24 अगस्त 2011

दिन के उजाले की प्रतीक्षा करेँ

सही चुनाव करना - ओशो । प्रश्न - मैँ अपने और अपनी प्रेमिका के बीच सबंधोँ को लेकर मुश्किल मेँ पड़ गया हूँ कि इन्हेँ रखूँ कि तोड़ डालूँ ?
- जल्दबाजी मत करो । क्योँकि होता यह है कि मन के अपने अंधेरे व उजाले क्षण होते हैँ । दिन के क्षण । और रात्रि के क्षण । जब दिन का क्षण आता है । तो हर चीज बहुत अच्छी लगती है । तुम हर चीज साफ साफ देख सकते हो । जब रात आती है । तो हर चीज काली हो जाती है । और तुम कुछ भी साफ साफ नहीँ देख पाते । यह पूरी सँभावना है कि तुम रात के क्षण मेँ । अँधेरे क्षण मेँ । क्षीण ऊर्जा के क्षण मेँ ऐसा कोई निर्णय ले लेते हो । अगर तुम उस घड़ी मेँ कोई ऐसा निर्णय ले लेते हो । तो यह समझ का निर्णय न होगा । क्योँकि तुमने इसी स्त्री के साथ सुंदर क्षण भी देखे हैँ ।
जरा सोचो । हम यहाँ बैठे हैँ । यहाँ प्रकाश है । तुम मुझे देख सकते हो । और तुम यहाँ सबको देख सकते हो । तुम पेड़ोँ को देख सकते हो । और अचानक बिजली चली जाती है । अब तुम किसी को नहीँ देख सकते । पेड़ और बाकी सब कुछ अब नहीँ हैँ । तो क्या तुम कहोगे कि अब पेड़ोँ का अस्तित्व मिट गया है ? व्यक्तियोँ का अस्तित्व मिट गया है ? अगर तुम ऐसा कहते हो । तो यह निर्णय बहुत जल्दबाजी का होगा । क्या तुम याद नहीँ कर सकते कि कुछ पल पहले यहाँ लोग थे । पेड़ हरे थे । और सब कुछ यहीँ था । और सब चीजेँ साफ थीँ ? अपने निर्णयोँ को दिन के समय तक के लिये संभालेँ ।
जब रात है । तो दिन को स्मरण रखेँ । इसे भूलेँ मत । और शीघ्र ही दिन आता ही होगा । तुम्हेँ जब भी निर्णय लेना हो । तो बेहतर है । उसे दिन के समय मेँ ही लेँ । तब तुम्हारा जीवन विधेय बन जाता है । अगर तुम अपना निर्णय रात के समय मेँ करते हो । तो तुम्हारा जीवन निस्व्हेध बन जाता है । मैँ धार्मिक व अधार्मिक व्यक्ति मेँ यही भेद करता हूँ । अधार्मिक सदा रात के समय मेँ अपना निर्णय करता है । वह नकारात्मक अवस्था मेँ निर्णय लेता है । तभी तो वह यह नहीँ कह सकता कि - ईश्वर है । वह कहता है - ईश्वर नहीँ है । वे सभी " न " मिलकर एक बड़ी न बन जाती है - कहीँ कोई ईश्वर नही है । सभी " हाँ " मिलकर बड़ी हाँ बनती है - हाँ ! ईश्वर है ।
तो प्रतीक्षा करेँ । निर्णय तभी लेँ । जब उजाला हो । जब फिर से तुम इस स्त्री को चाहने लगते हो । और कोई अवरोध नहीँ । सब कुछ सुंदर है । अतिरेक मेँ है । निर्णय तब लेँ । और अगर तुम अलग होना चाहते हो । तो अलग हो जाओ । लेकिन निर्णय अँधेरे मेँ न लो । तभी मैँ इसे थोड़ा और टालने को, प्रतीक्षा करने को कहता हूँ । यह बीत जाएगा ।
एक तीसरी अवस्था भी है - भावातीत अवस्था । जब तुमने दिन और रात को बारबार देख लिया । तब तुम जान जाते हो कि इन दोनोँ के ऊपर भी कुछ है । तुम, तुम्हारे साक्षी होने की क्षमता दोनो से ऊपर है ।
तो निर्णय तीन प्रकार के हैँ । पहला निर्णय - निषेधात्मक है । जो जीवन को बंजर बना देता है । तब वहाँ कुछ भी नहीँ उगता । यह निराशा है । यह नरक है । दूसरी तरह का निर्णय - हाँ का है । दिन का निर्णय । जहाँ जीवन प्रफुल्लता, उत्सव बन जाता है । वहाँ प्रसन्नता है । और तुम अपने होने का आनन्द अनुभव करते हो । यही स्वर्ग है । यही वैकुंठ है । और तीसरा है । न उजाला । न अँधेरा । जहाँ निर्णय साक्षी भाव से आता है । दिन और रात । दोनो के अनुभव से तुम निर्णय लेते हो । वही अंतिम निर्णय है । वही मनुष्य को संबुद्ध बनाता है । तो थोड़ी प्रतीक्षा करेँ । देखेँ । और दिन के उजाले की प्रतीक्षा करेँ । हुँ ? तब निर्णय लेँ । यही सही है - ओशो दिस इज़ इट !
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मैंने राम रतन धन पायो । 
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु । करि करिपा अपनायो । 
जनम जनम की पूंजी पाई । जग में समय खोवायो । 
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै । दिन दिन बढत सवायो । 
सत की नाव खेवटिया सतगुरु । भवसागर तरि आयो । 
मीरा के प्रभु गिरधर नागर । हरखि हरखि जस गायो ।
मेरा मन रामहि राम रटै रे ।
राम नाम जप लीजै प्रानी । कोटिक पाप कटै रे ।
जनम जनम के खत जु पुराने । नामहि लेत फटै रे । 
कनक कटोरे इम्रत भरियौ । पीवत कौन नटै रे । 
मीरा कहै प्रभु हरि अविनासी । तन मन ताहि पटै रे । 
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