27 अगस्त 2011

सत्यम शिवम सुन्दरम का असली अर्थ

ये भी बतायें कि ‘शिवोऽहम’ का अर्थ क्या है ? 
‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ का असली और गहरा अर्थ क्या है ? 
मैं ये भी जानना चाहती हूँ कि ‘सत चित आनन्द’ का अर्थ क्या है ? 
क्योंकि हमारी आत्मा को भी ‘सत चित आनन्द’ कहा जाता है । ये भी बतायें कि क्या ‘सत चित आनन्द’ को ही ‘सच्चिदानन्द’ कहा जाता है ।
जो साधु सन्त होते हैं उनके नाम के आगे ‘स्वामी’ शब्द लगाया जाता है । जैसे उदाहरण के तौर पर समझिये - स्वामी सच्चिदानन्द, तो स्वामी शब्द किसी साधु, सन्त या महात्मा के आगे लगाने का क्या तात्पर्य है ? क्या ये भी एक तरह से भक्ति लाइन में कोई उपाधि है ? 
मुझे आपसे इन सवालों के जवाबों का इन्तजार रहेगा । सतश्री अकाल
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 प्रश्न - ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ का असली और गहरा अर्थ क्या है ?
उत्तर - आत्मा के बारे में कुछ बता पाना, उस स्थिति के बारे में कुछ बता पाना, उस परमानन्द के बारे में कुछ बता पाना बङी असम्भव सी बात है । हालाँकि कबीर जैसे सन्तों ने बङी कोशिश की कि इस बारे में शब्दों द्वारा कुछ बता पायें ताकि मनुष्य अधिकाधिक भक्ति के लिये प्रेरित हो सके पर ये कभी सम्भव नहीं हो सका ।
ठीक यही बात - सत्यम शिवम सुन्दरम..पर भी लागू होती है । इसका वास्तविक रूप और इसका अनुभूत रूप बताना असम्भव ही है । शिव (जिनका आगे वर्णन है तथा ब्लाग के अन्य लेखों में भी है) का वह सत्य और निर्विकारी रूप ही सत्यम शिवम सुन्दरम है । इसी को नीचे से (साधना या भक्ति के स्तर से) इस तरह कह सकते हैं कि ज्यों ज्यों कोई साधक सत्य रूप (शाश्वत सत्य के अधिकाधिक निकट) होता हुआ । सबमें ही उस शिव (परमात्मा या आत्मा) को देखता हुआ, जानता हुआ ज्यों ज्यों निर्मल (मल रहित) मन होता जाता है । वह उस असीम सुन्दरता (अदभुत सौन्दर्य शीतल रूप) को प्राप्त होता है ।
हाँ लेकिन समझने को इसे बहुत आसान तरीके से समझ सकते हैं, कैसे - जो सत्य (शाश्वत सत्य यानी आत्मा) है वही शिव (सबमें यानी सर्वात्मा) है और वही (वास्तविक) सुन्दर है । क्योंकि उसके समान सुन्दर दूसरा नहीं हैं । 

रामायण में इस बात को इस तरह कहा गया है -
नाम रूप दोऊ अकथ कहानी । समझत बनत न जात बखानी ।
अर्थात नाम (आत्मा का वास्तविक नाम या निर्वाणी नाम या सन्तों ने जिसको शब्द कहा है) और रूप (आत्मा का वह शाश्वत रूप जो हर उपाधि से रहित है । मतलब जब ये सब कुछ भी नहीं था तब वो जैसा था) इन दोनों के बारे में ‘अकथ’ (यानी इनके बारे में कह कर बताना असम्भव ही है । अकथनीय ही है) स्थिति है ।
समझत बनत (यानी वहाँ पहुँचकर ही इसका सही सुख आनन्द जाना जा सकता है । सही बात पता लगती है) न जात बखानी (बोलकर समझाना इसको सम्भव नहीं है)
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प्रश्न - ये भी बतायें कि ‘शिवोऽहम’ का अर्थ क्या है ?
उत्तर - शिव शक्ति बहुत बङी शक्ति है (ये शंकर से अलग है) सर्वात्मा के रूप में परमात्मा या आत्मा इसी रूप में हैं । सीधी सी बात है, चेतन शक्ति का बँटवारा या प्रेषण बङे से बङे देवी देवताओं भगवानों ईश्वरों और छोटे से छोटे से जीव को यहीं से प्राप्त होता है ।
श्रीकृष्ण ने द्रौपदी द्वारा ‘अक्षय पात्र’ खाली हो जाने पर और उसी समय श्रीकृष्ण के आध्यात्मिक गुरु दुर्वासा के भोजन हेतु आ जाने पर इसी पात्र से लिपटा भोजन का सिर्फ़ 1 तिनका खाकर  ‘शिवोऽहम’ भाव का ध्यान करते हुये ही अखिल सृष्टि को भोजन के प्रति न सिर्फ़ तृप्त कर दिया था बल्कि डकारें लेने पर मजबूर कर दिया था ।
ओऽहम (ॐ रूपी मनुष्य शरीर) 
सोऽहम (सोऽहं रूपी मन, सोऽहंग से मन का निर्माण हुआ है । अहम और जीव बीज भी यही है) 
शिवोऽहम (सबमें मैं ही हूँ) 
एकोऽहम (सिर्फ़ एक मैं ही हूँ, दूसरा नहीं) 
कोऽहम (मैं कौन हूँ ? जीवात्मा की अज्ञान युक्त स्थिति) 
ये सब सर्वशक्तिमान आत्मा के खेल या विभिन्न स्थितियाँ ही हैं ।
शिवोहम का सही अर्थ या भाव यही है कि - सब मैं एक मैं (या वही आत्मा) ही हूँ । इसी भाव से इस मन्त्र का ध्यान आदि किया जाता है ।
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प्रश्न - मैं ये भी जानना चाहती हूँ कि ‘सत चित आनन्द’ का अर्थ क्या है ? क्योंकि हमारी आत्मा को भी ‘सत चित आनन्द’ कहा जाता है । ये भी बतायें कि क्या सत चित आनन्द को ही सच्चिदानन्द कहा जाता है ।
उत्तर - वास्तव में ये भी आत्मा की एक स्थिति ही है । जिसमें आत्मा सत (सत्य) चित (चित्त की एकाग्रता से) और आनन्द (परमानन्द की झलक मात्र) को अनुभव रूप महसूस करने लगती है । यानी आत्मा के सत्य में चित्त के लीन या लय हो जाने पर बनी आनन्द की स्थिति ही सच्चिदानन्द स्थिति होती है । इस स्थिति को प्राप्त हुआ साधक या भक्त सच्चिदानन्द कहलाने का अधिकारी हो जाता है ।
कु्ण्डलिनी या आत्मज्ञान की खासियत ही यही है । इसमें जो प्रयोगात्मक स्तर पर जितना जान लेता है उतना पा लेता है । इसके विपरीत सिद्धांत से गृहणता स्थिति के अनुसार सिर्फ़ भाव ही बनता है । वह न सही रूप में जानना होता है और न ही कुछ पाना पर लाभ इससे भी होता है ।
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प्रश्न - जो साधु सन्त होते हैं । उनके नाम के आगे ‘स्वामी’ शब्द लगाया जाता है । जैसे उदाहरण के तौर पर समझिये - स्वामी सच्चिदानन्द, तो स्वामी शब्द किसी साधु, सन्त या महात्मा के आगे लगाने का क्या तात्पर्य है ? क्या ये भी एक तरह से भक्ति लाइन में कोई उपाधि है ।
उत्तर - स्वामी शब्द का अर्थ मालिक होता है । स्वामी का मतलब पति भी होता है यानी किसी चीज का मालिक । जैसे किसी अच्छे बिजनेस मैन को उद्योगपति कहते हैं । साधु के साथ भी यही बात होती है । उसने अपने ज्ञान द्वारा जो प्राप्ति की है वह उसका स्वामी हुआ ।
आपने बिलकुल ठीक ही कहा, इसका सम्बन्ध आगे लगे नाम से ही होता है, जैसे स्वामी स्वरूपानन्द । इसका मतलब ये हुआ । जिसने अपने निज स्वरूप यानी आत्मा और उसके आनन्द को अनुभव, साक्षात और होने के स्तर पर जान लिया और सही रूप में प्राप्त कर लिया । वह स्वामी स्वरूपानन्द हो गया । सच्चिदानन्द इससे नीचे की आत्मा की एक स्थिति है ।
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आप सभी के अंतर में विराजमान सर्वात्मा प्रभु आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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