21 दिसंबर 2010

अब कोई आशा न बची


प्रेम - जागा हुआ प्रेम ही प्रार्थना । सोये रहने वाले के लिये जिस प्रकार केवल सुबह हो जाने से ही कुछ नहीं होता । उसी प्रकार प्रेम हो जाने से ही कुछ नहीं होता । प्रेम हो होकर भी लोग चूक जाते हैं । मन्दिर के द्वार तक आ आकर लोग मुड़ जाते हैं । चूक जाते हैं । सीढियॉं चढ चढकर लौट जाते हैं । प्रेम तो जीवन में बहुत बार घटता है । मगर बहुत थोड़े ही धन्यभागी होते हैं । जो जागते हैं । जो जाग जाते हैं । उनके प्रेम का नाम प्रार्थना है । जागे हुए प्रेम का नाम प्रार्थना है । जबकि सोई हुई प्रार्थना का नाम - प्रेम है ।
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बुद्ध ने कहा - विध्वंस सरल । सृजन कठिन । और आत्म सृजन तो और भी कठिन है । अहंकार स्पर्धा जगाता । स्पर्धा में ईर्ष्या होती । ईर्ष्या से द्वेष । द्वेष से शत्रुता । और फिर तो अंतर्बोध जगे कैसे ? सारी शक्ति तो इसी में व्यय हो जाती है । इसी मरुस्थल में खो जाती है नदी । सागर तक पहुंचे कैसे ? दूसरे का विचार ही न करो । समय थोड़ा है । स्वयं को जगा लो । बना लो । अन्यथा मल मूत्र के गड्डों में बारबार गिरोगे । भिक्षुओ ! तुम्हीं कहो । बारबार गर्भ में गिरना । मल मूत्र के गड्डे में गिरना नहीं । तो और क्या है ?
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तुम यह मान ही नहीं सकते कि - कोई तुमसे बेहतर हालत में हो सकता है । क्योंकि अगर कोई तुमसे बेहतर हालत में है । तो फिर तुम्हें कुछ करना पड़ेगा । फिर तुम्हें उठना पड़ेगा । तुम्हें अपने को बदलना पड़ेगा । रूपांतरण करना होगा । तो दुनिया में अधिक लोग बांझ मर जाते हैं । उनके जीवन में कुछ पैदा नहीं होता । कोई फूल नहीं खिलते । और कोई संगीत पैदा नहीं होता । कोई सुगंध नहीं बिखरती । कभी दीया नहीं जलता । और जिम्मेवार वे ही हैं । क्योंकि वे दीया जलाते ही नहीं । वे तो दूसरे का दीया फूंकने में लगे रहते हैं कि जब किसी का जला हुआ नहीं दिखायी पड़ेगा । तो अपनी ही अड़चन क्या है । इसलिए लोग सुबह से उठकर अखबार पढ़ते हैं । और अखबार पढ़कर बड़ी शांति मिलती है । गीता पढ़ो । तो शांति नहीं मिलती । गीता पढ़ो । तो अशांति मिलती है ।
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ओशो ने हर 1 पाखंड पर चोट की । ओशो ने सम्यक सन्यास को पुनरुज्जीवित किया है । ओशो ने पुनः उसे बुद्ध का ध्यान, कृष्ण की बांसुरी, मीरा के घुंघरू और कबीर की मस्ती दी है । सन्यास पहले कभी भी इतना समृद्ध न था । जितना आज ओशो के संस्पर्श से हुआ है । इसलिए यह नव संन्यास है । उनकी नजर में सन्यासी वह है । जो अपने घर संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक
जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए ।
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योग का अर्थ है - सत्य का साक्षात्कार । जैसा वह है ।
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1 युवक बोकोजू अपने गुरु के पास वर्षों रहा । ध्यान की । समाधि की तलाश में । और जब भी वह कुछ खबर लेकर जाता कि बड़ा अनुभव हुआ है कि गुरु उसको 1 चांटा रसीद कर देता । यह पहले तो बहुत चौंकता था । फिर समझने लगा । औरों से पूछा । बुजुर्गों से पूछा । जो पहले से ऐसे गुरु के चांटे खाते रहे थे - उनसे पूछा । उन्होंने कहा कि उसकी बड़ी कृपा है । वह मारता ही तब है । जब उसकी कृपा होती है किसी पर । नहीं तो वह मारता ही नहीं । फिजूल पर तो वह खर्चा ही क्यों करे । 1 चांटा भी क्यों खर्च करे । तुम पर उसकी बड़ी कृपा है । और वह मारता इसलिए है कि तुम जो भी ले जाते हो । वह अभी सच नहीं है । काल्पनिक है । कभी वह पहुंच जाता कि बड़े प्रकाश का अनुभव हुआ गुरुदेव । और 1 चांटा कि कुंडलिनी जग गयी गुरुदेव । और 1 चांटा कि चक्र खुलने लगे । और 1 चांटा । वह जो भी अनुभव ले जाता । और चांटा खाता । तब तो उसे भी समझ में आने लगा कि बात तो सब, यह सब तो काल्पनिक जाल ही है । जहां तक किसी चीज का अनुभव हो रहा है । वहां तक अनुभव हो ही नहीं रहा है । क्योंकि जो भी अनुभव हो रहा है । वह तुमसे अलग है । कुंडलिनी जगी । तो तुम तो देखने वाले हो । तुम तो कुंडलिनी नहीं हो । वह जो देख रहा है भीतर कि कुंडलिनी जग रही है । वह तो कुंडलिनी नहीं हो सकता न ? कुंडलिनी तो विषय हो गयी । जिसने देखा कि भीतर तीसरी आंख खुलने लगी । वह तो तीसरी आख से भी उतना ही दूर हो गया । जितना इन दो आंखों से दूर है । वह तीसरी आख भी अलग हो गयी । जिसने देखा कि भीतर कमल खिलने लगा । वह देखने वाला तो कमल नहीं हो सकता न ? वह देखने वाला तो पार और पार और पार । उसका तो पता तब चलता है । जब न कमल खुलते । न प्रकाश होता । न कुंडलिनी जगती । न चक्र घूमते । कुछ भी नहीं होता है । सन्नाटा छा जाता है । अनुभव में कुछ आता ही नहीं । सिर्फ वही बच जाता है - साक्षी । उस शून्य का साक्षी रह जाता है । ऐसा कहते हैं । 20 साल तक बोकोजू ने चांटे खाए । और आखिरी बार जब वह आया । तो पता है । कैसे उसने धन्यवाद दिया ? आकर 1 चांटा अपने गुरु को जड़ दिया । गुरु खूब हंसा । कहते हैं । गुरु लोटा । प्रसन्नता में लोटा । उसने कहा - तो हो गया आज । तो धन्यवाद कैसा होगा ? कहना मुश्किल है । यह ठीक धन्यवाद था । 20 साल चाटे खाने के बाद । आज कुछ कहने को था भी नहीं । झेन परंपरा अनूठी है । फकीरों की सारी परंपराएं अनूठी हैं ।
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शरीर से बहुत बंधने की जरूरत नहीं है । शरीर के दुश्मन होने की भी जरूरत नहीं है । शरीर सुंदर घर है । रहो । शरीर की देखभाल करो । अपने को शरीर ही न मान लो । मन भी प्यारा है । उसका भी उपयोग करो । उसकी भी जरूरत है । और हृदय तो और भी प्यारा है । उसमें भी जीओ । मगर ध्यान रहे कि - मैं साक्षी हूं । और जिसे सतत स्मरण है कि - मैं साक्षी हूं । उसकी क्रांति सुनिश्चित है । जिसे स्मरण है कि - मैं साक्षी हूं । वह भूमा को उपलब्ध हो जाता है । तुम सिर्फ साक्षी हो । वह तुम्हारा स्वरूप है । न तुम कर्ता हो । शरीर से कर्म हो । न तुम विचारक हो । मन से विचार होते हैं । न तुम भावुक हो । हृदय से भावनाएं होती हैं । तुम साक्षी हो - भावों के । विचारों के । कृत्यों के । ये तुम्हारी 3 अभिव्यक्तियां हैं । और इन तीनों के बीच में तुम्हारा साक्षी है । उस साक्षी के सूत्र को पकड़ लो । साक्षी के सूत्र को पकड़ते ही संन्यास का फूल खिल जाता है । जो कली की तरह रहा है - जन्मों जन्मों से । तत्क्षण उसकी पंखुड़ियां खुल जाती हैं । और वह ऐसा फूल नहीं । जो कुम्हलाए । वह फूल अमृत है । वह फूल ऐसा नहीं । जो मरे । वह भूमा है । असीम है । वह फूल आनंद का फूल है । वह फूल ही मोक्ष है ।
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योग का अर्थ है कि - अब कोई आशा न बची । अब कोई भविष्य न रहा । अब कोई इच्छा न बची । अब व्यक्ति तैयार है उसे जानने के लिए । जो है । अब कोई रुचि न रही इस बात में कि क्या हो सकता है ? क्या होना चाहिए या कि क्या होना चाहिए था । जरा भी रस न रहा । अब केवल उसी में रस है - जो है । क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें मुक्त कर सकता है । केवल वास्तविकता ही मुक्ति बन सकती है ।
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