02 सितंबर 2011

मंदिर में भी एक सुगंध है

आचार्य श्री ! यौन ऊर्जा के संचय और ऊर्ध्वीकरण के संबंध में आहार रसायन, डाइट केमिस्ट्री पर भी कुछ प्रकाश डालने की कृपा करें ।
- आहार शब्द बहुत बड़ा है । डाइट से बहुत बड़ा है । पहले आहार शब्द को समझ लें । फिर हम थोड़ी सी बात करें । आहार का मतलब है । जो भी हम बाहर से भीतर लेते हैं । वह सब आहार है । आंख से देखते हैं  एक सुंदर फूल को । तो आहार हो रहा है । आंख सौंदर्य का आहार कर रही है । कान से सुनते हैं एक संगीत को । तो संगीत का आहार हो रहा है । कान ध्वनियों का आहार कर रहा है । किसी के शरीर को स्पर्श करते हैं । हाथ आहार ले रहा है । किसी की सुगंध नासापुटों को छू लेती है । नाक आहार कर रही है । पूरा शरीर आहार कर रहा है । रोआं  रोआं श्वास ले रहा है । रोआं रोआं स्पर्श ले रहा है । पूरा शरीर ही हमारा आहार यंत्र है । हमारी सारी इंद्रियां बाहर के जगत को भीतर ले जा रही हैं । लेकिन हम सिर्फ भोजन को आहार समझते हैं । उससे भूल होती है । काम  ऊर्जा के ऊर्ध्वीकरण के लिए समस्त आहार को समझना जरूरी है । क्योंकि हो सकता है । भोजन आपने बिलकुल ऐसा लिया हो । जो काम ऊर्जा को नीचे न ले जाकर ऊपर ले जाने में सहयोगी हो । लेकिन आंख ने ऐसे दृश्य देखे हों कि काम ऊर्जा को नीचे ले जायें । और कान ने ऐसी ध्वनियां सुनी हों । जो ऊर्जा को नीचे ले जायें । और शरीर ने ऐसे स्पर्श किए हों । जो ऊर्जा को नीचे ले जायें । तो आहार के पूरे पर्सपेक्टिव को देख लेना जरूरी है । 
आंख से भी हम भोजन ले रहे हैं । कान से भी हम भोजन ले रहे हैं । नाक से भी हम भोजन ले रहे हैं । मुंह से भी हम भोजन ले रहे हैं । रोयें रोयें के स्पर्श से भी हम भोजन ले रहे हैं । चौबीस घंटे हम भोजन कर रहे हैं । बाहर के जगत से बहुत कुछ हममें प्रविष्ट हो रहा है । यह जो प्रवेश हम में हो रहा है । इसके परिणाम होंगे । स्वभावतः हम जो भी इकट्ठा कर रहे हैं शरीर में । वह कुछ काम करेगा । अगर एक आदमी ने शराब पी ली है । तो उसका सारा व्यक्तित्व दूसरा होगा । उसके सारे व्यक्तित्व में मूर्च्छा छा जाएगी । वह वही काम करने लगेगा । जो मूर्च्छा में संभव हैं । एक आदमी ने शराब नहीं पी है । तो वह वे काम नहीं कर सकेगा । जो मूर्च्छा में ही हो सकते हैं । हम जो भी भोजन ले रहे हैं । वह सब परिणाम लाएगा । उसके परिणाम आते ही रहेंगे ।
मुसोलिनी से एक भारतीय संगीतज्ञ पं. ओंकार नाथ मिलने गए थे । मुसोलिनी ने आमंत्रण दिया था । संगीतज्ञ इटली गया था । तो उसने उन्हें भोजन पर आमंत्रित किया । तब मुसोलिनी ताकत में था । उसने पं. ओंकार नाथ से भोजन करते समय यह कहा कि - मैंने सुना है कि कृष्ण बांसुरी बजाते थे । तो लोग दीवाने होकर उनके आसपास इकट्ठे हो जाते थे । ठीक जाने दें लोगों को । हो जाते होंगे । लेकिन यह विश्वास नहीं होता कि हरिण भी दौड़ आते थे । मोर भी नाचने लगते थे । यह कैसे हो सकता है ? पं. ओंकार नाथ ने कहा कि - मैं कृष्ण तो नहीं हूं । इसलिए वैसी बांसुरी नहीं बजा सकता । लेकिन थोड़ा सा क ख ग मैं भी जानता हूं । वह मैं आपको प्रयोग करके ही बताऊं ।
मुसोलिनी ने कहा - इससे बेहतर क्या होगा । लेकिन वहां कोई वाद्य यंत्र भी न था । वहां तो चम्मच कांटे थे । खाने की मेज पर बैठकर ये बातें हो रही थीं । तो ओंकार नाथ ने चम्मच और कांटे को उठाकर और चीनी के बर्तनों पर बजाना शुरू कर दिया । मुसोलिनी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि - मैं थोड़ी ही देर में बेहोश हो गया । और मेरा सिर झुक झुक कर टेबल से लगने लगा । और वह इतने जोर से चम्मच कांटे पटकने लगे कि मेरा सिर उसकी ताल में टेबल पर गिरे । और उठे । फिर मेरा सिर लहूलुहान हो गया । और मैंने चिल्लाकर कहा कि - बंद करो यह वाद्य । अन्यथा मैं सिर को कैसे रोकूं ? तब उस संगीतज्ञ ने बंद किया । सिर पर खून की बूंदें आ गयीं । सारा सिर छिल गया । मुसोलिनी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि - मैंने कहा । मुझे माफ करना । मुझे पता नहीं था कि संगीत का ऐसा परिणाम भीतर हो सकता है कि मैं रोक ही नहीं पा रहा था । शरीर अवश हो गया । सिर मेरे हाथ के बाहर हो गया । और मुझे ऐसा लगा कि अब तो मैं मर जाऊंगा । क्योंकि मैं कोशिश करूं । और कोई उपाय नहीं । जितना ही कोशिश करूं । सिर उतना ही और जोर से जाकर टेबल से टकराने लगा । और ओंकार नाथ ने कहा कि - मेरी कोई हैसियत नहीं । कृष्ण के बाबत मैं कोई वक्तव्य दूं । यह ठीक नहीं । लेकिन इतना हो सकता है । तो उतना भी हो सकता है ।
इस्लाम ने संगीत को वर्जित किया । इसलिए नहीं कि संगीत अनिवार्य रूप से काम ऊर्जा को नीचे ले जाता है । लेकिन संगीत के जितने प्रकार प्रचलित हैं । उनमें से निन्यान्बे प्रतिशत काम ऊर्जा को नीचे की तरफ ले जाने वाले हैं । शायद एक प्रतिशत संगीत मुश्किल से जगत में बचा है । जो ऊर्जा को ऊपर ले जाये । वह भी खोता जा रहा है । उसका भी कोई उपाय बचाने का नहीं दिखायी पड़ता । ऐसे सूफी फकीरों के नृत्य हैं । जिनको देखते देखते देखने वाले ध्यानस्थ हो जायें । गुरजिएफ सूफी फकीरों के दरवेश नृत्य की एक टोली बनाकर सारे यूरोप और अमरीका में घूमता रहा । और उसने कहा - सिर्फ देखो । और कुछ मत करो । तीस लोगों की टोली है । वे नाचना शुरू करते हैं । फकीरों का नाच है । और जितने लोग बैठे हैं । वे थोड़ी देर में ध्यानस्थ हो जाएंगे । वे सिर्फ देखेंगे - मूवमेंटस । वे मूवमेंटस उनके प्राणों में उतर जाएंगे । और उनके भीतर भी करस्पांडिंग मूवमेंट पैदा होंगे । जो बाहर हो रहा है । वही आकृति उनके भीतर भी डोलने लगेगी । बाहर वह जो फकीर नाच रहे हैं । उनके नाचने की जो रिदम और गति है । और लय है । वह धीरे धीरे उनके हृदय की गति और लय बन जाएगी । और उनके भीतर भी कोई नृत्य शुरू हो जाएगा । और उनकी ऊर्जा में रूपांतरण हो जाएगा । 
आंख से जो हम देखते हैं । कान से जो हम सुनते हैं । ओंठ से जो हम स्वाद लेते हैं । नाक से जो हम गंध लेते हैं । उन सबके संबंध हैं । मंदिरों में घंटे हमने कभी लटकाये थे । हर कोई घंटा मतलब का नहीं है । कुछ विशेष घंटे ही काम के हो सकते हैं । तिब्बतियों के पास एक विशेष घंटा होता है । शायद आपमें से किसी ने देखा हो । वह घंटा ऐसा लटकाने वाला नहीं होता । बर्तन की तरह बड़ा होता है । और बजाने को उसके अंदर एक गोल डंडा घुमाकर चोट करनी पड़ती है । जैसे एक बाल्टी रखी हो । उसके अंदर गोल घुमाकर डंडे से चोट करनी पड़ती है । उस डंडे और घंटे के बीच चोट का एक विशेष क्रम है । उस चोट करने से । घंटे से जोर की आवाज निकलती है - ॐ मणि पद्मे हुं । यह पूरा सूत्र तिब्बत का उससे निकलता है । और यह सूत्र बार बार मंदिर में गूंजता रहता है । और इस सूत्र के कुछ उपाय हैं । ये सूत्र हमारे भीतर जाकर कुछ चक्रों पर चोट करना शुरू कर देते हैं । और उन चक्रों की शक्ति ऊपर की तरफ उठनी शुरू हो जाती है ।
ॐ का उपयोग भीतर । उसकी गूंज । शक्ति को ऊपर ले जाने के लिए थी । अकेले ॐ का ही नहीं । मुसलमान कहते हैं - आमीन । वह ॐ का ही रूप है । क्रिश्चियन भी कहते हैं - आमीन । वह ॐ का ही रूप है । अंग्रेजी में शब्द हैं - ओमनी साइट । ओमनी पोटेंट । ओमनी प्रेजेंट । वह सब ॐ से ही बने हुए शब्द हैं । ओमनी साइट का मतलब है - जिसने ॐ को देख लिया । ॐ का मतलब है - विराट ब्रह्म । ओमनी प्रेजेंट का अर्थ है - जो ॐ के साथ मौजूद हो गया । ओमनी पोटेंट का अर्थ है - जो ॐ की तरह शक्तिशाली हो गया । जो परमात्मा के बराबर शक्ति बीज से भर गया । अब यह जो ॐ शब्द है । उसमें ए यू एम, अ ऊ म मूल ध्वनियां हैं । ये ध्वनियां अगर व्यवस्था से गुंजायी जायें । तो ऊर्जा को ऊपर ले जाने लगती हैं । इससे उलटी ध्वनियां भी हैं । जो चोट की जायें । तो ऊर्जा नीचे जाने लगती है । आज अमरीका में जाज है । टि्वस्ट है । शेक है । और जमाने भर के नृत्य हैं । उन सबकी ध्वनि  लहरी । उन सबके रिदम । सेक्स ऊर्जा को नीचे की तरफ ले जाने वाली हैं । इसलिए अगर आप टि्वस्ट देख रहे हों । तो थोड़ी देर में आप पायेंगे कि आपके भीतर टि्वस्ट होना शुरू हो गया । आपके भीतर कोई शक्ति डावांडोल होने लगी । 
आधुनिक जगत में विकसित सभी नृत्य और सभी संगीत की व्यवस्थाएं मनुष्य के काम का शोषण हैं । इसलिए आहार का मतलब बड़ा है । इसलिए जो भोजन हम ले रहे हैं । उसके परिणाम होंगे ही । उसके परिणाम से हम बच नहीं सकते । क्योंकि हमारा पूरा का पूरा जो जीवन यंत्र है । वह साइको केमिकल है । उसमें पीछे मन है । तो नीचे रसायन है । वह रसायन पूरे वक्त काम कर रहा है । केमिस्ट्री हमारे पूरे शरीर में पूरे वक्त काम कर रही है । हम क्या खाते हैं ? क्या पीते हैं ? उसके परिणाम होंगे । 
ऐसे भी भोजन हैं । जो मनुष्य को ज्यादा कामुक बनाते हैं । मधुमक्खियों के छत्ते में एक खास तरह की जैली होती है । मधुमक्खियों के बाबत आपको शायद थोड़ा पता हो कि मधुमक्खियों में एक ही रानी मक्खी होती है । जो बच्चे पैदा करती है । और बाकी सारी मधुमक्खियां मादा स्त्री मधुमक्खी । जो सिर्फ मजदूर का काम करती हैं । उनकी जिंदगी में सेक्स जैसी कोई चीज नहीं होती । फेवरे - जिसने इन मधुमक्खियों का विराट गहन अध्ययन किया है । वह बड़ी हैरानी में पड़ा कि लाखों मधुमक्खियों की जिंदगी में कोई सेक्स क्यों नहीं होता । आखिर वे भी मादा हैं । उनकी जिंदगी में भी सेक्स का यंत्र पूरा है । लेकिन फिर भी सेक्स नहीं है । बात क्या है ? तो उसे बड़ी हैरानी का जो नतीजा निकला । वह यह कि मधुमक्खियां खास तरह की जैली इकट्ठी करती हैं । जो सिर्फ मादा रानी ही खाती है । बाकी सब मधुमक्खियों को सिर्फ तीन दिन के लिए । जन्म के बाद । वह खाने को मिलती है । उसके बाद खाने को नहीं मिलती । उस जैली में ही सारा राज है । इसलिए उस जैली को रिजुवीनेशन के लिए कई पागलों ने प्रयोग किया । आदमी को उसकी गोली बनाकर खिला दी जाये । तो शायद बूढ़ा आदमी जवान हो जाये । उस जैली से बहुत सी क्रीम भी लोगों ने बनाई । और लाखों स्त्रियों के चेहरे पर पोती कि शायद उस जैली से सौंदर्य प्रगट हो जाये । वह जैली विशेष विटामिंस लिए हुए है । जो अति कामुकता पैदा कर देती है । तो वह जो रानी मधुमक्खी है । उसकी कामुकता का हिसाब लगाना मुश्किल है । वह दो हजार अंडे रोज देती है । और देती ही चली जाती है । वह करोड़ों अंडे एक ही मादा पैदा कर देती है । इतनी सेक्स एक्टिविटी उसके भीतर पैदा हो जाती है । और अब तो हम जानते हैं कि हारमोंस की खोज ने बड़ा स्पष्ट कर दिया है कि अगर एक पुरुष को भी स्त्री हारमोंस के इंजेक्शन दे दिए जायें । तो उसका शरीर पुरुष का न रहकर थोड़े दिनों में स्त्री का हो जाएगा । अगर एक स्त्री शरीर को पुरुष  इंजेक्शन दे दिये जायें । तो उसका शरीर थोड़े दिनों में स्त्री का न रहकर पुरुष का हो जाएगा । पैंतालीस से पचास साल के बाद आमतौर से कुछ स्त्रियों को मूंछ आनी शुरू हो जाती है । उसका कुल कारण इतना ही है कि स्त्री हारमोन्स कम हो गए । और शरीर में पड़े हुए पुरुष हारमोन प्रभावी होने लगे । इसलिए मूंछ आनी शुरू हो जायेगी । स्त्रियों की आवाज पचास साल के बाद पुरुषों से मेल खाने लगेगी । उसका कुल कारण यही है कि पुरुष हारमोन और स्त्री हारमोन का अनुपात टूट गया । स्त्री हारमोन कम हो गए । पुरुष हारमोन अनुपात में ज्यादा हो गए । तो आवाज में बदलाहट हो जाएगी । ये सारे केमिकल मामले हैं । हम जो भोजन ले रहे हैं । उस पर बहुत कुछ निर्भर है । हम कैसा भोजन ले रहे हैं ? इस भोजन में यदि मादक तत्व हैं । इस भोजन में यदि मूर्च्छा लाने वाले तत्व हैं । तो वे शरीर ऊर्जा को । काम  ऊर्जा को नीचे की तरफ प्रवाहित करेंगे । इस भोजन में अगर उत्तेजक स्टिमुलेंट हैं । एक्टीवाइजर्स हैं । तो वे शरीर की काम  ऊर्जा को नीचे की तरफ प्रवाहित करेंगे । अगर इस भोजन में ट्रैंकोलाइजर्स हैं । और शामक तत्व हैं । जो कि मन को शांत करते हैं । उत्तेजित नहीं करते हैं । तो वे ऊर्जा को ऊपर की तरफ ले जाने में सहयोगी होंगे । 
यह तो बहुत बड़ी बात है । लेकिन सिद्धांत की बात खयाल में लाई जा सकती है । जो तत्व उत्तेजना देते हों । जो तत्व मूर्च्छा देते हों । मादकता देते हों । जो तत्व शरीर को भारी कर देते हों । मन को बोझिल कर देते हों । उस तरह के भोजन से निरंतर बचना चाहिए । भोजन ऐसा होना चाहिए । जो शरीर को भारी न कर जाये । भोजन ऐसा होना चाहिए । जो शरीर को उत्तेजित न कर जाये । भोजन ऐसा होना चाहिए । जो शरीर को मादकता न दे । मूर्च्छा न दे । तंद्रा और निद्रा लाने वाला न बने ।
तो ऐसा भोजन साधक के लिए सहयोगी होता है । और उसके ऊपर की यात्रा का रास्ता बन जाता है । अगर इसके विपरीत भोजन है । तो साधक की यात्रा कठिन हो जाती है । ऐसा नहीं है कि नहीं हो सकती है । हो सकती है । लेकिन व्यर्थ की कठिनाइयां पैदा हो जाती हैं । गलत भोजन करके भी साधक ऊपर की तरफ जा सकता है । लेकिन व्यर्थ की कठिनाइयां पैदा हो जाती हैं । और जब मैंने आहार की पूरी बात कही । तो इसको भी ध्यान में ले लेना जरूरी है । जो साधक है । जो अपनी काम  ऊर्जा को ऊपर ले जाना चाहता है । वह सभी कुछ नहीं पढ़ेगा । वह सभी कुछ नहीं देखेगा । वह सभी कुछ नहीं सुनेगा ।
वह इस बात का विचार करके सुनेगा कि जो संगीत उत्तेजित करता है । वह व्यर्थ है । जो संगीत शांत करता है । वह सार्थक है । वह ऐसे दृश्य नहीं देखेगा । जो उत्तेजना से भर देते हैं । अब आपने देखा होगा । फिल्म भी अगर आप देख रहे हैं । तो अक्सर वैसी ही फिल्म ज्यादा देखी जाती हैं । जो थ्रीलिंग हैं । जो उत्तेजक हैं । जिनमें आपके रोयें  रोयें खड़े हो जायें । और रोंगटे खड़े हो जायें । जो रोमांचकारी हैं । इसलिए फिल्म का एडवरटाइज करने वाला अपनी फिल्म के एडवरटाइज के लिए लिखेगा कि - ऐसी रोमांचक फिल्म कभी नहीं बनी । आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे । लेकिन जिस फिल्म में आपके रोंगटे खड़े हो रहे हैं । आप गलत आहार कर रहे हैं । वह उत्तेजक है । डिटेक्टिव है । हत्या है । खून है । वह सबका सब आपको उत्तेजना से भर रहा है । अगर फिल्म को देखते वक्त आप किसी दिन फिल्म न देखें । कोने में खड़े हो जायें । और लोगों को देखें । फिल्म मत देखें । तो आपको पता चल जाएगा कि - कौन सी चीज उत्तेजित करती है ? जब उत्तेजना का चित्र आएगा । तो सारे लोग अपनी कुर्सियां छोड़कर रीढ़ को सीधा कर लेंगे । सांसें उनकी ठहर जाएंगी कि पता नहीं सांस के लेने में कोई चीज चूक न जाये । बिलकुल वे थिर हो जाएंगे । जब उत्तेजक चित्र चला जाएगा । फिर वे अपनी कुर्सी पर वापस टिक जायेंगे । फिर वे आराम से देखने लगेंगे । जितनी बार किसी फिल्म में आदमी कुर्सी छोड़कर बैठ जाता है । उतनी ही उसकी सेक्स  ऊर्जा को नीचे की तरफ जाने में सुविधा बनेगी । लेकिन हम रास्ते पर भी सब कुछ देख रहे हैं । बिना फिक्र किए कि सब कुछ देखना अनिवार्य नहीं है । न उचित है । न सब कुछ देखना  पढ़ना अनिवार्य है । न उचित है ।
व्यक्ति को प्रति पल चुनाव करना चाहिए । वह वही भीतर ले जाये । जो उसकी जिंदगी को ऊपर ले जाने वाला है । और अगर उसे जिंदगी को नीचे ही ले जाना है । तो भी सोच समझ कर ले जाये । फिर वही ले जाये । जो नीचे ले जाने वाला है । लेकिन हमें कुछ पता नहीं है । हम अंधों की तरह टटोलते रहते हैं । एक हाथ ऊपर भी मारते हैं । एक हाथ नीचे भी मारते हैं । सुबह चर्च भी हो आते हैं । सांझ फिल्म भी देख आते हैं । चर्च में चर्च की घंटी भी सुन लेते हैं । होटल में जाकर नृत्य भी देख आते हैं । हम इस तरह से अपनी जिंदगी को अपने हाथों से काटते रहते हैं । इस तरह हम अपनी जिंदगी को दोनों तरफ फैलाये रहते हैं । और कहीं भी नहीं पहुंच पाते । निर्णय चाहिए । नीचे जाना है । तो जायें । और पूरा नर्क तक छू कर लौटें । लेकिन तब भी व्यवस्था चाहिए । तब भी साधना चाहिए । तब फिर ऊपर की बातों को छोड़ दें । फिर चर्च की तरफ भूलकर मत देखें । फिर मंदिर की तरफ मुड़कर भी न जायें । फिर कभी गीता से कोई संबंध न बनायें । फिर साधु से बचें । फिर इनको भूल जायें कि ये दुनिया में हैं ।
फिर ये बुद्ध, महावीर, कृष्ण, इनके नाम भी न लें । क्योंकि ये ठीक लोग नहीं हैं । आपकी यात्रा में बाधा बनेंगे । आपको नर्क जाना है । अपनी गाड़ी पकड़ें । और अपनी गाड़ी पर मजबूती से रुके रहें । लेकिन आदमी अजीब है । एक पांव नर्क की गाड़ी पर रखे रहता है । एक पांव स्वर्ग की गाड़ी पर रखे रहता है । कहीं भी नहीं पहुंच पाता । यह सारी जिंदगी एक घसीटन बन जाती है । वह यहां से वहां तक घसीटता रहता है ।
आदमी ऐसी बैलगाड़ी है । जिसमें दोनों तरफ बैल जोत दिए हैं । वे दोनों तरफ खींचते रहते हैं । कभी यह बैल थोड़ा खींच लेता है । फिर मन पछताता है कि नर्क चूक गया । थोड़ा इस तरफ चलें । फिर थोड़ा नर्क की तरफ गए कि फिर मन पछताता है । कहीं स्वर्ग न चूक जाये । थोड़ा उस तरफ चलें । और सारी जिंदगी ऐसे ही बीत जाती है । बैलगाड़ी कहीं पहुंच नहीं पाती । अस्थि पंजर ढीले हो जाते हैं । और बैल मर जाते हैं । फिर नई दुनिया । फिर नई जिंदगी । फिर वही काम । हम पुरानी आदत से शुरू करते हैं ।
यह निर्णय करें कि कहां जाना है ? निर्णय करें । क्या होना है ? निर्णय करें । क्या पाना है ? निर्णय करें । क्या लक्ष्य है ? क्या दिशा है ? क्या आयाम है ? फिर उस निर्णय के अनुसार चलना शुरू करें । उस निर्णय के अनुसार जिंदगी में सब बदलें । आंख, कान, मुंह, हाथ सबको बदलें । फिर वही स्पर्श करें । जो परमात्मा की तरफ ले जाने वाला हो । फिर वही सुनें । जिसकी झंकार प्राणों को छुए । और वह ऊपर उठ आये । फिर वही खायें । जो जीवन को ऊंचा उठाता है । और हल्का करता है । फिर वही देखें । जो आंखों में दीया बन जाता है । और अंधेरे को दूर करता है । और फिर सब कुछ बदल दें । 
मंदिर में भी एक सुगंध है । मुसलमान फकीरों ने कुछ सुगंधें चुनी थीं । इस मुल्क में हिंदू संन्यासियों ने भी कुछ सुगंधें चुनी थीं । उन सुगंधों का कुछ आधार है । उनका कुछ कारण है । जब आदमी किसी गहरे ध्यान में पहुंचता है । तो अक्सर जैसी चंदन की गंध होती है । वैसी गंध से भर जाता है । इसलिए तो मंदिर में हमने चंदन को जलाना शुरू किया कि शायद यह गंध किसी के भीतर की गंध को चोट करे । और स्मरण दिला दे । जब कोई आदमी ध्यान की किसी स्थिति में पहुंच जाता है । तो ऐसी गंध से भर जाता है । जैसे लोबान की गंध होती है । इसलिए मुसलमान फकीरों ने लोबान को चुना कि शायद लोबान की गंध किसी के भीतर सोयी हुई गंध को चोट मार दे । और उठा दे । यह सब कुछ चुनाव है । यह सब अकारण नहीं है । इस सबके पीछे कारण है - ओशो
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