25 अगस्त 2011

तुम खुद ही भगवान हो

19 जनवरी 1990 संध्या 5 बजे । ओशो आश्रम, पुणे भारत । 
उनसे पूंछा गया कि सब सन्यासियों को क्या कहा जाय ? उन्होंने कहा कि - सबसे कहना कि अमेरिका में शार्लट, नार्थ केरोलाइना की जेल में रहने के बाद से उनका शरीर जर्जर होता चला गया । ओक्लाहोमा जेल में उन्हें थेलियम जहर दिया गया । और रेडियेशन से गुजारा गया । जिसका कि चिकित्सा विशेषज्ञों से संपर्क करने पर बहुत बाद में पता चल पाया । इस तरह जहर दिया गया । जिसका पीछे कोई सबूत न छूटे । मेरा जर्जर शरीर अमरीकी सरकार के ईसाई मतान्धों की कारस्तानी है । अपनी शारीरिक पीड़ा को मैंने स्वयं तक ही रखा । लेकिन इस शरीर में रहकर कार्य करना अब घोर कष्टप्रद एवं असंभव हो गया है । इतना कहकर वे लेटकर आराम करने लगे । उस समय जयेश वहाँ नहीं था । अमृतो जयेश के पास भागा भागा गया । और उसे बताया कि ओशो स्पष्टतः शरीर छोड़ रहे है । ओशो ने जब अम्रतो को पुकारा । तब अम्रतो ने ओशो को बताया कि जयेश भी आया हुआ है । तो उन्होंने जयेश को भी भीतर लाने को कहा । जब दोनों उनके पास बिस्तर पर बैठ गये । तब उन्होंने कहा - मेरे संबंध में कभी भी अतीतकाल में बात मत करना । मेरे प्रताड़ित शरीर से मुक्त होकर मेरी उपस्थिति कई गुना बढ़ जायेगी । मेरे लोगो को याद दिलाना कि वे अब मुझे और भी अधिक महसूस कर सकेंगे । मेरे लोगों को तत्क्षण पता चल जायेगा । अम्रतो उनका हाथ थामे हुये था । और यह सुनकर वह रोने लगा । उन्होंने उसकी ओर कड़ी नजर से देखा । वे बोले - नहीं, नहीं यह ढंग नहीं है ? यह सुनकर उसने तत्क्षण रोना बंद कर दिया । तब उन्होंने बड़े सुंदर ढंग से मुस्कराते हुये उसे स्नेह से भरकर निहारा । फिर उन्होंने कहा - मैं चाहता हूं कि मेरे काम का विस्तार जारी रहे । अब मैं अपना शरीर छोड़ रहा हूं । अब बहुत से लोग आयेंगे । और बहुत बहुत से लोगों का रस जागेगा । और उनका कार्य इतने अविश्वसनीय रूप से बढ़ेगा । जिसकी तुम सब कल्पना भी नहीं कर सकते । मैं तुम सबको अपना स्वपन सौंपता हूं । उनके हाथ की नब्ज अम्रतो देख रहा था । जो आहिस्ता आहिस्ता विलीन होती गई । जब वह बहुत मुश्किल से नब्ज को महसूस कर पा रहा था । तो उसने कहा - ओशो ! मैं समझता हूँ This is it ।( अब समय आ गया ) उन्होंने केवल धीमे से सिर हिलाकर हामी भरी । और चिरकाल के लिये अपने कमल नयनों को बंद कर लिया ।
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प्रेम तुम्हें रिक्त करता है । ईर्ष्या से रिक्त । पागलपन से रिक्त । क्रोध से रिक्त । प्रतिस्पर्धात्मकता से रिक्त । तुम्हारे अहंकार और उसके सारे कचरे से रिक्त करता है । लेकिन प्रेम तुम्हें कई बातों से भरता है । जिनके बारे में अभी तुम अनजान हो । यह तुम्हें खुशबू से भरता है । प्रकाश से भरता है । आनन्द से भरता है - ओशो ।
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परमात्मा का कोई मार्ग नही होता । वो तो अद्रश्य है । उसको कोई खोजना चाहा । तो कही पर भी स्टेशन नही है । उसका मार्ग तो प्रेम का है । एक तरफ प्रेम है । और एक तरफ है - लोभ मोह अहंकार, इनको त्यागें । और परमात्मा मिले । तुम खुद ही भगवान हो । किसी से इनाम नही लेना है । भूल यही करते हो कि लोगों से प्रमाण लेना चाहते हो । तुम जल्दी बहुत करते हो पाने के लिए । और फिर खाली हाथ लौट जाते हो । ऐसे जन्मों जन्मों से हो रहा हैं ।
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निर्णय लें प्रमुदित होने का । प्रसन्न होने का । यह एक सहज ध्यान विधि है । लेकिन विधि अत्यंत जादुई है । बस प्रमुदित होने का,प्रसन्न होने का निर्णय लें । एक बार तुम जब दूसरों की ओर देखना बंद कर देते हो । तो प्रसन्न या अप्रसन्न होने का निर्णय ले सकते हो । जब तुम निर्णय लेते हो कि अब तुमने शांत रहने का तय किया है । तब तुम किसी के किसी भी व्यवहार से अशांत नहीं होगे । यदि कोई अशांति उभरती भी है । तो तुम उसे सावधानी पूर्वक देख पाओगे कि यह कहाँ छिपी हुई थी । और कहाँ से अब यह सतह पर आ रही है । शांत होने के तुम्हारे निर्णय ने एक नए विचार को जन्म दिया है । और शांति के सफेद बादल अब तुम्हें भर देंगे । एक संबुद्ध व्यक्ति उसी संसार में रहता है । जिसमें तुम रहते हो । तुम संसार से प्रभावित हो जाते हो । जबकि वो प्रभावित नहीं होता । क्योंकि उसके निर्णय ने उसे एक नयी व्यवस्था दी है । उसके भीतर बस शांति और प्रेम है । एक खोजी के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वो एक संबुद्ध मित्र का स्मरण एक ध्यान की तरह अपने भीतर निरंतर बनाए रखे । यह कोई भी सदगुरु हो सकता है । जो भी तुम्हें ठीक लगता हो । अपने ध्यान को दूसरों के ऊपर रखने के बजाय अपने ऊपर रखें । यदि तुम पीड़ा, द्वंद्व, दुःख या अभाव में हो । तो इसका कारण तुम स्वयं हो । कोई अन्य नहीं । तुम अपने निर्णयों के ही अंतिम परिणाम हो । सहजता से प्रमुदित व प्रसन्न रहो । क्योंकि जब तुम सहजता से प्रमुदित व प्रसन्न रहते हो । तो एक गहरे आतंरिक रूपांतरण से गुजरते हो । धीरे धीरे तुम्हारा निर्णय तुम्हारा स्वभाव बन जाता है ।
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You only find true happiness only in God, the God of the Sumirn Remember always continuous ( 24 hours ) will continue, then there is a greater pleasure, without the grace of God that do not meet both the public and otherworldly. Sumirn remains constant in our world then we are free from all desires of the Vasanao then be with him during the whole of the divine lives. And the divine company   ?   Nad Brahma Dhyan Yog Ashram Indore.
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तुम जब इस शरीर से अलग हो के अपने को देख लोगे । तब तुम ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा में समाहित हो को भी देख लोगे । तब तुम तुम न रह जाओगे । अपने मूल रूप से सदा के लिये समाहित हो जाओगे ।
जब तक तुम शरीर को ही सब कुछ समझते रहोगे । तब तक अपने मूल रूप से बेखबर रहोगे । तुम्हारा यह सुंदर शरीर एक छण में मिट जायेगा । बिखर जायेंगे । शरीर को निर्माण करने वाले सभी तत्व भी बिखर जायेंगे । और जब तुम इस शरीर से अलग हो गये । स्वयं को देख लोगे । तब तुम सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त ऊर्जा को भी देख लोगे । ब्रह्माण्ड के प्रत्येक पदार्थ का मूल तत्व ऊर्जा है । और तुम्हारे शरीर का भी मूल तत्व ऊर्जा है । जिस दिन तुम इस भेद को जान लेते हो । उस दिन तुम्हारे सारे भम्र स्वतः ही मिट जाते है । नाद ब्रह्म ध्यान योग आश्रम इन्दौर
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ऊर्जा वही बहती है । जहां हमारा ध्यान जाता है । हमारा कोई भी विचार ऊर्जा के बिना निर्जीव है । संसार के प्रत्येक पदार्थ में ऊर्जा ही ऊर्जा है ।
ऊर्जा को न बनाया जा सकता है । न मिटाया जा सकता है । पदार्थ का मूल तत्व ऊर्जा है । जो सदा था । रहा है । और रहेगा । यदि हमारा ध्यान हमारे ही पास रहता है । तब हमारे भीतर कोई विचार नही रहता है । और जब विचार नही रहता है । तो निर्विचार रहता है । और निर्विचार ही स्वयं में स्थित रहना है । स्वयं में स्थित रहना ही स्वयं को जानना है । नाद ब्रह्म ध्यान योग आश्रम इन्दौर
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