22 सितंबर 2011

अनंत जन्म से आप चल रहे हैं

स्वयं की सत्ता - न तो प्रतिभा की अंतिम अवस्था है । 1 जन्म काफी नहीं है । अनेक जन्म लग जाते हैं । तब प्रतिभा पकती है । और कोई व्यक्ति अनंत जन्मों तक अगर सतत प्रयास करे तो ही । अन्यथा कई बार प्रयास छूट जाता है । अंतराल आ जाते है । जो पाया था । वह भी खो जाता है । भटक जाता है । फिर फिर पाना होता है । अगर सतत प्रयास चलता रहे । तो अनंत जन्म लगते है । तब समाधि उपलब्ध होती है । इससे घबड़ा मत जाना । इससे बैठ मत जाना । पत्थर के किनारे कि अब क्या होगा ? अनंत जन्मों से आप चल ही रहे हो । घबड़ाने की कोई जरूरत नहीं है । आ गया हो वक्त । तो जब कोई कहता है कि 1 ही कोस दूर । तो हो सकता है कि आपके लिए 1 ही कोस बचा हो । क्योंकि कोई आज की यात्रा नहीं है । अनंत जन्म से आप चल रहे हैं । इस क्षण भी ध्यान घटित हो सकता है । अगर पीछे की परिपक्वता साथ हो । अगर पीछे कुछ किया हो । कोई बीज बोए हों । तो फसल इस क्षण भी काटी जा सकती है । इसलिए भयभीत होने
की कोई जरूरत नहीं है । और न भी पीछे कुछ किया हो । तो भी बैठ जाने से कुछ हल नहीं है । कुछ करें । ताकि आगे कुछ हो सकें ।
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गुंजन - ध्यान । गुंजन करना बहुत सहयोगी हो सकता है । और इसे आप कभी भी कर सकते हैं । कम से कम दिन में 1 बार इसे करें । अगर आप दिन में 2 बार कर सकें । तो अच्छा होगा । यह इतना अदभुत अंतर संगीत है कि यह आपके पूरे प्राणों में शांति ला सकता है । तब आपके संघर्षरत अंग 1 लय में आने लगते हैं । और आप बस शांत बैठेंगे । और आप 1 सूक्ष्म संगीत को । 1 भीतरी नाद को । 1 प्रकार की गुंजन को सुन सकेंगे । सब कुछ इतने अच्छे ढ़ंग से चल रहा है । जैसे कि 1 बिलकुल ठीक ढ़ंग से कार्य करती कार का इंजन 1 खास लय में गुंजन करता हो । 1 अच्छे ड्राइवर को तुरंत पता चल जाता है । अगर जरा सी भी गड़बड़ी हो । यात्रियों को चाहे इस बारे में पता न लगे । लेकिन अच्छा ड्राइवर तुरन्त जान लेता है । जैसे ही इंजन की आवाज बदलती है । तब इंजन की आवाज लयबद्ध नहीं रहती है । कुछ नई आवाज आ रही है । वैसे ही अपने अंतर नाद से अच्छी तरह परिचित व्यक्ति धीरे धीरे अनुभव करने लगता है कि कब चीजें गलत जा रही है । यदि आपने ज्यादा भोजन ले लिया है । तो आप देखेंगे कि आपका भीतरी छंद चूक रहा है । और धीरे धीरे आपको चुनना पड़ेगा । या तो ज्यादा भोजन लें । या भीतरी छंद को सम्हालें । और भीतरी छंद इतना अनमोल, इतना दिव्य, 1 ऐसा आनंद है कि ज्यादा खाने की कौन चिंता करता है । और बिना किसी डाइटिंग के प्रयास के आप पाएंगे कि आप बहुत ही संतुलित ढ़ंग से भोजन ले रहे हैं । तब भीतर का छंद और भी सम स्वर हो जाता है । और आप स्पष्ट देख सकेंगे कि कौन से आहार आपके छंद में बाधा ड़ालते है । आप कुछ भारी भोजन लेते हैं । और वह बहुत देर तक पाचन तंत्र में पडा रहता है । तब भीतर का छंद उतना लयबद्ध नहीं रहता । 1 बार भीतर का छंद अनुभव में आ जाएं । तो आप जान सकेंगे कि कब कामवासना उठ रही है ? कब नहीं उठ रही है । और अगर पति पत्नी दोनों ही भीतर के छंद से जी रहे हों । तो आप चकित हो जाएंगे कि 2 व्यक्तियों के बीच कितनी गहराई, कितनी लीनता घट सकती है । और कैसे वे धीरे धीरे एक दूसरे कें प्रति संवेदनशील हो जाते हैं । कैसे वे महसूस करने लगते है कि कब दूसरा उदास है । कहने की भी कोई आवश्यकता नहीं होती । जब पति थका होता है । तो पत्नी सहज ही जान जाती है । क्योंकि दोनों 1 ही वेव लेंथ पर जी रहे हैं । 1 ही तरंग उन्हें आंदोलित करती है । ओशो
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बुद्ध 1 जंगल से गुजर रहे थे । रास्ता भटक गये । संगी साथी भिक्षु भूखे प्यासे थे । घनी दोपहर हो गई । जंगल के रास्ते में पानी भी कहीं नजर नहीं आ रहा था । जंगल का रास्ता किधर जाना है । कुछ मालूम नहीं पड़ रहा था । कोई गांव पास नहीं दिखाई दे रहा । इतनी देर में 1 आदमी आता हुआ मिला । बुद्ध के शिष्य आनंद ने पूछा - गांव कितनी दूर है ? वह आदमी कहता है - बस 2 मील, 1 कोस । 1 कोस चलने के बाद गांव नहीं आया । समझ में कुछ नहीं आ रहा था कहां जाये । फिर दूसरा आदमी आता हुआ मिला । तब आनंद ने उससे पूछा कि - भाई गांव कितनी दूर है । उसने भी कहा कि बस 2 मील 1 कोस । आनंद को थोड़ी बेचैनी हुई । 2 कोस भी ज्यादा चल लिए । पर गांव को कोई नामोनिशान नजर नहीं आ रहा है । फिर 1 अब तो सांझ भी होने वाली है । सूर्य भी अस्ताचल की और चल दिया है । जंगली जानवरों की हंकार भी सुनाई देने लगी है । कुछ ही देर में अंधेरा घिर जायेगा । पर न जाने गांव क्यों नहीं आ रहा । भूख प्यास भी बहुत लगी है । थकावट भी हो रही है । सुबह मुंह अंधेरे के चले हैं । पूरा दिन गुजर गया । इतनी देर में 1 लकड़हारा मिला । और उससे आनंद ने पूछा - भाई गांव कितनी दूरी पर है ? वह कहता है - बस 2 मील, 1 कोस । आनंद खड़ा हो जाता है । वह कहता है - यह किस तरह की यात्रा है । यह 1 कोस कभी खत्म भी होगा । तब भगवान बुद्ध आनंद की झुंझलाहट देख कर हंसे । और कहने लगे कि - आनंद तू खुश हो । कम से कम 1 कोस से ज्यादा तो नहीं बढ़ता गांव । इतना क्या कम है । वह गांव 1 कोस पर ठहरा हुआ है । उससे ज्यादा हो जाये । तो तू कितना घबरा जाता । हमने जितना था । उससे खोया नहीं है । इतना पक्का है । हम जहां थे । कम से कम वही स्थिर तो है । वहां से पीछे तो नहीं हटे । और ये लोग कितने भले है । ये कितने प्रेम पूर्ण हैं । 1 कोस तक तुम चल सको । फिर अगले 1 कोस को बताते है । अगर यह कह देते कि - 10 कोस हैं । तो तुम्हारी हिम्मत ही टूट जाती । ये कितने भले और समझदार लोग हैं । मैं कहता हूं । 1 कोस यह लंबी यात्रा है । पर 1-1 कोस चलकर करोड़ो मील पर कर जाती है । ये तुम्हारे चेहरे को देखकर कहते हैं । ये दयावान लोग हैं । 1 को से इनका कोई लेना देना नहीं है । अनंत यात्रा । लेकिन काफी समय लगता है । क्योंकि जितनी महा प्रतिभा की खोज हो । उतनी ही प्रौढ़ता में समय लगता है । इसे जरा समझें । इसे वैज्ञानिक भी स्वीकार करते है । ओशो
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