13 अगस्त 2011

इस दुनिया में कोई नहीं अपना

ध्यान - काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार । शब्दों से ऐसा प्रतीत होता है । जैसे बहुत सी बीमारियां आदमी के आसपास हैं । सचाई यह नहीं है । इतनी बीमारियां नहीं हैं । जितने नाम हमें मालूम हैं । बीमारी तो एक ही है । ऊर्जा एक ही है । जो इन सबमें प्रकट होती है । अगर काम को आपने दबाया । तो क्रोध बन जाता है । और हम सबने काम को दबाया है । इसलिए सबके भीतर क्रोध कम ज्यादा मात्रा में इकट्ठा होता है । अब अगर क्रोध से बचना हो । तो उसे कुछ रूप देना पड़ता है । नहीं तो क्रोध जीने न देगा । तो अगर आप लोभ में क्रोध की शक्ति को रूपांतरित कर सकें । तो आप कम क्रोधी हो जाएंगे । आपका क्रोध लोभ में निकलना शुरू हो जाएगा । फिर आप आदमियों की गर्दन कम दबाएंगे । रुपए की गर्दन पर मुट्ठी बांध लेंगे । एक बात खयाल में ले लेनी जरूरी है कि मनुष्य के पास एक ही ऊर्जा है । एक ही इनर्जी है । हम उसके पच्चीस प्रयोग कर सकते हैं । और अगर हम विकृत हो जाएं । तो वह हजार धाराओं में बह सकती है । और अगर आपने एक एक धारा से लड़ने की कोशिश की । तो आप पागल हो जाएंगे । क्योंकि आप एक एक से लड़ते भी रहेंगे । और मूल से आपका कभी मुकाबला न होगा । तो पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि - मूल ऊर्जा एक है । आदमी के पास । और अगर कोई भी रूपांतरण, कोई भी ट्रांसफार्मेशन करना है । तो मूल ऊर्जा से सीधा संपर्क साधना जरूरी है । उसकी अभिव्यक्तियों से मत उलझिए । सुगमतम मार्ग यह है कि आपके भीतर इन चार में से जो सर्वाधिक प्रबल हो । आप उससे शुरू करिए । अगर आपको लगता है कि क्रोध सर्वाधिक प्रबल है आपके भीतर । तो वह आपका चीफ करेक्टरिस्टिक हुआ । जो भी आपके भीतर खास लक्षण हो । उस पर दो काम करें । पहला काम तो यह है कि उसकी पूरी सजगता बढ़ाएं । क्योंकि कठिनाई यह है सदा कि जो हमारा खास लक्षण होता है । उसे हम सबसे ज्यादा छिपाकर रखते हैं । जैसे क्रोधी आदमी सबसे ज्यादा अपने क्रोध को छिपाकर रखता है । क्योंकि वह डरा रहता है । कहीं भी निकल न जाए । वह उसको छिपाए रखता है । वह हजार तरह के झूठ खड़े करता है अपने आसपास । ताकि क्रोध का दूसरों को भी पता न चले । उसको खुद को भी पता न चले । और अगर पता न चले । तो उसे बदला नहीं जा सकता । दूसरा इसके साथ सजग होना शुरू करें । जैसे क्रोध आ गया । तो जब क्रोध आता है । तो तत्काल हमें खयाल आता है उस आदमी का । जिसने क्रोध दिलवाया । उसका खयाल नहीं आता । जिसे क्रोध आया । और जब भी हमें क्रोध पकड़ता है । तो हमारा ध्यान उस पर होता है । जिसने क्रोध शुरू करवाया है । अगर आप ऐसा ही ध्यान रखेंगे । तो क्रोध के कभी बाहर न हो सकेंगे । जब कोई क्रोध करवाए । तब उसे तत्काल भूल जाईए । और अब इसका स्मरण करिए । जिसको क्रोध हो रहा है । और ध्यान रखिए । जिसने क्रोध करवाया है । उसका आप कितना ही चिंतन करिए । आप उसमें कोई फर्क न करवा पाएंगे । फर्क कुछ भी हो सकता है । तो इसमें हो सकता है । जिसे क्रोध हुआ है । तो जब क्रोध पकड़े । लोभ पकड़े । कामवासना पकड़े । जब कुछ भी पकड़े । तो तत्काल आब्जेक्ट को छोड़ दें । क्रोध भीतर आ रहा है । तो चिल्लाएं । कूदें । फांदें । बकें । जो करना है । कमरा बंद कर लें । अपने पूरे पागलपन को पूरा अपने सामने करके देख लें । और आपको पता तब चलता है । जब यह सब घटना जा चुकी होती है । नाटक समाप्त हो गया होता है । अगर क्रोध को पूरा देखना हो । तो अकेले में करके ही पूरा देखा जा सकता है । तब कोई सीमा नहीं होती । इसलिए मैंने वह जो पिलो मेडिटेशन, वह जो तकिए पर ध्यान करने की प्रक्रिया कुछ मित्रों को करवाता हूं । वह इसलिए कि तकिए पर पूरा किया जा सकता है । तो अपने कमरे में बंद हो जाएं । और अपने मूल, जो आपकी बीमारी है । उसको जब प्रकट होने का मौका हो । तब उसे प्रकट करें । इसको मेडिटेशन समझें । इसको ध्यान समझें । उसे पूरा निकालें । उसको आपके रोएं रोएं में प्रकट होने दें । चिल्लाएं । कूदें । फांदें । जो भी हो रहा है । उसे होने दें । और पीछे से देखें । आपको हंसी भी आएगी । हैरानी भी होगी । एक दो दफे तो आपको थोड़ी सी बेचैनी होगी । तीसरी दफे आप पूरी गति में आ जाएंगे । और पूरे रस से कर पाएंगे । और जब आप पूरे रस से कर पाएंगे । तब आपको एक अदभुत अनुभव होगा कि आप कर भी रहे होंगे बाहर और बीच में कोई चेतना खड़ी होकर देखने भी लगेगी । दूसरे के साथ यह कभी होना मुश्किल है । या बहुत कठिन है । एकांत में यह सरलता से हो जाएगा । चारों तरफ क्रोध की लपटें जल रही होंगी । आप बीच में खड़े होकर अलग हो जाएंगे । और ऐसा किसी भी वृत्ति के साथ किया जा सकता है । यह वृत्ति से कोई फर्क नहीं पड़ता । प्रक्रिया एक ही होगी । बीमारी एक ही है । उसके नाम भर अलग हैं - ओशो ।
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सवारी - भाई ! घंटाघर तक के कितने रूपये लोगे ?
रिक्शेवाला - 200 रूपये लगेंगे ।
सवारी बोला - ये कैसी दादागीरी वहाँ के तो दस रूपये लगते हैं । मैं भी दादागीरी दिखाने पर आ जाऊँ । तो - कुछ नहीं, दूंगा ।
रिक्शेवाले ने कहा - भाईसाहब गलती हो गयी । आपकी बात पर चलने को तेयार हूँ । मुझे " कुछ नहीं " चाहिए ।
बात खत्म हुयी समझ के वो व्यक्ति रिक्शे मैं बैठ गया कि जाकर दस रूपये दे दूंगा ।
जब पहुंचे । तो उसने दस रूपये निकाले । और देने लगा । रिक्शावाला हंसने लगा । बोला - भाईसाहब किराया तो कुछ नही तय हुआ था । ये दस रूपये रखिये आप ।
व्यक्ति थोडा हैरान हुआ । और जल्दी थी । तो जाने लगा । जैसे ही आगे बढ़ा । रिक्शेवाला गुर्राया - भाईसाहब ! कुछ नहीं तो दे के जाओ । जो तय हुआ है ।
आदमी परेशान समझ न आये । इसे चाहिए क्या ? इतनी देर मैं रिक्शे वालों का जमघट लग गया । सबने रिक्शेवाले की बात जायज ठहराई । बोले - भाईसाहब ! बात क्यों बढ़ा रहे हो । कुछ नहीं दो । और जाओ ।
अब आदमी समझ गया कि बुरा फंसा । उसने 200 रूपये निकाले । और रिक्शेवाले के हाथ मैं रख दिए । रिक्शेवाला हंसा । बोला - भाई पूरे कुछ नहीं चाहिए । उसकी नजर जेब में पड़े हजार के नोटों पर थी ।
इस सारी घटना को चौराहे पर बैठे लालाजी देख रहे थे । उन्होंने उस आदमी को बुलाया । और बोले - जा उस रिक्शेवाले को बोल कि लाला रिश्ते में हैं । मेरे उनसे ले लो । अपना कुछ नहीं ।
उस व्यक्ति ने यही किया । रिक्शेवाला ने सोचा - लाला तो और मोटी मुर्गी है । अच्छा माल मिलेगा ।
लालाजी के पास गया । तो लालाजी बोले - मेरे तकिये के नीचे जो है । वो ले ले ।
रिक्शे वाले ने तकिया हटाया । और बोला - लालाजी ! यहाँ तो कुछ नही है । लालाजी मुस्कराए । बोले । चुपचाप ले । और निकल ले ।
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नाशवंत वस्तु है जग में । फिर ममता क्या तू करता है ?
कर गुजरान गरीबी में । मगरुरी क्या पर करता है ।
नाशवंत वस्तु है जग में । फिर ममता क्या तू करता है ।  
माटी चुन चुन महल बनाया । गंवार कहे घर मेरा है । 
न घर तेरा न घर मेरा । चिड़िया रैन बसेरा है । 
इस दुनिया में कोई नहीं अपना । क्या अपना अपना करता है । 
काच्ची माटी का घाट घडुला । घड़ी पलक में ढलता है । 
इस दुनिया में नाटक देखत । देख भटकता फिरता है । 
कहे कबीर सुंणो भाई साधो । हरी को क्यों न सुमरता है ।
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सूक्ष्म शरीर पर इस स्थूल बाह्य शरीर का आवरण है । अकाल मृत्यु के अनेक कारणों से सूक्ष्म शरीर का यह बाह्य आवरण नष्ट हो जाता है । तब क्योंकि दूसरा आंतरिक सूक्ष्म शरीर उससे पूर्व के कारण शरीर  ( उस वक्त निहित कारण ) से बंधा हुआ है । इसलिये मजबूरन उसे उसी सूक्ष्म शरीर में रहना पङता है । तब उसे भूत प्रेत कहते हैं । भूत प्रेत सिर्फ़ अकाल मृत्यु मरे मनुष्य ही बनते हैं । अन्य कोई भी प्राणी या मनुष्य नहीं ।
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If a man is doing something but has not the firmness of determination within his mind, then he will never be successful.
A rich man may be poor because he has never known any love. Share love with him. A poor man may have known love but has not known good food - share food with him. A rich man may have everything and has no understanding - share your understanding with him; he is also poor. There are a thousand and one types of poverty. Whatsoever you have, share it  -Osho
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If you cannot respect women, you cannot respect anybody else, because it is from women you come. The woman mothered you for nine months, then she took every care, she loved you for years. And then again, you cannot live without a woman. She is your solace, your warmth   -  Osho

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