06 अप्रैल 2010

जो देखा सो दुखिया हो

भीष्म पितामह शरशैया पर लेटे हुये चिन्तन कर रहे थे कि मैंने पूरे जीवन उत्तम धर्म कर्तव्य का पालन किया । फ़िर मेरी ये गति ( दुर्दशा ) क्यों हुयी ? उसी समय भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिलने आये । भीष्म पितामह ने कहा - प्रभो ! मैं ध्यान क्रिया द्वारा अपने सौ जन्म देख सकता हूँ । और मैंने देखा कि मैंने सौ जन्मों में ऐसा कोई कार्य नहीं किया । जिस हेतु मुझे ये दुख उठाना पङे । तब भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुये कहा कि - मैं तुम्हें इससे और ऊपर लेकर चलता हूँ । तब तुम सचाई को जान सकोगे । श्रीकृष्ण योगविधि द्वारा उन्हें एक सौ छठवें जन्म में ले गये । जब वे एक राजकुमार थे । और घोङे पर सवार होकर मार्ग में जा रहे थे । तो रास्ते में एक दोमुहाँ साँप उनके बीच आ गया । तब उस राजकुमार ने तीर की नोक पर उस साँप को उठाकर एक और उछाल दिया । वह सर्प झरवेरी की झाङियों में जाकर गिर गया । और कांटो में फ़ंस जाने के कारण निकल नहीं सका । और उसी अवस्था में कई दिनों बाद दम तोङ दिया । ये पाप कर्म राजकुमार के खाते में जुङ गया । वैसे रा्जकुमार स्वभाव से पाप कर्म वाला नहीं था ।
श्रीकृष्ण ने कहा कि - तुम सौ जन्मों तक भले करम ही करते रहे । अतः उस पाप बीज को उत्पन्न होने के लिये जमीन नहीं मिली । लेकिन हस्तिनापुर में जब तुम समर्थ होते हुये भी कई अन्याय देखते रहे । और द्रौपदी चीर हरण जैसे घृणित कार्य में भी मूकदर्शक बने रहे । तो उस पाप बीज को मौसम मिल गया । और वो फ़लने लगा । अंत में इस परिणाम को प्राप्त हुआ । श्रीकृष्ण ने कहा कि - हे पितामह ! चाहे वह कितनी ही बङी शक्ति क्यों न हो । यदि उससे कोई अपराध हो जाता है । तो वो उसको भुगतना ही होगा ।
काया से जो पातक होई । बिनु भुगते छूटे नहि कोई ।

राम कृष्ण से कौन बङ । तिन्हूँ ने गुरु कीन । 
तीन लोक के ये धनी । गुरु आज्ञा आधीन ।
धनवन्ते सब ही दुखी । निर्धन है दुख रूप । 
साध सुखी सहजो कहे । पायो भेद अनूप ।
तन धर सुखिया कोई न देखा । जो देखा सो दुखिया हो । 
उदय अस्त की बात कहतु है । सबका किया विवेका हो ।
घाटे बाढे सब जग दुखिया । क्या गिरही बैरागी हो । 
शुकदेव अचारज दुख के डर से । गर्भ से माया त्यागी हो ।
जोगी दुखिया जंगम दुखिया । तपसी का दुख दूना हो । 
आसा त्रस्ना सबको व्यापे । कोई महल न सूना हो ।
साँच कहौ तो कोई न माने । झूठ कहा नहि जाई हो । 
ब्रह्मा विष्नु महेसर दुखिया । जिन यह राह चलाई हो ।
अबधू दुखिया भूपति दुखिया । रंक दुखी विपरीती हो । 
कहे कबीर सकल जग दुखिया । संत सुखी मन जीती हो ।
कोई तो तन मन दुखी । कोई चित्त उदास ।
एक एक दुख सभन को । सुखी संत का दास ।
भीखा भूखा कोई नहीं । सबकी गठरी लाल ।
गिरह खोल न जानही । ताते भये कंगाल ।
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गुरु होश में लाता है - गुरु का 1 ही अर्थ है । तुम्हारी नींद को तोड़ देना । तुम्हें जगा दे । तुम्हारे सपने बिखर जाएं । तुम होश से भर जाओ । नींद बहुत गहरी है । शायद नींद कहना भी ठीक नहीं । बेहोशी है । कितना ही पुकारो । नींद के परदे के पार आवाज नहीं पहुँचती । चीखो और चिल्लाओ भी । द्वार खटखटाओ । सपने काफी मजबूत हैं । थोड़े हिलतें हैं । फिर वापस अपने स्थान पर जम जाते हैं । निश्चित ही काम कठिन है । और न केवल कठिन है । बल्कि शिष्य को निरंतर लगेगा कि गुरु विघ्न डालता है । जब तुम्हें कोई साधारण नींद से भी उठाता है । तब तुम्हें लगता है । उठाने वाला मित्र नहीं - शत्रु है । नींद प्यारी है । और यह भी हो सकता है कि तुम 1 सुखद सपना देख रहे हो । और चाहते थे कि सपना जारी रहे । उठने का मन नहीं होता । मन सदा सोने का ही होता है । मन आलस्य का सूत्र है । इसलिए जो भी तुम्हें झकझोरता है । जगाता है । बुरा मालूम पड़ता है । जो तुम्हें सांत्वना देता है । गीत गाता है । सुलाता है । वह तुम्हें भला मालूम पड़ता है । सांत्वना की तुम तलाश कर रहे हो । सत्य की नहीं । और इसलिए तुम्हारी सांत्वना की तलाश के कारण ही दुनिया में 100 गुरुओं में 99 गुरु झूठे ही होते हैं । क्योंकि जब तुम कुछ मांगते हो । तो कोई न कोई उसकी पूर्ति करने वाला पैदा हो जाता है । असदगुरु जीता है । क्योंकि शिष्य कुछ गलत मांग रहे हैं । खोजने वाले कुछ गलत खोज रहे हैं । अर्थशास्त्र का छोटा सा नियम है - मांग से पूर्ति पैदा होगी । डिमांड क्रिएटस द सप्लाय । अगर हजारों लाखों, करोड़ों लोगों की मांग सांत्वना की है । तो कोई न कोई तुम्हें सांत्वना देने को राजी हो जाएगा । तुम्हारी सांत्वना की शोषण करने को कोई न कोई राजी हो जाएगा । कोई न कोई तुम्हें गीत गाएगा । तुम्हें सुलाएगा । कोई न कोई लोरी गाने वाला तुम्हें मिल जाएगा । जिससे तुम्हारी नींद और गहरी हो । सपना और मजबूत हो जाए । जिस गुरु के पास जाकर तुम्हें नींद गहरी होती मालूम हो । वहां से भागना । वहां 1 क्षण रूकना मत । जो तुम्हें झकझोरता न हो । जो तुम्हें मिटाने को तैयार न बैठा हो । जो तुम्हें काट ही न डाले । उससे तुम बचना । जीसस का 1 वचन है कि लोग कहते हैं कि मैं शांति लाया हूं । लेकिन मै तुमसे कहता हूं । मैं तलवार लेकर आया हूं । इस वचन के कारण बड़ी ईसाइयों को कठिनाई रही । क्योंकि 1 ओर जीसस कहते हैं कि - अगर कोई तुम्हारे 1 गाल पर चांटा मारे । तुम दूसरा भी उसके सामने कर देना । जो तुम्हारा कोट छीन ले । तुम कमीज भी उसे दे देना । और जो तुम्हें मजबूर करे 1 मील तक अपना वजन ढोने के लिए । तुम 2 मील तक उसके साथ चले जाना । ऐसा शांति प्रिय व्यक्ति जो कलह पैदा करना ही न चाहे । जो सब सहने को राजी हो । वह कहता है - मैं शांति लेकर नहीं । तलवार लेकर आया हूं । यह तलवार किस तरह की है ? यह तलवार गुरु की तलवार है । इस तलवार का उस तलवार से कोई संबंध नहीं । जो तुमने सैनिक की कमर पर बंधी देखी है । यह तलवार कोई प्रगट में दिखाई पड़ने वाली तलवार नहीं । यह तुम्हें मारेगी भी । और तुम्हारे खून की 1 बूंद भी न गिरेगी । यह तुम्हें काट भी डालेगी । और तुम मरोगे भी नहीं । यह तुम्हें जलाएगी । लेकिन तुम्हारा कचरा ही जलेगा । तुम्हारा सोना निखरकर बाहर आ जाएगा । हर गुरु के हाथ में तलवार है । और जो गुरु तुम्हें जगाना चाहेगा । वह तुम्हें शत्रु जैसा मालूम होगा । फिर तुम्हारी नींद आज की नहीं । बहुत पुरानी है । फिर तुम्हारी नींद सिर्फ नींद नहीं है । उस नींद में तुम्हारा लोभ । तुम्हारा मोह । तुम्हारा राग । सभी कुछ जुड़ा है । तुम्हारी आशाएं । आकांक्षाएं सब उस नींद में संयुक्त है । तुम्हारा भविष्य । तुम्हारे स्वर्ग । तुम्हारे मोक्ष । सभी उस नींद में अपनी जडों को जमाए बैठे हैं । और जब नींद टूटती है । तो सभी टूट जाता है । तुम ध्यान रखना । तुम्हारी नींद टूटेगी । तो तुम्हारा संसार ही छूट जाएगा । ऐसा नहीं । जिसे तुमने कल तक परमात्मा जाना था । वह भी छूट जाएगा । नींद में जाने गए परमात्मा की कितनी सच्चाई हो सकती है ? तुम्हारी दुकान तो छूटेगी । तुम्हारे मंदिर भी न बचेंगे । क्योंकि नींद में ही दुकान बनाई थी । नींद मे ही मंदिर तय किये गये थे । जब नींद की दुकान गलत थी । तो नींद के मंदिर कैसे सही होंगे ? तुम्हारी व्यर्थ की बकवास ही न छूटेगी । तुम्हारे शास्त्र भी 2 कौड़ी के हो जाएंगे । क्योंकि नींद में ही तुमने उन शास्त्रों को पढ़ा था । नींद में ही तुमने उन्हें कठंस्थ किया था । नींद में ही तुमने उनकी व्याख्या की थी । और तुम्हारे दुकान पर रखे खाते बही अगर गलत थे । तो तुम्हारी गीता । तुम्हारी कुरआन । तुम्हारी बाइबल भी सही नहीं हो सकती । नींद अगर गलत है । तो नींद का सारा फैलाव गलत है । इसलिए गुरु तुम्हारी जब नींद छीनेगा । तो तुम्हारा संसार ही नहीं छीनता । तुम्हारा मोक्ष भी छीन लेगा । वह तुमसे तुम्हारा धन ही नहीं छीनता । तुमसे तुम्हारा धर्म भी छीन लेगा । कृष्ण ने अर्जुन को गीता में कहा है - सर्वधर्मान परित्यज्य - तू सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा । तुम हिंदू हो । गुरु के पास जाते ही तुम हिंदू न रह जाओगे । और अगर तुम हिंदू रह गए । तो समझना गुरु झूठा है । तुम मुसलमान हो । गुरु के पास जाते ही तुम मुसलमान न रह जाओगे । अगर फिर तुम्हें मुसलमानियत प्यारी रही । तो समझना । तुम गलत जगह पहुंच गए । तुम जैन हो । बौद्ध हो । या कोई भी हो । गुरु तुमसे कहेगा - सर्वधर्मान परित्यज्य । सब धर्म छोड़कर तू मेरे पास आ जा । धर्म तो अंधे की लकड़ी है । उससे वह टटोलता है । शास्त्र तो नासमझ के शब्द हैं । जो नहीं जानता । वह सिद्धांतों से तृप्त होता है । गुरु के पास पहुँचकर तुम्हारे शास्त्र । तुम्हारे धर्म । तुम्हारी मस्जिद । मंदिर । तुम खुद । तुम्हारा सब छिन जाएगा । इसलिए गुरु के पास जाना बड़े से बड़ा साहस है । ओशो ।
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