31 अगस्त 2011

आर्य वचन दुःख देते हैं

जीवन दर्द का झरना है । जो भी जीते हैं । दर्द भोगते हैं । और दर्द भोगते भोगते ही हमें मरना है । दर्द नियति की दुकान की निहाई है ।
दर्द भगवान के हाथ का हथौड़ा है । देवता हम पर चोटें देकर हमें संवारता और गढ़ता है । शायद यह बात सच है कि आदमी दर्द में विकसित होता । खूबसूरत बनता और बढ़ता है । तो दर्द एकदम व्यर्थ नहीं हैं । दुख एकदम व्यर्थ नहीं हैं । दुख है बाहर । लेकिन वही चोट निहाई बनती । हथौड़ा बन जाती । वही चोट छेनी बन जाती । वही चोट तुम्हारे भीतर से जो जो व्यर्थ है । उसे काट देती । जला देती है । वही चोट तुम्हें जगाती है । देवता हम पर चोटें देकर हमें संवारता और गढ़ता है । दर्द नियति के दुकान की निहाई है । दर्द भगवान के हाथ का हथौड़ा है । शायद यह बात सच है कि आदमी दर्द में विकसित होता ।
खूबसूरत बनता और बढ़ता है - ओशो ।

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मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि तुम जहां हो । वहीं मजे में हो जाओ । न फकीर बनने की जरूरत है । न सम्राट बनने की जरूरत है । सम्राट हो । तो भी ठीक चलेगा । फकीर हो । तो भी चलेगा । न फकीरी पकड़ो । न बादशाहत पकड़ो । पकड़ो मत । जो है । जो उपलब्ध हुआ है । उसे प्रभु का प्रसाद समझकर स्वीकार करो । और जल में कमलवत रहना सीखो । रहो जल में । लेकिन जल छुए न । पकड़ने छोड़ने की बात नहीं है । अस्पर्शित रहने की बात है । और उस प्रक्रिया को ही मैं ध्यान कहता हूं । सब करते रहोगे । संसार का कृत्य काम, बाजार, दुकान और भीतर कोई दूर पारदर्शक बना बैठा रहेगा । साक्षी । देखता रहेगा । उस दर्शक को । उस साक्षी को । उस द्रष्टा को कुछ भी न छूएगा - ओशो 
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A serious person can never be innocent, and one who is innocent can never be serious.- Osho
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मान बड़ाई देखि कर । भक्ति करै संसार ।
जब देखैं कछु हीनता । अवगुन धरै गंवार ।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि - दूसरों की देखा देखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं । पर जब वह नहीं मिलता । वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं ।
अंतर्मन की शांति । इस जगत में कौन है । जो शांति नहीं चाहता ? लेकिन न लोगों को इसका बोध है । और न वे उन बातों को चाहते हैं । जिनसे कि शांति मिलती है । अंतरात्मा शांति चाहती है । लेकिन हम जो करते हैं । उसमें अशांति ही बढ़ती है । स्मरण रहे कि महत्वाकांक्षा अशांति का मूल है । जिसे शांति चाहनी है । उसे महत्वाकांक्षा छोड़ देनी पड़ती है । शांति का प्रारंभ वहां से है । जहां कि महत्वाकांक्षा अंत होती है । जोशुआ लीबमेन ने लिखा है - मैं जब युवा था । तब जीवन में क्या पाना है ? इसके बहुत स्वपन देखता था । फिर एक दिन मैंने सूची बनाई थी । उन सब तत्वों को पाने की । जिन्हें पाकर व्यक्ति धन्यता को उपलब्ध होता है । स्वास्थ्य, सौंदर्य, सुयश, शक्ति, संपत्ति । उस सूची में सब कुछ था । उस सूची को लेकर मैं एक बुजुर्ग के पास गया । और उनसे कहा कि क्या इन बातों में जीवन की सब उपलब्धियां नहीं आ जाती हैं ? मेरी बातों को सुन और मेरी सूची को देख उन वृद्ध की आंखों के पास हंसी इकठ्ठा होने लगी थी । और वे बोले थे - मेरे बेटे ! बड़ी सुंदर सूची है । अत्यंत विचार से तुमने इसे बनाया है । लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात तुम छोड़ ही गये हो । जिसके अभाव में शेष सब व्यर्थ हो जाता है । किंतु उस तत्व के दर्शन, मात्र विचार से नहीं । अनुभव से ही होते हैं । मैंने पूछा - वह क्या है ? क्योंकि मेरी दृष्टिं में तो सब कुछ ही आ गया था । उन वृद्ध ने उत्तर में मेरी पूरी सूची को निर्ममता के साथ काट दिया । और उन सारे शब्दों की जगह उन्होंने छोटे से तीन शब्द लिखे - मन की शांति । शांति को चाहो । लेकिन ध्यान रहे कि उसे तुम अपने भीतर नहीं पाते हो । तो कहीं भी नहीं पा सकोगे । शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं है । वह तो स्वयं का ही ऐसा निर्माण है कि हर परिस्थिति में भीतर संगीत बना रहे । अंतस के संगीत पूर्ण हो उठने का नाम ही शांति है । वह कोई रिक्त और खाली मन:स्थिति नहीं है । किंतु अत्यंत विधायक संगीत की भाव दशा है - ओशो ।
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निंदा रस निम्न विचार तीव्रता से फैलता है - ओशो । आप हैरान होंगे जानकर कि आपको हमेशा अनार्य वचनों में आनंद मिलता है क्यों ? क्योंकि जब भी कोई अनार्य वचन आप सुनते हैं क्षुद्र । तो पहली तो बात उसे एकदम समझ पाते हैं । क्योंकि वह आपकी भाषा है । दूसरी बात उसे सुनकर आप आश्वस्त होते है कि मैं ही बुरा नहीं हूं । सारा जगत ऐसा ही है । तीसरा उसे सुनते ही आपको जो श्रेष्ठता का चुनाव है । वह जो चुनौती है आर्यत्व की । उसकी पीड़ा मिट जाती है । सब उत्तरदायित्व गिर जाता है । ऐसा समझें । फ्रायड ने कहा कि - मनुष्य एक कामुक प्राणी है । यह अनार्य वचन है । असत्य नहीं है । सत्य है । लेकिन क्षुद्र सत्य है । निकृष्टतम सत्य है । आदमी की कीचड़ के बाबत सत्य है कि आदमी के बाबत सत्य नहीं है कि आदमी सेक्सुअल है कि आदमी के सारे कृत्य कामवासना से बंधे हैं । वह जो भी कर रहा है । कामवासना ही है । छोटे से बच्चे से लेकर बूढे आदमी तक सारी चेष्टा कामवासना की चेष्टा है । यह सत्य है । लेकिन क्षुद्र सत्य है । यह निम्नतम सत्य है - कीचड़ का । लेकिन सारी दुनिया में इस कीचड़ के सत्य ने लोगों को बड़ा आश्वासन दिया । लोगों ने कहा - तब ठीक है । तब हम ठीक है । जैसे हैं । फिर बुराई नहीं है । फिर अगर चौबीस घंटे कामवासना के संबंध में ही सोचता हूं । और नग्न स्त्रियां मेरे सपनों में तैरती हैं । तो जोकर रहा हूं । वह नैसर्गिक है । अगर मैं शरीर में ही जीता हूं । तो यह जीना ही तो वास्तविक है । फ्रायड कह रहा है । फ्रायड ने हमारे निम्नतम को परिपुष्ट किया । इसलिए फ्रायड के वचन थोड़े ही दिनों में सारे जगत में फैल गये । जितनी तीव्रता से साइको एनालिससि का । फ्रायड का आंदोलन फैला । दुनिया में काई आंदोलन नहीं फैला । महावीर को पचीस सौ साल हो गये । उपनिषदों को लिखे । और पुराना समय हुआ । गीता कहे । और भी समय व्यतीत हो गया । पाँच हजार साल हो गये । पाँच हजार सालों में भी उन्होंने कहा है । वह इतनी आग की तरह नहीं फैला । जो फ्रायड ने पिछले पचास सालों में सारी दुनिया को पकड़ लिया । साहित्य, फिल्म, गीत, चित्र । सब फ्रायडियन हो गये है । हर चीज फ्रायड के दृष्टिकोण से सोची और समझी जाने लगी है । क्या कारण होगा ? अनार्य वचन हमारे निम्नतम को पुष्ट करते है । जब भी कोई हमारे निम्नतम को पुष्ट करता है । तो हमें राहत मिलती है । हमें लगता है कि ठीक है । हम में कोई गड़बड़ नहीं है । अपराध का भाव छूट जाता है । बेचैनी छूट जाती है कि कुछ होना है कि कहीं जाना है कि कोई शिखर छूना है । सीधी जमीन पर चलने की स्वीकृति आ जाती है । कोई निंदा नहीं । आदमी ऐसा ही है । सभी आदमी ऐसे ही हैं । इसलिए हम सब दूसरों के संबंध में बुराई सुनकर प्रसन्न होते हैं । कोई निंदा करता है किसी की । हमें प्रसन्नता और भी ज्यादा होती है । क्योंकि यह पक्का हो जाता है कि महात्मा वहात्मा कोई हो नहीं सकता । सब ऊपरी बातचीत है । हैं तो सब मेरे ही जैसे । किसी का पता चल गया है । और किसी का पता नहीं चला है । तो जब भी आपको किसी की निंदा में रस आता है । तब आप समझना कि आप क्या कर रहे हैं । आप अपने निम्नतम को पुष्ट कर रहे हैं । आप यह कह रहे है कि अब कोई चुनौती नहीं । कोई चैलेंज नहीं । कहीं जाना नहीं । कुछ होना नहीं । जो मैं हूं । इसी कीचड़ में मुझे जीना है । और मर जाना है । यही कीचड़ जीवन है । अनार्य वचन बड़ा सुख देते हैं । बहुत अनार्य वचन प्रचलित हैं । हम सबको पता है कि अनार्य वचन तीव्रता से फैलते जा रहे हैं । और धीरे धीरे हम यह भी भूल गये है कि वे अनार्य वचन हैं । सब चीजों को जो लोएस्ट डिनामिनेटर है । जो निम्नतम तत्व है । उससे समझाने की कोशिश चल रही है । आदमी को रिडयूस करके आखरी चीज पर खड़ा कर देना है । जैसे हम आदमी को काटें पीटें । तो क्या पायेंगे । जो श्रेष्ठतम है । व हमारे उपकरणों से छूट जाता है । अगर आदमी के व्यवहार की हम जांच पड़ताल करें । तो क्या मिलेगा ? कामवासना मिलेगी । वासना मिलेगी । दौड़ मिलेगी । महत्वाकांक्षा की । फिर हर श्रेष्ठ चीज को हम निकृष्ट से समझा लेंगे । ऐसे ही जैसे हम कहेंगे - कमल में क्या रखा है । कीचड़ ही तो है । यह एक ढंग हुआ । इससे हम कीचड़ को राज़ी कर लेंगे कि कमल होने की मेहनत में मत लग । कमल में भी क्या रखा है । बस कीचड़ की है । तो कीचड़ की कमल होने की जो आकांक्षा पैदा हो सकती थी । वह कुंद हो जायेगी । कीचड़ शिथिल होकर बैठ जायेगी । अपनी जगह क्यों व्यर्थ दौड़ धूप करना । क्यों परेशान होना । अनार्य वचन सुख देते हैं । आर्य वचन दुःख देते हैं । महावीर कहते हैं - जो आर्य वचन में आनंद ले सके । वह ब्राह्मण है । भला वह अभी आर्य हो न गया हो । लेकिन आर्य वचनों मे आनंद लेने का अर्थ यह है कि चुनौती स्वीकार कर रहा है । जीवन के शिखर तक पहुंचने की आकांक्षा को जागने दे रहा है । आर्य वचन में आनंद लेने का अर्थ है । हम संभावना का द्वार खोल रहे हैं - ओशो ।
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