में सोने से पहले एक गिलास या आधा गिलास जूस दवा का काम करता है ।
लोग जिम में जी तोड़कर वर्कआउट करते हैं । उन्हें खाने के साथ चुकंदर खाना चाहिए । इससे शरीर में एनर्जी बढती है । और थकान दूर होती है । साथ ही अगर हाई बी पी हो गया हो । तो इसे पीने से केवल 1 घंटे में शरीर नार्मल हो जाता है ।
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Osho   - Always remember that   If you are moving in  The right direction  . You will go on flowering  Much fragrance will  Come out of you and   You will be creative   And you will be  Sensitive to life  To love and to   Everything that    God makes    Available to you.
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0sho  -   Hara is a death center.  Energy should not be allowed through the hara.   A person whose energy starts through hara you can very easily detect. For example, there are people with whom you will feel suffocated, with whom you will feel as if they are sucking your energy. You will find that, after they are gone, you feel at ease and relaxed, although they were not doing anything wrong to you.
You will find just the opposite kind of people also, whose meeting you makes you joyful, healthier. If you were sad, your sadness disappears; if you were angry, your anger disappears. These are the people whose energy is moving to higher centers. Their energy affects your energy. We are affecting each other continually. And the man who is conscious, chooses friends and company which raises his energy higher.
One point is very clear. There are people who suck you, avoid them !  It is better to be clear about it, say goodbye to them. There is no need to suffer, because they are dangerous; they can open your hara too. Their hara is open, that's why they create such a sucking feeling in you .

अब कोई आशा न बची


प्रेम - जागा हुआ प्रेम ही प्रार्थना । सोये रहने वाले के लिये जिस प्रकार केवल सुबह हो जाने से ही कुछ नहीं होता । उसी प्रकार प्रेम हो जाने से ही कुछ नहीं होता । प्रेम हो होकर भी लोग चूक जाते हैं । मन्दिर के द्वार तक आ आकर लोग मुड़ जाते हैं । चूक जाते हैं । सीढियॉं चढ चढकर लौट जाते हैं । प्रेम तो जीवन में बहुत बार घटता है । मगर बहुत थोड़े ही धन्यभागी होते हैं । जो जागते हैं । जो जाग जाते हैं । उनके प्रेम का नाम प्रार्थना है । जागे हुए प्रेम का नाम प्रार्थना है । जबकि सोई हुई प्रार्थना का नाम - प्रेम है ।
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बुद्ध ने कहा - विध्वंस सरल । सृजन कठिन । और आत्म सृजन तो और भी कठिन है । अहंकार स्पर्धा जगाता । स्पर्धा में ईर्ष्या होती । ईर्ष्या से द्वेष । द्वेष से शत्रुता । और फिर तो अंतर्बोध जगे कैसे ? सारी शक्ति तो इसी में व्यय हो जाती है । इसी मरुस्थल में खो जाती है नदी । सागर तक पहुंचे कैसे ? दूसरे का विचार ही न करो । समय थोड़ा है । स्वयं को जगा लो । बना लो । अन्यथा मल मूत्र के गड्डों में बारबार गिरोगे । भिक्षुओ ! तुम्हीं कहो । बारबार गर्भ में गिरना । मल मूत्र के गड्डे में गिरना नहीं । तो और क्या है ?
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तुम यह मान ही नहीं सकते कि - कोई तुमसे बेहतर हालत में हो सकता है । क्योंकि अगर कोई तुमसे बेहतर हालत में है । तो फिर तुम्हें कुछ करना पड़ेगा । फिर तुम्हें उठना पड़ेगा । तुम्हें अपने को बदलना पड़ेगा । रूपांतरण करना होगा । तो दुनिया में अधिक लोग बांझ मर जाते हैं । उनके जीवन में कुछ पैदा नहीं होता । कोई फूल नहीं खिलते । और कोई संगीत पैदा नहीं होता । कोई सुगंध नहीं बिखरती । कभी दीया नहीं जलता । और जिम्मेवार वे ही हैं । क्योंकि वे दीया जलाते ही नहीं । वे तो दूसरे का दीया फूंकने में लगे रहते हैं कि जब किसी का जला हुआ नहीं दिखायी पड़ेगा । तो अपनी ही अड़चन क्या है । इसलिए लोग सुबह से उठकर अखबार पढ़ते हैं । और अखबार पढ़कर बड़ी शांति मिलती है । गीता पढ़ो । तो शांति नहीं मिलती । गीता पढ़ो । तो अशांति मिलती है ।
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ओशो ने हर 1 पाखंड पर चोट की । ओशो ने सम्यक सन्यास को पुनरुज्जीवित किया है । ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी है । सन्यास पहले कभी भी इतना समृद्ध न था । जितना आज ओशो के संस्पर्श से हुआ है । इसलिए यह नव संन्यास है । उनकी नजर में सन्यासी वह है । जो अपने घर संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक
जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए ।
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योग का अर्थ है - सत्य का साक्षात्कार । जैसा वह है ।
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1 युवक बोकोजू अपने गुरु के पास वर्षों रहा । ध्यान की । समाधि की तलाश में । और जब भी वह कुछ खबर लेकर जाता कि बड़ा अनुभव हुआ है कि गुरु उसको 1 चांटा रसीद कर देता । यह पहले तो बहुत चौंकता था । फिर समझने लगा । औरों से पूछा । बुजुर्गों से पूछा । जो पहले से ऐसे गुरु के चांटे खाते रहे थे - उनसे पूछा । उन्होंने कहा कि उसकी बड़ी कृपा है । वह मारता ही तब है । जब उसकी कृपा होती है किसी पर । नहीं तो वह मारता ही नहीं । फिजूल पर तो वह खर्चा ही क्यों करे । 1 चांटा भी क्यों खर्च करे । तुम पर उसकी बड़ी कृपा है । और वह मारता इसलिए है कि तुम जो भी ले जाते हो । वह अभी सच नहीं है । काल्पनिक है । कभी वह पहुंच जाता कि बड़े प्रकाश का अनुभव हुआ गुरुदेव । और 1 चांटा कि कुंडलिनी जग गयी गुरुदेव । और 1 चांटा कि चक्र खुलने लगे । और 1 चांटा । वह जो भी अनुभव ले जाता । और चांटा खाता । तब तो उसे भी समझ में आने लगा कि बात तो सब, यह सब तो काल्पनिक जाल ही है । जहां तक किसी चीज का अनुभव हो रहा है । वहां तक अनुभव हो ही नहीं रहा है । क्योंकि जो भी अनुभव हो रहा है । वह तुमसे अलग है । कुंडलिनी जगी । तो तुम तो देखने वाले हो । तुम तो कुंडलिनी नहीं हो । वह जो देख रहा है भीतर कि कुंडलिनी जग रही है । वह तो कुंडलिनी नहीं हो सकता न ? कुंडलिनी तो विषय हो गयी । जिसने देखा कि भीतर तीसरी आंख खुलने लगी । वह तो तीसरी आख से भी उतना ही दूर हो गया । जितना इन दो आंखों से दूर है । वह तीसरी आख भी अलग हो गयी । जिसने देखा कि भीतर कमल खिलने लगा । वह देखने वाला तो कमल नहीं हो सकता न ? वह देखने वाला तो पार और पार और पार । उसका तो पता तब चलता है । जब न कमल खुलते । न प्रकाश होता । न कुंडलिनी जगती । न चक्र घूमते । कुछ भी नहीं होता है । सन्नाटा छा जाता है । अनुभव में कुछ आता ही नहीं । सिर्फ वही बच जाता है - साक्षी । उस शून्य का साक्षी रह जाता है । ऐसा कहते हैं । 20 साल तक बोकोजू ने चांटे खाए । और आखिरी बार जब वह आया । तो पता है । कैसे उसने धन्यवाद दिया ? आकर 1 चांटा अपने गुरु को जड़ दिया । गुरु खूब हंसा । कहते हैं । गुरु लोटा । प्रसन्नता में लोटा । उसने कहा - तो हो गया आज । तो धन्यवाद कैसा होगा ? कहना मुश्किल है । यह ठीक धन्यवाद था । 20 साल चाटे खाने के बाद । आज कुछ कहने को था भी नहीं । झेन परंपरा अनूठी है । फकीरों की सारी परंपराएं अनूठी हैं ।
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शरीर से बहुत बंधने की जरूरत नहीं है । शरीर के दुश्मन होने की भी जरूरत नहीं है । शरीर सुंदर घर है । रहो । शरीर की देखभाल करो । अपने को शरीर ही न मान लो । मन भी प्यारा है । उसका भी उपयोग करो । उसकी भी जरूरत है । और हृदय तो और भी प्यारा है । उसमें भी जीओ । मगर ध्यान रहे कि - मैं साक्षी हूं । और जिसे सतत स्मरण है कि - मैं साक्षी हूं । उसकी क्रांति सुनिश्चित है । जिसे स्मरण है कि - मैं साक्षी हूं । वह भूमा को उपलब्ध हो जाता है । तुम सिर्फ साक्षी हो । वह तुम्हारा स्वरूप है । न तुम कर्ता हो । शरीर से कर्म हो । न तुम विचारक हो । मन से विचार होते हैं । न तुम भावुक हो । हृदय से भावनाएं होती हैं । तुम साक्षी हो - भावों के । विचारों के । कृत्यों के । ये तुम्हारी 3 अभिव्यक्तियां हैं । और इन तीनों के बीच में तुम्हारा साक्षी है । उस साक्षी के सूत्र को पकड़ लो । साक्षी के सूत्र को पकड़ते ही संन्यास का फूल खिल जाता है । जो कली की तरह रहा है - जन्मों जन्मों से । तत्क्षण उसकी पंखुड़ियां खुल जाती हैं । और वह ऐसा फूल नहीं । जो कुम्हलाए । वह फूल अमृत है । वह फूल ऐसा नहीं । जो मरे । वह भूमा है । असीम है । वह फूल आनंद का फूल है । वह फूल ही मोक्ष है ।
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योग का अर्थ है कि - अब कोई आशा न बची । अब कोई भविष्य न रहा । अब कोई इच्छा न बची । अब व्यक्ति तैयार है उसे जानने के लिए । जो है । अब कोई रुचि न रही इस बात में कि क्या हो सकता है ? क्या होना चाहिए या कि क्या होना चाहिए था । जरा भी रस न रहा । अब केवल उसी में रस है - जो है । क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें मुक्त कर सकता है । केवल वास्तविकता ही मुक्ति बन सकती है ।

बातों से भगवान कैसे मिलेगा

mera naam vijay tiwari hai aur main mumbai me rahta hun. Meri age 23 hai. Mujhe hans gyan ki dikhsha leni hai. Main aapse kab aur kahan mil sakta hun. Pls answer bhejiyega.( ई मेल से ) 
- आपको उस समय आगरा आना होगा । जब श्री महाराज जी यहाँ आये हुये हों । ये बात आप खुद महाराज जी से फ़ोन पर पूछ सकते हैं । यदि जल्दी हो । तो भी आप महाराज जी से ही बात कर लें कि वो कहां मिलेंगे ।

पोस्ट " इंसान अपना प्रारब्ध ( भाग्य ) लेकर पैदा होता है । " पर ।

 osho ji ka kehna tha ki unke liye aam taur par aastik aur naastik dono 1 hi kishti ( small ship ) mein sawaar hai.
( एकदम सत्य है । भले ही खुद को आस्तिक मानने वाले बुरा मान जांय । )
dono hi andh-vishwaasi hai. 1 ne ( naastik ) ne maan liya hai ki rabb nahi hai ( apni man-mat ) se and dusre ne ( aastik ) ne maan liya hai ki wo hai ( lekin isne bhi man-mat se ).iske bare mein kuch kahen. 
( बहुत साधारण बात है । मानी हुयी बात से कभी किसी को कैसा भी लाभ नहीं होता । आगे जाकर किसी समय विचार बदल भी सकता है । नहीं भी बदले तो किसी भी चीज को प्राप्त करने हेतु उस समस्त तकनीक से गुजरना ही होगा । जो उसके लिये आवश्यक है । उदाहरण विचार करें । एक छोटे बच्चे को शिक्षा दिलाने हेतु ही तमाम तकनीक से गुजरना होता है । तो फ़िर मान लेने से या बातों से भगवान कैसे मिल जायेगा ? )
and dusri baat 1 baar maine suna tha ( tv par ) ki behsaq naastik se naastik person bhi jab aakhri saansein le raha hota hai 
( आखिरी सांस नही । बल्कि किसी किसी को मृत्यु का आभास और अजीव दृश्य दिखाई देना ( लेकिन भृम नहीं ) चार दिन । दो दिन । एक दिन । और कुछ घन्टे पहले से । अलग अलग स्थिति के अनुसार होने लगता है । जिसे लोग अपने अपने भाव और मनस्थिति के अनुसार अपने परिजनों को बताते भी हैं । अकाल मृत्यु । आसन्न मृत्यु के लक्षण । एक महीने पहले से दिखाई देने लगते हैं । जिन्हें गिने चुने अनुभवी लोग और साधु संत प्रायः जान जाते हैं । )
and jab aatma physical body chor deti hai to bahut pachtata hai 
( अब पछताय होत का जब चिडिया चुग गयी खेत । )
( ki main agyaanta ke kaaran deh-abhimaan mein raha and khud ko jaan nahi paya ( क्योंकि उस समय विकराल यमदूत सामने होते हैं । कोई सहारा देने वाला नहीं । बन्धु बान्धव बेबस । और आज अब ग्रन्थियों के ताले खुलने से वह । वह सत्य देख रहा है । माया के प्रभाव से जीवन में जिसके वारे में सोचा तक नहीं । लेकिन गुरु के शिष्य के साथ ऐसा नहीं होता । उसे लेने यमदूत नहीं आते । मृत्यु के समय अचानक जो अनुभव होते हैं । इनसे ज्यादा अनुभव वो नाम जप के समय ही कर लेता है । उसे अब कहां जाना है । पता होता है । वह अपनी गाडी स्टार्ट करता है और मजे से ड्राइव करता हुआ । सीटी बजाता हुआ जाता है । )
lekin ab uske pass vishesh time nahi hota sirf pachtane ke.kuch batayein. 
( पछताने का मौका भी कुछ ही देर मिलता है । यमदूत मारते हुये कडी यातना देते हुये ले जाने लगते हैं । बस हाय हाय ही कर पाता है ।  )
and ye bhi suna hai ki ant kaal ( in the end of present life means physical body tyagne se pehle ) mein jo rabb ki taraf dhyaan laga le ya chintan kare to uska bhi der-sware kalyaan hota hai ? 
( ये बहुत अच्छी सुन्दर और गूढ रहस्य की बात है । वास्तव में कितना ही बडे से बडा पापी क्यों न हो । किसी भी कारण । अंतकाल में उसका ध्यान प्रभु से लग जाय । तो देर सबेर नहीं । उसी समय उसका कल्याण हो जाता है । क्योंकि मृत्यु के समय । सर्प काट लेने के बाद । बेहद भय में । बेहद संकट में इंसान की एकाग्रता आटोमेटिक इतनी जबरदस्त हो जाती है कि हिमालय में बैठे योगी बीसियों साल में नहीं कर पाते । ऐसी ही नंगी होती द्रोपदी । ग्राह द्वारा पकडे गज की हो गयी थी । इसी के लिये कहा जाता है । 
आस वास दुविधा सब खोई । सुरति एक कमल दल होई । 
पर ऐसा बिरले के साथ ही हो पाता है । क्योंकि मृत्यु के समय इस जन्म के कर्मो का रस निचोड कर अगली योनि या स्वर्ग नरक आदि का निर्धारण होता है । तब ये उसी तरह है । मानों फ़सल कटने के बाद बारिश हो । मतलब उस समय खुद के कर्मों का निचोड इस तरह हावी हो जाता है कि जीव खुद ब खुद 84 में उतर जाता है । इसको इस तरह समझे । कर्म रूपी ( शराब के ) फ़ल रूपी नशे ( 84 ) में चला जाता है । )

20 दिसंबर 2010

रात को लेकिन न तारे भूलते हैं


प्रेम बहुत शक्तिशाली संजीवनी है । प्रेम से अधिक कुछ भी गहरा नहीं जाता । यह सिर्फ शरीर का ही उपचार नहीं करता । सिर्फ मन का ही नहीं । बल्कि आत्मा का भी उपचार करता है । यदि कोई प्रेम कर सके । तो उसके सभी घाव विदा हो जाएंगे । तब तुम पूर्ण हो जाते हो । और पूर्ण होना पवित्र होना है । ओशो
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जो अच्छा लगे । वो करते जाओ । कोई गलत भी होगा । तो पीछे वाले अपने आप सही कर लेंगे । कुंआ बावड़ी रास्ते पर कांटा लगाना ना चाहिए । अपने सुख के लिए किसी की आत्मा पर चोट ना हो । बाकी मैं अपने आप ही कर लूंगा । जो भी करें । उसको देखते हुए करते चलो । और पूर्ण भी ।
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दुख पैदा होता है । क्योंकि हम बदलाव को होने नहीं देते । हम पकड़ते हैं । हम चाहते हैं कि चीजें स्थिर हों । यदि तुम स्त्री को प्रेम करते हो । तो तुम उसे आने वाले कल भी चाहते हो । वैसी ही जैसी कि वह तुम्हारे लिए आज है । इस तरह से दुख पैदा होता है । कोई भी आने वाले क्षण के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकता । आने वाले कल की तो बात ही क्या करें ? होश से भरा व्यक्ति जानता है कि जीवन सतत बदल रहा है । जीवन बदलाहट है । यहां 1 ही चीज स्थायी है । और वह है - बदलाव । बदलाव के अलावा हर चीज बदलती है । जीवन की इस प्रकृति को स्वीकारना । इस बदलते अस्तित्व को । उसके सभी मौसम और मूड के साथ स्वीकारना । यह सतत प्रवाह । जो 1 क्षण के लिए भी नहीं रुकता । आनंद पूर्ण है । तब कोई भी तुम्हारे आनंद को विचलित नहीं कर सकता । स्थाई हो जाने की तुम्हारी चाह तुम्हारे लिए तकलीफ पैदा करती है । यदि तुम ऐसा जीवन जीना चाहते हो । जिसमें कोई बदलाव न हो । तुम असंभव बात करना चाहते हो । होश से भरा व्यक्ति इतना साहसी होता है कि इस बदलती घटना को स्वीकार लेता है । उस स्वीकार में आनंद है । तब सब कुछ शुभ है । तब तुम कभी भी विषाद से नहीं भरते ।
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1 स्त्री 1 दूसरी स्त्री को किसी तीसरी स्त्री के संबंध में निंदा की बातें कह रही थी । पहली स्त्री बड़ी प्रसन्नता से सुन रही थी । जब पूरी बात हो गयी । तो उसने कहा - अरे, कुछ और सुनाओ । थोड़ा कुछ और बताओ । फिर क्या हुआ ? उस स्त्री ने कहा - अब छोड़ो भी । जितना मैं जानती थी । उससे दुगुना तो बता ही चुकी ।
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जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है ।
कोई उठता है और तूफ़ान का रुख मोड़ देता है ।
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जब तुमने होश पैदा ही नहीं किया । तो होश कहाँ से होगा ? जब हम सो जाते हैं । और जब तुम उठ जाते हो । और पूरी दिन भर की क्रिया बेहोशी ही में निबट जाती है । होश का मात्र पल भर आपका जीवन बदल देता है ।
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1 तो होता है - मनोरंजन । 1 होता है - आनंद । उत्सव । दोंनों में शरीर साथ होता है । लेकिन 1 में मन साथ होता है । शरीर के जिसको मनोरंजन कहते हैं । मन की प्यास । मन को खुश करना । और जो खुश होता है । वो नाराज भी जल्दी हो जाता है । और 1 है - उत्सव । जिसमें शरीर तो है । लेकिन चेतना में रहता है । जब हम चंग या गाना, गीत, जो भी करते हैं । तब तुम नही रहते । और भीतर की यात्रा शुरू हो जाती है । हां जी आप भी अनुभव करो । जीवन 1 अनुभव ही है । मारवाड़ी में कहते है - राम ही निक्लग्यो । वा रे रसियो । बुढा हो जावोला ।
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यह बात बड़ी गजब की कही बुद्ध ने - मां का पेट है क्या ? मल मूत्र का गड्डा है । वहां और है क्या ? बच्चा मल मूत्र में लिपटा ही पड़ा रहता है । 9 महीने तक । बारबार जन्म लेना । मल मूत्र के गढ्ढे में बारबार गिरना है ।
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सुख का अर्थ है । दुख गया । मगर राह देख रहा है किनारे पर खड़ा कि कब सुख से आपका छुटकारा हो । तो मैं फिर आऊं । कभी ज्यादा दूर नहीं जाता । सुख में दुख ज्यादा दूर नहीं जाता । ऐसे दरवाजे के पास खड़ा हो जाता है निकलकर कि ठीक है । आप थोड़ी देर सुख भोगो । फिर मैं आ जाऊं । सुख और दुख साथ साथ हैं । आनंद का अर्थ है । दुख सदा को गया । और जब दुख ही चला गया सदा को । तो सुख भी चला गया सदा को । सुख दुख का जोड़ा है । वे साथ साथ हैं । आनंद तो 1 परम शांति की दशा है । जहां न दुख सताता । न सुख सताता । जहां कोई सताता ही नहीं । जहां कोई उत्तेजना नहीं होती । सुख की भी उत्तेजना है ।
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निंदा में रस होता है । अगर कोई आदमी आए । और किसी की निंदा करने लगे । तो तुम हजार काम छोड़कर कहते हो - हां भाई ! और कुछ सुनाओ । फिर क्या हुआ ? फिर इसके आगे क्या हुआ ? फिर तुम्हें 1 खुजलाहट पैदा होती है । तुम हजार काम छोड़ देते हो । तुम भगवान की प्रार्थना कर रहे थे । तुम छोड़ देते हो । कोई निंदक आ गया । तुम कहते हो - छोड़ो । प्रार्थना फिर कर लेंगे । ये निंदक महाराज मिलें । न मिलें । इनको वैसे काम भी काफी रहता है । क्योंकि जो मिल जाता है । वही इनको घंटों रोक लेता है कि कहो भाई ! क्या खबर ?
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पंडित मत बनना । इन बातों को सुनकर । प्रज्ञा को जगाना । होश को जगाना । ये बातें तुम्हारा अनुभव बन जाएं । तो ही मुक्तिदायी हैं ।
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तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारे गले में फांसी का फंदा बनेगी 1 दिन -ओशो
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समझ लेना मेरी बात । क्या मैं कह रहा हूं ? नहीं तो तुम कहोगे । भगवान ने गलत बात कह दी । गीता पढ़ो । तो अशांति मिलती है । क्योंकि गीता पढ़ो । तो यह पता चलता है कि तुम कहां कीड़े मकोड़ों की तरह सरक रहे हो । उठो । पहाड़ खड़ा हो जाता है सामने । इसको चढ़ना पड़ेगा । अर्जुन चढ़ गया । तुम क्यों नहीं चढ़ रहे हो ? बेचैनी होती है । गीता पढ़कर शांति नहीं मिलती । जिनको मिलती है । उन्होंने गीता पढ़ी नहीं । गीता पढ़ोगे । तो अशात हो जाओगे । तब दुकानदारी नहीं कर सकोगे इतनी आसानी से । जैसी कर रहे हो । क्योंकि फिर अर्जुन कब बनोगे ? फिर यह कृष्ण चेतना का अनुभव कब करोगे ? फिर यह छोटी छोटी बातों में उलझे हो । इसमें नहीं उलझे रह सकोगे । फिर भगवान को कब पुकारोगे ? फिर समर्पण कब होगा ? फिर अर्पण कब होओगे ? यह समय बहा जा रहा है ।
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स्वाध्याय न करना । मंत्रों का मैल है । मंत्र तो सीख लिया । दोहरा दिया तोते की तरह । और उसका स्वाध्याय न किया । तो मंत्र पर धूल जम जाती है । फिर मंत्र मैला हो गया । मंत्र को साफ करो । निखारो । मंत्र में जरूर शक्ति है । जैसे दर्पण में चित्र बन सकता तुम्हारा । लेकिन धूल तो हटाओ । जैसे दर्पण पर धूल जम जाती है । ऐसा बुद्ध कहते हैं । मंत्र पर भी धूल जम जाती है । शास्त्र पर भी धूल जम जाती है । शब्द पर भी धूल जम जाती है । उसे झाड़ो । झाड़ोगे कैसे ? स्वाध्याय से । जो कहा है शब्द ने । उसे जीवन में उतारो । निखारो । पहचानो । परीक्षा करो । प्रयोग करो ।
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तारकों को रात चाहे भूल जाये । रात को लेकिन न तारे भूलते हैं ।
दे भुला सरिता किनारों को भले ही । पर न सरिता को किनारे भूलते हैं । आंसुओ से तर बिछुड़ने की घड़ी में । 1 ही अनुरोध तुमसे कर रहा हूं । हास पर संदेह कर लेना भले ही । आंसुओ की धार पर विश्वास करना । प्राण ! मेरे प्यार पर विश्वास करना । लोग कहते हैं कि भौंरा गुनगुनाता । किंतु मैं कहता कि वह है आह भरता । क्या पता रंगीन कलियों को कि उन पर । 1 जीवन में भ्रमर 100 बार मरता । तीर सी चुभती बिछुड़ने की घड़ी में । 1 ही अनुरोध तुमसे कर रहा हूं । जीत पर संदेह कर लेना भले ही । पर हृदय की हार पर विश्वास करना । प्राण ! मेरे प्यार पर विश्वास करना । अश्रु मेरे जा रहे मुझको गलाये । आग मेरी जा रही मुझको जलाये । रह न जाये द्वैत तुममें और मुझमें । जा रहा हूं इसलिए हस्ती मिटाये । सांझ सी धुंधली बिछुड़ने की घड़ी में । 1 ही अनुरोध तुमसे कर रहा हूं । जिंदगी पर मत भले करना भरोसा । पर मरण त्यौहार पर विश्वास करना । प्राण ! मेरे प्यार पर विश्वास करना ।

19 दिसंबर 2010

कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है


हंसी तीन तरह की होती है । पहली तरह की हंसी तो वह है । जब तुम किसी और के ऊपर हंसते हो । यह सबसे निम्न, घटिया और अश्लील हंसी होती है । इसमें हिंसा होती है । अपमान करने की भावना होती है । हंसी में कहीं गहरे प्रतिरोध का भाव होता है । दूसरे तरह की हंसी होती है । जब खुद पर हंसते हो । यह हंसी प्राप्त करने योग्य है । इसे विकसित करना होता है । जो व्यक्ति खुद पर हंस सके । वह मूल्यवान है । वह अश्लीलता के पार उठ जाता है । वह निम्न भावों घ्रणा, आक्रमण, हिंसा से ऊपर हो जाता है । और तीसरी प्रकार की हंसी सबसे ऊंची है । वह किसी पर भी नहीं होती । न दूसरे पर । न स्वयं पर । तीसरी हंसी अस्तित्वगत होती है । तुम पूरे अस्तित्व की बेबूझता पर हंसते हो । न भविष्य का कोई उद्देश्य । न शुरुआत में कोई शुरुआत । पूरे अस्तित्व की अवस्था ऐसी है कि अगर तुम इसे पूर्णता में देख लो । इतना अनंत विस्तार बिना किसी उद्देश्य और गंतव्य के चला जा रहा है । तो हंसी पैदा होगी । जब तुम पूरे अस्तित्व के पूरे मज़ाक को समझ लेते हो । वह सबसे उच्चतम हंसी है । और केवल कोई बुद्ध ही उस तरह हंस सकता है । लेकिन तुम अगर दूसरे प्रकार की हंसी भी हंस सको । तो अच्छा है । पहले प्रकार की हंसी से बचो । किसी दूसरे का उपयोग करके मत हंसो । हंसना ही है । तो खुद पर हंसो ।
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मनुष्य को छोड़कर । और कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है । जब तक कि मनुष्य किसी पशु को पागल न करना चाहे । तब तक कोई पशु अपने से पागल नहीं होता । न्यूरोटिक नहीं होता । जंगल में पशु पागल नहीं होते । सर्कस में पागल हो जाते हैं । जंगल में पशु विक्षिप्त नहीं होते । अजायबघर में । "जू' में विक्षिप्त हो जाते हैं । कोई पशु आत्महत्या नहीं करता । स्युसाइड नहीं करता । सिर्फ आदमी अकेला आत्महत्या कर सकता है । यह जो मनुष्य नाम का रोग है । इस रोग को सोचने, समझने, हल करने के दो उपाय किए गए हैं । एक मेडिसिन है उपाय - औषधि । और दूसरा ध्यान है उपाय - मेडिटेशन । ये दोनों एक ही रोग का इलाज हैं ।
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दूसरों का अनुभव कभी काम नहीं आता । जरुरी नहीं कि कृष्ण ने परमात्मा कहा । इसलिये हम परमात्मा शब्द को पकड के बैठ जाएं । ये कृष्ण की अनुभूति है । मुहम्मद ने अल्लाह कहा । नानक ने वाहेगुरु कहा । लेकिन वो उनकी अनुभूति है । असल में शब्द कहीं नहीं पहुंचाते । क्योंकि सत्य शब्दों से परे है । लेकिन हम ऐसे सुंदर शब्दों को ही पकड के बैठ जाते हैं । नतीजा हमारी अपनी भीतर की संपदा नहीं होती । क्योंकि हम हंमेशा बासी और उधार के धन में ही खुश रहते हैं । हमें प्रमाण देने के लिए दूसरों का उधार का धन बीच में रखना पडता है । जो कि हमारा अपना नहीं होता ।
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पूर्व धारणा से किया गया ध्यान का कोइ मोल नहीं है । सब धारणाएं तिरोहित हो जाती है । और जो शेष बचता है । वो ध्यान है । वो होँश है । सिर्फ अपनी हस्ती का बोध । सांस छूटती है । छूट जाय । विचार छूटते हैं । छूट जायं । लेकिन हस्ती नहीं छुटनी चाहिए । वरना आशुतोस महाराज की तरह फ्रिज में रखना पडेगा । क्योंकि महसूस करने वाला नहीं मरता । महसूस करने वाला मर जाए । तो एक ही जगाह है - शमशान । कापी पेस्ट ।
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धर्म भोग है । और जब मैं ऐसा कहता हूँ - धर्म भोग है । तो अनेकों को बड़ी घबराहट होती है । क्योंकि उनको खयाल है कि - धर्म त्याग है । ध्यान रहे । जिसने सोचा कि धर्म त्याग है । वह उसी गलती में पड़ेगा । वह इनवेस्टमेंट की गलती में पड़ जाएगा । त्याग जीवन का तथ्य है । इसे जीवन में पकड़ना नासमझी है । पकड़ रहा है । वह गलती कर रहा है । सिर्फ गलती कर रहा है । जो उसे मिल सकता था । वह खो रहा है । पकड़कर खो रहा है । जो उसका ही था । उसने घोषणा करके कि मेरा है । छोड दिया । लेकिन जिसने जाना कि सब परमात्मा का है । सब छूट गया । फिर त्याग करने को भी नहीं बचता कुछ । ध्यान रखना । त्याग करने को भी उसी के लिए बचता है । जो कहता है - मेरा है ।
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ओशो जिस प्रेम की बात कर रहें हैं । उसका सम्बन्ध विपरीत लिंगी से प्रेम करना नहीं है । वह समग्र प्रेम की बात कर रहें हैं । वह प्रेम लिंग भेद, वर्ण भेद, के पार समष्टि से है । समग्र प्रेम का अर्थ क्या है ? जिसमें स्त्री पुरुष, पशु पक्षी, नदी, पहाड, आकाश, चाँद, तारे, सूरज, हवा, फल, फूल, पेड़, पौधे, सुन्दर और कुरूप, स्वस्थ और अस्वस्थ समस्त सम्मिलित हैं । समाविष्ट हैं । अपनी पत्नी, बेटी, माता को छोड़ जगत से प्रेम मांगनें चले हो । प्रेम का सम्मान निजी रिश्तों में कभी किया नहीं । जगत को प्रेम का सम्मान करने का पाठ पढ़ाने चले हो । कैसे ज्यादा से ज्यादा लोग तुम्हारे जाल में फंसें । और आप लोग उनकी जेबें काट सको । सत्य तो ये है । आप लोग अकर्मण्य हो । आपकी रोटी भी इसी तरह की जालसाज़ियों से चल रही है । कापी पेस्ट ।
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खुद पर विजय प्राप्त करना । लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है -  महावीर ।
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सत पुरुष कबीर साहब ने बिना योनि के स्त्री की उत्पत्ति की थी ।
इससे सिद्ध होता है कि कबीर साहब नहीं चाहते थे कि कोई भी सम्भोग करे । लेकिन काल ने स्त्री में योनि लगा दी । फिर सबसे पहले काल ने ही सम्भोग किया । इससे यह सिद्ध होता है कि यह योनि काल का जाल है । और उसका उपयोग करने वाले लोग काल के इस ब्रह्माण्ड में ही फंसे रहेंगे । इसलिए किसी भी सतलोक के अभिलाषी भगत को सतपुरुष की इच्छा का सम्मान करते हुए सम्भोग नहीं करना चाहिए । और आज ही काल की इस निशानी को अपने घर से बाहर फेंक देना चाहिए । सत साहिब । कापी पेस्ट ।

आत्म दर्शन की पहली सीढ़ी ध्यान है

आप हमेशा कहते हैं कि - प्रेम ही परमात्मा है । प्रेम और परमात्मा का क्या संबंध है ?
- मैं जब कहता हूँ । प्रेम ही परमात्मा है । तब मैं यही कह रहा हूं कि - वे 2 नहीं हैं । इसलिए संबंध की बात ही मत पूछो । संबंध तो 2 में होता है । प्रेम ही परमात्मा है । प्रेम कहो । या परमात्मा कहो । 1 ही बात कही जाती है । और ज्यादा अच्छा होगा । तुम प्रेम ही कहो । क्योंकि परमात्मा के नाम पर इतनी घृणा फैलायी गयी है । परमात्मा के नाम पर आदमी ने इतनी हत्या की है । इतना अनाचार किया । अत्याचार किया है । इतना व्यभिचार किया है कि अब अच्छा होगा कि हम प्रेम शब्द को ही परमात्मा के सिंहासन पर पूरा विराजमान कर दें ।
प्रेम ही परमात्मा है । संबंध की तो पूछो मत । तुम यह पूछ रहे हो कि दोनों के बीच क्या संबंध है ? तुमने 2 तो मान ही लिया । नहीं । परमात्मा प्रेम से अलग कुछ भी नहीं है । जहां तुम्हारा प्रेम आया । जहा तुम्हारा प्रेम का प्रकाश पड़ा । वहीं परमात्मा प्रगट हो जाता है । इसीलिए तो तुम जिसको प्रेम करते हो । उसमें दिव्यता दिखायी पड़ने लगती है । प्रेम दिव्यता को अनावृत करता है । उघाड़ता है । तुम 1 साधारण स्त्री को प्रेम करो । साधारण पुरुष को प्रेम करो । तुम्हारे घर 1 बेटे का जन्म हो । उसको प्रेम करो । और अचानक तुम पाओगे कि जिस तरफ तुम्हारे प्रेम की दृष्टि गयी । वहीं दिव्यता खड़ी हो जाती है ।
यही तो प्रेमियों की अड़चन है । क्योंकि जहां उन्हें दिव्यता दिखायी पड़ जाती है कभी । फिर सिद्ध नहीं होती । तो बड़ी अड़चन खड़ी होती है । जिस स्त्री में तुमने दैवीय रूप देखा था । या जिस पुरुष में तुमने परमात्मा की झलक पायी थी । फिर जीवन के व्यवहार में वैसी झलक खो जाती है । नहीं बचती । तो पीड़ा होती है । लगता है । धोखा दिया गया । कोई धोखा नहीं दे रहा है । सिर्फ तुम्हारे पास जो प्रेम की आंख है । अभी इतनी स्थिर नहीं है कि तुम सदा किसी व्यक्ति में परमात्मा देख सको । जब जब तम्हारी आंख बंद हो जाती है । परमात्मा दिखायी पड़ना बंद हो जाता है । तो प्रेम शुरुआत में तो बड़ा दिव्य होता है । सभी प्रेम दिव्य होते हैं । फिर सभी पतित हो जाते हैं । क्योंकि आंखों की आदत नहीं है इतना खुला रहने की । जिस दिन तुम सारे जगत को प्रेम कर पाओगे । उस दिन सारे जगत में परमात्मा प्रगट हो जाएगा ।
मैं तुमसे कहता हूं ? प्रेम ही परमात्मा है ।
आ गया नूर जर्रे जर्रे पर । सितारे भी चमक उठे हैं कुछ और ।
रोशनी चांद की भी बढ़ गयी है । महककर फूल इठलाए हैं कुछ और ।
प्रेम की लहर के आते ही । प्रेम का झोंका आ जाए । आ गया नूर जर्रे जर्रे पर । तो 1 अदभुत प्रकाश कण कण पर दिखायी पड़ने लगता है । तुमने प्रेमी को चलते देखा ? जैसे जमीन की कशिश उस पर काम नहीं करती । जैसे वह उड़ा जाता है । जैसे उसे पंख लग गए हैं । तुमने प्रेमी की आंखें देखीं ? जैसे उनमें दीए जलने लगे हैं । तुमने प्रेमी का चेहरा देखा ? रोशन । कोई दिव्य आभा प्रगट होने लगती है ।
आ गया नूर जर्रे जर्रे पर । सितारे भी चमक उठे हैं कुछ और ।
रोशनी चांद की भी बढ़ गयी है । महककर फूल कुछ इठलाए हैं और ।
तुम्हारी आंख की 1 जुंबिश ने । जिंदगी ही मेरी बदल डाली ।
लबों से तुमने जो इकरार किया । शर्म आंखों की बढ़ गयी है कुछ और । जब निगाहें मिली थीं पहली बार । निकलता सा लगा दिल पहलू से ।
तुम्हारी आंखों की गहराई में । हर घड़ी डूबने लगा था कुछ और ।
इस खामोश मुहब्बत ने कभी । सुकून से हमें जीने न दिया ।
हंसकर जब भी कभी देखा तुमने । दिल की बेचैनी बढ़ गयी कुछ और ।
बड़ा एहसान तुमने मुझ पर किया । तड़पते दिल को सहारा देकर ।
कबूल करके यह खामोश सदा । बढ़ाया प्यार मेरी राहों में कुछ और ।
आ गया नूर जर्रे जर्रे पर । सितारे भी चमक उठे हैं कुछ और ।
रोशनी चांद की भी बढ़ गयी है । महककर फूल कुछ इठलाए हैं और ।
यह तो साधारण प्रेम की बात । यह तो उस प्रेम की बात । जो 2 मनुष्यों के बीच घट जाता है । उस प्रेम की तो बात ही क्या कहें । जो मनुष्य और समस्त के बीच घटता है । मैं उसी प्रेम की बात कर रहा हूं । 2 मनुष्यों के बीच जो घटता है । यह तो 2 बूंदों का मिलन है । और मनुष्य और अनंत के बीच जो घटता है । वह बूंद का सागर से मिलन है । 2 बूंदें मिलकर भी तो बहुत बड़ी नहीं हो पातीं । तुमने देखा । कभी कभी कमल के पत्ते पर 2 ओस की बूंदें सरककर 2 हो जाती हैं । तो भी बूंद तो बूंद ही रहती है । 1 बूंद बन गयी 2 की जगह । कोई बड़ा विराट तो नहीं घट जाता । थोड़ी सीमा बड़ी हो जाती है । तुम थोड़े आधे आधे थे । प्रेमी से मिलकर तुम थोड़े थोड़े पूरे हो जाते हो । तुम अकेले अकेले थे । प्रेमी से मिलकर तुम अकेले नहीं रह जाते । प्रेम का मार्ग - प्रार्थना का मार्ग । तुम देखो । हिंदू हैं । तो सीता राम की साथ साथ मूर्ति बनायी है कि राधा कृष्ण की कि शिव पार्वती की । ये प्रतीक हैं - ये मूर्तियां । प्रतीक हैं इस बात की कि जो प्रेम मनुष्य और मनुष्य के बीच घटता है । उसी प्रेम को फैलाना है । उसी प्रेम को इतना बड़ा करना है कि मनुष्य और अनंत के बीच घट जाए । ध्यान के मार्ग पर इसकी जरूरत नहीं होती । इसलिए महावीर अकेले खड़े हैं । इसलिए बुद्ध अकेले बैठे हैं । ध्यान के मार्ग पर दूसरे की जरूरत नहीं है । प्रेम के मार्ग पर दूसरे की जरूरत है । प्रेम तो दूसरे के बिना फलित ही न हो सकेगा । इसलिए ध्यान के मार्ग पर परमात्मा की धारणा की भी जरूरत नहीं है । लेकिन प्रेम के मार्ग पर तो परमात्मा की धारणा अनिवार्य है । अपरिहार्य है । तो जब मैं तुमसे कहता हूं । प्रेम परमात्मा है । तो मैं भक्त की भाषा बोल रहा हूं । तुम्हें जो रुच जाए । तुम्हें जो ठीक पड़ जाए । अगर तुम्हें ऐसा लगता हो कि प्रेम में तुम सरलता से पिघल पाते हो । तुम्हारी आंखों से आंसुओ की धार बहने लगती है सुगमता से । तुम्हारा दिल डोलने लगता है । तुम नाचने लगते हो । तुम्हारा मन मयूर नाचने लगता । तुम्हारे भीतर 1 छंद पैदा होता है । 1 स्फुरणा होती है । रोआ रोआ किसी रोमाच से पुलकित हो जाता है । अगर तुम्हारे भीतर प्रेम का भाव रोमांच लाता हो । तो पहचान लेना कि तुम्हारे लिए भक्ति ही द्वार है । अगर तुम्हें प्रेम का शब्द खाली निकल जाता हो । प्रेम के शब्द से कुछ न होता हो । न आंख में आंसू झलकते हों । न हृदय में कोई धड़कन होती हो । न रोमांच होता हो । अगर प्रेम का शब्द खाली खाली निकल जाता हो । कोरा कोरा । इस शब्द में कोई प्राण ही न मालूम पड़ते हों । तो तुम इस बात को छोड़ देना । फिर कोई जरूरत नहीं है । हमेशा खयाल रखना । जो मार्ग तुम्हारे लिए न हो । उस पर श्रम मत करना । क्योंकि वह सारा श्रम व्यर्थ जाएगा । जिद मत करना । ऐसा मत कहना कि मैंने तो चुन लिया । इसी पर अटका रहूंगा । मेरे पास बहुत से लोग आते हैं । वे कहते हैं - हम बहुत दिन से प्रार्थना कर रहे हैं । कुछ परिणाम नहीं हुआ । तो हमने कोई पाप किए हैं ? हमने कोई पिछले जन्मों में बुरे कर्म किए हैं ? जब मैं देखता हूं गौर से । तो यह पाता हूं कि न तो कोई पाप किए हैं । क्या पाप करोगे तुम ? पाप करने को हैं क्या बहुत ? यह पाप करने की धारणा भी कर्ता का ही हिस्सा है । करने वाला तो परमात्मा है । तुम क्या पाप करोगे । क्या पुण्य करोगे । यह कर्म का जो हमारा सिद्धात है कि कर्म किए । यह भी कर्ता का ही हिस्सा है । यह अज्ञान का ही बोध है । न तो तुमने कुछ पाप किए । न पुण्य किए हैं । जो उसने करवाया है । करवाया है । जो हुआ है । हुआ है । फिर तुम क्यों अटके हो ? अटके इसलिए हो कि तुम उस द्वार से प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हो । जो तुम्हारा द्वार नहीं है । प्रार्थना तो कर रहे हो वर्षों से । लेकिन प्रार्थना तुम्हारा द्वार नहीं है । फिर समझाने को तुम सोच लेते हो कि पाप किए होंगे । इसलिए बाधा पड़ रही है । नहीं कोई बाधा पड़ती । तुम ध्यान से तलाशो । अगर प्रार्थना से नहीं मिल रहा है तो । कुछ लोग हैं । जो ध्यान पर लगे हुए हैं । कुछ नहीं हो रहा है । उनको मैं कहता है - तुम प्रार्थना से तलाशो । मेरी नजर मार्ग पर नहीं है । मेरी नजर तुम पर है । मेरे लिए यह बात बहुत अर्थ पूर्ण नहीं है कि - तुम किस मार्ग से पहुंचते हो । मेरे लिए यही बात अर्थ पूर्ण है कि - तुम पहुंचते हो । पहुंच जाओ । किसी वाहन पर सवार होकर - घोड़े कि हाथी पर कि पैदल कि बैलगाड़ी में । कैसे भी पहुंच जाओ । वाहन की बहुत चिंता मत करो । वाहन तुम्हारे लिए है । तुम वाहन के लिए नहीं हो । अब तक पृथ्वी पर मार्गों पर बहुत जोर दिया गया । तुम भक्त से पूछो । तो वह भक्त की ही बात को कहेगा । वह कहेगा - सिर्फ भक्ति से ही पहुंच सकते हो । वह आधी बात सच कह रहा है । आधे लोग भक्ति से पहुंच सकते हैं । तुम ध्यानी से पूछो । ज्ञानी से पूछो । वह कहता है - ध्यान के मार्ग से ही कोई पहुंचता है । भक्ति के मार्ग से कैसे पहुंचोगे । वह सब कपोल कल्पना है । वह भी आधी बात सच कह रहा है । आधे लोग ध्यान से पहुंचे हैं । आधे लोग भक्ति से पहुंचे हैं । और लोग उस मार्ग पर चलने की चेष्टा करते रहे । जो उनका नहीं था । जिस मार्ग के साथ उनके हृदय का मेल नहीं बैठता था । वे कभी नहीं पहुंचते हैं । वे भटकते ही रहे हैं । तुम अगर भटक रहे हो । तो बहुत संभावना यही है कि तुम ऐसे द्वार से प्रवेश कर रहे हो । जो तुम्हारा द्वार नहीं है । तो जब मैं कहता हूं - प्रेम परमात्मा है । तो मेरा अर्थ है । उन आधे लोगों के लिए । जो प्रेम से ही प्रवेश पा सकेंगे । यह उनके लिए कह रहा हूं । सबको इसे मान लेने की जरूरत नहीं है । जिनको यह बात न जमती हो । वे इसे छोड़ दें ।
मगर हम बडे परेशान होते हैं । कभी कभी हम ऐसी बातों के लिए परेशान होते हैं । जिनका कोई प्रयोजन नहीं होता है ।
कल 1 मित्र, बुद्धिमान मित्र, रात मिलने आए । प्रश्न पूछा । तो अजीब सा प्रश्न पूछा । प्रश्न यह पूछा कि - परशुराम को अवतार क्यों कहा जाता है । क्योंकि उन्होंने तो सिर्फ हिंसा की । मारकाट की । पृथ्वी को क्षत्रियों से खाली कर दिया । विध्वंस ही विध्वंस । उनको अवतार क्यों कहा जाता है ? अब पहली तो बात यह कि क्या लेना देना - परशुराम से । तुम्हें अवतार न जंचते हों । क्षमा करो । उनको जाने दो । कोई परशुराम तुम पर मुकदमा नहीं चलाएंगे कि तुमने हमें अवतार क्यों नहीं माना । भूलो । क्या लेना देना परशुराम से । हुए भी कि नहीं हुए । इसका भी कुछ पक्का नहीं है । तुम क्यों अड़चन ले रहे हो ? अब दूर से, दिल्ली से चलकर मुझसे मिलने आए हैं । और मिलकर पूछा यह ।
फिर अगर ऐसा लगता है कि परशुराम का मामला हल ही करना होगा । तभी तुम आगे बढ़ सकोगे । जो कि मेरी समझ में नहीं आता कि क्यों । परशुराम से क्या प्रयोजन है । बुद्धि की खुजलाहट है । नहीं जंचती बात । नहीं जंचती । अब उन पर अहिंसा का प्रभाव होगा । महावीर और बुद्ध का प्रभाव होगा । उनके मन में यह बात जंचती होगी कि अवतारी पुरुष तो अहिंसक होना चाहिए । कुछ कल्याण का काम करे । विध्वंस । इसको अवतार क्यों कहना ? तो तुम्हें अगर महावीर और बुद्ध की बात ठीक जमती है । तो महावीर और बुद्ध के मार्ग वाले परशुराम को अवतार कहते भी नहीं । तुम फिकर छोड़ो । लेकिन अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम्हारी गांठ परशुराम से बंधी है । और तुम्हारा मन मानने का करता है कि होने तो चाहिए अवतार । और फिर ये और दूसरी धारणाएं बाधा डालती हैं । तो दूसरी धारणाओं को छोड़ो । फिर समझने की कोशिश करो । हिंदू विचार तो समस्त जगत को दैवीय मानता है । दिव्य मानता है । हिंसा भी । और अहिंसा भी । सृजन भी । और विध्वंस भी । वह भक्त की धारणा है । भक्त कहता है - भगवान हजार रूप में प्रगट होता है । सब रूप उसके । कभी वह विध्वंसक के रूप में भी प्रगट होता है । क्योंकि विध्वंस किसका ? उसका ही । वही कर्ता है । हम तो कोई कर्ता नहीं हैं । कभी वह बुद्ध की तरह प्रगट होता है - करुणा का सागर । और कभी वह परशुराम की तरह प्रगट होता है - फरसे को हाथ में लिए हुए । अति कठोर । कभी वह चट्टान की तरह प्रगट होता है । और कभी फूल की तरह भी । चट्टान भी वही है । और फूल भी वही है । दोनों वही है । फिर उसका प्रयोजन ? वही जाने । अगर हमारी समझ में नहीं पड़ता । क्योंकि हमें लगता है । हमारे मूल्य के विपरीत जाती है यह बात कि कोई आदमी हिंसा कर रहा है । तो इस हिंसा का क्या प्रयोजन ? कभी कभी हिंसा का भी प्रयोजन है । कभी कभी बुराई से भी लड़ना होता है । और कभी कभी हिंसा से लड़ने का 1 ही उपाय होता है - हिंसा । क्षत्रिय तो हिंसा का प्रतीक है । जब हम कहते हैं - परशुराम ने सारी दुनिया को क्षत्रियों से खाली कर दिया । तो हम इतना ही कह रहे हैं कि - परशुराम ने सारी दुनिया को हिंसा से खाली कर दिया । मगर क्षत्रियों से जूझना हो । तो क्षत्रिय होकर ही जूझा जा सकता है । और कोई उपाय नहीं है । वे तो तलवार की भाषा ही समझते हैं । अब तुमको ऊपर से तो देखने में लगेगा कि परशुराम हिंसक हैं । अगर भीतर गौर से इस प्रतीक में झांकोगे । तो पता लगेगा कि परशुराम ने दुनिया से हिंसा को मिटाने का जैसा वृहत आयोजन किया । वैसा न बुद्ध ने किया । न महावीर ने । बुद्ध और महावीर तो समझाते रहे कि - भई, हिंसा मत करो । परशुराम तो लेकर फरसा और जूझ पड़े कि मिटा ही डालेंगे । हिंसा की जड़ों को काट डालेंगे । मगर 1 मजे की बात देखते हो । न बुद्ध के और महावीर के समझाने से हिंसा जाती है । न परशुराम के 18 बार क्षत्रियों को काट डालने से हिंसा जाती है । तो इसमें 1 और गहरा सत्य छिपा है कि इस जगत से द्वंद्व कभी नष्ट होता ही नहीं । बुराई और भलाई साथ साथ हैं । हिंसा अहिंसा साथ साथ हैं । करुणा कठोरता साथ साथ हैं । ऐसा कभी भी नहीं होगा कि तुम 1 को काटकर गिरा दोगे । बुद्ध महावीर समझाकर न गिरा सके । और परशुराम ने तो बड़ी चेष्टा की । भयंकर चेष्टा की । बड़ा श्रम लिया कि सारे क्षत्रिय काटते गए कि - न रहेगा बांस । न बजेगी बासुरी । मगर फिर फिर हिंसा उभर आयी । इस जगत से द्वंद्व नष्ट नहीं होने वाला । यह कथा का गहरा अर्थ है । तो फिर क्या करें ? तुम द्वंद्व के बाहर हो सकते हो । जगत से द्वंद्व नहीं मिटने वाला । तुम द्वंद्व के बाहर हो सकते हो । जगत से द्वंद्व कभी नहीं मिटेगा । हाँ । तुम जब चाहो । तब द्वंद्व से बाहर सरक जाओ । और उस सरक जाने की कला ही है - साक्षी भाव । तुम साक्षी हो जाओ । न अहिंसक । न हिंसक । न इधर । न उधर । तुम मध्य में खड़े होकर बीच से निकल जाओ । तुम कह दो कि - अब मैं कर्ता नहीं हूं । लेकिन व्यर्थ के प्रश्नों में मत उलझो । व्यर्थ के बौद्धिक प्रश्नों में मत उलझो ।
अगर ध्यान में रुचि है । तो ध्यान में डूब जाओ । फिर प्रेम के संबंध में प्रश्न ही मत पूछो । समय कहां है । व्यर्थ क्यो समय गंवाते हो ? कल का पक्का नहीं है । 1 क्षण बाद का पक्का नहीं है । अगर प्रेम की बात जंचती है । तो ध्यान की बात भूलो । और प्रेम में डुबकी ले लो । समय नहीं है ज्यादा । लेकिन मैं अक्सर देखता हूं कि लोग इस तरह की बातों में बड़ा श्रम लगाते हैं । अब जिन मित्र ने यह पूछा । वह निश्चित ही चिंतित हैं । चिंता जरा व्यर्थ मालूम होती है । लेकिन वह चिंतित हैं । इसमें कोई शक नहीं है । और प्रामाणिक उनकी परेशानी मालूम होती है । उनके चेहरे पर बड़े बल पड़ गए हैं । परशुराम को अवतार क्यों कहा जाता है ? मुझसे बात करने के बाद भी । मेरे समझाने के बाद भी । उन्होंने कहा कि - अभी तो ज्यादा समय नहीं है आपके पास । फिर कभी आऊंगा । मगर उनको अभी बात जंची नहीं है । यह बात नहीं जंची कि - यह व्यर्थ है । इसे छोड़ें । इससे क्या लेना देना । मतलब । अभी वह सोच विचार जारी रखेंगे । परशुराम न हुए । रोग हो गए । और परशुराम ने हिंसा की । या नहीं की । तुम परशुराम को पकड़कर अपने जीवन के साथ जो हिंसा कर रहे हो । वह तुम्हारी समझ में नहीं आती । जिससे प्रयोजन न हो । उसके संबंध में विचार करने की भी जरूरत नहीं । इतना भी क्यों अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा को व्यय करो । तो यदि तुम्हारे जीवन में प्रेम है । और तुम्हें लगता है कि प्रेम में तुम्हें सुविधा मिलेगी । सुगम मालूम होता है - उतरो । फिर तुम पाओगे कि - प्रेम में जैसे जैसे उतरे । परमात्मा में उतरे । 1 दिन तुम पाओगे कि - प्रेम की पराकाष्ठा ही परमात्मा है । न हो रस प्रेम में । तो इस तरह के प्रश्नों में मत उलझो । तुम ध्यान में उतरो । और 2 के अतिरिक्त तीसरा कोई मार्ग नहीं है । इसलिए निर्णय करना बहुत कठिन नहीं है । अच्छा ही है कि - 2 ही मार्ग हैं । 2 ही मार्ग के रहते भी तुम निर्णय नहीं कर पा रहे । अगर और बहुत ज्यादा मार्ग होते । तो बड़ी अड़चन हो जाती । फिर तो निर्णय कभी न हो पाता । दोनों पर प्रयोग करके देख लो । कभी कभी ऐसा भी होता है कि अनिर्णय की स्थिति होती है । ऐसा भी लगता है कि - प्रेम ठीक । ऐसा भी लगता है - ध्यान ठीक । तो दोनों पर प्रयोग करके देख लो । 1 वर्ष पूरा का पूरा भक्ति में डुबा दो । मिल गया तो ठीक । फिर दूसरे पर प्रयोग करने की जरूरत न रह जाएगी । लेकिन पूरा लगा दो । न मिला । तो भी एक बात तय हो जाएगी कि - यह मेरा मार्ग नहीं है । अधूरे अधूरे कुनकुने लोगों को बड़ी तकलीफ है । न तो कभी हृदय पूर्वक किया है । इसलिए तय ही नहीं हो पाता कि - मेरा मार्ग है । या नहीं है । मैं तुमसे कहता हूं । जो भी तुम पूरे रूप से कर लोगे । उसमें से निर्णय बाहर आ जाएगा । पूर्ण कृत्य निर्णायक होता है । या तो दिखेगा । यह मेरा मार्ग है । फिर तो चल पड़े । फिर तो लौटने की कोई जरूरत न रही । या दिख जाएगा कि - यह मेरा मार्ग नहीं है । तो भी झंझट मिट गयी । दूसरा फिर तुम्हारा मार्ग है । फिर कोई अड़चन न रही । हर हालत में निर्णय आ जाएगा ।
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बुद्ध सदा कहते थे - अपने पर दया करो । वह नहीं कहते थे - दूसरों पर दया करो । दूसरों पर तुम कैसे दया करोगे ? जब तक अपने पर ही दया नहीं की । जो आदमी अपने पर ही नाराज है । वह पूरे संसार से नाराज रहेगा । और जो आदमी अपने पर दया करता है । वह किसी पर नाराज न रहेगा । जिसने अपने को प्रेम करना सीख लिया । वह सारे संसार को प्रेम करना सीख लेगा ।
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मेरा सन्यासी हँसता गाता होना चाहिए । उदास नहीं । जिसने जन्म मृत्यु का मर्म समझ लिया । फिर क्या उदासी ? फिर तो जीवन उत्सव हो गया । आनन्द हो गया । फिर तो बस नदी सा बहना हो गया । सम्पूर्ण समर्पण हो गया । जन्म मृत्यु जीवन रुपी धागे के 2 छोर हैं । इनके बीच का उत्सव बोधत्व है । सन्यास है । जीवन का सम्पूर्ण संज्ञान यही है कि आप अपने जीवन को कितने उत्सव के साथ जीते हैं । विपरीत परिस्थतियों में भी । कठिनतम को भी । सन्यास भाव सहज और आसान बना देता है । सन्यास का अर्थ कतई हिमालय पर जाने से नहीं हो सकता । क्योंकि सच्चा सन्यासी कभी गैर जिम्मेदार नहीं हो सकता । इसी जीवन में । इन्ही सम्बन्धो के साथ । अपने कर्तव्य को हँसते खेलते पूरा करना । और वो भी बुद्धत्व के साथ । अर्थात सांसारिक कटुता, लोभ, मोह, क्रोध, जय, पराजय के भाव पर विजय करके सम भाव से जीवन जीना । बुद्धत्व का भाव तो और भी गहरा है । जीवन उत्सव तो है ही । साथ में कल्याण का भाव भी है । परम के प्रति परम आभार का भाव भी है । और इसी आत्म दर्शन की पहली सीढ़ी ध्यान है । पता नहीं । कब ये ध्यान नृत्य पूर्ण हो जाता है । 

16 दिसंबर 2010

वे कहेंगे - प्रेम यानी पागलपन



जिस दिन कोई व्यक्ति इस सत्य को समझने में समर्थ हो जाता है कि जब तक मैं आवश्यकता की पूर्ति खोजता रहूंगा । तब तक मैं 1 वर्तुल में घूमूंगा । रोज भूख लगेगी । रोज खाना कमा लूंगा । रोज खाना खा लूंगा । फिर भूख मिट जाएगी । कल फिर भूख लगेगी । फिर भोजन । फिर भूख । फिर भोजन । भोजन से कुछ सुख न मिलेगा । सिर्फ भूख से जो दुख मिलता था । वह न होगा । सांसारिक आदमी की परिभाषा यही है । जो केवल सुविधा खोज रहा है । असुविधा न हो । आध्यात्मिक आदमी का अर्थ यही है कि जो इस सत्य को समझ गया कि सुविधा सब भी मिल जाए । तो जीवन में फूल नहीं खिलते । न सुगंध उठती । न गीत बजते । नहीं । जीवन की वीणा खाली ही पड़ी रह जाती है । इसलिए मैं धर्म को आभिजात्य कहता हूं । आभिजात्य का अर्थ है । इसका कोई प्रयोजन नहीं है । यह प्रयोजन हीन, प्रयोजन शून्य या कहो प्रयोजन अतीत । और तुम्हारे जीवन में जब भी कभी कोई प्रयोजन अतीत उतरता है । वहीं थोड़ी सी झलक आनंद की मिलती है । जैसे - प्रेम में । प्रेम का क्या अर्थ है । क्या सार है ? खाओगे ? पीयोगे ? ओढोगे ? क्या करोगे प्रेम का ? न अगर कोई तुमसे पूछने लगे कि क्या पागल हो रहे हो । प्रेम से फायदा क्या है ? बैंक बैलेंस तो बढ़ेगा नहीं । मकान बड़ा बनेगा नहीं । प्रेम से फायदा क्या है ? क्यों समय गंवाते हो ? इसलिए तो राजनीतिज्ञ प्रेम व्रेम के चक्कर में नहीं पड़ता । वह सारी शक्ति पद पर लगाता । प्रेम पर नहीं । धन का दीवाना । धन का आकांक्षी । सारी शक्ति धन को कमाने में लगाता है । प्रेम -  वह कहता है । अभी नहीं । अभी फुर्सत कहां ? फिर प्रेम का प्रयोजन भी कुछ नहीं दिखाई देता । स्व तरह का पागलपन मालूम होता है । तुम व्यावहारिक लोगों से पूछो । वे कहेंगे - प्रेम यानी पागलपन । लेकिन प्रेम में थोड़ी सी झलक मिलती है - उसकी । जो प्रयोजन हीन है । जिसका कोई अर्थ नहीं । फिर भी परम रसमय है । फिर भी परम विभामय है । फिर भी सच्चिदानंद है ।
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1 - 10 तोला घी के हवन से 1 टन आक्सीजन निर्माण होता है I
2 -  गौ वंश आधारित खेती से ही सारा विश्व सुखी, समृद्ध व स्वालंबी जीवन जी सकता है I
3  -  5 लीटर गौ मूत्र में 100 धतूरे के पान काटकर मिला दें । और गौ मूत्र मिश्रण में 15 लीटर पानी मिलाकर प्रातःकाल फवार दें । तो मच्छर व लटें नष्ट होती हैं I
4 - 10 किलो गौ मूत्र में 2 किलो नीम के पत्ते मटके में भिगोकर 10 दिन रख दें I फिर इस 1 किलो गौ मूत्र में 10 किलो पानी मिलाकर किसी फसल पर 15 दिन से नियमित छिङक दें । तो फसल पर रोग नहीं लगेगा I
5 - गोबर गैस में गौ वंश के गोबर का उपयोग अधिक लाभकारी है I
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14 दिसंबर 2010

क्योंकि ये लीला अपरम्पार है कुलदीप जी ।


Hello Rajeev Ji... Aaj bahut dino ke baad aapke gyaan ki baate parne ko mili, par aap 2 mahine se kahan the, main hamesha aapke article ki pratiksha me rehta tha ke kuch aur gyaan mil jaye... kai bar socha ke apko ya guruji ko phone karu par man me aya ke shayad thek nahi hoga aise mera puchna ..

khair.. achha rajeev ji mujhe ye bataiye ke bina bhojan ke insaan ka shareer kaise jivit reh sakta hai, kya hum bina bhojan ke bhi apna jivan gujar sakta hun, kyonki maine kuch samay pehle tv par ek program dekha ke jabalpur me koi bahut purane baba hai (naam to main bhul gya) jo pichle 15 saal se bina kuch khaye jivit hai, un par kai scientific test huye par kuch pta nahi chala... kya ye sambhav hai....?? Dhnyavad....!! kuldeep singh..( EMAIL से ) ये 

परमात्मा की लीला बडी विलक्षण है । जिन बाबा की आप बात कर रहे हैं । उनको एक बार न्यूज में मैंने भी देखा था । वे कमजोर शरीर के थे । वे कोई योग बगैरा करते थे ? ये भी ठीक मुझको पता नही है । आपकी बात का उत्तर देने से पहले एक बात याद आ गई । लगभग 15 साल पहले अछल्दा दिबियापुर में एक गांव के बाहर मंदिर में मैं 15 दिन के लिये रुका था । वहां एक सच्चे योगी रहते थे । जिनकी आयु और कहां से आये है । इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं था । कोई उन्हें 200 तो कोई 400 साल आयु का बताता था ।

पर उनका सुगठित शरीर 20 साल के नौजवान जैसा पुष्ट था । एकदम सफ़ेद बाल । सफ़ेद दाढी । और सौम्य शान्त परिपक्व मुख । यानी मुख देखने से 80 का अहसास तो होता था । पर बाडी देखकर हैरानी होने लगती थी । वे सिर्फ़ कमर पर एक धोती बांधते थे और कमर से ऊपर निर्वस्त्र रहते थे । वे पूरे दिन एक कठिन आसन में तखत पर बैठे रहते थे । और शाम को मंदिर में ही अंडरग्राउंड गुफ़ा में चले जाते थे । जिसमें जाने की किसी को इजाजत नहीं थी । सबसे बडी बात ये थी कि तीन चार दिन में अपने एकमात्र शिष्य के बेहद आग्रह पर वो शाम को एक बार आधा टिक्कर ( साधुओं की हाथ की बनी रोटी ) मुश्किल से खाते थे ।

उनके शिष्य ने बताया । मैं भी इसी का अभ्यास कर रहा हूं । इसमें पहले कम भोजन । फ़िर पत्ते । फ़िर पानी । फ़िर वायु का आहार करने का अभ्यास किया जाता है । संयम करते करते धीरे धीरे खाना छूट जाता है । यह सब 15 दिन तक मैंने स्वयं देखा । तो कहने का मतलब ये कि TV वाले बाबा फ़िर भी कमजोर नजर आते थे । और 70 साल के थे । ये तो 24 घंटे तरोताजा दिखते थे ।

टेरी कोहाट सिंध ( अब पाकिस्तान ) के कायस्थ परिवार के स्वरूपानन्द जी ( अब अशरीर ) जिनका नंगली साहिब ( मेरठ ) में विशाल ( 16 किमी दायरे में ) आश्रम है । तपोभूमि नगला पदी आगरा में अपनी तपस्या के दौरान 12 साल तक निराहार रहे । इन्ही के गुरछपरा बिहार के अद्वैतानन्द जी भी ग्यान प्राप्ति के दिनों में काफ़ी समय तक निराहार रहते थे । अब आपकी बात का उत्तर देता हूं । विभिन्न वासनाओं के जाग्रत रहने से । और शरीर के द्वारा अलग अलग कार्य करने के अनुसार हमें भोजन की आवश्यकता होती है । जो लोग कम मेहनत करते हैं । उनको कम भोजन चाहिये होता है ।

5 तत्वों से बने इस शरीर में जल तत्व की जल द्वारा । वायु की वायु द्वारा । अग्नि और प्रथ्वी की भोजन द्वारा आपूर्ति होती है । तत्व में विशेष कमी हो जाने पर ( बीमारी में ) रसायन ( दवा ) आदि के द्वारा उसको पूरा किया जाता है । तत्वों के क्षय होने से ही बुढापा आता है । अधिक क्षीण हो जाने पर शरीर की मृत्यु हो जाती है । योगी इन तत्वों पर संयम ( ठहराव ) करना जानते है । जल तत्व पर संयम करने से प्यास प्रथ्वी पर संयम करने से भूख आदि को जीत लिया जाता है । संयम करने के और भी लाभ होते है । जैसे जल तत्व को सिद्ध करने पर जल पर भूमि के समान चलना । और झील या समुद्र की गहराई ( तल ) में नार्मली बिना सांस आदि रोके ऐसे बैठना । जैसे जमीन पर बैठे हों । आराम से होता है ।

लेकिन बिना किसी योग के भी आम इंसान में ऐसी क्रियायें कभी कभी घटित होती देखी गयी हैं । जैसी आपने TV पर देखी । इसमें किसी कारणवश मन क्रियारहित हो जाता है । और उसकी एक विशेष कनेक्टिविटी ब्रेन के दाहिने हिस्से से हो जाती है । जो आम आदमी का लाक होता है । यह सिद्ध क्षेत्र है । इस तरह आटोमेटिक आदमी के तत्वों की पूर्ति किसी योगी के तरह ही बिना खाये पिये ही होती रहती है । और वह जीवित रहता है । हालांकि में पक्का तो नहीं कह सकता । पर उन बाबा को जो क्रिया उनके शरीर में हुयी । उसका एक योगी की तरह उन्हें ग्यान नहीं है । क्योंकि ऐसा होता तो उनका शरीर भी नौजवान की तरह होता । साइंटिफ़िक टेस्ट की बात छोड दीजिये । कई बार महात्माओं के घरवालों के द्वारा उनके थोडा बीमार पड जाने पर जबरदस्ती डाक्टर को दिखाने पर जब डाक्टर के द्वारा उनका ब्लड प्रेशर आदि चेक किया गया । तो वो भोंचक्का होकर बोले । कमाल है । आप आराम से चल रहे है । जबकि आपका ब्लड प्रेशर 120 to 230 है । ऐसी हालत में तो इंसान खडा नहीं हो पाता । दूसरी अन्य क्रियाओं से भी बिना भोजन के जीने की स्थिति बन जाती है । क्योंकि ये लीला अपरम्पार है कुलदीप जी ?

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