31 अगस्त 2011

आर्य वचन दुःख देते हैं

जीवन दर्द का झरना है । जो भी जीते हैं । दर्द भोगते हैं । और दर्द भोगते भोगते ही हमें मरना है । दर्द नियति की दुकान की निहाई है ।
दर्द भगवान के हाथ का हथौड़ा है । देवता हम पर चोटें देकर हमें संवारता और गढ़ता है । शायद यह बात सच है कि आदमी दर्द में विकसित होता । खूबसूरत बनता और बढ़ता है । तो दर्द एकदम व्यर्थ नहीं हैं । दुख एकदम व्यर्थ नहीं हैं । दुख है बाहर । लेकिन वही चोट निहाई बनती । हथौड़ा बन जाती । वही चोट छेनी बन जाती । वही चोट तुम्हारे भीतर से जो जो व्यर्थ है । उसे काट देती । जला देती है । वही चोट तुम्हें जगाती है । देवता हम पर चोटें देकर हमें संवारता और गढ़ता है । दर्द नियति के दुकान की निहाई है । दर्द भगवान के हाथ का हथौड़ा है । शायद यह बात सच है कि आदमी दर्द में विकसित होता ।
खूबसूरत बनता और बढ़ता है - ओशो ।

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मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि तुम जहां हो । वहीं मजे में हो जाओ । न फकीर बनने की जरूरत है । न सम्राट बनने की जरूरत है । सम्राट हो । तो भी ठीक चलेगा । फकीर हो । तो भी चलेगा । न फकीरी पकड़ो । न बादशाहत पकड़ो । पकड़ो मत । जो है । जो उपलब्ध हुआ है । उसे प्रभु का प्रसाद समझकर स्वीकार करो । और जल में कमलवत रहना सीखो । रहो जल में । लेकिन जल छुए न । पकड़ने छोड़ने की बात नहीं है । अस्पर्शित रहने की बात है । और उस प्रक्रिया को ही मैं ध्यान कहता हूं । सब करते रहोगे । संसार का कृत्य काम, बाजार, दुकान और भीतर कोई दूर पारदर्शक बना बैठा रहेगा । साक्षी । देखता रहेगा । उस दर्शक को । उस साक्षी को । उस द्रष्टा को कुछ भी न छूएगा - ओशो 
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A serious person can never be innocent, and one who is innocent can never be serious.- Osho
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मान बड़ाई देखि कर । भक्ति करै संसार ।
जब देखैं कछु हीनता । अवगुन धरै गंवार ।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि - दूसरों की देखा देखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं । पर जब वह नहीं मिलता । वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं ।
अंतर्मन की शांति । इस जगत में कौन है । जो शांति नहीं चाहता ? लेकिन न लोगों को इसका बोध है । और न वे उन बातों को चाहते हैं । जिनसे कि शांति मिलती है । अंतरात्मा शांति चाहती है । लेकिन हम जो करते हैं । उसमें अशांति ही बढ़ती है । स्मरण रहे कि महत्वाकांक्षा अशांति का मूल है । जिसे शांति चाहनी है । उसे महत्वाकांक्षा छोड़ देनी पड़ती है । शांति का प्रारंभ वहां से है । जहां कि महत्वाकांक्षा अंत होती है । जोशुआ लीबमेन ने लिखा है - मैं जब युवा था । तब जीवन में क्या पाना है ? इसके बहुत स्वपन देखता था । फिर एक दिन मैंने सूची बनाई थी । उन सब तत्वों को पाने की । जिन्हें पाकर व्यक्ति धन्यता को उपलब्ध होता है । स्वास्थ्य, सौंदर्य, सुयश, शक्ति, संपत्ति । उस सूची में सब कुछ था । उस सूची को लेकर मैं एक बुजुर्ग के पास गया । और उनसे कहा कि क्या इन बातों में जीवन की सब उपलब्धियां नहीं आ जाती हैं ? मेरी बातों को सुन और मेरी सूची को देख उन वृद्ध की आंखों के पास हंसी इकठ्ठा होने लगी थी । और वे बोले थे - मेरे बेटे ! बड़ी सुंदर सूची है । अत्यंत विचार से तुमने इसे बनाया है । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात तुम छोड़ ही गये हो । जिसके अभाव में शेष सब व्यर्थ हो जाता है । किंतु उस तत्व के दर्शन, मात्र विचार से नहीं । अनुभव से ही होते हैं । मैंने पूछा - वह क्या है ? क्योंकि मेरी दृष्टिं में तो सब कुछ ही आ गया था । उन वृद्ध ने उत्तर में मेरी पूरी सूची को निर्ममता के साथ काट दिया । और उन सारे शब्दों की जगह उन्होंने छोटे से तीन शब्द लिखे - मन की शांति । शांति को चाहो । लेकिन ध्यान रहे कि उसे तुम अपने भीतर नहीं पाते हो । तो कहीं भी नहीं पा सकोगे । शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं है । वह तो स्वयं का ही ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में भीतर संगीत बना रहे । अंतस के संगीत पूर्ण हो उठने का नाम ही शांति है । वह कोई रिक्त और खाली मन:स्थिति नहीं है । किंतु अत्यंत विधायक संगीत की भाव दशा है - ओशो ।
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निंदा रस निम्न विचार तीव्रता से फैलता है - ओशो । आप हैरान होंगे जानकर कि आपको हमेशा अनार्य वचनों में आनंद मिलता है क्यों ? क्योंकि जब भी कोई अनार्य वचन आप सुनते हैं क्षुद्र । तो पहली तो बात उसे एकदम समझ पाते हैं । क्योंकि वह आपकी भाषा है । दूसरी बात उसे सुनकर आप आश्वस्त होते है कि मैं ही बुरा नहीं हूं । सारा जगत ऐसा ही है । तीसरा उसे सुनते ही आपको जो श्रेष्ठता का चुनाव है । वह जो चुनौती है आर्यत्व की । उसकी पीड़ा मिट जाती है । सब उत्तरदायित्व गिर जाता है । ऐसा समझें । फ्रायड ने कहा कि - मनुष्य एक कामुक प्राणी है । यह अनार्य वचन है । असत्य नहीं है । सत्य है । लेकिन क्षुद्र सत्य है । निकृष्टतम सत्य है । आदमी की कीचड़ के बाबत सत्य है कि आदमी के बाबत सत्य नहीं है कि आदमी सेक्सुअल है कि आदमी के सारे कृत्य कामवासना से बंधे हैं । वह जो भी कर रहा है । कामवासना ही है । छोटे से बच्चे से लेकर बूढे आदमी तक सारी चेष्टा कामवासना की चेष्टा है । यह सत्य है । लेकिन क्षुद्र सत्य है । यह निम्नतम सत्य है - कीचड़ का । लेकिन सारी दुनिया में इस कीचड़ के सत्य ने लोगों को बड़ा आश्वासन दिया । लोगों ने कहा - तब ठीक है । तब हम ठीक है । जैसे हैं । फिर बुराई नहीं है । फिर अगर चौबीस घंटे कामवासना के संबंध में ही सोचता हूं । और नग्न स्त्रियां मेरे सपनों में तैरती हैं । तो जोकर रहा हूं । वह नैसर्गिक है । अगर मैं शरीर में ही जीता हूं । तो यह जीना ही तो वास्तविक है । फ्रायड कह रहा है । फ्रायड ने हमारे निम्नतम को परिपुष्ट किया । इसलिए फ्रायड के वचन थोड़े ही दिनों में सारे जगत में फैल गये । जितनी तीव्रता से साइको एनालिससि का । फ्रायड का आंदोलन फैला । दुनिया में काई आंदोलन नहीं फैला । महावीर को पचीस सौ साल हो गये । उपनिषदों को लिखे । और पुराना समय हुआ । गीता कहे । और भी समय व्यतीत हो गया । पाँच हजार साल हो गये । पाँच हजार सालों में भी उन्होंने कहा है । वह इतनी आग की तरह नहीं फैला । जो फ्रायड ने पिछले पचास सालों में सारी दुनिया को पकड़ लिया । साहित्य, फिल्म, गीत, चित्र । सब फ्रायडियन हो गये है । हर चीज फ्रायड के दृष्टिकोण से सोची और समझी जाने लगी है । क्या कारण होगा ? अनार्य वचन हमारे निम्नतम को पुष्ट करते है । जब भी कोई हमारे निम्नतम को पुष्ट करता है । तो हमें राहत मिलती है । हमें लगता है कि ठीक है । हम में कोई गड़बड़ नहीं है । अपराध का भाव छूट जाता है । बेचैनी छूट जाती है कि कुछ होना है कि कहीं जाना है कि कोई शिखर छूना है । सीधी जमीन पर चलने की स्वीकृति आ जाती है । कोई निंदा नहीं । आदमी ऐसा ही है । सभी आदमी ऐसे ही हैं । इसलिए हम सब दूसरों के संबंध में बुराई सुनकर प्रसन्न होते हैं । कोई निंदा करता है किसी की । हमें प्रसन्नता और भी ज्यादा होती है । क्योंकि यह पक्का हो जाता है कि महात्मा वहात्मा कोई हो नहीं सकता । सब ऊपरी बातचीत है । हैं तो सब मेरे ही जैसे । किसी का पता चल गया है । और किसी का पता नहीं चला है । तो जब भी आपको किसी की निंदा में रस आता है । तब आप समझना कि आप क्या कर रहे हैं । आप अपने निम्नतम को पुष्ट कर रहे हैं । आप यह कह रहे है कि अब कोई चुनौती नहीं । कोई चैलेंज नहीं । कहीं जाना नहीं । कुछ होना नहीं । जो मैं हूं । इसी कीचड़ में मुझे जीना है । और मर जाना है । यही कीचड़ जीवन है । अनार्य वचन बड़ा सुख देते हैं । बहुत अनार्य वचन प्रचलित हैं । हम सबको पता है कि अनार्य वचन तीव्रता से फैलते जा रहे हैं । और धीरे धीरे हम यह भी भूल गये है कि वे अनार्य वचन हैं । सब चीजों को जो लोएस्ट डिनामिनेटर है । जो निम्नतम तत्व है । उससे समझाने की कोशिश चल रही है । आदमी को रिडयूस करके आखरी चीज पर खड़ा कर देना है । जैसे हम आदमी को काटें पीटें । तो क्या पायेंगे । जो श्रेष्ठतम है । व हमारे उपकरणों से छूट जाता है । अगर आदमी के व्यवहार की हम जांच पड़ताल करें । तो क्या मिलेगा ? कामवासना मिलेगी । वासना मिलेगी । दौड़ मिलेगी । महत्वाकांक्षा की । फिर हर श्रेष्ठ चीज को हम निकृष्ट से समझा लेंगे । ऐसे ही जैसे हम कहेंगे - कमल में क्या रखा है । कीचड़ ही तो है । यह एक ढंग हुआ । इससे हम कीचड़ को राज़ी कर लेंगे कि कमल होने की मेहनत में मत लग । कमल में भी क्या रखा है । बस कीचड़ की है । तो कीचड़ की कमल होने की जो आकांक्षा पैदा हो सकती थी । वह कुंद हो जायेगी । कीचड़ शिथिल होकर बैठ जायेगी । अपनी जगह क्यों व्यर्थ दौड़ धूप करना । क्यों परेशान होना । अनार्य वचन सुख देते हैं । आर्य वचन दुःख देते हैं । महावीर कहते हैं - जो आर्य वचन में आनंद ले सके । वह ब्राह्मण है । भला वह अभी आर्य हो न गया हो । लेकिन आर्य वचनों मे आनंद लेने का अर्थ यह है कि चुनौती स्वीकार कर रहा है । जीवन के शिखर तक पहुंचने की आकांक्षा को जागने दे रहा है । आर्य वचन में आनंद लेने का अर्थ है । हम संभावना का द्वार खोल रहे हैं - ओशो ।

30 अगस्त 2011

फ्रायड ठीक कहता है



बुद्ध परम होश हैं । शुद्ध बोध हैं । खुले आकाश जैसे हैं । वे निश्चित नहीं है । निश्चित होने को क्या है ? वे अनिश्चित भी नहीं है । अनिश्चित होने का क्या है ? केवल वही अनिश्चित हो सकता है । जो निश्चित की खोज में है । मन सदा अनिश्चित रहता है । और निश्चय की खोज करता है । मन सदा कन्फ्यूज रहता है । और क्लैरिटी की तलाश करता है । बुद्ध ने मन को ही गिरा दिया है । और मन के साथ सारे विभ्रम को । सारे निश्चय अनिश्चय को,सब कुछ को गिरा दिया है - ओशो ************* एक काफिला सफ़र के दौरान अंधेरी सुरंग से गुजर रहा था । उनके पैरों में कंकरिया चुभी । कुछ लोगों ने इस ख्याल से कि किसी और को ना चुभ जाये । नेकी की खातिर उठाकर जेब में रख ली । कुछ ने ज्यादा उठाई । कुछ ने कम । जब अँधेरी सुरंग से बाहर आये । तो देखा । वो हीरे थे । जिन्होंने कम उठाये । वो पछताए कि ज्यादा क्यों नहीं उठाए । जिन्होंने नहीं उठाए । वो और पछताए । दुनिया में जिन्दगी की मिसाल इस अँधेरी सुरंग जैसी है । और नेकी यहाँ कंकरियों की मानिंद है । इस जिंदगी में जो नेकी की । वो आखिर में हीरे की तरह कीमती होगी । और इन्सान तरसेगा कि और ज्यादा क्यों ना की ।
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मन और सेक्स । फ्रायड ठीक कहता है कि मनुष्य का मन सेक्स के आसपास ही घूमता है । लेकिन वह यह गलत कहता है कि सेक्स बहुत महत्त्वपूर्ण है । इसलिए घूमता है । नहीं । घुमने का कारण है - वर्जना । इनकार । विरोध । निषेध । घूमने का कारण है - हजारो साल की परंपरा । सेक्स को टैबू, वर्जित, निन्दित, गर्हित सिद्ध करने वाली परंपरा । सेक्स को इतना महत्त्वपूर्ण बनाने वालो में साधू संतो, महात्माओ का हाथ है । उन्होंने तख्तियां लटकाई वर्जना की । यह बड़ा उल्टा मालूम पड़ेगा । लेकिन यही सत्य है । और कहना ज़रूरी है । मनुष्य जाति को सेक्सुअलिटी की, कामुकता की तरफ ले जाने का काम महात्माओ ने ही किया है । जितने जोर से वर्जना लगाई है उन्होंने ।

आदमी उतने जोर से आतुर होकर भागने लगा है । इधर वर्जना लगा दी है । उसका परिणाम यह हुआ है कि सेक्स रग रग से फूटकर निकल पड़ा है । कविता - थोड़ी खोजबीन करो । ऊपर की राख हटाओ । भीतर सेक्स मिलेगा । चित्र देखो । मूर्ति देखो । सिनेमा देखो । और साधू संत इस वक़्त सिनेमा के बहुत खिलाफ हैं । और उन्हें पता नहीं कि सिनेमा नहीं था । तो भी आदमी यही करता था । कालिदास के ग्रन्थ पढो । कोई फिल्म इतनी अश्लील नहीं बन सकती । जितने कालिदास के वचन है । उठाकर देखो पुराना साहित्य । पुराणी मूर्तियां देखो । पुराने मंदिर देखो । जो फिल्म में है । वह पत्थरों में खुदा मिलेगा । लेकिन आँख नहीं खुलती हमारी । अंधे की तरह पीटते चले जाते है लकीरों को । सेक्स जब तक दमन किया जायेगा । और जब तक स्वस्थ खुले आकाश में उसकी बात न होगी । और जब तक एक एक बच्चे के मन से वर्जना की तख्ती नहीं हटेगी । तब तक दुनिया सेक्स के पागलपन से मुक्त नहीं हो सकती है । तब तक सेक्स एक रोग की तरह आदमी को पकडे रहेगा - ओशो ।
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कुतूहल, जिज्ञासा और मुमुक्षु । मुमुक्षु गुरु को खोजता है । जिज्ञासु शास्त्र को खोजता है । कुतूहली किसी से भी पूछ लेता है । मनुष्य तीन तरह से पूछ सकता है । एक कुतूहल होता है - बच्चों-जैसा । पूछने के लिए पूछ लिया । कोई जरूरत न थी । कोई प्यास भी न थी । कोई प्रयोजन भी न था । ऐसे ही मन की खुजली थी । उठ गया प्रश्न । पूछ लिया । उत्तर मिले तो ठीक । न मिले तो ठीक । दुबारा पूछने का भी खयाल नहीं आता । छोटे बच्चे जैसा पूछते हैं । रास्ते से गुजर रहे हैं । पूछते हैं - यह क्या है ? वृक्ष क्या है ? वृक्ष हरे क्यों हैं ? सूरज सुबह क्यों निकलता है । रात क्यों नहीं निकलता ? अगर तुमने उत्तर दिया । तो कोई उत्तर सुनने के लिए उनकी प्रतीक्षा नहीं है । जब तुम उत्तर दे रहे हो । तब तक वे दूसरा प्रश्न पूछने चले गये । तुम उत्तर न भी दो । तो भी कुछ जोर न डालेंगे कि उत्तर दो । तुम दो या न दो । यह असंगत है । प्रसंग के बाहर है । बच्चा पूछने के लिए पूछ रहा है । बच्चा केवल बुद्धि का अभ्यास कर रहा है । जैसा पहली दफे जब बच्चा चलता है । तो बारबार चलने की कोशिश करता है । कहीं पहुंचने के लिए नहीं । क्योंकि अभी बच्चे की क्या मंजिल है । अभी तो चलने में मजा लेता है । अभी तो पैर चला लेता है । इससे ही बड़ा प्रसन्न होता है । नाचता है कि मैं भी चलने लगा । अभी चलने का कोई संबंध मंजिल से नहीं है । अभी चलना अपने आप में ही अभ्यास है । ऐसा ही बच्चा जब बोलने लगता है । तो सिर्फ बोलने के लिए बोलता है । अभ्यास करता है । उसके बोलने में कोई अर्थ नहीं है । पूछना जब सीख लेता है । तो पूछने के लिए पूछता है । पूछने में कोई प्रश्न नहीं है । सिर्फ कुतूहल है । तो एक तो उस तरह के लोग हैं । वे बचकाने हैं । जो परमात्मा के संबंध में भी कुतूहल से पूछते हैं । मिले उत्तर, ठीक । न मिले उत्तर, ठीक । और कोई भी उत्तर मिले । उनके जीवन में उस उत्तर से कोई भी फर्क न होगा । तुम ईश्वर को मानते रहो । तो तुम वैसे ही जीओगे । तुम ईश्वर को न मानो । तो भी तुम वैसे ही जीओगे । यह बड़ी हैरानी की बात है कि नास्तिक और आस्तिक के जीवन में कोई फर्क नहीं होता । तुम जीवन को देख के बता सकते हो कि यह आदमी आस्तिक है । या नास्तिक । नहीं, तुम्हें पूछना पड़ता है कि क्या आप आस्तिक हैं ? या नास्तिक । आस्तिक और नास्तिक के व्यवहार में रत्ती भर का कोई फर्क नहीं होता । वैसा ही बेईमान यह । वैसा ही दूसरा । वे सब चचेरे मौसेरे भाई हैं । कोई अंतर नहीं है । एक ईश्वर को मानता है । एक ईश्वर को नहीं मानता है । इतनी बड़ी मान्यता । और जीवन में रत्ती भर भी छाया नहीं लाती । कहीं कोई रेखा नहीं खिंचती । दुकानदारी में वह उतना ही बेईमान है । जितना दूसरा । बोलने में उतना ही झूठा है । जितना दूसरा । न इसका भरोसा किया जा सकता है । न उसका । क्या जीवन में कोई अंतर नहीं आता आस्था से ? तो आस्था दो कौड़ी की है । तो आस्था कुतूहल से पैदा हुई होगी । वह बचकानी है । ऐसी बचकानी आस्था को छोड़ देना चाहिए । सबसे सतह पर कुतूहल है । दूसरे थोड़ी गहराई बढ़े । तो जिज्ञासा पैदा होती है । जिज्ञासा सिर्फ पूछने के लिए नहीं है । उत्तर की तलाश है । लेकिन तलाश बौद्धिक है । आत्मिक नहीं है । तलाश विचार की है । जीवन की नहीं है । जिज्ञासा से भरा हुआ आदमी । निश्चित ही उत्सुक है । और चाहता है कि उत्तर मिले । लेकिन उत्तर बुद्धि में संजो लिया जायेगा । स्मृति का अंग बनेगा । जानकारी बढ़ेगी । ज्ञान बढ़ेगा । आचरण नहीं । जीवन नहीं । उस आदमी को बदलेगा नहीं । वह आदमी वैसा ही रहेगा । ज्यादा जानकार हो जाएगा । जिज्ञासा पैदा होती है - बुद्धि से । फिर एक तीसरा तल है । जिसको - मुमुक्षा कहा है । मुमुक्षा का अर्थ है । जिज्ञासा सिर्फ बुद्धि की नहीं है । जीवन की है । इसलिए नहीं पूछ रहे हैं कि थोड़ा और जान लें । इसलिए पूछ रहे हैं कि जीवन दांव पर लगा है । इसलिए पूछ रहे हैं कि उत्तर पर निर्भर होगा कि हम कहां जाएं । क्या करें । कैसे जियें । एक प्यासा आदमी पूछता है - पानी कहां है ? यह कोई जिज्ञासा नहीं है । मरुस्थल में तुम पड़े हो । प्यास जगती है । और तुम पूछते हो । पानी कहां है ? उस क्षण तुम्हारा रोआं रोआं पूछता है । बुद्धि नहीं पूछती । उस क्षण तुम यह नहीं जानना चाहते कि पानी की वैज्ञानिक परिभाषा क्या है । उस समय कोई तुमसे कहे कि पानी पानी क्या लगा रखा है । एचटूओ । विज्ञान का उपयोग करो । फार्मूला जाहिर है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर पानी बनता है । दो मात्रा हाइड्रोजन, एक मात्रा ऑक्सीजन - एच टू ओ । लेकिन जो आदमी प्यासा है । उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पानी कैसे बनता है । यह सवाल नहीं है । पानी क्या है । यह भी सवाल नहीं है । यह कोई जिज्ञासा नहीं है । पानी के संबंध में जानकारी बढ़ाने के लिए । यहां जीवन दांव पर लगा है । अगर पानी नहीं मिलता घड़ी भर और । तो मृत्यु होगी । पानी पर ही जीवन निर्भर है । मृत्यु और जीवन का सवाल है । मुमुक्षा गुरु को खोजता है । जिज्ञासु शास्त्र को खोजता है । कुतूहली किसी से भी पूछ लेता है । कबीर उसको साधु कहते हैं । जो मुमुक्षु है । इसलिए उनका हर वचन इस बात को ध्यान में रखकर कहा गया है - सुनो भाई साधो । साधु का मतलब है - जो साधना के लिए उत्सुक है । जो साधक है । साधु का अर्थ है - जो अपने को बदलने के लिए, शुभ करने के लिए, सत्य करने के लिए आतुर है । जो साधु होने को उत्सुक है । साधु शब्द बड़ा अदभुत है । विकृत हो गया बहुत उपयाग से । साधु का अर्थ है - सीधा, सादा, सरल, सहज । साधु शब्द की बड़ी भाव भंगिमाएं हैं । और सीधा, सादा, सरल, सहज । यही साधना है । इसलिए कबीर कहते हैं - साधो, सहज समाधि भली । सहज हो रहो । सरल हो जाओ - ओशो । *********** प्रेम और सेक्स । आप जानकर हैरान होंगे - प्रेम और काम । प्रेम और सेक्स विरोधी चीजें हैं । जितना प्रेम विकसित होता है । सेक्स क्षीण हो जाता है । और जितना प्रेम कम होता है । उतना सेक्स ज्यादा हो जाता है । जिस आदमी में जितना ज्यादा प्रेम होगा । उतना उसमें सेक्स विलीन हो जाएगा । अगर आप परिपूर्ण प्रेम से भर जाएंगे । आपके भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी । और अगर आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है । तो आपके भीतर सब सेक्स है । सेक्स की जो शक्ति है । उसका परिवर्तन, उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है । अगर सेक्स से मुक्त होना है । तो सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा । उसे दबाकर कोई पागल हो सकता है । और दुनिया में जितने पागल हैं । उसमें से सौ में से नब्बे संख्या उन लोगों की है । जिन्होंने सेक्स की शक्ति को दबाने की कोशिश की है । और यह भी शायद आपको पता होगा कि सभ्यता जितनी विकसित होती है । उतने पागल बढ़ते जाते हैं । क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करवाती है । सभ्यता सबसे ज्यादा दमन, सप्रेशन सेक्स का करवाती है । और इसलिए हर आदमी अपने सेक्स को दबाता है । सिकोड़ता है । वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है । अनेक बीमारियां पैदा करता है । अनेक मानसिक रोग पैदा करता है । सेक्स को दबाने की जो भी चेष्टा है । वह पागलपन है । ढेर साधु पागल होते पाए जाते हैं । उसका कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं । और उनको पता नहीं है । सेक्स को दबाया नहीं जाता । प्रेम के द्वार खोलें । तो जो शक्ति सेक्स के मार्ग से बहती थी । वह प्रेम के प्रकाश में परिणत हो जाएगी । जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं । वे प्रेम का प्रकाश बन जाएंगी । प्रेम को विस्तीर्ण करें । प्रेम सेक्स का क्रिएटिव उपयोग है । उसका सृजनात्मक उपयोग है । जीवन को प्रेम से भरें । आप कहेंगे - हम सब प्रेम करते हैं । मैं आपसे कहूं । आप शायद ही प्रेम करते हों । आप प्रेम चाहते होंगे । और इन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है । प्रेम करना । और प्रेम चाहना । ये बड़ी अलग बातें हैं । हममें से अधिक लोग बच्चे ही रहकर मर जाते हैं । क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है । प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है । प्रेम चाहना । बिलकुल बच्चों जैसी बात है । छोटे छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं । मां उनको प्रेम देती है । फिर वे बड़े होते हैं । वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं । परिवार उनको प्रेम देता है । फिर वे और बड़े होते हैं । अगर वे पति हुए । तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं । अगर वे पत्नियां हुईं । तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं । और जो भी प्रेम चाहता है । वह दुख झेलता है । क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता । प्रेम केवल किया जाता है । चाहने में पक्का नहीं है । मिलेगा या नहीं मिलेगा । और जिससे तुम चाह रहे हो । वह भी तुमसे चाहेगा । तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी । दोनों भिखारी मिल जाएंगे । और भीख मांगेंगे । दुनिया में जितना पति पत्नियों का संघर्ष है । उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं । और देने में कोई भी समर्थ नहीं है । इसे थोड़ा विचार करके देखना । आप अपने मन के भीतर । आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा । चाहते हैं । कोई प्रेम करे । और जब कोई प्रेम करता है । तो अच्छा लगता है । लेकिन आपको पता नहीं है । वह दूसरा भी प्रेम करना । केवल वैसे ही है । जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है । आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है । आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है । वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है । वह मछलियों को चाहता है । इसलिए आटा फेंक रहा है । इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं । वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं । थोड़ी देर वे आटा खिलाएंगे, फिर..। और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा । वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा । वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा । थोड़ी देर बाद पता चलेगा । वे दोनों भिखमंगे हैं । और भूल में थे । एक दूसरे को बादशाह समझ रहे थे । और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है । और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी । दुनिया में दाम्पत्य जीवन नर्क बना हुआ है । क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं । देना कोई भी जानता नहीं है । सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है । और कितना ही परिवर्तन हो । किसी तरह के विवाह हों । किसी तरह की समाज व्यवस्था बने । जब तक जो मैं कह रहा हूं । अगर नहीं होगा । तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते । उनके अच्छे होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है । प्रेम मांगा नहीं जाता । सिर्फ दिया जाता है । जो मिलता है । वह प्रसाद है । वह उसका मूल्य नहीं है । प्रेम दिया जाता है । जो मिलता है । वह उसका प्रसाद है । वह उसका मूल्य नहीं है । नहीं मिलेगा । तो भी देने वाले का आनंद होगा कि उसने दिया । अगर पति पत्नी एक दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें । और मांगना बंद कर दें । तो जीवन स्वर्ग बन सकता है । और जितना वे प्रेम देंगे । और मांगना बंद कर देंगे । उतना ही अदभुत जगत की व्यवस्था है- उन्हें प्रेम मिलेगा । और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे । जितना वे प्रेम देंगे । उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा - ओशो ।
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अनिद्रा एक जीवन शैली है - अंतिम । जगह जगह ऐसे लोगों के लिए विशेष ध्यान केंद्र होने चाहिए । जो अनिद्रा से पीड़ित हैं । ध्यान उन्हें शिथिल होने में सहयोगी होगा । और जब वे ध्यान करें । तो उन्हें यह बता दिया जाना चाहिए कि केवल ध्यान से काम नहीं चलेगा । वह उपचार का केवल आधा हिस्सा है । तुम्हें शारीरिक श्रम भी करना पड़ेगा । और मेरा मानना है कि जो लोग अनिद्रा से पीड़ित हैं । वे कुछ भी करने को तैयार होंगे । और कड़े श्रम की अपनी खूबसूरती है । लकड़ी काटते हुए तुम पसीना पसीना हो जाओ । और अचानक ठंडी हवा तुम्हारे शरीर से टकराए । शरीर में ऐसी प्यारी अनुभूति होगी कि जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करता । वह उसे समझ भी नहीं सकता । गरीब आदमी के भी अपने ऐश्वर्य हैं । केवल वही उनके बारे में जानता है - ओशो ।
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सेक्स को समझें । युवकों से मैं कहना चाहता हूँ कि तुम्हारे माँ बाप तुम्हारे पुरखे, तुम्हारी हजारों साल की पीढ़ियाँ सेक्स से भयभीत रही हैं । तुम भयभीत मत रहना । तुम समझने की कोशिश करना उसे । तुम पहचानने की कोशिश करना । तुम बात करना । तुम सेक्स के संबंध में आधुनिक जो नई खोजें हुई हैं - उसको पढ़ना । चर्चा करना । और समझने की कोशिश करना कि क्या है सेक्स ? क्या है सेक्स का मेकेनिज्म ? उसका यंत्र क्या है ? क्या है उसकी आकांक्षा ? क्या है प्यास ? क्या है प्राणों के भीतर छिपा हुआ राज इसको समझना । इसकी सारी की सारी वैज्ञानिकता को पहचानना । इससे भागना । 'एस्केप' मत करना । आँख बंद मत करना । और तुम हैरान हो जाओगे कि तुम जितना समझोगे । उतने ही मुक्त हो जा जाओगे । तुम जितना समझोगे । उतने ही स्वस्थ हो जाओगे । तुम जितना सेक्स के फैक्ट को समझ लोगे । उतना ही सेक्स के 'फिक्शन' से तुम्हारा छुटकारा हो जाएगा - ओशो ।
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बेनियाजी हद से गुजरी बन्दा परवर कब तलक । हम कहेंगे हाले दिल और आप फरमायेंगे कया ।
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देखी जो नब्ज़ मेरी तो हँसकर बोला हक़ीम । जा दीदार कर उसका जो तेरे हर मर्ज की दवा है । 
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ये संगदिलों की दुनिया है यहाँ संभल के चलना ग़ालिब । यहाँ पलकों पे बिठाया जाता है नज़रों से गिराने के लिए । ********** 
एक बच्चे ने सारे सवालों के जवाब दिए । फिर भी मौखिक परीक्षा में फेल हो गया. क्यों ? सवाल के जवाब कुछ इस तरह थे । सवाल - टीपू सुल्तान की मृत्यु किस युद्ध में हुई थी ? जवाब - उसके आखिरी युद्ध में । सवाल - तलाक का प्रमुख कारण क्या है ? जवाब - शादी । सवाल - गंगा किस स्टेट में बहती है ? जवाब - लिक्विड स्टेट । सवाल - महात्मा गांधी का जन्म कब हुआ था ? जवाब - उनके जन्मदिन के दिन । सवाल - 6 लोगों के बीच 8 आम को तुम कैसे बांटोगे ? जवाब - मैंगो शेक बनाकर । सवाल - भारत में पूरे साल सबसे ज्यादा बर्फ कहां गिरती है ? जवाब - दारू के ग्लास में ।

29 अगस्त 2011

मेरा मन रामहि राम रटै रे

मैंने राम रतन धन पायो । 
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु । करि करिपा अपनायो । 
जनम जनम की पूंजी पाई । जग में समय खोवायो । 
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै । दिन दिन बढत सवायो । 
सत की नाव खेवटिया सतगुरु । भवसागर तरि आयो । 
मीरा के प्रभु गिरधर नागर । हरखि हरखि जस गायो । 
मेरा मन रामहि राम रटै रे ।
राम नाम जप लीजै प्रानी । कोटिक पाप कटै रे ।
जनम जनम के खत जु पुराने । नामहि लेत फटै रे ।
कनक कटोरे इम्रत भरियौ । पीवत कौन नटै रे ।
मीरा कहै प्रभु हरि अविनासी । तन मन ताहि पटै रे ।
मीरा कहती है - मैंने परम धन पा लिया । परम संपदा पा ली । जिसको पा लेने के बाद । फिर कुछ और पाने को नहीं बचता । ऐसा राम रतन पा लिया । पाया कैसे ? सब खोया । तब पाया । कुछ भी नहीं बचाया अपने भीतर । शून्य हुई । तो पूर्ण उतरा । मिटी । तो परमात्मा का आगमन हुआ । प्रेम की आग में जलोगे । मिट जाओगे । राख हो जाओगे । तभी उसका आगमन होता है । तुम्हारी राख में ही तुम्हारे भीतर उसका अंकुरण होता है । तुम जब तक हो । तब तक बाधा है । मुझसे लोग पूछते हैं कि - हम क्या करें ? कौन सी बाधाएं हैं ? जिन्हें हम अलग करें । ताकि परमात्मा मिल जाए ? मैं उनसे कहता हूं - तुम्हारे अतिरिक्त कोई और बाधा नहीं है । तुम हट जाओ बीच से । तुम अपने और परमात्मा के बीच मत खड़े होओ । तुम अपने को विदा दे दो । तुम अपने को नमस्कार कर लो सदा के लिए । और तुम पाओगे । कोई भी बाधा नहीं है । मैंने राम रतन धन पायो । धन तो वही है । जो कभी खोए न । जिसको हम धन कहते हैं । वह धन का धोखा है । वह केवल मान्यता है । धन तो वही है । जो कभी न खोए । धन तो वही है । जिसे मौत भी न छीन सके । ज्ञानियों ने संपत्ति की परिभाषा यही की है । जिसे मौत न छीन सके । जिसे मौत छीन ले । वह वस्तुतः विपत्ति है । तुमने उसको संपत्ति समझा है । वह तुम्हारी मान्यता है । मान्यता टूटेगी । और तुम बड़े विषाद में गिरोगे । संपत्ति, संपदा उसी तरह के शब्द हैं । जैसे - सम्यकत्व, समाधि, संबोधि । वह जो " सम " प्रत्यय लगा है । बड़ा बहुमूल्य है । वही समाधि में है । वही संबोधि में है । वही सम्यकत्व में है । वही संबुद्धत्व में है । सम - जो सदा एक सा रहे । जिसमें कभी लहर न उठे । कोई कंपन न हो । जो शाश्वत हो । जिसे कोई चीज तरंगित न कर सके । जिस पर बाहर का कोई प्रभाव न हो । तूफान आएं । और जाएं । और तुम्हारे भीतर " समता " बनी रहे । समता भी उसी धारा का एक शब्द है । तुम्हारे भीतर समता बनी रहे । दुख आए । सुख आए । सफलता, विफलता । तुम्हारे भीतर जो जीवन ज्योति है । वह कंपे भी नहीं । तूफान, आंधियां, हवाएं, अंधड़ । तुम्हारी ज्योति वैसी ही जलती रहे - अकंप ! समाधि ! संबोधि ! और वैसी ही दशा का नाम है - संपदा, संपत्ति । संपत्ति तुम्हारे भीतर है । और तुम उसे बाहर खोज रहे हो । इसलिए विपत्ति में उलझे हो । जो भीतर है । उसे बाहर खोजोगे । तो दुख पाओगे ही । क्योंकि उसे तो कभी पा ही न सकोगे । जिसे खोज रहे हो । कुछ का कुछ मिलता रहेगा । खोजोगे कुछ । पाओगे कुछ । दौड़ोगे किसी और चीज को पाने को । हाथ में आएगी कोई और चीज । और हर बार विषाद आएगा । और हर बार फिर..  लेकिन समझ नहीं आती कि बाहर तो जन्मों जन्मों से दौड़कर देख लिया । धन मिला नहीं । अब थोड़ा भीतर भी तलाश कर लें । यह भीतर का जगत भी अनखोजा क्यों रह जाए ? और जिसने भी भीतर झांक कर देखा । वह हंसे बिना नहीं रहा है । हंसे बिना नहीं रहा । क्योंकि बड़ा अजीब मामला है । जिसे हम खोज रहे हैं । वह हमारे भीतर मौजूद ही था । हम नाहक परेशान हो रहे थे । हम व्यर्थ ही दौड़ धाप कर रहे थे । राम रतन धन पायो । वस्तु अमोलक दी मेरे सदगुरु, करि करिपा अपनायो । मैंने राम रतन धन पायो । वस्तु अमोलक ! यह ऐसा कुछ है भीतर । यह राम रतन कि इसका कोई मूल्य भी हम चुकाएं । इसकी संभावना नहीं है । क्योंकि हमारे पास है ही क्या देने को ? कूड़ा  कर्कट लिए बैठे हैं । अमोलक है । मूल्य इसका चुकाया नहीं जा सकता । यह मूल्य में आंका नहीं जा सकता । कूता नहीं जा सकता । किसी तराजू पर तौला नहीं जा सकता । कोई कसौटी पर कसा नहीं जा सकता । यह परम मूल्य है । बाकी सब मूल्य छोटे पड़ जाते हैं ।
अब राम रतन की कितनी कीमत आंकोगे ? करोड़ कि दस करोड़ कि अरब कि दस अरब, कि शंख कि महा शंख ? कोई भी आंकड़ा काम नहीं पड़ेगा । सब आंकड़े छोटे पड़ जाएंगे । यह राम रतन आत्यंतिक मूल्य है । इसलिए हमारे कोई मूल्य इसके काम नहीं आ सकते । फिर भी हम राम रतन नहीं खोजते । हम बड़े डरे हैं कि कहीं राम रतन के खोजने में हमारे पास जो संपदा हम सोचते हैं, है । खोना न पड़े । कहीं खो न जाए । क्षुद्र बातों पर लोग अटके हुए हैं । बड़ी क्षुद्र बातें हैं । विचार करोगे । तो हंसी आएगी । किसी का मोह मकान से है । किसी का मोह दुकान से है । किसी का पति से । किसी का पत्नी से । किसी का बेटे से । किसी का मां से है । सब छिन जाने हैं । यह मकान तुम्हारा कितनी देर तक रहेगा ? यह सराय है । आज नहीं कल खाली करनी होगी । तुम नहीं थे । तब भी यह मकान था । तुम नहीं होओगे । तब भी यह मकान होगा । कोई और इसके वासी थे । फिर कोई और इसके वासी हो जाएंगे । तुम दो दिन के मेहमान हो । बस रैन बसेरा है । मगर मोह पकड़ लेता है । हम दावेदार हो जाते हैं । जो आदमी दावा करता है । इस संसार में कि यह मेरा है । वही आदमी अज्ञानी है । इस संसार में हमारा कोई दावा सच नहीं है । अगर दावा ही हो सकता है । तो एक ही दावा है कि - राम मेरा है कि राम रतन मेरा है । उस दावे को छोड़कर हम सब दावे करते हैं । क्यों ? क्योंकि और सब दावों में हम बच सकते हैं । यह जो राम रतन का दावा है । इसमें हम खो जाते हैं । मेरा अपना निरीक्षण ऐसा है कि अगर अहंकार बचता हो । तो लोग दुखी रहने को भी तैयार हैं । और अगर सुख भी मिलता हो अहंकार खोने पर । तो तैयार नहीं हैं ।
कुछ दिन पहले एक मित्र ने आकर कहा कि बड़ा आनंद आता है । जब यहां आ जाता हूं । नाच लेता हूं । तो जैसे जनम जनम की नाचने की आकांक्षा तृप्त हो जाती है । मगर घर जाकर नहीं नाच पाता । घर तो मैं पता ही नहीं चलने देता किसी को कि पूना में जाकर मैं नाचता हूं । क्योंकि गांव में लोगों को पता चल जाए । तो लोग समझेंगे - पागल है । तो मैंने उनसे पूछा कि लोगों का यह समझना कि तुम पागल नहीं हो । यह ज्यादा मूल्यवान है कि ध्यान के नृत्य में जो आनंद मिलता है । वह ज्यादा मूल्यवान है ? उन्होंने कहा - इसमें क्या मामला है कहने का । मूल्यवान तो वही है । जो ध्यान के नृत्य में मिलता है । तो फिर मैंने कहा - मूल्यवान को छोड़ना । और मूल्यहीन को पकड़ना । इसमें कौन सी बुद्धिमानी है ? और लोग अगर पागल समझेंगे । तो हर्ज क्या है ? अहंकार को हर्ज है । उन्होंने कहा कि - यह तो बहुत मुश्किल बात है । मैं सरकारी अधिकारी हूं । प्रतिष्ठा है । लोग सम्मान करते हैं । सब प्रतिष्ठा उखड़ जाएगी । आप भी कैसी बात कह रहे हैं ? प्रतिष्ठा का मतलब क्या होता है ? एक अहंकार है । गांव के लोग मानते हैं कि बड़े बुद्धिमान हो । यही लोग मानने लगेंगे कि यह आदमी काम से गया । इस आदमी की बुद्धि गई । अब यह हुआ निर्बुद्धि । अहंकार ही खोएगा न । दूसरे क्या मानते हैं । यही तो हमारा अहंकार है । तुम अक्सर अपने जानने के विपरीत भी लोगों के मानने को पकड़े रहते हो । मैंने कहा - तुम्हें न मिलता होता आनंद ध्यान में । न मिलता होता आनंद नृत्य में । तब एक बात थी । तुम कहते हो मिलता है । और भागा आ जाता हूं । दो त्तीन महीने के बाद आना ही पड़ता है । नहीं आता हूं । तो बड़ी कमी लगने लगती है । दस पांच दिन रह कर डूब लेता हूं । तो तीन चार महीने तक ताजगी बनी रहती है । मगर गांव में जाकर मैं पता भी नहीं बताता । सच तो यह है । उन्होंने कहा - आपसे क्या छिपाना, कि मैं यह अभी तक किसी को बताया नहीं कि पूना जाता हूं । पूना की ऐसी बदनामी । छुपा छुपा आता हूं । छुपा छुपा चला जाता हूं । पूना में भी सरकारी आफिसर हैं । वे कहते हैं - मुझे जानते हैं । उनको भी पता नहीं चलने देता कि मैं यहां आया । ऐसे क्षुद्र से कारण होते हैं । और क्षुद्र के लिए विराट खोता चला जाता है ।
मीरा ने राम रतन पाया । क्योंकि मीरा ने बड़ी हिम्मत की । राजघर से थी । स्त्री थी । प्रतिष्ठित थी । नाचने लगी गांव गांव । खो दी सब लोकलाज । मान मर्यादा । मस्त हो उठी । और जब मस्त हुई । तो फिर जरा संकोच न लिया । फिर क्षुद्र में न पड़ी । विराट से जो गठबंधन बांधा । तो पूरा बांधा । ऐसी मिटी कि कुछ बचाया नहीं । तब राम रतन पाया । तुम भी पा सकते हो । मिटने की तैयारी दिखानी पड़ेगी । उतनी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी । तुमने कहानी समझी न । सम्राट को प्रेम करना पड़ा एक साधारण स्त्री से तो साधारण हो जाना पड़ा । सारा राज्य छोड़ देना पड़ा । और तुम तो परमात्मा से प्रेम करने चले हो । फिर भी कुछ छोड़ने की इच्छा नहीं है । सम्राट ने एक साधारण स्त्री से प्रेम किया । तो साधारण स्त्री जैसा होना पड़ा । क्योंकि प्रेम तभी संभव है । तुम अगर परमात्मा से प्रेम करने चले हो । तो परमात्मा जैसा होना पड़ेगा । तो ही प्रेम संभव है । परमात्मा जैसा होने का अर्थ यह होता है कि न कोई चिंता । न कोई फिकर । न कल आने वाला । न कल जो बीत गया । परमात्मा तो अभी और यहां है । न उसका कोई अतीत है । न उसका कोई भविष्य है । परमात्मा शांत, चैतन्य की, आनंद की एक दशा है - सच्चिदानंद है । तुम्हें भी इस क्षण में सब भूल जाना पड़ेगा । और एक बार तुम्हारे हाथ में सूत्र आ जाए सब भूल जाने का । तो तुम्हारे हाथ में कुंजी है । तुम जब चाहो । तब उसका द्वार खोल लो । तुम जब चाहो तब । जहां चाहो वहां । उसके मंदिर में प्रविष्ट हो जाओ । यह राम रतन तुम्हारा ही है ।
तुम जब तक अटके हो क्षुद्र बातों में । अटके रहो । तुम जिस दिन तय करोगे । उस दिन कोई रोक नहीं सकता । तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हें किसी ने नहीं रोका है । और तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हें कोई रोक भी नहीं सकता । अगर बाधा हो । तो तुम हो । लेकिन लोग अक्सर ऐसा समझते हैं कि क्या करें । दूसरे लोग रोक रहे हैं । बात झूठी है । मीरा को नहीं रोक सके । तो तुम्हें क्या रोकेंगे । किसी को कभी नहीं रोक सके । तो तुम्हें क्यों रोकेंगे । लेकिन ये बहाने हैं । तुम बहाने खोज लेते हो । और बहाने ऐसे खोज लेते हो कि बड़े सुंदर मालूम होते हैं । मगर फिर वस्तु अमोलक कभी भी न पा सकोगे । वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु... भक्ति कि मार्ग में सदगुरु और परमात्मा में कोई भेद नहीं है । सतगुरु और परमप्रिय में कोई भेद नहीं है । सतगुरु उसी प्यारे का प्रतीक है । जैसे सूरज की एक किरण आती है तुम्हारे अंधेरे घर में । सूरज तो पूरा आना भी चाहे । तो नहीं आ सकता । और आ भी जाए अचानक । तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी । तुम झेल न पाओगे । तुम्हारी आंखें अंधी हो जाएंगी । सूरज तुम्हें जलाकर भस्म कर देगा । सूरज को तुम न झेल सकोगे । सूरज की तरफ तो टकटकी लगा कर भी देखना मुश्किल है । आंख अंधी हो जाएगी । और सूरज बहुत दूर है । आठ मिनट लगते हैं सूरज से रोशनी के आने में जमीन तक । आठ मिनट हमें छोटा समय मालूम पड़ता है । किरण के लिए छोटा नहीं है । क्योंकि किरण की गति बड़ी तीव्र है । एक लाख छयासी हजार मील प्रति सेकेंड । तो आठ मिनट में किरण बड़ी यात्रा करती है । प्रति सेकेंड एक लाख छयासी हजार मील । तो साठ का गुणा करना इसमें । फिर आठ का गुणा करना उसमें । बड़ी लंबी संख्या बनेगी । उतने मील दूर है सूरज । फिर भी सूरज की तरफ आंख करो । तो जलने लगेगी । घबड़ा जाओगे । अंधेरा छाने लगेगा । तुम्हारे घर में सूरज आ जाए । तो तुम बचोगे कहां ? जलकर खाक हो जाओगे । किरण आती है । मगर किरण काफी है । किरण को पकड़ लिया । किरण को आत्मसात कर लिया । तो तुम्हारी क्षमता बढ़ती जाएगी । फिर किरण के सहारे ही किसी दिन सूरज में भी पहुंच जाओगे । सतगुरु यानी किरण । वह परमात्मा की खबर है । परमात्मा तो चुप है । सतगुरु बोलता है । वह परमात्मा की तरफ से बोलता है । वह परमात्मा का प्रतिनिधि है ।
इसलिए मुसलमानों ने ठीक शब्द चुना है - पैगंबर । उसका मतलब होता है - पैगाम लाने वाला, संदेशवाहक । वह अवतार से भी प्यारा शब्द है । वह तीर्थंकर से भी प्यारा शब्द है - संदेशवाहक । खबर ला रहा है । सतगुरु को पकड़ना होगा । वहां से यात्रा शुरू होती है । सतगुरु को पचाते  पचाते एक दिन तुम पाओगे । कब गुरु ब्रह्मा हो गया । पता नहीं चला । गुरुर्ब्रह्मा ! कब हो जाता है गुरु ब्रह्मा ? पता नहीं चलता भक्त को । एक दिन अचानक पाता है कि जिसको मनुष्य की तरह देखा था । उसमें परमात्मा अवतरित हुआ । जिसको मनुष्य की तरह हाथ में हाथ जिसके दिया था । वह अब मनुष्य नहीं है । प्रेम धीरे धीरे प्रवेश करता है । और उसके अति मानवीय रूप को देखना शुरू कर देता है । वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, करि करिपा अपनायो । और मीरा कहती है कि - मेरी तो कोई पात्रता न थी । फिर भी तुमने अपना लिया । अपना बना लिया । मुझ अपात्र को भी । भक्त की यह भाव दशा सदा बनी रहती है कि मैं अपात्र हूं । यह उसकी अनिवार्य लक्षणा है । ज्ञानी को तो कभी  कभी भ्रम पैदा होते हैं कि मैं पात्र हूं । त्यागी को भ्रम पैदा होते हैं कि मैं पात्र हूं । तपस्वी को भ्रम पैदा होते हैं कि मैं पात्र हूं । मैंने इतना किया । इतना किया । वह खाते बही रखता है । हिसाब बनाकर तैयार रखता है कि दावादार । कभी अगर मौका मिला अदालत में तो दावा करेगा । लेकिन भक्त को यह बात सदा बनी रहती है कि मैं अपात्र हूं । जितना मिलता है भक्त को । उतना ही भक्त को यह लगने लगता है कि मैं अपात्र हूं । मगर जितना तुम्हें यह पता चलता है कि मैं अपात्र हूं । उतने ही तुम पात्र हो जाते । क्योंकि अपात्र होने का अर्थ है । अहंकार जा रहा । अहंकार गया । पात्रता का दावा तो अहंकार का दावा है - ओशो ।

27 अगस्त 2011

अहंकार ही नर्क है

भारत एक सनातन यात्रा । भारत कोई भूखंड नहीं है । न राजनैतिक इकाई । न ऐतिहासिक तथ्यों का कोई टुकड़ा । भारत एक प्यास है । सत्य को पा लेने की । जमीन पर कोई कहीं भी पैदा हो । किसी देश में । किसी सदी में । अतीत में । या भविष्य में । अगर कोई खोज अंतर की खोज है । किसी की भी । वह भारत का निवासी है । जातिवाद एक बहुत बड़ी समस्या है । सम काल हार गया । उसे सुलझाते हुए । कुछ नहीं कर पाया । ओशो सहज कह पाए हैं - देह शूद्र है । मन वैश्य । आत्मा क्षत्रिय । और परमात्मा ब्राह्मण ।  वे सब कुछ ब्योरे में उतरते हैं - देह शूद्र है, क्यों ? क्योंकि देह की दौड़ सिर्फ इतनी है - खा लो । पी लो । भोग कर लो । सो जाओ । जाग जाओ । और मर जाओ । यह शूद्र की सीमा है । जो देह मे जीता है । वह शूद्र । शूद्र का अर्थ हुआ - मैं देह हूं । यह मनोदशा शूद्र है । मन वैश्य है । खाने पीने से ही पाजी नहीं होता । कुछ और मांगता है । मन का अर्थ है - कुछ और चाहिए । शूद्र में एक तरह की सरलता है । देह में बड़ी सरलता है । वह सब कुछ ज्यादा नहीं मांगती । दो रोटी मिल जाए । सोने को छप्पर मिल जाए । और शरीर की मांग सीधी है - थोड़ी सी । सीमित सी । देह को असंभव में रस नहीं है । इसलिए कहता हूं - देह शूद्र है । जब और और की वासना उठती है । तो वैश्य हुआ । वैश्य का मतलब है - मन। और मन व्यवसायी है । वह फैलता चला जाता है । रुकना नहीं जानता । क्षत्रिय का मतलब है - संकल्प । प्रबल संकल्प कि मैं कौन हूं ? इसे जान लूं । शूद्र शरीर को ही जानता है । उतने में ही मजा लेता है । वैश्य मन के साथ दौड़ता है । और क्षत्रिय जानना चाहता है - मैं कौन हूँ ? इसीलिए चौबीस तीर्थंकर, राम, कृष्ण सब क्षत्रिय थे । क्योंकि ब्राह्मण होने से पहले क्षत्रिय होना जरूरी है । जिसने जन्म के साथ अपने को ब्राह्मण समझ लिया । वह चूक गया । जैसे परशुराम ब्राह्मण नहीं हैं । उनसे बड़ा क्षत्रिय खोजना मुश्किल होगा । जिंदगी भर मारने का काम करते रहे । फरसा लेकर घूमते थे । उन्हें ब्राह्मण करना ठीक नहीं है । सो - संकल्प क्षत्रिय है । ऐसा समझो कि - भोग यानी शुद्र । तृष्णा यानी - वैश्य । संकल्प यानी - क्षत्रिय । और जब संकल्प पूरा हो जाए । तब समर्पण की संभावना है । समर्पण - यानी ब्राह्मण । ब्राह्मण यानी ब्रह्म को जान लेना । जो मिटा । उसने ब्रह्म को जाना । भारत में पैदा होने से ही कोई भारत का नागरिक नहीं हो सकता । जो एक दुर्घटना की तरह भारत में हो गए । जब तक उनकी प्यास उन्हें दीवना न कर दे । तब तक वे भारत के नागरिक होने के अधिकारी नहीं हैं । भारत एक सनातन यात्रा है । अनंत से अनंत तक फैला हुआ रास्ता । मेरे लिए भारत और अध्यात्म एक ही अर्थ में हैं - ओशो ।
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अकेलापन और एकांत में बड़ा फर्क है । दोई कहे तिनहीं को दोजख । जिन्ह नाहिन पहिचाना । जिन्होंने दो कहा - वे नर्क में है । कबीर का यह वचन पश्चिम का आधुनिक विचारक ज्या पाल सार्त्र अगर पढ़े । तो राजी होगा । ज्या पाल सार्त्र का एक बहुत प्रसिद्ध वचन है । जिसमें उसने कहा है - द अदर द हेल । दूसरा नर्क है । उसके प्रयोजन हैं । लेकिन बात तो उसने भी पकड़ ली । दूसरा नर्क है । दूसरे की मौजूदगी नर्क है । तो क्या करें ? क्या अकेले में भाग जाएं ? एकांत में हो जाए । जहां दूसरा न हो ? न पत्नी हो । न पति हो । न बेटा हो । बहुतों ने यह प्रयोग किया है । भागे हैं हिमालय की कंदराओं में । ताकि अकेले हो जाए । क्योंकि दूसरा नर्क है । लेकिन तुम भागकर भी अकेले न हो पाओगे । क्योंकि तुम्हारा मैं तो तुम्हारे साथ ही चला जाएगा । तू यहां छोड़ जाओगे । मैं तो साथ चला जाएगा । और ध्यान रखो । जहां मैं हूं । वहां तू है । वह सिक्का इकठ्ठा है । तुम आधा आधा छोड़ नहीं सकते । अगर मैं तुम्हारे साथ गया । तो तू तुम्हारे साथ गया । जल्दी ही तुम अपने को ही दो हिस्सों में बांट कर चर्चा करने लगोगे । अकेले में लोग अपने से ही बात करने लगते हैं । मैं और तू दोनों हो गए । अकेले में लोग ताश खेलने लगते हैं । खुद ही दोनों तरफ से बाजी बिछा देते हैं । उस तरफ से भी चलते हैं । इस तरफ से भी चलते हैं । इतना ही नहीं । उस तरफ से भी धोखा देते हैं । इस तरफ से भी धोखा देते हैं । किसको धोखा दे रहे हो ? अकेले में लोग कल्पना की मूर्तियों में जीने लगते हैं । उनसे चर्चा करते हैं । बात करते हैं । तू मौजूद हो जाता है । भीड़ तुम्हारे हाथ ही आ जाएगी । अगर मैं तुम्हारे साथ गया । क्योंकि मैं तो केंद्र है सारी भीड़ का । भीड़ तो परिधि है । तुम जहां पाओगे । तुम भीड़ में रहोगे । तुम अकेले नहीं हो सकते । हिमालय का एकांत शून्य न बनेगा । अकेलापन रहेगा ही । और अकेलापन और एकांत में बड़ा फर्क है । अकेलेपन का अर्थ है - लोनलीनेस । और एकांत का अर्थ है - अलोननेस । अकेलेपन का अर्थ है कि दूसरे की चाह मौजूद है । इसलिए तो तुम अकेलापन अनुभव कर रहे हो कि मैं अकेला...मैं अकेला । दूसरे की चाह मौजूद है । दूसरे की वासना मौजूद है । तुम चाहते हो - कोई आ जाए । तुम अपनी हिमालय की गुफा के बाहर बैठकर भी रास्ते पर नजर लगाए रखोगे कि शायद कोई यात्री मान सरोवर जाता गुजर जाए । शायद कोई मनुष्य थोड़ी खबर ले आए नीचे के मैदानों की कि क्या हुआ ? जयप्रकाश नारायण की पूर्ण क्रांति हो पाई कि नहीं ? शायद कोई अखबार का एक टुकड़ा ही ले आए । और तुम वेद वचनों की तरफ अखबार को पढ़ लो । मन तुम्हारा नीचे ही भटकता रहेगा मैदानों में । जहां भीड़ है । 
रामकृष्ण कहते थे । एक बार बैठे थे मंदिर के बाहर दक्षिणेश्वर में । तो देखा कि एक चील मरे हुए चूहे को ले उड़ी है । अब चील कितने ही ऊपर उड़े । नजर तो उसकी नीचे कचरे घर में लगी रहती है । जहां मरे चूहे पड़े हों । मांस का टुकड़ा पड़ा हो । फेंकी गई मछली पड़ी हो । उड़ती है आकाश में । नजर तो घूरे पर लगी रहती है । तुम हिमालय पर बैठ जाओ । कोई फर्क न पड़ेगा । नजर घूरे पर लगी रहेगी दिल्ली में । नजर मरे चूहों पर लगी रहेगी । तुम अपने को तो साथ ही ले जाओगे । तुम ही तो तुम्हारे होने का ढंग हो । रामकृष्ण ने देखा कि वह चील उड़ रही है चूहे को लेकर । और बहुत सी चीलें उस पर झपट्टा मार रही हैं । कौवे दौड़ गए हैं । बड़ा उत्पात मच गया है आकाश में । वह चील बचने की कोशिश कर रही है । लेकिन और गिद्ध आ गए हैं । और सब तरफ से उसको टोचे जा रहे हैं । वह भागती है । बचना चाहती है । उसके पैरों पर लहू आ गया है । तब क्रोध की अवस्था में वह भी किसी गिद्ध पर झपटी । और मुंह से चूहा छूट गया । चूहे के छूटते ही सारा उपद्रव बंद हो गया । कोई वे चील के पीछे पड़ने ही थे । बाकी गिद्ध और चीलें और कौवे...वे चूहे के पीछे पड़े थे । जैसे ही चूहा छूटा । वे सब चले गए । वे चूहे की तरफ चले गए । अब वह थकी चील वृक्ष पर बैठ गई । रामकृष्ण कहते हैं कि मुझे लगा, शायद थोड़ी उसे समझ आई होगी । चूहा सारी भीड़ को ले आया था । तुम्हारा मैं...तुम हिमालय चले जाओ । कोई फर्क न पड़ेगा । सब भीड़ आ जाएगी । तुम्हारा मैं भीड़ को खींचता है । तुम मैं को छोड़ दो । बाजार में बैठे रहो । वहीं हिमालय हो जाएगा । तुम्हारी दुकान तुम्हारी गुफा हो जाएगी । तुम्हारा दफ्तर तुम्हारा मंदिर हो जाएगा । मैं का चूहा भर छूट जाए । फिर कोई चील हमला नहीं करती । फिर कोई सिद्ध तुम पर आकर हमला नहीं करता । तुमसे किसी का कुछ लेना देना नहीं है । वह तुम्हारा मैं ही तुम्हारे उपद्रव का कारण है । तुम्हें कभी किसी ने धक्का मारा ? नहीं तुम्हारे मैं को धक्के मारे गए हैं । किसी ने तुम्हें कभी नीचा दिखाया नहीं । तुम्हारे मैं को नीचा दिखाया गया है ? किसी ने कभी तुम्हें गाली दी ? नहीं । तुम्हारे मैं को गाली दी गई है । किसी ने कभी तुम्हारी स्तुति की ? नहीं । तुम्हारे मैं की स्तुति की गई । जैसे ही मैं गया । सारी भीड़ गिर जाती है निंदको की । स्तुति करने वालों की । मित्रों की । शत्रुओं की । अपनों की । परायों की । द अदर इज हेल । सार्त्र कह रहा है - दूसरा नर्क है । लेकिन अगर बहुत गौर से सोचो । और थोड़ा गहरे जाओ । तो दूसरा इसीलिए है कि तुम हो । द इगो इज द हेल । गहरे पर विश्लेषण करने पर तो पता चलेगा कि दूसरा तो तुम्हारे कारण है । इसलिए दूसरे को क्या नर्क कहना । वह नर्क मालूम पड़ता है । वस्तुतः मैं ही नर्क है । अहंकार ही नर्क है - ओशो ।
तुम्हे सच्चा आनंद सिर्फ परमात्मा के सुमरन में ही मिलेगा । यदि परमात्मा की याद हमेशा निरंतर ( 24 घन्टे ) बनी रहेगी । तो इससे बड़ा कोई सुख नही है । बिना परमात्मा की कृपा के लोक परलोक दोनो ही नही मिलते हैं । जब हमारे अन्दर सुमरन निरंतर बना रहता है । तो हम संसार की सभी प्रकार की वासनाओं से कामनाओं से हम मुक्त होते हैं । तब उस काल में परमात्मा का सानिध्य पूर्ण रूप से रहता है । और जब परमात्मा का सानिध्य बना रहता है । तो सब कुछ मिल जाता है । फिर उस काल में कोई कामना शेष नही रहती है ।

सत्यम शिवम सुन्दरम का असली अर्थ

ये भी बतायें कि ‘शिवोऽहम’ का अर्थ क्या है ? 
‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ का असली और गहरा अर्थ क्या है ? 
मैं ये भी जानना चाहती हूँ कि ‘सत चित आनन्द’ का अर्थ क्या है ? 
क्योंकि हमारी आत्मा को भी ‘सत चित आनन्द’ कहा जाता है । ये भी बतायें कि क्या ‘सत चित आनन्द’ को ही ‘सच्चिदानन्द’ कहा जाता है ।
जो साधु सन्त होते हैं उनके नाम के आगे ‘स्वामी’ शब्द लगाया जाता है । जैसे उदाहरण के तौर पर समझिये - स्वामी सच्चिदानन्द, तो स्वामी शब्द किसी साधु, सन्त या महात्मा के आगे लगाने का क्या तात्पर्य है ? क्या ये भी एक तरह से भक्ति लाइन में कोई उपाधि है ? 
मुझे आपसे इन सवालों के जवाबों का इन्तजार रहेगा । सतश्री अकाल
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 प्रश्न - ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ का असली और गहरा अर्थ क्या है ?
उत्तर - आत्मा के बारे में कुछ बता पाना, उस स्थिति के बारे में कुछ बता पाना, उस परमानन्द के बारे में कुछ बता पाना बङी असम्भव सी बात है । हालाँकि कबीर जैसे सन्तों ने बङी कोशिश की कि इस बारे में शब्दों द्वारा कुछ बता पायें ताकि मनुष्य अधिकाधिक भक्ति के लिये प्रेरित हो सके पर ये कभी सम्भव नहीं हो सका ।
ठीक यही बात - सत्यम शिवम सुन्दरम..पर भी लागू होती है । इसका वास्तविक रूप और इसका अनुभूत रूप बताना असम्भव ही है । शिव (जिनका आगे वर्णन है तथा ब्लाग के अन्य लेखों में भी है) का वह सत्य और निर्विकारी रूप ही सत्यम शिवम सुन्दरम है । इसी को नीचे से (साधना या भक्ति के स्तर से) इस तरह कह सकते हैं कि ज्यों ज्यों कोई साधक सत्य रूप (शाश्वत सत्य के अधिकाधिक निकट) होता हुआ । सबमें ही उस शिव (परमात्मा या आत्मा) को देखता हुआ, जानता हुआ ज्यों ज्यों निर्मल (मल रहित) मन होता जाता है । वह उस असीम सुन्दरता (अदभुत सौन्दर्य शीतल रूप) को प्राप्त होता है ।
हाँ लेकिन समझने को इसे बहुत आसान तरीके से समझ सकते हैं, कैसे - जो सत्य (शाश्वत सत्य यानी आत्मा) है वही शिव (सबमें यानी सर्वात्मा) है और वही (वास्तविक) सुन्दर है । क्योंकि उसके समान सुन्दर दूसरा नहीं हैं । 

रामायण में इस बात को इस तरह कहा गया है -
नाम रूप दोऊ अकथ कहानी । समझत बनत न जात बखानी ।
अर्थात नाम (आत्मा का वास्तविक नाम या निर्वाणी नाम या सन्तों ने जिसको शब्द कहा है) और रूप (आत्मा का वह शाश्वत रूप जो हर उपाधि से रहित है । मतलब जब ये सब कुछ भी नहीं था तब वो जैसा था) इन दोनों के बारे में ‘अकथ’ (यानी इनके बारे में कह कर बताना असम्भव ही है । अकथनीय ही है) स्थिति है ।
समझत बनत (यानी वहाँ पहुँचकर ही इसका सही सुख आनन्द जाना जा सकता है । सही बात पता लगती है) न जात बखानी (बोलकर समझाना इसको सम्भव नहीं है)
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प्रश्न - ये भी बतायें कि ‘शिवोऽहम’ का अर्थ क्या है ?
उत्तर - शिव शक्ति बहुत बङी शक्ति है (ये शंकर से अलग है) सर्वात्मा के रूप में परमात्मा या आत्मा इसी रूप में हैं । सीधी सी बात है, चेतन शक्ति का बँटवारा या प्रेषण बङे से बङे देवी देवताओं भगवानों ईश्वरों और छोटे से छोटे से जीव को यहीं से प्राप्त होता है ।
श्रीकृष्ण ने द्रौपदी द्वारा ‘अक्षय पात्र’ खाली हो जाने पर और उसी समय श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक गुरु दुर्वासा के भोजन हेतु आ जाने पर इसी पात्र से लिपटा भोजन का सिर्फ़ 1 तिनका खाकर  ‘शिवोऽहम’ भाव का ध्यान करते हुये ही अखिल सृष्टि को भोजन के प्रति न सिर्फ़ तृप्त कर दिया था बल्कि डकारें लेने पर मजबूर कर दिया था ।
ओऽहम (ॐ रूपी मनुष्य शरीर) 
सोऽहम (सोऽहं रूपी मन, सोऽहंग से मन का निर्माण हुआ है । अहम और जीव बीज भी यही है) 
शिवोऽहम (सबमें मैं ही हूँ) 
एकोऽहम (सिर्फ़ एक मैं ही हूँ, दूसरा नहीं) 
कोऽहम (मैं कौन हूँ ? जीवात्मा की अज्ञान युक्त स्थिति) 
ये सब सर्वशक्तिमान आत्मा के खेल या विभिन्न स्थितियाँ ही हैं ।
शिवोहम का सही अर्थ या भाव यही है कि - सब मैं एक मैं (या वही आत्मा) ही हूँ । इसी भाव से इस मन्त्र का ध्यान आदि किया जाता है ।
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प्रश्न - मैं ये भी जानना चाहती हूँ कि ‘सत चित आनन्द’ का अर्थ क्या है ? क्योंकि हमारी आत्मा को भी ‘सत चित आनन्द’ कहा जाता है । ये भी बतायें कि क्या सत चित आनन्द को ही सच्चिदानन्द कहा जाता है ।
उत्तर - वास्तव में ये भी आत्मा की एक स्थिति ही है । जिसमें आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है । यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है । इस स्थिति को प्राप्त हुआ साधक या भक्त सच्चिदानन्द कहलाने का अधिकारी हो जाता है ।
कु्ण्डलिनी या आत्मज्ञान की खासियत ही यही है । इसमें जो प्रयोगात्मक स्तर पर जितना जान लेता है उतना पा लेता है । इसके विपरीत सिद्धांत से गृहणता स्थिति के अनुसार सिर्फ़ भाव ही बनता है । वह न सही रूप में जानना होता है और न ही कुछ पाना पर लाभ इससे भी होता है ।
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प्रश्न - जो साधु सन्त होते हैं । उनके नाम के आगे ‘स्वामी’ शब्द लगाया जाता है । जैसे उदाहरण के तौर पर समझिये - स्वामी सच्चिदानन्द, तो स्वामी शब्द किसी साधु, सन्त या महात्मा के आगे लगाने का क्या तात्पर्य है ? क्या ये भी एक तरह से भक्ति लाइन में कोई उपाधि है ।
उत्तर - स्वामी शब्द का अर्थ मालिक होता है । स्वामी का मतलब पति भी होता है यानी किसी चीज का मालिक । जैसे किसी अच्छे बिजनेस मैन को उद्योगपति कहते हैं । साधु के साथ भी यही बात होती है । उसने अपने ज्ञान द्वारा जो प्राप्ति की है वह उसका स्वामी हुआ ।
आपने बिलकुल ठीक ही कहा, इसका सम्बन्ध आगे लगे नाम से ही होता है, जैसे स्वामी स्वरूपानन्द । इसका मतलब ये हुआ । जिसने अपने निज स्वरूप यानी आत्मा और उसके आनन्द को अनुभव, साक्षात और होने के स्तर पर जान लिया और सही रूप में प्राप्त कर लिया । वह स्वामी स्वरूपानन्द हो गया । सच्चिदानन्द इससे नीचे की आत्मा की एक स्थिति है ।
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आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।

26 अगस्त 2011

बृह्मचर्य का क्या मतलब होता है ? पप्पू सिंह एण्ड नोनू

सर जी ! सत श्री अकाल जी ! मेरा नाम पप्पू सिंह सरदार है । मेरी पत्नी का नाम नोनू है । मैं आपके पाठक और मित्र सुरिन्दर सिह ( आस्ट्रेलिया वाले ) के मामा का बेटा हूँ । मुझे और मेरी पत्नी को आपके ब्लाग के बारे में रुप भाभी ने बताया था । तो मेरी भी अपनी सेवा में हाजरी लगाईये ।
सर जी ! मुझे आप ये खुल के समझा दीजिये कि मन । कर्म और वचन से की गयी भक्ति क्या होती है ? मेरे कहने का मतलब है कि क्या इस तरह से भक्ति 3 प्रमुख भागो में डिवाइड हो गयी । या फ़िर ये मन । कर्म और वचन से की जाने वाली भक्ति असल मे 1 ही रुप के 3 भाग है ।
क्यु कि कहते है कि भक्ति को पूर्ण रुप से समर्पित होना चाहिये । भक्ति मन । कर्म और वचन से करनी चाहिये । इसलिये सर जी ! इस बात के पीछे क्या राज है ? जरा इस महिमा पर से पर्दा उठाईये । 1 बात और बता दीजिये कि - ये वास्तव मे " बृह्मचर्य " का क्या मतलब होता है ? बल्ले बल्ले ।
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सत श्री अकाल ! पप्पू सिंह जी ! सरदार जी एण्ड नोनू जी..सत्यकीखोज पर प्रथम शुभ आगमन पर हम सभी लोग आपका हार्दिक स्वागत करते हैं । आपसे मिलकर बेहद खुशी हुयी ।
सुरिन्दर जी ! बङे कमाल के इंसान हैं । ग्रेट कामेडियन हैं । वे मेरे ब्लाग के लेखों ( श्री विनोद त्रिपाठी जी के ) का हाजमोला की जगह इस्तेमाल करते हैं । पढकर इतना हँसते हैं कि जबरदस्त farting करते हैं । बताईये अभी कल को कोई कहे - राजीव जी ! आपके ब्लाग पढने के बाद मेरा पठाखे चलाने का शौक ही खत्म हो गया । कैसे कैसे लोग हैं भाई । सीता जी से तो मुझे गिन गिनकर बदले लेने हैं ।
आईये आपके साथ बातचीत की शुरूआत करते हैं ।
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सर जी ! मुझे आप ये खुल के समझा दीजिये कि मन । कर्म और वचन से की गयी भक्ति क्या होती है ? मेरे कहने का मतलब है कि क्या इस तरह से भक्ति 3 प्रमुख भागो में डिवाइड हो गयी । या फ़िर ये मन । कर्म और वचन से की जाने वाली भक्ति असल मे 1 ही रुप के 3 भाग है ।
- आपने थोङा घुमाव के साथ इस बात को समझ लिया । जो लगभग विपरीत भाव वाला ही हो गया । भक्ति 3 भागों में विभाजित नहीं हुयी । बल्कि ये जीव के 3 तीन प्रमुख व्यवहार का मिलकर 1 होना है । इसलिये ये तो एक बार को कह सकते हैं कि - 1 ही रुप के 3 भाग है ।  मन । कर्म - सभी कार्य । और वचन - वाणी ( के सभी बोल ) ये सभी भक्तिमय होने चाहिये । यहाँ इसका बहुत ही गलत मतलब अक्सर ही लोग ये लगा लेते हैं कि दुनियाँदारी छोङकर 


बाबा हो जाओ । मगर ऐसा नहीं हैं । शरीर को मन्दिर मानकर ( क्योंकि इसके अन्दर परमात्मा रहता है ) और सभी जीवों में उसी को देखते हुये ( क्योंकि अन्य सब में भी वही है । ) परस्पर जगत व्यवहार करना ही मन वचन कर्म से की गयी भक्ति है । यानी मन में सभी के प्रति अच्छे । भलाई के । और शुभ विचार रखना । मन की भक्ति । यही वात कर्म और वाणी पर भी लागू होती है । बस इतना ही हो जाने पर आप धीरे धीरे परिवर्तन द्वारा खुद भक्त बनने लगोगे ( इसका पूर्ण उत्तर आगे के उत्तर में आ गया है )
क्यूँ कि कहते है कि भक्त को पूर्ण रुप से समर्पित होना चाहिये । भक्ति मन । कर्म और वचन से करनी चाहिये । इसलिये सर जी ! इस बात के पीछे क्या राज है ? जरा इस महिमा पर से पर्दा उठाईये ।
- यहाँ भी दो बातें हैं । वास्तव में इंसान को एक भक्त की तरह अपना जीवन जीना चाहिये । मन - सदाचार युक्त ( यानी सभी के प्रति प्रेमभाव वाला । और सदगुणों वाला ) कर्म - सदकर्म ( इसको सरल रूप से समझने के लिये ये

सबसे बेहतर सिद्धांत है - जो व्यवहार आप अपने लिये दूसरों से चाहते हों । वही सबके साथ करें । यानी आपके सभी काम दूसरों को सुख पहुँचाने वाले हों । न कि दुख पहुँचाने वाले । वचन - यानी वाणी..में भी वही बात है । आपकी वाणी से दूसरों को सुख पहुँचे - ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय । औरन को शीतल करे आप हु शीतल होय । असली भक्ति यही है । न कि काल्पनिक रूप से किसी अपरिचित से god की पूजा करना ।
लेकिन ?? अब दूसरा पक्ष देखिये -
सभी इंसान जिस तरह के उपकरण से संचालित हैं । ये सब जिन्दगी में स्वयँ उतार पाना बहुत कठिन बात है । जिस प्रकार एक जंग लगे लोहे को आप रगङ कर या किसी केमिकल आदि की सहायता से भी पूर्णतः अपने स्तर पर शुद्ध नहीं कर सकते । उसे शुद्ध करने हेतु दहकती भट्टी में तपाकर जलाना होगा । और फ़िर उस पर घन से चोट मारनी होगी । तभी वह पूरा शुद्ध होगा ।
इसी प्रकार निर्वाणी नाम की ग्यान रूपी भट्टी में जब सुमरन रूपी चोट बारबार इस कौआ रूप मन को लगती है । तो यह आटोमेटिक शुद्ध हँस रूप को प्राप्त हो जाता है । और जो बातें मैंने ऊपर लिखी हैं । वैसी खुद ही आपके स्वभाव में आ जाती हैं । उनको थोपे गये स्टायल में नहीं करना होता । बल्कि ये आमूल चूल आपका आंतरिक परिवर्तन हो जाता है । सतनाम के सुमरन द्वारा । जिस सुरति शब्द योग कहते हैं ।
1 बात और बता दीजिये कि - ये वास्तव में " बृह्मचर्य " का क्या मतलब होता है ?
- बृह्मचर्य शब्द के दो अर्थ हैं । और बृह्मचर्य ही क्या वास्तव में लौकिक अलौकिक जगत में लगभग प्रत्येक शब्द के ही दो अर्थ हो जाते हैं । जिनमें अलौकिक अर्थ वाला अर्थ सत्य के अधिक करीब होता है । और लौकिक अर्थ स्थूल या प्रतीक रूप में ही होता है । जैसे पण्डित शब्द संसार में एक जाति के लिये प्रयुक्त होता है । परन्तु वास्तव में पण्डित शब्द का मतलब पाण्डित्य पूर्ण यानी ग्यानी होना है । जो ग्यानी है । उसको निसंदेह पण्डित कहा जा 


सकता है । भले ही जाति वर्गीकरण के अनुसार वह अत्यन्त नीच जाति में क्यों न आता हो ।
इसी तरह बृह्मचर्य शब्द का असली अर्थ है । बृह्म + चर्य = बृह्म यानी बृह्म या बृह्माण्डी सत्ता । और चर्य - वहाँ विचरना या पहुँच रखना । यानी जो व्यक्ति मनुष्य जीवन में ही बृह्म सत्ता में आता जाता है । उसको बृ्ह्मचर्य युक्त कहा जाता है । योगीराज कृष्ण इसीलिये अपने को बृह्मचर्य युक्त कहते थे । इसी तरह ब्राह्मण शब्द का भी असली अर्थ यही है - बृह्म + अणि = यानी बृह्म में स्थित पुरुष को ही सही रूप में ब्राह्मण कहा जाता है ।
आम जीवन में बृह्मचर्य - स्त्री में मासिक धर्म के बाद जब कामेच्छा प्रबल होती है । उसी समय सम्भोग करना भी बृह्मचर्य है । यहाँ महत्वपूर्ण ये भी है कि उस समय पुरुष में काम इच्छा हो या न हो । उसे स्त्री की इच्छा पूर्ति हेतु ऐसा करना चाहिये । ये इन्द्र द्वारा स्त्रियों को दिया गया वरदान है । और पुरुषों द्वारा इस समय स्त्री इच्छा की अवहेलना करने पर उनको शाप भी है । ठीक इसी तरह पुरुषों में भी जब वीर्य संचय के बाद काम वेग प्रवल हो । तो स्त्री को चाहे इच्छा हो । या न हो । उसे पुरुष की इच्छा पूर्ति करनी चाहिये ।
लेकिन मेरे अनुमान से जब स्त्री के मासिक धर्म के बाद के 3-4 दिनों में पति पत्नी 2 बार भी सम्भोग कर लेते हैं । तो उतने से ही दोनों की महीने भर की तृप्ति हो जाती है । ये स्वाभाविक काम आवेश है । क्योंकि पुरुष में वीर्य का संचय सिर्फ़ 15 दिन में 1 बार स्खलन हेतु ही प्राकृतिक तौर पर होता है । अतः महीने में 2 बार सम्भोग को बृ्ह्मचर्य के अंतर्गत रखा गया है । नवविवाहितों को कुछ समय तक 1 महीने में 3 बार सम्भोग करना भी बृह्मचर्य के अंतर्गत ही है ।
मीट मदिरा और तेज मसाले युक्त भोजन कामवासना को बङाते हैं । साथ ही साथ आजकल पति पत्नी द्वारा एक साथ लेटने से भी अतिरिक्त कामवासना पैदा होती है । जो निसंदेह हानिकारक है ।
विशेष - भाई ! आप लोग कैसे कैसे प्रश्न पूछते हो । बाबा जी के पास न तो स्त्री है । और न ही इस्तरी । बस रात को खिङकी से चाँद का रूप नजारा करके थोङा शहद चाट लिया । बाबा का यही हनीमून है । मुझे क्या पता - इसके आगे लन्दन में क्या होता है ? और लुधियाने में क्या ? मिथुन जी भी बस इतना कहकर ही गोल हो गये - आगे फ़िर जो लण्डन में हो । वही तो हो लुधियाने में । ओये बल्ले बल्ले..आगे फ़िर जो लण्डन में हो । वही तो हो लुधियाने में ।

25 अगस्त 2011

तुम खुद ही भगवान हो

19 जनवरी 1990 संध्या 5 बजे । ओशो आश्रम, पुणे भारत । 
उनसे पूंछा गया कि सब सन्यासियों को क्या कहा जाय ? उन्होंने कहा कि - सबसे कहना कि अमेरिका में शार्लट, नार्थ केरोलाइना की जेल में रहने के बाद से उनका शरीर जर्जर होता चला गया । ओक्लाहोमा जेल में उन्हें थेलियम जहर दिया गया । और रेडियेशन से गुजारा गया । जिसका कि चिकित्सा विशेषज्ञों से संपर्क करने पर बहुत बाद में पता चल पाया । इस तरह जहर दिया गया । जिसका पीछे कोई सबूत न छूटे । मेरा जर्जर शरीर अमरीकी सरकार के ईसाई मतान्धों की कारस्तानी है । अपनी शारीरिक पीड़ा को मैंने स्वयं तक ही रखा । लेकिन इस शरीर में रहकर कार्य करना अब घोर कष्टप्रद एवं असंभव हो गया है । इतना कहकर वे लेटकर आराम करने लगे । उस समय जयेश वहाँ नहीं था । अमृतो जयेश के पास भागा भागा गया । और उसे बताया कि ओशो स्पष्टतः शरीर छोड़ रहे है । ओशो ने जब अम्रतो को पुकारा । तब अम्रतो ने ओशो को बताया कि जयेश भी आया हुआ है । तो उन्होंने जयेश को भी भीतर लाने को कहा । जब दोनों उनके पास बिस्तर पर बैठ गये । तब उन्होंने कहा - मेरे संबंध में कभी भी अतीतकाल में बात मत करना । मेरे प्रताड़ित शरीर से मुक्त होकर मेरी उपस्थिति कई गुना बढ़ जायेगी । मेरे लोगो को याद दिलाना कि वे अब मुझे और भी अधिक महसूस कर सकेंगे । मेरे लोगों को तत्क्षण पता चल जायेगा । अम्रतो उनका हाथ थामे हुये था । और यह सुनकर वह रोने लगा । उन्होंने उसकी ओर कड़ी नजर से देखा । वे बोले - नहीं, नहीं यह ढंग नहीं है ? यह सुनकर उसने तत्क्षण रोना बंद कर दिया । तब उन्होंने बड़े सुंदर ढंग से मुस्कराते हुये उसे स्नेह से भरकर निहारा । फिर उन्होंने कहा - मैं चाहता हूं कि मेरे काम का विस्तार जारी रहे । अब मैं अपना शरीर छोड़ रहा हूं । अब बहुत से लोग आयेंगे । और बहुत बहुत से लोगों का रस जागेगा । और उनका कार्य इतने अविश्वसनीय रूप से बढ़ेगा । जिसकी तुम सब कल्पना भी नहीं कर सकते । मैं तुम सबको अपना स्वपन सौंपता हूं । उनके हाथ की नब्ज अम्रतो देख रहा था । जो आहिस्ता आहिस्ता विलीन होती गई । जब वह बहुत मुश्किल से नब्ज को महसूस कर पा रहा था । तो उसने कहा - ओशो ! मैं समझता हूँ This is it ।( अब समय आ गया ) उन्होंने केवल धीमे से सिर हिलाकर हामी भरी । और चिरकाल के लिये अपने कमल नयनों को बंद कर लिया ।
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प्रेम तुम्हें रिक्त करता है । ईर्ष्या से रिक्त । पागलपन से रिक्त । क्रोध से रिक्त । प्रतिस्पर्धात्मकता से रिक्त । तुम्हारे अहंकार और उसके सारे कचरे से रिक्त करता है । लेकिन प्रेम तुम्हें कई बातों से भरता है । जिनके बारे में अभी तुम अनजान हो । यह तुम्हें खुशबू से भरता है । प्रकाश से भरता है । आनन्द से भरता है - ओशो ।
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परमात्मा का कोई मार्ग नही होता । वो तो अद्रश्य है । उसको कोई खोजना चाहा । तो कही पर भी स्टेशन नही है । उसका मार्ग तो प्रेम का है । एक तरफ प्रेम है । और एक तरफ है - लोभ मोह अहंकार, इनको त्यागें । और परमात्मा मिले । तुम खुद ही भगवान हो । किसी से इनाम नही लेना है । भूल यही करते हो कि लोगों से प्रमाण लेना चाहते हो । तुम जल्दी बहुत करते हो पाने के लिए । और फिर खाली हाथ लौट जाते हो । ऐसे जन्मों जन्मों से हो रहा हैं ।
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निर्णय लें प्रमुदित होने का । प्रसन्न होने का । यह एक सहज ध्यान विधि है । लेकिन विधि अत्यंत जादुई है । बस प्रमुदित होने का,प्रसन्न होने का निर्णय लें । एक बार तुम जब दूसरों की ओर देखना बंद कर देते हो । तो प्रसन्न या अप्रसन्न होने का निर्णय ले सकते हो । जब तुम निर्णय लेते हो कि अब तुमने शांत रहने का तय किया है । तब तुम किसी के किसी भी व्यवहार से अशांत नहीं होगे । यदि कोई अशांति उभरती भी है । तो तुम उसे सावधानी पूर्वक देख पाओगे कि यह कहाँ छिपी हुई थी । और कहाँ से अब यह सतह पर आ रही है । शांत होने के तुम्हारे निर्णय ने एक नए विचार को जन्म दिया है । और शांति के सफेद बादल अब तुम्हें भर देंगे । एक संबुद्ध व्यक्ति उसी संसार में रहता है । जिसमें तुम रहते हो । तुम संसार से प्रभावित हो जाते हो । जबकि वो प्रभावित नहीं होता । क्योंकि उसके निर्णय ने उसे एक नयी व्यवस्था दी है । उसके भीतर बस शांति और प्रेम है । एक खोजी के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वो एक संबुद्ध मित्र का स्मरण एक ध्यान की तरह अपने भीतर निरंतर बनाए रखे । यह कोई भी सदगुरु हो सकता है । जो भी तुम्हें ठीक लगता हो । अपने ध्यान को दूसरों के ऊपर रखने के बजाय अपने ऊपर रखें । यदि तुम पीड़ा, द्वंद्व, दुःख या अभाव में हो । तो इसका कारण तुम स्वयं हो । कोई अन्य नहीं । तुम अपने निर्णयों के ही अंतिम परिणाम हो । सहजता से प्रमुदित व प्रसन्न रहो । क्योंकि जब तुम सहजता से प्रमुदित व प्रसन्न रहते हो । तो एक गहरे आतंरिक रूपांतरण से गुजरते हो । धीरे धीरे तुम्हारा निर्णय तुम्हारा स्वभाव बन जाता है ।
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You only find true happiness only in God, the God of the Sumirn Remember always continuous ( 24 hours ) will continue, then there is a greater pleasure, without the grace of God that do not meet both the public and otherworldly. Sumirn remains constant in our world then we are free from all desires of the Vasanao then be with him during the whole of the divine lives. And the divine company   ?   Nad Brahma Dhyan Yog Ashram Indore.
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तुम जब इस शरीर से अलग हो के अपने को देख लोगे । तब तुम ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा में समाहित हो को भी देख लोगे । तब तुम तुम न रह जाओगे । अपने मूल रूप से सदा के लिये समाहित हो जाओगे ।
जब तक तुम शरीर को ही सब कुछ समझते रहोगे । तब तक अपने मूल रूप से बेखबर रहोगे । तुम्हारा यह सुंदर शरीर एक छण में मिट जायेगा । बिखर जायेंगे । शरीर को निर्माण करने वाले सभी तत्व भी बिखर जायेंगे । और जब तुम इस शरीर से अलग हो गये । स्वयं को देख लोगे । तब तुम सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा को भी देख लोगे । ब्रह्माण्ड के प्रत्येक पदार्थ का मूल तत्व ऊर्जा है । और तुम्हारे शरीर का भी मूल तत्व ऊर्जा है । जिस दिन तुम इस भेद को जान लेते हो । उस दिन तुम्हारे सारे भम्र स्वतः ही मिट जाते है । नाद ब्रह्म ध्यान योग आश्रम इन्दौर
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ऊर्जा वही बहती है । जहां हमारा ध्यान जाता है । हमारा कोई भी विचार ऊर्जा के बिना निर्जीव है । संसार के प्रत्येक पदार्थ में ऊर्जा ही ऊर्जा है ।
ऊर्जा को न बनाया जा सकता है । न मिटाया जा सकता है । पदार्थ का मूल तत्व ऊर्जा है । जो सदा था । रहा है । और रहेगा । यदि हमारा ध्यान हमारे ही पास रहता है । तब हमारे भीतर कोई विचार नही रहता है । और जब विचार नही रहता है । तो निर्विचार रहता है । और निर्विचार ही स्वयं में स्थित रहना है । स्वयं में स्थित रहना ही स्वयं को जानना है । नाद ब्रह्म ध्यान योग आश्रम इन्दौर

हम परमात्मा को किस रिश्ते से याद करें ? पप्पी

नमस्कार जी ! मेरा नाम पप्पी है । मैं लालडू में रहती हूँ । मुझे आपके ब्लाग के बारे मे मेरी सहेली जोबनबीर कौर ने बताया है । जोबनबीर ने मुझे स्पेशली जोर दे देकर आपके ब्लाग पर जाने को कहा । जोबनबीर आपकी पाठक है ।
मैं भी पिछ्ले कई दिनों से लगातार आपका ब्लाग पढ रही हूँ । सब कुछ अच्छा लगा । जोबनबीर से मेरी मुलाकात जोबनबीर की शादी के बाद हुई । क्युँ कि मैं तो शुरू से लालडू में ही रहती हूँ । लेकिन जोबनबीर शादी के बाद लालडू में आयी । हम दोनों आज कल 1 ही कालोनी में रहती हैं ।
मेरे पति का नाम राजू सिंह बेदी है । उनकी गहनों की दुकान है । यानि वो सुनियारे हैं । मैं आपसे 1 बहुत जरुरी बात पूछना चाहती हूँ । ये तो सब जगह पढने को मिल गया । खासकर आपके ब्लाग पर भी ।
जैसे श्रीमद भगवत गीता में भी लिखा है कि - आत्मा अनादि । अजन्मी । अमर । अजर और अबिनाशी है । कबीर जी की वाणी में भी लिखा है कि - ये जीव ( आत्मा ) का आदि अन्त कोई भी नहीं जानता । आदि अन्त तो उसका होता है । जिसका जनम हुआ हो । जैसे शरीर पैदा होता है । और नष्ट हो जाता है ।
लेकिन जो अजन्मा है । उसका अन्त कौन जानेगा । इसलिये ये जीव ( आत्मा ) आदि अन्त रहित है । रामायण में भी श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं कि - ईश्वर अँश जीव अबिनाशी । इसी तरह हर दिव्यवाणी में ये बात अलग अलग ढंग से बताई गयी है ।
अब ये तो सुनी हुई और पढी हुई जानकारी के तहत पता लगा कि - हम आत्मा हैं । हमारा वास्तविक रूप आत्मा

है । ये शरीर जरुर हमारा है । लेकिन वास्तव में हम शरीर नहीं हैं । हम सब वास्तव में आत्मा हैं । अब मेरा जो प्रश्न है । वो ये है कि - हम परमात्मा को किस रिश्ते से याद करें ?
क्यूँ कि कोई उसे अपना सखा या मित्र कहकर याद करता है । कोई उसे दाता या मालिक या साहेब कहकर याद करता है । मीरा जी उसे अपने पति रुप में याद करती है । कोई उसे पिता रुप में याद करता है ।
तो आप ही बतायें कि - परमात्मा जो सर्वशक्तिमान । सर्वोच्च । सर्वसमर्थ और बेअन्त है । उसे हम किस रिश्ते से याद करें । या उससे कैसा रिश्ता मानते हुये उसकी भक्ति करें ।
मुझे तो परमात्मा को पिता के रुप में ही याद करना सबसे अच्छा लगता है । साथ में ये भी बताने की कृपा करे कि परमपिता परमेश्वर का शाब्दिक अर्थ क्या है ? परम + पिता और परम + ईश्वर । मुझे आपकी तरफ़ से बेहद सही जवाबों का जल्द इन्तजार रहेगा । नमस्कार ।
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नमस्कार पप्पी जी ! सत्यकीखोज पर आपके प्रथम शुभ आगमन पर हम सभी आपका हार्दिक स्वागत करते हैं । आपसे मिलकर अत्यन्त खुशी हुयी । जोबनवीर जी का बहुत बहुत धन्यवाद । जो आपको जोर दे देकर इस ब्लाग पर ले ही आयीं । वास्तव में सत्यकीखोज सिर्फ़ एक ब्लाग ही न होकर एक समान विचारों वाला सतसंगी परिवार है । जिसके सभी सदस्य आपस में प्रेम प्यार नोंक झोंक मीठा कङवा हँसी मजाक आदि सभी रसों से परिपूर्ण व्यवहार आपस में कर लेते हैं ।

दूसरे जो महत्वपूर्ण बात है । मैं इस ब्लाग को अपना ब्लाग न मानकर आप सभी का ही मानता हूँ । जोबनवीर जी और मेरे एक विचार में एकदम समानता है । हम दोनों जो भी काम करते हैं । जोर से और जोर दे देकर ही करते हैं । इसी वैचारिक एकता के चलते एक बार मैं इनके घर मेहमान बनकर गया । और  जोर दे देकर ( मतलब जबरदस्ती ) टिका ही रहा । जाने का नाम ही नहीं लिया । तब भी जोबनवीर जी ने मुझे जोर दे देकर भगाया ।
जोबनवीर की भाभी जी रूप कौर जी से शुरू हुआ ये सिलसिला आज उनके भाई सुरिन्दर जी । रूप जी की छोटी बहन नबरूप जी और उनसे जुङे बहुत से अन्य लोग मित्र रिश्तेदार के रूप में एक बङे परिवार के रूप में बदल गया है । सो अगेन थेंक्स जोबनवीर जी ! आपकी कौन सी नयी फ़िल्म रिलीज होने वाली है ?
चलिये थोङे से हँसी मजाक के बाद अब बातचीत शुरू करते हैं ।
ये शरीर जरुर हमारा है । लेकिन वास्तव में हम शरीर नहीं हैं । हम सब वास्तव में आत्मा हैं ।
- वास्तव में ये शरीर किराये का घर है । अपने दान आदि पुण्य रूपी भाग्य से जो किराया हमने अदा किया है । उसी किराये के आधार पर हमें यह शरीर स्वस्थ रोगी धन निर्धन सुख दुख आदि के साथ प्राप्त हुआ है । लेकिन इसका उपयोग सिर्फ़ अच्छा बुरा भोगना भर नहीं हैं । किराये के घर से अधिक ये एक गाङी हैं । जिसमें बैठकर हम इस दुर्लभ मनुष्य जीवन से नीचे की तरफ़ ( नरक नीच लोक आदि ) से लेकर ऊपर परम लक्ष्य परमात्मा के VVIP जोन तक की यात्रा करके उसे पा सकते हैं ।

अब मेरा जो प्रश्न है । वो ये है कि - हम परमात्मा को किस रिश्ते से याद करें ?
- वास्तव में परमात्मा को याद करने का सबसे श्रेष्ठ सुमरन सदगुरु द्वारा दी गयी नाम भक्ति ही है । जिसकी ही गुरुवाणी आदि तमाम सन्तवाणी में चर्चा की गयी है । और इस matter पर तो मेरे ब्लाग में भंडार ही भरा हुआ है । लेकिन जब तक किसी सच्चे सदगुरु द्वारा आपको नाम प्राप्त न हो । आप उसको आत्मा यानी निर्मल अति चमकीले प्रकाश के रूप में याद करें । और उसे प्रेम से साहेब कहते हैं । साहेब ।
क्यूँ कि कोई उसे अपना सखा या मित्र कहकर याद करता है । कोई उसे दाता या मालिक या साहेब कहकर याद करता है ।
- मैं तो किसी तरह याद नहीं करता । बिकाज न तो उसने मुझे कोई लव करने वाली दी । न बीबी दी । न साली दी । सर पे 1 लाख बाल दिये । बच्चे नहीं दिये । मून की टिकट और हनी की बाटल दोनों के पैसे खामखांह ही गये । फ़िर बताओ भला । मैं क्यूँ याद करूँ ?
मीरा जी उसे अपने पति रुप में याद करती है । कोई उसे पिता रुप में याद करता है ।
- मीरा जी के बारे में 99% विश्व के लोग यह नहीं जानते कि मीरा सार शब्द ग्यान की विलक्षण साधिका थीं । और 100 में से पूरे 100 नम्बर लेकर पास हुयी थी । वास्तव में वह खुद परमात्मा हो गयी थी । उन्होंने करोंङों जन्मों का लक्ष्य प्राप्त कर लिया था । फ़िर कौन पति ? किसका पति ?

वह खुद ही पति हो गयी थी । मीरा और कृष्ण की पति रूप भक्ति सिर्फ़ 13 वर्ष आयु तक थी । इसके बाद उन्हें रैदास जी द्वारा दीक्षा प्राप्त हो गयी । वे नाम सुमरन करने लगी - पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो ।
अब क्योंकि एकदम तो सभी संस्कार कट नहीं जाते । अतः बाद में उन्होंने कृष्ण के बारे में भी कहा । उनसे सम्बन्धित मन्दिरों आदि में भी रही । पर अब बेचारे कृष्ण जी भी उनसे मिलने को हजार सिफ़ारिश लगायें । तो भी मिलना बहुत मुश्किल है । क्योंकि परमात्मा के उस VVIP जोन में हरेक को जाने की इजाजत नहीं है । जहाँ अपनी भक्ति से आज परम आदरणीय मीरा जी हैं ।
तो आप ही बतायें कि - परमात्मा जो सर्वशक्तिमान । सर्वोच्च । सर्वसमर्थ और बेअन्त है । उसे हम किस रिश्ते से याद करें । या उससे कैसा रिश्ता मानते हुये उसकी भक्ति करें ।
- आपकी जैसे मर्जी याद करो जी । मैं आपको God जी का मोबायल नम्बर दे दूँगा । आप डायरेक्ट बात कर लेना । ( आपके प्रश्न का उत्तर ऊपर दे चुका । इसलिये मजाक कर रहा हूँ । मैं लिखते लिखते बोर हो जाता हूँ । फ़िर ऐसी ही बातें करने लगता हूँ । आज मुझे बहुत लिखना पङा । यही हाल मैं आमने सामने के सतसंग में भी करता हूँ । )
मुझे तो परमात्मा को पिता के रुप में ही याद करना सबसे अच्छा लगता है ।
- और मुझे बङा बोरिंग लगता है । बताओ सवाल उसके । आप लोग मेरे पीछे पङे हो । तभी तो मैं कहता हूँ - O My God Where Are You ? ओ रूप कौर जी ! आपसे मुझे गिन गिनकर बदले लेने हैं ।
साथ में ये भी बताने की कृपा करें कि परमपिता परमेश्वर का शाब्दिक अर्थ क्या है ? परम + पिता और परम + ईश्वर ।
- परम यानी इस अखिल सृष्टि से परे । सबका पिता - क्योंकि सब उसी के संकल्प से उसी के अंश होकर जन्में यानी उत्पन्न हुये हैं । और वह अपने मूल रूप में आत्मा है । ईश्वर शब्द ऐश्वर्य से बना है । जो इस सब ऐश्वर्य का मालिक है । तो उसी तरह इस अखिल सृष्टि के समस्त ऐश्वर्य का मालिक जो इस सबसे परे रहता है । वही परमेश्वर है । ध्यान रहे । ईश्वर अलग होता है ।

24 अगस्त 2011

दिन के उजाले की प्रतीक्षा करेँ

सही चुनाव करना - ओशो । प्रश्न - मैँ अपने और अपनी प्रेमिका के बीच सबंधोँ को लेकर मुश्किल मेँ पड़ गया हूँ कि इन्हेँ रखूँ कि तोड़ डालूँ ?
- जल्दबाजी मत करो । क्योँकि होता यह है कि मन के अपने अंधेरे व उजाले क्षण होते हैँ । दिन के क्षण । और रात्रि के क्षण । जब दिन का क्षण आता है । तो हर चीज बहुत अच्छी लगती है । तुम हर चीज साफ साफ देख सकते हो । जब रात आती है । तो हर चीज काली हो जाती है । और तुम कुछ भी साफ साफ नहीँ देख पाते । यह पूरी सँभावना है कि तुम रात के क्षण मेँ । अँधेरे क्षण मेँ । क्षीण ऊर्जा के क्षण मेँ ऐसा कोई निर्णय ले लेते हो । अगर तुम उस घड़ी मेँ कोई ऐसा निर्णय ले लेते हो । तो यह समझ का निर्णय न होगा । क्योँकि तुमने इसी स्त्री के साथ सुंदर क्षण भी देखे हैँ ।
जरा सोचो । हम यहाँ बैठे हैँ । यहाँ प्रकाश है । तुम मुझे देख सकते हो । और तुम यहाँ सबको देख सकते हो । तुम पेड़ोँ को देख सकते हो । और अचानक बिजली चली जाती है । अब तुम किसी को नहीँ देख सकते । पेड़ और बाकी सब कुछ अब नहीँ हैँ । तो क्या तुम कहोगे कि अब पेड़ोँ का अस्तित्व मिट गया है ? व्यक्तियोँ का अस्तित्व मिट गया है ? अगर तुम ऐसा कहते हो । तो यह निर्णय बहुत जल्दबाजी का होगा । क्या तुम याद नहीँ कर सकते कि कुछ पल पहले यहाँ लोग थे । पेड़ हरे थे । और सब कुछ यहीँ था । और सब चीजेँ साफ थीँ ? अपने निर्णयोँ को दिन के समय तक के लिये संभालेँ ।
जब रात है । तो दिन को स्मरण रखेँ । इसे भूलेँ मत । और शीघ्र ही दिन आता ही होगा । तुम्हेँ जब भी निर्णय लेना हो । तो बेहतर है । उसे दिन के समय मेँ ही लेँ । तब तुम्हारा जीवन विधेय बन जाता है । अगर तुम अपना निर्णय रात के समय मेँ करते हो । तो तुम्हारा जीवन निस्व्हेध बन जाता है । मैँ धार्मिक व अधार्मिक व्यक्ति मेँ यही भेद करता हूँ । अधार्मिक सदा रात के समय मेँ अपना निर्णय करता है । वह नकारात्मक अवस्था मेँ निर्णय लेता है । तभी तो वह यह नहीँ कह सकता कि - ईश्वर है । वह कहता है - ईश्वर नहीँ है । वे सभी " न " मिलकर एक बड़ी न बन जाती है - कहीँ कोई ईश्वर नही है । सभी " हाँ " मिलकर बड़ी हाँ बनती है - हाँ ! ईश्वर है ।
तो प्रतीक्षा करेँ । निर्णय तभी लेँ । जब उजाला हो । जब फिर से तुम इस स्त्री को चाहने लगते हो । और कोई अवरोध नहीँ । सब कुछ सुंदर है । अतिरेक मेँ है । निर्णय तब लेँ । और अगर तुम अलग होना चाहते हो । तो अलग हो जाओ । लेकिन निर्णय अँधेरे मेँ न लो । तभी मैँ इसे थोड़ा और टालने को, प्रतीक्षा करने को कहता हूँ । यह बीत जाएगा ।
एक तीसरी अवस्था भी है - भावातीत अवस्था । जब तुमने दिन और रात को बारबार देख लिया । तब तुम जान जाते हो कि इन दोनोँ के ऊपर भी कुछ है । तुम, तुम्हारे साक्षी होने की क्षमता दोनो से ऊपर है ।
तो निर्णय तीन प्रकार के हैँ । पहला निर्णय - निषेधात्मक है । जो जीवन को बंजर बना देता है । तब वहाँ कुछ भी नहीँ उगता । यह निराशा है । यह नरक है । दूसरी तरह का निर्णय - हाँ का है । दिन का निर्णय । जहाँ जीवन प्रफुल्लता, उत्सव बन जाता है । वहाँ प्रसन्नता है । और तुम अपने होने का आनन्द अनुभव करते हो । यही स्वर्ग है । यही वैकुंठ है । और तीसरा है । न उजाला । न अँधेरा । जहाँ निर्णय साक्षी भाव से आता है । दिन और रात । दोनो के अनुभव से तुम निर्णय लेते हो । वही अंतिम निर्णय है । वही मनुष्य को संबुद्ध बनाता है । तो थोड़ी प्रतीक्षा करेँ । देखेँ । और दिन के उजाले की प्रतीक्षा करेँ । हुँ ? तब निर्णय लेँ । यही सही है - ओशो दिस इज़ इट !
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मैंने राम रतन धन पायो । 
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु । करि करिपा अपनायो । 
जनम जनम की पूंजी पाई । जग में समय खोवायो । 
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै । दिन दिन बढत सवायो । 
सत की नाव खेवटिया सतगुरु । भवसागर तरि आयो । 
मीरा के प्रभु गिरधर नागर । हरखि हरखि जस गायो ।
मेरा मन रामहि राम रटै रे ।
राम नाम जप लीजै प्रानी । कोटिक पाप कटै रे ।
जनम जनम के खत जु पुराने । नामहि लेत फटै रे । 
कनक कटोरे इम्रत भरियौ । पीवत कौन नटै रे । 
मीरा कहै प्रभु हरि अविनासी । तन मन ताहि पटै रे । 

23 अगस्त 2011

क्या जिंदगी घड़ी भर से ज्यादा की है ?

खर्राटों की संगत - जो व्यक्ति रात स्वप्न ही देखता रहा है । वह सुबह थका मांदा उठता है । वह सुबह और भी थका होता है । जितना कि रात जब सोने गया था । उससे भी ज्यादा थका होता है । क्योंकि रात भर और सपने देखे । सपनों में जूझा । दुख स्वप्न। पहाड़ों से पटका गया । घसीटा गया । भूत  प्रेतों ने सताया । छाती पर राक्षस नाचे । क्या क्या नहीं हुआ ।
मुल्ला नसरुद्दीन एक रात को सोया है । और सपना देख रहा है कि भाग रहा हूं । भाग रहा हूं । तेजी से भाग रहा हूं । एक सिंह पीछे लगा हुआ है । और वह करीब आता जा रहा है । इतना करीब कि उसकी सांस पीठ पर मालूम पड़ने लगी । तब तो मुल्ला ने सोचा कि - मारे गये । अब बचना मुश्किल है । और जब सिंह ने पंजा भी उसकी पीठ पर रख दिया । तो घबड़ाहट में उसकी नींद खुल गई । देखा तो और कोई नहीं -पत्नी...। हाथ उसकी पीठ पर रखे है ।
पत्नियां नींद में भी ध्यान रखती हैं कि कहीं भाग तो नहीं गये । कहीं पड़ोसी के घर में तो नहीं पहुंच गये ।
मुल्ला ने कहा - माई । कम से कम रात तो सो लेने दिया कर । दिन में जो करना हो, कर । और क्या मेरी पीठ पर सांसे ले रही थी कि मेरी जान निकली जा रही थी । यह कोई ढंग है ।
एक दिन सुबह सुबह बैठकर अपने मित्रों को सुना रहा था कि शेर के शिकार को गया था । घंटों हो गये । शिकार मिले ही नहीं । सब मित्र थक गये । मैंने कहा - मत घबड़ाओ । मुझे आवाज देनी आती है । जानवरों की । तो मैंने सिंह की आवाज की । गर्जना की । क्या मेरी गर्जना करनी थी कि फौरन एक गुफा में से सिहंनी निकल कर बाहर आ गयी । धड़ाधड़ हमने बंदूक मारी । सिंहनी का फैसला किया ।
मित्रों ने कहा - अरे, तो तुम्हें इस तरह की आवाज करनी आती है । जरा यहां करके हमें बताओ तो । कैसी आवाज की थी ?
मुल्ला ने कहा -  भाई ! यहां न करवाओ तो अच्छा ।
नहीं माने मित्र कि - नहीं, जरा करके, जरा सा तो बता दो ।
जोश चढ़ा दिया । तो उसने कर दी आवाज । और तत्काल उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला । और कहा - क्यों रे, अब तुझे क्या तकलीफ हो गयी ? मुल्ला बोला - देखो । सिहंनी हाजिर । इधर आवाज दी । तुम देख लो । खुद अपनी आंखों से देख लो । पत्नी खड़ी है विकराल रूप लिये वहां । हाथ में अभी भी बेलन उसके ।
मुल्ला ने कहा - अब तो मानते हो । कि मुझे आती है जानवरों की आवाज । रात तुम अगर ऐसे सपने देखोगे । ऐसी आवाजें बोलोगे । ऐसी आवाजें निकालोगे । रात देखो, लोग क्या क्या आवाजें निकालते हैं ? कभी उठकर बैठकर निरीक्षण करने जैसा होता है ।
मैं वर्षो तक सफर करता रहा । तो मुझे अकसर यह झंझट आ जाती थी । रात एक ही डिब्बे में किसी के साथ सोना । एक बार तो यूं हुआ । चार आदमी डिब्बे में । मगर अदभुत संयोग था । चमत्कार कहना चाहिए कि पहले आदमी ने जो घुर्राहट शुरू की । तो मैंने कहा कि - आज सोना मुश्किल । मगर उसके ऊपर की बर्थ वाले ने जवाब दिया । तो मैंने कहा - पहला तो कुछ नहीं है - नाबालिग । दूसरा तो गजब का था । मैंने कहा - आज की रात तो बिलकुल गयी ।
और उनमें ऐसे जवाब सवाल होने लगे । संगत छिड़ गयी । तीसरा थोड़ी देर चुप रहा । जो मेरे ऊपर की बर्थ पर था । जब उसने आवाज दी । तब तो मैं उठकर बैठ गया । मैंने कहा - अब बेकार है । अब चेष्टा ही करनी बेकार है । और उन तीनों में क्या साज सिंगार छिड़ा ।
थोड़ी देर तक तो मैंने सुना । मैंने कहा कि - यह तो मुश्किल मामला है । यह पूरी रात चलने वाला है । तो मैंने भी आंखें बंद की । और फिर मैं भी जोर से दहाड़ा । वे तीनों में क्या साज  सिंगार छिड़ा ।
बोले कि - भाईजान ! अगर आप इतनी जोर से नींद में और घुर्रायेंगे । तो हम सोंयेगे । कैसे ?
मैंने कहा - सो कौन रहा है मूर्ख । मैं जग रहा हूं । और तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं कि अगर तुमने हरकत की । न मैं सोऊंगा । न तुम्हें सोने दूंगा । सो तुम रहे हो । मैं जग रहा हूं । मैं बिल्कुल जग कर आवाज कर रहा हूं । नींद में मैं आवाज नहीं करता । तुम सम्हल कर रहो । नहीं तो मैं...रात भर मैं भी तुम्हें नहीं सोने दूंगा ।
लोग सोते क्या हैं । रात में भी सुर सिंगार चलता है । और क्या जवाब सवाल । और फिर उनके भीतर क्या चल रहा है । वह तुम सोच सकते हो । कैसी  कैसी मुसीबतों में से गुजर रहे होंगे । फिर सुबह अगर थके मांदे उठे । तो आश्चर्य क्या । सोये ही नहीं -  ओशो ।
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भक्त सिर्फ प्रतीक्षा करता है । प्रतीक्षा का अर्थ है । कबीर कहते हैं - आंख बंद करूं ? नाक रूंधू ? शीर्षासन करूं ? पता नहीं । ये तुझे राजी न पड़ेंगे । न पड़ेंगे । तो भक्त कहता है - मैं तो इतना ही कर सकता हूं कि आंख खोलकर द्वार पर बैठा तेरी प्रतीक्षा करूं । भक्त की सारी साधना प्रतीक्षा है । और प्रतीक्षा से बड़ी कोई साधना नहीं है । क्योंकि प्रतीक्षा सबसे कठिन है । साधना में कुछ तो करने को रहता है । तो तुम व्यस्त रहते हो । माला जप रहे हो । बैठे हो । पूजन कर रहे हो । बैठे हो आसन जमा कर । प्राणायाम कर रहे हो । कुछ करने को रहता है । मन उलझा रहता है । आलंबन रहता है । मन लगा रहता है । भक्त सिर्फ प्रतीक्षा करता है । प्रतीक्षा का अर्थ है । मन शून्य हो । तो ही प्रतीक्षा हो सकती है । विचार बीच में न हो । अन्यथा मेहमान आएगा । और अगर विचार बीच में रहे । तो तुम देख न पाओगे । तो भक्त निर्विचार होकर प्रतीक्षा करता है । सब हटा देता है विचार - ओशो ।
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जीवन की सच्चाई - जीवन झाग का बुलबुला है । जो उसे ऐसा नहीं देखते । वे उसी में डूबते । और नष्ट हो जाते हैं । किंतु जो इस सत्य के प्रति सजग होते हैं । वे एक ऐसे जीवन को पा लेने का प्रारंभ करते हैं । जिसका कि कोई अंत नहीं होता है ।
एक फकीर कैद कर लिया गया था । उसने कुछ ऐसी सत्य बातें कहीं थीं । जो कि बादशाह को अप्रिय थीं । उस फकीर के किसी मित्र ने कैदखाने में जाकर उससे कहा - यह मुसीबत व्यर्थ क्यों मोल ले ली ? न कही होती वे बातें । तो क्या बिगड़ता था ?
फकीर ने कहा - सत्य ही अब मुझसे बोला जाता है । असत्य का ख्याल ही नहीं उठता । जब से जीवन में परमात्मा का आभास मिला । तब से सत्य के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रहा है । फिर यह कैद तो घड़ी भर की है ।
किसी ने जाकर यह बात बादशाह से कह दी । बादशाह ने कहा - उस पागल फकीर को कह देना कि कैद घड़ी भर की नहीं । जीवन भर की है । जब यह फकीर ने सुना । तो खूब हंसने लगा । और बोला - प्यारे बादशाह को कहना कि उस पागल फकीर ने पूछा है कि क्या जिंदगी घड़ी भर से ज्यादा की है ?
सत्य जीवन जिन्हें पाना हो । उन्हें इस तथाकथित जीवन की सत्यता को जानना होगा । और जो इसकी सत्यता को जानने का प्रयास करते हैं । वे पाते हैं कि एक स्वप्न से ज्यादा न इसकी सत्ता है । और न अर्थ है ।

13 अगस्त 2011

इस दुनिया में कोई नहीं अपना

ध्यान - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार । शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है । जैसे बहुत सी बीमारियां आदमी के आसपास हैं । सचाई यह नहीं है । इतनी बीमारियां नहीं हैं । जितने नाम हमें मालूम हैं । बीमारी तो एक ही है । ऊर्जा एक ही है । जो इन सबमें प्रकट होती है । अगर काम को आपने दबाया । तो क्रोध बन जाता है । और हम सबने काम को दबाया है । इसलिए सबके भीतर क्रोध कम ज्यादा मात्रा में इकट्ठा होता है । अब अगर क्रोध से बचना हो । तो उसे कुछ रूप देना पड़ता है । नहीं तो क्रोध जीने न देगा । तो अगर आप लोभ में क्रोध की शक्ति को रूपांतरित कर सकें । तो आप कम क्रोधी हो जाएंगे । आपका क्रोध लोभ में निकलना शुरू हो जाएगा । फिर आप आदमियों की गर्दन कम दबाएंगे । रुपए की गर्दन पर मुट्ठी बांध लेंगे । एक बात खयाल में ले लेनी जरूरी है कि मनुष्य के पास एक ही ऊर्जा है । एक ही इनर्जी है । हम उसके पच्चीस प्रयोग कर सकते हैं । और अगर हम विकृत हो जाएं । तो वह हजार धाराओं में बह सकती है । और अगर आपने एक एक धारा से लड़ने की कोशिश की । तो आप पागल हो जाएंगे । क्योंकि आप एक एक से लड़ते भी रहेंगे । और मूल से आपका कभी मुकाबला न होगा । तो पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि - मूल ऊर्जा एक है । आदमी के पास । और अगर कोई भी रूपांतरण, कोई भी ट्रांसफार्मेशन करना है । तो मूल ऊर्जा से सीधा संपर्क साधना जरूरी है । उसकी अभिव्यक्तियों से मत उलझिए । सुगमतम मार्ग यह है कि आपके भीतर इन चार में से जो सर्वाधिक प्रबल हो । आप उससे शुरू करिए । अगर आपको लगता है कि क्रोध सर्वाधिक प्रबल है आपके भीतर । तो वह आपका चीफ करेक्टरिस्टिक हुआ । जो भी आपके भीतर खास लक्षण हो । उस पर दो काम करें । पहला काम तो यह है कि उसकी पूरी सजगता बढ़ाएं । क्योंकि कठिनाई यह है सदा कि जो हमारा खास लक्षण होता है । उसे हम सबसे ज्यादा छिपाकर रखते हैं । जैसे क्रोधी आदमी सबसे ज्यादा अपने क्रोध को छिपाकर रखता है । क्योंकि वह डरा रहता है । कहीं भी निकल न जाए । वह उसको छिपाए रखता है । वह हजार तरह के झूठ खड़े करता है अपने आसपास । ताकि क्रोध का दूसरों को भी पता न चले । उसको खुद को भी पता न चले । और अगर पता न चले । तो उसे बदला नहीं जा सकता । दूसरा इसके साथ सजग होना शुरू करें । जैसे क्रोध आ गया । तो जब क्रोध आता है । तो तत्काल हमें खयाल आता है उस आदमी का । जिसने क्रोध दिलवाया । उसका खयाल नहीं आता । जिसे क्रोध आया । और जब भी हमें क्रोध पकड़ता है । तो हमारा ध्यान उस पर होता है । जिसने क्रोध शुरू करवाया है । अगर आप ऐसा ही ध्यान रखेंगे । तो क्रोध के कभी बाहर न हो सकेंगे । जब कोई क्रोध करवाए । तब उसे तत्काल भूल जाईए । और अब इसका स्मरण करिए । जिसको क्रोध हो रहा है । और ध्यान रखिए । जिसने क्रोध करवाया है । उसका आप कितना ही चिंतन करिए । आप उसमें कोई फर्क न करवा पाएंगे । फर्क कुछ भी हो सकता है । तो इसमें हो सकता है । जिसे क्रोध हुआ है । तो जब क्रोध पकड़े । लोभ पकड़े । कामवासना पकड़े । जब कुछ भी पकड़े । तो तत्काल आब्जेक्ट को छोड़ दें । क्रोध भीतर आ रहा है । तो चिल्लाएं । कूदें । फांदें । बकें । जो करना है । कमरा बंद कर लें । अपने पूरे पागलपन को पूरा अपने सामने करके देख लें । और आपको पता तब चलता है । जब यह सब घटना जा चुकी होती है । नाटक समाप्त हो गया होता है । अगर क्रोध को पूरा देखना हो । तो अकेले में करके ही पूरा देखा जा सकता है । तब कोई सीमा नहीं होती । इसलिए मैंने वह जो पिलो मेडिटेशन, वह जो तकिए पर ध्यान करने की प्रक्रिया कुछ मित्रों को करवाता हूं । वह इसलिए कि तकिए पर पूरा किया जा सकता है । तो अपने कमरे में बंद हो जाएं । और अपने मूल, जो आपकी बीमारी है । उसको जब प्रकट होने का मौका हो । तब उसे प्रकट करें । इसको मेडिटेशन समझें । इसको ध्यान समझें । उसे पूरा निकालें । उसको आपके रोएं रोएं में प्रकट होने दें । चिल्लाएं । कूदें । फांदें । जो भी हो रहा है । उसे होने दें । और पीछे से देखें । आपको हंसी भी आएगी । हैरानी भी होगी । एक दो दफे तो आपको थोड़ी सी बेचैनी होगी । तीसरी दफे आप पूरी गति में आ जाएंगे । और पूरे रस से कर पाएंगे । और जब आप पूरे रस से कर पाएंगे । तब आपको एक अदभुत अनुभव होगा कि आप कर भी रहे होंगे बाहर और बीच में कोई चेतना खड़ी होकर देखने भी लगेगी । दूसरे के साथ यह कभी होना मुश्किल है । या बहुत कठिन है । एकांत में यह सरलता से हो जाएगा । चारों तरफ क्रोध की लपटें जल रही होंगी । आप बीच में खड़े होकर अलग हो जाएंगे । और ऐसा किसी भी वृत्ति के साथ किया जा सकता है । यह वृत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता । प्रक्रिया एक ही होगी । बीमारी एक ही है । उसके नाम भर अलग हैं - ओशो ।
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सवारी - भाई ! घंटाघर तक के कितने रूपये लोगे ?
रिक्शेवाला - 200 रूपये लगेंगे ।
सवारी बोला - ये कैसी दादागीरी वहाँ के तो दस रूपये लगते हैं । मैं भी दादागीरी दिखाने पर आ जाऊँ । तो - कुछ नहीं, दूंगा ।
रिक्शेवाले ने कहा - भाईसाहब गलती हो गयी । आपकी बात पर चलने को तेयार हूँ । मुझे " कुछ नहीं " चाहिए ।
बात खत्म हुयी समझ के वो व्यक्ति रिक्शे मैं बैठ गया कि जाकर दस रूपये दे दूंगा ।
जब पहुंचे । तो उसने दस रूपये निकाले । और देने लगा । रिक्शावाला हंसने लगा । बोला - भाईसाहब किराया तो कुछ नही तय हुआ था । ये दस रूपये रखिये आप ।
व्यक्ति थोडा हैरान हुआ । और जल्दी थी । तो जाने लगा । जैसे ही आगे बढ़ा । रिक्शेवाला गुर्राया - भाईसाहब ! कुछ नहीं तो दे के जाओ । जो तय हुआ है ।
आदमी परेशान समझ न आये । इसे चाहिए क्या ? इतनी देर मैं रिक्शे वालों का जमघट लग गया । सबने रिक्शेवाले की बात जायज ठहराई । बोले - भाईसाहब ! बात क्यों बढ़ा रहे हो । कुछ नहीं दो । और जाओ ।
अब आदमी समझ गया कि बुरा फंसा । उसने 200 रूपये निकाले । और रिक्शेवाले के हाथ मैं रख दिए । रिक्शेवाला हंसा । बोला - भाई पूरे कुछ नहीं चाहिए । उसकी नजर जेब में पड़े हजार के नोटों पर थी ।
इस सारी घटना को चौराहे पर बैठे लालाजी देख रहे थे । उन्होंने उस आदमी को बुलाया । और बोले - जा उस रिक्शेवाले को बोल कि लाला रिश्ते में हैं । मेरे उनसे ले लो । अपना कुछ नहीं ।
उस व्यक्ति ने यही किया । रिक्शेवाला ने सोचा - लाला तो और मोटी मुर्गी है । अच्छा माल मिलेगा ।
लालाजी के पास गया । तो लालाजी बोले - मेरे तकिये के नीचे जो है । वो ले ले ।
रिक्शे वाले ने तकिया हटाया । और बोला - लालाजी ! यहाँ तो कुछ नही है । लालाजी मुस्कराए । बोले । चुपचाप ले । और निकल ले ।
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नाशवंत वस्तु है जग में । फिर ममता क्या तू करता है ?
कर गुजरान गरीबी में । मगरुरी क्या पर करता है ।
नाशवंत वस्तु है जग में । फिर ममता क्या तू करता है ।  
माटी चुन चुन महल बनाया । गंवार कहे घर मेरा है । 
न घर तेरा न घर मेरा । चिड़िया रैन बसेरा है । 
इस दुनिया में कोई नहीं अपना । क्या अपना अपना करता है । 
काच्ची माटी का घाट घडुला । घड़ी पलक में ढलता है । 
इस दुनिया में नाटक देखत । देख भटकता फिरता है । 
कहे कबीर सुंणो भाई साधो । हरी को क्यों न सुमरता है ।
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सूक्ष्म शरीर पर इस स्थूल बाह्य शरीर का आवरण है । अकाल मृत्यु के अनेक कारणों से सूक्ष्म शरीर का यह बाह्य आवरण नष्ट हो जाता है । तब क्योंकि दूसरा आंतरिक सूक्ष्म शरीर उससे पूर्व के कारण शरीर  ( उस वक्त निहित कारण ) से बंधा हुआ है । इसलिये मजबूरन उसे उसी सूक्ष्म शरीर में रहना पङता है । तब उसे भूत प्रेत कहते हैं । भूत प्रेत सिर्फ़ अकाल मृत्यु मरे मनुष्य ही बनते हैं । अन्य कोई भी प्राणी या मनुष्य नहीं ।
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If a man is doing something but has not the firmness of determination within his mind, then he will never be successful.
A rich man may be poor because he has never known any love. Share love with him. A poor man may have known love but has not known good food - share food with him. A rich man may have everything and has no understanding - share your understanding with him; he is also poor. There are a thousand and one types of poverty. Whatsoever you have, share it  -Osho
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If you cannot respect women, you cannot respect anybody else, because it is from women you come. The woman mothered you for nine months, then she took every care, she loved you for years. And then again, you cannot live without a woman. She is your solace, your warmth   -  Osho

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