05 जून 2011

क्रोधी आदमी अस्थायी पागल है

बुद्ध ने कहा है कि - जब मैंने जाना । तो मैंने पाया है कि अदभुत हैं वे लोग । जो दूसरों की भूल पर क्रोध करते हैं । क्यों ? तो बुद्ध ने कहा कि अदभुत इसलिए कि भूल दूसरा करता है । दंड वह अपने को देता है । गाली मैं आपको दूं । और क्रोधित आप होंगे । दंड कौन भोग रहा है ? दंड आप भोग रहे हैं । गाली मैंने दी । क्रोध में जलते हम हैं । राख हम होते हैं । लेकिन ध्यान वहां नहीं होता । इसलिए धीरे धीरे पूरी जिंदगी राख हो जाती है । और हमको भ्रम यह होता है कि हम जान गये हैं । हम जानते नहीं । क्रोध की सिर्फ स्मृति है । और क्रोध के संबंध में शास्त्रों में पढ़े हुए वचन हैं । और हमारा कोई अनुभव नहीं । जब क्रोध आ जाये । तो उस आदमी को धन्यवाद दें । जिसने क्रोध पैदा करवा दिया । क्योंकि उसकी कृपा । उसने आत्म निरीक्षण का 1 मौका दिया । भीतर आपको जानने का 1 अवसर दिया । उसको फौरन धन्यवाद दें कि मित्र धन्यवाद । और अब मैं जाता हूं । थोड़ा इस पर ध्यान करके वापस आकर बात करूंगा । द्वार बंद कर लें । और देखें कि भीतर क्रोध उठ गया है । हाथ पैर कसते हो । कसने दें । क्योंकि हाथ पैर कसेंगे । हो सकता है कि क्रोध में । अंधेरे में । हवा में । घूंसे चलें । चलने दें । द्वार बंद कर दें । और देखें कि - क्या क्या होता है ? अपनी पूरी पागल स्थिति को जानें । और पागलपन को पूरा प्रकट हो जाने दें अपने सामने । तब आप पहली बार अनुभव करेंगे कि - क्या है यह क्रोध । जब आप इस पागलपन की स्थिति को अनुभव करेंगे । तो कांप जायेंगे भीतर से कि यह है क्रोध । यह मैंने कई बार किया था । दूसरे लोगों ने क्या सोचा होगा । मनोवैज्ञानिक कहते हैं - क्रोध संक्षिप्त रूप में आया हुआ पागलपन है । थोड़ी देर के लिए आया हुआ पागलपन है । क्षणिक पागलपन है । क्षण भर में आदमी उसी हालत में हो गया । जिस हालत में कुछ लोग सदा के लिए हो जाते हैं । क्रोध में जलते हुए आदमी में । और पागल आदमी में मौलिक अंतर नहीं है । अंतर सिर्फ लंबाई का है । पागल आदमी स्थायी पागल है । क्रोधी आदमी अस्थायी पागल है । दूसरे ने आपको क्रोध में देखा होगा । इसलिए दूसरे कहते है कि यह बेचारा कितना पागल हो गया है । यह क्या करता है ? आपने कभी देखा है - अपने को ? अतः द्वार बंद कर लें । और अपनी पूरी हालत को देखें कि यह क्या हो रहा है । और रोके मत । प्रकट होने दें । जो हो रहा है । और उसका पूरा निरीक्षण करें । तब आप पहली दफा परिचित होंगे । यह है - क्रोध । ओशो ।
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तुम 1 पन्ना पढ़ते हो किताब का । पूरा पन्ना पढ़ जाते हो । अचानक खयाल आता है कि अरे, पढ़ते तो रहे । लेकिन चूक गए । यह किसको याद आया ? पढ़ने के अतिरिक्त भी तुम्हारे पीछे कोई खड़ा है - अंतिम निर्णायक । जो कहता है - फिर से पढ़ो । चूक गए । यह जो अंतिम है तुम्हारे भीतर । यही तुम्हारा स्वरूप है ।
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लोगों की भीड़ में तुम्हें कभी सच नहीं मिलेगा । यह सारी की सारी भीड़ मुझे समझ न सकेगी । मुझे समझने वाले लोग बहुत थोड़े हैं । और वह हमेशा रहेंगे आते रहेंगे ।
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धर्मगुरु तो हैं - पंडित । पुरोहित । मौलवी । अयातुल्ला खोमैनी । पोप पाल । पुरी के शंकराचार्य । ये सब धर्मगुरु हैं । और ये धर्मगुरु निश्चित ही बुद्धू हैं । इसमें मैं जरा भी संकोच नहीं करता हूं । मैं सत्य को बिलकुल नग्न ही कह देना पसंद करता हूं । ये अगर बुद्धू न होते । तो धर्मगुरु न होते । आदि शंकराचार्य धर्म हैं । मगर ये नकलची हैं । ये कोई शंकराचार्य हैं ? ये कार्बन कापियां हैं । और इस जगत में इससे बड़ा कोई अपमान नहीं है आदमी का कि वह कार्बन कापी हो जाए । प्रत्येक व्यक्ति मौलिक है । और मौलिक होने में ही उसका अपना गौरव है । और अपने गौरव में ही परमात्मा का गौरव है । जो कार्बन कापी होकर रह जाता है । वह 2 कौड़ी का हो जाता है ।
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वचन कर्म मन मोरी गति । भजन करही निष्काम ।
तिन्ह के ह्रदय कमल में ।  मैं करहू सदा विश्राम ।
सिद्ध योग का अभ्यास किया नहीं जा सकता । यह अपने आप होता है । सिद्ध योग के अभ्यास का मतलब है । हमेशा - धैर्य । समभाव । कृतज्ञता । और आनंद के राज्य में रहना ।
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ध्यान में प्रवेश की 3 पमुख विधियां हैं । प्रथम - त्राटक द्वारा । द्वितीय - स्वांस द्वारा । तृतीय - स्वर ( बीज़ मन्त्र जप ) नाद द्वारा ! स्वांस द्वारा - श्वास के आवागमन पर ध्यान एकत्रित करके हम ध्यान की अवस्था की प्राप्ति कर सकते हैं । यद्यपि यह प्रक्रिया कुछ जटिल हैं । एवं अधिक परिश्रम की मांग करती हैं । किन्तु इस प्रक्रिया के द्वारा ध्यान की प्राप्ति पहले के मुकाबले बहुत शीघ्र हो सकती हैं ।
यह प्रक्रिया तक़रीबन 1 महीने की हैं । जिसमें आपको प्रतिदिन सुख आसन में बैठना हैं । एवं अपनी श्वास पर सारा ध्यान एकत्रित करना हैं । श्वास अन्दर गई । फिर बाहर आई । नाभि उठी । फिर नाभि नीचे हुई । अपना पूरा ध्यान आसपास की घटनाओं से हटाकर पूरी तरह से अपनी श्वास पर एकत्रित करना होगा । इस प्रकार आसपास की घटनाओं से आसानी से ध्यान हटाना । प्रारंभ में बहुत कठिन प्रतीत होगा । परन्तु यदि आप श्वास पर ध्यान एकत्रित करने मे सफल हो गए । तो आपके लिए ध्यान की अवस्था को पा लेना बहुत आसान हो जाएगा ।
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जग में भक्त कहावई । चुकट चून नहिं देय ।
सिष जोरू का ह्वै रहा । नाम गुरु का लेय ।
- कुछ मनुष्य संसार में भला तो दिखना चाहते हैं । पर वह
किसी थोड़ा चून ( आटा ) भी नहीं दे सकते । ऐसे लोगों के मस्तिष्क में तो परिवार के हित का ही भाव रहता । पर अपने मुख से केवल परमात्मा का नाम लेते रहते हैं ।
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दिमाग एकदम तेज चलने लगेगा - बादाम 5 नग रात को पानी में गलाएं । सुबह छिलके उतारकर बारीक पीसकर पेस्ट बना लें । अब 1 गिलास दूध और उसमें बादाम का पेस्ट घोलें । इसमें 2 चम्मच शहद भी डालें । और ग्रहण करें । यह मिश्रण पीने के बाद 2 घंटे तक कुछ न लें । 2 अखरोट भी स्मरण शक्ति बढाने में सहायक है । इसका नियमित उपयोग हितकर है । 20 ग्राम अखरोट और साथ में 10 ग्राम किशमिश लेना चाहिए ।
3 ब्राह्मी दिमागी शक्ति बढ़ाने की मशहूर जड़ी बूटी है । इसका 1 चम्मच रस रोज पीना लाभदायक होता है । इसके 7 पत्ते चबाकर खाने से भी वही लाभ मिलता है । ब्राह्मी मे एन्टी ऑक्सीडेंट तत्व होते हैं । जिससे दिमाग की शक्ति बढऩे लगती है ।
4 दालचीनी के 10 ग्राम पाउडर को शहद में मिलाकर चाट लें । कमजोर दिमाग की अच्छी दवा है । अदरक, जीरा और मिश्री तीनों को पीसकर लेने से कमजोर याददाश्त की स्थिति में लाभ होता है ।
सावधानी - अधिक गर्म पानी । अधिक गर्म दूध । अधिक धूप में बच्चों को शहद का प्रयोग हानिकारक साबित होता है । साथ ही घी की समान मात्रा प्रयोग करने पर यह विष की भाँति कार्य करने लगता है । इसलिए इन स्थितियों में इसका प्रयोग सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए । दालचीनी का प्रयोग सर्दियों में ही करें । अखरोट और बादाम का प्रयोग रात्रि को भिगो के वर्ष भर सकते हैं । साथ में किशमिश जरूरी है । लें दूध और किशमिश में 2 घंटे का अंतर रखे । ब्राह्मी का प्रयोग गर्मियों में विशेष लाभकारी है । भोजन तभी करे । जब भूख लगे । क्योंकि मेवे में कैलोरी बहुत होती हैं । जो आपकी आवश्यकता जल्दी पूरी कर देती हैं । उसके ऊपर पेट भर कर खाने का मतलब है - पाचन तंत्र पर भार डालना । कम खायें । अच्छा खायें । टेंशन न लें । पेट साफ रखे । और पानी खूब पिए । सारे प्रयोग 1 साथ करे | अपनी प्रकृति के अनुसार प्रयोग करें । 

Internal Beauty stimulates energy of unbearable emotion which leads to divine soul ...It can’t be define in words its only to feel the same ( Sufiyana)

The day of your initiation into sannyas becomes your real birthday. You disown the past and you tell me: “I am ready for a new future - I will not continue my past; I am ready to discontinue it. And I will not insist on my past - I disclaim, I disown it. And I am absolutely open: wherever you lead, I am ready. I have no prejudices. Osho

Your life is short, and your life is slipping out of your fingers. Each moment you are less, each day you are less, and each day you are less alive and more dead! Each birthday is a death day; one more year is gone from your hands. Be a little more intelligent.Osho 
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