01 सितंबर 2011

आप आठ घंटे सो सकते हैं

आप रात्रि में ठीक तरह से न सो पाते हों । बहुत कम लोग ठीक तरह से सो पाते हैं । जब आप रात्रि में ठीक से नहीं सो पाते । तो दिन में थोड़ा थका महसूस करते हैं । यदि ऐसा है । तो आपको अपनी नींद के साथ कुछ करना होगा । इसे गहरी करना होगा । बात इतनी समय की नहीं है । आप आठ घंटे सो सकते हैं । परंतु यदि नींद गहरी नहीं है । तो आप नींद के भूखे होंगे । इसके लिये तरसेंगे - प्रश्न गहराई का है ।
हर रात सोने से पहले एक छोटी सी तकनीक का प्रयोग करें । और आप बेहद बेहतर महसूस करेंगे । बिजली बुझा दें । और अपने बिस्तर में सोने के लिये तैयार होकर बैठ जायें । लेकिन बैठें पंद्रह मिनट के लिये । अपनी आंखें बंद कर लें । और कोई भी अनर्गल, उबाने वाली ध्वनि निकालना शुरू करें । जैसे कि - ला, ला , ला । और प्रतीक्षा करें कि मन और नयी ध्वनियां पैदा करे । स्मरण रखने योग्य एक ही बात है कि वह ध्वनि या शब्द किसी ऐसी भाषा के न हों । जिसे आप जानते हैं । यदि आप अंग्रेज़ी, जर्मन या इटालियन भाषा जानते हैं । तो वे अंग्रेज़ी, जर्मन या इटालियन भाषा के नहीं होने चाहियें । किसी भी उस भाषा की आपको अनुमति है । जिसे आप नहीं जानते - तिब्बती, चीनी, जापानी । लेकिन यदि आप जापानी जानते हैं । तो उसकी अनुमति नहीं है । हां इटालियन बढ़िया रहेगी । कोई भी भाषा जो आप नहीं जानते । बोल सकते हैं । पहले दिन आप कुछ क्षणों के लिये थोड़ा मुश्किल महसूस करेंगे । क्योंकि उस भाषा को कैसे बोलें । जो आप नहीं जानते ? इसे आप बोल सकते हैं । और एक बार शुरू हो जाये । कोई भी ध्वनि । कोई भी अनर्गल शब्द । जो चेतन मन को हटाकर अवचेतन को बोलने दें । जब अवचेतन मन बोलता है । तो उसकी कोई भाषा नहीं होती ।
यह बहुत ही प्राचीन विधि है । यह ओल्ड टैस्टामैंट से आती है । उन दिनों इसे ग्लासोलेलिया कहा जाता था । अभी भी अमेरिका के कुछ चर्चों में इसका इस्तेमाल होता है । वे इसे " जिव्हा में बोलना " कहते हैं । और यह एक अभूतपूर्व विधि है । एक ऐसी विधि । जो अवचेतन में बहुत गहरे तक जाती है । आप - ला, ला, ला से प्रारंभ करते हैं । और फिर जो भी ध्वनि उभरती है । आप उसे आने देते हैं । केवल पहले दिन आप थोड़ा मुश्किल महसूस करते हैं । और यदि यह एक बार यह ध्वनि उठने लगी । तो आपके हाथ गुर आ जाता है । फिर पंद्रह मिनट के लिये आप उन शब्दों को बोल सकते हैं । जो अवचेतन से उठ रहे हैं । और उनका एक भाषा की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं । सच तो यह है कि आप पहले ही उस भाषा में बोल रहे हैं । यह आपके चेतन मन को बहुत गहरे में विश्रांत कर देगा ।
पंद्रह मिनट - और फिर आप बस लेट जायें । और सो जायें । आपकी नींद गहरी हो जायेगी । कुछ ही सप्ताह में आप अपनी नींद में एक गहराई का अनुभव करेंगे । और सुबह बिलकुल तरोताज़ा महसूस करेंगे ।
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मैं आपको एक सूत्र की बात कहूं - जिस मनुष्य के पास प्रेम है । उसकी प्रेम की मांग मिट जाती है । और यह भी मैं आपको कहूं । जिसकी प्रेम की मांग मिट जाती है । वही केवल प्रेम को दे सकता है । जो खुद मांग रहा है । वह दे नहीं सकता है । इस जगत में केवल वे लोग प्रेम दे सकते हैं । जिन्हें आपके प्रेम की कोई अपेक्षा नहीं है । केवल वे ही लोग ! महावीर और बुद्ध इस जगत को प्रेम देते हैं । जिनको हम समझ ही नहीं पाते । हम सोचते हैं । वे तो प्रेम से मुक्त हो गए हैं । वे ही केवल प्रेम दे रहे हैं । आप प्रेम से बिलकुल मुक्त हैं । क्योंकि उनकी मांग बिलकुल नहीं है । आपसे कुछ भी नहीं मांग रहे हैं । सिर्फ दे रहे हैं - ओशो ।
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प्रेम का अर्थ है - जहां मांग नहीं है । और केवल देना है । और जहां मांग है । वहां प्रेम नहीं है । वहां सौदा है । जहां मांग है । वहां प्रेम बिलकुल नहीं है । वहां लेन देन है । और अगर लेन देन जरा ही गलत हो जाए । तो जिसे हम प्रेम समझते थे । वह घृणा में परिणत हो जाएगा । लेन देन गड़बड़ हो जाए । तो मामला टूट जाएगा । ये सारी दुनिया में जो प्रेमी टूट जाते हैं । उसमें और क्या बात है ? उसमें कुल इतनी बात है कि लेन देन गड़बड़ हो जाता है । मतलब हमने जितना चाहा था मिले । उतना नहीं मिला । या जितना हमने सोचा था दिया । उसका ठीक प्रतिफल नहीं मिला । सब लेन देन टूट जाते हैं - ओशो ।
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मैं तुम्हें ध्यान दूंगा । फिर किसी में ध्यान बांसुरी बन जाएगा । किसी में ध्यान मीरा बनकर नाचेगा । किसी में ध्यान शात हो जाएगा । किसी में ध्यान बोलेगा । और किसी में ध्यान मौन हो जाएगा । किसी में ध्यान नग्न हो जाएगा । किसी में ध्यान कोई रूप लेगा । किसी में
ध्यान कोई रूप लेगा । अनंत रूप होंगे ध्यान के । सिखाने की बात ध्यान है । बस तुम्हारे भीतर परमात्मा से संबंध जुड़ जाए । इतना मैं सिखाता हूं । इससे ज्यादा मेरा कोई काम नहीं है । इससे ज्यादा अन्याय है । इससे ज्यादा हस्तक्षेप है । इससे ज्यादा तुम्हारी स्वतंत्रता के ऊपर बलात्कार है - ओशो ।
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कर्म मेँ कर्ता भाव - बङा अहंकार ।
ज्ञान मेँ सर्वस्व जानने का भाव - सूक्ष्म अहंकार ।
भक्ति मेँ समर्पण भाव - निरअहंकार । ओशो ।
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