15 अप्रैल 2010

रामायण में नाम की महिमा जो वास्तव में गुप्त है ??

रामचरित मानस प्रायः बहुत लोग पढते हैं और इसके २४ घन्टे के अखन्ड पाठ का काफ़ी प्रचलन है . मैं जब तक सतगुरु की शरण में नहीं पहुँचा था . मैं भी इसके रहस्यों से अनभिग्य था . महाराज जी से ही मुझे मालूम हुआ कि रामायण में दशरथ नन्दन राम की कथा के अतिरिक्त अनेकानेक रहस्य और भी हैं जितने कि वास्तव में गीता में भी नहीं हैं .
ढाई अक्षर का महामन्त्र जिसे कि संत गुप्त होने की वजह से प्रकट रूप में नाम कहते हैं . इस नाम की रामायण में अपार महिमा हैं . वास्तव में आत्मा की मुक्ति हेतु इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं . ये नाम पहले तो गुप्त है . फ़िर भी यदि कहीं से किसी को पता चल भी जाय तो इस नाम को बिना गुरु के जपना बेहद नुकसानदायक हो सकता है .और यदि ये नाम आपको मिल चुका है फ़िर भी आपका आत्मिक स्तर पर कोई उत्थान नहीं हुआ हैं तो नाम को देने वाला गुरु पहुँचा हुआ नहीं है . ये चर्चा फ़िर कभी फ़िलहाल आप नाम की महिमा निम्नलिखित दोहो में देखिये और इस सम्बन्ध में कुछ कठिनाई या प्रश्न आपके मन में हो तो आप मुझसे सहायता ले सकते हैं (रामायण में नाम की महिमा जो वास्तव में गुप्त है और ढाई अक्षर का महामन्त्र है और समस्त महाशक्तियां जिसके अधीन हैं )
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा
(सबके लिये हैं चाहे वो किसी जाति , देश या धर्म का हो . समस्त कलेश दूर करने वाला )
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
( वाल्मीक नारद ने जपा और अपनी होनी स्वयं बतायी )
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासी मुकुति हेतु उपदेसू
( शंकर जी स्वयं जपते हैं और काशी में मरने वाले के कान में बताते हैं )
महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ
( गणेश जपते हैं नाम के प्रभाव से प्रथम पूजा होती है )
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू
( वाल्मीक ने जपा डकैत से महर्षि हुये )
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी
( शंकर भवानी सहित जपते हैं )
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को
( शंकर नाम का प्रभाव जानकर विष पी गये )
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
( नाम रूप की कहानी अकथनीय है इसको अनुभवी ही ठीक जान सकता है )
नाम जीह जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
साधक नाम जपहिं लय लाए। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाए
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी
( भारी संकटो को खत्म कर देता है )
चहू चतुर कहु नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा
चहु जुग चहु श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहु किए मन मीन
मोरे मत बड़ नामु दुहू ते। किए जेहिं जुग निज बस निज बूते॥
उभय अगम जुग सुगम नाम ते। कहेउ नामु बड़ ब्रह्म राम ते॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
( राम ने अहिल्या तारी नाम ने अनेकों तारे )
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं
ब्रह्म राम ते नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महं लिय महेस जिय जानि
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊं। पायउ अचल अनूपम ठाऊ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई
चहु जुग तीनि काल तिहु लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
भाय कुभाय अनख आलसहू। नाम जपत मंगल दिसि दसहू॥
जपत उमा संग संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥
बिबसहु जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महामत्त गजराज कहु बस कर अंकुस खर्ब॥
जासु नाम सुमरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
उमा कहउं मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहंउ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि
निज अनुभव अब कहउ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।
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