27 जून 2011

अगर जरा भी भेद खोलूँ तो सब काफ़िर से मोमिन हो जायँ ।

सदा कारजु सचि नाम सुहेला । बिनु सबदै कारज केहा हे ।
हे भाईयो ! परमात्मा से मिलाने वाला ये शब्द ( नाम ) ही है । और जिसे ये शब्द नाम सच्चे सदगुरु से नहीं मिला । उसका परमात्मा से मिलाप किस तरह हो सकता है ? बिना सदगुरु के न कोई आज तक अन्दर गया है । न कभी जा पायेगा ।
संत शम्स तबरेज ने भी यही कहा है - आँ बादशाहे आजम दरे बस्त बूद मुहकम । 
परमात्मा ने हमारी आँखों के पीछे परदा डालकर हमें बाहर निकाला है । और उसे कब और किस तरह किस नियम से खोलता है - पोशीदा अलूके आदम यानी कि बरदर आमद ।
जब वह खुद मनुष्य का चोला पहनकर गुरु बनकर आता है । और उसका सत्य उपदेश क्या है - खामोश पंज नौबत बिशनोज आसमाने । का आसमाने बेरूँ जाँ हफ़्तो ई शश आमद । 
यानी चुपचाप होकर अन्दर की तरफ़ ध्यान दे । तेरे अन्दर पाँच आसमानी शब्द हो रहे हैं । खामोशी में वे सुनाई देंगे । जब वह यहाँ दोनों आँखों से 6 चक्रों के ऊपर चढेगा । जब तक वह यहाँ नहीं आता । तब तक जबानी लफ़्ज ही लफ़्ज हैं । मनुष्य सारी उमर किताबी शब्दों को जप जप कर मर जाये । कुछ हासिल नहीं होगा । किताबी नाम जबानी नाम वास्तविक नाम नहीं है ।
आमद निदाए बेचु न आज दरूँ न बेरूँ । अर्थात वह प्रेम की तान वह मीठी मीठी धुन आ रही है । पता नहीं कहाँ से आ रही है । पर आ जरूर रही है । बस उसको ही सुनने से परमात्मा मिलता है । वह श्ब्द धुनि ही प्रेम डोर है ।
न अज चपो न अज रास्त । नै अज बराबर आमद । यानी न दाहिनी ओर से । न बांयी ओर से । न सामने से । न पीछे से । फ़िर किस ओर से आती है वह धुन ?


गोई कि आँ वेह सुएस्त । आँ सू कि जुस्तजुएस्त । गोई कुजा कुनम रू आँ । सुए कि आँ वेह आमद ।
जिस ओर से हमें उस मालिक की तलाश है । उस आसमानी शब्द नाम धुन के साथ रूह को जोङ दो । और उसके ही साथ साथ आगे चलते जाओ ।
दस्तूर नेस्त जाँ रा । कि बिगोयद ई बयाँ रा । वरना ज कुफ़्र रस्ते हर जा कि काफ़िर आमद ।
वह धुन ऐसी मीठी है । उसकी ऐसी ताकत है कि मुझे अन्दर से ( परमात्मा के नियम अनुसार ) इजाजत नहीं कि मैं उसका भेद खोलूँ । अगर जरा सा भी उस रहस्य को जाहिर कर दूँ । तो सारी दुनियाँ ही मोमिन हो जाये । और कोई भी काफ़िर न रहे ।
श्री गुरु गृंथ साहिब में कहा है -
नाम के आरे सगले जंत । नाम के बारे खंड बृह्मंड । नाम के धारे पुरीआ सभ भवन ।
वह नाम सबके ( हर इंसान के । चाहे वह किसी धर्म जाति का हो ) अन्दर है । जिसको वह नाम नहीं मिला । उसका दुनियाँ में जन्म लेना ही फ़िजूल हो गया । जैसे कुत्ता बिल्ली सुअर गधा ऊँट बन्दर अपना जन्म बरबाद करके चले गये । वैसे ही तू भी बेकार ही चला जायेगा । उस रुहानी अमर शब्द की लज्जत न पा सका । तो तुझे मुक्ति नसीब नहीं होगी ।
बिनु सबदै अंतरि आनेरा । न वसतु लहै न चूके फ़ेरा । 
सतिगुरु हथि कुंजी होरतु दर खुल्है नाहीं । गुरु पूरे भागि मिला वणिआ ।
जब तक नाम नहीं मिलता । मनुष्य अंधा ही आता है । अँधा ही चला जाता है । यह चाबी सतगुरु के हाथ में है । जब तक गुरु चाबी नहीं लगायेगा । अन्दर का परदा अन्दर का गुप्त द्वार नहीं खुलेगा । अतः ऐसे सत्य शब्द मार्गी गुरु नाम अभ्यासी गुरु की तलाश पूरे जतन से करो ।


इस दुनियाँ को पैदा करने वाली ताकत शब्द है । शब्द ही मुक्ति का दाता है । शब्द से खंड बृह्मांड की सत्ता संचालित हो रही है । अगर मनुष्य जन्म पाकर भी अभागे तूने शब्द ( नाम ) नहीं पाया । तो इस जन्म लेने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ । अगर कोई मनुष्य इस दुनियाँ से खुशी खुशी मरकर जाता है । तो वह केवल शब्द का अभ्यासी ही होता है । जिसे मरने में भी आनन्द आता है । बाकी दुनियाँ के सब लोग चाहे वह बादशाह हो । या भिखारी । मरते समय रोते बिलखते हुये ही भयंकर यमदूतों के हाथ पिटते हुये जाते हैं । 
लेकिन इस भेद को छुपाया क्यों जाता है ?
गुरु नानक साहब कहते हैं - जिनि हरि पाइओ । तिनहि छिपाइओ ।
कबीर साहब कहते हैं - राम पदारथ पाय के कबिरा गांठ न खोल ।
अब जो कोई व्यक्ति पारबृह्म सत्ता में शब्द द्वारा जाता है । उसकी कीमत कौन कर सकता है ? अगर बहुत से अनपढों के बीच एक विद्वान आ जाये । तो उसकी विद्वता कैसे वे जानेंगे ?
गुरु नानक साहब कहते है - अखी बांझहु बेखणा बिनु कंता सुतणा । 
फ़िर भी लोगों ने संतो के साथ क्या बर्ताव किया ? गुरु नानक साहब के साथ क्या क्या न किया । हजरत मुहम्मद साहब को मक्के से निकालकर मदीना भेज दिया । एक गुफ़ा में उन्हें तीन दिन तक भूखे रहना पङा । हजरत ईसा को सूली पर चङा दिया गया । शम्स तबरेज की खाल खींची गयी । अतः ये नाम सबको नहीं दिया जाता है । जो इसकी कदर करते हैं । जो इसका महत्व जानते हैं । यह उन्हीं को मिलता है ।
सपा बाङ समुंद घर शेराँ पए बुकन । जे जम होवे पाहरू प्रेमी न सकन । 
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email