07 अगस्त 2011

1 नूर से सब जग उपजा

सत श्री अकाल !  आपका नया लेख पढा ( शेर की दहाड वाला ) पढकर इतनी खुशी हुई कि बयान नहीं कर सकती । बहुत ही अच्छा लिखा है आपने । सब बात समझ में आ गयी । बाकी मैंने आपसे कहा था कि - अभी सिर्फ़ 2 प्रश्न रहते हैं । 1 प्रश्न का तो आपने जवाब दे दिया ( शेर की दहाड वाला )
अब दूसरा प्रश्न रहता है । इसे आप मेरा लास्ट प्रश्न ही समझें ।
मैंने अपने किसी पुराने लेख में आपसे पूछा था कि - 1 नूर से सब जग उपजा । या शायद - 1 बिन्द से सब जग उपजा ।
तब आपने कहा था कि आप इस पर कोई स्पेशल लेख लिखेंगे । साथ में इस बात से संबन्धित - नाद बिन्द ग्यान.. पर भी बात लिखेंगे । आपने तब कहा था कि मुझे याद दिला देना ।
मैं फ़िर से आपका कहना मानते हुये । आपको याद दिलाने आ गयी । अब आप प्लीज - 1 नूर से सब जग उपजा ।  साथ में - नाद बिन्द ग्यान । पर 1 बडा और स्पेशल लेख लिख दें
मुझे सच में कहते हुये शर्म आ रही है कि हमारे सिख धर्म के आजकल के पाठी सिंह ( मैं सबकी बात नहीं कर रही । लेकिन अधिकतर का यही हाल है ) लाउड स्पीकर पर बहुत शोर मचाते हैं । लेकिन अगर किसी पाठी सिंह से कोई सवाल पूछो ।
तो वो सवाल का जवाब देने की बजाय कहने लग जाते हैं कि - तुम ये मत खाया करो । वो मत खाया करो । ये मत करो । वो मत करो ।

फ़िर उसके बाद हलवाई वाला प्रसाद देकर हमें दोबारा कल फ़िर आने की नसीहत देकर चल पडते हैं । उस समय समझ में नहीं आता कि - ये सब क्या है ? क्या वाकई इन्हें गहराई से कुछ भी नहीं पता ? बस लाउड स्पीकर पर शोर मचाना ही जानते हैं । बहुत ही अफ़सोस और शर्म की बात है ।
कभी कभी तो धर्म के नाम पर बनी ऐसी सामाजिक व्यवस्था पर बहुत ही शोक महसूस होता है । इससे तो न यहाँ सुख । और न ही परलोक की गारन्टी ।
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अव्वल अल्लाह नूर पाया । कुदरत के सब बंदे । एक नूर से सब जग उपजा । कौन भले कौन मंदे ।
गुरु ग्रन्थ साहब में जात पाँत ऊँच नीच जैसी सामाजिक बुराई को दूर करने के लिये कितना सुंदर आध्यात्मिक उल्लेख हुआ है । न कोई छोटा । न कोई बङा ।  सबके अन्दर उस परमात्मा की जोत ही समायी हुयी है । तो फ़िर मैं अपने को देखकर किस बात का अभिमान करूँ । या फ़िर किस बात का अफसोस करूँ । जैसे मैं उसका अंश हूँ । जिस नूर से 


सबकी उत्पत्ति हुई है । वैसे ही और भी सब हैं । तो सब मेरे । और मै सबका ।
वास्तव में इस वाणी का वैसे इतना ही मतलब निकलता है । लेकिन सन्तों की वाणी इतनी साधारण नहीं होती । एक नूर से सब जग उपजा - सारी अखिल सृष्टि सिर्फ़ उसी 1 नूरी रूप आत्मा से उत्पन्न है । जो आज परमात्मा के नाम से जाना जाता है ।
परम प्रकाश से होने वाली - सार शब्द ( नाम ) - अविनाशी अक्षर की समस्त सत्ता ।
सबसे शुरूआत में जब यह सब कुछ भी नहीं था । तब परम प्रकाश ( नूर ) वह आत्मा ही था । और वह है ।
यानी वह कहीं से उत्पन्न नहीं था । इसीलिये उसके लिये उसे जानने वालों ने " है " कहा है । इसी एक शाश्वत आत्मा के अतिरिक्त बाकी सभी परिवर्तन शील है । भले ही वे उसी से उत्पन्न हैं । बहुत समय तक ये आत्मा आनन्द की उसी अवस्था में रहा ।
तब आदि सृष्टि होने से कुछ ही क्षण पहले अचानक उसमें ( गहराई से समझें ) एक विचार भाव उठा ( मगर वाणी नहीं ) । यह ( भाव ) विचार था - मैं कौन हूँ ? इसलिये आज भी ये विचार सर्वात्मा के अन्दर मुख्य रूप समाया हुआ हूँ ।

खैर..इस विचार के उठते ही उसमें एक संकुचन भाव पैदा हुआ । और उससे प्रथम शब्द " हुँ " उत्पन्न हुआ । आज भी विचारशील होने पर यही " हुँ " शब्द प्रमुख होता है ।
उसी समय - मैं कौन हूँ । सोचने के कारण आत्मा का " मैं " भाव जागृत हुआ । और उस समय आत्मा को एक घवराहट थी । मगर ( ध्यान दें ) उस वक्त ये पूर्ण था ।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।
ॐ वह परबृह्म  पूर्ण है । और यह कार्यबृह्म भी पूर्ण है । क्योंकि पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है । तथा  प्रलयकाल में पूर्ण कार्यबृह्म का पूर्णत्व लेकर अपने में ही लीन करके  पूर्ण ( परबृह्म ) ही बच रहता है ।
तब इसने संकल्प किया । या कहिये । स्वतः हो गया कि - मैं एक से अनेक हो जाऊँ । और ऐसा ही हो गया । क्योंकि वह पूर्णता की स्थिति थी ।
अब सहज अन्दाजा लगाया जा सकता है । उस समय की स्थिति में जो असमंजस और घवराहट टायप की थी । सकंल्प पर संकल्प होते गये । और पूर्णता होने से सभी साकार भी होते गये । तब सबसे

अन्त में जब मनुष्य शरीर बना । तब आत्मा को अपने निर्माण पर तसल्ली हुयी । और वह इसी शरीर में स्थित हो गया । यह कहते हुये - " सोहं " - यानी मैं वही हूँ । मगर बाद में अपनी ही रची मायावश इस बात को भूल गया । और भयंकर कष्टों में दुर्दशा में जीव स्थिति बन गयी । जो खेल बना था । वह सच लगने लगा ।
। ध्यान दें । उससे पहले ही बेहद विचित्र और विलक्षण सृष्टि का निर्माण हो चुका था । जो आज भी बदस्तूर मौजूद है । बस तब से ये खेल चला आ रहा है ।
इसलिये 1 नूर से सब जग उपजा की असली बात यही है । आगे कबीर साहब की वाणी में इस नूरी परम आत्मा को देखिये । जानिये -
पहली आरती हरि दरबारे । तेज पुंज जहाँ प्राण उधारें । पाती पंच पौहप कर पूजा । देव निरंजन और न दूजा ।
खण्ड खण्ड में आरती गाजै । सकल मयी हरि जोत विराजै । शांति सरोवर मज्जन कीजै । जत की धोती तन पर लीजै ।
ग्यान अंगोछा मैल न राखै । धर्म जनेऊ सत मुख भाखे । दया भाव तिल मस्तक दीजै । प्रेम भक्ति का अचमन लीजै ।
जो नर ऐसी कार कमावै । कंठी माला सहज समावै । गायत्रि सो जो गिनती खोवै । तर्पण सो जो तमक न होवे ।
संध्या सो जो संधि पिछाने । मन पसरे कुं घर में आने । सो संध्या हमरे मन मानी । कहै कबीर सुनो रे ज्ञानी ।

सबसे पहले मैं परम आत्मा के दरवार में आरती करता हूं । जहाँ पर वह प्रकाश स्वरुप मालिक सब प्राणियों का उद्धार करता है । उसकी पूजा अपनी 5 इन्द्रियों आँख कान नाक त्वचा मुँह ( वाणी जिहवा ) का फ़ूल बनाकर करो । अर्थात अपनी बहिर मुखी 5 इन्द्रियों को पुष्प के समान केंद्रित करके अर्पित करते हुये उस 1 परमेश्वर की पूजा कर । संसार से अपनी इन्द्रियों को हटाकर परमात्मा की पूजा - शब्द । स्पर्श । रूप । रस और गंध से कर । वह परमात्मा माया से रहित है । उसके सिवा दूसरा कोई नहीं ।
हर 1 कण में उस साहिब की ही आरती गूंज रही है । सभी में हरि ( परमात्मा ) की ज्योति विराजमान है ।
उसकी आरती करने के लिए अपने मन को एकाग्र करके शांति के सरोवर में स्नान कर । जिस प्रकार धोती को अपने तन पर धारण करता है । उसी प्रकार से संयम को धारण कर ।
जिस प्रकार तौलिये से अपने शरीर की मैल साफ करता है । उसी तरह ज्ञान से अपने मन की मैल को दूर कर । तेरे धर्म का प्रतीक यह जनेऊ नहीं । बल्कि सत्य बोलना ही तेरा धर्म है । तू इसी जनेऊ को धारण कर ।
दया की भावना का अपने माथे पर तिलक लगा । अर्थात दया भाव को अपनी बुद्धि में हमेशा बनाये रख ।  और सबसे प्रेम करता हुआ प्रेम भगति का पान कर । जो मनुष्य ऐसे नियमों का पालन करता है । उसका अपने आप ही सुमरन चल पडता है । उसे लोक दिखावे के लिए गले में माला नहीं डालनी पडती । अर्थात वह सहज भाव से ही हर स्वांस के साथ परम आत्मा का स्मरण करता रहता है ।
जो स्वांस स्वांस के साथ नाम सुमरन करे । जिसका अजपा जाप चल पडे । और जो हर समय अपने मूल स्वरुप में खोया रहे । उसे गिनती के हिसाब से माला या गायत्री जप करने की जरुरत नहीं । वह तो हमेशा ही गायत्री जाप करता रहता है । जिसके अंदर का अंधकार मिट गया । समझो वह संतुष्ट हुआ । उसका तर्पण हो गया ।
वास्तव में संध्या तो वही है । जिसमे साधक जीव और बृह्म की एकता को पहचानता है । और बाह्य पदार्थों में फैले हुए मन को समेट कर अपने भीतर ( घर ) में स्थित परमात्मा में लगा देता है । यही सच्ची संध्या आरती पूजा है । कबीर साहिब कहते हैं - हे विचारशील जिज्ञासु लोगो सुनो । यही संध्या हमारे मन को अच्छी लगती है ।
ऐसी आरती त्रिभुवन तारे । तेज पुंज जहाँ प्राण उधारे । पाती पंच पुहप कर पूजा । देव निरंजन और न दूजा ।
अनहद नाद पिण्ड बृह्मण्डा । बाजत अह निस सदा अखंडा । गगन थाल जहाँ उडगन मोती । चंद सूर जहाँ निर्मल जोती ।
तन मन धन सब अर्पण कीन्हा । परम पुरुष जिन आत्म चीन्हा । प्रेम प्रकाश भरा उजियारा । कहै कबीर में दास तुम्हारा ।

कबीर साहब कहते हैं - इस तरह की आरती तीनों लोकों को तारने वाली है । वह प्रकाश स्वरुप परमात्मा ही सब प्राणियों का उद्धार करता है । उस मालिक की पूजा अपनी 5 ग्यान इन्द्रियों का फ़ूल बनाकर करो । वह साहिब माया से रहित है । उसके सिवा दूसरा कोई नहीं । उस सत पुरुष की आरती में बिना किसी के बजाए ही 1 शब्द इस शरीर और पूरे बृह्माण्ड में दिन रात लगातार बिना रुके बज रहा है ।
उस सत पुरुष की आरती में आकाश आरती की थाली के समान है । और तारा गण उस थाली में रखे मोतियों के समान हैं । और इस आरती की थाली में रखे दीपक के समान चंद्र और सूर्य की निर्मल ज्योति जगमगा रही है ।
ऐसे परम आत्मा के प्रति जिन्होंने अपना तन । मन । धन । अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है । जिन्होंने उस

परम आत्मा को अपनी आत्मा में बसाया है । अपनी आत्मा में उसका साक्षात्कार किया है । जिन महापुरुषों के ह्रदय में प्रेम भाव उत्पन्न हुआ है । कबीर जी कहते हैं - ऐसे सन्त महापुरुषों का मैं दास हूँ ।
संध्या आरती करो विचारी । काल दूत जम रहे झख मारी । लाग्या सुषमन कुंची तारा । अनहद शब्द उठै झनकारा ।
उनमनी संजम अगम घर जाई । अछे कमल में रहया समाई । त्रिकुटी संजम कर ले दरसन । देखत निरखत मन होय परसन ।
प्रेम मगन होय आरती गावैं । कहै कबीर भौजल बहुर न आवै ।
इस आरती को जो कोई भाव पूर्वक करता है । अर्थात परम आत्मा के सत्य शाश्वत स्वरुप का विचार करता है । या ध्यान करता है । उसके पास यमराज के दूत फटक भी नहीं सकते । वह व्यर्थ ही धक्के खाते रहते हैं ।
जो अपने मन को साफ करता है । उसे सूक्ष्म से सूक्ष्म करता है । अर्थात मन को परम आत्मा में लगाकर उसे पाने ( जानने ) की प्रक्रिया में मन की सारी सांसारिक मैल उतार कर मन को निर्मल ( सूक्ष्म ) करता है । वह अपने इस सूक्ष्म मन की चाबी से उस ताले को खोल देता है । जिसके खुलते ही 


अनहद ( बिना आहत के ) शब्द की झंकार सुनाई देने लगती है । और वह ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है । जहां उसे परम आत्मा का एहसास होने लगता है । अपने स्वांसों को रोक कर पवन को सुषमणा नाडी में प्रवेश करवाओ । जिससे अनहद शब्द की झंकार सुनाई देने लगे ।
जब उसका बहिर्मन शुद्ध हो जाता है । तो इसके प्रभाव से उसका अंतर्मन भी शुद्ध हो जाता है । फिर अंतर्मन और बहिर्मन दोनों एक होकर एक दिव्य मन में परवर्तित हो जाते हैं । और साधक का मन परम आत्मा में लगा जाता है । इस अवस्था को उनमन अवस्था कहते हैं । जो इस अवस्था में लगातार रहता है ( जिसका मन लगातार परम आत्मा की तरफ रहता है । ) वह ऐसे स्थान में प्रवेश कर जाता है । जहाँ पर किसी की गम्यता नहीं । अर्थात मुक्ति पद में प्रवेश करता है । ऐसा महापुरुष अक्षय अविनाशी ( जिसका कभी नाश न हो ) परमात्म तत्व में लीन रहता है ।
त्रिकुटी पर ध्यान लगाकर उस परमात्म स्वरुप के दर्शन कर । उसे देखने से उसको निहारने से मन अति प्रसन्न होता है । कबीर साहब कहते हैं - जो उस परम आत्म देव के प्रेम में लीन होकर आरती गाते हैं । वह इस संसार सागर में फिर नहीं आते । वह मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं ।
हरि दर्जी का मर्म न पाया । जिन योह चोला अजब बनाया । पानी की सुई पवन का धागा । नौ दस मास सिवते लागा ।
पांच तत की गुदरी बनाई । चंद सूरज दो थिगरी लगाई । कोटि जतन कर मुकुट बनाया । बिच बिच हिरा लाल लगाया ।
आपे सिवे आप बनावे । प्रान पुरुष को ले पहरावे । कहे कबीर सोई जन मेरा । नीर खीर का करे निवेरा ।
कबीर साहब परम आत्मा को दर्जी की उपमा देते हुए कहते हैं । जिस परम आत्मा ने इस अजब शरीर को बनाया 


। उस साहिब रूपी दर्जी का भेद कोई नहीं जान पाया । इस शरीर को बनाने के लिए परम आत्मा ने पानी की सुई और पवन को धागा बनाया । और उसे इस शरीर को सिलने में 9 - 10 महीने लगे ।
उसने इस शरीर रूपी गुदरी को 5 तत्वों आकाश । वायु । अग्नि । जल और पृथ्वी  से बनाया है । फिर इस शरीर में चंद्र और सूर्य के समान 2 चमकते हुए नेत्र लगाए । करोडों ही उपाय करके इस शरीर रूपी गुदड़ी के मस्तक ( मुकुट ) को बनाया । और उसके बीच बीच में लाल हीरे के समान सुन्दर नाक । कान । दाँत और नेत्र लगाए ।
वह परम आत्मा हरि नामक दर्जी खुद ही इस शरीर रूपी चोले को सीता है । खुद ही इसको पूर्ण रूप से बनाकर तैयार करता है । और खुद ही ले जाकर प्राण पुरुष को पहनाता है । कबीर साहब कहते हैं - वही भक्त मेरा अपना है । जो दूध और पानी को अलग अलग कर दे । अर्थात जो आत्मा और शरीर को अलग जानकर परम तत्व को प्राप्त कर ले । वही मेरा सच्चा भक्त है ।
राम निरंजन आरती । तेरी अवगति गति । कहुक समझ पडे नहीं । क्यों पहुंचे मति मेरी ।
निराकार निरलेप निरंजन । गुण अतीत तिहुं देवा । ग्यान ध्यान से रहे निराला । जानी जाय न सेवा ।
सनक सनन्दन नारद मुनिजन । शेष पार नहीं पावै । शंकर ध्यान धरे निस वासर । अजई ताहि झुलावें । सब सुमिरै अपने अनुमाना । तो गति लखी न जाई । कहैं कबीर कृपा कर जन पर । ज्यो है त्यों समझाई ।
हे निर्दोष । अदृश्य । विषय रहित । माया रहित । शुद्ध राम मैं आपकी आरती कैसे करूँ ? प्रभु ! आपकी गति को मैं 


समझ नहीं सकता । मेरी बुद्धि आप तक नहीं पहुँच सकती । आप आकार से रहित हो । किसी भी विषय वस्तु से निर्लिप्त हो । माया से रहित हो । 3 गुणों से अलग हो । और 3 देवों से भी आप अलग हो । आपको न ग्यान से । न ध्यान से पाया जा सकता है । क्योंकि आप इनसे भी अलग हो । न ही मैं यह जानता हूं कि मैं आपकी सेवा किस प्रकार करूं ?
आपके स्वरुप को सनक । सनंदन ।  सनातन और सनत कुमार ।  नारद । ऋषि मुनि लोग । और शेषनाग भी नहीं जान सके । शंकर दिन रात आपका ध्यान करते हैं । और अब तक उसी अवस्था में झूल रहे हैं । लेकिन आपके स्वरुप को नहीं  जान सके ।
कबीर साहब कहते हैं - सभी अपने अपने अनुमान के अनुसार आपका स्मरण करते हैं । लेकिन आपकी महिमा को पूर्ण रूप से कोई नहीं समझ सका । हे प्रभु अपने दास जनों पार कृपा करो । और आप अपने बारे में खुद ही हमें समझाओ ।
नूर की आरती नूर के छाजै । नूर के ताल पखावज वाजे । नूर के गायन नूर को गावै । नूर सुनन्ते बहुर न आवै ।
नूर की बानी बोले नूर । झिलमिल नूर रहया भरपूर । नूर कबीरा नूर ही भावै । नूर के कहै परम पद पावै ।

परमात्मा ( नूर ) की आरती को खुद परम प्रकाश ( नूर ) से सजा रहा है । उसी नूर की ( बदौलत अखिल सृष्टि में ) ताल पर ढोलक और बाजे बज रहे हैं । उसी नूर से आलोकित ( प्रकाशित संगीत ) गायक गाकर मालिक के नूर ( रोशनी )  का बखान कर रहे हैं । जो कोई साहिब के इस नूर ( परम प्रकाश ) के गीत को एक बार भी सुन लेता है । वह फिर इस संसार में वापस नहीं आता । अर्थात फ़िर उसका जन्म मरण बार बार नहीं होता ।
ईश्वरीय नूर की बाणी उसके अदभुत नूर का ही बखान कर रही है । सब तरफ जगमगाता हुआ वही ( परम प्रकाश ) 

नूर व्याप्त है । कबीर साहब कहते हैं - उस नूरी परम आत्मा को खुद के जैसा दिव्य नूर से भरा हुआ जीवात्मा ही अच्छा लगता है । उस नूर को कहने ( जानने ) से ही परम पद की प्राप्ति होती है ।
तेज की आरती तेज के आगे । तेज का भोग तेज कूँ लागे । तेज पखावज तेज बजावै । तेज ही नाचै तेज ही गावे ।
तेज का थाल तेज की बाती । तेज का पुष्प तेज की पाती । तेज के आगे तेज बिराजे । तेज कबीरा आरती साजै ।
परम आत्मा के तेज के द्वारा तेज स्वरूप परम आत्मा की ही आरती हो रही है । परम आत्मा तेज का भोग दिव्य तेज रूपी परम आत्मा को लग रहा है । तेज रूपी ढोलक है । और उसे तेज रूप परम आत्मा बजा रहा है । तेज स्वरुप परम आत्मा नाच रहा है । और तेज रूपी परम आत्मा ही गा रहा है ।
परम आत्मा का तेज ही आरती बना है । उस तेज की ही बाती है । उस परम तेज के पुष्प हैं । और उसी तेज की पत्तियां हैं । कबीर साहब कहते हैं - तेज स्वरुप परम आत्मा के आगे खुद तेज स्वरुप आत्मा विराजमान है । और वह खुद ही आरती बनकर सज रहा है ।
आपै आरती आपै साजै । आपै किंगर आपै बाजै । आपै ताल झांझ झनकारा । आप नचै अप देखन हारा ।
आपै दीपक आपै बाती । आपै पुष्प आप ही पाती । कहै कबीर ऐसी आरती गाऊं । आपा मधे आप समाऊ ।
वह परम आत्मा खुद ही आरती बना हुआ है । खुद ही आरती को सजा रहा है । खुद ही वाद्य यंत्र बना हुआ है । और खुद ही उन्हें बजा रहा है । वह परम आत्मा खुद ही ताल है । खुद ही झाँझ होकर झनकार कर रहा है । इस झंकार पर वह खुद ही नाच रहा है । अपने इस नाच को खुद ही देख रहा है ।

वह परम आत्मा खुद ही दीपक बना है । खुद ही उस दीपक की बाती । वह खुद ही फ़ूल और पत्र बना हुआ है । कबीर साहब कहते हैं - मैं ऐसी आरती गाता हू । जिससे कि मैं अपने निज स्वरूप शुद्ध बृह्म में समा जाऊँ ।
और ये वाणी ग्रन्थ साहब से -
देव सथानै किआ निसाणी । तह बाजे सबद अनाहद बाणी ।
पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ । अनहद बाणी नादु वजाइआ ।
पूरे गुर ते महल पाइआ । पति परगटु लोई । नानक अनहद धुनी दरि । वजदे मिलिया हरि सोई ।
द्रिसटि भई तब भीतरि आइओ । मेरा मनु अनदिनु सीतलागिओ ।
कहु नानक रसि मंगल गाए । सबदु अनाहदु बाजिओ ।
अंतरि जोति निरंतरि बाणी । साचे साहिब सिऊ लिव लाई ।
ऋग्वेद में इस आवाज के बारे में कहा है-
ऋतस्य श्लोको बधिराततर्द कर्णा बुधान: शुचमान आयो: ।
सत्य को जगाने वाली देदीप्यमान आवाज बहरे मनुष्य को भी सुनाई देती है । इसी प्रकार जैसे हम शिव के हाथों में डमरू देखते हैं । विष्णु के हाथ में शंख । और सरस्वती के हाथ में वीणा है । ये सब अंतर्जगत की ही वाणी के प्रतीक हैं । जिसे अनहद नाद कहते हैं । अनहद वाणी कहते हैं । जरूरत है कि हम भी उस वाणी को सुनकर अंतर्नाद को जानकर जीवन के संगीतमय आनंद में डूबकर परमानंद को जानें ।
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