08 जून 2011

रानी इन्द्रमती का सत्यलोक जाना

कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! तब यह सब रानी ने मेरे पास आकर कहा । और मैंने उसे विघ्न डालकर बुद्धि फ़ेरने वाले काल निरंजन का चरित्र सुनाया । उसने राजा की बुद्धि किस तरह फ़ेर दी । और इसके बाद मैंने रानी को भविष्य के बारे में बताया ।
मैंने रानी से कहा - हे रानी सुनो । काल निरंजन अपनी कला से छल का रूप धारण करेगा । साँप बनकर कालदूत तुम्हारे पास आयेगा । और तुम्हें डसेगा । ऐसा मैं तुम्हें पहले ही बताये देता हूँ । इसलिये मैं तुमको बिरहुली मन्त्र बताता हूँ । जिससे काल रूपी सर्प का सब जहर दूर हो जायेगा । फ़िर यम तुमसे दूसरा धोखा करेगा । वह हँस वर्ण का सफ़ेद रूप बनाकर तुम्हारे पास आयेगा । और मेरे समान ग्यान तुम्हें समझायेगा ।
वह तुमसे कहेगा - हे रानी ! मुझे पहचान । मैं काल निरंजन का मान मर्दन करने वाला हूँ । और मेरा नाम ग्यानी करुणामय है । इस प्रकार काल तुम्हें ठगेगा । मैं उसका हुलिया भी तुम्हें बताता हूँ ।
कालदूत का मस्तक छोटा होगा । और उसकी आँखों का रंग बदरंग होगा । और उसके दूसरे सब अंग श्वेत रंग के होंगे । ये सब काल के लक्षण मैंने तुम्हें बता दिये ।
तब रानी ने घबराकर मेरे चरण पकङ लिये । और बोली - हे प्रभु ! मुझे सत्यलोक ले चलो । यह तो यम का देश है । जिससे मेरे सब दुख कष्ट मिट जायें ।
तब मैंने कहा - हे रानी ! सत्यनाम दीक्षा से यम से तुम्हारा सम्बन्ध टूट गया है । और तुम सत्यपुरुष की आत्मा हो गयी हो । अब तुम इस सत्यनाम का सुमरन करो । तब ये प्रपंची काल निरंजन तुम्हारा क्या बिगाङ लेगा । जब तक तुम्हारी आयु पूरी न हो । इसी नाम का सुमरन करो । जब तक आयु का ठेका पूरा न हो । जीव सत्यलोक नहीं जा सकता । इस काल निरंजन की कला बहुत भयंकर है । वह संसार में जीवों के पास हाथी रूप में आता है । परन्तु सिंह रूपी सत्यनाम का सुमरन करते ही सुमरने वाले का भय काल निरंजन मानता है । और सामने नहीं आता ।
तब रानी बोली - हे साहिब ! जब काल निरंजन सर्प बनकर मुझे सताये । और हँस रूप धारण कर भरमाये । तब फ़िर आप मेरे पास आ जाना । और मेरी हँस जीवात्मा को सत्यलोक ले जाना । यही मेरी विनती है ।
कबीर साहब बोले - हे रानी ! काल सर्प और मानव रूप की कला धरकर तुम्हारे पास आयेगा । तब मैं उसका मान मर्दन करूँगा । मुझे देखते ही काल भाग जायेगा । उसके पीछे मैं तुम्हारे पास आऊँगा । और तुम्हारे जीव को सत्यलोक ले जाऊँगा ।
हे धर्मदास ! इतना कहकर मैंने स्वयँ को छुपा लिया । और तब तक्षक सर्प बनकर कालदूत आया । जब आधी रात हो गयी थी । तब रानी अपने महल में आकर पलंग पर लेट गयी । और सो गयी । उसी समय तक्षक ने आकर रानी के माथे में डस लिया ।
तब रानी ने जल्दी ही राजा से कहा - तक्षक ने मुझे डस लिया है । इतना सुनते ही राजा व्याकुल हो गया । और विष उतारने वाले गारुङी ( ओझा ) को बुलाया ।
रानी इन्द्रमती ने साहिब में सुरति लगाकर उनका दिया बिरहुली मन्त्र जपा । और गारुङी से कहा । तुम दूर जाओ । तुम्हारी आवश्यकता नहीं है । रानी ने राजा से कहा । सदगुरु ने मुझे बिरहुली मन्त्र दिया है । जिससे मुझ पर विष का प्रभाव नहीं होगा ।
ऐसा कहते हुये जाप करती हुयी रानी उठकर खङी हो गयी । राजा चन्द्रविजय अपनी रानी को ठीक देखकर बहुत प्रसन्न हुआ ।
हे धर्मदास ! रानी के बिना किसी नुकसान के ठीक हो जाने पर वह कालदूत वहाँ गया । जहाँ बृह्मा विष्णु महेश थे । और बोला - मेरे विष का तेज भी इन्द्रमती को नहीं लगा । सत्यपुरुष के नाम प्रताप से सारा विष दूर हो गया ।
तब विष्णु ने कहा - हे यमदूत सुन । तुम अपने सब अंग सफ़ेद बना लो । मेरी बात मानों । और छल करके रानी को ले आओ ।
तब उस कालदूत ने ऐसा ही किया । और रानी के पास मेरे ( कबीर साहब जैसा ) वेश में आकर बोला - हे रानी ! तुम क्यों उदास हो । मैंने तुम्हें दीक्षा मन्त्र दिया है । तुम जान बूझ कर ऐसी अनजान क्यों हो रही हो । हे रानी ! मेरा नाम करुणामय है । मैं काल को मारकर उसकी ऐसी पिसाई कर दूँगा । जब काल ने तक्षक बनकर तुम्हें डसा । तब भी मैंने तुम्हें बचाया । तुम पलंग से उतरकर मेरे चरण स्पर्श करो । और अपनी मान बङाई छोङो । मैं तुम्हें प्रभु के दर्शन कराऊँगा ।
लेकिन मेरे द्वारा पहले ही बताये जाने से रानी ने उसको पहचान लिया । और उसकी आँख में तीन रेखायें देखीं । पीली सफ़ेद और लाल । फ़िर उसका छोटा मस्तक देखा । तब रानी मेरे वचनों को याद करती हुयी बोली - हे यमदूत ! तुम अपने घर जाओ । मैंने तुम्हें पहचान लिया है ।
कौवा जो बहुत सुन्दर वेश बनाये । परन्तु वह हँस की सुन्दरता नहीं पा सकता । वैसा ही मैंने तुम्हारा रूप देखा । मेरे समर्थ गुरु ने मुझे पहले ही सब बता दिया था ।
यह बात सुनकर यमदूत ने बहुत क्रोध किया । और बोला - मैंने कितना बारबार तुम्हें कहकर समझाया । फ़िर भी तुम नहीं मानी । तुम्हारी बुद्धि फ़िर गयी है । ऐसा कहकर वह रानी के पास आया । और उसने रानी को थप्पङ मारा । जिससे रानी भूमि पर गिर गयी । और उसने मेरा ( कबीर साहब ) सुमरिन किया । और बोली - हे सदगुरु ! मेरी सहायता करो । मुझको ये क्रूर काल बहुत दुख दे रहा है ।
हे धर्मदास ! मेरा यह स्वभाव है कि भक्त की पुकार सुनते ही मुझसे नहीं रहा जाता । इसलिये मैं क्षण भर मैं इन्द्रमती के पास आ गया ।
मुझे देखते ही रानी को बहुत प्रसन्नता हुयी । मेरे आते ही काल वहाँ से चला गया । उसके थप्पङ से जो अशुद्धि हुयी थी । मेरे दर्शन से दूर हो गयी ।
तब रानी बोली - हे साहिब ! मुझे यम की छाया की पहचान हो गयी । मेरी एक विनती सुनिये । अब मैं मृत्युलोक में नहीं रहना चाहती । हे साहिब ! मुझे अपने देश सत्यलोक ले चलिये । यहाँ तो बहुत काल कलेश है । यह कहकर वह उदास हो गयी ।
हे धर्मदास ! उसकी ऐसी विनती सुनकर मैंने उस पर से काल का कठिन प्रभाव समाप्त कर दिया । फ़िर उसकी आयु का ठीका ( शेष आयु का अधिकार - समय से पहले पूरा करना ) पूरा भर दिया । और रानी के हंस जीव को लेकर सत्यलोक चला गया ।
मैंने उसे लेकर मान सरोवर दीप पहुँचाया । जहाँ पर माया कामिनी किलोल क्रीङा कर रही थी । अमृत सरोवर से उसे अमृत चखाया । तथा कबीर सागर पर उसका पाँव रखवाया ।
उसके आगे सुरति सागर था । वहाँ पहुँचते ही रानी की जीवात्मा प्रकाशित हो गयी । तब उसे सत्यलोक के द्वार पर ले गया । जिसे देखकर रानी ने परम सुख अनुभव किया ।
सत्यलोक के द्वार पर रानी की हँस आत्मा को देखकर वहां के हँसो ने दौङकर रानी को अपने से लिपटा लिया । और सबने स्वागत करते हुये कहा - तुम धन्य हो । जो करुणामय स्वामी को पहचान लिया । अब तुम्हारा काल निरंजन का फ़ंदा छूट गया । और तुम्हारे सब दुख द्वंद मिट गये । हे इन्द्रमती मेरे साथ आओ । तुम्हें सत्यपुरुष के दर्शन कराऊँ ।
ऐसा कहकर मैंने सत्यपुरुष ने विनती की - हे सत्यपुरुष ! अब हँसो के पास आओ । और एक नये हँस को दर्शन दो । हे बन्दीछोङ आप महान कृपा करने वाले हो । हे दीन दयालु दर्शन दो ।
तब पुष्प दीप का पुष्प खिला । और वाणी हुयी - हे योग संतायन सुनो । अब हँसो को ले आओ । और दर्शन करो । तब ग्यानी जी हँसो के पास आये । और उन्हें ले जाकर सत्यपुरुष का दर्शन कराया । सब हँसो ने सत्यपुरुष को दण्डवत प्रणाम किया । तब आदि पुरुष ने चार अमृत फ़ल दिये । जिसे सब हँसो ने मिलकर खाया ।
रानी इन्द्रमती का सत्यलोक जाना
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