19 दिसंबर 2010

कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है


हंसी तीन तरह की होती है । पहली तरह की हंसी तो वह है । जब तुम किसी और के ऊपर हंसते हो । यह सबसे निम्न, घटिया और अश्लील हंसी होती है । इसमें हिंसा होती है । अपमान करने की भावना होती है । हंसी में कहीं गहरे प्रतिरोध का भाव होता है । दूसरे तरह की हंसी होती है । जब खुद पर हंसते हो । यह हंसी प्राप्त करने योग्य है । इसे विकसित करना होता है । जो व्यक्ति खुद पर हंस सके । वह मूल्यवान है । वह अश्लीलता के पार उठ जाता है । वह निम्न भावों घ्रणा, आक्रमण, हिंसा से ऊपर हो जाता है । और तीसरी प्रकार की हंसी सबसे ऊंची है । वह किसी पर भी नहीं होती । न दूसरे पर । न स्वयं पर । तीसरी हंसी अस्तित्वगत होती है । तुम पूरे अस्तित्व की बेबूझता पर हंसते हो । न भविष्य का कोई उद्देश्य । न शुरुआत में कोई शुरुआत । पूरे अस्तित्व की अवस्था ऐसी है कि अगर तुम इसे पूर्णता में देख लो । इतना अनंत विस्तार बिना किसी उद्देश्य और गंतव्य के चला जा रहा है । तो हंसी पैदा होगी । जब तुम पूरे अस्तित्व के पूरे मज़ाक को समझ लेते हो । वह सबसे उच्चतम हंसी है । और केवल कोई बुद्ध ही उस तरह हंस सकता है । लेकिन तुम अगर दूसरे प्रकार की हंसी भी हंस सको । तो अच्छा है । पहले प्रकार की हंसी से बचो । किसी दूसरे का उपयोग करके मत हंसो । हंसना ही है । तो खुद पर हंसो ।
*************
मनुष्य को छोड़कर । और कोई पशु पागल होने में समर्थ नहीं है । जब तक कि मनुष्य किसी पशु को पागल न करना चाहे । तब तक कोई पशु अपने से पागल नहीं होता । न्यूरोटिक नहीं होता । जंगल में पशु पागल नहीं होते । सर्कस में पागल हो जाते हैं । जंगल में पशु विक्षिप्त नहीं होते । अजायबघर में । "जू' में विक्षिप्त हो जाते हैं । कोई पशु आत्महत्या नहीं करता । स्युसाइड नहीं करता । सिर्फ आदमी अकेला आत्महत्या कर सकता है । यह जो मनुष्य नाम का रोग है । इस रोग को सोचने, समझने, हल करने के दो उपाय किए गए हैं । एक मेडिसिन है उपाय - औषधि । और दूसरा ध्यान है उपाय - मेडिटेशन । ये दोनों एक ही रोग का इलाज हैं ।
*********
दूसरों का अनुभव कभी काम नहीं आता । जरुरी नहीं कि कृष्ण ने परमात्मा कहा । इसलिये हम परमात्मा शब्द को पकड के बैठ जाएं । ये कृष्ण की अनुभूति है । मुहम्मद ने अल्लाह कहा । नानक ने वाहेगुरु कहा । लेकिन वो उनकी अनुभूति है । असल में शब्द कहीं नहीं पहुंचाते । क्योंकि सत्य शब्दों से परे है । लेकिन हम ऐसे सुंदर शब्दों को ही पकड के बैठ जाते हैं । नतीजा हमारी अपनी भीतर की संपदा नहीं होती । क्योंकि हम हंमेशा बासी और उधार के धन में ही खुश रहते हैं । हमें प्रमाण देने के लिए दूसरों का उधार का धन बीच में रखना पडता है । जो कि हमारा अपना नहीं होता ।
**********
पूर्व धारणा से किया गया ध्यान का कोइ मोल नहीं है । सब धारणाएं तिरोहित हो जाती है । और जो शेष बचता है । वो ध्यान है । वो होँश है । सिर्फ अपनी हस्ती का बोध । सांस छूटती है । छूट जाय । विचार छूटते हैं । छूट जायं । लेकिन हस्ती नहीं छुटनी चाहिए । वरना आशुतोस महाराज की तरह फ्रिज में रखना पडेगा । क्योंकि महसूस करने वाला नहीं मरता । महसूस करने वाला मर जाए । तो एक ही जगाह है - शमशान । कापी पेस्ट ।
************
धर्म भोग है । और जब मैं ऐसा कहता हूँ - धर्म भोग है । तो अनेकों को बड़ी घबराहट होती है । क्योंकि उनको खयाल है कि - धर्म त्याग है । ध्यान रहे । जिसने सोचा कि धर्म त्याग है । वह उसी गलती में पड़ेगा । वह इनवेस्टमेंट की गलती में पड़ जाएगा । त्याग जीवन का तथ्य है । इसे जीवन में पकड़ना नासमझी है । पकड़ रहा है । वह गलती कर रहा है । सिर्फ गलती कर रहा है । जो उसे मिल सकता था । वह खो रहा है । पकड़कर खो रहा है । जो उसका ही था । उसने घोषणा करके कि मेरा है । छोड दिया । लेकिन जिसने जाना कि सब परमात्मा का है । सब छूट गया । फिर त्याग करने को भी नहीं बचता कुछ । ध्यान रखना । त्याग करने को भी उसी के लिए बचता है । जो कहता है - मेरा है ।
*************
ओशो जिस प्रेम की बात कर रहें हैं । उसका सम्बन्ध विपरीत लिंगी से प्रेम करना नहीं है । वह समग्र प्रेम की बात कर रहें हैं । वह प्रेम लिंग भेद, वर्ण भेद, के पार समष्टि से है । समग्र प्रेम का अर्थ क्या है ? जिसमें स्त्री पुरुष, पशु पक्षी, नदी, पहाड, आकाश, चाँद, तारे, सूरज, हवा, फल, फूल, पेड़, पौधे, सुन्दर और कुरूप, स्वस्थ और अस्वस्थ समस्त सम्मिलित हैं । समाविष्ट हैं । अपनी पत्नी, बेटी, माता को छोड़ जगत से प्रेम मांगनें चले हो । प्रेम का सम्मान निजी रिश्तों में कभी किया नहीं । जगत को प्रेम का सम्मान करने का पाठ पढ़ाने चले हो । कैसे ज्यादा से ज्यादा लोग तुम्हारे जाल में फंसें । और आप लोग उनकी जेबें काट सको । सत्य तो ये है । आप लोग अकर्मण्य हो । आपकी रोटी भी इसी तरह की जालसाज़ियों से चल रही है । कापी पेस्ट ।
***********
खुद पर विजय प्राप्त करना । लाखों शत्रुओं पर विजय पाने से बेहतर है -  महावीर ।
**********
सत पुरुष कबीर साहब ने बिना योनि के स्त्री की उत्पत्ति की थी ।
इससे सिद्ध होता है कि कबीर साहब नहीं चाहते थे कि कोई भी सम्भोग करे । लेकिन काल ने स्त्री में योनि लगा दी । फिर सबसे पहले काल ने ही सम्भोग किया । इससे यह सिद्ध होता है कि यह योनि काल का जाल है । और उसका उपयोग करने वाले लोग काल के इस ब्रह्माण्ड में ही फंसे रहेंगे । इसलिए किसी भी सतलोक के अभिलाषी भगत को सतपुरुष की इच्छा का सम्मान करते हुए सम्भोग नहीं करना चाहिए । और आज ही काल की इस निशानी को अपने घर से बाहर फेंक देना चाहिए । सत साहिब । कापी पेस्ट ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email