24 दिसंबर 2010

ध्यान की घोषणा उसे बहुत उपद्रव में डाल देगी

बुद्ध की बिना घोषणा के 99 को पता नहीं चल सकता था । बुद्ध को पता चलेगा । जो जाग गया । उसको पता चलेगा कि किसको हो गया । लेकिन शेष जो सोए हुए हैं । उन्हें कैसे पता चलेगा ? उन्हें तो कोई जागा हुआ घोषणा करेगा । तभी पता चलेगा ।
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इसी कला के कारण इस देश में गुरु के चरणों में झुकने का मूल्य बना । वह तो प्रतीक है । वह तो बाह्य प्रतीक है - भीतर की घटना का । भीतर को कैसे कहें ? तो बाहर के किसी प्रतीक से कहते हैं । दुनिया के किसी देश ने पैरों में झुकने की कला नहीं खोजी । एक अपूर्व संपदा से वे वंचित रह गए ।
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मेरे पास लोग आते हैं । मेरे पास संन्यासी आते हैं । वे कहते हैं - जिन लोगों को आपके पास ध्यान उपलब्ध हो गया है । आप उनके नाम की घोषणा क्यों नहीं करते ? मैं कहता हूं - इसीलिए नहीं करता हूं । क्योंकि बड़ी जलन होगी । बड़ी ईर्ष्या पैदा होगी । अगर मैं 1 के नाम की घोषणा करूंगा कि यह ध्यान को उपलब्ध हो गया । तो बाकी सब उसके दुश्मन हो जायेंगे । और बड़ी राजनीति पैदा होगी । और बड़ी खींचातान मच जाएगी । वह नाहक कष्ट मे पड़ जाएगा । ध्यान की घोषणा उसे बहुत उपद्रव में डाल देगी । और दूसरे, जो ध्यान की चेष्टा में लगे थे । वे तो चेष्टा छोड़ देंगे । वे किसी भांति यह सिद्ध हो जाए कि इस आदमी को ध्यान नहीं मिला है । इस चेष्टा में लग जाएंगे ।
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चढ़ जाओ घरों की मुंडेर पर । और चिल्लाओ वहाँ से । क्योंकि तुम्हें जो मिला है । बहुतों को उसकी जरूरत है । और उन्हें उसका कोई पता नहीं । और इतने पास है - जीसस ।
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प्रेम किसी को नहीं जानता । प्रेम न तो जाति को जानता है । न कुल को जानता है । न कुलीनता को जानता है । न धन को जानता । प्रेम का धन से क्या सम्बन्ध है ? प्रेम न रंग को जानता है । हड्डी मांस मज्जा से प्रेम का सम्बन्ध क्या है ? तुम हिन्दू हो कि मुसलमान कि जैन कि ईसाई, प्रेम का लेना देना क्या है ?
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उपनिषद पैदा न होते । वेद पैदा न होते । कुरान बाइबल पैदा न होते । यह धम्मपद कैसे पैदा होता ? यह मुंडेर पर कुछ लोग चढ़ गए । और चिल्लाए । यह जानते हुए चिल्लाए कि चिल्लाने भर से तुम्हारी प्यास नहीं बुझ जाएगी । लेकिन चिल्लाने से शायद तुम्हें पता चल जाए कि किस दिशा में स्रोत है जल का । तुम शायद चल पड़ो ।
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जिसको तुम प्रेम करते हो । उसी को तुम घृणा करते हो । क्योंकि तुम्हारा प्रेम पूरा नहीं है । तुमने कभी इस बात को गौर से देखा । जिसको तुम प्रेम करते हो । उसी को घृणा करते हो । और जिसको तुम श्रद्धा करते हो । उसी पर तुम्हारी भीतर भीतर अश्रद्धा और संदेह भी चलते रहते हैं । तुम प्रतीक्षा में रहते हो । कब मौका मिल जाए कि इस श्रद्धा को फेंक दें उठाकर । सिद्ध हो जाए कि अश्रद्धा सही है । तो तुम ऐसा मौका चूकोगे नहीं । तुम झपटकर ले लोगे ।
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इस बात को खयाल रखना । जितनी ऊंची बात है । उतनी ही इनकार करनी आसान । जितनी नीची बात है । उतनी इनकार करनी कठिन ।
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मेरे प्रेम की गठरी में थोड़े शब्द हैं । तो ढेर सारा मौन है । कुछ उदासियां हैं । तो अनंत हसीं है । मेरी इस गठरी में दुबकी है कई अजन्मीं खुशियां । मेरे प्रेम की गठरी में कच्चे पक्के रास्ते हैं । तो जंगली पगडंडियां भी हैं । मेरे वहाँ कस्तूरी बसती है । वन वन भटकती नहीं । मेरे पास मृगछौने सा समय करता है किलोल । मेरे प्रेम की गठरी में चुटकी भर ठिठुरन है । तो अंजुरी भर धूप है । मेरी इस पोटली में 1 ऐसी छीनी है । जिससे हो सकता है - आसमान में सुराख । मेरे प्रेम की गठरी में 1 छांव है । जहां सुस्ताता है - उस पार का बटोही । मेरे यहाँ हुआ करती हैं तृप्ति की कई कई नदियां । मेरे पास लहरों की कथा है - नित्य प्रवाहमान । मैंने अपनी गठरी में बाँधा है - 1 नई धरती । 1 नया आसमान । 
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असल में ज्ञान जिसको हो गया है । वह बिना बोले कैसे चुप रहेगा ? 
कि जिस आदमी को जल का स्रोत मिल गया है । और तुम प्यासे भटक रहे मरुस्थल में । प्यास से तुम्हारी आखें निकली आ रही हैं । तुम्हारी सांस टूटी जा रही है । तुम्हारे पैर डगमगा रहे हैं । धूल धूसरित, धूप में जलते मरुस्थल में तुम भटक रहे हो । और मुझे पता है कि जल स्रोत पास ही है । और मैं चुप रहूंगा । मैं चिल्लाऊंगा ।
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बुद्ध का चचेरा भाई देवदत्त बुद्ध से दीक्षा लिया । संन्यस्त हुआ । लेकिन यह देखकर उसे बड़ी पीड़ा होने लगी । क्योंकि वह चचेरा भाई था । तो वह सोचता था । बुद्ध के बाद नंबर 2 कम से कम मेरा होना चाहिए । लेकिन उसका तो कोई नंबर ही नहीं लग रहा था । वहां तो और लोग आते गए । और ज्ञान को उपलब्ध होते गए । और देवदत्त पीछे पड़ता गया । कतार में दूर होने लगा । उसको चोट भारी लगी । वह भिक्षुओं को लेकर, गिरोह को लेकर अलग हो गया । फिर उसने बुद्ध को मारने के बड़े उपाय किए । बुद्ध के ऊपर पागल हाथी छोड़ा । बुद्ध ध्यान करते थे । तो 1 चट्टान उनके ऊपर सरका कर गिरायी । जब चट्टान बुद्ध के पास से सरकती हुई गयी । इंच इंच बचे । बाल बाल बचे । तो किसी ने पूछा कि - संयोग की बात कि आप बच गए । बुद्ध ने कहा - संयोग की बात नहीं । चट्टान कोई मेरी चचेरा भाई तो नहीं । चट्टान को मुझसे क्या लेना देना है । जब पागल हाथी बुद्ध पर छोड़ा - देवदत्त ने । और पागल हाथी आकर उनके चरणों में झुक गया । बजाय उनको मार डालने के । रौंद डालने के । तब भी किसी ने कहा कि - अपूर्व चमत्कार ! बुद्ध ने कहा - कुछ भी चमत्कार नहीं । पागल हाथी कोई मेरा शिष्य तो नहीं । मुझसे बदला लेने का कोई कारण तो नहीं ।
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बुद्ध पुरुष तो नदी की भांति हैं । तुम अगर प्यासे हो - सत्य के । तो झुको । नहीं कि तुम्हारे झुकने से बुद्ध पुरुषों को कुछ मिलता है । तुम्हारे झुकने से क्या मिलेगा ? तुम्हारे पास ही कुछ नहीं है । तुमसे मिलना क्या है ? तुम यह मत सोचना कि तुमने कोई आभार किया किसी बुद्ध पुरुष के चरणों में झुककर । नहीं । उसने तुम्हें झुकने दिया । उसने ही आभार किया । क्योंकि झुककर तुम्हें ही मिलेगा । झुककर तुम कुछ खोने को नहीं हो । खोने को तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं ।
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महावीर का 1 दूसरा विरोधी उनका ही दामाद था । वह भी शिष्य हुआ था । वह भी विरोध में चला गया । महावीर के 500  शिष्यों को अपने साथ लेकर निकल गया । अब हमारे देश में तो ऐसा है कि दामाद का पैर छूते हैं । तो जब शादी हुई होगी । तो महावीर ने उसके पैर छुए होंगे । और फिर जब महावीर संन्यस्त हो गए । शान को उपलब्ध हुए । और दामाद भी संन्यस्त हुआ । तो उसे महावीर के पैर छूने पड़े । वह बदला लिया । वह क्षमा नहीं कर सका । उसने महावीर के संघ में पहला उपद्रव खड़ा किया । पहली राजनीति खड़ी की ।
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कितने दिनों की जिन्दगी है । मात्र 15 000 या 20 000 दिन । साल नहीं । दिन शेष रहे हैं । क्या कर लोगे ? कितनों को कंधे पर घाट पर छोड़ आये ? तुम तो अपने आपसे मिल लो । तो थोड़ा जीवन में दूरी आ जायेगी ।
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कृष्ण कह रहे हैं अर्जुन से । जो व्यक्ति, जीवन गुणों के अनुसार वर्तित हो रहा है । और कर्म भी महा प्रकृति की विराट लीला के हिस्से हैं । ऐसा जान लेता है । वह कर्म में अनासक्त हो जाता है । ऐसे व्यक्ति को दुख नहीं व्यापता । ऐसे व्यक्ति को सुख नहीं व्यापता । ऐसे व्यक्ति को सफलता असफलता समान हो जाती है । ऐसे व्यक्ति को यज्ञ अपयज्ञ 1 ही अर्थ रखते हैं । ऐसे व्यक्ति को जीवन मृत्यु में भी कोई फर्क नहीं रह जाता है । और ऐसी चित्त दशा में ही परमात्मा का, सत्य का, आनंद का अवतरण है । इसलिए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं - तू भाग मत । तू इस भांति बरत । समझ कि जो हो रहा है । हो रहा है । तू उसके बीच में अपने को भारी मत बना । अपने को बीच में बोझिल मत बना । जो हो रहा है । उसे होने दे । और तू उस होने के बाहर अनासक्त खड़ा हो जा । यदि तू अनासक्त खड़ा हो सकता है । तो फिर युद्ध ही शांति है । और अगर तू अनासक्त खड़ा नहीं हो सकता । तो शांति भी युद्ध बन जाती है ।
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