27 अगस्त 2011

अहंकार ही नर्क है

भारत एक सनातन यात्रा । भारत कोई भूखंड नहीं है । न राजनैतिक इकाई । न ऐतिहासिक तथ्यों का कोई टुकड़ा । भारत एक प्यास है । सत्य को पा लेने की । जमीन पर कोई कहीं भी पैदा हो । किसी देश में । किसी सदी में । अतीत में । या भविष्य में । अगर कोई खोज अंतर की खोज है । किसी की भी । वह भारत का निवासी है । जातिवाद एक बहुत बड़ी समस्या है । सम काल हार गया । उसे सुलझाते हुए । कुछ नहीं कर पाया । ओशो सहज कह पाए हैं - देह शूद्र है । मन वैश्य । आत्मा क्षत्रिय । और परमात्मा ब्राह्मण ।  वे सब कुछ ब्योरे में उतरते हैं - देह शूद्र है, क्यों ? क्योंकि देह की दौड़ सिर्फ इतनी है - खा लो । पी लो । भोग कर लो । सो जाओ । जाग जाओ । और मर जाओ । यह शूद्र की सीमा है । जो देह मे जीता है । वह शूद्र । शूद्र का अर्थ हुआ - मैं देह हूं । यह मनोदशा शूद्र है । मन वैश्य है । खाने पीने से ही पाजी नहीं होता । कुछ और मांगता है । मन का अर्थ है - कुछ और चाहिए । शूद्र में एक तरह की सरलता है । देह में बड़ी सरलता है । वह सब कुछ ज्यादा नहीं मांगती । दो रोटी मिल जाए । सोने को छप्पर मिल जाए । और शरीर की मांग सीधी है - थोड़ी सी । सीमित सी । देह को असंभव में रस नहीं है । इसलिए कहता हूं - देह शूद्र है । जब और और की वासना उठती है । तो वैश्य हुआ । वैश्य का मतलब है - मन। और मन व्यवसायी है । वह फैलता चला जाता है । रुकना नहीं जानता । क्षत्रिय का मतलब है - संकल्प । प्रबल संकल्प कि मैं कौन हूं ? इसे जान लूं । शूद्र शरीर को ही जानता है । उतने में ही मजा लेता है । वैश्य मन के साथ दौड़ता है । और क्षत्रिय जानना चाहता है - मैं कौन हूँ ? इसीलिए चौबीस तीर्थंकर, राम, कृष्ण सब क्षत्रिय थे । क्योंकि ब्राह्मण होने से पहले क्षत्रिय होना जरूरी है । जिसने जन्म के साथ अपने को ब्राह्मण समझ लिया । वह चूक गया । जैसे परशुराम ब्राह्मण नहीं हैं । उनसे बड़ा क्षत्रिय खोजना मुश्किल होगा । जिंदगी भर मारने का काम करते रहे । फरसा लेकर घूमते थे । उन्हें ब्राह्मण करना ठीक नहीं है । सो - संकल्प क्षत्रिय है । ऐसा समझो कि - भोग यानी शुद्र । तृष्णा यानी - वैश्य । संकल्प यानी - क्षत्रिय । और जब संकल्प पूरा हो जाए । तब समर्पण की संभावना है । समर्पण - यानी ब्राह्मण । ब्राह्मण यानी ब्रह्म को जान लेना । जो मिटा । उसने ब्रह्म को जाना । भारत में पैदा होने से ही कोई भारत का नागरिक नहीं हो सकता । जो एक दुर्घटना की तरह भारत में हो गए । जब तक उनकी प्यास उन्हें दीवना न कर दे । तब तक वे भारत के नागरिक होने के अधिकारी नहीं हैं । भारत एक सनातन यात्रा है । अनंत से अनंत तक फैला हुआ रास्ता । मेरे लिए भारत और अध्यात्म एक ही अर्थ में हैं - ओशो ।
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अकेलापन और एकांत में बड़ा फर्क है । दोई कहे तिनहीं को दोजख । जिन्ह नाहिन पहिचाना । जिन्होंने दो कहा - वे नर्क में है । कबीर का यह वचन पश्चिम का आधुनिक विचारक ज्या पाल सार्त्र अगर पढ़े । तो राजी होगा । ज्या पाल सार्त्र का एक बहुत प्रसिद्ध वचन है । जिसमें उसने कहा है - द अदर द हेल । दूसरा नर्क है । उसके प्रयोजन हैं । लेकिन बात तो उसने भी पकड़ ली । दूसरा नर्क है । दूसरे की मौजूदगी नर्क है । तो क्या करें ? क्या अकेले में भाग जाएं ? एकांत में हो जाए । जहां दूसरा न हो ? न पत्नी हो । न पति हो । न बेटा हो । बहुतों ने यह प्रयोग किया है । भागे हैं हिमालय की कंदराओं में । ताकि अकेले हो जाए । क्योंकि दूसरा नर्क है । लेकिन तुम भागकर भी अकेले न हो पाओगे । क्योंकि तुम्हारा मैं तो तुम्हारे साथ ही चला जाएगा । तू यहां छोड़ जाओगे । मैं तो साथ चला जाएगा । और ध्यान रखो । जहां मैं हूं । वहां तू है । वह सिक्का इकठ्ठा है । तुम आधा आधा छोड़ नहीं सकते । अगर मैं तुम्हारे साथ गया । तो तू तुम्हारे साथ गया । जल्दी ही तुम अपने को ही दो हिस्सों में बांट कर चर्चा करने लगोगे । अकेले में लोग अपने से ही बात करने लगते हैं । मैं और तू दोनों हो गए । अकेले में लोग ताश खेलने लगते हैं । खुद ही दोनों तरफ से बाजी बिछा देते हैं । उस तरफ से भी चलते हैं । इस तरफ से भी चलते हैं । इतना ही नहीं । उस तरफ से भी धोखा देते हैं । इस तरफ से भी धोखा देते हैं । किसको धोखा दे रहे हो ? अकेले में लोग कल्पना की मूर्तियों में जीने लगते हैं । उनसे चर्चा करते हैं । बात करते हैं । तू मौजूद हो जाता है । भीड़ तुम्हारे हाथ ही आ जाएगी । अगर मैं तुम्हारे साथ गया । क्योंकि मैं तो केंद्र है सारी भीड़ का । भीड़ तो परिधि है । तुम जहां पाओगे । तुम भीड़ में रहोगे । तुम अकेले नहीं हो सकते । हिमालय का एकांत शून्य न बनेगा । अकेलापन रहेगा ही । और अकेलापन और एकांत में बड़ा फर्क है । अकेलेपन का अर्थ है - लोनलीनेस । और एकांत का अर्थ है - अलोननेस । अकेलेपन का अर्थ है कि दूसरे की चाह मौजूद है । इसलिए तो तुम अकेलापन अनुभव कर रहे हो कि मैं अकेला...मैं अकेला । दूसरे की चाह मौजूद है । दूसरे की वासना मौजूद है । तुम चाहते हो - कोई आ जाए । तुम अपनी हिमालय की गुफा के बाहर बैठकर भी रास्ते पर नजर लगाए रखोगे कि शायद कोई यात्री मान सरोवर जाता गुजर जाए । शायद कोई मनुष्य थोड़ी खबर ले आए नीचे के मैदानों की कि क्या हुआ ? जयप्रकाश नारायण की पूर्ण क्रांति हो पाई कि नहीं ? शायद कोई अखबार का एक टुकड़ा ही ले आए । और तुम वेद वचनों की तरफ अखबार को पढ़ लो । मन तुम्हारा नीचे ही भटकता रहेगा मैदानों में । जहां भीड़ है । 
रामकृष्ण कहते थे । एक बार बैठे थे मंदिर के बाहर दक्षिणेश्वर में । तो देखा कि एक चील मरे हुए चूहे को ले उड़ी है । अब चील कितने ही ऊपर उड़े । नजर तो उसकी नीचे कचरे घर में लगी रहती है । जहां मरे चूहे पड़े हों । मांस का टुकड़ा पड़ा हो । फेंकी गई मछली पड़ी हो । उड़ती है आकाश में । नजर तो घूरे पर लगी रहती है । तुम हिमालय पर बैठ जाओ । कोई फर्क न पड़ेगा । नजर घूरे पर लगी रहेगी दिल्ली में । नजर मरे चूहों पर लगी रहेगी । तुम अपने को तो साथ ही ले जाओगे । तुम ही तो तुम्हारे होने का ढंग हो । रामकृष्ण ने देखा कि वह चील उड़ रही है चूहे को लेकर । और बहुत सी चीलें उस पर झपट्टा मार रही हैं । कौवे दौड़ गए हैं । बड़ा उत्पात मच गया है आकाश में । वह चील बचने की कोशिश कर रही है । लेकिन और गिद्ध आ गए हैं । और सब तरफ से उसको टोचे जा रहे हैं । वह भागती है । बचना चाहती है । उसके पैरों पर लहू आ गया है । तब क्रोध की अवस्था में वह भी किसी गिद्ध पर झपटी । और मुंह से चूहा छूट गया । चूहे के छूटते ही सारा उपद्रव बंद हो गया । कोई वे चील के पीछे पड़ने ही थे । बाकी गिद्ध और चीलें और कौवे...वे चूहे के पीछे पड़े थे । जैसे ही चूहा छूटा । वे सब चले गए । वे चूहे की तरफ चले गए । अब वह थकी चील वृक्ष पर बैठ गई । रामकृष्ण कहते हैं कि मुझे लगा, शायद थोड़ी उसे समझ आई होगी । चूहा सारी भीड़ को ले आया था । तुम्हारा मैं...तुम हिमालय चले जाओ । कोई फर्क न पड़ेगा । सब भीड़ आ जाएगी । तुम्हारा मैं भीड़ को खींचता है । तुम मैं को छोड़ दो । बाजार में बैठे रहो । वहीं हिमालय हो जाएगा । तुम्हारी दुकान तुम्हारी गुफा हो जाएगी । तुम्हारा दफ्तर तुम्हारा मंदिर हो जाएगा । मैं का चूहा भर छूट जाए । फिर कोई चील हमला नहीं करती । फिर कोई सिद्ध तुम पर आकर हमला नहीं करता । तुमसे किसी का कुछ लेना देना नहीं है । वह तुम्हारा मैं ही तुम्हारे उपद्रव का कारण है । तुम्हें कभी किसी ने धक्का मारा ? नहीं तुम्हारे मैं को धक्के मारे गए हैं । किसी ने तुम्हें कभी नीचा दिखाया नहीं । तुम्हारे मैं को नीचा दिखाया गया है ? किसी ने कभी तुम्हें गाली दी ? नहीं । तुम्हारे मैं को गाली दी गई है । किसी ने कभी तुम्हारी स्तुति की ? नहीं । तुम्हारे मैं की स्तुति की गई । जैसे ही मैं गया । सारी भीड़ गिर जाती है निंदको की । स्तुति करने वालों की । मित्रों की । शत्रुओं की । अपनों की । परायों की । द अदर इज हेल । सार्त्र कह रहा है - दूसरा नर्क है । लेकिन अगर बहुत गौर से सोचो । और थोड़ा गहरे जाओ । तो दूसरा इसीलिए है कि तुम हो । द इगो इज द हेल । गहरे पर विश्लेषण करने पर तो पता चलेगा कि दूसरा तो तुम्हारे कारण है । इसलिए दूसरे को क्या नर्क कहना । वह नर्क मालूम पड़ता है । वस्तुतः मैं ही नर्क है । अहंकार ही नर्क है - ओशो ।
तुम्हे सच्चा आनंद सिर्फ परमात्मा के सुमरन में ही मिलेगा । यदि परमात्मा की याद हमेशा निरंतर ( 24 घन्टे ) बनी रहेगी । तो इससे बड़ा कोई सुख नही है । बिना परमात्मा की कृपा के लोक परलोक दोनो ही नही मिलते हैं । जब हमारे अन्दर सुमरन निरंतर बना रहता है । तो हम संसार की सभी प्रकार की वासनाओं से कामनाओं से हम मुक्त होते हैं । तब उस काल में परमात्मा का सानिध्य पूर्ण रूप से रहता है । और जब परमात्मा का सानिध्य बना रहता है । तो सब कुछ मिल जाता है । फिर उस काल में कोई कामना शेष नही रहती है ।
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