23 जून 2011

जो है वही व्यर्थ हो जाता है

वस्‍तुत: जिसे हम " मैं " कहते हैं । वह हमारे आसपास बने हुए समाज के विचारों, धारणाओं, दृष्‍टिकोण, भाषा इत्‍यादि से बनता है । उसे बनाने में हमारे मां बाप, शिक्षक, रिश्तेदार और दोस्‍तों का बड़ा हाथ है । हम उनके आइने में अपनी तस्‍वीर देखना सीख लेते हैं । लेकिन वह आइना टूटा हुआ है । हमें शायद यह पता नहीं है कि हम अपने सामाजिक परिवेश से हम कितना प्रभावित होते है । हमारे गहरे से गहरे विचार और नितांत व्‍यक्‍तिगत भावनाएं भी हमारी अपनी नहीं होती । क्‍यों ? क्‍योंकि हम भाषा से सोचते हैं । और हमारे भाव सचित्र होते हैं । जिनका आविष्‍कार हमने नहीं किया । समाज में सदियों सदियों से चलते आ रहे हैं । समाज मानो हमारा फैला हुआ शरीर और मन है । जब तक हम समाज दत संस्‍कारों से पूरी तरह मुक्‍त नहीं हो जाते । तब तक हमारा वास्‍तविक " मैं " नहीं उभर सकता । ओशो ।
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क्या तुम्हारे जीवन का अनुभव भी यही नहीं है ? जो मिल जाता है । वही व्यर्थ हो जाता है । जब तक नहीं मिला । तब तक सार्थक मालूम होता है । बड़े से बड़े महल में भी पहुंचकर भी कितने दिन तक महल सुख देता है ? दो चार दिन पा लेने की तरंग रहती है । अकड़ रहती है कि मिल गया । दो चार दिन के बाद तुम भूल जाते हो । जो महलों में रहते हैं । कोई चौबीस घंटे महल को याद रखते हैं । महल झोपड़े जैसे ही भूल जाते हैं । और बड़े महलों के सपने उठने लगते हैं । सब महल छोटे हो जाते हैं । जो है । वही व्यर्थ हो जाता है - ओशो ।
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6 जनवरी 1971  बुडलैंड अपार्टमेन्ट, बम्बई, भारत । डा. जोन जार्ज हेनरोट और मैडम यूको फ्यूजोता पेरिस और जापान से भगवान श्री से भेंटवार्ता के लिये आये । और अंत में चलते उन्होंने पूछा - मैंने सुना है । आप ध्यान के लिये शाकाहारी भोजन आवश्यक मानते हैं । आप अपने सन्यासियों को मांसाहार लेने से मना करते हैं ।
भगवान श्री ने जीसस के प्रसिद्ध वचन को उद्धत करते हुये कहा - जीसस ने कहा है । जो तुम नहीं चाहते कि दूसरे तुम्हारे साथ करें । वह तुम उनके साथ भी न करो । जैसे हमें अपना जीवन प्यारा लगता है । पशुओं को भी अपना जीवन उतना ही प्रिय है । हम कभी नहीं चाहते कि शेर या भेड़िया हमें खा जायें । इसलिये हम अपने से कमजोर निरीह प्राणियों का मांस खाते हैं । उनकी हिंसा करते हैं । हम जैसा भोजन करते हैं । हमारी चित्त वृति भी वैसी ही हो जाती है । आप लोग कहते हैं । मांस स्वादिष्ट होता है । ईदी अमीन को बच्चों का गोश्त सबसे स्वादिष्ट लगता था । अफ्रीका के कुछ कबीले अभी भी नरभक्षी हैं । वह ज्यों ज्यों सभ्य हुये । उन्होंने बच्चों का गोश्त खाना छोड़ दिया । कुछ और समझ आने पर हमने आदमी का मांस खाना घृणित समझा । इस समझ को और अधिक परिष्कृत करने पर हमें लगेगा कि जिसे हम उत्पन्न नहीं कर सकते । हमें उसे मारने का क्या अधिकार है ? जिसकी संवेदनशीलता जरा भी बढेगी । वह मांसाहार कर ही नहीं सकता ।
बर्नाड शा ने शाकाहारी होने पर एक भोज में अपने मित्र द्वारा मांसाहारी डिश प्रस्तुत किये जाने पर कहा था - मित्र ! माफ़ कीजिए । मेरा पेट कोई कब्र नहीं है ?
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नाजायज बच्चे कभी नाजायज नहीं होते । यहां सिर्फ नाजायज अभिभावक होते हैं । बच्चा कैसे नाजायज हो सकता है ? और नाजायज माता पिता कौन हैं ? जरूरी नहीं कि जिन्होंने शादी नहीं की । कोई भी बच्चा जो माता पिता के प्रेम के बिना पैदा होता है । उन्हें नाजायज बना देता है । वे शादीशुदा हैं । या नहीं । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । लेकिन बच्चा निश्चित ही नाजायज नहीं होता ।
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हासिल ए जिंदगी, हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं ।
ये मिला नहीं वो किया नहीं ये हुआ नहीं वो रहा नहीं ।
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जीवन का उद्देश्य क्या है ? यह प्रश्न बहुत मूल्यवान है । उत्तर पाने की जल्दी में मत रहो । जो कहते हैं । वे जानते नहीं । जो जानते हैं । वे कहते नहीं । यह प्रश्न एक माध्यम है । जिसके द्वारा उत्तर तुम्हारे भीतर से उठें ।
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इन सांसा को विश्वास नहीं । कद आतो आतो रुक जावे । इन सांसों में कुरआन में लिखा है - साँसों से मोहम्मद मोहम्मद तू गाता रहे । हिन्दू कहे तू हर सांस में । सतगुरु नाथ तू रटता जा । सांस की चाल है । और सांस ही जीवन है । हंसलो निकल चल्यो काया से तेरी पड़ी रहे तस्वीर । तो जब हम गुरु के ध्यान में बैठते हैं । तो एक मिनट में 12 बारह सांस आते हैं । और जब पेट भरने के लिए कर्म करते हैं । तो 18 सांस आते हैं । और सोते 30,32 सांस आते हैं । जब मंथन करते हैं । यानी ( सेक्स ) में होते हैं । तब एक मिनट में 64 65 सांस जाते आते हैं । तो कद भज सयो सतगुरु को । तो योगी ने कहा है - भोग में तेरा सब कुछ जाएगा । लेकिन तेरा गुरु को याद किया हुआ संग जाएगा । तो हो सके तो । जितने धीमे सांसों में ही जीवन बिताए । मृत्यु तो सत्य है । लेकिन मृत्यु को जीत भी सकते हैं । कोई लड़ाई नही करनी है । बस उसको ध्यान के द्वारा जानना होगा । तो गोरखनाथ  ने यही संदेश दिया है कि मूल मत हार जाना । मूल मत खो देना । बस यही तेरी मस्तक ( लिलाड़ ) की चमक है । जहाँ त्रिनेत्र कहा गया है ।
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बड़े नादान है वो लोग जो इस दौर में भी वफ़ा की उम्मीद रखते है ।
यहाँ तो दुआ कबूल ना हो तो लोग भगवान बदल देते है ।
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