29 जुलाई 2013

सहज योगगुरु श्री राकेश महाराज जी

लगभग एक वर्ष पूर्व की बात है जब (शिमला मूल के निवासी और वर्तमान में) दिल्ली के श्री राकेश शर्मा जी फ़ोन पर मेरी पहली बार बात हुयी । मेरे लिये ये रोजमर्रा की भांति आने वाली सामान्य काल जैसी ही थी । 
राकेश जी ने गूगल पर हमारे ‘मुक्तमंडल’ के बारे में जानकारी पढ़ कर योग से सम्बन्धित जिज्ञासावश फ़ोन किया था । इससे पूर्व राकेश जी नारायणदत्त श्रीमाली और प्रमुख सच्चे नाथपंथी योगियों आदि से काफ़ी समय से जुङे रहे थे ।
बातचीत में उस समय तो राकेश जी की योग उपलब्धियों और पहुँच पर मैंने प्रत्यक्ष कुछ नहीं कहा फ़िर भी आजकल योग, ध्यान, भक्ति के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है । उसके तुलनात्मक राकेश जी उस समय भी इस सबकी तुलना में काफ़ी श्रेष्ठ योगी थे और ये मेरे लिये आकर्षण का विषय था ।
दिल्ली की अति व्यस्त जिन्दगी और कार्य व्यवसाय की अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से घिरे किसी हिमालय पर ध्यानरत योगी की भांति ही योग यात्रा करते हुये राकेश जी किसी के लिये भी आश्चर्य का विषय हो सकते थे ।
खैर..राकेश जी मुझसे जानना चाहते थे कि उनका योग किस स्थान पर है और अब उसमें किस तरह क्या होगा ?
लेकिन उससे पूर्व उन्होंने अपने बचपन से ही जो अनुभव उन्हें पूर्वजन्म की योग यात्रा और भक्ति संस्कार के प्रभाव से होते थे । उन सबके बारे में विस्तार से बताया ।
इसके बाद जो कुछ मैं सदगुरु के सानिंध्य में सीखा था, जानता था । मैंने उन्हें बताया ।
लेकिन जो बताया, वह ‘समय के गुरु या सदगुरु’ के सहयोग के बिना अकेले सम्भव नहीं था । 
अतः राकेश जी ने हमारे सदगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज ‘परमहंस’ जी से मिलना तय किया । यहाँ महत्वपूर्ण बात ये है, मैंने उसी समय राकेश जी से कहा - आपकी जाने के कुछ समय बाद ही ‘हँसदीक्षा’ इसके कुछ घण्टों में ही परमहँस दीक्षा और समाधि ज्ञान कराया जायेगा और एक वर्ष बाद आप हमारे ‘मुक्तमण्डल’ के लिये गुरु रूप में कार्य करेंगे ।
उस समय राकेश जी को मेरी बातों पर काफ़ी आश्चर्य हुआ और एक तरह से विश्वास नहीं हुआ । जो व्यक्ति फ़ोन पर पहली बार सिर्फ़ किसी से बात कर रहा हो । निसंदेह उसे इस सब पर आश्चर्य ही होगा पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं था । 
इतिहास गवाह है, ठीक ऐसा ही हुआ ।
मुझे फ़ोन करने के बाद यथाशीघ्र राकेश जी हमारे ‘चिन्ताहरण मुक्तमंडल आश्रम’ नगला भादों, जिला फ़िरोजाबाद पर आये ।
महाराज जी ने उनको ध्यान पर बैठाकर उनकी अभी की ध्यान स्थिति जांची और 2 घन्टे बाद ही परमहंस दीक्षा दी ।
इसके बाद ही उनके सक्षम सदगुरु के अभाव में अटके हुये योग को तीवृगति मिल गयी और वह निर्बाध योग ऊँचाईयों की तरफ़ सतत और सफ़ल यात्रा करने लगे ।
क्योंकि वह पूर्वजन्म के योगी रहे थे । अतः शीघ्र ही निश्चयात्मक ऊँचाई (जहाँ योगी में स्थिरता, समर्थता और शक्ति आ जाती है) का लक्ष्य प्राप्त कर लिया ।
तब उन्हें सदगुरु महाराज जी ने नये शिष्यों, साधकों को दीक्षा देने का आदेश कर दिया ।
राकेश जी अभी पिछले एक महीने में ही 30 के लगभग सफ़ल हँसदीक्षा कर चुके हैं ।
आत्मज्ञान की जानकारी न रखने वालों को ये साधारण बात लग सकती है पर कोई भी टाटा बिरला चौरासी लाख योनियों, नरक से मुक्ति और निश्चित अगला मनुष्य जन्म, धन या बुद्धि बल आदि से कभी प्राप्त नहीं कर सकता । 
ये सभी जानकारी मैं उन लोगों को देना चाहता हूँ जो ठीक से ध्यान, योग का महत्व और भक्ति का मतलब ही नहीं जानते । भक्ति के बिना कोई सुख सम्भव नहीं है ।
भक्ति स्वतन्त्र सकल सुख खानी ।
बिनु सतसंग न पावहि प्रानी ।
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा ।
जिमि हरि शरन न एक हू बाधा ।
अतः ये दिल्ली और आसपास के लोगों के लिये बेहद खुशखबरी और सौभाग्य वाली बात है कि आप ध्यान के उच्चतम स्तरों को दिल्ली में ही सरलता से जान सकते हैं । अक्षय ऊर्जा, अक्षय धन और निरन्तर सरल सहज भक्ति और सर्वाधिक दुर्लभ और उच्च सहज योग (सुरति शब्द योग) को आसानी से सीख सकते हैं ।
सत साहेब ! 
सम्पर्क सूत्र -
श्री राकेश महाराज जी  ‘परमहंस’  
0 84478 15644 
0 98183 12908

25 जुलाई 2013

गुरु पूर्णिमा पर संजय केसरी द्वारा लिये गये चित्र


श्री महाराज जी के साथ शिष्य श्री राकेश शर्मा जी गुरु महाराज दिल्ली
रुद्राक्ष माला पहने राकेश महाराज जी
सदगुरु के सानिंध्य में आशीर्वाद देते श्री राकेश महाराज
हमारे शिष्य विष्णु नागौरिया ( सफ़ेद शर्ट ) डा. संजय के साथ
हमारे शिष्य डा. संजय और अशोक ( काली शर्ट )
गुरु पूजन
महाभोज
महाभोज
आश्रम के चारों तरफ़ ऐसे दृश्य हैं आम
आश्रम में बाहर से आयीं महिलायें

09 जुलाई 2013

गुरुपूर्णिमा 2013

प्रातः स्मरणीय परमपूज्य सदगुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज परमहंस के तत्वावधान में गुरु पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर चिंताहरण आश्रम मुक्तमंडल में दिनांक 19, 20 तथा 21 जुलाई 2013 को सत्संग एवं दिनांक 22 जुलाई 2013 (गुरुपूर्णिमा) के दिवस पर गुरुपूजन तथा महाभोज (भंडारा) का आयोजन हो रहा है । इस पावन अवसर पर आप सभी भक्तजन सप्रेम आमंत्रित हैं ।

पता -
चिंताहरण आश्रम मुक्तमंडल,
ग्राम - नगला भादों (मुस्तफाबाद रोड)
तहसील - जसराना
जिला - फ़िरोज़ाबाद 
(उत्तर प्रदेश)

तिथि एवं कार्यक्रम -
सत्संग - दिनांक 19, 20 तथा 21 जुलाई 2013
गुरुपूजन तथा महाभोज - दिनांक 22 जुलाई 2013 (गुरुपूर्णिमा)

कार्यक्रम के मुख्य आयोजक - श्री राकेश शर्मा जी महाराज (दिल्ली)

आश्रम तक आने के लिए आपको सर्वप्रथम बस, ट्रेन अथवा अन्य वाहन के माध्यम से फ़िरोज़ाबाद तक पहुंचना होगा । अगर आप आगरा से आ रहे हैं तो फ़िरोज़ाबाद तक के लिए ट्रेन कम हैं, ऐसे में आप बिजलीघर बस स्टैंड से फ़िरोज़ाबाद के लिए बस ले सकते हैं । टूंडला जंक्शन से फ़िरोज़ाबाद के लिए पर्याप्त ट्रेनें हैं ।
फ़िरोज़ाबाद बस स्टैंड या स्टेशन पहुँचने पर आपको ऑटो मिल जायेगा जो आपको 5 रू. में कोटला चुंगी पहुंचा देगा । कोटला चुंगी से आपको रिक्शा मिलेगा जिससे आपको ठार पूंठा (प्राइवेट बस स्टैंड) पहुंचना है । रिक्शा वाला आपसे 10 रू. लेगा । 
अगर आप चाहें तो बस स्टैंड या स्टेशन से सीधे ठारपूंठा के लिए ऑटो भी कर सकते हैं, पर उसका मूल्य अधिक लगेगा ।
ठार पूंठा पहुँचने पर आपको वही पर खड़ी बसें दिखेंगी जो सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक चलती हैं । ये बसें मुस्तफाबाद तक जाती हैं और यही बसें आपको सीधे आश्रम के मोड़ पर उतारेंगी ।
ठार पूंठा से चल कर बस से आपको नगला भादों पर उतरना हैं । आप बस वाले को बता सकते हैं कि नगला भादों आश्रम पर उतरना है तो वह आश्रम के मोड़ पर ही आपको उतारेगा । 
बस से आपका किराया लगभग 25 रू. लगेगा ।
इसी मोड़ पर चलकर आप पहुँच जायेंगे - चिंताहरण मुक्तमंडल आश्रम ।

आरती सदगुरुदेव महाराज जी की

आरती सदगुरु देव नमामी । पारबृह्म सब जग के स्वामी ।  (1)
विधि हरि हर तुम्हरो यश गावे । शेष शारदा तुमको ध्यावे । (2)
राम कृष्ण गुरु के गुण गावे । जय शिवानन्द परधामी । (3)
भव के संकट तारन हारे । काल कर्म गति नाशन हारे । (4)
आये शरण तुम्हारे द्वारे । अलख अगोचर अगम अनामी । (5)
श्रीगुरु चरण कमल की छाया । जाकी शरण जीव जो आया । (6)
करते दूर ताप त्रिय माया । करो दया गुरु अन्तर्यामी । (7)
सत्यनाम गुरु हमको दीना । चंचल मन निश्चल कर दीन्हा । (8)
पायो ज्ञान मोक्ष पद लीन्हा । परम भक्ति पद के अनुगामी । (9)
निसिदिन आरत करों तुम्हारी । सुन लीजे गुरु विनय हमारी । (10)
कहते सच्चिदानन्द पुकारी । बारम्बार सदगुरु देव नमामी । (11)

। जय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की ।

03 जुलाई 2013

चावार्क दर्शन ? ही मेरे लिए अंतिम सत्य ? था - मुकेश


मुकेश शर्मा पोस्ट " ये ही मिस्टर परमात्मा है ? " पर  टिप्पणी ।
प्रणाम गुरुदेव ! प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद । 
6-7 वर्ष की उमृ से मैं नियमित पूजा पाठ करता रहा हूँ । बचपन से ही भगवान में जरुरत से अधिक विश्वास था । या यूँ कहे । अंध विश्वास था । परन्तु अपने अंधविश्वास के कारण छात्र जीवन में काफी असफल ( 12 वीं क्लास में ३ बार फेल होना मेरे लिए 18 साल की उमृ में बहुत बड़ा झटका था । जिसने मुझे भगवान के बारे में सारे कांसेप्टस बदलने पर मजबूर कर दिए । और इसके बाद मुझमें भी अपने आप बहुत ज्यादा बदलाव हो गए । और मैंने मेरी पढाई भी पूरी की) हुआ । तब मैं परिणाम स्वरुप भौतिक संसार को ही सत्य मानने लग गया । इन सब आध्यात्मिक बातों भगवान को झूठ मानने लग गया । सोचता - सब कुछ पुरुषार्थ से ही संभव है । संसार में राजनीति से बङा कुछ नहीं है । मतलब यदि दर्शन की बात की जाये । तो चावार्क दर्शन ? ही मेरे लिए अंतिम सत्य ? था । परन्तु ​मन की शांति के लिए पूजा पाठ अवश्य करता रहा । शायद मेरे पूर्व जन्म के संस्कार हों । परन्तु आपने मुझे अपनी सनातन संस्कृति के एक हिस्से से परिचित करवाया । सबसे महत्वपूर्ण भगवान का मतलब समझाया । आपके ब्लॉग पर आया । भगवान ( परमात्मा) को समझने की शुरआत की । पूरा समझ नहीं पाया । परन्तु ऐसा लगता है कि गलत दिशा में नहीं हूँ । जानता हूँ । बहुत गूढ़ रहस्य है । जितना जानूँ । कम है । आपके द्वारा परिचित कराई गयी पंक्तियां मुझे परमात्मा के बारे में बहुत कम शब्दों में परन्तु विस्तृत व्याख्या करती हैं । और एक नयी उर्जा से भर देती हैं । जो इस प्रकार हैं - कैसा अदभुत खेल बनाया । मोह माया में जीव फ़ँसाया । दुनियाँ में फ़ँसकर वीरान हो रहा है । खुद को भूलकर हैरान हो रहा है । तू अजर अनामी वीर भय किसकी खाता । तेरे ऊपर कोई न दाता । ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी । जङ चेतन ग्रन्थि पर गई । यधपि मृषा छूटत कठिनई
परन्तु मेरी महत्वाकांक्षायें मुझे पूर्ण रूपेण भक्ति में जाने से रोकती हैं । ये महत्वाकांक्षायें मेरी बचपन से ही हैं । परन्तु ये महत्वाकांक्षायें कोरे निजी स्वार्थ वश नहीं हैं । अपितु इन महत्वाकांक्षाओं में एक स्वर्णिम भारत का सपना बसता है । जिसमें सनातन संस्कृति की स्थापना भी महत्वपूर्ण है । इन सब कार्यों की पूर्ति का रास्ता राजनीति ही है । eng की पढाई करने के साथ साथ और पश्चात भी पिछले 6 साल से मैं अध्ययन और चिंतन कर रहा हूँ कि कैसे इन कार्यों को अंजाम दिया जाये । और मेरा भारत पूर्व समय की भांति समृद्ध बने । इस कार्य के लिए मुझे राजीव दीक्षित जी ( इस समय चील पक्षी के रूप में 84 लाख योनियों में हैं ) से काफी प्रेरणा और ज्ञान मिला । और आपसे वैराग्य को जाना । जिससे निस्वार्थता की भावना जन्मी । और सही दिशा मिली । जिसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । गीता रामायण तो मैंने बचपन में कई बार पढ़े । परन्तु अज्ञान वश अंधविश्वास ही उपजा| जैसा कि आप कहते हैं कि ये पूर्व जन्म संस्कार कारण होते हैं । शायद ये मेरे पूर्व जन्म के संस्कार हों । 
एक बात और मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है कि विभिन्न देशों के साथ साथ भारत की आधी से अधिक जनसंख्या के पास खाने को भोजन नहीं है । इसके अलावा इतने अपराध हैं| इसीलिए देश की समस्याओं की और मेरा अधिक ध्यान है । इसके अलावा मुझे किसी और चीज़ से मतलब नहीं ( आपके आशीर्वाद से मेरी आध्यात्म में रूचि अवश्य बरक़रार रही है । परमात्मा को जानने की भी तीव्र इच्छा है ) है । परन्तु कभी कभी डर भी लगता है कि इन कार्यों को कैसे पूरा करूँगा । वैसे आपके ज्ञान से अदभुत निडरता अवश्य आई है । परन्तु डर का सबसे बड़ा कारण है । मेरी ये सोच कि सोचना अलग बात है । और व्यावहारिकता में इन्हें पूरा करना अलग । क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य ( स्वर्णिम भारत) से अधिक प्यारा कुछ नहीं है । बस यही बात मुझे डराए रहती है कि अपना कार्य पूरा कर पाउँगा । या नहीं । अब मेरी समस्या ये है कि ऐसा कोई उपाए बतायें कि परमात्मा की भक्ति और अपने लक्ष्य ( स्वर्णिम भारत) दोनों की प्राप्ति मैं कर सकूँ । वैसे गीता आपकी कृपा से अब अच्छे से समझ आई है । और मेरी समस्या का समाधान भी करती है । परन्तु यदि आप भी मार्ग दर्शन करेंगे । तो मुझे एक नई एनर्जी मिलेगी । कृपया मार्गदर्शन करें । मुकेश शर्मा । अलवर । राजस्थान । उम्र 23 साल ।
इस पर मेरे विचार शीघ्र ही इसी पेज पर आयेंगे ।


शिवजी कैलाश पर दिखाई क्यों नहीं देते - मुकेश



मुकेश शर्मा पोस्ट " ये ही मिस्टर परमात्मा है ? " पर  टिप्पणी । 
गुरूजी आपको मेरा शत शत प्रणाम । मेरे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हूँ|
1 - सूक्ष्म । स्थूल । कारण शरीर के बारे में कृपया विस्तार से बतलाईए । 
- स्थूल शरीर आपका यही पंच भौतिक शरीर ही होता है । जो आम आदमी को दिखता है । बाह्य व्यवहार में आता है । ये किसी भी एक जीवन के लिये ही होता है । फ़िर चाहे वह मनुष्य योनि हो । या फ़िर 84 लाख योनियों का कोई भी शरीर । इसके बाद दूसरे नम्बर पर सूक्ष्म शरीर होता है । जो मन । बुद्धि । चित्त । अहम इन चार अंगों से निर्मित होता है । मृत्यु के बाद यही शरीर से बाहर जाता है । इसी को जीवात्मा भी कहते हैं । अगर इसको आम आदमी देख सके । तो इसमें और इस शरीर के मृतक व्यक्ति में कोई फ़र्क नहीं होता । इसीलिये मृतक से परिचित व्यक्ति को यदि मृतक प्रेत रूप में दिखे । तो वह उसे आसानी से पहचान लेता है । आपका पूरा पाप पुण्य लेखा जोखा भी इसमें समाहित होता है । क्योंकि मृत्यु के बाद मृतक का सिर्फ़ स्थूल ही नष्ट होता है । सूक्ष्म सहित शेष पांच शरीर आवरण इसी शरीर में समाये होते हैं । यदि किसी को अपने पुण्य कार्यों आदि के फ़लस्वरूप कोई दिव्य या अन्य शरीर प्राप्त होता है । तब भी उसका ढांचा सूक्ष्म शरीर ही होता है । सूक्ष्म शरीर का बङा विज्ञान है । जो कम शब्दों में नहीं बताया जा सकता है । तीसरे
कारण शरीर में आपके वे कारण बीज समाये होते हैं । जिनके कारण आपको असंख्यों 
विभिन्न शरीर मिलते रहे हैं । और मिलते रहेंगे । वास्तव में एक भाव में आपको सपना भी कारण शरीर के कारण ही आता है । दरअसल ये सभी विषय ऐसे हैं । जिन पर विस्तार से सिर्फ़ पुस्तक में ही लिखा जा सकता है ।
2 - क्या सब कुछ पूर्व लिखित होता ​है ? गीता में एक और कहा गया है कि सभी कार्य मेरी ही प्रेरणा से सभी जीव करते हैं । और एक और कहा गया है कि सभी कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं । बुद्ध को भी जब आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ । तो उन्होंने पूर्व और भविष्य के आत्म ज्ञानियों को प्रणाम किया था| कृपया इस बात को विस्तार से बतायें । 
- जो आपको अभी पूर्व लिखित लग रहा है । वो कर्म आधार पर आपने ही पहले स्वयं लिखा था । और आज जो भी आप लिख रहे हैं । वह आगे फ़लित होगा । आपके पूर्व जन्म के कर्मफ़ल के आधार पर भाग्य ठीक उसी तरह से है । जैसे आपने पहले कमाकर अपने घर में दाल चावल मक्खन मलाई और फ़्रिज टीवी जैसे सभी सामान इकठ्ठा किये हों । और आगे उससे सुख उठायेंगे । या दुख ? ये आपकी बुद्धि विवेक और दूसरी अन्य चीजों पर निर्भर करता है । दूसरे उदाहरण में आपकी आज खोली गयी दुकान ( संचित धन या वस्तु आदि ) भाग्य की तरह है । लेकिन अब आगे उस दुकान से आप कमाते हैं । या गंवाते हैं । ये कर्म आपका अग्रिम कर्मफ़ल बनायेगा । थोङा सोचने से आराम से समझा जा सकता है । श्रीकृष्ण तो सभी जानते हैं । नम्बर 1 के झूठे थे । लेकिन वास्तव में इस बात का काफ़ी गहरा अर्थ है । चेतना और प्रेरणा आत्मदेव और प्रकृति के मिले जुले सौजन्य से होती है । और श्रीकृष्ण आत्म रूप में ही अपनी बात कह रहे थे । बुद्ध को वैसे आत्मज्ञान तो प्राप्त नहीं हुआ था । शून्य ज्ञान आदि ही प्राप्त हुआ था । फ़िर भी एक परम्परा वश ऐसा आंतरिक क्रियाओं में स्व प्रेरित ही होता है । यदि आप एक चीज को मानें कि जो आपके अनुभव में आये । वही सबसे बङा सत्य है । इतिहास जहाँ मूल जानकारी देता है । वहीं बारीक तथ्यों में भृम पैदा कर देता है । आप किसी भी चरित्र का गहराई से समग्र अध्ययन करें । तो तमाम विरोधाभास उसी एक चरित्र में उत्पन्न हो जायेंगे ।
3 - ​गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं - मैं निराकार भी हूँ । साकार भी हूँ । इसका मतलब क्या है ? 
- बेचारे श्रीकृष्ण भगवान क्या मिट्टी लोहा सोना पानी खुद आप भी यानी सृष्टि का हर पदार्थ अपनी मूल अवस्था में निराकार ही है । और जरूरत के अनुसार साकार हो जाता है । लोहे के चूर्ण ( मूल निराकार पदार्थ ) से लोहे की छङ बनती हैं । फ़िर उससे कितने तरह की वस्तुयें ( साकार ) बनती हैं । आप गिनती कर सकते हैं । सोने की धूल से सोने के बिस्कुट बनाकर कितने तरह के आभूषण और दूसरी अन्य चीजें बनती हैं । कोई गिन सकता है । पानी से भाप ओस बादल बर्फ़ क्या क्या बनता है । आप जानते ही होंगे । इसलिये श्रीकृष्ण बेकार में शेखी मारते हैं कि मैं साकार निराकार हूँ । यहाँ मैं एक अजीब बात कहता हूँ । वास्तव में - मैं न साकार हूँ । न निराकार हूँ । मैं जो हूँ । वो हूँ । और वह न साकार है । न निराकार है । न सत्य है । न असत्य है । मूल रूप में वह जो है । सो है । और वह क्या है ? वह शब्दों में ज्यों का त्यों नहीं बताया जा सकता । क्योंकि वह निर्वाणी है ।
4 - वेदों की रचना के बारे में आपका क्या मानना है । वेद मानव निर्मित हैं ? अथवा ... ?
- वेदों की छोङिये । मनुष्य मनुष्य ज्ञान के स्तर पर सन्त कवियों का कोई भी एक दोहा ही लिखकर दिखा दे । एक उदाहरण देखें । आत्मज्ञान से रहित । सिर्फ़ ( भगवान के ) भक्त श्रेणी के एक मुसलमान सन्त कवि का दोहा - कदली सीप भुजंग मुख । स्वांति एक गुण तीन । क्या कोई भी मनुष्य कभी ये बता सकता है कि स्वांति नक्षत्र की एक बूँद कदली  ( केला ) में गिरने पर कपूर । सीप में मोती । और सर्प के मुख में विष बन जाती है । बूँद एक ही । पर 3 अलग अलग परिणाम । जब प्रथम और पूर्ण आदि पुरुष यानी काल पुरुष पहली बार ही अस्तित्व में आया । तब उसकी स्वांसों से वेद रूपी ज्ञान विज्ञान ( सही भाव में सृष्टि का संविधान ) प्रकट हुआ । इसका मतलव था । सृष्टि के पदार्थ इस तरह के आदेशित नियम पर कार्य करेंगे । अगर वेदों को प्रमाणिक और जीवन्त स्तर पर जानना है । तो आज भी स्वांस ( कुण्डलिनी के मुख्य योग ) द्वारा काल पुरुष के बराबर स्थिति पर पहुँच कर जाना जा सकता है ।
6 - जैसा रूप बृह्मा । विष्णु । महेश का पुराणों में वर्णित है । और उनके बारे में जैसा वर्णित है । वह तो मनुष्य की तरह ही है । परन्तु वे तो भगवान हैं । ये सत्य है । या कोई गूढ ( गहराई) वाली बातें । जो मनुष्य समझ नहीं पाता । 
- भगवान एक पद है । हँस दीक्षा के बाद हँस ज्ञान को पूरा कर लेने वाला और कुण्डलिनी में सायुज्य आदि मुक्ति ज्ञान और भी तरीके हैं को पूरा कर लेने वाला भगवान या भगवान के समतुल्य ही हो जाता है । अखिल सृष्टि में बृह्मा विष्णु महेश या अन्य स्तरीय पदों की भरमार असंख्य रूप से है । आदि सृष्टि में जब विभिन्न शरीरों का निर्माण हो रहा था । तब सबसे श्रेष्ठ शरीर आकार मनुष्य आकार ही माना गया । इसलिये सूक्ष्म शरीर के ढांचे के ऊपर इसी काया ( आकार ) को ओढाने का विधान हुआ । वैसे ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं । दिव्य लोग स्वेच्छा अनुसार अलग शरीर भी गृहण कर लेते हैं । जैसे लक्ष्मी मित्तल और अम्बानी आदि भी मनुष्य ही हैं । पर वे तमाम मनुष्यों के लिये भगवान के बराबर ही हैं । गहराई से चिंतन करें । तो आसानी से समझ में आ जायेगा ।
7 - कहते हैं । शिवजी कैलाश पर रहते हैं । तो वो अब दिखाई क्यों नहीं देते।
​- शंकर इस तिब्बत वाले कैलाश पर नहीं रह्ते । न हीं अमरनाथ में रह्ते हैं । न हीं प्रथ्वी पर अन्य कहीं रह्ते हैं । यह सभी प्रतीक और सिद्ध स्थान हैं । जो विभिन्न अलौकिक आवश्यकताओं वश सिद्ध हुये हैं । जहाँ तक दिखाई देने की बात है । लोगों ने आज तक मुझे नहीं देखा । अभी तक श्री महाराज जी के अतिरिक्त मुझे किसी ने नहीं देखा । हालांकि मेरे द्वारा प्रेरित बहुत से शिष्यों को यह भृम है कि वे मुझसे मिले । देखा । बातचीत की । पर वास्तव में यह पूरी तरह से असत्य है । उन्होंने हवा की शीतलता की भांति मुझे अहसास अवश्य किया है । पर देखा कभी नहीं । इसलिये ये दिखने वाला विज्ञान अलग ही है । ये सभी चीजें तीसरे नेत्र और स्थिति से दिखती हैं ।
8 - गीता में कहा गया है कि 5 कर्म इन्द्रिय ​5 ज्ञान इन्द्रिय 11 वां मन । उससे परे भूत । और उससे भी परे मैं हूँ । तो क्या आत्मा परमात्मा का रूप नहीं है ? 
- वैसे मैं सीता और गीता के चक्कर में कम ही पङा हूँ । फ़िर भी गीता में सही ही लिखा है । 5 कर्म इन्द्रिय ( हाथ । पैर । मुँह । लिंग या योनि । और गुदा । ) 5 ज्ञान इन्द्रिय ( आँख । कान । नाक । जीभ । त्वचा ) और 11 वां मन । इनसे मिलकर मनुष्य शरीर बना । और वह मनुष्य शरीर अपने भूत ( कालीन कर्मों के आधार पर ) से वर्तमान और फ़िर भविष्य बनेगा । आज का वर्तमान + भविष्य आगे फ़िर भूत बन जायेगा । जाहिर है । चेतना से प्रकृति पदार्थ द्वारा शरीर बन बिगङ रहा है । और अन्य क्रियायें हो रही हैं । लेकिन मूल आत्मा ज्यों का त्यों अलग और निर्लेप है । न तो वह भी नष्ट हो गया होता । वास्तव में जिस तरह परे कार्वन लाइट ( आत्मा ) से अलग अलग चलचित्र ( रील में बने कारण + सृष्टि पदार्थ ) विभिन्न नायक नायिकाओं ( तरह तरह के जीवन ) के फ़िल्मी परदे ( मायावी सृष्टि । जिसका परदा धरती आकाश आदि है । बृह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति वेद कहे ) पर चलते रहते हैं । उसमें श्रीकृष्ण वाली बात फ़िट होती है कि नहीं । श्रीकृष्ण बातें बनाने के उस्ताद थे । वास्तव में आप खुद या दूसरे सभी । सभी के साथ यही सिद्धांत है । जिसको आपने आत्मा शब्द लिखा है । वहाँ दरअसल आपको जीवात्मा लिखना चाहिये था । जीवात्मा आत्मा का ही अंश है । और परमात्मा जैसा कुछ नहीं होता । इसका शुद्ध शब्द आत्मा ही है । लेकिन आदि सृष्टि के बाद से ही आत्मा को ही परमात्मा भी कहा जाने लगा । क्योंकि यह सबमें होने के बाबजूद भी सबसे परे है । इसलिये आत्मा में परे के अनुसार पर जुङकर परमात्मा हुआ ।
9 - गीता में कहा है कि सभी जीव मुझसे ऐसे जुङे हैं । जैसे मोती माला में पिरे होते हैं । सबसे परे मैं हूँ । तो परमात्मा परे कैसे है ?
- संसार में इसका सबसे अच्छा उदाहरण विधुत ऊर्जा ही है । जो वास्तव में आत्मा - चेतन गुण ( चेतना ) - विभिन्न ट्रांसफ़ार्मर - विधुत तारें - फ़िर विभिन्न उपकरण । अब आप देखिये । बिजली से ही तो सभी जुङे हैं । क्रियाशील हैं । जैसे माला में मोती । फ़िर भी बिजली सबसे परे है । सबसे सयुंक्त भी । और एकदम परे भी । और उसे किसी ने कभी देखा भी नहीं । मैंने कई बार कहा है । आत्मा का मुख्य गुण चेतना है । और ये गुण आत्मा के अतिरिक्त किसी में नहीं है । अतः चेतना और फ़िर ऊर्जा के जितने भी स्रोत आपको नजर आते हैं । वह सभी इसी चेतन ऊर्जा के रूपांतरण हैं ।
10 - यदि इस जन्म में हमारी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है । तो क्या वह अगले जन्म में पूर्ण होती है|
- इच्छा काया इच्छा माया इच्छा जगत बनाया । इच्छा पार हैं जो विचरत उनका पार न पाया । वास्तव में आपका अभी का ही जन्म शरीर लाखों वर्ष पूर्व ( तक ) के कई जन्मों के इच्छा रूपी समूह का ही आकार है । सीधी सी बात है । वह अगले ( जब भी आपको अगला मनुष्य जन्म मिले ) जन्म में पूर्ण होगी । यदि खुद कर पाये तो । नहीं तो भगवान के पास ठेका नहीं है । किसी की इच्छायें पूरी करने का । क्योंकि जैसा ही आपका ये जन्म है । वैसे ही आगे भी होंगे । यदि कर्मठता और लगन है । तो सभी इच्छायें इसी जन्म में पूरी की जा सकती हैं । बल्कि इसकी अन्तिम परिणति इच्छा होते ही तत्क्षण पूरा हो जाना है - जो इच्छा करिहौ मन माहीं । राम कृपा कछु दुर्लभ नाहीं । सकल पदारथ हैं जग माहीं । कर्महीन नर पावत नाहीं ।
मुकेश शर्मा । अलवर ।

02 जुलाई 2013

जो नहीं कहा जा सकता

बुद्ध के पास 1 आदमी आया । उसने कहा - जो नहीं कहा जा सकता । वही सुनने आया हूं । बुद्ध ने आंखें बंद कर लीं । बुद्ध को आंखें बंद किये देख वह आदमी भी आंख बंद करके बैठ गया । आनंद पास ही बैठा था बुद्ध का अनुचर । सदा का सेवक । सजग हो गया कि मामला क्या है ? झपकी खा रहा होगा । बैठा बैठा करेगा क्या । जम्हाई ले रहा होगा । देखा कि मामला क्या है ? इस आदमी ने कहा - जो नहीं कहा जा सकता । वही सुनने आया हूं । और बुद्ध आंख बंद करके चुप भी हो गये । और यह भी आंख बंद करके बैठ गया । दोनों किसी मस्ती में खो गये । कहीं दूर..। शून्य में दोनों का जैसे मिलन होने लगा । आनंद देख रहा है । कुछ हो जरूर रहा है । मगर शब्द नहीं कहे जा रहे है । न इधर से । न उधर से । न ओंठ से बन रहे हैं शब्द । न कान तक जा रहे हैं शब्द । मगर कुछ हो जरूर रहा है । कुछ अदृश्य उपस्थिति उसे अनुभव हुई । जैसे किसी 1 ही आभामंडल में दोनों डूब गये । और वह आदमी आधी घड़ी बाद उठा । उसकी आंखों से आनंद के आंसू बह रहे थे । झुका बुद्ध के चरणों में । प्रणाम किये । और कहा - धन्य भाग मेरे ! बस ऐसे ही आदमी की तलाश में था । जो बिना कहे कह दे । और आपने खूब सुंदरता से कह दिया । मैं तृप्त होकर जा रहा हूं ।
वह आदमी रोता आनंदमग्न, बुद्ध से विदा हुआ । उसके विदा होते ही आनंद ने पूछा कि मामला क्या है ? हुआ क्या ? न आप कुछ बोले । न उसने कुछ सुना । और जब वह जाने लगा । और उसने आपके पैर छुए । तो आपने इतनी गहनता से उसे आशीष दिया । उसके सिर पर हाथ रखा । जैसा आप शायद ही कभी किसी के सिर पर हाथ रखते हों । बात क्या है । इसकी गुणवत्ता क्या थी ?
बुद्ध ने कहा - आनंद ! तू जानता है । जब तू जवान था । हम सब जवान थे । सगे भाई थे । चचेरे भाई थे । बुद्ध और आनंद, 1 ही राजघर में पले थे । एक ही साथ बड़े हुए थे । तो तुझे घोड़ों से बहुत प्रेम था । तू जानता है न । कुछ घोड़े होते हैं कि उनको मारो । तो भी ठिठक जाते हैं । मारते जाओ । तो भी नहीं हटते । बड़े जिद्दी होते हैं । फिर कुछ घोड़े होते हैं । उनको जरा चोट करो कि चल पड़ते हैं । फिर कुछ घोड़े होते हैं । उनको चोट नहीं करनी पड़ती । सिर्फ कोड़ा फटकारो । आवाज कर दो । मारो मत । और चल पड़ते हैं । और भी कुछ घोड़े होते हैं । तू जानता है भलीभांति । जिनको कोड़े की आवाज करना भी अपमानजनक मालूम होगा । जो सिर्फ कोड़े की छाया देखकर चलते हैं । यह उन्हीं घोड़ों में से 1 था । कोड़े की छाया । मैंने इससे कुछ कहा नहीं । मैं सिर्फ अपनी शून्यता में लीन हो गया । इसे बस मेरी छाया दिख गयी । सत्संग हो गया । इसका नाम सत्संग ।
और ऐसा नहीं है कि बुद्ध बोलते नहीं हैं । जो बोलना ही समझ सकते हैं । उनसे बोलते हैं । जो धीरे धीरे न बोलने को समझने लगते हैं । उनसे नहीं भी बोलते हैं । बोलना 'नहीं बोलने' की तैयारी है ।
सत्संग के 2 रूप हैं । एक जब गुरु बोलता है । क्योंकि अभी तुम बोलना ही समझ सकोगे । बोलना भी समझ जाओ तो बहुत । फिर दूसरी घड़ी आती है - परम घड़ी । जब बोलने का कोई सवाल नहीं रह जाता । जब गुरु बैठता है । तुम पास बैठे होते हो । इस घड़ी को पुराने दिनों में उपनिषद कहते थे । गुरु के पास बैठना । इसी पास बैठने में हमारे उपनिषद पैदा हुए हैं । उनका नाम भी उपनिषद पड़ गया । गुरु के पास बैठ बैठकर शून्य 0 में जो संगीत सुना गया था । उसको ही संग्रहीत किया गया है । उन्हीं से उपनिषद बने । उपनिषद का मतलब होता है - पास बैठना, सत्संग । ओशो

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