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29 जून 2011

real name is in every man, not in religion

रस कस खाए पिंडु बधाए । भेख करै गुरु सबदु न कमाए ।


जीवन में न तो गुरु मिला । और न ही गुरु की बात मानी । और न ही ( मोक्ष ) मार्ग मिला । सारी उमर ऐश आराम बिषय भोग में ही व्यर्थ गुजार दी । वास्तविकता में अपने लिये कुछ ( अक्षय धन या नाम कमाई जो परलोक में काम आती है ) भी न कमाया । खाली हाथ आया । और खाली हाथ चला गया । अगर किसी के घर में करोंङो रुपया दबा हो । पर उसको पता न हो । और न ही वो उसको निकाल पाये । और माँगते खाते हुये गरीबी में ही मर जाय । तो वह खाली हाथ आया । और खाली हाथ ही चला गया ।
ये इंसान चाहे कितने ही धर्म मजहब अपना ले । कितनी ही जाति कौम का हो जाय । कितने ही तरह के वेश ( धर्म के अनुसार वेशभूषा के कपङे पगङी टोपी और धार्मिक प्रतीक धारण करना ) बना ले । मगर उससे कुछ होने वाला नहीं है । अगर कोई आदमी दरोगा की ड्रेस पहन ले । तो क्या वह दरोगा हो जायेगा ?
इसी तरह जब तक नाम अन्दर नहीं आया । तो समझो । अभी कोई बात नहीं बन पायी ।
जिस प्रकार विध्य़ा की दौलत बिना मेहनत के नहीं मिलती । उसी प्रकार ये नाम की दौलत भी मेहनत और अभ्यास से ही प्राप्त होती है । यह कमाई की चीज है ।
पर यह मनुष्य विषय विकार में ही लगा रहता है । नाम की कमाई नहीं करता । तब इसका क्या हाल होगा ?


अंतरि रोगु महा दुखु भारी । बिसटा माहि समाहा हे ।

ये जीव ( मनुष्य ) बीमारी ( अपना भवरोग दूर करने के लिये ही खास इसे मनुष्य जन्म मिला था । ताकि अनगिनत जन्मों से भोगते 84 लाख योनियों के महा दारुण कष्ट से छूट सके । ) की हालत में आया था । और बीमार ही चला जाता है । इसकी आत्मा परदों में ढकी हुयी ही आयी थी । और परदे में ढकी ही चली गयी । आना जाना व्यर्थ रहा । अन्दर जो उद्धारक नाम था । उसका कोई फ़ायदा नहीं ले पाया । खोटे खोटे कर्मों में ही जीवन गंवाया । और आगे गन्दे गन्दे 84 लाख योनियों के कष्ट भोगने के लिये फ़िर से चला गया । क्योंकि जीवन में न निर्वाणी नाम मिला । न ही गुरु मिला ।
वह नाम न हिन्दी बोली में है । न अंग्रेजी । न तुर्की । न अरबी । न फ़ारसी । न और ही किसी बोली में । और न ही वह लिखने पङने में आता है । न ही बोलने में आता है । इसलिये दुनियाँ ( के सभी लोग ) किताबों ( धर्म पुस्तकों ) में लिखे नाम राम कृष्ण अल्लाह खुदा गाड आदि को ही पढ पढकर चली गयी । पर अविनाशी नाम जो स्वतः उसके घट में गूँज रहा है । नहीं जान पायी ।


बेद पङहि पङि बादु बखाणहि । घट महि बृहमु तिसु सबदि न पछाणहि ।

चाहे मनुष्य चारों वेद क्यों न पढ ले । बिलकुल उसका पंडित ग्यानी ही बन जाय । और वेद पढ पढकर कितने ही वाद विवाद क्यों न कर ले । उनमें जीतकर श्रेष्ठ भी हो जाय । पर जब तक इसकी सुरति अन्दर घट में खुद ही होते शब्द ( अविनाशी नाम ) से नहीं जुङती । तब तक इसके उद्धार और फ़ायदे की कोई बात नहीं बनती ।
कबीर साहब ने क्या खूब कहा है - नाम लिया तिन सब लिया चार वेद का भेद । बिना नाम नरके पङा पढ पढ चारो वेद ।
अगर वेद पढने से ही मुक्ति मिलती । तो रावण को मिलनी चाहिये थी । क्योंकि वह चारों वेदों का प्रकांड पंडित और ग्यानी था । रावण ने न सिर्फ़ चारों वेदों का गहन अध्ययन किया था । बल्कि वह उनका भाष्यकर्ता भी था । टीकाकार पंडित भी था ।

परन्तु उसकी करनी क्या थी ? परायी स्त्रियों को चुराता था । वही रावण जिसका पुतला दशहरा पर हर साल जलाया जाता है । इसलिये मुँह जबानी पढने से तोता रटन्त से कुछ भी हासिल न होगा ।
इसी संबन्ध में तुलसीदास कहते हैं -

चार अठारह नौ पढे । षट पङ खोया मूल । सुरति शब्द चीन्हे बिना । ज्यों पँछी चंडूल ।

अगर कोई चारों वेद पढ ले । 18 पुराण ( मुख्य पुराण 18 ही हैं ) भी पढ ले 6 उपनिषद ( मुख्य उपनिषद 6 ही हैं ) भी पढ ले । और 9 व्याकरण भी पूरी तरह से पढ ले ।
परन्तु अगर आत्मा शब्द के साथ नहीं जुङी । तो फ़िर वह कैसा ग्यानी है ? वह फ़िर ऐसा ग्यानी हुआ । जैसे चण्डूल होता है ।
चण्डूल एक चिङिया होती है । इसकी खासियत ये होती है कि ये किसी की भी आवाज सुनकर उसकी हूबहू नकल कर लेती है । दूसरे कौआ चिङिया पक्षी आदमी ( आदमी की कुछ विशेष प्रकार की रोने बुलाने जैसी आवाजों की नकल )  तथा बहुत से अन्य जानवरों की नकल करने में इसे महारत हासिल होती है । इससे वनीय क्षेत्र में जाने वाले बहुत से लोग धोखा खा जाते हैं । इसी से बनाबटी आवाज के द्वारा धोखा देने के कारण इसका नाम चांडाल ( दुष्ट व्यक्ति ) के आधार पर चण्डूल कहा जाता है ।
इसी तरह अगर अविनाशी निर्वाणी नाम नहीं मिला । और वेद पुराण गीता कुरआन बाइबिल श्री गुरुगृँथ साहिब आदि धर्म पुस्तकें पढ पढकर लोगों के साथ वाद विवाद बहस करता रहा कि वेद बङे है । कि कुरआन बङी है । कि बाइबिल बङी है । तो ऐसा पंडित ग्यानी इंसान उसी चण्डूल पक्षी की भांति है । जो खुद तो धोखे में है ही । दूसरे बहुत से अन्य को भी धोखे में डाल रहा है ।
मगर प्रत्येक इंसान चाहे वह हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई पारसी यहूदी कोई भी क्यों न हो । उसके घट के अन्दर स्वतः गूँजता निर्वाणी नाम खुद एक प्रमाण है । अतः उसके लिये प्रमाण देने की क्या आवश्यकता है ।

नाम और दिव्य प्रकाश हर इंसान के अन्दर है । न कि किसी विशेष जाति धर्म की बपौती ।
 Divine Light and real name is in every man, not in religion.

बस आवश्यकता उसे जानने की है । वही मोक्ष और अक्षय सुख को देने वाला है ।
एक पशु वाला पशु चराकर आ रहा था । तभी किसी राहगीर इंसान ने पूछा - ये किसके पशु हैं ?
वह बोला - एक मेरे चाचा का है । एक मेरे ताऊ का है । बाकी और किस किसके हैं ? मुझे पता नहीं ?
इसी तरह - हे अग्यान नींद में सोये मनुष्य ! अगर तूने अन्दर का परदा न खोला । फ़िर सोच तेरा क्या है ?

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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326