03 जुलाई 2013

शिवजी कैलाश पर दिखाई क्यों नहीं देते - मुकेश



मुकेश शर्मा पोस्ट " ये ही मिस्टर परमात्मा है ? " पर  टिप्पणी । 
गुरूजी आपको मेरा शत शत प्रणाम । मेरे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों के उत्तर के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । पुनः आपकी सेवा में उपस्थित हूँ|
1 - सूक्ष्म । स्थूल । कारण शरीर के बारे में कृपया विस्तार से बतलाईए । 
- स्थूल शरीर आपका यही पंच भौतिक शरीर ही होता है । जो आम आदमी को दिखता है । बाह्य व्यवहार में आता है । ये किसी भी एक जीवन के लिये ही होता है । फ़िर चाहे वह मनुष्य योनि हो । या फ़िर 84 लाख योनियों का कोई भी शरीर । इसके बाद दूसरे नम्बर पर सूक्ष्म शरीर होता है । जो मन । बुद्धि । चित्त । अहम इन चार अंगों से निर्मित होता है । मृत्यु के बाद यही शरीर से बाहर जाता है । इसी को जीवात्मा भी कहते हैं । अगर इसको आम आदमी देख सके । तो इसमें और इस शरीर के मृतक व्यक्ति में कोई फ़र्क नहीं होता । इसीलिये मृतक से परिचित व्यक्ति को यदि मृतक प्रेत रूप में दिखे । तो वह उसे आसानी से पहचान लेता है । आपका पूरा पाप पुण्य लेखा जोखा भी इसमें समाहित होता है । क्योंकि मृत्यु के बाद मृतक का सिर्फ़ स्थूल ही नष्ट होता है । सूक्ष्म सहित शेष पांच शरीर आवरण इसी शरीर में समाये होते हैं । यदि किसी को अपने पुण्य कार्यों आदि के फ़लस्वरूप कोई दिव्य या अन्य शरीर प्राप्त होता है । तब भी उसका ढांचा सूक्ष्म शरीर ही होता है । सूक्ष्म शरीर का बङा विज्ञान है । जो कम शब्दों में नहीं बताया जा सकता है । तीसरे
कारण शरीर में आपके वे कारण बीज समाये होते हैं । जिनके कारण आपको असंख्यों 
विभिन्न शरीर मिलते रहे हैं । और मिलते रहेंगे । वास्तव में एक भाव में आपको सपना भी कारण शरीर के कारण ही आता है । दरअसल ये सभी विषय ऐसे हैं । जिन पर विस्तार से सिर्फ़ पुस्तक में ही लिखा जा सकता है ।
2 - क्या सब कुछ पूर्व लिखित होता ​है ? गीता में एक और कहा गया है कि सभी कार्य मेरी ही प्रेरणा से सभी जीव करते हैं । और एक और कहा गया है कि सभी कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं । बुद्ध को भी जब आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ । तो उन्होंने पूर्व और भविष्य के आत्म ज्ञानियों को प्रणाम किया था| कृपया इस बात को विस्तार से बतायें । 
- जो आपको अभी पूर्व लिखित लग रहा है । वो कर्म आधार पर आपने ही पहले स्वयं लिखा था । और आज जो भी आप लिख रहे हैं । वह आगे फ़लित होगा । आपके पूर्व जन्म के कर्मफ़ल के आधार पर भाग्य ठीक उसी तरह से है । जैसे आपने पहले कमाकर अपने घर में दाल चावल मक्खन मलाई और फ़्रिज टीवी जैसे सभी सामान इकठ्ठा किये हों । और आगे उससे सुख उठायेंगे । या दुख ? ये आपकी बुद्धि विवेक और दूसरी अन्य चीजों पर निर्भर करता है । दूसरे उदाहरण में आपकी आज खोली गयी दुकान ( संचित धन या वस्तु आदि ) भाग्य की तरह है । लेकिन अब आगे उस दुकान से आप कमाते हैं । या गंवाते हैं । ये कर्म आपका अग्रिम कर्मफ़ल बनायेगा । थोङा सोचने से आराम से समझा जा सकता है । श्रीकृष्ण तो सभी जानते हैं । नम्बर 1 के झूठे थे । लेकिन वास्तव में इस बात का काफ़ी गहरा अर्थ है । चेतना और प्रेरणा आत्मदेव और प्रकृति के मिले जुले सौजन्य से होती है । और श्रीकृष्ण आत्म रूप में ही अपनी बात कह रहे थे । बुद्ध को वैसे आत्मज्ञान तो प्राप्त नहीं हुआ था । शून्य ज्ञान आदि ही प्राप्त हुआ था । फ़िर भी एक परम्परा वश ऐसा आंतरिक क्रियाओं में स्व प्रेरित ही होता है । यदि आप एक चीज को मानें कि जो आपके अनुभव में आये । वही सबसे बङा सत्य है । इतिहास जहाँ मूल जानकारी देता है । वहीं बारीक तथ्यों में भृम पैदा कर देता है । आप किसी भी चरित्र का गहराई से समग्र अध्ययन करें । तो तमाम विरोधाभास उसी एक चरित्र में उत्पन्न हो जायेंगे ।
3 - ​गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं - मैं निराकार भी हूँ । साकार भी हूँ । इसका मतलब क्या है ? 
- बेचारे श्रीकृष्ण भगवान क्या मिट्टी लोहा सोना पानी खुद आप भी यानी सृष्टि का हर पदार्थ अपनी मूल अवस्था में निराकार ही है । और जरूरत के अनुसार साकार हो जाता है । लोहे के चूर्ण ( मूल निराकार पदार्थ ) से लोहे की छङ बनती हैं । फ़िर उससे कितने तरह की वस्तुयें ( साकार ) बनती हैं । आप गिनती कर सकते हैं । सोने की धूल से सोने के बिस्कुट बनाकर कितने तरह के आभूषण और दूसरी अन्य चीजें बनती हैं । कोई गिन सकता है । पानी से भाप ओस बादल बर्फ़ क्या क्या बनता है । आप जानते ही होंगे । इसलिये श्रीकृष्ण बेकार में शेखी मारते हैं कि मैं साकार निराकार हूँ । यहाँ मैं एक अजीब बात कहता हूँ । वास्तव में - मैं न साकार हूँ । न निराकार हूँ । मैं जो हूँ । वो हूँ । और वह न साकार है । न निराकार है । न सत्य है । न असत्य है । मूल रूप में वह जो है । सो है । और वह क्या है ? वह शब्दों में ज्यों का त्यों नहीं बताया जा सकता । क्योंकि वह निर्वाणी है ।
4 - वेदों की रचना के बारे में आपका क्या मानना है । वेद मानव निर्मित हैं ? अथवा ... ?
- वेदों की छोङिये । मनुष्य मनुष्य ज्ञान के स्तर पर सन्त कवियों का कोई भी एक दोहा ही लिखकर दिखा दे । एक उदाहरण देखें । आत्मज्ञान से रहित । सिर्फ़ ( भगवान के ) भक्त श्रेणी के एक मुसलमान सन्त कवि का दोहा - कदली सीप भुजंग मुख । स्वांति एक गुण तीन । क्या कोई भी मनुष्य कभी ये बता सकता है कि स्वांति नक्षत्र की एक बूँद कदली  ( केला ) में गिरने पर कपूर । सीप में मोती । और सर्प के मुख में विष बन जाती है । बूँद एक ही । पर 3 अलग अलग परिणाम । जब प्रथम और पूर्ण आदि पुरुष यानी काल पुरुष पहली बार ही अस्तित्व में आया । तब उसकी स्वांसों से वेद रूपी ज्ञान विज्ञान ( सही भाव में सृष्टि का संविधान ) प्रकट हुआ । इसका मतलव था । सृष्टि के पदार्थ इस तरह के आदेशित नियम पर कार्य करेंगे । अगर वेदों को प्रमाणिक और जीवन्त स्तर पर जानना है । तो आज भी स्वांस ( कुण्डलिनी के मुख्य योग ) द्वारा काल पुरुष के बराबर स्थिति पर पहुँच कर जाना जा सकता है ।
6 - जैसा रूप बृह्मा । विष्णु । महेश का पुराणों में वर्णित है । और उनके बारे में जैसा वर्णित है । वह तो मनुष्य की तरह ही है । परन्तु वे तो भगवान हैं । ये सत्य है । या कोई गूढ ( गहराई) वाली बातें । जो मनुष्य समझ नहीं पाता । 
- भगवान एक पद है । हँस दीक्षा के बाद हँस ज्ञान को पूरा कर लेने वाला और कुण्डलिनी में सायुज्य आदि मुक्ति ज्ञान और भी तरीके हैं को पूरा कर लेने वाला भगवान या भगवान के समतुल्य ही हो जाता है । अखिल सृष्टि में बृह्मा विष्णु महेश या अन्य स्तरीय पदों की भरमार असंख्य रूप से है । आदि सृष्टि में जब विभिन्न शरीरों का निर्माण हो रहा था । तब सबसे श्रेष्ठ शरीर आकार मनुष्य आकार ही माना गया । इसलिये सूक्ष्म शरीर के ढांचे के ऊपर इसी काया ( आकार ) को ओढाने का विधान हुआ । वैसे ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं । दिव्य लोग स्वेच्छा अनुसार अलग शरीर भी गृहण कर लेते हैं । जैसे लक्ष्मी मित्तल और अम्बानी आदि भी मनुष्य ही हैं । पर वे तमाम मनुष्यों के लिये भगवान के बराबर ही हैं । गहराई से चिंतन करें । तो आसानी से समझ में आ जायेगा ।
7 - कहते हैं । शिवजी कैलाश पर रहते हैं । तो वो अब दिखाई क्यों नहीं देते।
​- शंकर इस तिब्बत वाले कैलाश पर नहीं रह्ते । न हीं अमरनाथ में रह्ते हैं । न हीं प्रथ्वी पर अन्य कहीं रह्ते हैं । यह सभी प्रतीक और सिद्ध स्थान हैं । जो विभिन्न अलौकिक आवश्यकताओं वश सिद्ध हुये हैं । जहाँ तक दिखाई देने की बात है । लोगों ने आज तक मुझे नहीं देखा । अभी तक श्री महाराज जी के अतिरिक्त मुझे किसी ने नहीं देखा । हालांकि मेरे द्वारा प्रेरित बहुत से शिष्यों को यह भृम है कि वे मुझसे मिले । देखा । बातचीत की । पर वास्तव में यह पूरी तरह से असत्य है । उन्होंने हवा की शीतलता की भांति मुझे अहसास अवश्य किया है । पर देखा कभी नहीं । इसलिये ये दिखने वाला विज्ञान अलग ही है । ये सभी चीजें तीसरे नेत्र और स्थिति से दिखती हैं ।
8 - गीता में कहा गया है कि 5 कर्म इन्द्रिय ​5 ज्ञान इन्द्रिय 11 वां मन । उससे परे भूत । और उससे भी परे मैं हूँ । तो क्या आत्मा परमात्मा का रूप नहीं है ? 
- वैसे मैं सीता और गीता के चक्कर में कम ही पङा हूँ । फ़िर भी गीता में सही ही लिखा है । 5 कर्म इन्द्रिय ( हाथ । पैर । मुँह । लिंग या योनि । और गुदा । ) 5 ज्ञान इन्द्रिय ( आँख । कान । नाक । जीभ । त्वचा ) और 11 वां मन । इनसे मिलकर मनुष्य शरीर बना । और वह मनुष्य शरीर अपने भूत ( कालीन कर्मों के आधार पर ) से वर्तमान और फ़िर भविष्य बनेगा । आज का वर्तमान + भविष्य आगे फ़िर भूत बन जायेगा । जाहिर है । चेतना से प्रकृति पदार्थ द्वारा शरीर बन बिगङ रहा है । और अन्य क्रियायें हो रही हैं । लेकिन मूल आत्मा ज्यों का त्यों अलग और निर्लेप है । न तो वह भी नष्ट हो गया होता । वास्तव में जिस तरह परे कार्वन लाइट ( आत्मा ) से अलग अलग चलचित्र ( रील में बने कारण + सृष्टि पदार्थ ) विभिन्न नायक नायिकाओं ( तरह तरह के जीवन ) के फ़िल्मी परदे ( मायावी सृष्टि । जिसका परदा धरती आकाश आदि है । बृह्माण्ड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति वेद कहे ) पर चलते रहते हैं । उसमें श्रीकृष्ण वाली बात फ़िट होती है कि नहीं । श्रीकृष्ण बातें बनाने के उस्ताद थे । वास्तव में आप खुद या दूसरे सभी । सभी के साथ यही सिद्धांत है । जिसको आपने आत्मा शब्द लिखा है । वहाँ दरअसल आपको जीवात्मा लिखना चाहिये था । जीवात्मा आत्मा का ही अंश है । और परमात्मा जैसा कुछ नहीं होता । इसका शुद्ध शब्द आत्मा ही है । लेकिन आदि सृष्टि के बाद से ही आत्मा को ही परमात्मा भी कहा जाने लगा । क्योंकि यह सबमें होने के बाबजूद भी सबसे परे है । इसलिये आत्मा में परे के अनुसार पर जुङकर परमात्मा हुआ ।
9 - गीता में कहा है कि सभी जीव मुझसे ऐसे जुङे हैं । जैसे मोती माला में पिरे होते हैं । सबसे परे मैं हूँ । तो परमात्मा परे कैसे है ?
- संसार में इसका सबसे अच्छा उदाहरण विधुत ऊर्जा ही है । जो वास्तव में आत्मा - चेतन गुण ( चेतना ) - विभिन्न ट्रांसफ़ार्मर - विधुत तारें - फ़िर विभिन्न उपकरण । अब आप देखिये । बिजली से ही तो सभी जुङे हैं । क्रियाशील हैं । जैसे माला में मोती । फ़िर भी बिजली सबसे परे है । सबसे सयुंक्त भी । और एकदम परे भी । और उसे किसी ने कभी देखा भी नहीं । मैंने कई बार कहा है । आत्मा का मुख्य गुण चेतना है । और ये गुण आत्मा के अतिरिक्त किसी में नहीं है । अतः चेतना और फ़िर ऊर्जा के जितने भी स्रोत आपको नजर आते हैं । वह सभी इसी चेतन ऊर्जा के रूपांतरण हैं ।
10 - यदि इस जन्म में हमारी कोई इच्छा अधूरी रह जाती है । तो क्या वह अगले जन्म में पूर्ण होती है|
- इच्छा काया इच्छा माया इच्छा जगत बनाया । इच्छा पार हैं जो विचरत उनका पार न पाया । वास्तव में आपका अभी का ही जन्म शरीर लाखों वर्ष पूर्व ( तक ) के कई जन्मों के इच्छा रूपी समूह का ही आकार है । सीधी सी बात है । वह अगले ( जब भी आपको अगला मनुष्य जन्म मिले ) जन्म में पूर्ण होगी । यदि खुद कर पाये तो । नहीं तो भगवान के पास ठेका नहीं है । किसी की इच्छायें पूरी करने का । क्योंकि जैसा ही आपका ये जन्म है । वैसे ही आगे भी होंगे । यदि कर्मठता और लगन है । तो सभी इच्छायें इसी जन्म में पूरी की जा सकती हैं । बल्कि इसकी अन्तिम परिणति इच्छा होते ही तत्क्षण पूरा हो जाना है - जो इच्छा करिहौ मन माहीं । राम कृपा कछु दुर्लभ नाहीं । सकल पदारथ हैं जग माहीं । कर्महीन नर पावत नाहीं ।
मुकेश शर्मा । अलवर ।
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