10 जून 2011

हम दोनों में बहनों जैसा प्यार है ।

हैलो जी ! लोग कहते हैं कि - मेरी शक्ल काजोल जैसी है । मेरा नाम प्रीती शर्मा है । मैं इस फोटो में काली साडी पहने हुए हूँ । मैं लुधियाना की रहने वाली हूँ । इस समय मैं पूना में डिगरी कर रही हूँ । मैं लास्ट सन्डे अपने घर लुधियाना आयी थी ।
तब बनदीप ने मुझे आपके ब्लाग के बारे में बताया । उस दिन वो पूरा दिन मेरे घर ही रही । हम दोनों के घर बिलकुल साथ साथ है ।
उसने मुझे आपके सारे ब्लाग खोलकर दिखाये । परमात्मा सत्यकीखोज वगैरह । वैसे मैं जब लुधियाना में थी । तब बनदीप के साथ रोज मन्दिर जाती थी । हम दोनों 1 ही स्कूल में पढी हैं । हम दोनों 1 ही क्लास में थी । इसलिये रोज सुबह स्कूल जाने से पहले मन्दिर जाती थी । वैसे तो स्कूल । कालेज और युनिवर्सिटी को भी विध्या का मन्दिर बोला जाता है ।
बेशक मैं हिन्दु परिवार से हूँ । और बनदीप सिख परिवार से । लेकिन फ़िर भी हम दोनों में बहनों जैसा प्यार है । घर भी बिल्कुल पास पास । स्कूल भी 1 । क्लास भी 1 । लेकिन बनदीप का आर्टस मे इन्ट्रेस्ट था । इसलिये उसने B A में एडमिशन लिया । मेरा मैथ्स में इन्ट्रेस्ट था । इसलिये मैंने कामर्स में एडमिशन लिया ।
मेरे पिताजी बैंक में जाब करते हैं । और मम्मी गृहणी हैं । मेरा कोई भाई बहन नही हैं । मैं अपने माता पिता की इकलौती बेटी हूँ । लेकिन मैंने तो मेरी प्यारी बनदीप को अपनी बहन माना हुआ है । मुझे बनदीप ने आपके

ब्लाग्स के अलग अलग किस्म के लेख दिखाये । मेरे लिये ये 1 नया और अनोखा अनुभव था । मैं अब वापिस पूने आ गयी हूँ । इस समय मैं पूने अपने हास्टल से ही आपको मैसेज कर रही हूँ । मैं अपने अन्य सहपाठियों और हास्टल में साथ रहने वाली लडकियों को भी आपके ब्लाग के बारे में बताऊँगी । येस ! रियली इंडिया इज ग्रेट ।

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नमस्कार प्रीती जी ! सत्यकीखोज पर आपका बहुत बहुत स्वागत है । आपसे मिलकर बेहद खुशी हुयी । युवा लोग जब धार्मिक होते हैं । तभी क्रान्ति होती है । इंसान जब इसी उमृ से प्रभु से प्रेम करता है । तो जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लेता है । बुढापा आने पर हाथ पैर शरीर कमजोर हो जाता है । बहुत से रोग घेर लेते हैं । तब भक्ति इतनी आसान नहीं होती । फ़िर पछताना ही होता है ।
वास्तव में दुनियाँ के सभी सम्बन्ध इस जीवन तक ही साथ रहते हैं । पर परमात्मा तो जन्म जन्म से आपके साथ है । आप उसको भूल सकते हो । पर वह आपको कभी नहीं भूलता । अतः उससे भी प्रेम करना सीखो । वह सिर्फ़ हमारे ( प्रेम ) भाव का भूखा है ।
एक बात और - कभी अकेले दुकेले जब हम असहाय स्थिति में होते हैं । किसी अपने की सहायता की आवश्यकता महसूस कर रहे होते हैं । और कोई भी नहीं होता । तब भी वह हमारे साथ होता है । बस अपनी अग्यानता से हमें

इस बात का विश्वास नहीं होता । कभी उसको सच्चे दिल से याद कर आजमा कर देखना ।
आपके इस जीवन में माँ और पिता दो है । पर परमात्मा आपका माँ और पिता दोनों ही है । इसलिये जब भी आपको मौका मिले । थोङा रेस्ट के टाइम में उसका ध्यान करते हुये आँख बन्द कर लो । और पूरे विश्वास से - जैसे आप अपने पिताजी से बात करती हो । वैसा ही मानते हुये । मानों आप परमपिता से फ़ेस टू फ़ेस कह रही हो - हे प्रभु ! हम आपके नादान बच्चे हैं । हमारी उँगली सदा थामे रखना । हमें सच्ची और नेकी की राह दिखाना । हमारा आपके अलावा भला और है ही कौन ।
बस इतना ही सच्चा भाव भी प्रभु को दृवित कर देता है । और वे तुरन्त आपकी बात सुनते हैं । ना मानों । तो करके देखना । खेलो कूदो । पढो लिखो । हुल्लङबाजी खूब करो । मस्ती शैतानी खूब करो । पर ये प्रार्थना और ऐसा प्रेम भी परमात्मा से करो ।
बस एक ध्यान रखना है । ये दस बीस मिनट की प्रार्थना करते समय आपको सिर्फ़ परमात्मा या साहिब भाव से ध्यान करना है । न कि आप परम्परा से सुनते समझते आये किसी देवी देवता भगवान ईश्वर आदि की कथा जोङ दो । वो परमात्मा का ध्यान भक्ति नहीं है । वे बेचारे खुद उसका ध्यान करते हैं ?
और ऐसा सिर्फ़ अकेले मत करो । सभी फ़्रेंडस को भी प्रेरित करो । हल्ला गुल्ला एक होकर करते हो । तो प्रभु की भक्ति भी करो । साहिब..साहिब ! आप ही हो ।

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अपने सभी पाठकों से - श्री महाराज जी आत्मग्यान का एक बेहद सरल प्रयोग बताते हैं । जो बहुत शीघ्र और उच्च रिजल्ट देता है । इसमें त्राटक की उच्च एकाग्रता भी मिलती है । मेमोरी भी शार्प होती है । टेंशन आदि भी सहज दूर होती है । बस आपके घर तीन चार फ़ुट बङा दर्पण ( मिरर ) दीवाल में लगा होना चाहिये । मेरे घर तो दो तीन लगे हैं ।
ये दर्पण इतनी ऊँचा हो कि आप कुर्सी पर बैठकर आराम से अपना प्रतिबिम्ब देख सको । तो बहुत ही अच्छा है । न होने पर ऐसी व्यवस्था कर लेना कोई बङी बात भी नहीं है ।
- अब आप सहज भाव से दर्पण देखो । इस समय तीन हैं । 1 दर्पण  2 देखने वाला और 3 दिखाई देने वाला
कुछ देर आप अपनी ही छवि को देखते रहो । जैसे आप शरीर में गन्दे साफ़ । लाल वस्त्र । हरे वस्त्र आदि जो भी जैसे हो । वैसे ही दर्पण में नजर आते हो ।

कुछ देर इसी तरह देखते रहें । थोङे अभ्यास के बाद आपको अपनी छवि नजर आना बन्द हो जायेगी । दर्पण देखते समय यह भाव लायें कि - दर्पण में जो दिख रहा है । वो तो मेरा प्रतिबिम्ब है । पर जो देखने वाला है । वह असल में कौन है ?
ठीक इसी तरह परमात्मा ( देखने वाला ) दर्पण ( अंतःकरण - जिसको मोटे तौर पर मन भी कह देते हैं । ) और दर्पण में नजर आता प्रतिबिम्ब ( जीव या मनुष्य ) बस इतने ही मेन सिस्टम से यह पूरा खेल चल रहा है । तभी तो शास्त्र आदि में कहा गया है । परमात्मा और हमारे बीच बहुत मामूली सा वो भी अग्यान ( मन के कारण - क्योंकि इससे ही हम सब कुछ मान रहे हैं ) के कारण फ़ासला है ।
*** और अन्त में आप सबका बेहद आभारी हूँ दोस्तो । जो मुझे सतसंग करने । सुमरन करने का मौका दिलाते हो । जय राम जी की ।
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