04 जून 2011

तुम कौन हो उनकी चिंता करने वाले

नृत्य में डूबो । और उत्सव मनाओ - निश्चित ही यही धर्म है । और अगर तुम नृत्य में डूब सकते । गीत नहीं गा सकते । उत्सव नहीं मना सकते । तो और क्या करोगे ? पहली तो बात । तुम अपनी फिकर के लिए यहां आए हो कि सबकी फिकर के लिए ? तुमने कोई ठेका लिया है । सारे लोगों की फिकर का ? तुम कौन हो । उनकी चिंता करने वाले ? पहले तुम तो पा लो । और तुम यह नहीं पूछते कि शास्त्रीय संगीत सबके लिए है । या नहीं ? और तुम यह नही पूछते कि शेक्सपीयर के नाटक । और कालिदास के शास्त्र । और भवभूति की रचनाएं । और रवींद्रनाथ के गीत सबके लिए हैं । या नही ? तब तुम यह नहीं कहते कि - कोई सस्ते कालिदास क्यों पैदा नहीं किये जाते ? जो सर्व सुलभ हों । धर्म के लिए ही क्यों यह आग्रह है तुम्हारा ? धर्म को लोगों ने समझ रखा है - 2 कौड़ी की चीज होनी चाहिए । सस्ती होनी चाहिए । सर्व सुलभ होनी चाहिए । और धर्म इस जीवन में सबसे कीमती चीज है । सबसे बहुमूल्य । यह तो जीवन का परम शिखर है । यहां कालिदास । भवभूति । रवींद्रनाथ । शेक्सपीयर और मिल्टन जैसे लोगों की भी पहुंच मुश्किल से हो पाती है । यहाँ आइंस्टीन और न्यूटन और एडिंग्टन जैसे वैज्ञानिकों तक की पहुंच नहीं हो पाती । सर्व साधारण की तो बात ही तुम छोड़ दो । यहां तो कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई कृष्ण, कोई जीसस अंगुली पर इने गिने लोग पहुंच पाए । मैं क्या करूं । नियम यह है । एस धम्मो सनंतनो । धर्म तो परम शिखर है । इसके लिए तो प्रतिभा चाहिए । इसके लिए तो बड़ी प्रखर प्रतिभा चाहिए । क्योंकि यह जीवन के आखिरी तत्व को खोज लेना है । तुम्हारा प्रश्न सोचने जैसा है । और पहले प्रश्न के संदर्भ में इसको लेना । तो आसान हो जाएगा समझना ।
कहते हो - आप कहते हैं कि - नृत्य में डूबो । उत्सव मनाओ । गीत गाओ । यही धर्म है । निश्चित ही यही धर्म है । और अगर तुम नृत्य में डूब सकते । गीत नहीं गा सकते । उत्सव नहीं मना सकते । तो और क्या करोगे ? तुम कहते हो - इसकी फुरसत कहां है । और चिलम पीने की फुर्सत है । और ताश खेलने की फुर्सत है । और अभी बरसात में चौपड़ बिछाकर बैठने की फुर्सत है । और आल्हा ऊदल गाने की फुर्सत है । किन गंवारों की बात कर रहे हो यहां ? ये ही गंवार गांवों में बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं । और हनुमान जी की पूजा करने की फुर्सत है । और गीत गाने की फुरसत नहीं । और नाचने की फुरसत नहीं । और उपद्रव करने की फुर्सत है । हिंदू मुस्लिम दंगा करना हो । तो बिलकुल फुरसत है । और बलात्कार करना हो । तो फुरसत है । हरिजनों के झोपड़े जलाने हों । तो फुर्सत है । और चुनाव लड़ना हो । तो फुर्सत है । जो मर गए हैं बिलकुल । वे भी वोट देने पहुंच जाते हैं लोगों के कंधों पर बैठकर । अंधे, लंगड़े, लूले, इनको चुनाव में रस है । और अगर इनसे कहो - उत्सव । तो चिन्तामणि पाठक को बड़ी चिंता पैदा हो रही है । तुम कहते हो - फुरसत कहां है लोगों को । निर्धनता का अभिशाप झेल रहे हैं । कौन जिम्मेवार है ? अगर झेल रहे हैं । तो खुद जिम्मेवार हैं । और तुम जैसे लोग जिम्मेवार हैं । जो उनकी निर्धनता का किसी तरह का सुरक्षा का उपाय खोज रहे हो । क्यों झेल रहे हैं । निर्धनता का अभिशाप ? 5 000  साल से क्या भाड़ झोंकते रहे । अमरीका 300  साल में समृद्ध हो गया । कुल 300 साल का इतिहास है । और दुनियां के शिखर पर पहुंच गया । तुम क्या कर रहे हो ? तुम्हें लेकिन फुर्सत है रामचरित मानस पढ़ने की । हर साल रामलीला खेलने की । वही गांव के गुंडे राम बन जाएंगे । और उनके पैर छूने की । और गांव का कोई मूर्ख सीता बन जाएगा । और तुम जानते हो कि कौन है यह ? मूंछें मुड़ाए खड़ा हुआ है । और सीता मैया सीता मैया कर रहे हो । तुम्हें फुरसत है कि समय कैसे काटें । हर तरह से समय बरबाद करने की फुर्सत है । मगर आलसी हैं । बेईमान हैं ।  और तुम्हारे महात्माओं ने तुम्हें बेईमानी और आलसीपन सिखाया है । वे तुम्हें सिखा गए कि क्या करना है । अरे, सबका देखने वाला भगवान है । जब उसकी मर्जी होगी । छप्पर फाड़ कर देता है । अभी तक किसी को छप्पर फाड़ कर दिया ? देखा नहीं । और देगा भी । तो सम्हल कर बैठना । खोपड़ी न खुल जाए । छप्पर ही न गिर जाए कहीं । तुम कहते हो - फुर्सत नहीं है । और कर क्या रहे हैं गांव के लोग 24 घंटे ? और हर तरह के दंगे फसाद की फुर्सत है । सत्य नारायण की कथा में बैठने की फुर्सत है । डंडे चलाना हो । तो एकदम तैयार हैं । नागपंचमी में दंगल करना हो । तो दंगल के लिए तैयार हैं । सांप की पूजा करनी हो । तो ये तैयार है । 1 दूसरे सज्जन ने पूछा है कि - मेरा विश्वास सनातन धर्म में है । बजरंगबली महावीर में मेरी अटूट श्रद्धा है । आपकी बातें मुझे दिलचस्प तो लगती हैं । लेकिन हमारे सनातन धर्म से उनका मेल नहीं बैठता । क्या आप बताने की कृपा करेंगे कि मुझमें क्या कमी है ? नाम है - खिलिन्दा राम चौधरी । प्रधान । महावीर सेवा दल । पानीपत । इस सबकी फुर्सत है । ये खिलिन्दा राम को तरह तरह के खेल करने की फुर्सत है । महावीर सेवा दल के प्रधान हैं । इसकी इनको फुर्सत है । और बजरंग बली की सेवा करने की फुर्सत है । और तुम्हें कोई भी चीज सही कही जाए । तो तुम्हारे सनातन धर्म का सौभाग्य । न खाए । तुम जानो । कोई मैंने ठेका नहीं लिया है । तुम्हारे धर्म से मेल बिठालने का । मैं किस किस के धर्म से मेल बिठाऊं ? यहां 300  धर्मों को मानने वाले लोग पृथ्वी पर हैं । अगर इन सबका ही मेल बिठाता रहूं । तो मेरा ही तालमेल खो जाए । किस किस का मेल बिठालना है । यहां तरह तरह के मूढ़ पड़े हुए हैं । और सबकी अपनी धारणांए हैं । अब तुम्हारी अटूट श्रद्धा बजरंगबली में है । तुम आदमी हो । या क्या हो ? और कमी पूछ रहे हो । बजरंगबली से ही पूछ लेना । वे खुद ही हंसते होंगे कि - यह देखो मूर्ख ! खिलिन्दा राम ! राम होकर और बजरंगबली की सेवा कर रहे हैं ? आजकल बजरंगबली तक राम की सेवा नहीं कर रहे हैं । क्योंकि उनको दूसरी रामलीला में ज्यादा पैसे पर नौकरी मिल गई । इस तरह से लोगों से यह देश भरा हुआ है । जमाने भर की जड़ता को तुम सनातन धर्म कहते हो । हर तरह के अंधविश्वास को तुम सनातन धर्म कहते हो । ओशो
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सत्यम शिवम सुंदरम - जीवन में सत्य, शिव और सुंदर के थोड़े से बीज बोओ । यह मत सोचना कि बीज थोड़े से हैं । तो उनसे क्या होगा । क्योंकि 1 बीज अपने में हजारों बीज छुपाए हुए है । सदा स्मरण रखना कि 1 बीज से पूरा उपवन पैदा हो सकता है । आज किसी ने कहा है । मैंने बहुत थोड़ा समय देकर ही बहुत कुछ जाना है । थोड़े से क्षण मन की मुक्ति के लिए दिये । और अलौकिक स्वतंत्रता का अनुभव किया । फूलों, झरनों और चांद तारों के सौंदर्य अनुभव में थोड़े से क्षण बिताये । और न केवल सौंदर्य को जाना । बल्कि स्वयं को सुंदर होता हुआ भी अनुभव किया । शुभ के लिए थोड़े से क्षण दिये । और जो आनंद पाया । उसे कहना कठिन है । तबसे मैं कहने लगा कि - प्रभु को तो सहज ही पाया जा सकता है । लेकिन हम उसकी ओर कुछ भी कदम न उठाने के लिए तैयार हों । तो दुर्भाग्य ही है । स्वयं की शक्ति । और समय का थोड़ा अंश । सत्य के लिये । शांति के लिये । सौंदर्य के लिये । शुभ के लिये दो । और फिर तुम देखोगे कि जीवन की ऊंचाइयां तुम्हारे निकट आती जा रही हैं । और 1 बिलकुल अभिनव जगत अपने द्वार खोल रहा है । जिसमें कि बहुत आध्यात्मिक शक्तियां अंतर्गर्भित हैं । सत्य और शांति की जो आकांक्षा करता है । वह क्रमश: पाता है कि सत्य और शांति उसके होते जा रही हैं । और जो सौंदर्य और शुभ की ओर अनुप्रेरित होता है । वह पाता है कि उनका जन्म स्वयं उसके ही भीतर हो रहा है । सुबह उठकर आकांक्षा करो कि आज का दिवस सत्य शिव और सुंदर की दिशा में कोई फल ला सके । और रात्रि देखो कि कल से तुम जीवन की ऊंचाइयों के ज्यादा निकट हुए हो । या नहीं । गहरी आकांक्षा स्वयं में गहरी आकांक्षा पैदा करता है ।
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