02 जून 2011

जब मंदिर खाली हो जाते हैं

शिक्षा और क्रांति - मैं आपके बीच उपस्थित होकर अत्यंत आनंदित हूं । निश्चय ही इस अवसर पर मैं अपने हृदय की कुछ बातें आपसे कहना चाहूंगा । शिक्षा की स्थिति देखकर हृदय में बहुत पीड़ा होती है । शिक्षा के नाम पर जिन परतंत्रताओं का पोषण किया जाता है । उनसे एक स्वतंत्र और स्वस्थ मनुष्य का जन्म संभव नहीं है । मनुष्य जाति जैसी कुरूपता और अपंगता में फंसी है । उसके मूलभूत कारण शिक्षा में ही छिपे हैं । शिक्षा ने प्रकृति से तो मनुष्य को तोड़ दिया है । लेकिन संस्कृति उससे पैदा नहीं हो सकी है । उल्टे पैदा हुआ है - विकृति । इस विकृति को ही प्रत्येक पीढ़ी नयी पीढि़यों पर थोपी चली जाती है । और फिर जब विकृति ही संस्कृति समझी जाती हो । तो स्वभावतः थोपने का कार्य पुण्य की आभा भी ले लेता हो । तो आश्चर्य नहीं है । और जब पाप पुण्य के वेश में प्रगट होता है । तो अत्यंत घातक हो ही जाता है । इसलिए ही तो शोषण सेवा की आड़ में खड़ा होता है । और हिंसा अहिंसा के वस्त्र ओढ़ती है । और विकृतियां संस्कृति के मुखौटे पहन लेती हैं । अधर्म का धर्म के मंदिरों में आवास अकारण नहीं है । अधर्म सीधा और नम्र तो कभी उपस्थित ही होता है । इसलिए यह सदा ही उचित है कि मात्र वस्त्रों में विश्वास न किया जाए । वस्त्रों को उघाड़कर देख लेना अत्यंत ही आवश्यक है । मैं भी शिक्षा के वस्त्रों को उघाड़कर ही देखना चाहूंगा । इसमें आप बुरा तो न मानेंगे ? विवशता है । इसलिए ऐसा करना आवश्यक है । शिक्षा की वास्तविक आत्मा को देखने के लिए उसके तथाकथित वस्त्रों को हटाना ही होगा । क्योंकि अत्यधिक सुंदर वस्त्रों में जरूर ही कोई अस्वस्थ और कुरूप आत्मा वास कर रही है । अन्यथा मनुष्य का जीवन इतनी घृणा, हिंसा और अधर्म का जीवन नहीं हो सका था । जीवन के वृक्ष पर कड़वे और विषाक्त फल देखकर क्या गलत बीजों के बोये जाने का स्मरण नहीं आता है ? बीज गलत नहीं तो वृक्ष पर गलत फल कैसे आ सकते हैं ? वृक्ष का विषाक्त फलों से भरा होना बीज में प्रच्छन्न विष के अतिरिक्त और किस बात की खबर है ? मनुष्य गलत है । तो निश्चय ही शिक्षा सम्यक नहीं है । यह हो सकता है कि आप इस भांति न सोचते रहे हों । और मेरी बात का आपकी विचारणा से कोई मेल न हो । लेकिन मैं माने जाने का नहीं । मात्र सुने जाने का निवेदन करता हूं । उतना ही पर्याप्त भी है । सत्य को शांति से सुन लेना ही काफी है । असत्य ही माने जाने का आग्रह करता है । सत्य तो मात्र सुन लिए जाने पर ही परिणाम ले आता है । मनुष्य का विचार और आचार इतना भिन्न, स्व विरोधी क्यों है ? शास्त्रों और सिद्धांतों के आधार पर जीवन पर थोपे गये समाधानों का ही यह परिणाम है । समाधान समस्याओं से नहीं जन्मे हैं । उन्हें समस्याओं के ऊपर थोपा गया है । समाधान ऊपर हैं । समस्यायें भीतर हैं । समाधान बुद्धि में हैं । समस्यायें जीवन में हैं । और यह अंतर्द्वंद आत्मघाती हो गया है । सभ्यता के भीतर इस भांति जो विक्षिप्तता चलती रही है । वह अब विस्फोट की स्थिति में आ गयी है । उसके विस्फोट की संभावना से पूरी मनुष्यता भयाक्रांत है । लेकिन मात्र भयभीत होने से क्या होगा ? भय की नहीं । वरन साहस पूर्वक पूरी स्थिति को जानने और पहचानने की जरूरत है ।
मैं शास्त्रों को बीच में नहीं लूंगा । क्योंकि मैं समाधानों से अंधा नहीं होना चाहता । मैं तो आपसे कुछ ऐसी बातें करना चाहता हूं । जो कि समस्याओं को सीधा देखने से पैदा होती हैं । मनुष्य की परतंत्रता के लिए ही अनुशासन पर अत्याधिक बल दिया जाता है । विवेक के अभाव की पूर्ति अनुशासन से करने की कोशिश की जाती है । विवेक हो । तो व्यक्ति में और उसके जीवन में एक स्वतः स्फूर्ति अनुशासन अपने आप ही पैदा होता है । उसे लाना नहीं पड़ता है । वह तो अपने आप ही आता है । लेकिन जहां विवेक सिखाया ही न जाता हो । वहां तो ऊपर से थोपे अनुशासन पर ही निर्भर होना पड़ता है । यह अनुशासन मिथ्या तो होगा ही । क्योंकि वह व्यक्ति के अंतस से नहीं जागता है । और उसकी जड़ें उसके स्वयं के विवेक में नहीं होती हैं । व्यक्ति का अंतःकरण तो सदा भीतर ही भीतर उसके विरोध में सुलगता रहता है । ऐसे अनुशासन की प्रतिक्रिया में ही स्वच्छंदता पैदा होती है । स्वच्छंदता सदा ही परतंत्रता की प्रतिक्रिया है । वह उसकी ही अनिवार्य प्रतिध्वनि है । स्वतंत्रता से भरी चेतना कभी भी स्वच्छंद नहीं होती है । मनुष्य को स्वच्छंदता के रोग से बचाना हो । तो उसकी आत्मा को परिपूर्ण स्वतंत्रता का वायुमंडल मिलना चाहिए । लेकिन हम तो दो ही विकल्प जानते हैं - परतंत्रता या स्वच्छंदता । स्वतंत्रता के लिए तो हम अब तक तैयार ही नहीं हो सके हैं । अनुशासन - दूसरों से आया हुआ अनुशासन भी परतंत्रता है । ऐसा अनुशासन जगह जगह टूट रहा है । तो बहुत चिंता व्याप्त हो गई है । यह अनुशासन तो टूटेगा ही । यह तो टूटना ही चाहिए । उसके होने के कारण ही गलत हैं । उसकी मृत्यु तो उसमें ही छिपी हुई है । वह तो अराजकता को बलपूर्वक स्वयं में ही छिपाये हुए है । और बलपूर्वक जो भी दमन किया जाता है । एक न एक दिन उसका विस्फोट अवश्यंभावी है ।
मनुष्य का इतिहास मूर्खताओं से भरा है । अंधविश्वासों और अज्ञानों ने सब कहीं डेरे डाले रखे हैं । लेकिन शिक्षक उस श्रृंखला से नयी पीढ़ियों को अलग नहीं होने देता है । वह उसी श्रृंखला से ये नये आगन्तुकों को बांधता चला जाता है । वह अतीत का चाकर है । और इस भांति भविष्य का दुश्मन सिद्ध होता है । क्या यह उचित नहीं है कि अतीत का भार हमारे सिर पर न हो ? वह पैरों के तले की भूमि बने । यह तो ठीक, लेकिन सिर का बोझ बने । यह तो ठीक नहीं है । भविष्य के निर्माण के लिए अतीत से मुक्त चित्त चाहिए । शिक्षा भविष्योन्मुख होनी चाहिए । अतीतोन्मुख नहीं । तभी विकास हो सकता है । कोई भी सृजनात्मक प्रक्रिया भविष्योन्मुख ही हो सकती है । क्या यह उचित नहीं है कि हम भविष्य के लिए प्रेम और आदर सिखायें ? अतीत की अर्थ हीन पूजा बहुत हो चुकी । क्या अब यह उचित नहीं है कि हम भविष्य के सूर्योदयों के लिए हमारे हृदयों में प्राथनायें हों ? ओशो ।
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तेरा कोई न संगी जगती में । घट रखो अटल सुरती ने ।
घट रखो अटल सुरती ने । दर्शन कर निज भगवान का ।
सतगुरु धोरे गया सत्संग में । गुराजी भेय दिया हरी रंग में ॥
शब्द बाण मारया मेरे तन में । सैल लग्या ज्याणु स्यार का । 
मेरा मन चेत्या भक्ति में । घट रखो अटल सुरती ने । 
जब से शब्द सुन्या सतगुरु का । खुलगा खिडक मेरे काया मंदिर का । 
मात पिता दरस्या नहीं घर का । दूत ले ज्या यमराज का । 
तेरा कोई न संगी जगती में । घट रखो अटल सुरती ने । 
नैन नासिका ध्यान संजो ले । रमता राम निजर भर जोले । 
बिन बतलाया तेरे घट में बोले । बेरो ले भीतर बार का ।
अब क्यों भटके भूली में । घट रखो अटल सुरती ने ।
अमृतनाथ जी राम रह्या सुन्न में । मुझको दीदार दिखा दिया छिन में । मधो मगन हो ज्या भजन में । रूप देख निराकार का ।
अब क्या सांसा मुक्ति में । घट रखो अटल सुरती ने । जय श्री नाथ जी
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लोग तो मंदिरों में जाते ही तब हैं । जब मंदिर खाली हो जाते हैं । जब तक मंदिरों में कोई दीया जलता है । तब तक लोग दूर दूर रहते हैं । दीये से डर लगता है । लपट पकड़ सकती है । दीये के पास तो पतंगे जा सकते हैं सिर्फ - मतवाले, दीवाने, पागल । जो अपने को निछावर कर सकें । कायर तो बाहर बाहर होते हैं । जब तक दीया जलता है । जैसे ही दीया बुझा कि कायरों का मंदिरों में प्रवेश हो जाता है । फिर वे खूब घंटनाद करते हैं । आरतियां उतारते हैं । अब कोई भय नहीं है । अब भय का कोई कारण ही नहीं है ।
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