04 जून 2011

ध्यान में हम सीधे ब्रह्मांड से जुड़ते हैं

ध्यान के जो परम सूत्र हैं । उनमें एक सूत्र यह भी है कि जब ध्यान छोड़ने की घड़ी आ जाये । तो ध्यान पूरा हुआ । जब तक ध्यान छूट न सके । तब तक जानना अभी कच्चा है । अभी पका नहीं । जब फल पक जाता है । तो वृक्ष से गिर जाता है । और जब ध्यान का फल पक जाता है । तब ध्यान का फल भी गिर जाता है । जब ध्यान का फल गिर जाता है । तब समाधि फलित होती है ।
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क्रोध - जब तुम किसी के लिए क्रोधित हो । और तुम अपना क्रोध उस पर डालते हो । तुम प्रतिक्रिया की चेन पैदा करते हो । अब वह क्रोधित होगा । यह हो सकता है कि जन्मों तक चलता रहे । और तुम दुश्मन बने रह सकते हो । तुम इसका अंत कैसे कर सकते हो ? यहां सिर्फ एक ही संभावना है । तुम इसका सिर्फ ध्यान में अंत कर सकते हो । और कहीं नहीं । क्योंकि ध्यान में तुम किसी पर क्रोधित नहीं हो । तुम बस क्रोधित हो । भेद बुनियादी है । तुम किसी के ऊपर क्रोधित नहीं हो । तुम बस क्रोधित हो । और क्रोध ब्रह्मांड में मुक्त होता है । तुम किसी के लिए नफरत से नहीं भरे हो । तुम बस नफरत से भरे हो । और वह बाहर फेंक रहे हो । ध्यान में, भावनाएं किसी के लिए नहीं हैं । वे किसी के लिए नहीं हैं । वे ब्रह्मांड में चली जाती हैं । और ब्रह्मांड हर चीज को शुद्ध कर देता है । यह ऐसे ही जैसे कि गंदी नदी समुद्र में गिरती है । समुद्र उसे शुद्ध कर देगा । जब कभी तुम्हारा क्रोध, तुम्हारी नफरत, तुम्हारी कामुकता, ब्रह्मांड में जाती है । समुद्र में जाती है । यह शुद्ध हो जाती है । यदि गंदी नदी किसी दूसरी नदी में गिरती है । तब दूसरी नदी भी गंदी हो जाती है । जब तुम किसी के ऊपर क्रोधित हो । तुम अपने कचरे को उस पर फेंक रहे हो । तब वह अपना कचरा तुम्हारे ऊपर फेंकेगा । और तुम कचरा फेंकने की संयुक्त प्रक्रिया हो जाओगे ।
ध्यान तुम स्वयं को ब्रह्मांड में शुद्ध होने के लिए फेंक रहे हो । सारी ऊर्जा जो तुम ब्रह्मांड में फेंकते हो । वह शुद्ध हो जाती है । ब्रह्मांड बहुत विशाल है । महान समुद्र । तुम उसे गंदा नहीं कर सकते । ध्यान में हम किसी व्यक्ति से नहीं जुड़े हैं । ध्यान में हम सीधे ब्रह्मांड से जुड़ते हैं ।
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संन्यास दीवानापन है । यह तो जो पीयेगा । वही जानेगा । यह तो शराब है - अंगूरों से ढली हुई नहीं । आत्मा से ढली हुई । बाहर से आयी हुई नहीं । भीतर इसकी रसधार बहती है । यह तो गूंगे का गुड़ है । तुम किसी दूसरे को बताना भी चाहोगे । तो न बता पाओगे । 
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साइकोलाजी का प्रक्टीकल हो रहा था । प्रोफेसर ने 1 चूहे के लिए एक तरफ केक और दूसरी तरफ चुहिया रख दी । चूहा फ़ौरन केक की तरफ लपका । दूसरी बार केक को बदल के रोटी रखी । चूहा रोटी कि तरफ लपका । कई बार फ़ूड आइटम्स बदले । मगर चूहा हर बार फ़ूड की तरफ भागा । प्रोफेसर - so students, its proved कि hunger is bigger need than girls.
इतने में लास्ट बेंच से रणछोर दास चांचड़ बोला - सर ! 1 बार चुहिया बदल के भी देख लो । हो सकता है । वो उसकी बीवी हो ।
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