04 अप्रैल 2010

क्योंकि पत्थर आखिर पत्थर ही है

शर्मिष्ठा - मा आनंद मधु । प्रभु श्री फिर कुछ रूककर बोले - इतिहास में अभी तक प्रारम्भ से ही स्त्रियों के साथ उचित न्याय नहीं हुआ है । जिस स्त्री ने पुरुष को जन्म दिया है । उस स्त्री को ही पुरुष ने सम्पति समझ कर उसका उपभोग किया । उसका शोषण किया । उसने स्त्री को केवल भोग की वस्तु माना । ईसामसीह को भी जब क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था । तो डर के कारण उनके सभी शिष्य भाग गए थे । केवल 3 स्त्रियां ही उनके शव को लेने श्रद्धा पूर्वक जल्लाद के सामने खड़ी थीं । पर इसके बाबजूद ईसाई धर्म ने भी स्त्री को उचित सम्मान नहीं दिया । जैन धर्म तो कहता है कि - स्त्री की मुक्ति संभव ही नहीं है । उसे पहले पुरुष के रूप में जन्म लेना होगा । तभी उसकी मुक्ति होगी । मल्लिनाथ जिन्हें तीर्थंकर माना गया । वह 1 स्त्री थी । पर उसे भी पुरुष का नाम दिया गया । बुद्ध और महावीर दोनों ही स्त्री को दीक्षित करने में उत्सुक नहीं थे । क्योंकि उनका विचार था कि स्त्री के कारण उनका धर्म शीघ्र नष्ट हो जायेगा । सनातन धर्म तो स्त्री को नर्क का द्वार मानता है ।  स्त्री की प्रतिष्ठा न रामायण काल में थी । और न महाभारत काल में । सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी । 1 धोबी के कहने से उन्हें जंगल में धकेल दिया गया । द्रोपदी को 5 पति स्वीकार करने पड़े । वह जुए के दावं पर लगा दी गई । पर मैं चाहता हूं कि स्त्री को उसका खोया सम्मान मिले । इसलिये सबसे पहले नव संन्यास ग्रहण करने के लिये 1 स्त्री को पहले आमंत्रित कर रहा हूं । इस अवसर पर आज मुझे अपनी नानी की बहुत याद आ रही है । शायद बहुतों को यह न मालूम हो कि मेरे बुद्धत्व प्राप्त करने के 3 दिन बाद ही मेरी नानी ने सबसे पूर्व संन्यास लिया था । और मैं उसका साक्षी था । 1967 में वह बुद्धत्व को उपलब्ध हो गई थी । इसलिये आज भी मैं नव संन्यास देने के लिये सबसे पहले 1 नारी को ही आमंत्रित कर रहा हूं । वह हैं - शर्मिष्ठा । जिसे सदैव प्रत्येक धर्म के द्वारा नारी के प्रति की गई उपेक्षा व्यथित करती रही । पुलक और आनंद शर्मिष्ठा के अंग अंग से फूट रही थी । आमंत्रण मिलते ही वह जैसे ही संन्यास लेने के लिये उठी । पूरा हाल फिर तालियों से 

गूंज उठा । शर्मिष्ठा आगे बढ़कर प्रभु श्री के चरणों में गिर पड़ी । उसे प्रेम से उठाते । और उसकी भ्रकुटी पर अंगूठा रखकर शक्तिपात करते हुये प्रभु श्री मुस्कुरा कर बोले - आज से इसका नाम आनंद मधु है । जैसे ही प्रभु श्री ने शर्मिष्ठा के मस्तक पर अंगूठा रखकर कुछ दबाते हुये शक्तिपात किया । उसे विद्युत का तीव्र झटका सा लगा । अंग प्रत्यंग तरंगित हो उठे । उसे लगा । जैसे वह आनंद के सागर में डूबती जा रही है । फिर जैसे ही प्रभु ने अपने चित्र वाली माला पहनाई । पूरा हाल फिर तालियों से गूंज उठा । फिर प्रभु श्री ने अपनी बाईं कलाई पर बंधी गोल्डन वाच उतारते हुये मधु को पहनाते हुये घोषणा की - यह घड़ी मुझे बनारस में उस ज्योतिषी ने दी थी । जिसने मेरे बचपन में मेरे बुद्ध होने की घोषणा की थी । मैंने बचपन में उसका मस्तक देखकर उसके भिक्षु होने की भविष्यवाणी की थी । ज्योतिषी ने कहा था कि यदि मेरा कथन सिद्ध हुआ । तो यह अपनी गोल्डन वाच शर्त हार जाने के उपलक्ष्य में मुझे देगा । इसलिये आज वह घड़ी स्मृति के रूप में नव संन्यास में सर्वप्रथम दीक्षित होने वाली मधु को दे रहा हूं । फिर अन्य सभी साधक साधिकाओं को नव संन्यास देते हुये भगवान श्री ने कहा -  मैं तुम्हें वह सब कुछ दे देना चाहता हूं । जो मेरे पास है । पर यह तुम्हारी ग्राह्यता पर निर्भर है कि तुम कितना कुछ ले पाते हो । मैं तो अपना प्रेम । अपनी करुणा । अपना आनंद उलीच ही रहा हूं । मैं सोचता हूं । तुम्हें क्या भेंट दूं ? क्या कोई कीमती पत्थर ? नहीं नहीं । क्योंकि पत्थर आखिर पत्थर ही है । फिर क्या कोई सुंदर फूल ? नहीं नहीं । क्योंकि फूल तो मैं दे भी न पाऊंगा कि वह मुरझा जायेगा । मैं तुम्हें अपने हृदय का प्रेम देता हूं । क्योंकि इस पूरे जगत में प्रेम ही अकेला है । जो कि पत्थर नहीं है । और प्रेम ही ऐसा है । जो कभी मुरझाता नहीं । प्रेम मनुष्य के हृदय में परमात्मा की सुगंध है । प्रेम मनुष्य के प्राणों में परमात्मा का संगीत है ।
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जीवन का संगीत पैदा होता है - प्रेम और ध्यान से । दोनों को सम्हालो । जब अकेले तब - ध्यान में । जब कोई मौजूद हो । तब - प्रेम में ।
जब प्रेम में । तो अपने को बिल्कुल भूल जाओ । और जब ध्यान में । तो दूसरे को बिलकुल भूल जाओ । और यह रूपांतरण इतना सहज होना चाहिए । इतना तरल होना चाहिए कि इसमें जरा भी अड़चन न हो । यह सहज रूप से हो जाए । जैसे तुम घर के बाहर आते । भीतर जाते । जैसे श्वास लेते । श्वास छोड़ते । इतना ही सहज होना चाहिए । ओशो
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प्रिय आत्मन ! जब भी कोई बुद्ध पुरुष हुआ हैं । तो उसकी कोई नहीं मानते हैं । जैसे कोई राजनीति में ईमानदार आते ही भष्टाचार खत्म हो जाता है । वैसे ही धर्म के ठेकेदार का नकली धर्म की पोल खुल जाती है । तो वो विरोध सबसे पहले वही ही करते हैं । मेरे 1 नाम ( महाप्रभु ) रखने से कई पंडितों की चोटी खिंची जाती है । जब कोई जागा हुआ इंसान अंधेरी नगरी में जाते ही रोशनी हो जाती है । तो यह तो होता आया है । और बुद्ध पुरुष को या तो औरत में । या धन दौलत में  बदनाम करेंगे । और हम भी ऐसे ही हैं । बुराई करने में और सुन लेने में बड़ा आनंद आता हैं । चाहे कोई लेना देना ना हो । ओशो
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मन हमें अपने साथ लिए घूमता है । जब तक सही जगह नहीं मिल जाती । तब तक वह हमें बैठने नहीं देता है । हम कहीं बैठते हैं । तो वह बारबार हमें उठा देता है । जब उसे लगता है कि हाँ अब सही जगह मिल गयी । तब वह पूरी तसल्ली करता है । और जब संतुष्ट हो जाता है । तभी वह हमसे विदाई लेता है । उससे पहले वो विदा नहीं हो सकता । इसलिए मन को बहुत बहुत धन्यवाद । सीमा आनंदिता
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परमात्मा के पास जाने के लिये कोई रास्ता नहीं । छोटी छोटी पगडंडियां हैं । वह भी जब तुम चलना शुरु करोगे । तब बननी शुरु होगी - ओशो ।
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अगर ब्रह्मचर्य इस जगत में फला है । तो वासना से ही फला है । फल को तो तुम आदर देते हो । वृक्ष को इंकार करते हो ? तो तुम भूल कर रहे हो । तो तुम्हारे जीवन के गणित में साफ सुथरापन नहीं । बड़ी उलझन है । बड़ा विभ्रम है ।
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कहाँ से आया कहाँ जाओगे । खबर करो अपने तन की ।
सदगुरु मिले तो भेद बतावे । खुल जाये अंतर खिड़की ।
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हम दूसरे में उतना ही देख सकते हैं । उसी सीमा तक । जितना हमने स्वयं में देख लिया है । हम दूसरे की किताब तभी पढ़ सकते हैं । जब हमने अपनी किताब पढ़ ली हो । कम से कम भीतर की वर्णमाला तो पढ़ो । भीतर के शास्त्र से तो परिचित होओ । तो ही तुम दूसरे से भी शायद परिचित हो जाओ । और मजा ऐसा है कि जिसने अपने को जाना । उसने पाया कि दूसरा है ही नहीं । अपने को जानते ही पता चला कि बस 1 है । वही बहुत रूपों में प्रगट हुआ है । जिसने अपने को पहचाना । उसे पता चला । परिधि हमारी अलग अलग । केंद्र हमारा 1 है । जैसे ही हम भीतर जाते हैं । वैसे ही हम 1 होने लगते हैं । जैसे ही हम बाहर की तरफ आते हैं । वैसे ही अनेक होने लगते हैं । अनेक का अर्थ है - बाहर की यात्रा । 1 का अर्थ है - अंतर्यात्रा ।

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