18 जून 2011

ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ

ध्यान विधि - अपना मुंह बंद करो । मुंह वास्तव में बहुत बहुत महत्वपूर्ण है । क्योंकि वहीं से पहली क्रिया शुरू हुई । तुम्हारे ओठों ने पहली क्रिया की । मुंह के आसपास की जगह से हर क्रिया की शुरुआत हुयी । तुमने स्वांस अन्दर ली । तुम रोए । तुमने मां का स्तन ढूंढना शुरु किया । और तुम्हारा मुंह हमेशा सतत क्रियाशील रहा । जब भी तुम ध्यान के लिए बैठते हो । जब भी तुम मौन होना चाहते हो । पहली बात - अपना मुंह पूरी तरह से बन्द करो । अगर तुम मुंह पूरी तरह से बन्द करते हो । तुम्हारी जीभ तुम्हारे मुंह की तालु को छुएगी । दोनों ओंठ पूरी तरह से बन्द होंगे । और जीभ तालु को छुएगी । इसको पूरी तरह से बन्द करो । लेकिन यह तब ही हो सकेगा । जब तुमसे जो भी मैंने कहा - तुम उसका पालन करो । इससे पहले नहीं । तुम इसे कर सकते हो । मुंह बन्द करना बहुत बड़ा काम नहीं है । तुम एक मूर्ति की तरह बैठ सकते हो । मुंह को पूरी तरह बन्द किए । लेकिन यह क्रियाशीलता नहीं रोकेगा । अन्दर गहरे में विचार चलते रहेंगे । और अगर विचार चल रहे हैं । तो तुम ओठों पर सूक्ष्म कंपन अनुभव कर सकते हो । दूसरे इसे नहीं भी देख पाएं । क्योंकि वे बहुत सूक्ष्म हैं । लेकिन अगर तुम सोच रहे हो । तो तुम्हारे ओंठ थोड़े कंपित होते हैं । एक बहुत सूक्ष्म कंपन । जब तुम वास्तव में शिथिल होते हो । वे कंपन रुक जाते हैं । तुम बोल नहीं रहे हो । तुम अपने अन्दर कुछ क्रिया नहीं कर रहे हो । और तब सोचो मत । तुम करोगे क्या ? विचार आ जा रहे हैं । उन्हें आने और जाने दो । वह कोई समस्या नहीं है । तुम इसमें शामिल मत होना । तुम अलग, दूर बने रहना । तुम बस उन्हें आते जाते देखना । तुम्हें उनसे कोई मतलब नहीं है । मुंह बन्द रखो । और मौन रहो । धीरे धीरे विचार स्वयं बन्द हो जाते हैं । उन्हें होने के लिए तुम्हारे सहयोग की आवश्यकता होती है । अगर तुम सहयोग करते हो । तो वे होंगे । अगर तुम लड़ते हो । तब भी वे वहां होंगे । क्योंकि दोनों सहयोग हैं । एक समर्थन में । दूसरा विरोध में । दोनों एक तरह की क्रिया हैं । बस देखो । लेकिन मुंह बन्द रखना बहुत सहायक है । तो पहले, जैसा कि मैं लोगों का निरीक्षण करता हूं । मैं तुम्हें सलाह दूंगा । पहले जम्हाई लो । अपना मुंह जितना बड़ा हो सके । उतना खोलो । अपने मुंह को जितना ज्यादा तनाव दे सको दो । और पूरी तरह से जम्हाई लो । यह दर्द तक करने लगता है । इसे दो या तीन बार करो । यह मुंह को देर तक बन्द रखने में मदद करेगा । और फिर दो या तीन मिनट तक जिबरिश करो । अनर्गल, जोर से । जो भी मन में आए । इसे जोर से बोलो । और इसका मजा लो । उसके बाद मुंह बन्द कर लो । विपरीत छोर से चलना ज्यादा आसान है । अगर तुम अपना हाथ शिथिल करना चाहते हो । पहले इसे जितना हो सके । उतना तनाव देना ज्यादा अच्छा है । मुठ्ठी भींचो । और जितना हो सके । इसे उतना तनाव दो । ठीक विपरीत करो । और तब शिथिल करो । और तब तुम तंत्रिका तंत्र की गहरी शिथिलता अनुभव करोगे । मुद्राएं बनाओ । चेहरे बनाओ । विकृत आकृतियां बनाओ । जम्हाई लो । दो तीन मिनट अनर्गल प्रलाप करो । और तब मुंह बन्द कर लो । यह तनाव तुम्हें मुंह और ओठों को शिथिल करने में ज्यादा सहायक होगा । मुंह बंद करो । और फिर साक्षी बनो । जल्दी ही तुम पर एक मौन अवतरित होगा । निष्क्रिय हो जाओ । जैसे कि तुम एक नदी के पास बैठे हो । और नदी बह रही है । और तुम बस देख रहे हो । कोई उत्सुकता नहीं है । कोई जल्दी नहीं । कोई आपात स्थिति नहीं है । कोई तुम्हें विवश नहीं कर रहा है । अगर तुम भूल भी जाते हो । तो कुछ नहीं खोता । तुम बस साक्षी हो जाओ । बस देखो ।
बल्कि - देखो शब्द भी अच्छा नहीं है । क्योंकि यह " देखो " शब्द करने का अहसास देता है । बस देखो । कुछ भी करने को नहीं है । तुम बस नदी के किनारे बैठ जाओ । तुम देखो । और नदी बह रही है । या, तुम निष्क्रियता से आकाश को देखते हो । और बादल तैरते हैं । यह निष्क्रियता बहुत ही आवश्यक है । इसे समझना है । क्योंकि तुम्हारा सक्रियता का जुनून उत्सुकता बन सकता है । एक सक्रिय प्रतीक्षा बन सकता है । तब तुम सारी बात चूक जाते हो । तब सक्रियता पीछे के दरवाजे से दोबारा घुस चुकी है । एक निष्क्रिय साक्षी बनो । यह निष्क्रियता स्वत: तुम्हारे मन को खाली कर देगी । सक्रियता की लहरें, मन ऊर्जा की लहरें, धीरे धीरे शांत हो जाएंगी । और तुम्हारी सारी चेतना की सतह, लहर विहीन हो जाएगी । बिना किसी तरंग के । यह एक शांत दर्पण बन जाएगी - ओशो ।
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और ऐसा हमेशा से होता आया है । बुद्ध के समय उनके ही चचेरे भाई देवव्रत ने सैकड़ों लोगो का ग्रुप बनाकर बुद्ध की हत्या करने का प्रयास किया । जे. कृष्णमूर्ती के शिष्य जी.के. कृष्णमूर्ती ने भी उनसे अलग होकर उनके ट्रस्ट के धन संपत्ति आदि को अपने नाम धोखे से ट्रांसफर कर अपनी प्रथक सत्ता खड़ी कर ली । ऐसा इसलिये होता है । क्योंकि कुछ लोग शिष्य बनने का ढोंग रचकर अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये सदगुरु के पास आते हैं । उनकी सहज करुणा इसलिये उन्हें स्वीकार कर लेती है । क्योंकि उन्हें अस्तित्व पर विश्वास है । वह प्रत्येक के रूपांतरण में उत्सुक है । वह सभी को प्रेम के अतिरिक्त और कुछ दे ही नहीं सकते । क्योंकि उनके पास बांटने को प्रेम ही होता है । पर जब ऐसे लोग या तो अपनी पोल खुल जाने के भय से भाग खड़े होते हैं । या अपना प्रथक संगठन बना लेते हैं । ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ है - ओशो 
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