04 सितंबर 2011

मूर्ख आदमी अकारण हंसता रहता है

विचार आ जा रहे हैं । उन्हें आने और जाने दो । वह कोई समस्या नहीं है । तुम इसमें शामिल मत होना । तुम अलग, दूर बने रहना । तुम बस उन्हें आते जाते देखना । तुम्हें उनसे कोई मतलब नहीं है । मुंह बन्द रखो । और मौन रहो । धीरे धीरे विचार स्वयं बन्द हो जाते हैं । उन्हें होने के लिए तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता होती है । अगर तुम सहयोग करते हों । तो वे होंगे । अगर तुम लड़ते हो । तब भी वे वहां होंगे । क्योंकि दोनों सहयोग हैं । 1 समर्थन में । दूसरा विरोध में । दोनों 1 तरह की क्रिया हैं । बस देखो ।
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मुंह वास्तव में बहुत बहुत महत्वपूर्ण है । क्योंकि वहीं से पहली क्रिया शुरू हुई । तुम्हारे ओठों ने पहली क्रिया की । मुंह के आसपास की जगह से हर क्रिया की शुरुआत हुयी । तुमने स्वांस अन्दर ली । तुम रोए । तुमने मां का स्तन ढूंढना शुरु किया । और तुम्हारा मुंह हमेशा सतत क्रियाशील रहा । जब भी तुम ध्यान के लिए बैठते हो । जब भी तुम मौन होना चाहते हो । पहली बात । अपना मुंह पूरी तरह से बन्द करो । अगर तुम मुंह पूरी तरह से बन्द करते हो । तुम्हारी जीभ तुम्हारे मुंह की तालु को छुएगी । दोनों ओंठ पूरी तरह से बन्द होंगे । और जीभ तालु को छुएगी । इसको पूरी तरह से बन्द करो । लेकिन यह तब ही हो सकेगा । जब तुमसे जो भी मैंने कहा । तुम उसका पालन करो । इससे पहले नहीं । 
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जीवन हंसने हंसाने का अवसर है । आदमी खुद पर हंस नहीं सकता । क्योंकि वह मूर्ख बनने से डरता है । लेकिन मूर्खता में क्या खराबी है ? ज्ञानी बनने की बजाय मूर्ख बनकर जीना ज्यादा बेहतर है । सच्चा मूर्ख वह है । जो किसी बात को गंभीरता से नहीं लेता । मूर्ख आदमी अकारण हंसता रहता है । उसमें मिथ्या अहंकार नहीं होता । वह सहज, सरल होता है । यह बहुत बड़ा वरदान है । क्योंकि हमारी जिंदगी इतनी बोझिल है कि हंसने के कारण खोजने जाएं । तो मिलने बहुत मुश्किल हैं । जो अकारण हंस सकता है । उसका जीवन मधुमास बन जाता है । उसके जीवन में आनंद की फुलझड़ियाँ छूटती हैं । अकारण ही । ओशो
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