30 जून 2011

तू ही तो असली शंहशाह है

आपे बखसे सबदि मिलाए । तिसदा सबदु अथाहा हे ।
जब वह साहिब किसी कौम को । किसी इंसान को । किसी धर्म मजहब को बख्शना चाहता है । तो वह अपने किसी प्यारे को उस कौम में भेजकर उन्हें समझाता है । हिदायत देता है । लेकिन जितने भी पहुँचे हुये सन्त और कामिल फ़कीर हुये हैं । उन सबका कहना एक समान ही है ।
लेकिन आजकल के जो बनाबटी सन्त फ़कीर वेश धरकर घूमते हैं । उनके सबके धर्म मजहब जातियाँ अलग अलग हैं । अलग वाणी बोलते हैं । अलग ग्यान बताते हैं । राम रहीम में भेद करते हैं । और ये अग्यानी मौत के वक्त एक ही हो जाते हैं । सबका एक ही जैसा हाल तो होता है ।
जितने भी कामिल हुये । पूरे सन्त फ़कीर हुये । सभी ने एक ही बात कही है - किसी कामिल मुर्शिद या पूर्ण सन्त

या पहुँचे हुये फ़कीर से रास्ता ( नाम उपदेश ) लेकर अपनी सुरति को अन्दर होते उस शब्द या कलमे के साथ जोङ दो ।
वे ऐसे फ़कीर सन्त शरीयतों ( कर्मकांड ) को छूते भी नहीं । बल्कि कहते हैं कि अपनी अपनी कौम अपने अपने मजहब अपने देश अपने गांव में रहते हुये ही अन्दर का परदा खोल लो । तुम सबका वह कुल मालिक वाहिद हु ला शरीक एक है । तथा उसका कोई अलग भागीदार नहीं है । वह अथाह है । अपार है । उसकी तालीम कुल आलम यानी सारे संसार के लिये एक ही है । जब वह बख्शता है । तो मनुष्यों के लिये कुछ न कुछ इंतजाम करता है ।
जीउ पिंडु सभु है तिसु केरा । सचा साहिबु ठाकुर मेरा ।
नानक गुरवाणी हरि पाइआ । हरि जपु जाप समाहा हे ।
हे मालिक ! मेरा जीव प्राण पिंड सब तेरा ही तो है । तू ही हमारा ठाकुर है । तू ही तो असली शंहशाह है । मेरा तन मन धन सब तेरा है । मैं तुझमें ही समाया हूँ । मेरा तो बस अब तू ही तू है ।
और तू मिलता किस तरह से है ?
गुरु और उसके नाम उपदेश के जरिये से । क्योंकि और कोई जरिया तो है ही नहीं । जो पाक रूह की दौलत है । वह सारे संसार की एक ही है । एक ही होती है ।
हजरत मुहम्मद साहब अजरत अली को यही समझाते हैं - तू पहुँचे गुरु की शरण ले । भाई ! गुरु के सिवाय तेरा कोई दूसरा नहीं है । इस्लाम के बहुत से फ़िरके ऐसे हैं । जो कहते हैं कि - मुर्शिद या गुरु की कोई जरूरत नहीं है । लेकिन यह अटल सत्य है कि गुरु के वगैर खुदा भगवान नहीं मिलता । फ़िर वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई कोई भी क्यों न हो । सच्चे गुरु के वगैर असली ग्यान और मुक्ति नहीं होती ।
गुफ़्त पैगम्बर अली रा कै अली । शेरे हक्की पहिलवानी पुर रुई ।
अली सच्चा फ़कीर था । बहुत नाम बन्दगी करने वाला सच्चा अभ्यासी था । और बहादुर भी बहुत था । एक बार उसकी टांग में तीर लग गया । जब लोग तीर निकालने लगे । तो बहुत दर्द हुआ । इतना कि उससे सहा नहीं गया ।

लोगों ने पूछा - फ़िर कैसे निकालें भाई ? निकालने में दर्द तो होगा ही ।
तब अली बोला - जब मैं उस मालिक की नमाज में खङा होऊँ । तब निकालना ।
जब वह नमाज पढने लगा । रूह मालिक से लग गयी । और लोगों ने तीर निकाल दिया ।
 तब पैगम्बर साहब बोले - तू शेर है । पहलवान है । लेकिन सच्ची पहलवानी कौन सी हुयी ? किसी मुर्शिद की पनाह में जाना । किसी सच्चे सन्त फ़कीर की शरण में जाना ।
या अली अज जुमलाए ताआते राह । बरगुजी तू सायाए खासे अलाह ।
हे अली ! जो उस रब के खास बन्दे हैं । उनकी पनाह ले । तू उनकी शरण में जा । उनके ही साये में रह ।
तू बरौ दर सायाए आकल गुरेज । ता वही जाँ दुश्मने पिनहाँ सतेज ।
जब तू उनके पास जायेगा । तो काम क्रोध लोभ मोह अहंकार जो तेरे दुश्मन हैं । सब तेरे गुलाम हो जायेंगे । और तेरा कहना मानते हुये तेरे आदेश में ही चलेंगे ।
अज हमह ताआते अनीयत लाइक अस्त । सबक याबी बर हराँ को साबक अस्त ।
चूँ गरिफ़्तो पैरहन तसलीम शौ । हमचो मूसा जेरे हुक्मे खिजरे रौ ।
जब तूने गुरु धारण कर लिया । उसका पल्ला पकङ लिया । तो फ़िर अब कोई उज्र एतराज न कर । चाहे वह जायज ( उचित ) कहें । या नाजायज ( अनुचित ) कहें । ( क्योंकि सच्चे गुरु की हर बात में एक रहस्य छिपा हुआ होता है ) उसके हुक्म को पूरा कर । और ऐसा कोई एतराज न कर । जैसा कि हजरत मूसा ने हजरत खिजर साहब के साथ किया था ।
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हजरत मूसा और हजरत खिजर साहब के बारे में अक्सर लोगों ने पढा होगा । फ़िर भी इस दिलचस्प दास्तान का ब्लाग पर भी प्रकाशन होगा । और कुछ मैटर पहले से भी प्रकाशित है ।

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