19 जून 2011

शरीर ग्यान परिचय

तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! मैं बङ भागी हूँ । जो आपने मुझे ग्यान दिया । अब आप मुझे शरीर का निर्णय विचार भी कहिये । इसमें कौन सा देवता कहाँ रहता है ? और उसका क्या कार्य है ? नाङी रोम कितने हैं ? और शरीर में खून किसलिये है ? तथा स्वांस कौन से मार्ग से चलती है ? आँते । पित्त । फ़ेफ़ङा और आमाशय इनके बारे में भी बताओ । शरीर में स्थिति कौन से कमल पर कितना जप होता है ? और रात दिन में कितनी स्वांस चलती है ? कहाँ से शब्द उठकर आता है ? तथा कहाँ जाकर वह समाता है ? अगर कोई जीव झिलमिल ज्योति को देखता है । तो मुझे उसका भी ग्यान विवेक कहो कि उसने कौन से देवता का दर्शन पाया ?
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! अब तुम शरीर विचार सुनो ।
सत्यपुरुष का नाम सबसे न्यारा और शरीर से अलग है । क्योंकि वह आदिपुरुष कृमशः - स्थूल । सूक्ष्म । कारण । महाकारण तथा कैवल्य शरीरों से अलग है । इसलिये उसका नाम भी अलग ही है ।
पहला मूलाधार चक्र गुदा स्थान है । यहाँ 4 दल का कमल है । इसका देवता गणेश है । यहाँ 1600 अजपा जाप है  मूलाधार के ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । यह 6 दल का कमल है । यहाँ बृह्मा सावित्री का स्थान है । यहाँ 6000 अजपा जाप है । 8 दल ( पत्ते ) का कमल नाभि स्थान पर है । यह विष्णु लक्ष्मी का स्थान है । यहाँ 6000 अजपा जाप है ।
इसके ऊपर ह्रदय स्थान पर 12 दल का कमल है । यह शिव पार्वती का स्थान है ।  यहाँ 6000 अजपा जाप है । विशुद्ध चक्र का स्थान कंठ ( गला )  है । यह 16 दल का कमल है । इसमें सरस्वती का स्थान है । इसके लिये 1000 अजपा जाप है ।
भंवर गुफ़ा 2 दल का कमल है । वहाँ मन राजा का थाना ( चौकी - मुक्त होते जीव को भरमाने के लिये ) है ।इसके लिये भी 1000 अजपा जाप है । इस कमल के ऊपर शून्य 0 स्थान है । वहाँ होती झिलमिल ज्योति को काल निरंजन जानो । सबसे ऊपर सुरति कमल में सदगुरु का वास है । वहाँ अनन्त अजपा जाप है ।
हे धर्मदास ! सबसे नीचे मूलाधार चक्र से ऊपर तक 21600 स्वांस दिन रात चलती है ।
( इस बारे में मैं कई लेखों में बता चुका हूँ । सामान्य स्वांस लेने और छोङने में 4 सेकेंड का समय लगता है । इस हिसाब से 24 घंटे में  21600 स्वांस दिन रात आती जाती है - राजीव )
हे धर्मदास ! अब शरीर के बारे में जानो । 5 तत्व से बना ये कुम्भ ( घङा या घट रूपी ) रूपी शरीर है । तथा शरीर में 7 धातुयें - रक्त । माँस । मेद । मज्जा । रस । शुक्र । और अस्थि हैं । इनमें रस बना खून सारे शरीर में दौङता हुआ शरीर का पोषण करता है । जैसे प्रथ्वी पर असंख्य पेङ पौधे हैं । वैसे ही प्रथ्वी रूपी इस शरीर पर करोंङो रोम ( रोंये ) होते है । इस शरीर की संरचना में 72 कोठे हैं । जहाँ 72000 नाङियों की गाँठ बँधी हुयी है । इस तरह शरीर में धमनी और शिरा प्रधान नाङियाँ हैं ।  72 नाङियों में 9 पुहुखा । गंधारी । कुहू । वारणी । गणेशनी । पयस्विनी । हस्तिनी । अलंवुषा । शंखिनी हैं । इन 9 में भी इङा । पिंगला । सुषमना ये 3 प्रधान हैं । इन तीन नाङियों में भी सुषमना खास है । इस नाङी के द्वारा ही योगी सत्य यात्रा करते हैं ।
नीचे मूलाधार चक्र से लेकर ऊपर बृह्मरंध्र तक जितने भी कमल दल चक्र आते हैं । उनसे शब्द उठता है । और उनका गुण प्रकट करता है । तब वहाँ से फ़िर उठकर वह शब्द शून्य 0 में समा जाता है । आँत का 21 हाथ होने का प्रमाण है । और आमाशय सवा हाथ अनुमान है । नभ क्षेत्र का सवा हाथ प्रमाण है । और इसमें सात खिङकी - दो कान । दो आँख । दो नाक छिद । एक मुँह है ।
इस तरह इस शरीर में स्थित प्राण वायु के रहस्य को जो योगी जान लेता है । और निरंतर ये योग करता है । परन्तु सदगुरु की भक्ति के बिना वह भी लख 84 में ही जाता है ।
हर तरह से ग्यान योग कर्म योग से श्रेष्ठ है । अतः इन विभिन्न योगों के चक्कर में न पङकर नाम की सहज भक्ति से अपना उद्धार करे । और शरीर में रहने वाले अत्यन्त बलबान शत्रु काम । क्रोध । मद । लोभ आदि को ग्यान द्वारा नष्ट करके जीवन मुक्त होकर रहे ।
हे धर्मदास ! ये सब कर्मकांड मन के व्यवहार हैं । अतः तुम सदगुरु के मत से ग्यान को समझो । काल निरंजन या मन शून्य 0 में ज्योति दिखाता है । जिसे देखकर जीव उसे ही ईश्वर मानकर धोखे में पङ जाता है । इस प्रकार ये मन रूपी काल निरंजन अनेक प्रकार के भृम उत्पन्न करता है ।
हे धर्मदास ! योग साधना में मस्तक में प्राण रोकने से जो ज्योति उत्पन्न होती है । वह आकार रहित निराकार मन ही है । मन में ही जीवों को भरमाने उन्हें पाप कर्मों में विषयों में प्रवृत करने की शक्ति है । उसी शक्ति से वह सब जीवों को कुचलता है । उसकी यह शक्ति तीनों लोक में फ़ैली हुयी है । इस तरह मन द्वारा भृमित यह मनुष्य खुद को पहचान कर असंख्य जन्मों से धोखा खा रहा है । और ये भी नहीं सोच पाता कि काल निरंजन के कपट से जिन तुच्छ देवी देवताओं के आगे वह सिर झुकाता है । वे सब उसके ( आत्मा - मनुष्य ) के ही आश्रित हैं । हे धर्मदास ! यह सव निरंजन का जाल है । जो मनुष्य देवी देवताओं को पूजता हुआ कल्याण की आशा करता है । परन्तु सत्यनाम के बिना यह यम की फ़ाँस कभी नहीं कटेगी ।
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