30 जून 2011

तू ही तो असली शंहशाह है

आपे बखसे सबदि मिलाए । तिसदा सबदु अथाहा हे ।
जब वह साहिब किसी कौम को । किसी इंसान को । किसी धर्म मजहब को बख्शना चाहता है । तो वह अपने किसी प्यारे को उस कौम में भेजकर उन्हें समझाता है । हिदायत देता है । लेकिन जितने भी पहुँचे हुये सन्त और कामिल फ़कीर हुये हैं । उन सबका कहना एक समान ही है ।
लेकिन आजकल के जो बनाबटी सन्त फ़कीर वेश धरकर घूमते हैं । उनके सबके धर्म मजहब जातियाँ अलग अलग हैं । अलग वाणी बोलते हैं । अलग ग्यान बताते हैं । राम रहीम में भेद करते हैं । और ये अग्यानी मौत के वक्त एक ही हो जाते हैं । सबका एक ही जैसा हाल तो होता है ।
जितने भी कामिल हुये । पूरे सन्त फ़कीर हुये । सभी ने एक ही बात कही है - किसी कामिल मुर्शिद या पूर्ण सन्त

या पहुँचे हुये फ़कीर से रास्ता ( नाम उपदेश ) लेकर अपनी सुरति को अन्दर होते उस शब्द या कलमे के साथ जोङ दो ।
वे ऐसे फ़कीर सन्त शरीयतों ( कर्मकांड ) को छूते भी नहीं । बल्कि कहते हैं कि अपनी अपनी कौम अपने अपने मजहब अपने देश अपने गांव में रहते हुये ही अन्दर का परदा खोल लो । तुम सबका वह कुल मालिक वाहिद हु ला शरीक एक है । तथा उसका कोई अलग भागीदार नहीं है । वह अथाह है । अपार है । उसकी तालीम कुल आलम यानी सारे संसार के लिये एक ही है । जब वह बख्शता है । तो मनुष्यों के लिये कुछ न कुछ इंतजाम करता है ।
जीउ पिंडु सभु है तिसु केरा । सचा साहिबु ठाकुर मेरा ।
नानक गुरवाणी हरि पाइआ । हरि जपु जाप समाहा हे ।
हे मालिक ! मेरा जीव प्राण पिंड सब तेरा ही तो है । तू ही हमारा ठाकुर है । तू ही तो असली शंहशाह है । मेरा तन मन धन सब तेरा है । मैं तुझमें ही समाया हूँ । मेरा तो बस अब तू ही तू है ।
और तू मिलता किस तरह से है ?
गुरु और उसके नाम उपदेश के जरिये से । क्योंकि और कोई जरिया तो है ही नहीं । जो पाक रूह की दौलत है । वह सारे संसार की एक ही है । एक ही होती है ।
हजरत मुहम्मद साहब अजरत अली को यही समझाते हैं - तू पहुँचे गुरु की शरण ले । भाई ! गुरु के सिवाय तेरा कोई दूसरा नहीं है । इस्लाम के बहुत से फ़िरके ऐसे हैं । जो कहते हैं कि - मुर्शिद या गुरु की कोई जरूरत नहीं है । लेकिन यह अटल सत्य है कि गुरु के वगैर खुदा भगवान नहीं मिलता । फ़िर वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई कोई भी क्यों न हो । सच्चे गुरु के वगैर असली ग्यान और मुक्ति नहीं होती ।
गुफ़्त पैगम्बर अली रा कै अली । शेरे हक्की पहिलवानी पुर रुई ।
अली सच्चा फ़कीर था । बहुत नाम बन्दगी करने वाला सच्चा अभ्यासी था । और बहादुर भी बहुत था । एक बार उसकी टांग में तीर लग गया । जब लोग तीर निकालने लगे । तो बहुत दर्द हुआ । इतना कि उससे सहा नहीं गया ।

लोगों ने पूछा - फ़िर कैसे निकालें भाई ? निकालने में दर्द तो होगा ही ।
तब अली बोला - जब मैं उस मालिक की नमाज में खङा होऊँ । तब निकालना ।
जब वह नमाज पढने लगा । रूह मालिक से लग गयी । और लोगों ने तीर निकाल दिया ।
 तब पैगम्बर साहब बोले - तू शेर है । पहलवान है । लेकिन सच्ची पहलवानी कौन सी हुयी ? किसी मुर्शिद की पनाह में जाना । किसी सच्चे सन्त फ़कीर की शरण में जाना ।
या अली अज जुमलाए ताआते राह । बरगुजी तू सायाए खासे अलाह ।
हे अली ! जो उस रब के खास बन्दे हैं । उनकी पनाह ले । तू उनकी शरण में जा । उनके ही साये में रह ।
तू बरौ दर सायाए आकल गुरेज । ता वही जाँ दुश्मने पिनहाँ सतेज ।
जब तू उनके पास जायेगा । तो काम क्रोध लोभ मोह अहंकार जो तेरे दुश्मन हैं । सब तेरे गुलाम हो जायेंगे । और तेरा कहना मानते हुये तेरे आदेश में ही चलेंगे ।
अज हमह ताआते अनीयत लाइक अस्त । सबक याबी बर हराँ को साबक अस्त ।
चूँ गरिफ़्तो पैरहन तसलीम शौ । हमचो मूसा जेरे हुक्मे खिजरे रौ ।
जब तूने गुरु धारण कर लिया । उसका पल्ला पकङ लिया । तो फ़िर अब कोई उज्र एतराज न कर । चाहे वह जायज ( उचित ) कहें । या नाजायज ( अनुचित ) कहें । ( क्योंकि सच्चे गुरु की हर बात में एक रहस्य छिपा हुआ होता है ) उसके हुक्म को पूरा कर । और ऐसा कोई एतराज न कर । जैसा कि हजरत मूसा ने हजरत खिजर साहब के साथ किया था ।
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हजरत मूसा और हजरत खिजर साहब के बारे में अक्सर लोगों ने पढा होगा । फ़िर भी इस दिलचस्प दास्तान का ब्लाग पर भी प्रकाशन होगा । और कुछ मैटर पहले से भी प्रकाशित है ।

29 जून 2011

पूर्ण और सही हँसदीक्षा की जानकारी

आईये आज आपको पूर्ण दीक्षा के बारे में बताता हूँ ।
चाहे वह द्वैत की कोई भी मंत्र दीक्षा हो । या अद्वैत आत्मग्यान की एकमात्र सत्यनाम महामन्त्र हँसदीक्षा । दोनों में ही एक बात समान रूप से लागू होती है कि दीक्षा लेने वाले को उस ग्यान और गुरु के बारे में पूरी तरह से theory टायप जानकारी होनी ही चाहिये ।
और वह किसी भी तरह से प्रभावित होने के बजाय गुरु और ग्यान के प्रति संतुष्ट होकर दीक्षा ले रहा हो । इसके लिये कम से कम 6 महीने का सतसंग होना आवश्यक होता है । सतसंग का मतलब है । उस ग्यान का सत्य ! जिसको वो अपनाने जा रहा है । धारण करने जा रहा है । अपने जीवन में उतारने वाला है ।
लेकिन हमारे यहाँ सतसंग की यह सुविधा ब्लाग्स के जरिये किसी भी इंसान को घर बैठे । उसके घर आफ़िस या दुकान में आराम से हासिल हो जाती है । कोई भी इंसान आत्मग्यान और हँसदीक्षा के बारे में 6 महीने या अधिक टाइम से श्रद्धालु पाठक होने पर पूरी तरह से जान जाता है । अब आपके ढेरों ई मेल्स से ये प्रमाणित बात हो चुकी है ।
इसके बाद जो भी अन्य प्रश्न या शंकायें पाठक के मन में उत्पन्न होती हैं । उसे वे ई मेल के द्वारा व्यक्त करते हैं । और ब्लाग पर पोस्ट द्वारा उनको उत्तर मिल जाता है । इसका लाभ ये है कि ऐसे ही अन्य प्रश्न रखने वाले पाठकों को बिना पूछे ही उत्तर मिल जाता है ।
इस तरह कोई भी इंसान जब ग्यान और गुरु के प्रति पूरी तरह संतुष्ट हो जाता है । तब उसके शिष्य बनने की बारी आती है ।
अब आईये । इससे आगे क्या होता है । वह आपको बताते हैं ।

जब कोई एक या अधिक इंसान दीक्षा के लिये हमसे अनुमति लेकर समय तय कर देते हैं । तब उन्हें दीक्षा वाले दिन से एक दिन पूर्व श्री महाराज जी के पास आना होता है । वह किसी भी स्थान से आये । एक दिन पहले दोपहर लगभग 1 बजे तक पहुँच जाये । क्योंकि दो तीन घन्टे थकान दूर होकर फ़्रेश होने में आराम से लग ही जाते हैं ।
इसके बाद भले ही आपने पूरा सतसंग जाना हो । पढा हो । श्री महाराज जी अपनी अमृत वाणी से उपदेश रूप में वह ग्यान बताते हैं । बहुत से लोग मैंने देखा है । यहीं चूक कर जाते हैं । पढा या सुना सतसंग । और गुरु द्वारा बोले गये सतसंग ( चाहे अक्षरशः वही क्यों न हो ) में बेहद अंतर होता है । अतः मनमुखता दिखाने या बोरियत महसूस करने के बजाय पूरे श्रद्धा भाव से उसको सुनना चाहिये ।
इस सतसंग में हमारे यहाँ बहुत सी अन्य जानकारी के साथ प्रमुखतया गुप्त आदिनाम की चर्चा और मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य तथा कई आत्मग्यानी सन्तों के दृष्टांत सुनाये जाते हैं ।
इस तरह 1 बजे  से आकर 3 - 4 बजे तक सफ़र आदि के प्रभाव से शांत हुये । और 4 से 6 - 7 बजे तक आपने दिव्य सतसंग सुना । इसके बाद एक दो घन्टे खाना पीना और सामान्य बातें ।
अब आ जाईये । रहस्य वाली बात पर । इससे पहले के सतसंग में महाराज जी के पास अन्य बाहरी लोग भी स्थिति अनुसार बैठे हो सकते हैं । पर 7 - 8 बजे के बाद वही लोग रह जाते हैं । जो यूँ ही या टाइम पास के बजाय सच्चे जिग्यासु होते हैं ।

तब महाराज जी रुहानी अमृतमय सतसंग देते हैं । इससे पूर्ण भाव से समर्पित इंसान को बङी अलौकिकता का अनुभव होता है । ये सतसंग रात 8 बजे से 11 बजे तक चल सकता है । इसके बाद दीक्षा लेने आया इंसान उन्ही श्रद्धामय भक्तिभाव के साथ गुरु जी के पास ही सो जाता है ।
सुबह 5 - 6 बजे उठकर दिनचर्या से निवृत होकर नहा धोकर हँसदीक्षा के लिये तैयार हो जाता है ।
साधक की श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पूर्ण सही हँसदीक्षा सिर्फ़ 5 पुष्प से लेकर 2000 रुपये तक की होती है ।
इसमें निम्न चीजें शामिल होती हैं -
 5 अलग अलग रंग के पुष्प । बाँटने के लिये प्रसाद 10 रुपये से लेकर श्रद्धा सामर्थ्य अनुसार । एक अच्छी अगरबत्ती या धूपबत्ती का नया पैकेट । और गुरु के लिये दक्षिणा 1 रुपये से लेकर श्रद्धा सामर्थ्य अनुसार ।
गुरु के लिये 5 सफ़ेद वस्त्र - कुर्ते का कपङा ( पौने तीन मीटर ) तहमद या लुंगी का कपङा ( सवा दो मीटर ) अंगोछा या साफ़ी का कपङा ( डेढ मीटर ) अन्डरवियर । बनियान ।
इस तरह हमारे मंडल की हँसदीक्षा का पूरा सामान यह होता है ।
हमारे गुरुजी खासतौर पर टेरीकाट मिक्स काटन ( 80% काटन 20% टेरीकाट ) ही पहनते हैं । ये मैं खासतौर पर इसलिये बता रहा हूँ कि जो भी वस्तुयें शिष्य भेंट करता है । उसका भाव यह रहता है कि गुरुजी उसको इस्तेमाल करें । अतः अनुकूल वस्त्र न होने पर गुरुजी शिष्य की भावना पूर्ति के लिये दो चार बार पहनकर उस कपङे को किसी साधु आदि को दे देते हैं ।
वैसे भी गुरुजी अधिकतर भाग्यशालियों के कपङे ही पहन पाते हैं । क्योंकि इतनी बङी संख्या में सभी के कपङे पहनना कैसे संभव है ? अतः वे अन्य साधुओं को दे ही दिये जाते हैं ।
ये सभी सामान दीक्षा वाले कक्ष में रखकर महाराज जी और दीक्षा लेने वाले कक्ष में पहुँच जाते हैं । तब एकाग्रता शांति और हल्के अँधेरे के उद्देश्य से दरबाजा बन्द कर दिया जाता है । ताकि दीक्षा के समय यकायक कोई डिस्टर्ब न कर दे ।

इसके बाद महाराज जी किसी ऊँचे आसन आदि स्थान पर और दीक्षा लेने वाले शिष्य नीचे चटाई पर बैटते हैं । सभी को मौसम के अनुसार एक शाल जितना बङा कपङा सिर पर डालने के लिये दिया जाता है । सर्दियों में गर्म शाल दी जाती है । ताकि दीक्षा लेने वाला सर्दी महसूस न करे । गर्मियों में सादा कपङा ।
इसके बाद महाराज जी थोङा सा और उपदेश बताते हैं । और इसके बाद आपकी चेतनधारा में गूँजते गुप्त निर्वाणी आदि नाम को ।
अब मुख्य बात आती है । नामदान आपको मिल ही गया । अब दोनों हाथों की उंगलियों से आँख । उंगलियों से ही कान । और उंगलियों से ही मुँह भी बन्द कर लेते हैं । आँख और मुँह स्वाभाविक तरीके से भी बन्द करके ऊपर से उँगलियाँ रखें । जैसा अक्सर सही मेडीटेशन में होता है । और महाराज जी द्वारा बतायी जगह पर ध्यान दें ।
विशेष - मैंने इस बारे में बहुत समझाया । फ़िर भी ज्यादातर लोग अक्सर ये गलती करते हैं कि वे सोचने लगते हैं कि सतसंग में बताये अनुसार या ब्लाग में पढे अनुसार अब ध्यान में ये दिखायी देगा । वो दिखायी देगा । ऐसे अनुभव होंगे । वैसे अनुभव होंगे ।
बस यही बहुत बङी चूक हो जाती है । ऐसा पक्का भाव बनते ही " मैं " खङा हो जाता है । और होने वाले अनुभव मामूली ही रह जाते हैं । क्योंकि -
जब " मैं " था तब हरि नहीं । जब हरि हैं मैं नाहिं । सब अँधियारा मिट गया । जब दीपक देख्या माँहि ।
वास्तव में यहाँ आपको एकदम कोई भाव न रखते हुये गुरु में पूर्ण समर्पण करते हुये अपने आपको ढीला छोङ देना है । तब गहन अनुभूति अनुभव उसी समय हो जाते हैं । अन्यथा बाद में अभ्यास करने पर धीरे धीरे होते हैं ।
ये आपकी वास्तविक हँसदीक्षा ( आत्मा का दिखना ) होने लगी । अब इसमें किसी को थोङे अनुभव ( ठीक इसी समय से ) 20 मिनट तक ही हो पाते हैं । और बहुत से 1 घंटा तक अनुभव करते हैं । इस तरह आपकी हँसदीक्षा पूरी हुयी ।
इसके बाद दीक्षा लेने वाले को सामर्थ्य अनुसार । 1 से लेकर जितने वह चाहे । ब्राह्मणों ( जाति से ब्राह्मण नहीं । बल्कि दीक्षा प्राप्त दीक्षित । बृह्म + अणि ( स्थित ) = ब्राह्मण ) को भोजन कराना श्रेष्ठ होता है ।
और इसके बाद शाम को भजन कीर्तन करा के प्रसाद आदि बाँटना ।
इस तरह ये मैंने पूर्ण दीक्षा के बारे में आपको बताया ।
अब कुछ अलग शंकायें जो अक्सर पाठक पूछते हैं ।
- कोई लेडी मासिक धर्म के दौरान दीक्षा नहीं ले सकती । लेकिन गर्भवती होने पर कोई बात नहीं । उल्टे उसके गर्भस्थ शिशु को भी नामदान मिल जाता है ( क्योंकि गर्भस्थ शिशु और माँ का एका होता है ) इससे दिव्यगुण वाली संतान पैदा होती है ।
- यदि शराब और मीट खाने से मजबूर हैं । तो भी कोई बात नहीं आप नामदान ले सकते हैं ।
- यदि आप हिन्दू नहीं है । और सिख मुसलमान ईसाई यहूदी पारसी अरबी अंग्रेज कोई भी हैं । मगर इंसान हैं । तो आप भी दीक्षा ले सकते हैं ।
- दीक्षा के बाद आपको sex बन्द करके बृहमचर्य से रहना होगा । ऐसी कोई बात नहीं । ये शरीर की आवश्यकता है । नाम भक्ति से इसका कोई लेना देना नहीं ।
- आप किसी और गुरु से दीक्षा ले चुके हैं । मगर असंतुष्ट हैं । तो आप संतुष्ट न होने तक 1000 गुरु बना सकते हैं । यानी दीक्षा ले सकते हैं । इसमें कोई गलती या पाप नहीं होता ।
- दीक्षा के बाद आपको किन्ही विशेष नियमों जैसे ध्यान पर घंटों बैठना आदि आवश्यक नहीं होता ।
- एक ही परिवार के अधिक लोग यदि एक साथ दीक्षा ले रहे हों । तो सबको बराबर उतने ही सामान की आवश्यकता नहीं होती । सिर्फ़ हरेक शिष्य को गुरु दक्षिणा अलग अलग देनी होती है । बाकी गुरु के वस्त्र । प्रसाद । ब्राह्मणों को भोजन आदि सबका एक साथ उसी में हो जाता है ।

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अब मेरी बात - अक्सर दीक्षा लेने के उत्सुक लोग फ़ोन पर इस तरह के प्रश्न पूछते रहते हैं । अतः उनका धन और समय का व्यय होता है । मुझे भी बारबार समझाना होता है । अतः आप सभी के लिये अधिकाधिक जानकारी प्रकाशित कर रहा हूँ । जय जय श्री गुरुदेव । जय गुरुदेव की ।

real name is in every man, not in religion

रस कस खाए पिंडु बधाए । भेख करै गुरु सबदु न कमाए ।


जीवन में न तो गुरु मिला । और न ही गुरु की बात मानी । और न ही ( मोक्ष ) मार्ग मिला । सारी उमर ऐश आराम बिषय भोग में ही व्यर्थ गुजार दी । वास्तविकता में अपने लिये कुछ ( अक्षय धन या नाम कमाई जो परलोक में काम आती है ) भी न कमाया । खाली हाथ आया । और खाली हाथ चला गया । अगर किसी के घर में करोंङो रुपया दबा हो । पर उसको पता न हो । और न ही वो उसको निकाल पाये । और माँगते खाते हुये गरीबी में ही मर जाय । तो वह खाली हाथ आया । और खाली हाथ ही चला गया ।
ये इंसान चाहे कितने ही धर्म मजहब अपना ले । कितनी ही जाति कौम का हो जाय । कितने ही तरह के वेश ( धर्म के अनुसार वेशभूषा के कपङे पगङी टोपी और धार्मिक प्रतीक धारण करना ) बना ले । मगर उससे कुछ होने वाला नहीं है । अगर कोई आदमी दरोगा की ड्रेस पहन ले । तो क्या वह दरोगा हो जायेगा ?
इसी तरह जब तक नाम अन्दर नहीं आया । तो समझो । अभी कोई बात नहीं बन पायी ।
जिस प्रकार विध्य़ा की दौलत बिना मेहनत के नहीं मिलती । उसी प्रकार ये नाम की दौलत भी मेहनत और अभ्यास से ही प्राप्त होती है । यह कमाई की चीज है ।
पर यह मनुष्य विषय विकार में ही लगा रहता है । नाम की कमाई नहीं करता । तब इसका क्या हाल होगा ?


अंतरि रोगु महा दुखु भारी । बिसटा माहि समाहा हे ।

ये जीव ( मनुष्य ) बीमारी ( अपना भवरोग दूर करने के लिये ही खास इसे मनुष्य जन्म मिला था । ताकि अनगिनत जन्मों से भोगते 84 लाख योनियों के महा दारुण कष्ट से छूट सके । ) की हालत में आया था । और बीमार ही चला जाता है । इसकी आत्मा परदों में ढकी हुयी ही आयी थी । और परदे में ढकी ही चली गयी । आना जाना व्यर्थ रहा । अन्दर जो उद्धारक नाम था । उसका कोई फ़ायदा नहीं ले पाया । खोटे खोटे कर्मों में ही जीवन गंवाया । और आगे गन्दे गन्दे 84 लाख योनियों के कष्ट भोगने के लिये फ़िर से चला गया । क्योंकि जीवन में न निर्वाणी नाम मिला । न ही गुरु मिला ।
वह नाम न हिन्दी बोली में है । न अंग्रेजी । न तुर्की । न अरबी । न फ़ारसी । न और ही किसी बोली में । और न ही वह लिखने पङने में आता है । न ही बोलने में आता है । इसलिये दुनियाँ ( के सभी लोग ) किताबों ( धर्म पुस्तकों ) में लिखे नाम राम कृष्ण अल्लाह खुदा गाड आदि को ही पढ पढकर चली गयी । पर अविनाशी नाम जो स्वतः उसके घट में गूँज रहा है । नहीं जान पायी ।


बेद पङहि पङि बादु बखाणहि । घट महि बृहमु तिसु सबदि न पछाणहि ।

चाहे मनुष्य चारों वेद क्यों न पढ ले । बिलकुल उसका पंडित ग्यानी ही बन जाय । और वेद पढ पढकर कितने ही वाद विवाद क्यों न कर ले । उनमें जीतकर श्रेष्ठ भी हो जाय । पर जब तक इसकी सुरति अन्दर घट में खुद ही होते शब्द ( अविनाशी नाम ) से नहीं जुङती । तब तक इसके उद्धार और फ़ायदे की कोई बात नहीं बनती ।
कबीर साहब ने क्या खूब कहा है - नाम लिया तिन सब लिया चार वेद का भेद । बिना नाम नरके पङा पढ पढ चारो वेद ।
अगर वेद पढने से ही मुक्ति मिलती । तो रावण को मिलनी चाहिये थी । क्योंकि वह चारों वेदों का प्रकांड पंडित और ग्यानी था । रावण ने न सिर्फ़ चारों वेदों का गहन अध्ययन किया था । बल्कि वह उनका भाष्यकर्ता भी था । टीकाकार पंडित भी था ।

परन्तु उसकी करनी क्या थी ? परायी स्त्रियों को चुराता था । वही रावण जिसका पुतला दशहरा पर हर साल जलाया जाता है । इसलिये मुँह जबानी पढने से तोता रटन्त से कुछ भी हासिल न होगा ।
इसी संबन्ध में तुलसीदास कहते हैं -

चार अठारह नौ पढे । षट पङ खोया मूल । सुरति शब्द चीन्हे बिना । ज्यों पँछी चंडूल ।

अगर कोई चारों वेद पढ ले । 18 पुराण ( मुख्य पुराण 18 ही हैं ) भी पढ ले 6 उपनिषद ( मुख्य उपनिषद 6 ही हैं ) भी पढ ले । और 9 व्याकरण भी पूरी तरह से पढ ले ।
परन्तु अगर आत्मा शब्द के साथ नहीं जुङी । तो फ़िर वह कैसा ग्यानी है ? वह फ़िर ऐसा ग्यानी हुआ । जैसे चण्डूल होता है ।
चण्डूल एक चिङिया होती है । इसकी खासियत ये होती है कि ये किसी की भी आवाज सुनकर उसकी हूबहू नकल कर लेती है । दूसरे कौआ चिङिया पक्षी आदमी ( आदमी की कुछ विशेष प्रकार की रोने बुलाने जैसी आवाजों की नकल )  तथा बहुत से अन्य जानवरों की नकल करने में इसे महारत हासिल होती है । इससे वनीय क्षेत्र में जाने वाले बहुत से लोग धोखा खा जाते हैं । इसी से बनाबटी आवाज के द्वारा धोखा देने के कारण इसका नाम चांडाल ( दुष्ट व्यक्ति ) के आधार पर चण्डूल कहा जाता है ।
इसी तरह अगर अविनाशी निर्वाणी नाम नहीं मिला । और वेद पुराण गीता कुरआन बाइबिल श्री गुरुगृँथ साहिब आदि धर्म पुस्तकें पढ पढकर लोगों के साथ वाद विवाद बहस करता रहा कि वेद बङे है । कि कुरआन बङी है । कि बाइबिल बङी है । तो ऐसा पंडित ग्यानी इंसान उसी चण्डूल पक्षी की भांति है । जो खुद तो धोखे में है ही । दूसरे बहुत से अन्य को भी धोखे में डाल रहा है ।
मगर प्रत्येक इंसान चाहे वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई पारसी यहूदी कोई भी क्यों न हो । उसके घट के अन्दर स्वतः गूँजता निर्वाणी नाम खुद एक प्रमाण है । अतः उसके लिये प्रमाण देने की क्या आवश्यकता है ।

नाम और दिव्य प्रकाश हर इंसान के अन्दर है । न कि किसी विशेष जाति धर्म की बपौती ।
 Divine Light and real name is in every man, not in religion.

बस आवश्यकता उसे जानने की है । वही मोक्ष और अक्षय सुख को देने वाला है ।
एक पशु वाला पशु चराकर आ रहा था । तभी किसी राहगीर इंसान ने पूछा - ये किसके पशु हैं ?
वह बोला - एक मेरे चाचा का है । एक मेरे ताऊ का है । बाकी और किस किसके हैं ? मुझे पता नहीं ?
इसी तरह - हे अग्यान नींद में सोये मनुष्य ! अगर तूने अन्दर का परदा न खोला । फ़िर सोच तेरा क्या है ?

27 जून 2011

अगर जरा भी भेद खोलूँ तो सब काफ़िर से मोमिन हो जायँ ।

सदा कारजु सचि नाम सुहेला । बिनु सबदै कारज केहा हे ।
हे भाईयो ! परमात्मा से मिलाने वाला ये शब्द ( नाम ) ही है । और जिसे ये शब्द नाम सच्चे सदगुरु से नहीं मिला । उसका परमात्मा से मिलाप किस तरह हो सकता है ? बिना सदगुरु के न कोई आज तक अन्दर गया है । न कभी जा पायेगा ।
संत शम्स तबरेज ने भी यही कहा है - आँ बादशाहे आजम दरे बस्त बूद मुहकम । 
परमात्मा ने हमारी आँखों के पीछे परदा डालकर हमें बाहर निकाला है । और उसे कब और किस तरह किस नियम से खोलता है - पोशीदा अलूके आदम यानी कि बरदर आमद ।
जब वह खुद मनुष्य का चोला पहनकर गुरु बनकर आता है । और उसका सत्य उपदेश क्या है - खामोश पंज नौबत बिशनोज आसमाने । का आसमाने बेरूँ जाँ हफ़्तो ई शश आमद । 
यानी चुपचाप होकर अन्दर की तरफ़ ध्यान दे । तेरे अन्दर पाँच आसमानी शब्द हो रहे हैं । खामोशी में वे सुनाई देंगे । जब वह यहाँ दोनों आँखों से 6 चक्रों के ऊपर चढेगा । जब तक वह यहाँ नहीं आता । तब तक जबानी लफ़्ज ही लफ़्ज हैं । मनुष्य सारी उमर किताबी शब्दों को जप जप कर मर जाये । कुछ हासिल नहीं होगा । किताबी नाम जबानी नाम वास्तविक नाम नहीं है ।
आमद निदाए बेचु न आज दरूँ न बेरूँ । अर्थात वह प्रेम की तान वह मीठी मीठी धुन आ रही है । पता नहीं कहाँ से आ रही है । पर आ जरूर रही है । बस उसको ही सुनने से परमात्मा मिलता है । वह श्ब्द धुनि ही प्रेम डोर है ।
न अज चपो न अज रास्त । नै अज बराबर आमद । यानी न दाहिनी ओर से । न बांयी ओर से । न सामने से । न पीछे से । फ़िर किस ओर से आती है वह धुन ?


गोई कि आँ वेह सुएस्त । आँ सू कि जुस्तजुएस्त । गोई कुजा कुनम रू आँ । सुए कि आँ वेह आमद ।
जिस ओर से हमें उस मालिक की तलाश है । उस आसमानी शब्द नाम धुन के साथ रूह को जोङ दो । और उसके ही साथ साथ आगे चलते जाओ ।
दस्तूर नेस्त जाँ रा । कि बिगोयद ई बयाँ रा । वरना ज कुफ़्र रस्ते हर जा कि काफ़िर आमद ।
वह धुन ऐसी मीठी है । उसकी ऐसी ताकत है कि मुझे अन्दर से ( परमात्मा के नियम अनुसार ) इजाजत नहीं कि मैं उसका भेद खोलूँ । अगर जरा सा भी उस रहस्य को जाहिर कर दूँ । तो सारी दुनियाँ ही मोमिन हो जाये । और कोई भी काफ़िर न रहे ।
श्री गुरु गृंथ साहिब में कहा है -
नाम के आरे सगले जंत । नाम के बारे खंड बृह्मंड । नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ।
वह नाम सबके ( हर इंसान के । चाहे वह किसी धर्म जाति का हो ) अन्दर है । जिसको वह नाम नहीं मिला । उसका दुनियाँ में जन्म लेना ही फ़िजूल हो गया । जैसे कुत्ता बिल्ली सुअर गधा ऊँट बन्दर अपना जन्म बरबाद करके चले गये । वैसे ही तू भी बेकार ही चला जायेगा । उस रुहानी अमर शब्द की लज्जत न पा सका । तो तुझे मुक्ति नसीब नहीं होगी ।
बिनु सबदै अंतरि आनेरा । न वसतु लहै न चूके फ़ेरा । 
सतिगुरु हथि कुंजी होरतु दर खुल्है नाहीं । गुरु पूरे भागि मिला वणिआ ।
जब तक नाम नहीं मिलता । मनुष्य अंधा ही आता है । अँधा ही चला जाता है । यह चाबी सतगुरु के हाथ में है । जब तक गुरु चाबी नहीं लगायेगा । अन्दर का परदा अन्दर का गुप्त द्वार नहीं खुलेगा । अतः ऐसे सत्य शब्द मार्गी गुरु नाम अभ्यासी गुरु की तलाश पूरे जतन से करो ।


इस दुनियाँ को पैदा करने वाली ताकत शब्द है । शब्द ही मुक्ति का दाता है । शब्द से खंड बृह्मांड की सत्ता संचालित हो रही है । अगर मनुष्य जन्म पाकर भी अभागे तूने शब्द ( नाम ) नहीं पाया । तो इस जन्म लेने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ । अगर कोई मनुष्य इस दुनियाँ से खुशी खुशी मरकर जाता है । तो वह केवल शब्द का अभ्यासी ही होता है । जिसे मरने में भी आनन्द आता है । बाकी दुनियाँ के सब लोग चाहे वह बादशाह हो । या भिखारी । मरते समय रोते बिलखते हुये ही भयंकर यमदूतों के हाथ पिटते हुये जाते हैं । 
लेकिन इस भेद को छुपाया क्यों जाता है ?
गुरु नानक साहब कहते हैं - जिनि हरि पाइओ । तिनहि छिपाइओ ।
कबीर साहब कहते हैं - राम पदारथ पाय के कबिरा गांठ न खोल ।
अब जो कोई व्यक्ति पारबृह्म सत्ता में शब्द द्वारा जाता है । उसकी कीमत कौन कर सकता है ? अगर बहुत से अनपढों के बीच एक विद्वान आ जाये । तो उसकी विद्वता कैसे वे जानेंगे ?
गुरु नानक साहब कहते है - अखी बांझहु बेखणा बिनु कंता सुतणा । 
फ़िर भी लोगों ने संतो के साथ क्या बर्ताव किया ? गुरु नानक साहब के साथ क्या क्या न किया । हजरत मुहम्मद साहब को मक्के से निकालकर मदीना भेज दिया । एक गुफ़ा में उन्हें तीन दिन तक भूखे रहना पङा । हजरत ईसा को सूली पर चङा दिया गया । शम्स तबरेज की खाल खींची गयी । अतः ये नाम सबको नहीं दिया जाता है । जो इसकी कदर करते हैं । जो इसका महत्व जानते हैं । यह उन्हीं को मिलता है ।
सपा बाङ समुंद घर शेराँ पए बुकन । जे जम होवे पाहरू प्रेमी न सकन । 

26 जून 2011

around the world - 3 घुमक्कङ

1 - घुमक्कङ देवता - संदीप पंवार

शास्त्रों में अभी तक 33 करोङ देवताओं का ही जिक्र है । पर आज मैं आपको 33 करोङ 1 यानी एक नये देवता के बारे में बताता हूँ । इस घुमक्कङ देवता का नाम जाट देवता है । वैसे आप लोग इन जाट देवता को अच्छी तरह से जानते होंगे ।
नही भी जानते होंगे । तो ये जाट देवता बाइक पर घूमते हुये आपके क्षेत्र में कभी घूमने आ ही जायेंगे । क्योंकि ये " अथातो घुमक्कङ जिग्यासा " वाले राहुल सांस्कृत्यायन जी की तरह घूमने के बेहद शौकीन है । संदीप पंवार जी नाम के ये जाट देवता । लोनी बोर्डर । गाजियाबाद के रहने वाले हैं । और अपनी तारीफ़ में कुछ इस तरह कहते हैं । कहते ही नहीं बल्कि अमल भी करते हैं ।
 वह आप भी देखिये - मैं..कंजूस । मेहनती । मनमौजी । पक्का घुमक्कड हूँ । चाय । बीडी । सिगरेट । गुटका । पान । तम्बाकू । अंडा । मीट । मछली । शराब व रिश्वत से सख्त नफ़रत करता हूँ ।
खैर..अपने इसी घुमक्कङी शौक के चलते इनकी मित्रता एक घुमक्कङ देवी दर्शन कौर धनौए जी से भी है । जो कि मेरी भी मित्र हैं । अब चलते चलते एक गाना याद आ रहा है - आदमी मुसाफ़िर है । आता है । जाता है । आते जाते बस यादें छोङ जाता है । आप सभी के साथ । ऐसा ही प्रेमयुक्त सफ़र - ब्लाग- जाट देवता का सफ़र ( इनके ब्लाग पर जाने के लिये यहाँ क्लिक करें )

2 - मुसाफ़िर हूँ यारो - नीरज जाट

सैर कर दुनियाँ की गाफ़िल जिंदगानी फ़िर कहाँ । जिंदगानी गर रही तो नौजवानी फ़िर कहाँ । शायद यही बात नीरज जी के दिल में उतर गयी । और उन्होंने दुनियाँ की सैर करने की ठान ली । दिलवालों की दिल्ली में रहने

वाले पेशे से इंजीनियर श्री नीरज जाट जी गोल गोल घूम रही प्रथ्वी पर स्केटिंग सी करते हुये घूमते ही रहते हैं । और अपने अनुभवों से घुमक्कङी का यह महँगा शौक सस्ते में किस तरह से हो जाये । सबको बताते हैं ।
घूमने के शौकीनों के लिये इनके ब्लाग पर बहुत मसाला टिप्स मौजूद है । और फ़िर भी कोई दिक्कत लगे । तो इनका फ़ोन नम्बर है ही । बस आपको ट्रिन ट्रिन करने की देर है । इनका कहना है कि - घुमक्कडी जिंदाबाद ! बेशक पर्यटन एक महंगा शौक है । उस पर समय खपाऊ और खर्चीला ।
जबकि घुमक्कडी इसके ठीक विपरीत है । यहां पर आप देखेंगे । किस तरह कम समय और सस्ते में बेहतरीन घुमक्कडी की जा सकती है । घुमक्कडी के लिये रुपये पैसे की जरुरत नहीं है । रुपये पैसे की जरुरत  है । बस के कंडक्टर को । जरुरत है । होटल वाले को । अगर यहीं पर कंजूसी दिखा दी । तो समझो घुमक्कडी सफल है । इनके ब्लाग - घुमक्कडी जिन्दाबाद मुसाफ़िर हूँ यारो । ( इनके ब्लाग पर जाने के लिये यहाँ क्लिक करें )
 फोन - 0 99993 99632    

3 - घुमक्कङ देवी - दर्शन कौर

और अब मिलिये । तीसरी घुमक्कङ बसई मुम्बई निवासी दर्शन कौर धनोए  से दर्शन कौर जी खुशदिल और भावुक महिला हैं । ब्लाग जगत में बहुत कम समय में इन्होंने अपनी अच्छी पहचान बनाई । और आप सब जानते ही है । ये मेरी दोस्त भी हैं ।
जब मैंने इनको दोस्त मानते हुये दोस्ती का प्रस्ताव किया । तो उसे दर्शन कौर जी ने सहर्ष कबूल किया । मैंने सोचा था कि दर्शन कौर जी अन्य महिला ब्लागरों की तरह कवितायें ही शायद अधिक लिखें । पर इन्होंने यात्रा विवरण । संस्मरण । कविता । विचार विमर्ष आदि सब पर लिखा । और लिख रहीं हैं । इसलिये मैंने इन्हें ब्लागर के बजाय रिपोर्टर कहना शुरू कर दिया । चलिये देखते हैं । दर्शन जी इसके बारे में क्या कह रहीं हैं ।


- मेरे मन में बहुत से अरमान हैं । बस उन्हें ही पूरा करने की कोशिश करती हूँ..। और कोई काम धाम नहीं करती ।  मन से बहुत भावुक हूँ..। लेकिन झगङालू भी बहुत हूँ ।  खुश रहती हूँ । तो इसमें किसी के बाप का क्या जाता है । इसलिए चाहती हूँ कि सब खुश रहे..। अब फ़िर भी नहीं रहते । तो मेरी बला से । मेरा जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर शहर मे 28 मार्च को हुआ । पर सिर्फ़ जन्म ही हुआ है । क्योंकि मेरा एक पाँव चीन में तो दूसरा जापान में रहता है । शिक्षा मनासा और मंदसोर में हुई । पर कौन बोरिंग पढाई करता । स्कूल बंक करके घूमती थी । फिलहाल बॉम्बे मे रहती हूँ..। बचपन से घूमने का शौक है..। पहाडों पर मेरा दिल बसता है..। वही बसने का अरमान है...। न जाने कब पूरा होगा .. । सपने बहुत है....?
एक बार मैं इनके सपने में गया । तो सपने में भी ये माउंट एवरेस्ट पर बैठी थी । मैंने कहा - दर्शन जी ! यहाँ क्या कर रही हो ?
तो दर्शन जी बोलीं - मैं कुतुबमीनार के टाप फ़्लोर से ताजमहल देखना चाहती थी । लेकिन वहाँ के डयूटी गार्ड ने ऊपर जाने ही नहीं दिया । इसलिये यहाँ आ गयी । अब कोई मुझे रोक के दिखाये । मैं यहाँ से ताजमहल देख रही हूँ ।
मैंने कहा - लेकिन दर्शन जी आपको तो गर्मी में भी ठंड लगती है । फ़िर यहाँ ठंडा ठंडा कूल कूल में क्यों आ गयीं ?
तब उन्होंने कहा - राजीव जी ! मैं पागल नहीं हूँ । इसीलिये तो सपने में आयी हूँ ।
इनका ब्लाग - मेरे दिल के अरमान ( इनके ब्लाग पर जाने के लिये यहाँ क्लिक करें )
और अंत में - हे घुमक्कङो ! धन्य है आपकी पत्नियाँ । और धन्य हैं आपके देव पति । बेचारे कितने सहनशील धीरज धैर्य वाले प्राणी हैं । जो आपका पाँव घर में टिकता नहीं । तो भी उन्हें कोई शिकवा नहीं ।

25 जून 2011

आत्मा मुक्त रूप में बहुत शक्तिशाली होती है

आत्मा के मुख्य रूप से पाँच प्रकार होते हैं । परमात्मा । आत्मा । शिव आत्मा । बृह्म आत्मा और जीव आत्मा
परमात्मा के विषय में प्रायः सभी अपने अपने स्तर से जानते ही है । सबकी मालिक और साहिब के नाम से पुकारी जाने वाली ये शक्ति सर्वोपरि ही है । और सबसे परे है । इसी की सत्ता सर्वत्र है । और दृश्य अदृश्य सभी कुछ इसी से है । लेकिन कमाल की बात है । परमात्मा को किसी से कुछ भी लेना देना नहीं है ।
मैं जिस निर्वाणी ध्वनि रूपी और शरीर के अंतर आकाश में स्वतः गूँजने वाले नाम का जिक्र करता हूँ । वह हँस दीक्षा के समय उल्टे रूप में दिया जाता है । तुलसीदास जी ने इसी के लिये कहा है -
उल्टा नाम जपा जग जाना । वाल्मीकि भये बृह्म समाना ।
ये उल्टा नाम सामान्य स्थिति में प्रत्येक 4 सेकेंड में 1 बार हमारे शरीर में उतरती चेतनधारा में स्वतः आ जा रहा है इस तरह 24 घंटे में इसकी गिनती 21600 बार हो जाती है ।
भाव पूर्ण ढंग से सुमिरन करते करते जब ये नाम सूक्ष्मता को प्राप्त होकर बृह्म में ऊपर उठता है । तब ये उल्टे से सीधा हो जाता है । और आत्मा मुक्त आकाश में अति आनन्द का अनुभव और विभिन्न रोमांचक स्थलों की सैर करती हुयी हँसो..हँसो कहती हुयी यात्रा करती है । और ज्यों ज्यों ऊपर उठती जाती है । ये सूक्ष्म होती जाती है ।

सुमिरन द्वारा साधक इस नाम को जितना सूक्ष्म कर लेता है । उतना ही गहरा ध्यान समाधि को प्राप्त करता है । उतने ही विलक्षण अनुभव उसे होते हैं । और सबसे अंत में सार शब्द पर पहुँचकर जो वास्तविक नाम है । ये परमात्मा का साक्षात्कार करती है । जिसके लिये कबीर साहब ने कहा है - आङा शब्द कबीर का । डारे पाट उखाङ ।
मतलब ये जन्म मरण रूपी जीवन चक्की का पाट ही उखाङ कर फ़ेंक देता है । इस तरह ये हँस दीक्षा से परमात्मा तक का सफ़र मैंने संक्षेप में बताया ।
इसके बाद सिर्फ़ आत्मा मुक्त रूप में बहुत शक्तिशाली होती है । क्योंकि इसमें कोई भी भाव नहीं जुङा है । और ये हर तरह से निर्विकार है । इसकी अखिल सृष्टि में सर्वत्र गति होती है । ये परमात्मा से कभी भी मिल सकती है । खास बात यह होती है कि इसमें देव बृह्म जीव शिव आदि कोई भी भाव नहीं जुङा होता ।
शिव आत्मा - अर्थात सबके अन्दर जो चेतन शक्ति कार्यरत है । और सदा ही कल्याणकारी शक्ति है । शिव शक्ति है । और जो सबका ही आत्मा भी है । वही  शिव आत्मा है । इसी आत्मा के योग को शिव योग भी बोला जाता है । इससे ठीक ऊपर सार शब्द है । और उससे ऊपर परमात्मा ।
बृह्म आत्मा को जानना कोई अधिक कठिन नहीं है । बृह्म सत्ता के अंतर्गत आने वाली आत्माओं को बृह्म आत्मा कहते हैं ।
फ़िर देव आत्मा महा आत्मा सिद्ध आत्मा आदि बहुत प्रकार हो जाते हैं । जो सब बृह्म के अंतर्गत ही आते हैं ।
जीव आत्मा के बारे में आप सभी जानते ही हो । जीव या जीवन या किसी भाव में जीने की इच्छा भाव जुङने से आत्मा जीव आत्मा हो जाती है ।

आत्मा के बारे में सबसे बङा रहस्य यह है । जो आज मैं पहली बार बता रहा हूँ कि डर उत्पन्न होने से इसमें मैं या जीव भाव पैदा होता है । डर भाव उत्पन्न होने से इसमें एक संकुचन पैदा होता है । जिससे ये सिकुङती है । और निडरता निर्भयता से ये फ़ैलती है । विस्तार लेती है ।
इच्छा पैदा होते ही इसमें आवरण बनने लगते हैं । और तम भाव पैदा होने से इसका प्रकाश और शक्ति इच्छाओं से बने आवरण के अनुसार न्यूनतम हो जाती है । आत्मा परमात्मा को जानने का सरल और सहज उपाय निर्वाणी नाम ही है ।
कुछ लोग ये कहते हैं कि ये बात सच है । इसको हम किस तरह मानें ?
इसका उत्तर यही है भाई ! कोई आपके शरीर के अन्दर और सभी मनुष्यों के शरीर के अन्दर ध्वनि रूपी नाम को किसी जादू से तो प्रकट नहीं कर सकता । चाहे वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई यहूदी पारसी कोई क्यों न हो ।
सदगुरु से ही यह नाम मिला है । इसकी पहचान क्या है ?
यह नाम किसी न किसी रूप में विभिन्न अनुकूल परिवर्तन आपके जीवन में लाने लगता है । और ध्यान सुमिरन के समय आपको दिव्य अनुभव होने लगते हैं । लेकिन यहाँ एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये सत्यनाम साधक का ( भव ) रोग दूर करता है । अतः संस्कार के अनुसार सुख दुख दोनों के ही अनुभव होते हैं । क्योंकि साधक के संस्कार जलते है । अतः जिस प्रकार इलाज के दौरान कभी कभी कष्ट भी होता है । उसी प्रकार संस्कार के अनुसार आपको सुमरन से भी ऐसा ही अनुभव हो सकता है ।
लेकिन कुछ समय के सुमरन के उपरांत नाम आपको सुखी करने लगता है ।
निज अनुभव तोहि कहूँ खगेसा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा
उमा कहहुँ मैं अनुभव अपना । सत हरि नाम जगत सब सपना
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल जीव उद्धारी ।

24 जून 2011

महाराज जी आज 25 june को अम्बाला में

ये लेख जब तक आप देख रहे होंगे । तब तक श्री महाराज जी अम्बाला पहुँच चुके होंगे । जैसा कि पूर्व लेख में ( जो नीचे फ़िर से प्रकाशित है ) मैंने सूचित किया था । महाराज जी 25 june  को अम्बाला आयेंगे । तीन दिन पहले श्री महाराज जी आगरा आ गये थे । और कल 24 june की रात अम्बाला चले गये । ये तीन दिन बहुत ही दिव्यता वाले और आनन्द भरे रहे । जो कुछ बात सतसंग आदि हुयी । समय समय पर आपसे शेयर करूँगा ।
केवल एक खास सूचनात्मक चौंकाऊँ रहस्य की बात अभी बता देता हूँ । जो सतसंग के दौरान महाराज जी ने कही । हालांकि उनकी सभी बातें रहस्य की परतें खोलने वाली ही होती है । वह बात यह थी कि - जो लोग श्रीमदभगवत गीता पढना पसन्द करते हैं । वो एक बार सन्त ग्यानेश्वर जी की गीता टीका अवश्य पढें । इस गीता टीका में श्लोंकों की सही और स्पष्ट व्याख्या है । अब रहस्य की बात ये थी । जो कि मेरे लिये भी नई थी । सन्त ग्यानेश्वर जी का जन्म नहीं हुआ था । बल्कि वे प्रकट हुये थे । और इससे पहले वाले जन्म में जो गीता टीका उन्होंने लिखी थी । वह गलत थी । इसलिये अपने अल्प समय के जीवन में वो मात्र इसी गीता की सही अर्थ वाली टीका करने हेतु आये थे । और कार्य पूरा कर चले गये ।
- पूर्व प्रकाशित लेख नये लोगों के लिये फ़िर से प्रकाशित ।
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अभी श्री महाराज जी से फ़ोन पर मेरी कम ही बात हो पाती है । और अगर होती भी है । तो वो अलग सहज योग मैटर पर ही अधिक होती है । इसलिये उनके आने जाने के बारे में मुझे कम ही पता रहता है । लेकिन अभी कोई 8 दिन पहले जीरकपुर ( चंडीगढ ) के हमारे गुरुभाई कुलदीप जी ने बताया कि श्री महाराज जी 25 june  को अम्बाला आयेंगे । फ़िर यही बात मोहाली के हमारे अन्य गुरुभाई मदनलाल जी ने बतायी कि श्री महाराज जी 25 june  को अम्बाला आ रहें हैं ।
तब मैंने महाराज जी से फ़ोन पर बात की । पिछले दिनों महाराज जी पटियाला गये थे । जहाँ कई लोगों की हँसदीक्षा हुयी । और एक साधिका की परमहँस दीक्षा हुयी । जो पहले किसी और मंडल से दीक्षित थी । इसके बाद महाराज जी हनुमानगढ राजस्थान टिब्बी गये । वहाँ भी कई लोगों की हँसदीक्षा और एक परिपक्व साधक की परमहँस दीक्षा हुयी । ये भी किसी और मंडल से दीक्षित थे । और हँस को लगभग पार करने के बाद आगे नहीं बङ पा रहे थे ।
इसके बाद महाराज जी सिर्फ़ एक दिन के लिये आगरा आये । तब मेरी उनसे मुलाकात नहीं हो पायी । एक दिन बाद ही महाराज जी इटावा चले गये । और दो तीन दिन अग्यात रहे । चौथे दिन जब मैंने महाराज जी को फ़ोन किया । तो वो फ़रिहा मुस्तफ़ाबाद के एक ग्रामीण क्षेत्र में थे । और वहाँ जोरदार सतसंग चल रहा था । श्रद्धालु प्रतिदिन दीक्षित हो रहे थे ।
इसके बाद कुलदीप ने ही फ़िर बताया कि महाराज जी कानपुर की तरफ़ जाने वाले हैं । मुझे थोङी हैरानी थी कि इनमें से कोई बात मुझको पता ही न थी । जिसका एक कारण ये भी था कि पिछले दिनों में और भी ज्यादा व्यस्त हो गया ।
कल मेरी फ़िर महाराज जी से बात हुयी । तब मुझे सब बात स्पष्ट पता चली । 17 june  से 20 june तक महाराज जी फ़िर से फ़रिहा के पास कौरारी नाम के स्थान पर जायेंगे । इसके बाद दो तीन दिन के लिये आगरा आयेंगे । इसके बाद यहीं से अम्बाला जायेंगे । अम्बाला के बाद पक्का तो पता नहीं । पर शायद फ़िर से आगरा आयें । क्योंकि उनके शिष्य परिवार में एक विवाह समारोह है ।
लगभग 7 july  से 19 july गुरु पूर्णिमा उत्सव तक श्री महाराज जी फ़िर से कौरारी के आसपास ही रहेंगे । क्योंकि वहाँ के लोगों का आग्रह है कि इस बार गुरु पूर्णिमा और सतसंग ग्यान सप्ताह आदि आयोजन उनके यहाँ ही सम्पन्न हो ।
तो अब से लेकर 19 july  तक का महाराज जी का जो भी भृमण कार्यकृम आदि मुझे मालूम था । वह मैंने मंडल से जुङे लोगों शिष्यों आदि के लिये सूचना रूप में प्रकाशित कर दिया ।
***अम्बाला के आसपास के लोग जो भी हँसदीक्षा । परमहँस दीक्षा । सार शब्द ग्यान । सन्तवाणी के रहस्य आदि विषयों पर समाधान के इच्छुक हों । इससे सम्बन्धित ग्यान या दीक्षा चाहते हों । वे अम्बाला में उनसे मिल सकते हैं ।
अम्बाला के लिये सही दीक्षा का विधान । पूर्व तैयारी । स्थान आदि की जानकारी आप इन दो फ़ोन नम्बरों पर प्राप्त कर सकते हैं ।
1- kuldeep singh श्री कुलदीप सिंह जी जीरकपुर - चंडीगढ
0 98884 13419
2 - madanlal श्री मदनलाल जी मोहाली
0 75089 24458

23 जून 2011

जो है वही व्यर्थ हो जाता है

वस्‍तुत: जिसे हम " मैं " कहते हैं । वह हमारे आसपास बने हुए समाज के विचारों, धारणाओं, दृष्‍टिकोण, भाषा इत्‍यादि से बनता है । उसे बनाने में हमारे मां बाप, शिक्षक, रिश्तेदार और दोस्‍तों का बड़ा हाथ है । हम उनके आइने में अपनी तस्‍वीर देखना सीख लेते हैं । लेकिन वह आइना टूटा हुआ है । हमें शायद यह पता नहीं है कि हम अपने सामाजिक परिवेश से हम कितना प्रभावित होते है । हमारे गहरे से गहरे विचार और नितांत व्‍यक्‍तिगत भावनाएं भी हमारी अपनी नहीं होती । क्‍यों ? क्‍योंकि हम भाषा से सोचते हैं । और हमारे भाव सचित्र होते हैं । जिनका आविष्‍कार हमने नहीं किया । समाज में सदियों सदियों से चलते आ रहे हैं । समाज मानो हमारा फैला हुआ शरीर और मन है । जब तक हम समाज दत संस्‍कारों से पूरी तरह मुक्‍त नहीं हो जाते । तब तक हमारा वास्‍तविक " मैं " नहीं उभर सकता । ओशो ।
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क्या तुम्हारे जीवन का अनुभव भी यही नहीं है ? जो मिल जाता है । वही व्यर्थ हो जाता है । जब तक नहीं मिला । तब तक सार्थक मालूम होता है । बड़े से बड़े महल में भी पहुंचकर भी कितने दिन तक महल सुख देता है ? दो चार दिन पा लेने की तरंग रहती है । अकड़ रहती है कि मिल गया । दो चार दिन के बाद तुम भूल जाते हो । जो महलों में रहते हैं । कोई चौबीस घंटे महल को याद रखते हैं । महल झोपड़े जैसे ही भूल जाते हैं । और बड़े महलों के सपने उठने लगते हैं । सब महल छोटे हो जाते हैं । जो है । वही व्यर्थ हो जाता है - ओशो ।
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6 जनवरी 1971  बुडलैंड अपार्टमेन्ट, बम्बई, भारत । डा. जोन जार्ज हेनरोट और मैडम यूको फ्यूजोता पेरिस और जापान से भगवान श्री से भेंटवार्ता के लिये आये । और अंत में चलते उन्होंने पूछा - मैंने सुना है । आप ध्यान के लिये शाकाहारी भोजन आवश्यक मानते हैं । आप अपने सन्यासियों को मांसाहार लेने से मना करते हैं ।
भगवान श्री ने जीसस के प्रसिद्ध वचन को उद्धत करते हुये कहा - जीसस ने कहा है । जो तुम नहीं चाहते कि दूसरे तुम्हारे साथ करें । वह तुम उनके साथ भी न करो । जैसे हमें अपना जीवन प्यारा लगता है । पशुओं को भी अपना जीवन उतना ही प्रिय है । हम कभी नहीं चाहते कि शेर या भेड़िया हमें खा जायें । इसलिये हम अपने से कमजोर निरीह प्राणियों का मांस खाते हैं । उनकी हिंसा करते हैं । हम जैसा भोजन करते हैं । हमारी चित्त वृति भी वैसी ही हो जाती है । आप लोग कहते हैं । मांस स्वादिष्ट होता है । ईदी अमीन को बच्चों का गोश्त सबसे स्वादिष्ट लगता था । अफ्रीका के कुछ कबीले अभी भी नरभक्षी हैं । वह ज्यों ज्यों सभ्य हुये । उन्होंने बच्चों का गोश्त खाना छोड़ दिया । कुछ और समझ आने पर हमने आदमी का मांस खाना घृणित समझा । इस समझ को और अधिक परिष्कृत करने पर हमें लगेगा कि जिसे हम उत्पन्न नहीं कर सकते । हमें उसे मारने का क्या अधिकार है ? जिसकी संवेदनशीलता जरा भी बढेगी । वह मांसाहार कर ही नहीं सकता ।
बर्नाड शा ने शाकाहारी होने पर एक भोज में अपने मित्र द्वारा मांसाहारी डिश प्रस्तुत किये जाने पर कहा था - मित्र ! माफ़ कीजिए । मेरा पेट कोई कब्र नहीं है ?
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नाजायज बच्चे कभी नाजायज नहीं होते । यहां सिर्फ नाजायज अभिभावक होते हैं । बच्चा कैसे नाजायज हो सकता है ? और नाजायज माता पिता कौन हैं ? जरूरी नहीं कि जिन्होंने शादी नहीं की । कोई भी बच्चा जो माता पिता के प्रेम के बिना पैदा होता है । उन्हें नाजायज बना देता है । वे शादीशुदा हैं । या नहीं । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । लेकिन बच्चा निश्चित ही नाजायज नहीं होता ।
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हासिल ए जिंदगी, हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं ।
ये मिला नहीं वो किया नहीं ये हुआ नहीं वो रहा नहीं ।
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जीवन का उद्देश्य क्या है ? यह प्रश्न बहुत मूल्यवान है । उत्तर पाने की जल्दी में मत रहो । जो कहते हैं । वे जानते नहीं । जो जानते हैं । वे कहते नहीं । यह प्रश्न एक माध्यम है । जिसके द्वारा उत्तर तुम्हारे भीतर से उठें ।
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इन सांसा को विश्वास नहीं । कद आतो आतो रुक जावे । इन सांसों में कुरआन में लिखा है - साँसों से मोहम्मद मोहम्मद तू गाता रहे । हिन्दू कहे तू हर सांस में । सतगुरु नाथ तू रटता जा । सांस की चाल है । और सांस ही जीवन है । हंसलो निकल चल्यो काया से तेरी पड़ी रहे तस्वीर । तो जब हम गुरु के ध्यान में बैठते हैं । तो एक मिनट में 12 बारह सांस आते हैं । और जब पेट भरने के लिए कर्म करते हैं । तो 18 सांस आते हैं । और सोते 30,32 सांस आते हैं । जब मंथन करते हैं । यानी ( सेक्स ) में होते हैं । तब एक मिनट में 64 65 सांस जाते आते हैं । तो कद भज सयो सतगुरु को । तो योगी ने कहा है - भोग में तेरा सब कुछ जाएगा । लेकिन तेरा गुरु को याद किया हुआ संग जाएगा । तो हो सके तो । जितने धीमे सांसों में ही जीवन बिताए । मृत्यु तो सत्य है । लेकिन मृत्यु को जीत भी सकते हैं । कोई लड़ाई नही करनी है । बस उसको ध्यान के द्वारा जानना होगा । तो गोरखनाथ  ने यही संदेश दिया है कि मूल मत हार जाना । मूल मत खो देना । बस यही तेरी मस्तक ( लिलाड़ ) की चमक है । जहाँ त्रिनेत्र कहा गया है ।
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बड़े नादान है वो लोग जो इस दौर में भी वफ़ा की उम्मीद रखते है ।
यहाँ तो दुआ कबूल ना हो तो लोग भगवान बदल देते है ।

22 जून 2011

जीवन दुख ही दुख नहीं

जीवन में दुख ही दुख क्यों हैं ? परमात्मा ने यह कैसा जीवन रचा है ?
- जीवन दुख ही दुख नहीं है । यह तुमसे किसने कहा ? हां यहां दुख भी हैं । लेकिन दुख केवल भूमिकाएं हैं - सुख की । जैसे फूल के पास कांटे लगे हैं । वे सुरक्षायें हैं - फूल की । कांटे फूलों के दुश्मन नहीं हैं । उनके रक्षक हैं । पहरेदार हैं । कांटे फूलों के सेवक हैं । जीवन दुख ही दुख नहीं है । यद्यपि दुख यहां हैं । पर हर दुख तुम्हें निखारता है । और बिना निखारे तुम सुख को अनुभव न कर सकोगे । हर दुख परीक्षा है । हर दुख प्रशिक्षण है । ऐसा ही समझो कि कोई वीणावादक तारों को कस रहा है । अगर तारों को होश हो । तो लगेगा कि बड़ा दुख दे रहा है । मीड़ रहा है । तारों को कस रहा है । बड़ा दुख दे रहा है । लेकिन वीणावादक तारों को दुख नहीं दे रहा है । उनके भीतर से परम संगीत पैदा हो सके । इसका आयोजन कर रहा है । तबलची ठोंक रहा है । तबले को हथौड़ी से । तबले को अगर होश हो । तो तबला कहे - बड़ा दुख है । जीवन में दुख ही दुख है । जब देखो तब हथौड़ी । चैन ही नहीं है । मगर तबलची तबले को सिर्फ तैयार कर रहा है कि नाद पैदा हो सके । दुख नहीं है । जैसा तुम देखते हो वैसा । परमात्मा तुम्हें तैयार कर रहा है । यह सुख की अनंत यात्रा है । लेकिन यात्रा में कुछ कीमत चुकानी पड़ती है । मूल्य चुकाना पड़ता है । सोने को शुद्ध होने के लिये आग से गुजरना पड़ता है । बीज को वृक्ष होने के लिये टूटना पड़ता है । नदी को सागर होने के लिये खोना पड़ता है । इस सबको तुम दुख कहोगे ? दुख कहोगे । तो चूक गये बात । यह कोई भी दुख नहीं है । ऐसा जो जानता है । वही जानता है । यहां दुख भी हैं । सुख भी हैं । लेकिन हर दुख सुख की सेवा में रत है । यहां कांटे भी हैं । फूल भी हैं । लेकिन हर कांटा फूल की सेवा में रत है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
और जिनकी आंखें कभी रोई नहीं । उनकी मुस्कान बासी होती है । उनकी मुस्कान में तुम धूल जमी पाओगे । उनकी मुस्कान में धुलावट नहीं होती । उनकी मुस्कान में चमक नहीं होती । जो रोये ही नहीं कभी । जिनकी आंखों से आंसू नहीं बहे कभी । उनके ओंठ गंदे होते हैं । आंख से आंसू बहते रहें । तो ओंठ ताजे होते हैं । सद्यःस्नात होते हैं । जो रो सकता है । जब हंसता है । तो उसकी हंसी में फूल झरते हैं । और जो रोने की कला जानता है । उसके तो आंसुओं में भी फूल झरने लगते हैं । जो पूरा पूरा निष्णात हो जाता है । उसके आंसू भी सुंदर हैं । उसकी मुस्कराहट भी सुंदर है । अगर समझ हो । तो तुम जब माला गूंथो फूलों की । अगर होशियार हो । तो कांटों का भी उपयोग कर सकते हो । देखने की आंख चाहिये । अब तुम देखते हो । नये युग में गुलाब से भी ज्यादा आदृत कैक्टस हो गया है । देखने की आंख चाहिये । लोगों ने घरों में गुलाब नहीं लगा रखे हैं । लोगों ने घरों में कैक्टस रख छोड़े हैं । कैक्टस । आज से 300 साल पहले या 200 साल पहले दुनिया में अगर कोई घर में अपने कैक्टस रखता । तो लोग उसको पागल समझते कि - तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । यह धतूरे का पेड़ कहां भीतर लिये आ रहे हो । यह जहर है । इसका कांटा किसी को गड़ जायेगा । मौत हो जायेगी । लोग इस तरह के कैक्टस के झाड़ तो खेतों की बागुड़ में लगाते थे सिर्फ । ताकि जानवर न घुस जायें । कोई चोरी खेत से न कर ले जाये । इनको कोई घर में लाता था ?
लेकिन मनुष्य की संवेदनशीलता विकसित होती गई है । परिष्कार हुआ है । अब कैक्टस में भी 1 सौंदर्य है । और निश्चित सौंदर्य है । अब दिखाई पड़ना शुरू हुआ - कैक्टस का सौंदर्य । ऐसी ही घटना घटती है । आंख वाले को दुख में भी सौंदर्य दिखाई पड़ने लगता है । सुख दिखाई पड़ने लगता है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
प्रार्थना बेला पुजारन । क्यों प्रकम्पित गात तेरा ।
है यहां अवहेलना भी । पर यहां वरदान भी है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
डगमगाते क्यों चरण । मंजिल तुझे करती इशारा ।
देख इस अनजान पथ की । एक चिर पहचान भी है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
अबल है या सबल मानव ? हृदय युग युग की समस्या ।
है यहां यदि प्राप्ति आशा । तो यहां प्रतिदान भी है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
आंसुओं की लहरियों पर । हास का सरसिज खिला है ।
है हृदय में करुण क्रन्दन । पर स्वरों में गान भी है ।
हैं नयन में अश्रु भी यदि । अधर पर मुस्कान भी है ।
थोड़ा जागो । थोड़ा खोजो । किसने तुमसे कहा कि - जीवन में दुख ही दुख है ? ये तुम्हारे तथाकथित त्यागी त्तपस्वी । ये तुम्हें इसी तरह के व्यर्थ बातें कहते रहे हैं - जीवन में दुख ही दुख है । कांटे ही कांटे हैं । सब बुरा ही बुरा है । त्यागो । भागो । छोड़ो । लेकिन खयाल रखना । जो जीवन को त्यागता है । जीवन को छोड़ता है । उसने परमात्मा का अपमान किया है । वह नास्तिक है । वह आस्तिक नहीं है । क्यों मैं ऐसा कह रहा हूं ? खूब सोचकर ऐसा कह रहा हूं । अगर तुम चित्रकार को प्रेम करते हो । तो उसके चित्र का त्याग कैसे करोगे ? और अगर तुम मूर्तिकार को प्रेम करते हो । तो उसकी मूर्ति का त्याग कैसे करोगे ? और अगर तुमने संगीतज्ञ को चाहा है । तो तुम उसकी वीणा को सिर माथे धरोगे । परमात्मा ने अगर यह सृष्टि की है । तो तुम इसका त्याग कैसे करोगे ? इसके त्याग में तो परमात्मा के प्रति शिकायत है । इसके त्याग में तो यह घोषणा है कि - यह तूने क्या बनाया ? इसके त्याग में तो इस बात की घोषणा है कि तुझसे अच्छा तो हम जानते हैं कि कैसा जगत होना चाहिये था । हम बना लेते तुझसे अच्छा । यह तूने क्या बनाया ? यह कैसा दुख ही दुख भर दिया है ? नहीं दुख ही दुख नहीं है । दुख पृष्ठभूमि है - सुख की । और जैसे रात में ही तारे दिखाई पड़ते हैं । दिन में भी तारे होते हैं - आकाश में । कहीं भाग नहीं गये हैं । कोई दिन में संन्यास नहीं लेते तारे । दिन में भी आकाश तारों से भरा है । लेकिन दिखाई नहीं पड़ते । क्योंकि पृष्ठभूमि नहीं है । अंधेरे की पृष्ठभूमि चाहिये । इसलिये जितनी अंधेरी रात होती है । उतने तारे चमकते हैं । अमावस की रात तारों में जैसी ज्योति होती है । वैसी कभी नहीं होती । काले ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं न हम सफेद खड़िया से । सफेद दीवाल पर लिखो । कुछ दिखाई न पड़ेगा । लिखावट भी हो जायेगी । कुछ दिखाई न पड़ेगा । ब्लैकबोर्ड पर लिखना पड़ता है । तब कुछ दिखाई पड़ता है । पृष्ठभूमि चाहिये । दुख सुख की पृष्ठभूमि है । कांटे फूलों की पृष्ठभूमि हैं । आंसू मुस्कुराहटों की पृष्ठभूमि हैं । और तुम पृष्ठभूमि को छोड़ दोगे । तो तुम्हारा जीवन बिलकुल नीरस हो जायेगा । अस्त व्यस्त हो जायेगा । तुम्हारे जीवन की सारी आधारशिला गिर जायेगी । मगर त्यागी त्तपस्वी यही सिखाता रहा है कि - भागो । वह तुम्हें अंगुलियां गड़ा गड़ाकर दिखाता रहा है । तुम्हारी आंख में अंगुलियां डाल डालकर दिखाता रहा है कि - यह दुख । यह दुख । वह दुखों की गिनती करवाता रहा है । किसी ने तुम्हें सुखों की गिनती नहीं करवाई अब तक ।
और मैं तुमसे कहता हूं । ऐसा कोई दुख ही नहीं है । जो सुख का आयोजन न कर रहा हो । हर दुख सुख के लिये पृष्ठभूमि है । सुख के तारों के लिये अमावस की रात है । इसे जानना मैं जीवन की कला मानता हूं । तब यह सारा जगत अपूर्व सौंदर्य से भरा हुआ मालूम होगा । और उस अपूर्व सौंदर्य में ही परमात्मा की पहली झलक मिलती है ।
खयाल रखो । जिस जीवन में चुनौतियां नहीं हैं दुख की । वह जीवन नपुंसक हो जाता है । जिस जीवन में बड़े प्रश्न नहीं जगते । उस जीवन में बड़ा चैतन्य पैदा नहीं होता । समाधि का भी पहला चरण गहन अंधकार है । क्योंकि जब सब तरफ अंधेरा हो जाता है । तो चेतना को बाहर जाने का उपाय नहीं रहता । चेतना अपने पर वापस लौट आती है । इसीलिए तो रात हम सोते हैं । अगर प्रकाश हो । तो नींद में बाधा पड़ती है । क्योंकि चेतना को बाहर जाने के लिए मार्ग होता है । अंधकार हो । तो चेतना अपने पर वापस लौट आती है । अंधकार में मार्ग नहीं है । किसी और को देखने का । इसलिए अपने को ही देखने की एकमात्र शेष संभावना रह जाती है । पर अंधकार के प्रति हमारा भय है । इसलिए हम अंधेरे में कभी भी नहीं जीते । अंधेरा हुआ कि हम फिर सो जाएंगे । उजाला हो । तो हम जी सकते हैं । इसलिए पुरानी दुनिया सांझ होते सो जाती थी । क्योंकि उजाला न था । अब नई दुनिया के पास उजाला है कि वह रात को भी दिन बना ले । तो अब 2 बजे तक दिन चलेगा । बहुत संभावना है कि धीरे धीरे रात खतम ही हो जाए । क्योंकि हम प्रकाश पूरा कर लें । अंधेरे में फिर हमें सोने के सिवाय कुछ भी नहीं सूझता । क्योंकि कहीं जाने का रास्ता नहीं रह जाता । लेकिन काश हम अंधेरे में जाग सकें । तो हम समाधि में प्रवेश कर सकते हैं ।
तो पहले 5 मिनट हम गहन अंधकार में डूबेंगे । 1 ही भाव रह जाए मन में कि अंधकार है । अंधकार है । चारों तरफ अंधकार है । सब तरफ अंधकार घिर गया । और हम उस अंधकार में डूब गए । डूब गए । डूब गए । पूर्ण अंधकार रह गया है । और हम हैं । और अंधकार है । तो 5 मिनट पहले इस अंधकार के प्रयोग को करेंगे । फिर मैं दूसरा प्रयोग समझाऊंगा । फिर तीसरा । और अंत में तीनों को जोड़कर फिर हम ध्यान के लिए । समाधि के लिए बैठेंगे ।
तो सबसे पहले तो एक दूसरे से थोड़ा थोड़ा फासले पर हट जाएं । चिंता न करें बिछावन की । अगर नीचे भी बैठ जाएंगे । तो उतना हर्ज नहीं है । जितना कोई छूता हो । क्योंकि कोई छूता हो । तो कोई मौजूद रह जाएगा । अंधेरा पूरा न हो पाएगा । तो बिलकुल कोई न छूता हो । और इसका भी खयाल न रखें कि दूसरा हट जाए । दूसरा कभी नहीं हटेगा । स्वयं को ही हटना पड़ेगा । तो हट जाएं । चाहे जमीन पर चले जाएं । चाहे पीछे हट जाएं । लेकिन कोई किसी को किसी भी हालत में छूता हुआ न हो । और इतने धीरे न हटें । जमीन पर बैठ गए । तो क्या हर्जा हुआ जाता है । बिलकुल सहजता से हट जाएं । 1 भी व्यक्ति छूता हुआ न हो । मैं मान लूं कि आप हट गए हैं । कोई किसी को नहीं छू रहा है । अगर अब भी कोई छू रहा हो । तो उठकर बाहर आ जाए । और अलग बैठ जाए । अब आंख बंद कर लें । आंख बंद कर लें । आंख बंद कर लें । शरीर को ढीला छोड़ दें । शरीर ढीला छोड़ दिया है । आंख बंद कर ली है । और देखें भीतर । अनुभव करें - अंधकार । महा अंधकार है । विराट अंधकार फैल गया है । चारों तरफ सिवाय अंधकार के । और कुछ भी नहीं । अंधकार है । अंधकार है । बस एकदम अंधकार ही अंधकार है । जहां तक खयाल जाता है - अंधकार अंधकार अंधकार । 5 मिनट के लिए इस अंधकार में डूबते जाएं । बस अंधकार ही शेष रह जाए । छोड़ दें अपने को अंधकार में । और 5 मिनट के अंधकार का अनुभव मन को बहुत शांत कर जाएगा । समाधि की पहली सीढ़ी खयाल में आ जाएगी । मृत्यु की भी पहली सीढ़ी खयाल में आ जाएगी । अनुभव करें अंधकार का । बस अंधकार ही अंधकार है चारों ओर । सब तरफ मन को घेरे हुए अंधकार है । दूर दूर तक घनघोर अंधकार है । कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता । कुछ भी नहीं सूझता । हम हैं । और अंधकार है । 5 मिनट के लिए मैं चुप हो जाता हूं । आप गहरे अंधकार को अनुभव करते हुए, करते हुए अंधकार में डूब जाएं । बस अंधकार शेष रह गया है - अंधकार और अंधकार, महा अंधकार । सब अंधेरा हो गया है । कुछ भी नहीं सूझता । अंधकार है । जैसे अंधेरी रात ने चारों ओर से घेर लिया । मैं हूं । और अंधकार है ।
अंधकार ही अंधकार है । डूब जाएं । छोड़ दें । बिलकुल अंधेरे में डूब जाएं । अंधकार ही अंधकार शेष रह गया । अंधकार है । बस अंधकार है । अंधकार ही अंधकार है । अनुभव करते करते मन बिलकुल शांत हो जाएगा । अंधकार ही अंधकार है । अंधकार ही अंधकार है । मन शांत होता जा रहा है । मन बिलकुल शांत हो जाएगा । अंधकार ही अंधकार है । छोड़ दें अपने को । अंधकार में बिलकुल छोड़ दें । अंधकार ही अंधकार है । बस अंधकार ही अंधकार है । छोड़ दें अंधकार में । महान अंधकार चारों ओर रह गया । मैं हूं । और अंधकार है । न कुछ दिखाई पड़ता । कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता । बस अंधकार ही अंधकार मालूम होता है । डरें नहीं । छोड़ दें । बिलकुल छोड़ दें । अंधकार ही अंधकार शेष रह गया है । और मन एकदम शांत हो जाएगा । अंधकार परम शांतिदायी है । मन का कण कण शांत हो जाएगा । मस्तिष्क का कोना कोना शांत हो जाएगा । अंधकार में डूब जाएं । अंधकार ही अंधकार है । अंधकार ही अंधकार है । अंधकार ही अंधकार है । मन बिलकुल शांत हो गया है । मन शांत हो गया है । मन शांत हो गया है । अंधकार ही अंधकार है । चारों ओर अंधकार है । मैं हूं । और अंधकार है । कुछ भी नहीं सूझता । कोई और दिखाई नहीं पड़ता । अंधकार है । अंधकार है । मन शांत हो गया है । मन बिलकुल शांत हो गया है ।
अब धीरे धीरे आंखें खोलें । बाहर भी बहुत शांति मालूम पड़ेगी । धीरे धीरे आंखें खोलें । फिर दूसरा प्रयोग समझें । और उसे 5 मिनट के लिए करें । समाधि की पहली सीढ़ी है - अंधकार का बोध । धीरे धीरे आंख खोलें । बाहर भी बहुत शांति मालूम पड़ेगी ।
अब दूसरा चरण समझ लें । फिर 5 मिनट उसे हम करेंगे । जब कोई मरता है । तो गहन अंधकार में चारों ओर से घिर जाता है । मृत्यु के पहले चरण पर अंधकार घेर लेता है । वह सारा जगत जो दिखाई पड़ता था । खो जाता है । वे सब प्रियजन, मित्र, अपने, पराये, वे जो चारों तरफ थे । सब खो जाते हैं । और 1 अंधकार का पर्दा चारों तरफ से घेर लेता है । लेकिन हम अंधकार से इतना डरते हैं कि उस डर के कारण बेहोश हो जाते हैं । काश हम अंधकार को भी प्रेम कर पाएं । तो फिर मृत्यु में बेहोश होने की जरूरत न रह जाए । और समाधि में जिन्हें जाना है । उन्हें अंधकार को प्रेम करना सीखना पड़े । अंधकार को आलिंगन करना सीखना पड़े । अंधकार में डूबने की तैयारी दिखानी पड़े । इसलिए पहले चरण में 5 मिनट अंधकार को अपने चारों ओर घिरा हमने देखा । अब दूसरी बात समझ लेनी चाहिए । मृत्यु का या समाधि का दूसरा चरण है - एकाकीपन का बोध । मैं अकेला हूं । मृत्यु के दूसरे चरण में अंधकार के घिरते ही पता चलता है कि - मैं अकेला हूं । कोई भी मेरा नहीं । कोई भी संगी नहीं । कोई भी साथी नहीं । लेकिन जीवन भर हम इसी ढंग से जीते हैं कि लगता है - सब हैं मेरे । मित्र हैं । प्रियजन हैं । अपने हैं । अकेला हूं । इसका कभी खयाल भी नहीं आता । अगर खयाल आए भी तो जल्दी किसी को अपना बनाने निकल पड़ता हूं । ताकि अकेलेपन का खयाल न आए । बहुत कम लोग । बहुत कम क्षणों पर । अकेले होने का अनुभव कर पाते हैं । और जो मनुष्य अकेले होने का अनुभव नहीं कर पाता । वह अपना अनुभव भी नहीं कर पाएगा । जो व्यक्ति निरंतर ऐसा ही सोचता है कि दूसरों से जुड़ा हूं । दूसरों से जुड़ा हूं । दूसरे हैं । संगी हैं । साथी हैं । उसकी नजर कभी अपने पर नहीं जा पाती है । मृत्यु का भी दूसरा अनुभव जो है । वह अकेले का अनुभव है । इसलिए मृत्यु हमें बहुत डराती है । क्योंकि जिंदगी भर हम अकेले न थे । और मृत्यु अकेला कर देगी । असल में मृत्यु का डर नहीं है । डर है - अकेले होने का ।

21 जून 2011

ओमियो तारा 1 अलग ही चीज थी

राजीव जी ! नमस्ते । मैं आज आपको 1 खुशखबरी देने के लिये ई-मेल कर रहा हूँ । अब हमारे ग्रुप में आपका ब्लाग पढने वालों की गिनती 28 हो गयी है । मैं उन सबके नाम यहाँ लिखने जा रहा हूँ ।
सुभाष ( मैं ) रजत । मेरी गर्लफ़्रेन्ड - रविन्दर । और उसका भाई । शालु । निशु । वरूण । दीपक । जतिन । नितिन । कपिल । अंकुर । अतुल । राहुल । रोहित । गुंजन । शैलिका । डिम्पल । नीरज । मनोज । सुनील । नवनीत । पोनी । हिना । ज्योती । अनामिका । शुभम और जय किशोर ।
ये सभी लोग पटेल पब्लिक कालेज राजपुरा में विध्यार्थी है । ये सब BA के ही छात्र है । इन सबको आपके ब्लाग पर लाने की मेहनत असल में रजत ने ही की है । उसे आप बेशक हमारे ग्रूप का सबसे खास मेम्बर समझ लीजिये ।
ये सभी लोग ( 28 ) अब आपका ब्लाग अपने अपने घर पढते है । इनमें से ज्यादातर को आपका ब्लाग रजत ने एक साथ ही दिखाया था । उस दिन नीरज का बर्थ डे था । शाम को केक खाने के बाद चाय पीते हुये । रजत ने नीरज से कहा - चल नीरज ! अपना कम्प्यूटर खोल ।
जब नीरज ने कम्प्यूटर आन किया । तब रजत ने सब फ़्रेन्ड्स को ( जो पार्टी मे आये हुये थे ) कहा - आज तुम सबको मैं एक चमत्कार दिखाता हूँ ।

पहले तो मुझे भी समझ में नही आया कि - ये क्या करने जा रहा है ? लेकिन जब उसने ( रजत ने ) आपका ब्लाग खोला । तब मैं समझा । रजत ने जिस ढंग से आपका ब्लाग खोलकर फ़्रेन्डस को जानकारी दी । उससे सब फ़्रेन्डस में ब्लाग को देखने और पढने की जिगयासा पैदा हो गयी ।
अब हमने उन फ़्रेन्डस से जब भी कभी पूछा कि - ब्लाग पढते हो ? तब सबने कहा कि - हाँ पढते हैं ।
अब हमने ( मैंने और रजत ने ) उन फ़्रेन्डस से ये भी कहा कि अब वो लोग और लोगों को भी इस ब्लाग के बारे में बतायें । लेकिन प्यार से बिना झगडे के ।
राजीव जी ! हमारे सभी फ़्रेन्डस हमारे क्लासमेट होने के कारण सब नौजवान हैं । इसलिये उन्होने फ़टाफ़ट आपके ब्लाग्स के नये पुराने सभी लेखों के सिरलेख खोलकर देखे । जो जो जिसको पसन्द आये । उन्होने पढ लिये । क्योंकि आजकल हमारी छुट्टियाँ चल रही हैं ।
अधिकतर फ़्रेन्डस ने आपकी सभी प्रेत कहानियाँ पढ ली हैं । मेरे साथ मेरे कुछ फ़्रेन्डस ने बात भी की थी । उनकी बात से मैं भी सहमत हूँ । बात ये है कि - आपकी प्रेत कहानियों के बारे में हम कुछ राय आपको देना चाहते हैं । लेकिन अगर आप बुरा न मानें तो ।
आपने ब्लाग साल 2010 में बनाया । तब से लेकर अब तक आपने सिर्फ़ कुछ प्रेत कहानियाँ लिखीं । जिसमें से आपकी सबसे बढिया प्रेत कहानी थी " रेशमा प्रेत का बदला "  जानकारी के रूप में सबसे बढिया थी " प्रेतकन्या ". छोटी कहानी के रूप में बढिया थी " काली विधवा "  जानकारी भरा 1 छोटा सा लेख " छ्लावा " भी ठीक था । बाकी " पाँच प्रेत " और " प्रेत का उद्धार " कुछ खास नहीं थे ।

आपकी लिखी कहानियाँ " नगर कालका " और " अब तू औरत नही चुडैल है " भी ठीक ठाक ही थी । वैसे नगर कालका जानकारी के हिसाब से ठीक थी । लेकिन ये नयी वाली " अब तू औरत नही चुडैल है " कुछ खास नहीं थी ।
आप हमारी बातों का बुरा मत मानना । आपकी हर प्रेत कहानी असल मे 1 तरह से जानकारी होती है । कहानी के रूप में । लेकिन हमने सिर्फ़ आपको  ये जानकारी देने की कोशिश की है कि - कौन सी कहानी या लेख कितना पसन्द किया गया ।
अब 1 बात और है । आपकी लिखी " ओमियो तारा " 1 अलग ही चीज थी । जो बातें उसमें लिखी थीं । ऐसी बातें तो हमने न कभी पढी । और न ही सुनीं ।  न ही देशी या विदेशी फ़िल्मो में देखी । पता नहीं किस कारणवश आप वो कहानी पूरी नही कर पाये ।
लेकिन अब हम सब 28 लोग । और बाकी आपको पता होगा । आपके अन्य पाठकों के बारे में । हम सबको आपसे हर महीने कम से कम 1 प्रेत कहानी जरूर चाहिये । पढने के लिये । आप ये मत समझना कि हम लोगो को भूत-प्रेतों में दिलचस्पी है ।
असल में बात ये है कि आपकी प्रेत कहानियों में साधना का भी जिकर आता है । द्वैत साधना का । इस रहस्यमयी विशाल दुनिया के अजीबो गरीब रहस्य सामने आते हैं । नहीं तो आम जिन्दगी तो बस..! फ़िल्मों में भी क्या रखा है ? किसी ने 1 बार मजाक में कहा था कि - अगर 1 हिन्दी फ़िल्म देख लो । तो लगता है । सभी हिन्दी फ़िल्में देख लीं । शायद आपको प्रेत कहानियों वाली बात खास न लगती हो । जैसे हाथी को खुद अपना वजन मालूम नहीं होता ।
आप तो अपने हिसाब से 1 जानकारी के तहत लेख लिख देते हैं । आपके लिये ये शायद आम बात होगी । लेकिन जिसको इस तरह की जानकारी नहीं है । न कभी सुनी । न पढी । और अनुभव तो दूर की बात है । उन लोगों के लिये तो ये आपकी प्रेत कहानियाँ खास से भी खास हैं ।
लेखक । कलाकार । कोई भी अन्य खास व्यक्ति जो भी काम करता है । वो काम वो अपनी जरुरत । शौक या सामाजिक कार्य हेतु करता है
लेकिन बहुतायत में अन्य लोगों के लिये ये सब 1 अचम्भे जैसा ही होता है । मुझे तो लगता है कि आपके ब्लाग में जो अन्य पाठक हैं । सबके सब प्रेत कहानियाँ पढते जरुर होंगे । लेकिन बस पढा । और भाग लिये । न कोई टिप्पणी । न कोई सुझाव । बस बारात में गये । खाया पिया । और बिना शगन दिये खिसक लिये । बस अब हमारे सभी फ़्रेन्डस पूछ रहें है कि आपकी आने वाली प्रेत कहानियाँ किस किस टापिक्स पर होंगी ? किस तरह की होंगी ?
हम सबको महीने में अब कितनी प्रेत कहानियाँ या इस तरह के जानकारी भरे छोटे या बडे लेख पढने को मिला करेंगे ?
आपकी आने वाली प्रेत कहानी कब छ्पेगी ? आने वाली प्रेत कहानियों के क्या नाम होंगे ? मैं आज आपको अपने प्यारे कालेज की 4 फ़ोटो भेज रहा हूँ । मैं चाहता हूँ कि आप ये 4 फ़ोटो मेरे इस ई-मेल के साथ अपने आने वाले लेख में जरूर छापें । इससे मुझे मेरे अन्य कालेज के दोस्तों को आपके ब्लाग पर लाने में आसानी होगी ।
इन 4 फ़ोटो में से 2 फ़ोटो तो तब की हैं । जब हमारे पेपर खत्म हो गये थे । बाद दोपहर छुट्टी टाइम खींची गयी थी । जब कालेज तकरीबन खाली हो चुका था । ये दोनों फ़ोटो रजत ने खींची थी । बाकी 2 फ़ोटो तब की है । जब हमारे कालेज में छोटा सा पुस्तक मेला लगा था । तब स्टूडेंटस ने अच्छी अच्छी पुस्तकें सस्ते दामों पर खरीदी थी । उस समय स्टूडेंटस  की पुस्तक खरीदते हुए 2 फ़ोटो मैंने खींचे थे । अगर कभी मौका मिला । तो हम सब दोस्तों की 1 ग्रुप फ़ोटो आपको भेजूँगा । पूरे 28 लेकिन क्या पता ? आने वाले समय में गिनती और अधिक हो जाये ।
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इन सबको आपके ब्लाग पर लाने की मेहनत असल में रजत ने ही की है -
- सुभाष जी ! इतनी मेहनत से एक सुन्दर भावपूर्ण पत्र लिखने के लिये आपका बेहद धन्यवाद । रजत जी आपका

भी बहुत बहुत धन्यवाद । और आपके सभी दोस्तों - रविन्दर । और उनके भाई । शालु । निशु । वरूण । दीपक । जतिन । नितिन । कपिल । अंकुर । अतुल । राहुल । रोहित । गुंजन । शैलिका । डिम्पल । नीरज । मनोज । सुनील । नवनीत । पोनी । हिना । ज्योती । अनामिका । शुभम और जय किशोर को भी धन्यवाद । और आप सभी का सत्यकीखोज पर बहुत बहुत स्वागत है

अब हमने ( मैंने और रजत ने ) उन फ़्रेन्डस से ये भी कहा कि अब वो लोग और लोगों को भी इस ब्लाग के बारे में बतायें । लेकिन प्यार से बिना झगडे के ।
- मैं आपसे सहमत हूँ । लेकिन आप सहज योग या परमात्मा की वास्तविक भक्ति और गुप्त आदि नाम की चर्चा अधिक करें । तो आपको और सुनने वाले दोनों को लाभ होगा । वैसे ये बात सुझाव के तौर पर कह रहा हूँ । पर आप पहले से ही निश्चय ही ऐसा करते होंगे ।
बात ये है कि - आपकी प्रेत कहानियों के बारे में हम कुछ राय आपको देना चाहते हैं । लेकिन अगर आप बुरा न मानें तो ।
- जो लोग किसी से प्रेम अपनत्व मानते हैं । वही उसे उसका अच्छा बुरा बताते हैं । मैं कई बार लेखों में भी जिक्र कर चुका हूँ । मैं कभी भी किसी की भी किसी बात का बुरा नहीं मानता । हाँ जो मेरे लेखों में आपको व्यंग्यात्मक टोन या कभी कभी चोट मारने जैसा भाव महसूस होता होगा । यह सन्तमत के नियम अनुसार जीवों को चेताने हेतु एक आवश्यक जरूरत है । मैं यह भी बता चुका हूँ । शुरू शुरू में ई मेल कमेंट फ़ोन द्वारा लोगों ने मुझे भद्दी भद्दी गालियाँ तक दीं । उनको भी मैंने संकेत रूप में ससम्मान छाप दिया । क्रियात्मक ग्यान वाले सन्तों का अंतःकरण योग द्वारा चेंज हो जाता है । अतः वो चाहे । तो भी राग द्वेष आदि भाव पैदा ही नहीं होंगे । जैसे चन्दन लकङी से आपको शीतलता के स्थान पर ताप कभी नहीं मिलेगा ।
आपकी सबसे बढिया प्रेत कहानी थी " रेशमा प्रेत का बदला "  जानकारी के रूप में सबसे बढिया थी " प्रेतकन्या ". छोटी कहानी के रूप में बढिया थी " काली विधवा "  जानकारी भरा 1 छोटा सा लेख " छ्लावा " भी ठीक था । बाकी " पाँच प्रेत " और " प्रेत का उद्धार " कुछ खास नहीं थे ।
- पाँच प्रेत और  प्रेत का उद्धार..कहानी या लेख न होकर गरुण पुराण में वर्णित जानकारी थी । मेरा उसमें कुछ नहीं था । फ़िर भी लोगों को गलत कार्य से रोकने हेतु वह भी अच्छा मैटर था ।
आपकी लिखी कहानियाँ " नगर कालका " और " अब तू औरत नही चुडैल है " भी ठीक ठाक ही थी । वैसे नगर कालका जानकारी के हिसाब से ठीक थी । लेकिन ये नयी वाली " अब तू औरत नही चुडैल है " कुछ खास नहीं थी । लेकिन हमने सिर्फ़ आपको  ये जानकारी देने की कोशिश की है कि - कौन सी कहानी या लेख कितना पसन्द किया गया ।
- पूरी बात और सभी पहलू बताऊँगा । तो बात बहुत लम्बी हो जायेगी । औरत नही चुडैल.. जैसे सच्चे मामले ( किसी की पूर्वजन्म की दौलत में चेतना उलझना ) मेरे अब तक के जीवन में 10 तो आये ही होंगे । ये कहानी लिखने से ठीक पहले मुझे पंजाब से फ़ोन आया था । तब मुझे पिछली घटनायें याद आ गयीं । फ़िर उसका दूसरा पहलू किसी गरीब या मजलूम की हाय भी था ।
प्रेत कहानियों के लिये मेरे पास बहुत माँग आती है । जिनमें बहुत से लोग किसी हारर फ़िल्म की तरह अति डरावनी वीभत्स और कामुक वर्णन युक्त कहानी की बात कहते हैं । लेकिन अब मैं सभी बातें मान सकता हूँ । पर कामुकता बिलकुल नहीं होगी । रोमांस हो सकता है । क्योंकि आप सभी जानते ही हैं । आपके इस ब्लाग पर लङकियों महिलाओं सभ्रांत लोगों की संख्या तेजी से बढी है । अतः पिछली कहानी आदि में इस तरह का जो थोङा सा वर्णन हो गया है । उसको मैं समय मिलते ही एडिट करके निकाल दूँगा । यही बात कुछ चित्र जो प्रकाशित हो गये हैं । उन्हें भी हटा दूँगा । ताकि किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे ।
अब 1 बात और है । आपकी लिखी " ओमियो तारा " 1 अलग ही चीज थी । जो बातें उसमें लिखी थीं । ऐसी बातें तो हमने न कभी पढी । और न ही सुनीं ।  न ही देशी या विदेशी फ़िल्मो में देखी । पता नहीं किस कारणवश आप वो कहानी पूरी नही कर पाये ।
- ॐ और तारा यानी ओमियो तारा - योग की इतनी बङी उपलब्धि कि योगी खुद बृह्मांड में एक सत्ता सी बनाकर अपना ग्रह आदि बनाकर राज्य कायम कर ले । इसका चर्चित उदाहरण विश्वामित्र थे । कुंडलिनी में ॐ शक्ति को जागृत करके कुछ अन्य शक्तियाँ हासिल करके यह कार्य संभव होता है । और ये झूठ नहीं हैं । बल्कि ऐसे अनेकों खेल अखिल सृष्टि में बनते बिगङते रहते हैं ।
ओमियो तारा एक ऐसे ही योगी की सशक्त कहानी है । जो केन्द्रक और अणु परमाणु का नियंत्रण रहस्य आदि तो जान गया । और उसने एक अति विकसित सभ्यता वाला स्टार ( तारा ) भी बना लिया । लेकिन वह इन अणुओं को शरीर का आवरण कैसे पहनाये । ये नहीं जानता । इसके लिये वह प्रसून का अपहरण सा करना चाहता है । दूसरे वह प्रसून के बारे में जानकर । उसको अपने खास मंत्री के तौर पर भी रखना चाहता है । तीसरे वह अपने स्टार के लिये 4D स्पेस के द्वारा इंसानों को 4D मैटर में बदलकर बहुत से केन्द्रक और अणु परमाणु भी हासिल करना चाहता है आदि ।
ये कहानी 8 भाग लिखने के बाद शायद 4 महीने तक मैं भी 4D स्पेस में ही चला गया । और नेट भी डिसकनेक्ट रहा । वापसी पर सुश्री रूप कौर जी मुझे बेताबी से इंतजार करती मिलीं । और बंसल जी के पेंडिंग ई मेल का उत्तर यानी नई पोस्ट होते ही सवाल जबाब का सिलसिला शुरू हो गया । उन्हें भी इस कहानी का बेहद इंतजार है ।
ऐसा नहीं कि उसे लिखूँगा नहीं । पर एकाएक ई मेल और पाठक इस रफ़्तार से आये कि समय ही नहीं मिलता । जबकि ऐसा मैटर फ़ुरसत में ही लिखा जा सकता है । हालांकि मैं किसी भी तरह के मैटर में कल्पना का सहारा तो लेता ही नहीं । जो ताना बाना बुनना पङे । फ़िर भी खास मैटर के लिये मूड आवश्यक होता है । प्रश्नों के उत्तर देना सबसे आसान होता है ।
हम सबको आपसे हर महीने कम से कम 1 प्रेत कहानी जरूर चाहिये । पढने के लिये । आप ये मत समझना कि हम लोगो को भूत-प्रेतों में दिलचस्पी है ।
- 20 july गुरु पूर्णिमा उत्सव के बाद मेरे पास काफ़ी समय हुआ करेगा । तब तक 2 कहानियाँ प्रकाशित हो सकती हैं । जैसा कि आपने देखा । एकाएक अध्यात्म जिग्यासाओं वाले काफ़ी मेल आने लगे । तब मैंने लोगों की आँखें खोलने हेतु अनुराग सागर की अधिक से अधिक जानकारी एक साथ दे दी । इस तरह बहुत लोगों को पूछे अनपूछे उत्तर मिल गये । इसी से अन्य विषयों पर लिखना नहीं हो सका ।
शायद आपको प्रेत कहानियों वाली बात खास न लगती हो । आप तो अपने हिसाब से 1 जानकारी के तहत लेख लिख देते हैं । आपके लिये ये शायद आम बात होगी । लेकिन जिसको इस तरह की जानकारी नहीं है । न कभी सुनी । न पढी । और अनुभव तो दूर की बात है । उन लोगों के लिये तो ये आपकी प्रेत कहानियाँ खास से भी खास हैं
- द्वैत का कोई भी साधक कुंडलिनी योग या मंत्र शक्ति द्वारा ऊपर उठता है । तो पहले ही आसमान के विभिन्न क्षेत्रों में प्रेत लोक । तांत्रिक लोक 1D और 2D सृष्टियाँ आदि मिलती हैं । ये बङे रोमांचक अनुभव होते हैं । यदि मुझे इस ग्यान के प्रचार का निमित्त आदेश न होता । तो मैं कभी इस प्रकार के बेमजा और फ़ालतू ब्लाग लिखने जैसा कार्य न करता । पर सत्ता के आदेश का पालन अनिवार्य है । आदेशित कार्य न करने पर साधक डिसमिस कर दिया जाता है ।

मुझे लगता है कि आपके जो अन्य पाठक हैं । सब प्रेत कहानियाँ पढते जरुर होंगे । लेकिन बस पढा । और भाग लिये । न कोई टिप्पणी । न कोई सुझाव ।
- अगर आप ब्लाग के आंतरिक भाग से परिचित हों । तो ब्लाग के डेशबोर्ड पर states या आंकङे एक आप्शन होता है । यह सभी जानकारी देता है । कौन सा लेख कितनी बार कब कब पढा गया । कौन से देश के लोग ब्लाग पर आ रहे हैं आदि आदि सभी जानकारी । अतः मुझे कमेंट आदि की परवाह कभी न रही । ये सच है । सभी मित्रों को प्रेत कहानियाँ अच्छी लगती हैं । महिलाओं को तो बहुत ज्यादा । लेकिन मैं सभी के ई मेल उनकी भावना अनुसार गोपनीय ही रखता हूँ ।
अब हमारे सभी फ़्रेन्डस पूछ रहें है कि आने वाली प्रेत कहानियाँ किस टापिक्स पर होंगी ? किस तरह की होंगी ?
- पंचागुली देवी । कर्ण पिशाचिनी । डायन । खतरनाक टायप के सिद्धों पर । आप लोगों की अधिक रुचि देखते हुये इनका स्तर बहुत अधिक बदला हुआ होगा । दूसरे कहानी को 20 लम्बे पार्ट में लिखने की कोशिश करूँगा । ताकि आप बार बार पढें । फ़िर भी मजा आये । जटिलता भी पहले से अधिक होगी । जैसे ओमियो तारा यकायक समझ में नहीं आती । 20 july के बाद एकदम 10 बङी कहानियाँ एक एक करके आपके सामने जल्दी जल्दी आयेंगी । मेरी इच्छा अन्य दुर्लभ विषयों पर भी लिखने की है । पर आपकी भूख बहुत ज्यादा है । और मेरे पास बहुत सीमित समय ।
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आने वाले दिनों में - श्रीमदभगवत गीता । तुलसी रामायण । बीजक इन पर भी आपको एक नये अन्दाज में जानकारी मिलेगी । शेष फ़िर कभी । आप सभी का आभार ।

20 जून 2011

कपटी काल निरंजन का चरित्र

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! अब इस कपटी काल निरंजन का चरित्र सुनो । किस प्रकार वह जीवों की छल बुद्धि कर अपने जाल में फ़ँसाता है । इसने कृष्ण अवतार धरकर गीता की कथा कही । परन्तु अग्यानी जीव इसके चाल रहस्य को नहीं समझ पाता ।
अर्जुन श्रीकृष्ण का सच्चा सेवक था । और श्रीकृष्ण की भक्ति में लगन लगाये रहता था । श्रीकृष्ण ने उसे सव सूक्ष्म ग्यान कहा । सांसारिक विषयों से लगाव और सांसारिक विषयों से परे आत्म मोक्ष सब कुछ सुनाया । परन्तु बाद में काल अनुसार उसे मोक्ष मार्ग से हटाकर सांसारिक कर्म कर्तव्य में लगने को प्रेरित किया । जिसके परिणाम स्वरूप भयंकर महाभारत युद्ध हुआ ।
श्रीकृष्ण ने गीता के ग्यान उपदेश में पहले दया क्षमा आदि गुण उपदेश के बारे में बताया । और ग्यान बिग्यान कर्म योग आदि कल्याण देने वाले उपदेशों का वर्णन किया । जबकि अर्जुन सत्य भक्ति में लगन लगाये था । तथा वह श्रीकृष्ण को बहुत मानता था ।
पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन को मुक्ति की आशा दी । परन्तु बाद में उसे नरक में डाल दिया । कल्याणदायक ग्यान योग का त्याग कराकर उसे सांसारिक कर्म कर्तव्य की ओर घुमा दिया । जिससे कर्म के वश हुये अर्जुन ने बाद में बहुत दुख पाया । मीठा अमृत दिखाकर उसका लालच देकर धोखे से विष समान दुख दे दिया । इस प्रकार काल जीवों को बहला फ़ुसलाकर सन्तों की छवि बिगाङता है । और उन्हें मुक्ति से दूर रखता है । जीवों में सन्तों के प्रति अविश्वास और संदेह उत्पन्न करता है ।

इस काल निरंजन की छल बुद्धि कहाँ कहाँ तक गिनाऊँ । उसे कोई कोई विवेकी सन्त ही पहचानता है । जब कोई ग्यान मार्ग में पक्का रहता है । तभी उसे सत्य मार्ग सूझता है । तब वह यम के छल कपट को समझता है । और उसे पहचानता हुआ उससे अलग हो जाता है । सदगुरु की शरण में जाने पर यम का नाश हो जाता है । तथा अटल अक्षय सुख प्राप्त होता है ।
तब धर्मदास बोले - हे प्रभु ! इस काल निरंजन का चरित्र मैंने समझ लिया । अब आप सत्य पँथ की डोरी कहो । जिसको पकङकर जीव यम निरंजन से अलग हो जाता है ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! मैं तुमको सत्यपुरुष की डोरी की पहचान कराता हूँ । सत्यपुरुष की शक्ति को जब यह जीव जान लेता है । तब काल कसाई उसका रास्ता नहीं रोक पाता ।
सत्यपुरुष की शक्ति उनके एक ही नाल से उत्पन्न 16 सुत है । उन शक्तियों के साथ ही जीव सत्यलोक को जाता है । बिना शक्ति के पँथ नहीं चल सकता । शक्तिहीन जीव तो भवसागर में ही उलझा रहता है । ये शक्तियाँ सदगुणों के रूप में बतायी गयी हैं ।
ग्यान । विवेक । सत्य । संतोष । प्रेमभाव । धीरज । मौन । दया । क्षमा । शील । निहकर्म । त्याग । वैराग्य । शांति । निज धर्म ।
दूसरों का दुख दूर करने के लिये ही तो करुणा की जाती है । परन्तु  अपने आप भी करुणा करके अपने जीव का उद्धार करे । और सबको मित्र समान समझकर अपने मन में धारण करे । इन शक्ति स्वरूप सदगुणों को ही धारण कर जीव सत्यलोक में विश्राम पाता है । अतः मनुष्य जिस भी स्थान पर रहे । अच्छी तरह से समझ बूझ कर सत्य रास्ते पर चले । और मोह ममता काम क्रोध आदि दुर्गुणों पर नियंत्रण रखे । इस तरह इस डोर के साथ जो सत्यनाम को पकङता है । वह जीव सत्यलोक जाता है ।

तब धर्मदास बोले - हे प्रभु ! आप मुझे पँथ का वर्णन करो । और पँथ के अंतर्गत विरक्ति और गृहस्थ की रहनी पर भी प्रकाश डालो । कौन सी रहनी से वैरागी वैराग्य करे । और कौन सी रहनी से गृहस्थ आपको प्राप्त करे ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! सुनो । अब मैं वैरागी के लिये आचरण बताता हूँ । वह पहले अभक्ष्य पदार्थ माँस मदिरा आदि का त्याग करे । तभी हँस कहायेगा । वैरागी सन्त सत्यपुरुष की अनन्य भक्ति अपने ह्रदय में धारण करे । किसी से भी द्वेष और वैर न करे । ऐसे पाप कर्मों की तरफ़ देखे भी नहीं । सब जीवों के प्रति ह्रदय में दया भाव रखे । मन वचन कर्म से भी किसी जीव को न मारे । सत्य ग्यान का उपदेश और नाम ले । जो मुक्ति की निशानी है । जिससे पाप कर्म अग्यान तथा अहंकार का समूल नाश हो जायेगा । वैरागी बृह्मचर्य वृत का पूर्ण रूप से पालन करे । काम भावना की दृष्टि से स्त्री को स्पर्श न करे । तथा वीर्य को नष्ट न करे । काम क्रोध आदि विषय और छल कपट को ह्रदय से पूर्णतया धो दे । और एक मन एक चित्त होकर नाम का सुमरण करे ।
हे धर्मदास ! अब गृहस्थ की भक्ति सुनो । जिसको धारण करने से गृहस्थ काल फ़ाँस में नहीं पङेगा । वह काग दशा ( कौवा स्वभाव ) पाप कर्म दुर्गुण और नीच स्वभाव से पूरी तरह दूर रहे । और ह्रदय में सभी जीवों के प्रति दया भाव बनाये रखे । 
मछली । किसी भी पशु का माँस । अंडे न खाये । और न ही शराब पिये । इनको खाना पीना तो दूर इनके पास भी न जाये । क्योंकि ये सब अभक्ष्य पदार्थ हैं । वनस्पति अंकुर से उत्पन्न अनाज फ़ल शाक सब्जी आदि का आहार करे । सदगुरु से नाम ले । जो मुक्ति की पहचान है । तब काल कसाई उसको रोक नहीं पाता है ।
हे भाई ! जो गृहस्थ जीव ऐसा नहीं करता । वह कहीं भी नहीं बचता । वह घोर दुख के अग्निकुन्ड में जल जलकर नाचता है । और पागल हुआ सा इधर उधर को भटकता ही है । उसे अनेकानेक कष्ट होते हैं । और वह जन्म जन्म बारबार कठोर नरक में जाता है । वह करोंडो जन्म जहरीले साँप के पाता है । तथा अपनी ही विष ज्वाला का दुख सहता हुआ यूँ ही जन्म गँवाता है ।
वह विष्ठा ( मल टट्टी ) में कीङा कीट का शरीर पाता है । और इस प्रकार 84 की योनियों के करोंङो जन्म तक नरक में पङा रहता है । और तुमसे जीव के घोर दुख को क्या कहूँ । मनुष्य चाहे करोङो योग आराधना करे । किन्तु बिना सदगुरु के जीव को हानि ही होती है । सदगुरु मन बुद्धि पहुँच के परे का अगम ग्यान देने वाले हैं । जिसकी जानकारी वेद भी नहीं बता सकते ।
वेद इसका उसका यानी कर्म योग उपासना और बृह्म का ही वर्णन करता है । वेद सत्यपुरुष का भेद नहीं जानता । अतः करोंङो में कोई ऐसा विवेकी संत होता है । जो मेरी वाणी को पहचान कर गृहण करता है । काल निरंजन ने खानी वाणी के बंधन में सबको फ़ँसाया हुआ है । मंद बुद्ध अल्पग्य जीव उस चाल को नहीं पहचानता । और अपने घर आनन्द धाम सत्यलोक नहीं पहुँच पाता । तथा जन्म मरण और नरक के भयानक कष्टों में ही फ़ँसा रहता है ।

19 जून 2011

शरीर ग्यान परिचय

तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! मैं बङ भागी हूँ । जो आपने मुझे ग्यान दिया । अब आप मुझे शरीर का निर्णय विचार भी कहिये । इसमें कौन सा देवता कहाँ रहता है ? और उसका क्या कार्य है ? नाङी रोम कितने हैं ? और शरीर में खून किसलिये है ? तथा स्वांस कौन से मार्ग से चलती है ? आँते । पित्त । फ़ेफ़ङा और आमाशय इनके बारे में भी बताओ । शरीर में स्थिति कौन से कमल पर कितना जप होता है ? और रात दिन में कितनी स्वांस चलती है ? कहाँ से शब्द उठकर आता है ? तथा कहाँ जाकर वह समाता है ? अगर कोई जीव झिलमिल ज्योति को देखता है । तो मुझे उसका भी ग्यान विवेक कहो कि उसने कौन से देवता का दर्शन पाया ?
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! अब तुम शरीर विचार सुनो ।
सत्यपुरुष का नाम सबसे न्यारा और शरीर से अलग है । क्योंकि वह आदिपुरुष कृमशः - स्थूल । सूक्ष्म । कारण । महाकारण तथा कैवल्य शरीरों से अलग है । इसलिये उसका नाम भी अलग ही है ।
पहला मूलाधार चक्र गुदा स्थान है । यहाँ 4 दल का कमल है । इसका देवता गणेश है । यहाँ 1600 अजपा जाप है  मूलाधार के ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । यह 6 दल का कमल है । यहाँ बृह्मा सावित्री का स्थान है । यहाँ 6000 अजपा जाप है । 8 दल ( पत्ते ) का कमल नाभि स्थान पर है । यह विष्णु लक्ष्मी का स्थान है । यहाँ 6000 अजपा जाप है ।
इसके ऊपर ह्रदय स्थान पर 12 दल का कमल है । यह शिव पार्वती का स्थान है ।  यहाँ 6000 अजपा जाप है । विशुद्ध चक्र का स्थान कंठ ( गला )  है । यह 16 दल का कमल है । इसमें सरस्वती का स्थान है । इसके लिये 1000 अजपा जाप है ।
भंवर गुफ़ा 2 दल का कमल है । वहाँ मन राजा का थाना ( चौकी - मुक्त होते जीव को भरमाने के लिये ) है ।इसके लिये भी 1000 अजपा जाप है । इस कमल के ऊपर शून्य 0 स्थान है । वहाँ होती झिलमिल ज्योति को काल निरंजन जानो । सबसे ऊपर सुरति कमल में सदगुरु का वास है । वहाँ अनन्त अजपा जाप है ।
हे धर्मदास ! सबसे नीचे मूलाधार चक्र से ऊपर तक 21600 स्वांस दिन रात चलती है ।
( इस बारे में मैं कई लेखों में बता चुका हूँ । सामान्य स्वांस लेने और छोङने में 4 सेकेंड का समय लगता है । इस हिसाब से 24 घंटे में  21600 स्वांस दिन रात आती जाती है - राजीव )
हे धर्मदास ! अब शरीर के बारे में जानो । 5 तत्व से बना ये कुम्भ ( घङा या घट रूपी ) रूपी शरीर है । तथा शरीर में 7 धातुयें - रक्त । माँस । मेद । मज्जा । रस । शुक्र । और अस्थि हैं । इनमें रस बना खून सारे शरीर में दौङता हुआ शरीर का पोषण करता है । जैसे प्रथ्वी पर असंख्य पेङ पौधे हैं । वैसे ही प्रथ्वी रूपी इस शरीर पर करोंङो रोम ( रोंये ) होते है । इस शरीर की संरचना में 72 कोठे हैं । जहाँ 72000 नाङियों की गाँठ बँधी हुयी है । इस तरह शरीर में धमनी और शिरा प्रधान नाङियाँ हैं ।  72 नाङियों में 9 पुहुखा । गंधारी । कुहू । वारणी । गणेशनी । पयस्विनी । हस्तिनी । अलंवुषा । शंखिनी हैं । इन 9 में भी इङा । पिंगला । सुषमना ये 3 प्रधान हैं । इन तीन नाङियों में भी सुषमना खास है । इस नाङी के द्वारा ही योगी सत्य यात्रा करते हैं ।
नीचे मूलाधार चक्र से लेकर ऊपर बृह्मरंध्र तक जितने भी कमल दल चक्र आते हैं । उनसे शब्द उठता है । और उनका गुण प्रकट करता है । तब वहाँ से फ़िर उठकर वह शब्द शून्य 0 में समा जाता है । आँत का 21 हाथ होने का प्रमाण है । और आमाशय सवा हाथ अनुमान है । नभ क्षेत्र का सवा हाथ प्रमाण है । और इसमें सात खिङकी - दो कान । दो आँख । दो नाक छिद । एक मुँह है ।
इस तरह इस शरीर में स्थित प्राण वायु के रहस्य को जो योगी जान लेता है । और निरंतर ये योग करता है । परन्तु सदगुरु की भक्ति के बिना वह भी लख 84 में ही जाता है ।
हर तरह से ग्यान योग कर्म योग से श्रेष्ठ है । अतः इन विभिन्न योगों के चक्कर में न पङकर नाम की सहज भक्ति से अपना उद्धार करे । और शरीर में रहने वाले अत्यन्त बलबान शत्रु काम । क्रोध । मद । लोभ आदि को ग्यान द्वारा नष्ट करके जीवन मुक्त होकर रहे ।
हे धर्मदास ! ये सब कर्मकांड मन के व्यवहार हैं । अतः तुम सदगुरु के मत से ग्यान को समझो । काल निरंजन या मन शून्य 0 में ज्योति दिखाता है । जिसे देखकर जीव उसे ही ईश्वर मानकर धोखे में पङ जाता है । इस प्रकार ये मन रूपी काल निरंजन अनेक प्रकार के भृम उत्पन्न करता है ।
हे धर्मदास ! योग साधना में मस्तक में प्राण रोकने से जो ज्योति उत्पन्न होती है । वह आकार रहित निराकार मन ही है । मन में ही जीवों को भरमाने उन्हें पाप कर्मों में विषयों में प्रवृत करने की शक्ति है । उसी शक्ति से वह सब जीवों को कुचलता है । उसकी यह शक्ति तीनों लोक में फ़ैली हुयी है । इस तरह मन द्वारा भृमित यह मनुष्य खुद को पहचान कर असंख्य जन्मों से धोखा खा रहा है । और ये भी नहीं सोच पाता कि काल निरंजन के कपट से जिन तुच्छ देवी देवताओं के आगे वह सिर झुकाता है । वे सब उसके ( आत्मा - मनुष्य ) के ही आश्रित हैं । हे धर्मदास ! यह सव निरंजन का जाल है । जो मनुष्य देवी देवताओं को पूजता हुआ कल्याण की आशा करता है । परन्तु सत्यनाम के बिना यह यम की फ़ाँस कभी नहीं कटेगी ।

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