04 अगस्त 2011

सहज योग - शुरू से अन्त तक

लेखकीय - आप लोग अक्सर प्रश्न करते रहे हैं कि अन्तर में योग की स्थितियाँ क्या है ? यानी किसके बाद क्या आता है । अतः आज मैं कबीर साहब की वाणी में ये सब रचना आपके लिये प्रकाशित कर रहा हूँ । हालांकि संक्षिप्त अर्थ में सब बात पूरी तरह स्पष्ट करना संभव नहीं हैं । फ़िर भी आपको बहुत कुछ पता चल जायेगा । ऐसी आशा है ।
विशेष - घबरायें नहीं । ये सब स्थितियाँ जानकारी के लिये बता रहा हूँ । जैसा इसमें वर्णन के अनुसार कठिन सा लगता है । वैसी दिक्कत हमारे " सहज योग " में नहीं आती । मगर प्राप्ति अन्त तक होती है ।
कर नैनों दीदार । महल में प्यारा है ।
काम क्रोध मद लोभ बिसारो । सील संतोष छिमा सत धारो ।
मद्य मांस मिथ्या तज डारो । हो ज्ञान घोड़े असवार । भरम से न्यारा है । 1
धोती नेती वस्ती पाओ । आसन पदम जुगत से लाओ ।
कुभंक कर रेचक करवाओ । पहिले मूल सुधार । कारज हो सारा है । 2
मूल कँवल दल चतुर बखानो । कलिंग जाप लाल रंग मानो ।
देव गनेश तहं रोपा थानो । रिध सिध चँवर ढ़ुलारा है । 3
स्वाद चक्र  षटदल बिस्तारो । बृह्मा सावित्री रुप निहारो ।
उलटि नागिनी का शिर मारो । तहां शबद (ॐ) ओंकारा है । 4
नाभी अष्टकँवल दल साजा । सेत सिंहासन बिष्नु बिराजा ।
हिरिंग जाप तासु मुख गाजा । लछमी शिव आधारा है । 5
द्वादश कँवल हृदय के माहीं । जंग गौर शिव ध्यान लगाई ।
" सोहं " शबद तहाँ धुन छाई । गन करै जै जैकारा है । 6
षोडश दल कँवल कंठ के माहीं । तेहि मध बसे अविद्या बाई ।
हरि हर बृह्मा चँवर ढ़ुलाई । जहँ शरिंग नाम उचारा है । 7
ता पर कंज कँवल है भाई । बग भौंरा दुइ रुप लखाई ।
निज मन करत तहाँ ठकुराई । सो नैनन पिछवारा है । 8
कंवलन भेद किया निर्वारा । यह सब रचना पिण्ड मंझारा ।
सतसंग कर सतगुरु सिर धारा । वह सतनाम उचारा है । 9
आंख कान मुख बन्द कराओ । अनहद झिंगा शब्द सुनाओ ।
दोनों तिल इक तार मिलाओ । तब देखो गुलजारा है । 10
चंद सूर एकै घर लाओ । सुषमन सेती ध्यान लगाओ ।
तिरबेनी के संघ समाओ । भोर उतर चल पारा है । 11
घंटा शंख सुनो धुन दोई । सहस कँवल दल जगमग होई ।
ता मध करता निरखो सोई । बंकनाल धंस पारा है । 12
डांकिन सांकिनी बहु किलकारें । जम किंकर धर्मदूत हंकारें ।
सतनाम सुन भागें सारे । जब सतगुरु नाम उचारा है । 13
गगन मंडल विच उर्धमुख कुइंआं ।  गुरुमुख साधू भर भर पिया ।
निगुरे प्यास मरे बिन कीया । जा के हिये अंधियारा है । 14
त्रिकुटी महल में विद्या सारा । घनहर गरजें बजे नगारा ।
लाल बरन सूरज उजियारा । चतुर कँवल मंझार शब्द ओंकारा है । 15
साध सोई जिन यह गढ़ लीना । (9) नौ दरवाजे परगट चीन्हा ।
दसवां खोल जाय जिन दीन्हा । जहां कुफुल रहा मारा है । 16
आगे सेत सुन्न है भाई  । मान सरोवर पैठि अन्हाई ।
हंसन मिल हंसा होइ जाई । मिलै जो अमी अहारा है । 17
किंगरी सारंग बजै सितारा । अच्छर बृह्म सुन्न दरबारा ।
द्वादस भानु हंस उजियारा । खटदल कँवल मंझार शब्द ररंकारा है । 18
महासुन्न सिंध बिषमी घाटी । बिन सतगुरु पावै नहिं बाटी ।
ब्याघर सिंह सरप बहु काटी । तहं सहज अचिंत पसारा है । 19
अष्ट दल कंवल पारबृह्म भाई । दाहिने द्वादस अचिंत रहाई ।
बायें दस दल सहज समाई । यूं कंवलन निरवारा है । 20
पांच ब्रह्म पांचों अंड बीनो । पांच बृह्म नि:अक्षर चीन्हो ।
चार मुकाम गुप्त तहं कीन्हो । जा मध बंदीवान पुरुष दरबारा है । 21
दो पर्वत के संध निहारो । भंवर गुफा ते संत पुकारो ।
हंसा करते केल अपारो । तहां गुरन दरबारा है । 22
सहस अठासी(88000) द्वीप रचाये । हीरे पन्ने महल जड़ाये ।
मुरली बजत अखंड सदाये । तहं "सोहं" झुनकारा है । 23
सोहं हद तजी जब भाई । सतलोक की हद पुनि आई ।
उठत सुगंध महा अधिकाई । जा को वार न पारा है । 24
(16)षोड़स भानु हंस को रुपा । बीना सत धुन बजै अनूपा ।
हंसा करत चंवर सिर भूपा । सत्त पुरुष दरबारा है । 25
(करोङों) कोटिन भानु उदय जो होई । एते ही पुनि चंद्र लखोई ।
पुरुष रोम सम एक न होइ । ऐसा पुरुष दीदारा है । 26
आगे अलख लोक है भाई । अलख पुरुष की तहं ठकुराई ।
अरबन सूर रोम सम नाहीं । ऐसा अलख निहारा है । 27
ता पर अगम महल इक साजा । अगम पुरुष ताहि को राजा ।
खरबन सूर रोम इक लाजा । ऐसा अगम अपारा है । 28
ता पर अकह लोक है भाई । पुरुष अनामी तहां रहाई ।
जो पहुँचा जानेगा वाही । कहन सुनन से न्यारा है । 29
काया भेद किया निर्वारा । यह सब रचना पिंड मंझारा ।
माया अवगति जाल पसारा । सो कारीगर भारा है । 30
आदि माया कीन्ही चतुराई । झूठी बाजी पिंड दिखाई ।
अवगति रचन रची अंड माहीं । ता का प्रतिबिंब डारा है । 31
शब्द बिहंगम चाल हमारी । कहैं कबीर सतगुरु दइ तारी ।
खुले कपाट शबद झुनकारी । पिण्ड अण्ड के पार । सो ही देश हमारा है । 32
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कर नैनों दीदार । महल में प्यारा है ।
सदगुरु कबीर साहब कहते हैं - हे मनुष्य ! तू अपनी ज्ञान रुपी आँख ( तीसरा नेत्र ) से देख ( दीदार कर )  तेरे इसी शरीर में साहिब विराजमान है ।
काम क्रोध मद लोभ बिसारो । सील संतोष छिमा सत धारो ।
लेकिन साहिब के दर्शन हेतु उससे पहले - काम । क्रोध । अहंकार और लोभ छोड़कर । उसकी जगह शील । क्षमा । सत्य और संतोष धारण कर ।
मद्य मांस मिथ्या तज डारो । हो ज्ञान घोड़े असवार । भरम से न्यारा है । 1
मांस और मदिरा छोड़कर सात्विक शाकाहारी भोजन कर । झूठ । असत्य मिथ्या बातों को तजकर । सत्य को अपनाकर । ज्ञान रुपी घोड़े पर चढ़कर । मोह रुपी भृम से छुटकारा पाकर ।  वहाँ जा पाते हैं ।
धोती नेती वस्ती पाओ । आसन पदम जुगत से लाओ ।
भारतीय योग के तरीके - धोती । नेती और वस्ति से शरीर की आंतरिक शुद्धि कर । इसके बाद पदम आसन में बैठने का अभ्यास कर । इसके बाद कुम्भक रेचक के प्राणायाम द्वारा प्राणों को साधकर शरीर के अन्दर पहले चक्र - मूलाधार चक्र को बेधना है ।
कुभंक कर रेचक करवाओ । पहिले मूल सुधार । कारज हो सारा है । 2
इसके बाद कुम्भक रेचक के प्राणायाम द्वारा प्राणों को साधकर मूल स्थिति यानी शरीर को योग और भक्ति हेतु तैयार करो । तब काम बनेगा ।
मूल कँवल दल चतुर बखानो । कलिंग जाप लाल रंग मानो ।
मूलाधार चक्र का देवता गणेश हैं । वहाँ 4 दल कमल है । जाप करिंग है । रंग लाल है ।
देव गनेश तहं रोपा थानो । रिध सिध चँवर ढ़ुलारा है । 3
यहाँ का देवता गणेश है । रिद्धियाँ सिद्धियाँ सेवा कर रही हैं ।
स्वाद चक्र (6) षटदल बिस्तारो । बृह्मा सावित्री रुप निहारो ।
स्वाधिष्ठान चक्र का देवता बृह्मा ( सावित्री - बृह्मा की पत्नी ) है । वहाँ 6 दल कमल है ।
उलटि नागिनी का शिर मारो । तहां शबद (ॐ) ओंकारा है । 4
नागिनी रूपी कुण्डलिनी उल्टा मुँह किये साढे तीन लपेटे मारकर बैठी है । ( इसलिये इंसान को अपनी शक्ति का अहसास नहीं है ) जब यह सीधी होकर उठती है । तब अन्तर में ॐ धुन सुनाई देती है ।
नाभी (8) अष्टकँवल दल साजा । सेत सिंहासन बिष्नु बिराजा ।
नाभि चक्र का देवता बिष्णु है । वहाँ 8 अष्ट दल कमल है ।
हिरिंग जाप तासु मुख गाजा । लछमी शिव आधारा है । 5
यहाँ हिरिंग का जाप है । तथा लक्ष्मी शिव का आधार है ।
(12) द्वादश कँवल हृदय के माहीं । जंग गौर शिव ध्यान लगाई ।
हृदय चक्र देवता शंकर है । वहाँ 12 द्वादश दल कमल है ।
" सोहं " शबद तहाँ धुन छाई । गन करै जै जैकारा है । 6
सोहं शब्द की वहाँ धुन हो रही है । और देवता जय जयकार कर रहे हैं ।
16 षोडश दल कँवल कंठ के माहीं । तेहि मध बसे अविद्या बाई ।
कंठ चक्र की देवी शक्ति देवी हैं । वहाँ 16 सोलह  दल कमल है ।
हरि हर बृह्मा चँवर ढ़ुलाई । जहँ शरिंग नाम उचारा है । 7
बृह्मा विष्णु महेश यहाँ चँवर ढुलाते हुये देवी की सेवा करते हैं । यहाँ " शरिंग " मन्त्र उच्चारित हो रहा है ।
ता पर कंज कँवल है भाई । बग भौंरा दुइ रुप लखाई ।
यहाँ पर कंज कमल है । तथा यहाँ दिव्य भँवरा के दर्शन होते हैं ।
निज मन करत तहाँ ठकुराई । सो नैनन पिछवारा है । 8
मन का जहाँ निवास है । जिस स्थान का वह स्वामी है । वह स्थान आँखों के पीछे है ।
कंवलन भेद किया निर्वारा । यह सब रचना पिण्ड मंझारा ।
यह सव रचना शरीर के बीच में है । जिसको कमलों के द्वारा बाँटा गया है ।
सतसंग कर सतगुरु सिर धारा । वह सतनाम उचारा है । 9
सतसंग करते हुये जो सतगुरु की शिष्यता गृहण करता है । और सतनाम का जाप करता है । वही इसे जान पाता है ।
आंख कान मुख बन्द कराओ । अनहद झिंगा शब्द सुनाओ ।
दोनों आँख कान ( उँगली डालकर या रुई लगाकर ) और मुँह बन्द करके अनहद शब्द जो झींगुर की आवाज के समान है । इसको सुनो ।
दोनों तिल इक तार मिलाओ । तब देखो गुलजारा है । 10
आँखों की दोनों पुतलियाँ जब एक ( स्वतः हो जाती हैं ) होकर मिलेंगी । तब आप अन्दर के अदृश्य नजारे देखोगे ।
चंद सूर एकै घर लाओ । सुषमन सेती ध्यान लगाओ ।
तब सूर्य चन्द्रमा आपके इसी शरीर में एक ही स्थान पर दिखेंगे ।
तिरबेनी के संघ समाओ । भोर उतर चल पारा है । 11
इङा पिंगला और सुषमणा यानी इन नाङियों के मिलन स्थान त्रिवेणी से ऊपर उठने लगते हैं ।
घंटा शंख सुनो धुन दोई । 1000 सहस कँवल दल जगमग होई ।
यहाँ घण्टा और शंख की धुन हो रही है । और 1000 पत्तों वाला कमल जगमगा रहा है ।
ता मध करता निरखो सोई । बंकनाल धंस पारा है । 12
इसी कमल के मध्य करतार या कर्ता पुरुष विराजमान है । आगे बंक ( टेङी नली के समान - ये ठीक S अक्षर के समान है । यहाँ निकलने में थोङी कठिनाई होती है ।  ) नाल मार्ग आता है ।
डांकिन सांकिनी बहु किलकारें । जम किंकर धर्मदूत हंकारें ।
यहाँ पर डाकिनी शाकिनी किलकारियाँ भरती हुयी डराने की कोशिश करती हैं । यम के दूत भय दिलाते हैं ।
सतनाम सुन भागें सारे । जब सतगुरु नाम उचारा है । 13
लेकिन इस सतनाम को सुनते ही और सतगुरु का ध्यान आते ही वह डर कर भाग जाते हैं ।
गगन मंडल विच उर्धमुख कुइंआं ।  गुरुमुख साधू भर भर पिया ।
आकाश मंडल में उल्टा अमृत कुँआ है । जिससे गुरुमुख साधु भर भरकर अमृत पीते हैं ।
निगुरे प्यास मरे बिन कीया । जा के हिये अंधियारा है । 14
निगुरे कभी इस अमृत को नहीं पी पाते । और उनके ह्रदय में अँधकार ही रहता है । यानी सत्य का प्रकाश कभी नहीं होता ।
त्रिकुटी महल में विद्या सारा । घनहर गरजें बजे नगारा ।
त्रिकुटी महल में अदभुत नजारे हैं । नगाङा आदि बाजे बज रहे हैं । इस महल में विध्या के निराले रूप दिखते हैं ।
लाल बरन सूरज उजियारा । चतुर कँवल मंझार शब्द ओंकारा है । 15
यहाँ लाल रंग है । चार दल कमल है । जिसके मध्य ॐकार ध्वनि उठ रही है । और उजाला फ़ैला हुआ है ।
साध सोई जिन यह गढ़ लीना । नौ दरवाजे परगट चीन्हा ।
वही साधु है । जिसने इस नौ द्वारों के इस शरीर के असली भेद को जान लिया ।
(10) दसवां खोल जाय जिन दीन्हा । जहां कुफुल रहा मारा है । 16
तथा नौ दरवाजों से ऊपर दसवाँ द्वार यानी मुक्ति का द्वार खोल लिया । जहाँ सारे बुरे संस्कार फ़ल नष्ट हो जाते हैं ।
आगे सेत सुन्न है भाई  । मान सरोवर पैठि अन्हाई ।
आगे सुन्न का मैदान है । यहाँ आत्मा मान सरोवर में स्नान करती है ।
हंसन मिल हंसा होइ जाई । मिलै जो अमी अहारा है । 17
यहाँ आत्मा हँसो से मिलकर हँस रूप हो जाती है । और अमृत का आहार करती है ।
किंगरी सारंग बजै सितारा । अच्छर बृह्म सुन्न दरबारा ।
यहाँ किरंगी सारंगी सितार आदि बज रहे हैं । यहाँ अक्षर बृह्म का दरबार है ।
(12) द्वादस भानु हंस उजियारा । खटदल कँवल मंझार शब्द ररंकारा है । 18
यहाँ आत्मा का प्रकाश 12 सूर्य के बराबर हो जाता है । कमल के मध्य ररंकार ध्वनि हो रही है ।
महासुन्न सिंध बिषमी घाटी । बिन सतगुरु पावै नहिं बाटी ।
महासुन्न की घाटी और मैदान बहुत ही विशाल और कठिनाईयों से भरा है । बिना सतगुरु के यहाँ से पार होना असंभव ही है ।
ब्याघर सिंह सरप बहु काटी । तहं सहज अचिंत पसारा है । 19
शेर चीता सर्प अजगर आदि काटने लगते है ।
(8) अष्ट दल कंवल पारबृह्म भाई । दाहिने द्वादस अचिंत रहाई ।
पारबृह्म में आठ दल का कमल है । इसके दाँये बारह अचिंत दीप है ।
बायें (10) दस दल सहज समाई । यूं कंवलन निरवारा है । 20
बाँयी  तरफ़ सहज लोक है । यहाँ दस दल का कमल है । ऐसे कमलों का स्थान है ।
पांच बृह्म पांचों अंड बीनो । पांच बृह्म नि:अक्षर चीन्हो ।
( इस लाइन का अर्थ समझाना बहुत कठिन है । )
चार मुकाम गुप्त तहं कीन्हो । जा मध बंदीवान पुरुष दरबारा है । 21
यहाँ 4 स्थान गुप्त हैं । इसके बीच उन बन्दीवान आत्माओं का निवास है । जो पूरा सतगुरु न मिलने से आगे नहीं जा पायीं । या नाम सुमरन की कमी से । वे जाते हुये सन्तों से प्रार्थना करती हैं । तब कभी कभी सन्त दया करके उन्हें अपने साथ आगे ले जाते हैं । यहाँ आत्मायें आनन्द से तो हैं । पर उन्हें मालिक का दर्शन नहीं होता ।
दो पर्वत के संध निहारो । भंवर गुफा ते संत पुकारो ।
इन दोनों पर्वत के बीच भँवर गुफ़ा दिखाई देती है ।
हंसा करते केल अपारो । तहां गुरन दरबारा है । 22
हँस आत्मायें यहाँ खेलती हुयी आनन्द करती हैं । यहाँ गुरुओं का दरबार है ।
सहस अठासी(88000) द्वीप रचाये । हीरे पन्ने महल जड़ाये ।
यहाँ आगे 88000 सुन्दर द्वीप बने हुये हैं । जिनमें हीरा पन्ना आदि जङकर भव्य महलों की तरह निवास बने हैं ।
मुरली बजत अखंड सदाये । तहं "सोहं" झुनकारा है । 23
यहाँ लगातार बाँसुरी बजती रहती है । यही वो असली बाँसुरी है । जिस पर गोपियाँ झूम उठती थी । यहाँ " सोहं..सोहं " की अखण्ड धुनि हो रही है ।
सोहं हद तजी जब भाई । सतलोक की हद पुनि आई ।
सोहं की सीमा समाप्त होते ही सतलोक की सीमा शुरू हो जाती है ।
उठत सुगंध महा अधिकाई । जा को वार न पारा है । 24
यहाँ इतनी अधिक चंदन की सुगन्ध आ रही है कि उसका वर्णन संभव नहीं है ।
(16)षोड़स भानु हंस को रुपा । बीना सत धुन बजै अनूपा ।
अब आत्मा हँस रूप होकर 16 सूर्यों के बराबर प्रकाश वाली हो जाती है । यहाँ वीणा की मधुर अनोखी धुन सुनाई दे रही है ।
हंसा करत चंवर सिर भूपा । सत्त पुरुष दरबारा है । 25
यहाँ सतपुरुष का दरबार है । जहाँ हँस आत्मायें चंवर ढुला रही हैं ।
कोटिन भानु उदय जो होई । एते ही पुनि चंद्र लखोई ।
करोंङों सूर्य एक साथ निकल आयें । और इतने ही चन्द्रमा निकल आयें ।
पुरुष रोम सम एक न होइ । ऐसा पुरुष दीदारा है । 26
लेकिन सतपुरुष के एक रोम के प्रकाश की बराबरी नहीं कर सकते । सतपुरुष का ऐसा दर्शन होता है ।
आगे अलख लोक है भाई । अलख पुरुष की तहं ठकुराई ।
आगे " अलख लोक " है । यहाँ के स्वामी " अलख पुरुष " हैं ।
अरबन सूर रोम सम नाहीं । ऐसा अलख निहारा है । 27
अरबों सूर्यों का प्रकाश इनके एक रोम से होने वाले प्रकाश की बराबरी नहीं कर सकता । ऐसा न देखे जाने वाला दर्शन सदगुरु कृपा से प्राप्त होता है ।
ता पर अगम महल इक साजा । अगम पुरुष ताहि को राजा ।
इसके ऊपर " अगम लोक " है ।  " अगम पुरुष " यहाँ के स्वामी हैं ।
खरबन सूर रोम इक लाजा । ऐसा अगम अपारा है । 28
खरबों सूर्यों का प्रकाश इनके एक रोम के प्रकाश के आगे फ़ीका है । ऐसा अपार अगम ( जहाँ जाया न जा सके ) शोभायुक्त है ।
ता पर अकह लोक है भाई । पुरुष अनामी तहां रहाई ।
इसके ऊपर " अकह लोक " है । यानी जहाँ कुछ भी कहने की स्थिति ही खत्म हो जाती है । और जहाँ पहुँचकर सन्त " मौन हो जाते हैं । शाश्वत आनन्द में पहुँच जाते हैं । यहाँ के स्वामी को ’ अनामी पुरुष " कहा जाता है । यानी इनका कोई भी कैसा भी नाम नहीं हैं ।
जो पहुँचा जानेगा वाही । कहन सुनन से न्यारा है । 29
यहाँ की असली बात पहुँचने वाला ही जान पाता है । क्योंकि ये कहने सुनने में नहीं आती । यानी इसका कैसा भी वर्णन असंभव ही है ।
काया भेद किया निर्वारा । यह सब रचना पिंड मंझारा ।
यह सब अदभुत रचना इसी शरीर के भीतर ही है ।  इस तरह शरीर को भेद द्वारा बाँटकर निर्माण किया है ।
माया अवगति जाल पसारा । सो कारीगर भारा है । 30
माया ने अपना विलक्षण जाल फ़ैलाकर बहुत भारी कारीगरी दिखाई है ।
आदि माया कीन्ही चतुराई । झूठी बाजी पिंड दिखाई ।
आदि माया ने चालाकी से पिंड शरीर में ऐसा ही झूठा खेल बना दिया । पर असल बात कुछ और ही है ।
अवगति रचन रची अंड माहीं । ता का प्रतिबिंब डारा है । 31
असल रचना का छाया रूप मायावी प्रतिबिम्ब उसने चतुराई से पिण्ड में बना दिया । ताकि साधक धोखे में रहें । अतः सदगुरु के बिना सच्चाई ग्यात नहीं होती ।
शब्द बिहंगम चाल हमारी । कहैं कबीर सतगुरु दइ तारी ।
शब्द के सहारे बिना किसी डोर के ( यह शब्द ही खींच लेता है ) बिहंगम यानी पक्षी की तरह उङते हुये सन्त आनन्द से जाते हैं । लेकिन सिर्फ़ वही जा सकते हैं । जिनको सदगुरु कृपा करके चाबी दे देते हैं ।
खुले कपाट शबद झुनकारी । पिंड अंड के पार । सो ही देश हमारा है । 32
जब अन्दर का दरबाजा खोलकर हम शब्द की धुन झनकार सुनते हैं ।  और अण्ड पिण्ड के पार जाते हैं । तब हमारा असली देश असली घर आता है ।
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